Thursday, November 10, 2016

सूरह 32 : अस-सज्दा [नमाज़ में सर झुकाना, Bowing Down in Worship]

सूरह 32: अस-सज्दा
 [नमाज़ में सर झुकाना, Bowing Down in Worship]



01-03: किताब [क़ुरआन] और सावधान करने वाला 

04-09: अल्लाह को हर चीज़ पैदा करने की ताक़त 

10-14: विश्वास न करने वाले क़यामत के दिन दोबारा उठाए जाने को नहीं मानते 

15-22: इनाम और सज़ा 

23-25: मूसा की किताब और इसराईल की संतानें 

26-30: ईमानवालों को प्रमाण मिल जाना 



अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

अलिफ़॰ लाम॰ मीम॰ (1)

यह किताब [क़ुरआन], जो हर तरह के संदेह से परे है, सारे संसार के रब की ओर से उतारी जा रही है। (2)

इसके बावजूद, वे यही कहते हैं, "मुहम्मद ने इसे स्वयं ही गढ़ लिया है!" बिल्कुल नहीं!, यह तो वह सच्चाई (की बातें) हैं जो [ऐ रसूल], आपके रब की तरफ़ से आपके लिए हैं, जिससे आप उन (मक्का के) लोगों को सावधान कर दें जिनके पास इससे पहले सावधान करने वाला कोई नहीं आया था, ताकि उन्हें सही मार्ग दिखाया जा सके।  (3)

यह तो अल्लाह है जिसने आसमानों और ज़मीन को और वह सारी चीज़ें जो दोनों के बीच में हैं, छह दिनों में पैदा किया। फिर उसने अपने आपको सिंहासन पर स्थापित किया। तुम (लोगों) के पास उस (अल्लाह) के सिवा कोई नहीं जो तुम्हारी रक्षा कर सके, और न कोई है जो तुम्हारे लिए सिफ़ारिश कर सके। तो फिर क्यों तुम (नसीहत पर) ध्यान नहीं देते? (4)

वह आसमान से लेकर ज़मीन तक, हर एक चीज़ को सही ढंग से चलाता है, और अंत में, एक दिन हर एक चीज़ चढ़कर उसके पास पहुँच जाएगी, और वह (क़यामत का) दिन तुम्हारे हिसाब से एक हज़ार साल के बराबर का होगा। (5)

वह ऐसा है जो सब जानता है --- वह चीज़ भी जो दिखायी नहीं देती हो और वह भी जो दिखायी देती हो, वह बहुत प्रभुत्वशाली व हर एक पर दयावान है,  (6)

जिसने हर एक चीज़ को बिल्कुल सही [Perfect] रूप दिया है। उसने आदमी को पहले मिट्टी से बनाया,  (7

फिर उसकी नस्लों को मामूली से तरल पदार्थ [वीर्य, Semen] के सत [extract] से बनाया।  (8)

फिर उसके (शरीर के आकार को) ठीक-ठाक किया; और फिर उसमें अपनी रूह (आत्मा) फूँकी; उसने तुम्हें सुनने की, देखने की, और सोचने की क्षमता दी। मगर, तुम बदले में बहुत कम ही (मेरा) शुक्र अदा करते हो!  (9)

वे कहते हैं, "क्या? जब हम (मर के) मिट्टी में मिल चुके होंगे, तो फिर क्या सचमुच हम नए सिरे से पैदा किए जाएंगे?” असल में, वे अपने रब से होने वाली मुलाक़ात को मानने से इंकार करते हैं।  (10)

कह दें, "मौत का फ़रिश्ता जो तुम पर नियुक्त है, वह तुम्हें फिर से अपने क़ब्ज़े में ले लेगा, और फिर तुमको अपने रब के पास लाया जाएगा।" (11)

[ऐ रसूल] काश आप शैतानी करने वालों को देख पाते जो अपने रब के सामने सिर झुकाए हुए (खड़े) होंगे (और कहेंगे): "हमारे रब! अब हमने देख भी लिया और सुन भी लिया, हमें वापस (दुनिया में) भेज दे ताकि हम अच्छे कर्म कर सकें। अब हमें पूरा विश्वास हो गया है।" (12

अगर हमने ऐसा चाहा होता, तो हमने ज़रूर हर आदमी को (पहले से ही) सच्चे व सही रास्ते पर चलाया होता, मगर मेरी कही हुई बात ही सच हुई है, (जब मैंने कहा था) कि "मैं जहन्नम को अवश्य ही जिन्नों और इंसानों— सब से भर दूँगा।" (13

“जिस तरह तुम उस (क़यामत के) दिन हम से होने वाली मुलाक़ात को भुलाए बैठे थे, अब हम भी तुम्हें (उसी तरह) भुला देंगे: जो कुछ भी तुम किया करते थे, उसके बदले में अब चखो मज़ा कभी न ख़त्म होने वाली यातनाओं का!” (14)
 

हमारी आयतों [संदेशों] पर तो बस वही लोग सच्चा ईमान रखते हैं, जिन्हें उन (आयतों) के द्वारा जब नसीहत दी जाती है, तो वे हमारे सामने (सज्दे में) अपनी गर्दन झुका देते हैं, अपने रब की बड़ाई का गुणगान करते हैं, और घमंड में अपने आपको बड़ा नहीं समझते।  (15)

(रात में सोते हुए) वे अपने बिस्तरों को छोड़कर उठ जाते हैं, डर और उम्मीद (के मिले-जुले भाव) के साथ अपने रब की इबादत करते हैं; और जो भी हमने उन्हें दिया है, उसमें से कुछ दूसरों को भी देते हैं।  (16

किसी (जान) को भी मालूम नहीं कि जो कुछ (अच्छे कर्म) वे करते हैं, उसके बदले इनाम में उन्हें कितनी ख़ुशी मिलेगी जो छुपाकर ख़ास तौर से रखी गयी है।  (17)

भला जो आदमी (अल्लाह पर) ईमान रखता हो, वह उस आदमी के बराबर कैसे हो सकता है जो अल्लाह को मानता ही न हो? नहीं, वे बराबर नहीं हो सकते!  (18)

जो लोग ईमान रखते हैं और अच्छे कर्म करते हैं, उनके लिए बाग़ों [जन्नत] में हमेशा रहने का घर होगा, और यह इनाम होगा उन (नेक) कर्मों का जो उन्होंने किया होगा।  (19)

रहे वे लोग जो अल्लाह के हुक्म को नहीं मानते, उनका घर (जहन्नम की) आग होगा। जब कभी वे वहाँ से भागने की कोशिश करेंगे, उन्हें पकड़कर फिर उसी (आग) में डाल दिया जाएगा और उनसे कहा जाएगा, "चखो उस आग की यातना का मज़ा, जिसे तुम हमेशा झूठ समझते थे।" (20)

हम उन्हें (परलोक की) बड़ी यातना से पहले, (इसी दुनिया में) छोटी यातना का मज़ा चखाएँगे, ताकि शायद वे (विचार करें और) सही मार्ग पर (वापस) आ जाएं।  (21)

उस आदमी से बढ़कर ग़लत काम [ज़ुल्म] करने वाला कौन होगा जिसके सामने जब उसके रब की आयतों को पढ़कर सुनाया जाता है, तो वह उनसे मुँह मोड़कर चला जाए? निश्चय ही हम अपराधियों को कड़ी सज़ा देंगे।  (22)


हमने मूसा [Moses] को (आसमानी) किताब [तोरात/Torah] दी थी --- अतः [ऐ मुहम्मद] आपको इसमें कोई शक नहीं होना चाहिए कि आपको भी (आसमानी) किताब दी जा रही है---- और हमने इसराईल की सन्तान के लिए उस (किताब) को सही रास्ता दिखाने वाली बनाया था।  (23)

जब वे धीरज रखते हुए (सच्चाई पर) जम गए, और हमारी आयतों पर पक्का विश्वास करने लगे, तब हमने उनमें से नायकों [leaders] को उठाया, जो हमारे आदेश से (लोगों को) मार्ग दिखाते थे। (24)

[ऐ रसूल], आपका रब है जो क़यामत के दिन उनके बीच उन बातों का फ़ैसला कर देगा, जिनमें वे मतभेद करते रहे हैं।  (25)


क्या उनके लिए यह सी़ख लेने की चीज़ नहीं कि (वे देखते कि) उनसे पहले, कितनी ही नस्लों को हम बर्बाद कर चुके हैं, जिनके रहने-बसने की जगहें (अब खंडहर बन चुकी हैं), जिनके बीच से वे चलते-फिरते हैं? सचमुच इसमें बहुत-सी निशानियाँ हैं---- फिर क्या वे सुनते नहीं? (26)

क्या उन्होंने देखा नहीं कि हम किस तरह बारिश को सूखी बंजर ज़मीन की ओर खींचकर ले जाते हैं। फिर उसके द्वारा खेती उगाते हैं, जिसमें से उनके चौपाए भी खाते है और वे ख़ुद भी खाते हैं? तो क्या उन्हें सूझता नहीं? (27)

वे कहते हैं कि "यह फ़ैसला कब होगा, बताओ अगर तुम सच्चे हो?" (28

कह दें कि "(सच्चाई से) इंकार करने वाले अगर फ़ैसले के दिन, विश्वास कर भी लें, तब भी उन्हें कोई फ़ायदा नहीं होगा; उन्हें कोई ढील नहीं दी जाएगी।" (29)

सो [ऐ रसूल], आप उनसे मुंह मोड़कर अलग हो जाएं, और इंतज़ार करें: वे भी इंतज़ार कर रहे हैं।  (30)



नोट:

3: मक्का के इलाक़े में जब से मूर्तियों की पूजा शुरू हुई और ज़्यादातर लोग बहुदेववादी हो गए,  उस समय से वहाँ कोई नबी नहीं आया था जो अल्लाह का संदेश लोगों तक पहुँचाता। हाँ, कुछ लोग ज़रूर निजी स्तर पर एक अल्लाह की सच्चाई का संदेश देते रहते थे।

4: अरब के लोग देवी-देवताओं की पूजा इसलिए करते थे कि वे उनकी ज़रूरतों के लिए अल्लाह से सिफ़ारिश करेंगे, जैसा कि सूरह यूनुस (10:18) में आया है।

13: जिन्नों और इंसानों को पहली बार बनाने का मक़सद ही यह था कि उन्हें दुनिया में भेजकर आज़माया जाए। उसी समय यह बात तय कर दी गई थी कि अगर वे नबियों के मार्गदर्शन को मानते हुए सही रास्ते पर चलते हैं तो उन्हें जन्नत मिलेगी, और जो कोई सच्चाई को मानने से इंकार करेगा, उसे जहन्नम में डाल दिया जाएगा।

26: अरब के व्यापारियों का कारवाँ अक्सर पुरानी क़ौमों के खंडहरों से होकर गुज़रता था, जैसे समूद की क़ौम के टूटे-फूटे खंडहर इन्हीं रास्तों में पड़ते थे।

 



Friday, November 4, 2016

सूरह 31 : लुक़मान [हकीम लुक़मान / Sage Luqman]

सूरह 31: लुक़मान 
[हकीम लुक़मान / Sage Luqman]



01-09: एक किताब जो रास्ता दिखाने वाली है, उसका मज़ाक़ उड़ाया गया 

10-11: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ 

12-19: अपने बेटे को हकीम लुक़मान की सलाह

20-26: विश्वास न करने वाले शुक्र अदा नहीं करते, और हठधर्म हैं 

   27: अल्लाह का भेजा संदेश ख़त्म नहीं होने वाला 

   28: पैदा करना और दोबारा ज़िंदा करके उठाना दोनों एक-दूसरे से अलग नहीं है 

29-32: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ 

33-34: क़यामत की घड़ी का आना पक्का है   

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
अलिफ़॰ लाम॰ मीम॰ (1)
(जो आयतें उतर रही हैं) यह गहरी समझ-बूझ से भरी हुई किताब [क़ुरआन] की आयतें हैं,  (2)
मार्ग दिखानेवाली हैं, और उनके लिए रहमत [mercy] है जो अच्छा कर्म करते हैं, (3)
जो नमाज़ को पाबंदी से अदा करते हैं, ज़कात [दान] देते हैं और आनेवाली दुनिया [आख़िरत] पर पक्का विश्वास रखते हैं:  (4)
वही हैं जिनको रब ने सही मार्ग दिखाया है, और वही हैं जो कामयाब होंगे।  (5)
लोगों में एक ऐसा आदमी है जो (क़ुरआन से लोगों के) ध्यान को दूर हटा देने वाली चीज़ों [कहानी, खेल तमाशे] पर पैसे ख़र्च करता है, बिना किसी जानकारी के, इस इरादे से कि दूसरों को अल्लाह के रास्ते से भटका सके, और उस (अल्लाह के रास्ते का व उसकी निशानियों) का मज़ाक़ उड़ा सके। उसके लिए अपमानित करने वाली यातना होगी!  (6)
जब उसे हमारी आयतें पढ़कर सुनाई जाती हैं, तो वह नफ़रत व उपेक्षा से पीठ फेरकर चल देता है, मानो उसने कुछ सुना ही नहीं, या मानो कानों से वह बहरा हो। यह ख़बर उसे सुना दें कि उसे बड़ी दर्दनाक यातना होगी!  (7)

मगर जो लोग (सच्चाई में) विश्वास [ईमान] रखते हैं, और उन्होंने अच्छे कर्म किए, तो उनके लिए नेमत-भरे बाग़ [जन्नत, Garden of bliss] हैं, (8)
जहाँ वे (हमेशा) रहेंगे: यह अल्लाह का सच्चा वादा है, और वह बहुत प्रभुत्वशाली, और गहरी समझ-बूझ रखने वाला है।  (9)
उसने आसमानों को ऐसा बनाया है कि तुम देख सकते हो कि वह बिना किसी सहारे के थमा हुआ है, और उसने ज़मीन में मज़बूत पहाड़ों को जमा दिया ताकि तुम्हारे नीचे (की ज़मीन) हिले-डुले नहीं---- और उसमें हर प्रकार के जानवर चारों ओर फैला दिए। और हमने आसमान से पानी बरसाया, जिससे हमने धरती पर हर प्रकार की अच्छी वनस्पतियाँ उगा दीं: (10)
यह सभी चीज़ें अल्लाह की रची हुई हैं। अब तुम ज़रा मुझे दिखाओ कि (अल्लाह को छोड़कर) जिन्हें तुम पूजते हो, उन्होंने क्या पैदा कर दिया है! नहीं, यह (सच्चाई में) विश्वास न करने वाले साफ़ तौर से भटके हुए हैं। (11)
और हमने लुक़मान को गहरी समझ-बूझ दी थी: “अल्लाह का शुक्र अदा करते रहो: जो कोई उसका शुक्र अदा करता है, वह अपने ही फ़ायदे के लिए ऐसा करता है, और वे लोग जो उसके एहसानों को नहीं मानते ---- (तो वे जान लें कि अल्लाह तो आत्मनिर्भर है) उसे किसी की ज़रूरत नहीं, वही सारी प्रशंसा के लायक़ है।”  (12)
लुक़मान ने अपने बेटे को समझाते हुए कहा था, "ऐ मेरे बेटे! किसी को भी अल्लाह का साझेदार [Partner] मत ठहराना। अल्लाह के साथ (उसके अधिकारों में किसी को) साझेदार ठहराना सचमुच बहुत भारी ग़लती है।" (13)
हमने लोगों को अपने माँ-बाप के साथ अच्छा सलूक करने पर बहुत ज़ोर दिया है: तकलीफ़-पे-तकलीफ़ सह के, उनकी माँ उन्हें अपने पेट में लिए फिरी, और दो वर्ष लगते हैं (बच्चों को) दूध छुड़ाने में। सो तुम मेरा शुक्र अदा करो और साथ में अपने माँ-बाप का भी---- (अंत में) सबको मेरी ही पास लौटकर आना है। (14)
अगर तब भी, वे [माँ-बाप] तुझ पर दबाव डालें कि तू मेरे साथ किसी और को (मेरी ख़ुदायी में) साझेदार [partner] ठहराए, जिसका तुझे (कोई किताबी) ज्ञान नहीं, तो उनकी बात मत मानना। मगर इसके बावजूद, अपनी ज़िंदगी में तुम उनके साथ भले तरीक़े से रहना, और उन लोगों के रास्ते पर चलना जो (पूरी भक्ति से माफ़ी के लिए) मेरी ओर झुकते हैं। और अंत में, तुम सबको मेरे ही पास लौटकर आना है, और फिर मैं तुम्हें वह सब कुछ बता दूँगा जो तुम ने किया होगा। (15)
[लुक़मान ने यह भी कहा], "ऐ मेरे बेटे! (याद रखो) अगर राई के दाने के बराबर भी कोई चीज़ चट्टान के बीच में छिपी हो या आसमानों और ज़मीन में कहीं भी हो, अल्लाह उसे सामने हाज़िर कर देगा, क्योंकि अल्लाह छोटी से छोटी चीज़ को देखनेवाला, और हर चीज़ की ख़बर रखनेवाला है। (16)
"ऐ मेरे बेटे! नमाज़ पाबंदी से पढ़ा करो; लोगों को अच्छाई की तरफ़ प्रेरित करो; बुराई से रोको; जो मुसीबत भी तुम पर पड़े उस पर धीरज से काम लो: यही वे काम हैं जिन्हें करने का पक्का इरादा करना चाहिए।  (17)
लोगों की उपेक्षा करते हुए उनसे मुँह न मोड़ो, न ज़मीन पर अकड़कर चला करो, क्योंकि अल्लाह किसी अहंकारी और डींग मारने वाले को पसन्द नहीं करता। (18)
जब चलो तो एक अंदाज़ की चाल [न धीमी, न तेज़] से चला करो, और अपनी आवाज़ धीमी रखा करो, सचमुच आवाज़ों में सबसे बुरी आवाज़ गधों के रेंकने की होती है।" (19)
[लोगो] क्या तुम देखते नहीं कि जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन पर है, उन सबको अल्लाह ने किस तरह से तुम्हारे फ़ायदे के लिए बनाया है, और उसने तुम पर अपनी नेमतें [blessings] न्योंछावर कर दी हैं--- तुम्हारे भीतर भी और तुम्हारे बाहर भी? तब भी कुछ लोग ऐसे हैं जो अल्लाह के विषय में बहस करते हैं, जबकि न तो उन्हें कोई जानकारी है, न कोई मार्गदर्शन है और न उनके पास ऐसी कोई (आसमानी) किताब है जो सही रौशनी दिखा सके‌‌। (20)
जब उनसे कहा जाता है कि "जो चीज़ अल्लाह ने उतारी है, उसको मानते हुए उस रास्ते पर चलो”, तो वे कहते हैं, "नहीं, हम तो उस रास्ते पर चलेंगे जिसपर हमने अपने बाप-दादा को चलते हुए देखा है।" क्या! यहाँ तक कि शैतान उनको भड़कती हुई (जहन्नम की) आग की यातना की ओर बुला रहा हो तब भी (वे बाप-दादा के रास्ते पर ही चलेंगे)?  (21)
जो कोई अपने आपको अल्लाह के सामने पूरी भक्ति के साथ समर्पित करता हो, और वह अच्छे कर्म भी करता हो, तो सचमुच उसने बड़ा मज़बूत सहारा थाम लिया है, क्योंकि सारे मामलों का नतीजा तो अल्लाह ही के हाथ में है।  (22)
और जो कोई ऐसा करने से इंकार कर दे, तो [ऐ रसूल] उसका (आपकी बातों को मानने से) इंकार कर देना कहीं आपको बहुत दुखी न कर दे---- वे सब हमारे ही पास लौटकर आएंगे और फिर जो कुछ वे किया करते थे, हम उन्हें सब बता देंगे---- निस्संदेह अल्लाह दिलों के अंदर की बात तक जानता है----- (23)
हम उन्हें (दुनिया में) कुछ समय के लिए थोड़ा मज़ा उड़ाने का मौक़ा देते हैं, मगर फिर हम उन्हें एक कठोर यातना की ओर खींचकर ले जाएँगे। (24)
अगर आप उनसे पूछें कि आसमानों और ज़मीन को किसने पैदा किया, तो वे अवश्य कहेंगे, "अल्लाह ने।" कह दें, "तारीफ़ें भी सब अल्लाह के लिए हैं," मगर अधिकांश लोग नहीं समझते हैं।  (25)
हर एक चीज़ जो आसमानों में और ज़मीन पर है, सब अल्लाह की है। निस्संदेह अल्लाह तो आत्मनिर्भर है (जिसे किसी की ज़रूरत नहीं), और सारी प्रशंसा के लायक़ भी वही है। (26)
ज़मीन पर जितने पेड़ हैं, अगर वे क़लम बन जाएँ और सारे समंदर स्याही बन जाएं, और फिर उसके साथ सात समंदर और भी मिल जाएं, (और वह अल्लाह की तारीफ़ें लिखें) तब भी अल्लाह की बातें समाप्त न हो सकेंगी: अल्लाह अत्यन्त प्रभुत्वशाली, बहुत समझ-बूझ रखने वाला है।  (27)
तुम सबको पैदा करना और फिर दोबारा ज़िंदा करके उठाना (अल्लाह के लिए) तो बस ऐसा है, जैसे किसी एक आदमी को पैदा करना और फिर ज़िंदा उठाना: अल्लाह सब कुछ सुनता और हर चीज़ देखता है। (28)
क्या आपने [ऐ रसूल] देखा नहीं कि अल्लाह रात को दिन से मिला देता है और दिन को रात से मिला देता है; और यह कि उसने सूरज और चाँद को काम पर लगा रखा है, हर एक अपने नियत समय तक अपनी कक्षा में चलता रहता है; और क्या तुम नहीं जानते कि जो कुछ भी तुम (लोग) करते हो, अल्लाह उसकी पूरी ख़बर रखता है? (29)
और यह सब कुछ इस कारण से है कि अल्लाह ही सत्य है, और उसे छोड़कर जिन (बुतों) को भी वे पुकारते हैं, वे झूठ हैं। और अल्लाह ही सबसे ऊँचा, सबसे महान है। (30)
क्या [ऐ रसूल] आपने देखा नहीं कि समंदर में नौकाएं अल्लाह की मेहरबानी से चलती हैं, ताकि वह तुम (लोगों) को अपनी कुछ निशानियाँ दिखाए? सचमुच इसमें हर उस आदमी के लिए निशानियाँ हैं जो धीरज [सब्र] से काम लेता है, और शुक्र अदा करता है।  (31)
(पानी के जहाज़ों पर) जब समंदर की लहरें किसी विशाल परछायीं की तरह छा जाती हैं, तो (उसमें बैठे हुए) लोग पूरी भक्ति से अपने आपको केवल अल्लाह के सामने समर्पित करते हुए (मदद के लिए) पुकारते हैं, फिर जब वह उन्हें बचाकर किनारे तक पहुँचा देता है, तो उनमें से कुछ लोगों की सोच डगमगा जाती है (और वे अल्लाह को छोड़कर अपने बनाए हुए ख़ुदाओं को याद करने लगते हैं) ---- हमारी निशानियों को मानने से इंकार केवल वही करता है जो एक नम्बर का विश्वासघाती, और नाशुक्रा [Ungrateful] हो।  (32)
ऐ लोगो! अपने रब से डरते हुए बुराइयों से बचो, और उस दिन से डरो जब किसी भी तरह से न कोई माँ-बाप (मदद के लिए) अपने बच्चे की जगह ले पायेगा और न ही कोई बच्चा अपने माँ-बाप की जगह ले पायेगा। अल्लाह का वादा सच्चा है, अतः देखना कि यह सांसारिक जीवन तुम्हें धोखे में न डाल दे, और न ही अल्लाह के बारे में कोई (शैतान) धोखेबाज़ तुम्हें धोखे में डाल सके। (33)

निस्संदेह उस [क़यामत की] घड़ी का ज्ञान तो बस अल्लाह ही को है; वही पानी बरसाता है और वह जानता है कि माँ की कोख में क्या छुपा है, कोई भी आदमी नहीं जानता कि कल उसके कर्मों का क्या फल मिलेगा, और कोई आदमी नहीं जानता है कि उसकी मौत ज़मीन के किस हिस्से में होगी; वह तो अल्लाह है जो सब जाननेवाला, और हर चीज़ की ख़बर रखनेवाला है। (34)



नोट:

6: मक्का में जिन लोगों ने अभी तक अल्लाह के संदेश को क़बूल नहीं किया था, वे भी जब कभी क़ुरआन पढ़कर सुनायी जाती, तो उसे छुप-छुपकर सुना करते थे, और इसके नतीजे में कुछ लोग इससे प्रभावित होकर मुसलमान बन जाते थे। इस सूरत में मक्का के सरदारों ने सोचा कि लोगों को किसी तरह क़ुरआन से दूर रखा जाए। मक्का में “नज़र बिन हारिस” नाम का एक व्यापारी था जो व्यापार के सिलसिले में दूर के देशों में जाया करता था, वह ईरान [फारस] से वहाँ के बादशाहों के क़िस्सों पर आधारित एक किताब लाया था, और कुछ के अनुसार एक नाचने-गानेवाली लौंडी भी लाया था। उसने लोगों से कहना शुरू किया कि मुहम्मद साहब जो पुराने क़िस्से बताते हैं, उससे कहीं ज़्यादा दिलचस्प क़िस्से और गाने मैं तुम्हें सुनाउंगा।

12: हज़रत लुक़मान के बारे में माना जाता है कि वह नबी नहीं थे, बल्कि एक बहुत ही गहरी समझ-बूझवाले आदमी थे। कुछ लोग मानते हैं कि वह यमन के रहनेवाले थे, और हज़रत हूद (अलै.) के जो साथी यातना से बच गए थे, उसमें वह भी शामिल थे, कुछ लोग कहते हैं कि वह हब्शा [इथोपिया] के रहनेवाले थे। बहरहाल, अरब के लोग उन्हें बहुत क़ाबिल व समझदार मानते थे, और उनके बीच उनकी अक़्लमंदी की बहुत सी बातें मशहूर थीं।  

13: “भारी ग़लती” के लिए यहाँ "ज़ुल्म" शब्द आया है, ज़ुल्म का मतलब किसी का हक़ छीनकर दूसरे को दे देना होता है। चूँकि इबादत किए जाने का अधिकार [हक़] केवल अल्लाह को ही है, इसलिए जब अल्लाह के साथ उसकी ख़ुदायी में दूसरों को साझेदार बनाया जाता है, तो इसे ज़ुल्म कहा गया है।

15: मक्का में जब लोग आहिस्ता-आहिस्ता मुसलमान होने लगे, तो उनके साथ यह समस्या थी कि उनके माँ-बाप तो अपने पुराने धर्म पर अड़े हुए थे और अपने बच्चों पर दबाव बना रहे थे कि वे भी इस्लाम छोड़ दें। यहाँ यह बात साफ़ कर दी गयी कि माँ-बाप के साथ तो हर हाल मे अच्छा व्यवहार करना है, लेकिन अगर वे सच्चाई को छोड़ने की बात पर ज़ोर दें, तो उनकी बात नहीं माननी चाहिए और नर्मी से मना कर देना चाहिए।

25: मक्का के लोग यह मानते थे कि ज़मीन और आसमान को अल्लाह ने ही पैदा किया है, मगर यह बात नहीं समझ पाते थे कि फिर इबादत [पूजा] किए जाने के लायक़ भी केवल अल्लाह ही है।

Surah/सूरह 1: Al-Fatiha/अल-फ़ातिहा [(किताब की) शुरुआत/ The Opening]

       सूरह 1: अल-फ़ातिहा    [(किताब की) शुरुआत/ The Opening] यह एक मक्की सूरह है। पूरे क़ुरआन में अल्लाह का जो संदेश आया है , उसका इस सूरह मे...