Sunday, May 1, 2016

सूरह 46 : अल अहक़ाफ़ [रेत के टीले, The Sand Dunes]

सूरह 46: अल-अहक़ाफ़ 
[रेत के टीले, The Sand Dunes]



02: यह किताब अल्लाह की तरफ़ से है

03-06: मूर्तिपूजा करने की मूर्खता 

07-08: अल्लाह के संदेश को मानने से इंकार 

   09: एक रसूल जो अल्लाह की तरफ़ से लोगों को सावधान करने आया है

10-14: रसूल की लाई हुई किताब [क़ुरआन]मूसा की किताब [तौरात] जैसी है

15-18: माँ-बाप के साथ प्यार से पेश आना 

19-20: हर एक अपने-अपने कर्मों से परखा जाएगा

21-28: 'आद' की क़ौम की कहानी 

29-32: जिन्नों का क़ुरआन सुनकर उसपर विश्वास कर लेना 

33-35: क़यामत में दोबारा उठाया जाना और सबका हिसाब-किताब होना तय है


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

हा॰ मीम॰ (1)

इस किताब [क़ुरआन] को अल्लाह की तरफ़ से उतारा जा रहा है, जो बहुत ताक़त व इज़्ज़तवाला, गहरी समझ-बूझ रखनेवाला है।  (2)

हमने आसमानों और ज़मीन, और जो कुछ उन दोनों के बीच मौजूद है, उनकी रचना एक ख़ास मक़सद और एक तय की हुई अवधि तक के लिए ही की है, इसके बावजूद जिन लोगों ने सच्चाई को मानने से इंकार किया है, वे उन चेतावनियों पर ध्यान नहीं देते जो उन्हें दी जाती रही हैं।  (3)

[ऐ रसूल] आप कहें, "तुम अल्लाह को छोड़कर जिनकी पूजा करते हो, क्या तुमने उनके बारे में कभी सोचा है: मुझे दिखाओ तो सही कि इस धरती का कौन सा हिस्सा है जिसे उन्होंने पैदा किया है या बताओ कि आसमानों में क्या कोई हिस्सा है जो इनके क़ब्ज़े में है; मेरे पास इस [क़ुरआन] से पहले की कोई किताब [Scripture] ले आओ या दिव्य ज्ञान की कोई बची हुई मान्यताओं को ही (सबूत में) पेश करो---- अगर तुम अपनी बात में सच्चे हो।" (4)

उस आदमी से बढ़कर ग़लती पर और कौन होगा जो अल्लाह को छोड़कर उन (गढ़े हुए देवताओं) को पुकारता हो, जो क़यामत के दिन तक उसकी पुकार का जवाब नहीं दे सकते, उन्हें तो यह भी ख़बर नहीं कि उन्हें कोई पुकार रहा है; (5)

और जब सारे लोग (क़यामत के दिन) इकट्ठा किए जाएँगे तो वे [गढ़े हुए देवता] ख़ुद उस आदमी के दुश्मन हो जाएंगे और उसके द्वारा की गयी पूजा को न मानते हुए उससे अलग हो जाएंगे!  (6)


जब हमारी (क़ुरआन की) आयतें उन्हें पढ़कर स्पष्ट रूप से सुनाई जाती हैं तो वह सच्चाई जो उन लोगों तक पहुँचती है, उसके बारे में इंकार करनेवाले लोग [काफ़िर] यह कह देते हैं कि "यह तो सचमुच जादू है।" (7)

या वे कहते हैं कि, "उस [रसूल] ने इस (क़ुरआन) को स्वयं अपनी तरफ़ से गढ़ लिया है?" [ऐ रसूल] आप कह दें, "अगर मैंने इसे सचमुच गढ़ा है तो तुम मुझे अल्लाह की पकड़ से ज़रा भी नहीं बचा सकते। जिसके बारे में तुम बातें बनाने में लगे हो, वह [अल्लाह] उसे भली-भाँति जानता है। और वह मेरे और तुम्हारे बीच गवाह की हैसियत से काफ़ी है। और वही बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है।" (8)

कह दें, "मैं अल्लाह के रसूलों में कोई पहला (या अलग) रसूल तो नहीं हूँ। मैं (निजी तौर पर) नहीं जानता कि मेरे साथ क्या किया जाएगा और न यह मालूम है कि तुम्हारे साथ क्या होगा; (अल्लाह की ओर से) जो भी “वही” [revelation] मुझे भेजी जाती है, मैं बस उसी का अनुसरण करता हूँ; और मैं सीधे-सीधे (अल्लाह की ओर से) सावधान करनेवाला हूँ।" (9)

आप कहें, "क्या तुमने सोचा भी है: क्या होगा अगर यह क़ुरआन सचमुच अल्लाह की तरफ़ से हुई और फिर भी तुमने उसको मानने से इंकार कर दिया? क्या होगा अगर इसराईल की सन्तानों में से कोई इस किताब को पुरानी आसमानी किताबों [तोरात, इंजील] से मिलती जुलती होने की गवाही दे दे, और उसमें विश्वास करने लगे, मगर तब भी तुम घमंड में इतने पड़े रहो (कि विश्वास न कर सको)? सचमुच अल्लाह शैतानियाँ करने वालों को मार्ग नहीं दिखाता।" (10)


जो लोग सच्चाई से इंकार करने पर अड़े रहे, वे विश्वास रखनेवालों के बारे में कहते हैं, "अगर इस (क़ुरआन) में कुछ भी अच्छा होता, तो हम लोगों से पहले उन (गरीब दबे-कुचले लोगों) ने इसमें विश्वास न किया होता", और चूँकि उन [काफ़िरों] ने उससे मार्गदर्शन लेने से इंकार कर दिया, सो अब वे कहते हैं, "यह तो वही पुराना झूठ है!" (11)

हालाँकि इससे पहले मूसा [Moses] की किताब [तोरात/Torah] एक रास्ता दिखानेवाली और रहमत [mercy] के रूप में उतारी जा चुकी थी, और यह (क़ुरआन) अरबी भाषा में एक ऐसी किताब है जो उस (तोरात) के सही व सच्ची होने की पुष्टि करती है, ताकि बुरे कर्म करनेवालों को सावधान कर दे, और अच्छा कर्म करनेवालों के लिए ख़ुशख़बरी ले आए। (12)

इसमें शक नहीं कि जिन लोगों ने कह दिया, "हमारा रब अल्लाह है, "फिर वे सीधे मार्ग पर जमे रहे, तो उन्हें न तो किसी बात का डर होगा और न वे दुखी होंगे:  (13)

वही जन्नतवाले लोग हैं, वहाँ वे हमेशा के लिए रहेंगे-- यह उन कर्मों का इनाम [reward] है जो वे (दुनिया में) किया करते थे।  (14)


हमने आदमी को अपने माँ-बाप के साथ अच्छा व्यवहार करने का आदेश दिया है: उसकी माँ तकलीफ़ उठाकर उसे (पेट में) लिए फिरी और उसे बड़ी तकलीफ़ के साथ जन्म दिया---- और उसके गर्भ की अवस्था में रहने और दूध छुड़ाने में पूरे तीस माह लगे, यहाँ तक कि जब वह अपनी पूरी जवानी को पहुँचा और चालीस वर्ष का हुआ तो उसने कहा, "ऐ मेरे रब! मेरी मदद कर कि मैं तेरे इस एहसान का शुक्रिया अदा कर सकूँ जो तुने मुझ पर और मेरे माँ-बाप पर किया है; और यह कि मैं अच्छे कर्म कर सकूँ जिससे तू ख़ुश हो जाए; मेरी संतान को भी अच्छा व नेक बना। मैं (तौबा के लिए) तेरी ही ओर झुकता हूँ; और मैं उन लोगों में से हूँ जो पूरी तरह से तुझ पर समर्पित [मुस्लिम] हैं।" (15)

ऐसे ही लोगों के द्वारा किए गए कर्मों में से बेहतरीन कामों को हम क़बूल कर लेते हैं, और हम उनके बुरे कर्मों को (माफ़ करते हुए) उसे नज़रअंदाज़ कर देते हैं। वे जन्नतवालों में शामिल होंगे---- यह सच्चा वादा है जो उनसे किया गया है। (16)


किन्तु एक आदमी है जो अपने माँ-बाप से कहता है, "उफ़्फ़! क्या आप सचमुच मुझे डरा रहे हैं कि मैं अपनी क़ब्र से ज़िंदा उठाया जाऊँगा, हालाँकि कितनी ही नस्लें हैं जो गुज़र चुकी हैं और मुझ से पहले जा चुकीं?" उसके माँ-बाप अल्लाह से फ़रियाद करते हैं, और (बेटे से) कहते हैं, "अफ़सोस है तुमपर! विश्वास करो! निस्संदेह अल्लाह का वादा सच्चा है।" मगर तब भी वह कहता है, "ये तो बस पहले के लोगों की झूठी कहानियाँ हैं और कुछ नहीं।" (17)

ऐसे सभी लोगों (की सज़ाओं) का फ़ैसला तय हो चुका है, और इनमें ऐसे सभी गिरोह शामिल हैं जो उनसे पहले गुज़र चुके हैं—चाहे वे जिन्न हों या इंसान: सचमुच वे बड़े घाटे में रहे।  (18)

(अच्छे और बुरे) कर्मों के मुताबिक़ हर एक का दर्जा तय किया जाएगा और जो कुछ उन्होंने किया है, अल्लाह उन्हें उसका पूरा-पूरा बदला दे देगा: और उनपर कोई ज़ुल्म नहीं होगा। (19)

और एक दिन आएगा जब सच्चाई से इंकार करनेवाले लोगों को (जहन्नम की) आग के सामने पेश किया जाएगा, और उनसे कहा जाएगा, "तुम अपने सांसारिक जीवन में अपने हिस्से की अच्छी चीज़ों को बेकार [waste] कर चुके और उनका मज़ा ले चुके हो, अतः आज के दिन तुम्हें अपमानित करने वाली सज़ा दी जाएगी: क्योंकि तुम धरती पर बिना किसी अधिकार के घमंड करते रहे और तुमने (मर्यादा) की सभी सीमाएं तोड़ डालीं।" (20)


[ऐ रसूल] आद के भाई [हूद] की चर्चा करें: जब उन्होंने (यमन में स्थित) रेत के टीलों के बीच बसनेवाले आद के लोगों को सावधान किया था, और ऐसा सावधान करनेवाले उनसे पहले भी और उनके बाद भी कई आए और कई गुज़र चुके थे --- (सब एक ही बात कहते कि), "अल्लाह को छोड़कर किसी की उपासना [इबादत] न करो। मुझे तुम्हारे लिए डर है कि एक भयानक दिन में तुम्हें दंडित किया जाएगा।" (21)

मगर उन्होंने कहा, "क्या तुम हमारे पास इसलिए आए हो कि हमको अपने देवताओं से अलग-थलग कर दो? तुम अगर अपनी बात में सच्चे हो, तो फिर ले आओ हम पर वह सज़ा, जिसकी धमकी तुम हमें देते हो!" (22)

हूद ने कहा, "यह तो केवल अल्लाह ही जानता है कि वह दिन कब आएगा: मैं तो तुम्हें बस वह संदेश पहुँचा रहा हूँ जो मुझे देकर भेजा गया है, मगर मैं देख रहा हूँ कि तुम बड़े अक्खड़ व जाहिल लोग हो।" (23)

फिर जब उन लोगों ने बादलों को उनकी घाटी की तरफ़ आते हुए देखा, तो वे कहने लगे, "यह बादल है जो हम पर बरसने वाला है!', (हूद ने कहा), "नहीं!, बल्कि यह तो वही चीज़ है जिसके लिए तुमने जल्दी मचा रखी थी: यह तो दर्दनाक सज़ा लिए हुए एक तूफ़ानी हवा है (24)

जो अपने रास्ते में आने वाली हर चीज़ को अपने रब के आदेश से तहस-नहस कर देगी।" (अगली सुबह) वहाँ मकानों के खंडहर के सिवा देखने के लिए कुछ भी बाक़ी नहीं बचा था: अपराधियों को हम ऐसा ही बदला देते हैं।  (25)


[ऐ मक्का के लोगो!] हमने (आद की क़ौम के) लोगों को कुछ चीज़ों में ऐसी ताक़त व सलाहियत दे रखी थी, कि वैसी ताक़त तुम्हें नहीं दी; हमने उन्हें कान, आँखें और दिल दिए थे, इसके बावजूद न तो उनके कान, न उनकी आँखें और न उनके दिल ही उनके किसी काम आ सके, क्योंकि वे अल्लाह की आयतों को मानने से इंकार करते थे। जिस चीज़ की वे हँसी उड़ाते थे, उसी यातना ने उन्हें आ घेरा।  (26)

हम तुम्हारे आस-पास बसी हुई दूसरे समुदायों की बस्तियों को भी तबाह-बर्बाद कर चुके हैं---- हमने उन्हें भी अपनी बहुत सारी निशानियाँ दी थीं, ताकि वे सही रास्ते पर वापस आ सकें---  (27)

(वे कहते थे कि) अल्लाह से नज़दीकी हासिल करने के लिए उन लोगों ने कुछ देवताओं को अल्लाह के बजाए अपना ख़ुदा बना लिया था, (अगर यह नज़दीकी वाली बात सच होती तो) फिर क्यों उनके देवताओं ने उनकी कोई मदद नहीं की? बिल्कुल नहीं! बल्कि वे (देवता) उन्हें छोड़कर ख़ुद ही चले गए: असल में यह एक झूठी बात थी जो ख़ुद उन्हीं लोगों ने गढ़कर बना ली थी।  (28)


और याद करें [ऐ रसूल], जब हमने जिन्नों के एक समूह को आपके पास क़ुरआन को सुनने के लिए भेजा था, तो जब वे वहाँ पहुँचकर उसे सुनने लगे तो उन लोगों ने (एक दूसरे से) कहा, "चुप हो जाओ!" फिर जब उस (क़ुरआन) का पाठ पूरा हुआ तो वे अपनी क़ौम की ओर लौट गए और उन्हें (अल्लाह की ओर से) चेतावनियाँ दीं। (29)

उन (जिन्नों) ने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! हमने एक ऐसी किताब [क़ुरआन] सुनी है, जो मूसा (की तौरात) के बाद उतारी गई है, जो अपने से पहले उतारी गयी किताबों को सच्चा मानती है, और सच्चाई और सीधे मार्ग की तरफ़ मार्गदर्शन करती है।  (30)

(आगे कहा) ऐ लोगो! उसकी बात मान लो जो तुम्हें अल्लाह की तरफ़ बुलाता है। उस (अल्लाह) में विश्वास करो: अल्लाह तुम्हारे गुनाहों को माफ़ कर देगा और तुम्हें दर्दनाक यातना से बचा लेगा।”  (31)

और जो कोई अल्लाह की तरफ़ बुलाने वाले की बात नहीं मानता, तो वह धरती पर कहीं भी अल्लाह के क़ाबू से बच निकलने वाला नहीं है, और न कोई अल्लाह से उसकी रक्षा करने वाला होगा: ऐसे लोग सचमुच रास्ता भटककर दूर जा पड़े हैं। (32)


क्या इंकार पर अड़े लोग [काफ़िर] यह नहीं समझते कि वह अल्लाह जिसने आसमानों और ज़मीन को पैदा किया, और जो ऐसा करने में ज़रा थका भी नहीं, उसमें इतनी ताक़त नहीं है कि वह मरे हुए लोगों को फिर से ज़िंदा कर दे? क्यों नहीं! बेशक, हर एक चीज़ उसके क़ब्ज़े में है।  (33)

और जिस दिन इंकार पर अड़े काफ़िरों को जहन्नम की आग के सामने लाया जाएगा, (और उनसे पूछा जाएगा), "क्या यह (जहन्नम) सचमुच असली नहीं है?" वे जवाब देंगे, "हमारे रब की क़सम! यह सचमुच असली है", तब अल्लाह कहेगा, "सच्चाई से इंकार करने के नतीजे में अब चखो मज़ा अपनी सज़ा का!” (34)


अत: [ऐ मुहम्मद] आप धीरज रखते हुए अपने काम पर जमे रहें! जिस तरह (आप से पहले) पक्के इरादोंवाले रसूलों [नूह, इबराहीम, मूसा, ईसा] ने धीरज से काम लिया था। आप उन [इंकार पर अड़े काफ़िरों] के लिए सज़ा माँगने में जल्दी न करें: जिस दिन वे लोग उस चीज़ को देख लेंगे जिसके बारे में उन्हें सावधान किया जाता था, तो वे महसूस करेंगे कि जैसे वे बस दिन की एक घड़ी भर से ज़्यादा (इस दुनिया में) नहीं ठहरे थे। यह एक (चेतावनी-भरा) संदेश है। अब कौन है जो बर्बाद होगा सिवाए हर बात का विरोध करनेवाले और आदेश न माननेवालों के? (35)
 
 
 
 
नोट:

6: बहुदेववादियों [Idolaters] की कई तरह की मान्यताएं होती थीं। कुछ लोगों ने दुनिया से जा चुके कुछ इंसानों को अपना ख़ुदा बना लिया थाउन इंसानों को पता ही नहीं होता कि उनकी पूजा की जा रही है, इसलिए वे इंकार कर देंगे, और जिनको पता होगा, वे यह कहेंगे कि असल में ये हमारी नहीं बल्कि अपनी इच्छाओं के पुजारी थे। कुछ दूसरे लोग वे थे जो फ़रिश्तों को अल्लाह की बेटी मानते हुए उनकी पूजा करते थे, सूरह सबा (34: 40-41) में है कि जब अल्लाह उन फ़रिश्तों से पूछेगा, तो वे कहेंगे कि ये तो जिन्नों और शैतानों की पूजा करते थे, क्योंकि उन्होंने ही इन लोगों को बहकाया था। तीसरी तरह के वे लोग होंगे जो पत्थर के बुतों को पूजते थे, तो उनके बारे में तो ज़ाहिर है कि वे बेजान पत्थर हैं, तो उन्हें तो कुछ पता ही नहीं होगा। इस तरह, ये लोग जिन-जिन की पूजा करते थे, वे सभी यही कहेंगे कि ये लोग हमारी इबादत नहीं करते थे। 

12: अरबी ज़बान में होने का ख़ास तौर पर ज़िक्र इसलिए हुआ है कि इसके पहले की आसमानी किताबें अरबी में नहीं थीं, और उन किताबों को मुहम्मद (सल्ल) के पढ़ने की कोई संभावना नहीं थी क्योंकि वह उन भाषाओं को नहीं जानते थे। इसके बावजूद अगर वह उन किताबों की बातें बता रहे हैं, तो ज़ाहिर है कि उसका ज्ञान उन्हें "वही" द्वारा ही मिलता होगा। 

15: इंसान को यह बताया गया है कि वह अपने माँ-बाप के साथ हर हाल में अच्छा व्यवहार करे। मक्का में ऐसा हुआ था कि कुछ लोगों ने सच्चाई पर विश्वास कर लिया और मुसलमान हो गए, मगर उसके माँ-बाप सच्चाई का इंकार करते रहे। हाँ, जहाँ तक हो सके, उनसे अच्छा व्यवहार करें, लेकिन अगर वे अल्लाह को छोड़कर किसी और की इबादत करने को कहें या किसी गुनाह के काम करने को कहें, तो नर्मी से ऐसी बातें मानने से मना कर देना चाहिए, जैसा कि सूरह अंकबूत (29: 8) में आया है।

गर्भ ठहर जाने से बच्चे के पैदा होने की कम से कम अवधि 6 मास होती है, और दूध पिलाने की ज़्यादा से ज़्यादा अवधि 24 महीने होती है। 

21: "अहक़ाफ़" का मतलब 'रेत के लम्बे टीले' होता है, और जहाँ आद की क़ौम रहती थी, वहाँ इस तरह के टीले बड़ी संख्या में पाए जाते थे। कुछ लोगों का कहना है कि असल में उस जगह का नाम ही अहक़ाफ़ था जो यमन में स्थित था। हज़रत हूद के बारे में सूरह अ'राफ़ (7: 65) में आया है।

27: आसपास की बस्तियों से यहाँ मतलब समूद की क़ौम और हज़रत लूत (अलै.) की क़ौम की बस्तियाँ हैं जो सीरिया जाते हुए अरबों के व्यापारिक रास्ते में पड़ती थीं। 

29: मुहम्मद (सल्ल) इंसानों के साथ-साथ जिन्नों के लिए भी पैग़म्बर बनाए गए थे। इस आयत में उस घटना का वर्णन है जब मुहम्मद साहब अल्लाह का संदेश पहुँचाने के लिए "तायफ़" नामक शहर गए थे, जहाँ उनके साथ बहुत बुरा सलूक किया गया, वहाँ से जब वह दुखी होकर मक्का वापस आ रहे थे तो रास्ते में "नख़ला" नाम की जगह पर रुके, जहाँ उन्होंने सुबह की नमाज़ में जब क़ुरआन पढ़ना शुरू किया तो जिन्नों का एक दल जो वहाँ से गुज़र रहा था, रुक कर ध्यान से सुनने लगा था। 

 

Surah/सूरह 1: Al-Fatiha/अल-फ़ातिहा [(किताब की) शुरुआत/ The Opening]

       सूरह 1: अल-फ़ातिहा    [(किताब की) शुरुआत/ The Opening] यह एक मक्की सूरह है। पूरे क़ुरआन में अल्लाह का जो संदेश आया है , उसका इस सूरह मे...