Saturday, October 29, 2016

सूरह 30 : अर रुम [पूर्वी रोमन साम्राज्य, The Byzantines]

सूरह 30: अर-रुम 
[पूर्वी रोमन साम्राज्य, The Byzantines]
 
 

 02-05: रोम [पूर्वी रोमबाइज़ेंटाइन] की सेना

06-19: क़यामत और दोबारा ज़िंदा करके उठाया जाना तय है 

20-27: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ 

 28   : एक ग़ुलाम की मिसाल 

29-45: सही और सच्चे दीन की स्थापना करो 

46-54: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ 

55-57: फ़ैसले के दिन का दृश्य 

58-60: रसूल को धीरज से काम लेने की सलाह  


 


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

अलिफ़॰ लाम॰ मीम॰ (1)

रोम (साम्राज्य की सेना) को (फ़ारस के हाथों) हार हुई है, (2)

नज़दीक के देश [सीरिया के आसपास हुए युद्ध] में। (मगर देखना) वे अपनी हार को जीत में बदल देंगे,  (3)

कुछ ही साल [3-9 वर्ष] की अवधि में (रोम की सेना की जीत होगी) --- हर मामले में अल्लाह को ही पूरा अधिकार है, पहले भी और आख़िर में भी। और उस दिन ईमान रखने वाले अल्लाह की मदद से होने वाली (रोमियों की फ़ारस पर) जीत की ख़ुशियां मनाएंगे। (4)

वह जिसकी चाहता है, मदद करता है: वह अत्यन्त प्रभुत्वशाली, दयावान है।  (5)

यह अल्लाह का वादा है: अल्लाह अपने वादे को कभी नहीं तोड़ता है। मगर अधिकतर लोग यह बात नहीं जानते: (6)

वे तो इस सांसारिक जीवन के केवल बाहरी रूप को ही जानते हैं। किन्तु आने वाली दुनिया [आख़िरत] के बारे में वे बिलकुल ही अनजान बने हुए हैं। (7)

क्या उन्होंने ख़ुद अपने बारे में सोच-विचार नहीं किया? अल्लाह ने आसमानों और ज़मीन को और जो कुछ उनके बीच है, उन्हें बिना किसी ख़ास मक़सद के और बिना एक तय की हुई अवधि के, यूँ ही नहीं पैदा कर दिया है, मगर फिर भी, सचमुच बहुत-से लोग इस बात को मानने से इंकार करते हैं कि उन्हें (एक दिन) अपने रब के सामने जाना होगा। (8)
 

क्या वे ज़मीन पर यहाँ-वहाँ चले-फिरे नहीं कि देखते कि उन लोगों का क्या अंजाम हुआ जो उनसे पहले वहाँ रहते थे? वे ताक़त में इन लोगों से कहींं अधिक ज़ोर रखते थे: उन्होंने धरती में खेतों की अधिक जुताई की थी और उस पर बस्तियों के निर्माण भी कहीं अधिक किए थे। उनके पास भी उनके रसूल साफ़-साफ़ निशानियाँ लेकर आए थे: (मगर उन्होंने सच्चाई को न माना और तबाह हुए), सो अल्लाह तो ऐसा न था कि उन पर ज़ुल्म करता, किन्तु वे स्वयं ही अपने आप पर ज़ुल्म करने वाले थे।  (9)

बाद में शैतानी करने वाले लोगों का अंजाम बहुत बुरा हुआ, क्योंकि उन्होंने अल्लाह की आयतों को झूठ माना और उनकी (बराबर) हंसी उड़ाते रहे।  (10)

अल्लाह ही सृष्टि करके जीवन की शुरुआत करता है, फिर वही उसको दोबारा पैदा करेगा, और फिर उसी की ओर तुम्हें लौटकर जाना होगा।  (11)
 

और जिस दिन वह (क़यामत की) घड़ी आ खड़ी होगी, उस दिन गुनाहगार एकदम से निराश हो जाएँगे।  (12)

उन लोगों ने जिनको (शक्ति में) अल्लाह के बराबर का साझेदार [Partners] मान रखा था, उनमें से कोई भी उनके लिए सिफ़ारिश करने वाला न होगा---- और वे स्वयं ही इन (झूठे) साझेदारों को मानने से इंकार कर देंगे। (13)

और जब (क़यामत की) घड़ी आ जाएगी, उस दिन लोगों को अलग-अलग (समूह में) बाँट दिया जाएगा: (14)

अतः जिन लोगों ने ईमान रखा था और अच्छे कर्म किए थे, वे बाग़ [जन्नत] में खुशियाँ मनाएंगे,  (15)

किन्तु जिन लोगों ने (सच्चाई को) मानने से इंकार किया था, और हमारी आयतों [संदेशों] को और आनेवाली दुनिया [आख़िरत] में हमारे सामने होने वाली पेशी को झूठ जाना था, वे सज़ा के लिए वहाँ पकड़कर लाए जाएँगे। (16)
 

अतः अल्लाह की महानता का गुणगान करो, शाम में भी और सुबह में भी ---- (17)

और आसमानों और ज़मीन में सारी तारीफ़ें उसी के लिए हैं, ---- सो (अल्लाह का गुणगान करो) तीसरे पहर सूरज ढलने के समय भी और दोपहर में भी। (18)

वह बेजान चीज़ से जीवित चीज़ को निकाल लाता है, और जीवित चीज़ से बेजान चीज़ को निकाल लाता है। वह मुर्दा पड़ी हुई धरती में (बारिश के द्वारा) फिर से जान डाल देता है, इसी तरह तुम भी (क़ब्रों से ज़िंदा) निकाले जाओगे। (19)

यह उसकी निशानियों में से है कि उसने तुम्हें मिट्टी से पैदा किया---- और फिर देखते देखते तुम आदमी बन गए, और धरती पर दूर दूर तक फैल गए। (20)

और यह भी उसकी निशानियों में से है कि उसने तुम्हीं लोगों में से तुम्हारे लिए (मर्द-औरत के रूप में) जोड़े पैदा कर दिए, ताकि तुम उनके साथ शान्ति व सुकून से रह सको: और उसने तुम्हारे बीच आपस में प्रेम और दया का भाव पैदा कर दिया। सचमुच इसमें उन लोगों के लिए बहुत-सी निशानियाँ हैं जो सोच-विचार करते हैं।  (21)
 

उसकी एक और निशानियों में से है आसमानों और ज़मीन को बनाना, और उसमें पायी जानेवाली विविधता -- तुम्हारी भाषाओं की और तुम्हारे (शरीर के) रंगों की। सचमुच उन लोगों के लिए इसमें बहुत-सी निशानियाँ हैं जो जानकारी रखते हैं।  (22)

और उसकी निशानियों में से तुम्हारा रात और दिन के समय का सोना, और (रोज़ी के लिए) उसके फ़ज़ल [bounty] की तलाश करना भी है। सचमुच ही इसमें निशानियाँ हैं उन लोगों के लिए जो सुनना चाहते हों।  (23)

और उसकी निशानियों में से यह भी है कि वह तुम्हें बिजली की चमक दिखाता है जिससे डर भी लगता है और उम्मीद भी जागती है; और वह आसमान से पानी बरसाता है जिससे मुर्दा पड़ी हुई ज़मीन में फिर से जान पड़ जाती है। सचमुच इसमें बहुत-सी निशानियाँ हैं उन लोगों के लिए जो बुद्धि से काम लेते हैं।  (24)

और उसकी निशानियों में से यह भी है कि आसमान और ज़मीन उसके आदेश से मज़बूती से जमे हुए हैं। आख़िर में, जब वह तुम्हें एक बार ज़मीन से पुकारेगा, उसी वक़्त तुम सब (उसकी ओर) निकल पड़ोगे। (25)

आसमानों और ज़मीन में हर एक चीज़ का वही मालिक है, और तमाम चीज़ें उसकी इच्छा का पालन करती हैं। (26)

वही (अल्लाह) है जिसने सृष्टि की पहली बार रचना की थी। फिर वही उसको दोबारा बना देगा---- और यह उसके लिए पहले से ज़्यादा आसान होगा। वह आसमानों और ज़मीन में किसी भी तरह की तुलना से परे है; वह सबसे ज़्यादा ताक़तवाला और गहरी समझ-बूझ रखनेवाला है।  27)
 

वह तुम्हें एक उदाहरण देता है, जो ख़ुद तुम्हारी ज़िंदगी से लिया गया है: जो कुछ माल हमने तुम्हें दे रखा है, क्या तुम अपने ग़ुलाम को (अपने माल में) बराबर-बराबर का हिस्सेदार [Partner] बना सकते हो? क्या तुम उनसे (बिना पूछे ख़र्च करने से पहले) ऐसे ही डरोगे जैसे आपस में (अपने हिस्सेदारों से) डरते हो? इसी तरह से हम अपने संदेशों [आयतों] को उन लोगों के लिए साफ़ व स्पष्ट रूप से पेश करते हैं जो समझ-बूझ से काम लेते हैं।  (28)

और तब भी (सच्चाई से) इंकार करनेवाले [बहुदेववादी, Idolaters] बिना (सच्चाई की) जानकारी के अपनी इच्छाओं के पीछे भागते फिरते हैं। मगर जिसे अल्लाह ही भटकता छोड़ दे, उसे कौन मार्ग दिखा सकता है? कोई नहीं होगा जो इनकी मदद कर सके। (29)

अतः [ऐ रसूल], पक्के ईमानवाले होने के नाते, अपने मज़हब [दीन] पर पूरी भक्ति से मज़बूती के साथ जमे रहें। यह एक प्राकृतिक स्वभाव [फ़ितरत] है जिसे अल्लाह ने हर आदमी में डालकर पैदा किया है--- अल्लाह की बनाई हुई संरचना बदली नहीं जा सकती--- यही सीधा व सही दीन है, किन्तु अधिकतर लोग मानते नहीं हैं। (30)

तुम सब, पूरी भक्ति से (तौबा के लिए) केवल उसी की ओर झुका करो। तुम्हें उससे डरते हुए बुराइयों से बचते रहना चाहिए; नमाज़ को पाबंदी से पढ़ा करो; और उन लोगों के साथ शामिल न हो जाओ जो अल्लाह के साथ उसका साझेदार [partner] ठहराते हैं, (31)

या जिन्होंने अपने दीन [धर्म] को कई फ़िरक़ों [sects] में बाँट दिया, हर फ़िरक़े के पास जो कुछ है, उसी में ख़ुश और मगन है। (32)

और जब लोगों को कोई तकलीफ़ पहुँचती है, तो वे अपने रब को पुकारते हैं और मदद के लिए उसी की ओर झुकते हैं, मगर जैसे ही वह उन्हें अपनी दयालुता का रस चखाता है--- तो क्या देखते हैं कि --- उनमें से कुछ लोग अचानक (किसी और को) अपने रब का साझेदार [partners] ठहराने लगते हैं,  (33)

और (ऐसा लगता है कि) जो कुछ हमने उन्हें दिया था, उसके बदले में वे जान-बूझकर शुक्र तक अदा करना नहीं चाहते। "अच्छा तो मज़े उड़ा लो, जल्द ही तुम्हें पता चल जाएगा!" (34)

या क्या हमने उन पर ऐसा कोई प्रमाण उतारा है जो अल्लाह के साथ (किसी को) साझेदार ठहराने की अनुमति देता हो?  (35)
 

और हम जब लोगों को अपनी रहमत [mercy] का मज़ा चखने देते हैं, तो वे उस पर बहुत ख़ुश हो जाते हैं, मगर जब उनके साथ कोई बुरी घटना घट जाती है ----और वह भी उन्हीं के करतूतों के कारण--- तो वे बहुत जल्द पूरी तरह निराश हो जाते हैं। (36)

क्या वे नहीं देखते कि अल्लाह जिसके लिए चाहता है रोज़ी को बढ़ा-चढ़ाकर देता है और (जिसके लिए चाहता है) रोज़ी को घटा देता है? सचमुच इसमें उन लोगों के लिए निशानियाँ हैं, जो ईमान रखते हैं। (37)

अतः रिश्तेदार को, ज़रूरतमंद को और (ग़रीब) मुसाफ़िर को उनका हक़ देते रहो---- यह उनके लिए बेहतर है जिनका मक़सद अल्लाह की ख़ुशी हासिल करना हो: यही वह लोग हैं जो कामयाब होंगे।  (38)

जो कुछ क़र्ज़ तुम ब्याज पर देते हो, ताकि लोगों के धन के ज़रिये तुम्हारी सम्पत्ति बढ़ जाए, तो वह अल्लाह की नज़रों में नहीं बढ़ती; मगर अल्लाह की ख़ुशी हासिल करने की इच्छा से जो कुछ तुम दान (ज़कात) में देते हो, तो बदले में (अल्लाह के यहाँ) तुम कई गुना इनाम कमा लोगे। (39)

वह अल्लाह है जिसने तुम्हें पैदा किया और तुम्हें रोज़ी दी, वह तुम्हें मौत भी देगा और उसके बाद तुम्हें दोबारा जीवित करेगा। क्या तुम्हारे ठहराए हुए (अल्लाह के) साझेदारों [Partners] में से कोई भी है जो इनमें से एक काम भी कर सके? महान है अल्लाह, और वह उनसे बहुत ऊँचा व बड़ा है जिन्हें वे (अल्लाह का) साझेदार मानते हैं। (40)

लोगों के ग़लत कामों के चलते थल [land] और जल [sea] में बिगाड़ [फ़साद/corruption] पैदा हो गया है, और अल्लाह उनके कुछ बुरे कामों के नतीजे में उन्हें अपनी सज़ा का मज़ा चखाएगा, ताकि वे उन (बुरे कामों) से अपने को रोक सकें।  (41)

कह दें, "धरती में यहाँ-वहाँ चल-फिरकर देखो कि जो लोग तुमसे पहले गुज़रे हैं, उन लोगों का अंत किस तरह हुआ-- --- उनमें अधिकतर बहुदेववादी [Idolaters] ही थे।" (42)

अतः [ऐ रसूल] आप एक सच्चे व सही दीन की भक्ति में मज़बूती से जमे रहें,  इससे पहले कि अल्लाह की ओर से वह दिन आ जाए जिसे टाला न जा सके। उस दिन, मानव-जाति को अलग-अलग बाँट दिया जाएगा:  (43)

जिन लोगों ने सच्चाई (को मानने) से इंकार किया था तो उनको इंकार करने का नतीजा भुगतना होगा, और जिन लोगों ने अच्छे कर्म किए थे तो उन्होंने अपने लिए अच्छी जगह बना ली होगी।  (44)

अल्लाह अपने फ़ज़ल [bounty] से उन लोगों को इनाम देगा जो ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए; वह उन्हें पसंद नहीं करता जो सच्चाई को मानने से इंकार करते हैं।  (45)
 

और अल्लाह की निशानियों में से यह (भी) है कि वह (वर्षा की) ख़ुशख़बरी सुनाने वाली हवाएँ भेजता है, ताकि तुम उसकी रहमत [grace] का मज़ा उठा सको, और उसके हुक्म से (हवा के द्वारा) पानी में नौकाएं चल सकें, और तुम (उसमें यात्रा करके) अपने लिए रोज़ी तलाश कर सको, ताकि तुम (अल्लाह का) शुक्र अदा कर सको। (46)

[ऐ रसूल] आपसे पहले, हम हर रसूल को उनकी अपनी क़ौमों के पास भेज चुके हैं: वे उनके पास साफ़ व स्पष्ट प्रमाण लेकर आए, (मगर वे लोग न माने) और उसके बाद, हमने शैतानी करने वालों को दंड दिया। मगर ईमानवालों की मदद करना तो हमारा कर्तव्य बनता है।  (47)

अल्लाह ही है जो हवाओं को भेजता है; फिर वे बादलों में हलचल मचा देती हैं; फिर वह जिस तरह चाहता है उन बादलों को आसमान में फैला देता है; फिर उन परतोंवाली घटाओं के टुकड़े कर देता है, और तब तुम देखते हो कि उनके बीच से बारिश की बूँदें टपकी चली आती हैं। वह अपने बन्दों में से जिन पर चाहता है, पानी बरसाता है, और जब ऐसा होता है तो देखो कि कैसे वे ख़ुशियाँ मनाने लगते हैं,  (48)

हालाँकि इससे पहले जब तक उन पर बारिश नहीं हुई थी, वे सारी उम्मीद छोड़ चुके थे।  (49)

अब ज़रा देखो, अल्लाह की दयालुता [रहमत] की निशानियाँ! वह किस तरह से मुर्दा पड़ी हुई धरती में फिर से एक नई जान डाल देता है: वही अल्लाह मुर्दा पड़े हुए लोगों को भी (उसी तरह) फिर से ज़िंदा कर देगा---- और तमाम चीज़ें उसी के क़ब्ज़े में हैं।  (50)

अगर हम एक (जला देने वाली गर्म) हवा भेज दें, जिसके नतीजे में वे अपनी फ़सल को पीली पड़ी हुई देखे लें, तब भी वे विश्वास न करने पर अड़े रहेंगे।  (51)

अतः [ऐ रसूल] आप मुर्दों को अपनी बात नहीं सुना सकते और न बहरों को अपनी पुकार सुना सकते हैं, जबकि वे पीठ फेरे चले जा रहे हों; (52)

और न आप अंधों को ग़लत रास्ते से फेरकर सही मार्ग पर ला सकते हैं: आप तो केवल उन्हीं को अपनी बात सुना सकते हैं जो हमारी आयतों मॆं विश्वास रखते हैं और पूरी भक्ति के साथ (हमारे सामने) झुकते हैं। (53)

वह अल्लाह ही है जिसनें तुम्हें कमज़ोर पैदा किया, फिर कमज़ोरी के बाद तुम्हें ताक़त दी, ताक़त के बाद (बुढ़ापे में) फिर से कमज़ोरी दी और तुम्हारे बाल पक गए: वह जो कुछ चाहता है पैदा करता है, वह सब जाननेवाला, हर चीज़ पर क़ाबू रखनेवाला है। (54)


जिस दिन वह (क़यामत की) घड़ी आ जाएगी, गुनाहगार लोग क़समें खाएँगे कि वे (क़ब्रों में) घड़ी भर से अधिक नहीं ठहरे----(सचमुच) वे दुनिया में हमेशा से ही धोखे में पड़े रहे थे ---- (55)

किन्तु जिन लोगों को ज्ञान और ईमान दिया गया था, वे कहेंगे, "अल्लाह के लिखे हुए रिकार्ड के मुताबिक़ तो तुम असल में ‘दोबारा उठाए जाने के दिन’ तक (दुनिया में) ठहरे रहे थे: यही तो है ‘ज़िंदा उठाए जाने का दिन’ [Day of Resurrection], मगर तुम तो समझते ही न थे।" (56)

उस दिन शैतानी करनेवालों के कोई भी बहाने उनके किसी काम न आएंगे: उन्हें (अपनी ग़लतियों में) सुधार करने का कोई मौक़ा नहीं दिया जाएगा। (57)

हमने इस क़ुरआन में लोगों के सामने हर क़िस्म की मिसालें पेश कर दी हैं, इसके बावजूद अगर [ऐ रसूल], आप इनके सामने कोई चमत्कार भी लाकर दिखाएं, तब भी विश्वास न करनेवाले यही कहेंगे, "तुम तो बस झूठ गढ़ते हो।" (58)

इस तरह से, अल्लाह उन इंकार पर अड़े हुए लोगों के दिलों को ठप्पा [seal] लगा (कर बंद कर) देता है जो समझते ही नहीं हैं।  (59

अतः धीरज [सब्र] से काम लें, निश्चय ही अल्लाह का वादा सच्चा है: ऐसे लोगों से निराश होने की ज़रूरत नहीं है जो लोग पक्का विश्वास नहीं रखते।  (60)




नोट:

4: यहाँ सन 613-14 ई. में सीरिया के नज़दीक फ़ारस के हाथों जो पूर्वी रुमियों [Byzantines] की हार हुई थी, उसी का वर्णन है। फ़ारस की जीत पर मक्का के बहुदेववादियों ने ख़ुशियाँ मनायी थीं और उसे एक ख़ुदा के माननेवालों की हार माना था। यहाँ भविष्यवाणी की गई है कि तीन से नौ सालों के अवधि में पूर्वी रुमियों की फ़ारस पर जीत होगी, और तब ईमानवाले ख़ुशियाँ मनाएंगे। फिर ऐसा ही हुआ कि लगभग 624 ई. में रूमियों की फ़ारस पर जीत हुई, उसी साल बद्र की लड़ाई में ईमानवालों की मक्का के बहुदेववादियों पर भी जीत हुई। 

8: अगर 'आख़िरत' [परलोक] को न माना जाए, तो मतलब यह होगा कि यह दुनिया बिना किसी मक़सद के पैदा की गयी है, और किसी ज़ालिम और बुरे आदमी को हो सकता है कि कोई सज़ा ही न मिले और न  ही अच्छा कर्म करने वालों को कोई इनाम ही मिले। इसके साथ यह भी बताया गया है कि यह दुनिया यूँ ही असीमित काल तक नहीं चलती रहेगी।

11: अल्लाह ने ही हर चीज़ को पहली बार पैदा किया है, सो उसे दोबारा पैदा करना कोई मुश्किल नहीं है, अत: मक्का के लोगों का यह मानना कि आदमी मर जाने के बाद सड़‌‌ गलकर दोबारा पैदा नहीं हो सकता, ग़लत है।

19: बेजान चीज़ से जानदार [सजीव] को निकालना जैसे अंडे से मुर्ग़ी का निकलना, और जानदार चीज़ से बेजान चीज़ को निकालना जैसे मुर्ग़ी से अंडा।

28: तो फिर अल्लाह की ख़ुदायी में हिस्सेदार ठहरा लेना कहाँ तक सही है। 

29: ध्यान रहे कि जब आदमी अपनी ज़िद और हठधर्मी के कारण सच्चाई को मानने से इंकार करने पर अड़ा रहता है, तब अल्लाह उसे सही रास्ता दिखाना बंद करके उसे भटकता छोड़ देता है। 

32: आदमी के पैदा होने के साथ उसकी फ़ितरत में यह बात डाल दी गयी है कि वह अल्लाह के दीन की सच्चाई को पहचान सके, लेकिन फिर लोगों ने अलग-अलग तरीक़े अपना लिए और अपने आपको अलग-अलग मज़हब [फ़िरक़े/ sects] में बाँट लिया। 

37: जब रोज़ी में तंगी आ जाए, तो मायूस होकर अल्लाह की नाशुक्री करने के बजाए उसे अल्लाह से ही मदद मांगनी चाहिए, क्योंकि यह सब अल्लाह के ही हाथ में है। इसके साथ ही रोज़ी में बेहतरी के लिए और ज़्यादा कोशिश करनी चाहिए।

39: यह सूरह मक्का में उतरी थी जिसमें ब्याज [Interest] की बुराई बतायी गई हैमगर उस समय तक ब्याज लेने को हराम घोषित नहीं किया गया था। 





Surah/सूरह 1: Al-Fatiha/अल-फ़ातिहा [(किताब की) शुरुआत/ The Opening]

       सूरह 1: अल-फ़ातिहा    [(किताब की) शुरुआत/ The Opening] यह एक मक्की सूरह है। पूरे क़ुरआन में अल्लाह का जो संदेश आया है , उसका इस सूरह मे...