01-02: यह स्पष्ट किताब अरबी ज़बान में है
03 : यूसुफ़ (अलै) की कहानी का परिचय
04-06: यूसुफ़ का ख़्वाब
07-22: यूसुफ़ और उनके भाई-बंधु
23-34: यूसुफ़ और मिस्र के अज़ीज़ की बीवी
35-42: यूसुफ़ क़ैदख़ाने में
43-49: यूसुफ़ ने बादशाह के ख़्वाब का मतलब बताया
50-57: यूसुफ़ की क़ैद से रिहाई और मिस्र में ऊँचा दर्जा हासिल करना
58-69: यूसुफ़ के भाइयों का मिस्र आना
70-87: यूसुफ़ का अपने भाइयों को बुद्धू बनाना
88-101: याक़ूब (अलै) और उनके ख़ानदान का मिस्र आना
102-108: यूसुफ़ (अलै) का ख़्वाब पूरा होना, कहानी की समाप्ति
109-111: पिछली पीढ़ियों को सज़ा: एक चेतावनी
111 : क़ुरआन कोई झूठी बनाई हुई बात नहीं है
5: ख़्वाब सुनकर हज़रत याक़ूब [अलै.) समझ गए थे कि यूसुफ़ को एक दिन इतना ऊँचा दर्जा मिलने वाला है कि एक समय उनके ग्यारह (11) भाई, माँ और बाप उसके सामने आदर से झुक जाएंगे। यूसुफ़ को यह बात उन्होंने अपने भाइयों को बताने से इसलिए मना किया था कि असल में उनका सगा एक ही भाई बेन्यामिन था, बाक़ी दस भाई सौतेले थे, जो यूसुफ़ से जलन के चलते हो सकता था कि कुछ ग़लत क़दम उठाने के लिए सोचते।
7: मक्का के विश्वास न करने वाले लोग बीच-बीच में मुहम्मद (सल्ल) को परखने के लिए उनसे कुछ पूछते रहते थे कि अगर वह सच्चे नबी हैं तो उन्हें पुरानी बातें पता होनी चाहिए, सो ऐसा ही एक सवाल उनसे पूछा गया था कि इसराईल की संतानें फ़िलिस्तीन के इलाक़े से मिस्र में जाकर क्यों आबाद हो गयी थीं? असल में यह सूरह उसी के जवाब में उतरी है।
21: जिसने मिस्र के बाज़ार में यूसुफ़ को ख़रीदा, वह वहाँ का गवर्नर था जो शायद भंडार मंत्री भी था, जिसे मिस्र में "अज़ीज़" कहा जाता था।
24: उस वक़्त अल्लाह ने यूसुफ़ (अलै.) को क्या निशानी दिखाई जिससे वह गुनाह करने से बच गए, यह बात बताई नहीं गई है, बहरहाल, जो नेक बंदे होते हैं वह हर वक़्त अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते हैं, एक पल के लिए ग़लत काम का ख़्याल आ भी जाए, तो दूसरे ही पल अल्लाह से डरते हुए उससे रुक जाते हैं।
41: यहाँ "मालिक" का मतलब मिस्र के बादशाह से है, यह आदमी बादशाह को शराब पिलाया करता था।
50: हज़रत यूसुफ़ (अलै.) बिना अपनी बेगुनाही साबित हुए जेल से नहीं जाना चाहते थे, और उनका असल मक़सद अपने मालिक [अज़ीज़] को यह जताना था कि उन्होंने पीठ पीछे उनके साथ कोई धोखा नहीं किया [आयत 52]
53: यूसुफ़ (अलै.) ने अपनी बेगुनाही साबित हो जाने के बाद भी अल्लाह का शुक्र अदा किया कि अगर उसने दया न की होती, तो गुनाह से बचना बहुत कठिन होता।
55: जब यूसुफ़ (अलै) ने बादशाह को आने वाले अकाल की तैयारियों के बारे में ज़रूरी सुझाव दिए, तो सुनकर बादशाह बहुत ख़ुश हुआ, मगर उसको यह चिंता हुई कि वैसे समय में कौन इस काम की सही देखरेख कर पाएगा, इस पर यूसुफ़ (अलै.) ने अपने नाम की पेशकश की, क्योंकि उन्हें अंदेशा था कि मुश्किल समय में ग़रीब लोगों के साथ ज़ुल्म किया जाएगा।
56: आयत 21 में भी मिस्र में यूसुफ़ (अलै) के क़दम जमाने की बात आयी है, और साथ में यह भी है कि उन्हें ख़्वाबों का सही मतलब निकालने का हुनर भी सिखा दिया। यह आयत उससे जुड़ी हुई है, क्योंकि उसके बाद कई इम्तेहानों से गुज़रने के बाद जब यूसुफ़ (अलै) ने ख़्वाब का सही मतलब बताया, तो बादशाह ने ख़ुश होकर उन्हें बड़ा पद दे दिया, और फिर अज़ीज़ के मरने के बाद उन्हें "अज़ीज़" बना दिया गया जो बादशाह के बाद सबसे बड़ा पद था, इस तरह अल्लाह ने उनके पाँव मिस्र में मज़बूती से जमा दिए।
58: अकाल पड़ जाने के बाद जब लोगों को पता चला कि मिस्र में अनाज सही दाम पर मिल रहा है, तो दूर-दूर से लोग आने लगे। यूसुफ़ (अलै) के बाबा और भाई तो फ़िलिस्तीन के इलाक़े कनान में रहते थे, वहाँ से उनके भाई भी अनाज लेने मिस्र आए। ...... यूसुफ़ को उनके भाइयों ने जब कुएं में डाला था, तब वे बहुत छोटे (शायद 7 साल के) थे, इसलिए जब इतने सालों के बाद मिले तो उनके भाइयों ने उन्हें नहीं पहचाना।
59: असल में वहाँ दस भाई गए थे और उन लोगों ने अपने एक और (सौतेले) भाई के लिए भी राशन के हिसाब से अनाज माँगा जो वहाँ नहीं आया था, इसलिए कहा गया कि अगली बार उसे ज़रूर लाना, ताकि उसका हिस्सा मिल सके और यह पता चल जाए कि तुम लोग झूठ नहीं बोल रहे हो।
67: कुछ लोगों का मानना है कि याक़ूब (अलै) ने सभी भाइयों को अलग-अलग दरवाज़ों से दाख़िल होने के लिए इसलिए कहा था ताकि वे बुरी नज़र से बच सकें।
100: यूसुफ़ (अलै) ने बचपन से कैसी-कैसी तकलीफ़ों का सामना किया, लेकिन यहाँ उन्होंने अपनी परेशानी के बारे में नहीं कहा, बल्कि केवल Positive बातें कहीं, और अल्लाह का शुक्र अदा किया।
102: जैसा कि ऊपर आयत: 7 में बताया गया कि मक्का के लोगों ने मुहम्मद (सल्ल) से एक सवाल पूछा था, और उन्हें लगता था कि वह इसका जवाब नहीं बता पाएंगे, मगर अल्लाह ने "वही" द्वारा पूरी कहानी बता दी, मगर फिर भी वे लोग विश्वास करने वाले नहीं थे।
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