Saturday, July 23, 2016

सूरह 36 : या-सीन [Ya Sin]

सूरह 36: या-सीन [Ya Sin]



02-06: पैग़म्बर का मिशन 

07-12: (सच्चाई पर) विश्वास करने से इंकार करने वालों के ख़िलाफ़ फ़ैसला हो चुका है 

13-32: उदाहरण एक ऐसी बस्ती का जहाँ के लोगों ने रसूलों पर विश्वास नहीं किया

33-44: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ 

45-50: विश्वास न करने वाले बहुत ज़िद्दी हैं 

51-68: (सच्चाई पर) विश्वास रखने वाले और न रखने वाले दोनों का अंजाम अलग-अलग 

69-70: अल्लाह के रसूल शायर नहीं हैं 

71-76: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ 

77-83: दोबारा ज़िंदा करके उठाए जाने पर ज़ोर 

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है


या॰ सीन॰ (1)

गहरी समझ-बूझ [हिकमत] से भरे हुए क़ुरआन की क़सम,  (2)

[ऐ मुहम्मद] आप सचमुच भेजे गए पैग़म्बरों [messengers] में से एक हैं,  (3)

बिल्कुल सीधे मार्ग पर,   (4)

यह (क़ुरआन) उस रब की तरफ़ से उतारा जा रहा है जिसके क़ब्ज़े में सारी ताक़त है, और वह बहुत दया करने वाला है,  (5)

ताकि आप ऐसे लोगों को सावधान कर दें, जिनके बाप-दादा को सावधान नहीं किया गया था; इस कारण वे इन बातों को नहीं जानते हैं।  (6)

उनमें से अधिकतर लोगों के ख़िलाफ़ फ़ैसला हो चुका है, क्योंकि उन लोगों ने (सच्चाई पर) विश्वास करने से इंकार कर दिया है। (7)

(ऐसा लगता है मानो) हमने उनकी गर्दनों में ठुड्डियों [chin] तक लोहे की ज़ंजीर बाँध दी हो, जिससे उनके सिर ऊपर की तरफ़ अकड़ गए हों,  (8)

और हमने एक रोक [barrier] लगा दी हो, उनके आगे भी और उनके पीछे भी, और उनकी नज़रों को छेंक लिया हो: सो वे कुछ देख नहीं सकते।   (9)
 
आप उन्हें चेतावनी दें या न दें, उनके लिए तो दोनों ही बराबर है: वे (सच्चाई पर) विश्वास नहीं करेंगे।  (10)

आप तो बस ऐसे ही लोगों को सावधान कर सकते हैं जो (क़ुरआन की) नसीहत पर चलते हों, और अपने दयालु रब का डर रखते हों, हालाँकि वे उसे देख नहीं सकते: ऐसे लोगों को उनके गुनाहों की माफ़ी और एक बड़े इनाम की ख़ुशख़बरी सुना दें।  (11)

निस्संदेह हम-- मुर्दों को दोबारा ज़िंदा करेंगे, और हम लिखते रहते हैं जो कुछ (कर्म) वे अपने आगे भेजते हैं, और साथ ही जो कुछ (अपने कर्मों के प्रभाव) वे अपने पीछे छोड़ जाते हैं: हम एक स्पष्ट किताब में हर एक चीज़ का हिसाब-किताब रखते हैं।  (12)
[ऐ रसूल] आप उनके सामने उन लोगों का उदाहरण बताएं जिनकी बस्ती में (अल्लाह का संदेश लेकर) रसूल आए थे।  (13)

हमने (शुरू में) दो रसूल [messengers] भेजे, मगर उन लोगों ने दोनों को मानने से इंकार कर दिया। फिर हमने तीसरे (रसूल) के द्वारा उनकी ताक़त बढ़ायी, तब उन (रसूलों) ने कहा, "यक़ीन करो, हम तुम्हारे पास (अल्लाह का संदेश) लेकर आए हैं।" (14)

उन लोगों ने जवाब दिया, "तुम तो बस हमारे ही जैसे आदमी हो। रहम करनेवाले रब ने कोई भी चीज़ नहीं भेजी है; तुम तो केवल झूठ बोल रहे हो।" (15)

उन (रसूलों) ने कहा, "हमारा रब जानता है कि हम निश्चय ही तुम्हारी ओर भेजे गए हैं  (16)
और हमारी ज़िम्मेदारी तो बस तुम तक संदेश पहुँचा देने की है।" (17)

वे जवाब में बोले, "हम तो तुम्हें अप-शगुन [evil omen] समझते हैं, यदि तुम नहीं माने तो हम तुम्हें पत्थर से मारेंगे, और तुम्हें अवश्य हमारी ओर से दर्दनाक यातना पहुँचेगी।" (18)

रसूलों ने कहा, "तुम्हारा अप-शगुन तो तुम्हारे अपने अंदर है। तुमलोग इस चीज़ को अप-शगुन क्यों मानते हो, जबकि तुम्हें (सच्चाई की याद दिलाकर) चेताया जा रहा है? असल में तुम लोग (गुनाहों में) बहुत दूर जा चुके हो!" (19)
 
फिर शहर के दूसरे छोर से एक आदमी दौड़ता हुआ आया। उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! इन रसूलों का कहना मान लो। (20)
इनके बताए हुए रास्ते पर चलो: वे तुम से कोई मज़दूरी तो नहीं मांग रहे हैं, और वे सीधे मार्ग पर हैं,  (21)
और मैं उसकी बंदगी क्यों न करूँ, जिसने मुझे पैदा किया? और उसी की ओर तुम्हें लौटकर जाना है।  (22)
मैं उस (अल्लाह) को छोड़कर दूसरे देवताओं को कैसे अपना ख़ुदा मान लूँ, जबकि अगर रहम करनेवाला ख़ुदा मुझे कोई तकलीफ़ पहुँचाना चाहे, तो न उनकी सिफ़ारिश मेरे कोई काम आ सकेगी और न तो वे मुझे बचा ही सकेंगे? (23)
तब तो मैं साफ़ तौर से ग़लत रास्ते में पड़ जाऊँगा। (24)
मैं तो आपके रब में विश्वास करता हूं, अतः मेरी बात सुनो!" (25)
(अंतत: बस्तीवालों ने शायद उसे शहीद कर दिया, तब अल्लाह की तरफ़ से) कहा गया, “दाख़िल हो जाओ जन्नत में!" उसने कहा, "ऐ काश! मेरी क़ौम के लोग यह बात जान पाते (26)

कि किस तरह मेरे रब ने मुझे माफ़ कर दिया और मुझे प्रतिष्ठित लोगों में शामिल कर लिया!" (27)

उसके बाद उसकी क़ौम पर हमने आसमान से कोई सेना नहीं उतारी और न हमें उतारने की कोई ज़रूरत थी:  (28)

वह तो केवल एक ज़ोरदार आवाज़ थी जिससे वे बेजान होकर गिर गए!  (29)
अफ़सोस है मनुष्य जाति पर! जब कभी कोई रसूल उनके पास आया, वे उसका मज़ाक़ ही उड़ाते रहे।  (30)

क्या उन्होंने नहीं देखा कि उनसे पहले कितनी ही नस्लों को हमने तबाह-बर्बाद कर दिया, जिनमें से कोई भी अब कभी लौटकर उनके पास आने वाला नहीं है? (31)

मगर यह सबके सब लोग हमारे सामने इकट्ठा करके हाज़िर किए जाएँगे। (32)
 
और (देखो!) उनके लिए एक निशानी तो वह ज़मीन है जो मुर्दा पड़ी हुई थी: हमने उसे जीवित किया और उससे अनाज उगा दिए, जिसमें से वे खाते हैं।  (33)
 
और हमने उसमें खजूरों और अंगूरों के बाग़ लगाए हैं, और उसमें से पानी के सोते (springs) प्रवाहित कर दिए हैं,    (34)

ताकि वे उसके फल खा सकें --- हालाँकि यह सब कुछ उनके हाथों का बनाया हुआ नहीं है --- तो क्या फिर भी वे शुक्र नहीं अदा करेंगे? (35)

महिमावान है वह जिसने हर चीज़ को जोड़े-जोड़े में (और तरह-तरह का) पैदा किया है--- धरती जो चीजें उगाती है उनमें से भी, और स्वयं उन इंसानों में से भी, और उन चीज़ों में से भी जिनको वे अभी नहीं जानते! (36)

और एक निशानी उनके लिए रात भी है: हम उस पर से दिन की रौशनी को खींच लेते हैं, फिर क्या देखते हैं कि वे अचानक अँधेरे में रह गए।  (37)

और सूरज भी अपने नियत रास्ते पर चलता रहता है जिसे सबसे ताक़तवाले और सबसे ज्ञानी (अल्लाह) ने उसके लिए तय किया है। (38)

और चाँद की भी हमने मंज़िलें [phases] हिसाब करके तय कर रखी हैं, यहाँ तक कि वह (अपनी मंज़िलें तय करता हुआ) फिर खजूर की पुरानी टहनी की तरह (पतला) हो जाता है।  (39)

न सूरज ही से हो सकता है कि चाँद को जा पकड़े और न रात दिन से आगे बढ़ सकती है: हर एक अपनी-अपनी कक्षा में तैर रहे हैं।  (40)
और एक निशानी उनके लिए यह भी है कि हमने आदमी की पूरी एक नस्ल को भरी हुई (नूह की) नौका [Noah’s Ark] में सवार कर (के बचा) लिया था, (41)

और हमने उनके लिए उस (नौका) की तरह (सवारी करने की) कई चीज़ें बनायीं, जिन पर वे सवारी करते हैं,  (42)

और अगर हम चाहें तो उन्हें पानी में डुबा दें, फिर कोई न होगा जो इनकी मदद कर सके: उन्हें बचाया नहीं जा सकेगा। (43)

यह तो बस हमारी दयालुता [mercy] है कि हमने उन्हें थोड़े समय के लिए ज़िंदगी के मज़े उठाने की मुहलत दे रखी है।  (44)

इसके बावजूद जब उनसे कहा जाता है कि “बचकर रहो (उस यातना से), जो तुम्हारे आगे (आने वाली दुनिया में) भी है और जो तुम्हारे पीछे (इस दुनिया में) भी है, ताकि तुम पर रहम [दया] किया जा सके”,  (45)

मगर वे अपने रब की तरफ से आयी हुई हर एक निशानी को नज़रअंदाज़ [ignore] कर देते हैं,  (46)

और जब उनसे कहा जाता है कि "अल्लाह ने जो कुछ रोज़ी तुम्हें दी है उनमें से (दूसरों पर भी) ख़र्च करो", तो (सच्चाई से) इंकार करने वाले [काफ़िर], ईमानवालों से कहते हैं, "हम उन लोगों को खाना क्यों खिलाएँ जिन्हें अगर अल्लाह चाहता तो स्वयं ही खिला देता? असल में तुम तो पूरी तरह मार्ग से भटक चुके हो।" (47)
और वे कहते हैं कि "अगर तुम्हारी बात सच्ची है, तो यह (क़यामत का) वादा कब पूरा होगा?" (48)

असल में, वे तो बस एक ज़ोरदार धमाके की प्रतीक्षा में हैं जो उन्हें (अचानक) आ पकड़ेगी, जबकि वे आपस में झगड़ रहे होंगे,  (49)

फिर न तो उन्हें कोई वसीयत करने का समय मिल पाएगा और न अपने घरवालों की ओर लौटकर जा सकेंगे। (50)
(जब) नरसिंघे [Trumpet] को फूँक मार कर बजा दिया जाएगा और --– देखोगे कि अचानक ---- वे अपनी क़ब्रों से निकलकर अपने रब की ओर तेज़ी से चल पड़ेंगे,  (51)

(क़यामत देखकर) कहेंगे, "अफ़सोस हम पर! किसने हमें आराम करने की जगहों से उठा खड़ा किया है?” (उनसे कहा जाएगा) यह वही चीज़ है जिसका वादा रहम करनेवाले रब ने किया था, और रसूलों ने सच कहा था।" (52)

बस बड़े ज़ोर का एक ही धमाका होगा और फिर ---– देखोगे कि अचानक वे सबके-सब हमारे सामने हाज़िर कर दिए गए। (53)

आज के दिन किसी जान पर रत्ती भर भी ज़ुल्म नहीं होगा, और तुम्हें बदले में कुछ और नहीं, बल्कि वही मिलेगा जो कुछ कर्म तुम किया करते थे।  (54)

सचमुच जन्नतवाले लोग आज अपने पसंदीदा कामों में मगन होंगे,  (55)

वे लोग और उनके पति-पत्नियाँ घनी छाँव में तख़्तों पर तकिया लगाए हुए बैठे होंगे, (56)

उनके लिए वहाँ (हर तरह का) फल होगा, और वह सब कुछ मौजूद होगा जिसकी वे माँग करें। (57)

दया करनेवाले रब की तरफ़ से उन्हें “सलाम” कहा जाएगा।  (58)

[काफ़िरों से कहा जाएगा], "मगर ऐ अपराधियो! आज तुम (नेक लोगों से) अलग हट जाओ! (59)

क्या मैंने तुम्हें यह आदेश नहीं दिया था, ऐ आदम के बेटो!, कि शैतान की पूजा न करो क्योंकि सचमुच वह तुम्हारा खुला दुश्मन है,  (60)

बल्कि मेरी बन्दगी करो? यही सीधा मार्ग है (61)

उसने तुममें से बहुत बड़ी संख्या में लोगों को सही मार्ग से भटका दिया। तो क्या तुमने अपनी बुद्धि का इस्तेमाल नहीं किया? (62)

यह वही जहन्नम है जिसकी तुम्हें धमकी दी जाती थी। (63)

आज इस (आग) में दाख़िल हो जाओ, इस कारण से कि तुम (मेरे आदेशों को) मानने से हमेशा इंकार करते रहे हो।" (64)
और उस दिन हम उनके मुँह को बंद करके सील कर देंगे, मगर उनके हाथ हमसे बातें करेंगे, और उनके पाँव उन कर्मों की गवाही देंगे, जो कुछ भी उन्होंने किया है। (65)
 
अगर हम ऐसा चाहते तो (इसी दुनिया में) उनकी आँखों की रौशनी छीन लेते। वे रास्ते की तलाश में मारे मारे फिरते, मगर वे कैसे देख पाते? (66)

अगर हम ऐसा चाहते तो जहाँ वे खड़े हैं, वहीं उनके शरीर को बेकार कर देते जिससे न वह आगे बढ़ पाते और न ही पीछे हट पाते।  (67)

अगर हम किसी को लम्बी उम्र देते हैं, तो उसके (शरीर के) विकास को (कमज़ोर कर) उलट देते हैं। फिर भी वे बुद्धि से काम नहीं लेते? (68)
हमने उन (रसूल) को शायरी (का हुनर) नहीं सिखाया और न ही कभी भी वह कवि के रूप में जाने गए हैं। यह क़ुरआन, और कुछ नहीं, बल्कि लोगों को (उनके कर्तव्यों को) याद दिलाने [remind] के लिए उतारी गई है, जो चीज़ों को स्पष्ट कर देती है; (69)

ताकि वह ऐसे आदमियों को चेतावनी दे सके जो सचमुच ज़िंदा (दिल रखते) हों, और यह कि (सच्चाई पर) विश्वास न करनेवालों के ख़िलाफ़ अल्लाह अपना फ़ैसला सुना सके।  (70)
क्या उन्होंने नहीं देखा कि हमने अपने हाथों की बनाई हुई चीज़ों में से उनके लिए चौपाए [मवेशी/livestock] पैदा किए, जिनके अब वे मालिक हैं?  (71)
 
और उन (मवेशियों) को उनके वश में करके सधा दिया, ताकि उनमें से कुछ तो उनके लिए सवारियों के काम में आते हैं, कुछ खाने के काम में,  (72)
कुछ मवेशियों से दूसरे कई फ़ायदे हैं, तो कुछ पीने के काम में आते हैं, तो क्या वे (हमारा) शुक्र नहीं अदा करेंगे?  (73)
मगर इसके बावजूद उन्होंने अल्लाह को छोड़कर दूसरों को अपना ख़ुदा बना रखा है कि शायद उनसे उन्हें कोई मदद मिल जाए,  (74)
हालाँकि वे उनकी कोई मदद नहीं कर सकते, चाहे वे अपनी पूरी फ़ौज को ही एक साथ क्यों न बुला लें! (75)
अतः [ऐ रसूल] आप उनकी बातों से दुखी न हों: हम जानते हैं जो कुछ वे छिपाते हैं और जो कुछ वे सामने कहते हैं।  (76)
क्या आदमी नहीं जानता कि हमने उसे वीर्य [sperm] की एक बूंद से पैदा किया? तब भी क्या देखते हैं कि वह खुलकर (क़ुरआन और क़यामत पर) झगड़े करता है, (77)

हमारे ख़िलाफ़ तर्क-वितर्क करता है, मगर ख़ुद अपनी पैदाइश को भुला बैठा है। कहता है, "कौन इन हड्डियों में फिर से जान डालेगा, जबकि वे सड़-गल चुकी होंगी?" (78)

कह दें, "उनमें वही फिर से जान डालेगा जिसने उनको पहली बार पैदा किया था: वह तो पैदा करने के हर एक काम की पूरी पूरी जानकारी रखता है, (79)
 
वही तो है जिसने तुम्हारे लिए हरे पेड़ से आग पैदा कर दी --— फिर तुम उससे अपने लिए आग सुलगा लेते हो।" (80)

जिसने आसमानों और ज़मीन को पैदा किया है, क्या उसे इसकी ताक़त नहीं कि उन जैसे लोगों को (दोबारा) पैदा कर सके? बिल्कुल है! वह तो ऐसी रचना करने वाला है जो सब कुछ जानता है:  (81)

उसका मामला तो यह है कि जब वह किसी चीज़ (के पैदा करने) का इरादा करता है, तो बस इतना कहता है कि ----  "हो जा!" और वह हो जाती है। 82)
अतः महिमा है उसकी, जिसके हाथ में हर चीज़ का पूरा नियंत्रण [Control] है। और उसी के पास तुम सबको ले जाया जाएगा.”  (83)
 
 
 
 
 
नोट:

8/9: यह उनकी ज़िद और हठधर्मी का बयान है कि सच्चाई सामने होने के बावजूद ऐसा लगता है कि वे उसे देख नहीं पाते।

12: लोगों के सारे बुरे कर्मों को भी लिखा जा रहा है, और उन बुरे कर्मों के जो प्रभाव उनके मरने के बाद भी बाक़ी रह जाते हैं,  वह भी लिखे जा रहे हैं।

40: चाँद और सूरज अपनी-अपनी कक्षाओं [Orbits] में चलते रहते हैं और वे कभी भी एक-दूसरे की कक्षा में नहीं घुसते।

65: यही बात सूरह नूर (24: 24) और सूरह फ़ुस्सिलत (41: 20) में भी कही गई है।

69: मक्का के लोगों ने शुरू में मुहम्मद (सल्ल) को कवि कहना शुरू किया था और वह जो क़ुरआन सुनाते,  उसे वह जादुई शायरी कहते थे।

80: अरब में दो पेड़ होते थे,  एक मर्ख़ और दूसरा अफ़्फ़ार।" अरब के लोग इनसे चक़माक़ का काम लेते थे और उनको एक-दूसरे के साथ रगड़ने से आग पैदा हो जाती थी।  


 

Surah/सूरह 1: Al-Fatiha/अल-फ़ातिहा [(किताब की) शुरुआत/ The Opening]

       सूरह 1: अल-फ़ातिहा    [(किताब की) शुरुआत/ The Opening] यह एक मक्की सूरह है। पूरे क़ुरआन में अल्लाह का जो संदेश आया है , उसका इस सूरह मे...