सूरह 1: अल-फ़ातिहा
यह एक मक्की सूरह है।
पूरे क़ुरआन में अल्लाह का जो संदेश आया है, उसका इस
सूरह में निचोड़ पेश किया गया है, दूसरे शब्दों में कहें तो
"गागर में सागर भर दिया गया है।" यह
सूरह इस्लामी इबादत के लिए बहुत अहम है क्योंकि इस सूरह को हर नमाज़ में पढ़ना ज़रूरी
होता है और इस तरह, इसे दिन भर में 17 बार
पढ़ा जाता है। असल में देखा जाए तो इसमें अल्लाह का अपने बंदों से संबंध स्थापित
किया गया है, सर्वशक्तिमान के रूप में इस दुनिया में और
आनेवाली दुनिया में अल्लाह की नि:संंदेह authority है,
और इंसान उस पर पूरी तरह से निर्भर है, चाहे
मार्गदर्शन हो या मदद मांगना हो। मुख्य बात यही है कि इंसान इस बात को मान ले कि
अकेला अल्लाह ही इबादत के लायक़ है---- इस सच्चाई से इंकार करनेवाले इस हक़ीक़त को
समझने में असमर्थ हैं। जो भी बुनियादी सिद्धांत इस सूरह में दिए गए हैं, बाक़ी क़ुरआन में उन्हीं बातों को विस्तार से बताया गया है।
विषय:
01 : अल्लाह के नाम से शुरू
02-07: दुआ
1: क़ुरआन में जब-जब "रहमान" शब्द आया है, वह इस संदर्भ में है कि अल्लाह बहुत ताक़तवाला और महान होने के साथ-साथ बहुत दयावान भी है। इसका मतलब वह हस्ती जिसकी रहमत बहुत व्यापक [Extensive] हो, यानी दुनिया का हर अच्छा-बुरा आदमी उसकी दी हुई नेमतों से फ़ायदा उठाता है, इसलिए अल्लाह 'रहमान' यानी सब पर मेहरबान है। यह शब्द केवल अल्लाह के लिए ही इस्तेमाल होता है कि बड़े प्यार और दया [loving mercy] से उसने सृष्टि की हर चीज़ को पैदा किया है|
अल्लाह "रहीम" भी है, इसका मतलब यह है कि रहम [दया] करना उसकी प्रकृति में रचा-बसा हुआ है, और वह जिसे चाहता है, उस पर रहम [दया] करता है।
“रहमान" और "रहीम" का संबंध इस तरह का है कि जैसे 'रहमान' सूरज की रौशनी है जो सारे आसमान को रौशन कर देती है, और 'रहीम' सूरज की रौशनी की एक ख़ास किरण है जो किसी जीव पर पड़ती है।
2: अरबी में "रब" का मतलब मालिक के साथ-साथ परवरिश करना और देखभाल करना भी होता है। तो जहाँ-जहाँ भी क़ुरआन में "रब" का शब्द आया है, इसका ये मतलब भी ध्यान में रखना चाहिए।
"आ'लमीन" का मतलब सारे जहानों का यानी इंसानों का, जानवरों का, फ़रिश्तों का, पौधों का, इस दुनिया का, आने वाली दुनिया का, इत्यादि।
इस कायनात की हर चीज़ अल्लाह की बनायी हुई है। अगर किसी चीज़ की तारीफ़ की जाए, तो वह असल में उसके बनाने वाले की ही तारीफ़ होगी, इस तरह सारी तारीफ़ें अल्लाह के लिए हैं, जो सारे जहानों का रब है।
4: अल्लाह "फ़ैसले के दिन" का मालिक है, जिस दिन हर आदमी के कर्मों का हिसाब-किताब होगा और इसके नतीजे में किसी को इनाम मिलेगा और किसी को सज़ा। दुनिया में इंसानों को थोड़े समय के लिए कुछ-कुछ चीज़ों का मालिक बनाया गया है, मगर क़यामत के दिन यह अधिकार ख़त्म हो जाएगा।
5: यहाँ से बंदों को अल्लाह से दुआ करने का तरीक़ा सिखाया गया है। केवल अल्लाह की ही इबादत [पूजा] करना और केवल उसी से ज़रूरत पड़ने पर मदद माँगने को ही "तौहीद" [एकेश्वरवाद] कहते हैं। अल्लाह को छोड़कर किसी और को मदद के लिए पुकारना या अल्लाह के साथ किसी और (ख़ुदा) को भी अल्लाह का साझेदार मानना बिल्कुल ग़लत है।
6: यहाँ सीधा रास्ता दिखाने की दुआ की गई है जो हमेशा से नेक और सच्चे लोगों का रास्ता रहा है, जिन पर अल्लाह ने अपना करम किया है।
7: वैसे लोगों पर गुस्सा उतरा है, जो सच्चाई जानने के बावजूद अपने घमंड और अपने बाप-दादा की परम्परा के मोह में अटके रहे या अपनी बड़ाई के समाप्त हो जाने के डर से सच्चाई से मुँह मोड़ते रहे।
सीधे रास्ते से गुमराह वे हो गए जो सच्चाई सामने होते हुए भी झूठे ख़ुदाओं के जाल में फंस गए और उन्हें अल्लाह का साझेदार मानकर अपनी ज़रूरतों के लिए पुकारने लगे।
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