सूरह 42: अश-शूरा
[राय-मशविरा/परामर्श, Consultation]
03-06: अल्लाह की महानता
07-08: क़ुरआन का मक़सद
09-12: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ
13-15: बहुदेववादियों के अलावा सबका एक ही दीन है
16-18: रसूल का उत्साह बढ़ाना
19-26: (सच्चाई पर) विश्वास करने वालों और विश्वास न करने वालों का अंजाम
27-35: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ
36-46: ईमान रखनेवालों और ईमान न रखने वालों का अंजाम
47-48: अपने गुनाहों की माफ़ी माँगो
49-50: अल्लाह की बादशाहत और ताक़त
51-53: संदेश उतारने [Revelation] का ज़रिया
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
अल्लाह जो बहुत ताक़तवाला, और बड़ी गहरी समझ-बूझ रखने वाला है, आप पर [ऐ रसूल!], इसी तरह से 'वही' [revelations] उतारता
है जैसा कि आपसे पहले गुज़र चुके (रसूलों पर) उतारता था। (3)
जो कुछ
आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन पर है, सब उसी
का है: वही है जो बड़ाई में सबसे ऊँचा और महान है। (4)
फ़रिश्ते इस तरह अपने रब की तारीफ़ के साथ उसका गुणगान
करते रहते हैं, और
धरती पर रहने वालों के लिए माफ़ी की प्रार्थना करते रहते हैं कि लगता है कि आसमान
ऊपर की तरफ़ से (इनके बोझ से) फट पड़ेगा। (याद रखो!) अल्लाह सचमुच सबसे बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है। (5)
और जिन लोगों ने अल्लाह को छोड़कर अपने लिए कुछ दूसरे
संरक्षक [Protector] बना
रखे हैं, अल्लाह
उन पर नज़र रखे हुए है; [ऐ
रसूल], आप
उनके लिए ज़िम्मेदार नहीं हैं। (6)
अत: हमने आपकी ओर अरबी में यह क़ुरआन उतार भेजी है, ताकि आप केंद्रीय शहर [मक्का], और उसके आसपास रहने वाले लोगों को (बुरे
कर्मों के नतीजे से) सावधान कर दें। और उनको उस दिन की (ख़ास करके) चेतावनी दे दें, जिस (क़यामत के) दिन सबको इकट्ठा किया
जाएगा, जिसके
आने में कोई सन्देह नहीं, जब एक
गिरोह बाग़ [जन्नत] में जाएगा और एक गिरोह (जहन्नम की) भड़कती हुई आग में। (7)
अगर ऐसा अल्लाह चाहता, तो उन सबको एक ही समुदाय बना देता, मगर वह जिस किसी को चाहता है, उसे अपनी रहमत [mercy] में शामिल कर लेता है; शैतानियाँ करने वालों का न तो कोई रखवाला
होगा और न ही कोई मददगार। (8)
उन लोगों ने अल्लाह को छोड़कर दूसरों को कैसे अपना
रखवाला बना रखा है? रखवाला
तो बस अल्लाह ही है; वही
मुर्दों को जीवित करता है; और उसको
हर चीज़ (करने) की ताक़त है। (9)
किसी चीज़ के बारे में तुम जो कुछ भी मतभेद रखते हो, उसका फ़ैसला तो अल्लाह को ही करना है।
[आप कह दें], “ऐसा है
अल्लाह, मेरा रब।
उसी पर मैं भरोसा करता हूँ, और उसी के सामने (अपना सिर) झुकाता हूँ, (10)
जो आसमानों और ज़मीन का पैदा करनेवाला है।" उसने तुम लोगों में से ही तुम्हारे लिए
जोड़े बनाए --- और चौपायों के जोड़े भी--- ताकि तुम्हारी नस्ल बढ़ सके। कोई नहीं है
जो उसके जैसा हो: वह हर बात सुनता है, सब कुछ
देखता है। (11)
आसमानों और ज़मीन की सारी कुंजियाँ उसी के क़ब्ज़े में
हैं; वह जिसके
लिए चाहता है उसकी रोज़ी को ख़ूब बढ़ा देता है और जिसके लिए चाहता है उसकी रोज़ी को
घटा देता है; उसे सारी
चीज़ों की पूरी जानकारी है। (12)
धर्म के मामलों में, उसने तुम (लोगों) के लिए वही
नियम-क़ायदे तय किए हैं जैसे आदेश उसने नूह [Noah] को दिए
थे, और जो
हमने [ऐ रसूल] आपके पास उतारा [revealed] है, और जिसका आदेश हमने इबराहीम [Abraham] और
मूसा [Moses] और ईसा
[Jesus] को
दिया था: "तुम (इसी)
दीन [धर्म] पर क़ायम रहो और उसके अंदर अलग-अलग गुटों में न बँट जाओ" --- फिर भी, बहुदेववादियों [Idolaters] को जिस
बात की तरफ़ आप बुला रहे हैं, वह
चीज़ उन के लिए बहुत कठिन व भारी है; अल्लाह
जिसे चाहता है उसे अपने लिए चुन लेता है, और जो
उसकी ओर पूरी भक्ति के साथ (गुनाहों की माफ़ी के लिए) झुकता है, उसे अपने तक पहुँचने का रास्ता दिखा
देता है। (13)
आपसी ज़िद व दुश्मनी के कारण वे लोग (धर्म के मामले
में) बँट गए, हालाँकि
ऐसा करने के समय तक उनके पास सच्चा ज्ञान आ चुका था, और, अगर तुम्हारे रब की ओर से एक नियत अवधि
तक के लिए उन्हें मुहलत दिए जाने का आदेश पहले से ही पारित न हो गया होता, तो अब तक उनका फ़ैसला पहले ही हो चुका
होता। उनके बाद के लोग, जो
(आसमानी) किताब के वारिस [inheritor] हुए, वे उसके बारे में संदेह के चलते सख़्त
उलझन में पड़े हुए हैं। (14)
अतः [ऐ रसूल] आप उन लोगों को उसी (सच्चे दीन) की ओर
बुलाते रहें, और ख़ुद
सीधे रास्ते पर चलते रहें, जैसा
कि आपको हुक्म दिया गया है। उन लोगों की इच्छाओं का पालन न करें, और कह दें, "अल्लाह ने जो भी किताब उतारी है, मैं उसमें विश्वास रखता हूं। मुझे तो
आदेश हुआ है कि मैं तुम्हारे बीच न्याय करूँ। अल्लाह तो हमारा भी रब है और
तुम्हारा भी रब है --- हमारे लिए हमारे कर्म हैं और तुम्हारे लिए तुम्हारे कर्म--- हमारे और तुम्हारे बीच (अब) कोई
झगड़ा-बहस नहीं होना चाहिए ---- अल्लाह हम सबको (एक दिन) एक साथ इकट्ठा करेगा, और अन्ततः उसी के पास सबको लौटकर जाना
है।" (15)
रहे वे लोग जो अल्लाह की पुकार को स्वीकार कर लेने के
बाद भी, उस
[अल्लाह] के विषय में (अभी तक) बहस करते रहते हैं, उनके रब के सामने ऐसी (झूठी) बातों का
कोई मोल नहीं है: (अल्लाह का) क्रोध उन पर टूट पड़ेगा और उनके लिए बड़ी दर्दनाक
यातना होगी। (16)
वह अल्लाह ही है जिसने सच्चाई पर आधारित किताब उतारी
और (प्रकृति के नियमों का और इंसाफ़ का) संतुलन स्थापित किया। तुम्हें क्या मालूम? शायद क़यामत की घड़ी जल्दी ही आ जाए: (17)
जो लोग उस [क़यामत] में विश्वास नहीं रखते, वे चाहते हैं कि यह घड़ी जल्दी आ जाए, किन्तु जो इसमें विश्वास रखते हैं, वे तो उससे डरे-सहमे रहते हैं। वे जानते
हैं कि यह सत्य है; जो लोग
उस घड़ी के बारे में (सन्देह डालने वाली) बहसें करते रहते हैं, वे सही रास्ते से बहुत ज़्यादा भटके हुए
हैं। (18)
अल्लाह अपने बन्दों [सभी जीवों] पर बेहद दयालु है; वह जिसे चाहता है रोज़ी (बढ़ा के) देता है; वह बहुत ताक़तवाला, अत्यन्त प्रभुत्वशाली है। (19)
अगर कोई आदमी आने वाली दुनिया [आख़िरत/परलोक] में
(अपने लिए) फ़सल [harvest] चाहता है, तो हम उसकी फ़सल को और बढ़ाकर देंगे; और अगर कोई (केवल) इसी दुनिया की फ़सल
चाहता है, तो हम
उसे उसी में से कुछ हिस्सा दे देंगे, मगर
(फिर) आने वाली दुनिया में उसका कोई हिस्सा नहीं होगा। (20)
वे लोग ऐसे (ठहराए हुए अल्लाह के) साझेदारों [Partners] पर कैसे
विश्वास कर सकते हैं, जो उनके
लिए दीन [Faith] के ऐसे
तरीक़ों का हुक्म देते हैं जिसकी मंज़ूरी अल्लाह ने दी ही नहीं? अगर अंतिम निर्णय के बारे में अल्लाह का
आदेश पारित न हो गया होता, तो उनके
बीच फ़ैसला पहले ही किया जा चुका होता। शैतानी करने वालों को बड़ी दर्दनाक सज़ा
होगी--- (21)
तुम उन [ज़ालिमों] को देखोगे कि जो बुरे कर्म
उन्होंने कर रखे हैं, उसके
नतीजे में डरे-सहमे हुए होंगे: मगर सज़ा तो उनको मिलकर ही रहेगी--- किन्तु जिन
लोगों ने विश्वास [ईमान] रखा और अच्छे कर्म किए, वे (जन्नत में) फूलों से लदे हुए बाग़ों
में होंगे। अपने रब से वे जिस चीज़ की भी इच्छा करेंगे, उन्हें वह सब कुछ मिलेगा: यही सबसे बड़ा
इनाम है; (22)
यही तो है वह चीज़ जिसकी ख़ुशख़बरी अल्लाह अपने उन बंदों
को देता है जो ईमान रखते हैं और अच्छे कर्म करते हैं।
[ऐ रसूल] आप कहें, "मैं इस (अच्छाई की तरफ़ बुलाने के काम) के बदले में
तुमसे कोई मज़दूरी नहीं माँगता, बस
नातेदारी के कारण थोड़ा सा स्नेह चाहता हूँ।” अगर कोई
आदमी कुछ भलाई का काम करेगा, तो हम उसके
लिए उसकी अच्छाई को और बढ़ा देंगे; अल्लाह बड़ा
माफ़ करने वाला और (अच्छाई की) बहुत क़द्र करने वाला है। (23)
वे ऐसा कैसे कह सकते हैं कि "इस आदमी [रसूल] ने अल्लाह के नाम से झूठी बातें गढ़कर
बना ली हैं?"
अगर अल्लाह चाहता, तो आपके दिल को ठप्पा [Seal] लगाकर बंद कर देता और झूठ को मिटा देता: अल्लाह अपने शब्दों से सच्चाई की
पुष्टि करता है। जो कुछ सीनों में छुपा है, वह उसकी
पूरी जानकारी रखता है--- (24)
वही तो है जो अपने बंदों के (गुनाहों से) तौबा करने
को क़बूल करता है और बुरे कर्मों को माफ़ करता है---- (हालाँकि) जो कुछ तुम करते
हो, वह सब
जानता है। (25)
और वह उन लोगों की दुआएं सुनता है जो (एक अल्लाह पर)
ईमान रखते हैं और अच्छे कर्म करते हैं, और अपनी
उदारता से उन्हें और ज़्यादा इनाम देता है। रहे (सच्चाई से) इंकार करने वाले [काफ़िर], तो उनके लिए दर्दनाक यातना है। (26)
अगर अल्लाह अपने (पैदा किए हुए) सभी जीवों के लिए
रोज़ी को ख़ूब बढ़ा देता, तो वे धरती
पर अकड़ते और बदतमीज़ी पर उतर आते। मगर वह जितनी (रोज़ी) चाहता है, एक सही अंदाज़े के साथ उतार भेजता है, क्योंकि वह अपने बन्दों को अच्छी तरह से जानता है, और उनपर नज़र रखता है: (27)
जब लोग सारी उम्मीद छोड़ चुके होते हैं, तो वही है जो बारिश से राहत पहुँचाता है और अपनी रहमत
[mercy] को दूर-दूर
तक फैला देता है। वही है सबका रखवाला, हर प्रशंसा
के लायक़। (28)
आसमानों और ज़मीन की रचना और वे सारे जीवधारी जो उस
(अल्लाह) ने इनमें चारों ओर फैला रखे हैं, अल्लाह
की निशानियों में से हैं: वह जब कभी चाहे, उन्हें
एक-साथ इकट्ठा करने की ताक़त भी रखता है। (29)
जो भी मुसीबत तुम (लोगों) को पहुँचती है, वह तुम्हारे अपने हाथों किए गए कर्मों
का नतीजा है--- अल्लाह तो बहुत कुछ माफ़ कर देता है--- (30)
धरती पर तुम कहीं भी उससे बचकर निकल नहीं सकते:
अल्लाह को छोड़कर न तुम्हारा कोई संरक्षक है और न कोई मददगार। (31)
उसकी निशानियों में से हैं समुद्र में चलनेवाले
(ऊँचे) जहाज़, जो पानी
में तैरते हुए पहाड़ों जैसे लगते हैं: (32)
अगर वह चाहे, तो हवा
को ठहरा दे, जिससे
वे (जहाज़) समुद्र की सतह पर बिना किसी हरकत के खड़े रह जाएँ --– सचमुच इसमें बड़ी
निशानियाँ हैं हर उस आदमी के लिए, जो
धीरज से काम लेता हो और शुक्र अदा करने वाला हो ---- (33)
या अगर वह [अल्लाह] चाहे, तो यात्रियों के (बुरे) कर्मों के चलते
उन (जहाज़ों) को नष्ट कर दे --- वैसे अल्लाह बहुत माफ़ करनेवाला है ---- (34)
तो जो लोग हमारे संदेशों में झगड़े निकालते हैं, उन्हें जान लेना चाहिए कि उनके लिए भाग
निकलने की कोई जगह नहीं है। (35)
तुम्हें जो चीज़ मिली है, वह तो सांसारिक जीवन की (तेज़ी से)
समाप्त होने वाली सुख-सामग्री मात्र है। इससे कहीं बेहतर और लम्बे समय तक बाक़ी रहने वाली चीज़ तो अल्लाह अपने उन बंदों को देगा, जो
अपने रब में विश्वास और भरोसा रखते हैं; (36)
जो बड़े-बड़े गुनाहों और अश्लील कर्मों [indecencies] से
बचते है; जब
उन्हें (किसी पर) ग़ुस्सा आता है तो वे क्षमा कर देते हैं; (37)
अपने रब का हुक्म मानते हैं; नमाज़ क़ायम करते हैं; काम-काज के मामलों में एक दूसरे से सलाह-मशविरा करते हैं; और जो कुछ (रोज़ी) हमने उन्हें दे रखी
है उसमें से दूसरों पर भी ख़र्च करते हैं; (38)
और जब उन पर ज़ुल्म किया जाता है तो वे अपनी रक्षा
करते हैं। (39)
बुराई (नुक़सान) के बदले में ठीक उसी के बराबर बुराई
(हानि) की जा सकती है, हालाँकि
जो कोई माफ़ कर देता है और (मामले में) सुधार करता है, तो उसका इनाम उसे ख़ुद अल्लाह से मिलेगा
--- वह ज़ुल्म करने वालों को पसन्द नहीं करता। (40)
अपने ऊपर ज़ु्ल्म होने के बाद, अगर कोई आदमी अपनी रक्षा करता है, तो उसके ख़िलाफ़ कार्रवाई करने का कोई
कारण नहीं है, (41)
मगर उनके ख़िलाफ़ ज़रूर क़दम उठाना चाहिए जो लोगों पर
ज़ुल्म करते हैं और धरती पर न्याय की तमाम सीमाओं को तोड़ डालते हैं---- ऐसे लोगों
के लिए दर्दनाक यातना होगी---- (42)
किन्तु जो आदमी धीरज से काम लेता है और क्षमा कर देता
है, तो यह
बहुत हिम्मत (और महानता) का काम है। (43)
जिस आदमी को अल्लाह भटकता छोड़ दे, तो उसके बाद कोई और नहीं होगा जो उसकी
मदद कर सके: [ऐ रसूल], आप
ज़ालिमों को देखेंगे कि जब वे यातना को देख लेंगे तो कह रहे होंगे, "क्या अब लौटने का भी कोई रास्ता है?" (44)
और आप देखेंगे कि उन्हें उस (जहन्नम की) आग के सामने
इस हालत में लाया जाएगा कि बेबसी और अपमान के कारण दबे हुए, और नज़रें चुरा रहे होंगे। जबकि जो लोग
ईमान रखते थे, वे उस
समय कहेंगे कि "निश्चय
ही असल घाटे में वही हैं जिन्होंने क़यामत के दिन अपने आपको और अपने लोगों को घाटे
में डाल दिया।" सचमुच!
शैतान लोग [ज़ालिम] कभी न ख़त्म होनेवाली यातना में पड़े होंगे; (45)
और उनके कोई साथी व मददगार भी न होंगे, जो अल्लाह के ख़िलाफ़ उनकी मदद कर सकें।
(याद रहे) जिसे अल्लाह भटकता छोड़ दे, तो
उसके लिए फिर (आगे बढ़ने का) कोई रास्ता नहीं। (46)
[ऐ लोगो!] अपने रब की बात उस दिन के आने
से पहले-पहले मान लो जिसे अल्लाह की ओर से टाला नहीं जा सकता--- उस दिन तुम्हारे
लिए न कोई शरण लेने की जगह होगी और न तुम्हारे लिए (अपने गुनाहों से) इंकार करना
संभव होगा। (47)
अगर वे तब भी आपकी बातों से मुँह मोड़ें--- तो (याद
रखें ऐ रसूल!) कि हमने आपको उन पर निगरानी रखनेवाला बनाकर तो भेजा नहीं है: आप पर
तो केवल संदेश पहुँचा देने की ज़िम्मेदारी है। हाल यह है कि जब हम आदमी को अपनी ओर
से दयालुता का मज़ा चखाते हैं, तो वह
बहुत ख़ुश होकर इतराने लगता है, और अगर
ख़ुद अपने हाथों किए गए करतूत के कारण ऐसे लोगों को जब कोई मुसीबत आ पड़ती है, तो वह बड़ा नाशुक्रा [कृतघ्न /ungrateful] बन
जाता है। (48)
अल्लाह की ही बादशाहत है आसमानों और ज़मीन पर; वह जो चाहता है पैदा करता है--- जिसे
चाहता है लड़की प्रदान करता है, और
जिसे चाहता है लड़का प्रदान करता है, (49)
या लड़के और लड़कियाँ दोनों मिलाकर देता है, और जिसे चाहता है निस्संतान रखता है: वह
सब कुछ जाननेवाला, बहुत
ताक़तवाला है। (50)
किसी इंसान की इतनी हैसियत नहीं कि अल्लाह उससे (सीधे-सीधे)
बात करे, बल्कि
(अल्लाह की बात) 'वही' [revelation] के
द्वारा, या
परदे के पीछे से (बिना दिखे) होती है, या यह
कि वह एक संदेश लानेवाला (फ़रिश्ता) भेज दे, जो
अल्लाह के हुक्म से 'वही' का संदेश पहुँचा दे: वह बहुत ऊँची
शानवाला, बहुत
समझ-बूझ रखने वाला है। (51)
और इस तरह, [ऐ
रसूल] हमने अपने आदेश से आपकी ओर 'वही' [revelation] के
द्वारा एक रूह [क़ुरआन] उतारी है: आप इससे पहले न यह जानते थे कि किताब क्या होती
है और न यह कि ईमान क्या होता है, मगर
हमने इस किताब [क़ुरआन] को एक रौशनी बनाया, जिसके
द्वारा हम अपने बन्दों में से जिसे चाहते हैं, मार्ग दिखाते हैं। इसमें कोई शक नहीं
कि आप, लोगों
को सीधा रास्ता दिखाते हैं, (52)
जो अल्लाह का मार्ग है, वह अल्लाह, जिसके क़ब्ज़े में वह सब कुछ है जो
आसमानों और ज़मीन में है: हक़ीक़त यह है कि सारे मामले अंत में अल्लाह के ही ओर लौटेंगे। (53)
नोट:
8: यानी अल्लाह चाहता
तो सबको ईमानवाला बना देता, मगर ऐसा नहीं है, बल्कि हर इंसान को यह आज़ादी दी गई है कि वह सोच-समझकर सच्चाई को क़बूल करे या
चाहे तो न करे। इसी के अनुसार आख़िरत में उसके कर्मों का फ़ैसला होगा।
20: यही विषय सूरह
इसरा/ बनी इसराईल (17: 18) में भी है, जिसमें कहा गया है कि जो आदमी केवल दुनिया की भलाई चाहता है, उसको केवल दुनिया
की ही नेमतें दी जाएंगी, लेकिन हर माँगी हुई चीज़ भी नहीं मिलती, बल्कि अल्लाह जिसको
जितना देना चाहता है, उतना देता है।
23: मक्का के लोगों के
साथ मुहम्मद (सल्ल) की रिश्तेदारियाँ थीं, मुहम्मद साहब
अल्लाह का संदेश पहुंचाने के लिए तो कोई फीस नहीं मांगते, बल्कि केवल इतना
चाहते हैं कि मक्का के लोग कम से कम नातेदारी का हक़ निभाते हुए उन्हें तकलीफ़ न
पहुंचाएं, और उनके रास्तों में कांटे न बिछाएं।
51: "वही" की एक
सूरत यह होती है कि अल्लाह जो बात कहना चाहता है, वह किसी के दिल में
डाल देता है।
52: "रूह" का मतलब
(फ़रिश्ता) हज़रत जिबरील (अलै.) भी हो सकता है, जिन्हें "रूह
उल क़ुद्स" भी कहा जाता है और अल्लाह ने अपने संदेश भेजने के लिए उन्हें ही
चुना है।