सूरह 26: अश-शु’अरा
[कविगण /The Poets]
01-02: अल्लाह की किताब की आयतें (निशानियाँ)
03-09: विश्वास न करने वालों की ज़िद्द और हठधर्मी
10-51: मूसा (अलै) और फ़िरऔन की कहानी
52-68: मिस्र से इसराईल की संतानों का निकलना
69-104: इबराहीम (अलै) और उनकी क़ौम की कहानी
105-122: नूह (अलै) और उनकी क़ौम की कहानी
123-140: हूद (अलै) और आ'द के लोगों की कहानी
141-159: सालेह (अलै) और समूद के लोगों की कहानी
160-175: लूत (अलै) और उनकी क़ौम की कहानी
176-191: शुएब (अलै) और जंगल में रहने वाले लोगों की कहानी
192-209: सचमुच क़ुरआन भरोसा करने के लायक़ है
210-220: क़ुरआन लाने वाला कोई जिन्न या शैतान नहीं है
221-227: झूठे लोग और कविगण
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
ये उस किताब की आयतें हैं, जो सच्चाई को स्पष्ट कर देती हैं: (2)
[ऐ रसूल], क्या आप यह सोच-सोचकर अपनी जान ही दे देंगे कि आख़िर वे लोग (आपकी बातों में) विश्वास क्यों नहीं करते? (3)
अगर हम ऐसा चाहते, तो उनपर आसमान से एक ऐसी निशानी उतार देते, कि फिर उसके आगे उनकी गर्दनें झुकी की झुकी रह जातीं। (4)
जब कभी दयालु रब [रहमान] की तरफ़ से उनके पास नयी नसीहतें [आयतें] भेजी जाती हैं, वे उससे मुँह मोड़ लेते हैं: (5)
वे इसे (मानने से) इंकार करते हैं, मगर जल्द ही उन्हें उसकी हक़ीक़त मालूम हो जाएगी, जिसका वे मज़ाक़ उड़ाते रहे हैं। (6)
क्या उन्होंने धरती को नहीं देखा कि हमने उसमें कैसी-कैसी (वनस्पतियों की) क़िस्में उगा दीं? (7)
सचमुच ही इसमें एक बड़ी निशानी है, हालाँकि उनमें से अधिकतर लोग विश्वास नहीं करते: (8)
और तुम्हारा रब ही है जो बड़ा प्रभुत्वशाली, सब पर दयावान है। (9)
(उस समय का हाल सुनो) जबकि तुम्हारे रब ने मूसा [Moses] को पुकारकर कहा था, "ग़लत काम करनेवाले [ज़ालिम] लोगों के पास जाओ, (10)
यानी फ़िरऔन [Pharaoh] की क़ौम के पास --- क्या वे (अल्लाह की बातों पर) ध्यान नहीं देंगे?" (11)
मूसा ने कहा, "ऐ मेरे रब! मुझे डर है कि वे मुझे झूठा कहेंगे, (12)
और मैं दुखी हो जाऊँगा और मेरी ज़बान बंद हो जाएगी, इसलिए (मेरे भाई) हारून [Aaron] को भी मेरे साथ भेज दें; (13)
इसके अलावा, मेरे ख़िलाफ़ उन लोगों ने एक (क़त्ल का) इल्ज़ाम भी लगा रखा है। इसलिए मैं डरता हूँ कि कहीं वे मुझे मार ही न डालें।" (14)
अल्लाह ने कहा, "नहीं [वे ऐसा नहीं कर सकते]! तुम दोनों हमारी निशानियाँ लेकर जाओ--- यक़ीन रखो, हम तुम्हारे साथ रहेंगे, और सब सुनते रहेंगे। (15)
अतः तुम दोनो फ़िरऔन के पास जाओ और कहो, “हम सारे संसार के रब की तरफ़ से संदेश लेकर आए हैं: (16)
इसराईल की सन्तानों को हमारे साथ जाने दो।" (17)
फ़िरऔन ने कहा, "क्या हमने तुम्हें अपने यहाँ रखकर पाला नहीं था जब तुम बच्चे थे? क्या तुमने हमारे साथ रहते हुए अपनी उम्र के कई साल नहीं गुज़ारे थे? (18)
और फिर तुमने अपने हाथ से वह अपराध कर डाला था: तुम बड़े एहसान फ़रामोश [ungrateful] हो।" (19)
मूसा ने जवाब दिया, “जब मैंने वह (घूँसा मारने का) काम किया, उस वक़्त मुझे धोखा हुआ था, (20)
और मैं तुम्हारे डर से यहाँ से भाग़ खड़ा हुआ था; बाद में, मेरे रब ने मुझे सही ज्ञान दिया और मुझे अपने रसूलों में शामिल कर लिया। (21)
और क्या यही बड़ा काम किया है तुमने --- कि इसराईल की सन्तान को ग़ुलाम बना रखा है--- जो तुम मुझ पर अपना एहसान जता रहे हो?" (22)
फिर फ़िरऔन ने पूछा, "और यह सारे संसार का रब क्या होता है?" (23)
मूसा ने जवाब दिया, "वह सारे आसमानों का, ज़मीन का, और जो कुछ इन दोनों के बीच है, उन सबका रब है, अगर तुम सचमुच विश्वास कर सको!" (24)
फ़िरऔन ने वहाँ मौजूद लोगों से कहा, "क्या तुमने सुना, जो कुछ इस ने कहा?" (25)
मूसा ने कहा, "वह तुम्हारा भी रब है और तुम्हारे बाप-दादाओं का भी रब है।" (26)
फ़िरऔन ने कहा, "यह रसूल, जो तुम्हारी ओर भेजा गया है, सचमुच ही पागल है।" (27)
मूसा ने आगे कहा, "वह पूरब और पश्चिम का भी रब है और जो कुछ उनके बीच है उसका भी रब है, (समझ जाओगे) अगर तुम अपनी बुद्धि से काम लो!" (28)
मगर फिरऔन ने (मूसा से) कहा, "अगर तूने मेरे सिवा किसी और को पूजने के क़ाबिल माना, तो मैं तुझे ज़रूर बन्दी बना लूँगा", (29)
इस पर मूसा ने पूछा, "क्या तब भी, अगर मैं तुम्हें कोई ऐसी चीज़ दिखा दूँ जिसे (देखकर) तुम मान जाओ?" (30)
“अच्छा ठीक है, दिखाओ, अगर तुम सच बोल रहे हो", फ़िरऔन ने कहा। (31)
अत: मूसा ने अपनी लाठी फेंकी, देखते ही देखते वह अजगर साँप बन गयी। (32)
फिर उसने अपना हाथ (बग़ल से) खींचकर निकाला, तो वह पल भर में देखने वालों के सामने सफ़ेद होकर चमकने लगा। (33)
फ़िरऔन ने अपने आसपास मौजूद सरदारों से कहा, "यह आदमी तो बड़ा ही माहिर जादूगर है! (34)
ऐसा लगता है कि यह अपने जादू से तुम्हें तुम्हारी ज़मीन से निकाल बाहर करना चाहता है! तो अब तुम्हारी क्या राय है?" (35)
उन्होंने जवाब दिया, "इसे और इसके भाई को अभी कुछ समय के लिए टाल दें, और सभी शहरों में संदेशवाहकों को भेज दें, (36)
ताकि सभी मँझे हुए जादूगरों को आपके पास लाया जा सके।" (37)
जादूगरों को एक ख़ास दिन में एक नियत समय पर जमा होना था, (38)
और लोगों से पूछा गया था, (39)
"क्या तुम सब लोग (देखने) आ रहे हो? अगर जादूगरों की जीत होती है, तो हम उनके बताए हुए रास्ते पर चल सकते हैं।" (40)
फिर जादूगरों ने वहाँ पहुँचकर फ़िरऔन से कहा, "अगर हम जीत जाएंगे, तो क्या हमें कोई इनाम दिया जाएगा?" (41)
उसने कहा, "हाँ, हाँ, तुम हमारे क़रीबी दरबारियों में शामिल कर लिए जाओगे।" (42)
मूसा ने उनसे कहा, "फेंको, जो कुछ तुम फेंकना चाहते हो।" (43)
तब जादूगरों ने अपनी रस्सियाँ और लाठियाँ फेंकी और बोले, "फ़िरऔन की इज़्ज़त व ताक़त की क़सम! हम ही विजयी रहेंगे।" (44)
मगर मूसा ने अपनी लाठी जैसे ही ज़मीन पर फेंकी, तो क्या देखते हैं कि वह (अजगर बनकर) उस स्वांग से रची गयी चीज़ों को निगल गया, (45)
और इस पर जादूगर घुटनों के बल (सज्दे में) गिरा दिए गए, (46)
और बोल उठे, "हमने सारे संसार के रब पर विश्वास कर लिया, (47)
जो मूसा और हारून का रब है!" (48)
फ़िरऔन ने कहा, "तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई कि मेरी अनुमति लिए बिना ही, तुमने इस पर विश्वास भी कर लिया? यह ज़रूर तुम सबका उस्ताद है, जिसने तुमको जादू सिखाया है! अच्छा, तो अभी तुम्हें मालूम हुआ जाता है: मैं तुम्हारे एक तरफ़ के हाथ और दूसरी तरफ़ के पाँव कटवा दूँगा, और तुम सबको सूली पर चढ़ा दूँगा!" (49)
जादूगरों ने कहा, "हमारा तो इससे कोई नुक़सान नहीं होगा, क्योंकि यह बात पक्की है कि हमको अपने रब के पास लौटकर जाना है। (50)
उम्मीद है कि हमारा रब हमारे गुनाहों को माफ़ कर देगा, क्योंकि सबसे पहले हमने विश्वास कर लिया था।" (51)
हमने मूसा को 'वही' [revelation] भेजकर अपनी बात बतायी, "मेरे बन्दों को लेकर रातों-रात निकल जाओ, अवश्य ही तुम्हारा पीछा किया जाएगा!" (52)
इस बीच फ़िरऔन ने शहरों में संदेशा देने वालों को यह कहते हुए भेजा, (53)
"यह (इसराईल की संतानें) कमज़ोर और थोड़े से लोगों की एक टोली है--- (54)
उन लोगों ने हमें ताव दिलाया है--- (55)
और हम एक बड़ी सेना हैं, हमेशा तैयार रहने वाली।" (56)
अंत में, ऐसा हुआ कि उन (फिरऔन के लोगों) को --- अपने बाग़ों और पानी के सोतों को, (57)
अपने ख़ज़ानों, और रहने के बेहतरीन मकानों को--- छोड़कर निकलना पड़ा। (58)
हमने ऐसी चीज़ें (बाद में) इसराईल की सन्तानों को दे दी। (59)
सुबह-तड़के ही फ़िरऔन और उसके लोगों ने उनका पीछा किया, (60)
फिर जैसे ही दोनों तरफ़ के लोग (नज़दीक पहुंचे) और एक-दूसरे को दिखाई देने लगे, तो मूसा के माननेवालों ने कहा, "अब हम ज़रूर पकड़े जाएंगे!" (61)
मूसा ने कहा, "नहीं, मेरा रब मेरे साथ है: वह अवश्य रास्ता दिखाएगा", (62)
और हमने मूसा को 'वही' [Revelation] भेजी, "अपनी लाठी समंदर पर मारो।" समंदर दो हिस्सों में फट गया ----- हर एक हिस्सा ऊँचे पहाड़ की तरह खड़ा हो गया (और रास्ता बन गया) ---- (63)
और हम दूसरों [फ़िरऔन व उसके साथियों] को भी उसी जगह ले आए : (64)
और हमने मूसा को और उनके सभी साथियों को बचा लिया, (65)
और बाक़ी बचे (फ़िरऔन के) लोगों को डुबा दिया। (66)
सचमुच इसमें एक बड़ी निशानी है, मगर अधिकतर लोग विश्वास नहीं करते: (67)
तुम्हारा रब ही है जो सबसे ताक़तवाला, सब पर दयावान है। (68)
और [ऐ रसूल] उन्हें इबराहीम [Abraham] की कहानी सुनाएं, (69)
जबकि उसने अपने बाप और अपनी क़ौम के लोगों से कहा, "तुम किसे पूजते हो?" (70)
उन्होंने कहा, "हम मूर्तियों की पूजा करते हैं, और हम तो उन्हीं की सेवा में लगे रहते हैं।" (71)
उसने पूछा, "क्या ये तुम्हारी बात सुनते हैं, जब तुम पुकारते हो, (72)
क्या ये तुम्हारी कुछ मदद या हानि पहुँचाते हैं?" (73)
उन्होंने कहा, "नहीं, बल्कि हमने तो अपने बाप-दादा को ऐसा ही करते हुए देखा है।" (74)
इबराहीम ने कहा, "कभी तुमने यह सोचा कि तुम किसकी पूजा करते रहे हो, (75)
तुम और तुम्हारे बाप-दादा, (76)
वे सब तो मेरे लिए दुश्मन हैं; मगर सारे संसार के रब की बात अलग है, (77)
जिसने मुझे पैदा किया। फिर वही है जो मुझे सीधा रास्ता दिखाता है; (78)
और वही है जो मुझे खिलाता और पिलाता है; (79)
जब मैं बीमार होता हूँ, तो वही मुझे ठीक कर देता है; (80)
और वही है जो मुझे मौत देगा, और फिर मुझे दोबारा ज़िंदगी देगा; (81)
और वही है जिससे मुझे उम्मीद है कि फ़ैसले के दिन वह मेरी ग़लतियाँ माफ़ कर देगा। (82)
ऐ मेरे रब! मुझे ज्ञान व समझ-बूझ दे; और मुझे नेक लोगों के साथ शामिल कर ले; (83)
और मुझे बाद में आने वाली नस्लों में भी अच्छे नामों से याद किया जाता रहे; (84)
और मुझे उनमें से बना जिन्हें नेमतों वाली जन्नत [Garden of bliss] दी जाएगी--- (85)
और मेरे बाबा को माफ़ कर दे, कि वह उन लोगों में से हैं जो सही रास्ते से भटक चुके हैं——(86)
और मुझे उस दिन की बेइज़्ज़ती से बचा, जब सब लोग जीवित करके दोबारा उठाए जाएँगे: (87)
उस दिन न माल काम आएगा और न बाल-बच्चे ही कोई मदद कर सकेंगे, (88)
और उस दिन केवल वही सुरक्षित बच पाएगा, जो अल्लाह के सामने ऐसा दिल लेकर आया हो, जो पूरी भक्ति से उसके ही सामने झुकनेवाला हो।" (89)
जब (जन्नत के) बाग़ को सही रास्ते पर चलने वाले नेक लोगों के नज़दीक लाया जाएगा, (90)
और (जहन्नम की) आग भटके हुए लोगों के ठीक सामने खड़ी कर दी जाएगी, (91)
और तब उनसे पूछा जाएगा, "कहाँ हैं वे जिन्हें तुम पूजते थे, (92)
अल्लाह को छोड़कर? क्या वे अब तुम्हारी सहायता कर सकते हैं या अपना बचाव ही कर सकते हैं?" (93)
और उसके बाद, उन सबको जहन्नम में फेंक दिया जाएगा, साथ में उन लोगों को भी जो उन्हें सीधे रास्ते से भटका देते थे, (94)
और इबलीस [शैतान] के सारे समर्थक भी (आग में डाले जाएंगे)। (95)
वहाँ वे आपस में तू-तू मैं-मैं करते हुए, अपने (गढ़े हुए) ख़ुदाओं से कहेंगे, (96)
"अल्लाह की क़सम! हम उस समय सचमुच बड़ी गुमराही में थे, (97)
जब हमने तुम्हें सारे संसार के रब के बराबर ठहराया था। (98)
वे शैतानियाँ करनेवाले लोग ही थे जिन्होंने हमें सही रास्ते से भटका दिया था, (99)
और अब हमारे लिए न तो कोई सिफ़ारिश करने वाला है, (100)
और न कोई सच्चा दोस्त है। (101)
काश! अगर हम अपनी ज़िंदगी दोबारा जी पाते, तो हम पक्के ईमानवाले [मोमिन] हो जाते!" (102)
सचमुच ही इसमें एक बड़ी निशानी है, हालाँकि अधिकतर लोग विश्वास नहीं करते: (103)
तुम्हारा रब ही है जो सबसे प्रभुत्वशाली, सब पर दयावान है। (104)
नूह [Noah] की क़ौम ने भी रसूलों को झुठा बताया। (105)
उनके भाई नूह ने उनसे कहा, "क्या तुम अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से नहीं बचोगे? (106)
निस्संदेह मैं एक भरोसेमंद रसूल हूँ, जो तुम्हारे पास भेजा गया हूँ: (107)
अल्लाह का डर रखो और मेरा कहा मानो। (108)
मैं इसके लिए तुमसे कोई इनाम नहीं माँगता, क्योंकि मेरा इनाम तो बस उसके पास है जो सारे संसार का पालनहार है: (109)
अल्लाह का डर रखो और मेरा कहा मानो।" (110)
उन्होंने जवाब दिया, "हम तुम्हारी बात पर कैसे विश्वास कर लें, जबकि तुम्हारे पीछे चलने वाले तो बिल्कुल ही नीच क़िस्म के लोग हैं?" (111)
नूह ने कहा, "मुझे क्या मालूम कि वे क्या करते थे? (112)
उनका हिसाब लेने का काम तो बस मेरे रब के हाथ में है---काश तुम समझ पाते--- (113)
और जिन लोगों ने (मेरी बात पर) विश्वास कर लिया, मैं उन्हें दुत्कारने वाला तो हूँ नहीं। (114)
मैं तो बस यहाँ इसीलिए हूँ कि लोगों को साफ़-साफ़ चेतावनी दे दूँ।" (115)
इस पर उन लोगों ने कहा, "ऐ नूह! अगर तुमने अपनी हरकतें बंद नहीं की, तो तुम्हें ज़रूर पत्थरों से मार डाला जाएगा।" (116)
नूह ने कहा, "ऐ मेरे रब! मेरी क़ौम के लोगों ने मेरी बात मानने से इंकार कर दिया है, (117)
इसलिए अब मेरे और उनके बीच दो टूक फ़ैसला कर दे, और मुझे और मेरे ईमानवाले साथियों को बचा ले!" (118)
इस तरह, हमने उसे और उसके माननेवालों को, जो भरी हुई नौका में थे, बचा लिया, (119)
और बाक़ी बचे लोगों को डुबा दिया। (120)
सचमुच ही इसमें एक बड़ी निशानी है, हालाँकि अधिकतर लोग विश्वास नहीं करते: (121)
तुम्हारा रब ही है जो सबसे प्रभुत्वशाली, सब पर दयावान है। (122)
आद के लोगों ने भी रसूलों को झूठा बताया। (123)
उनके भाई हूद ने उनसे कहा, "क्या तुम अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से नहीं बचोगे? (124)
निस्संदेह मैं एक भरोसेमंद रसूल हूँ, जो तुम्हारे पास भेजा गया हूँ: (125)
अल्लाह का डर रखो और मेरा कहा मानो। (126)
मैं इसके लिए तुमसे कोई इनाम नहीं माँगता, क्योंकि मेरा इनाम तो बस उसके पास है जो सारे संसार का पालनहार है। (127)
क्या तुम दिखावे के लिए हर ऊँची जगह पर बेकार के स्मारक ही बनाते फिरोगे? (128)
क्या तुम इस आशा में (शानदार) क़िले बनवाते रहते हो कि जैसे तुम्हें यहाँ हमेशा ज़िंदा रहना है? (129)
और जब किसी पर हमला करते हो, तो बिल्कुल निर्दयी ज़ालिम क्यों बन जाते हो? (130)
अतः अल्लाह का डर रखो और मेरा कहा मानो; (131)
उस (अल्लाह) का डर रखो, जिसने तुम तक वह सारी चीज़े पहुँचाई हैं जिन्हें तुम अच्छी तरह जानते हो--- (132)
उसने तुम्हें चौपाए और बाल-बच्चे दिए हैं, (133)
और बाग़ व पानी के सोते [Springs] भी--- (134)
इस कारण मुझे सचमुच डर है कि एक बड़े दर्दनाक दिन की यातना तुम्हें घेर लेगी।" (135)
जवाब में वे बोले, "चाहे तुम हमें सावधान करो या न करो, हमें इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ने वाला है, (136)
क्योंकि हम तो केवल वही करेंगे, जैसा कि हमारे बाप-दादा किया करते थे: (137)
हमें कोई सज़ा नहीं दी जाएगी।" (138)
उन लोगों ने हूद को खुले आम झूठा घोषित कर दिया, जिसके नतीजे में हमने उन्हें बर्बाद कर दिया। सचमुच ही इसमें एक बड़ी निशानी है, हालाँकि अधिकतर लोग विश्वास नहीं करते: (139)
तुम्हारा रब ही है जो सबसे प्रभुत्वशाली, सब पर दयावान है। (140)
समूद के लोगों ने भी रसूलों को झुठा कहा। (141)
उनके भाई सालेह ने उनसे कहा, "क्या तुम अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से नहीं बचोगे? (142)
निस्संदेह मैं तुम्हारे लिए एक भरोसेमंद रसूल हूँ: (143)
अल्लाह से डरो, और मेरा कहा मानो। (144)
मैं इसके लिए तुमसे कोई इनाम नहीं माँगता, क्योंकि मेरा इनाम तो बस उसके पास है जो सारे संसार का पालनहार है। (145)
(क्या तुम सोचते हो कि) यहाँ जो कुछ है उनके बीच, तुम हमेशा के लिए सुरक्षित छोड़ दिए जाओगे--- (146)
इन बाग़ों और पानी के सोतों, (147)
खेतों और फलों से लदे हुए खजूर के पेड़ों के बीच--- (148)
और पहाड़ों को काट-काटकर नफ़ासत से बनाए हुए घरों के बीच (क्या सदा के लिए रहोगे)? (149)
अतः अल्लाह से डरो, और मेरा कहा मानो: (150)
और उन मर्यादा को तोड़नेवालों का कहना बिल्कुल न मानो, (151)
जो धरती में गड़बड़ी फैलाते रहते हैं, बजाए इसके कि चीज़ों को सुधारते व सही काम करते।" (152)
उन्होंने कहा, "तुम पर तो जादू कर दिया गया है! (153)
तुम और कुछ नहीं, बस हमारे ही जैसे एक आदमी हो। अगर तुम सच बोल रहे हो तो कोई निशानी दिखाओ।" (154)
सालेह ने कहा, "(ठीक है, लो) यह ऊँटनी है, पानी पीने की बारी इसकी अलग होगी, और तुम्हारी बारी अलग होगी, और हर एक के लिए पीने का एक नियत दिन होगा। (155)
सो देखना, उस (ऊँटनी) को कोई नुक़सान नहीं होना चाहिए, अन्यथा एक बड़े भयानक दिन की यातना तुम्हें आ पकड़ेगी।" (156)
मगर उन लोगों ने उसके अगले पाँव की कूचें [hamstring] काट डालीं। सुबह में वे (अपनी ग़लती पर) पछताते रह गए: (157)
यातना ने उन्हें आ दबोचा था। सचमुच ही इसमें एक बड़ी निशानी है, हालाँकि अधिकतर लोग विश्वास नहीं करते: (158)
तुम्हारा रब ही है जो सबसे प्रभुत्वशाली, सब पर दयावान है। (159)
लूत [Lot] की क़ौम के लोगों ने भी रसूलों को झुठा बताया। (160)
उनके भाई लूत ने उनसे कहा, "क्या तुम अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से नहीं बचोगे? (161)
निस्संदेह मैं तुम्हारे लिए एक भरोसेमंद रसूल हूँ: (162)
अल्लाह से डरो, और मेरा कहा मानो। (163)
मैं इसके लिए तुमसे कोई इनाम नहीं माँगता, क्योंकि मेरा इनाम तो बस उसके पास है जो सारे संसार का पालनहार है। (164)
क्या दूसरे लोगों से तुम अलग-थलग हो कि (सेक्स के लिए) मर्दों के पास जाते हो, (165)
और अपनी पत्नियों को तुमने छोड़ रखा है, जिन्हें अल्लाह ने तुम्हारे लिए पैदा किया है? तुम तो सारी सीमाएं तोड़ रहे हो।" (166)
मगर उन लोगों ने जवाब दिया, "ऐ लतू! अगर तुमने सचमुच अपनी बातें बंद नहीं कीं, तो तुम्हें अवश्य ही निकाल बाहर किया जाएगा।" (167)
सो लूत ने कहा, "जो हरकत तुम करते हो, उससे मुझे नफ़रत है: (168)
ऐ मेरे रब! जो कुछ ये करते हैं, उससे मुझे और मेरे परिवार के लोगों को बचा ले।" (169)
फिर हमने उसे और उसके परिवार के सारे लोगों को बचा लिया; (170)
सिवाए एक बुढ़िया के, जो पीछे रह जाने वालों में थी, (171)
फिर दूसरे सभी लोगों को हमने बर्बाद कर दिया, (172)
और हमने उन पर एक तबाहीवाली बारिश बरसाई--- और कितनी भयानक बारिश थी वह, उन लोगों के लिए जिन्हें पहले सावधान किया जा चुका था! (173)
सचमुच ही इसमें एक बड़ी निशानी है, हालाँकि अधिकतर लोग विश्वास नहीं करते: (174)
तुम्हारा रब ही है जो सबसे प्रभुत्वशाली, सब पर दयावान है। (175)
अल-ऐका [जंगल में रहनेवालों] ने भी रसूलों को झुठा कहा। (176)
शुऐब ने उनसे कहा, "क्या तुम अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से नहीं बचोगे? (177)
निस्संदेह मैं तुम्हारे लिए एक भरोसेमंद रसूल हूँ: (178)
अल्लाह से डरो, और मेरा कहा मानो। (179)
मैं इसके लिए तुमसे कोई इनाम तो नहीं माँगता, क्योंकि मेरा इनाम तो बस उसके पास है जो सारे संसार का पालनहार है। (180)
नाप-तौल के मुताबिक़ पूरा दिया करो: दूसरों को बेचते समय (नाप से) कम न दो। (181)
सही व ठीक तराज़ू से तौलो: (182)
लोगों को उनकी चीज़ों में कमी करके न दो। धरती पर गड़बड़ी व लूटमार [corruption] न मचाओ। (183)
अल्लाह से डरो, जिसने तुम्हें और पिछली नस्लों को पैदा किया", (184)
मगर उन लोगों ने जवाब दिया, "तुम पर तो जादू कर दिया गया है! (185)
तुम और कुछ नहीं, बस हमारे ही जैसे एक आदमी हो। असल में तो हम तुम्हें झूठा समझते हैं। (186)
अगर तुम सच बोल रहे हो, तो हम पर आसमान का कोई टुकड़ा ही गिरा के दिखा दो।" (187)
शुऐब ने कहा, "मेरा रब अच्छी तरह से जानता है जो कुछ तुम करते हो।" (188)
उन लोगों ने उसे झुठा कहा, और इस तरह छायावाले दिन की यातना ने उन्हें आ दबोचा--- वह एक बड़े भयानक दिन की यातना थी! (189)
सचमुच ही इसमें एक बड़ी निशानी है, हालाँकि अधिकतर लोग विश्वास नहीं करते: (190)
तुम्हारा रब ही है जो सबसे प्रभुत्वशाली, सब पर दयावान है। (191)
सचमुच इस क़ुरआन को सारे संसार के रब ने उतार भेजा है: (192)
एक भरोसेमंद रूह [जिबरईल] इसे लेकर आए, (193)
और इसको [ऐ रसूल], आपके दिल पर उतारा गया, ताकि आप चेतावनी दे सकें, (194)
यह पिछले धर्मों की आसमानी किताबों में पहले ही बता दिया गया था। (196)
क्या उनके लिए यह सबूत काफ़ी नहीं कि इसराईल की संतानों में पढ़े-लिखे लोगों ने इसे पहचान लिया है? (197)
अगर हम इसे किसी ऐसे आदमी पर उतारते, जो अरब का न होता, (198)
और वह इसे पढ़कर उन्हें सुनाता, तब भी उन लोगों ने इस पर विश्वास नहीं किया होता। (199)
इस तरह, हमने अपराधियों के दिलों में ये बातें डाल दीं, जो उनके दिल से होती हुई सीधे गुज़र जाती हैं, (200)
वे उस वक़्त तक इस में विश्वास नहीं करेंगे, जब तक कि दर्दनाक यातना ख़ुद न देख लें, (201)
फिर वह (यातना) अचानक उन पर आ जाएगी, और उन्हें इसके आने की ख़बर तक न होगी, (202)
और तब वे कहेंगे, "क्या हमें कुछ मुहलत मिल सकती है?" (203)
तो फिर कैसे यह लोग माँग करते हैं कि हमारी यातना उन तक जल्दी से जल्दी ले आयी जाए? (204)
ज़रा सोचो, अगर हम उन्हें इस जीवन में कुछ सालों तक मज़ा उठाने दें; (205)
फिर उन पर वह यातना आ जाए, जिससे उन्हें डराया जाता है; (206)
तो जो सुख (पहले) उन्हें मिला होगा, उसका उन्हें क्या फ़ायदा होगा? (207)
हमने कभी भी किसी बस्ती को उस वक़्त तक तबाह-बर्बाद नहीं किया, जब तक कि पहले रसूलों को उनके पास सावधान करने के लिए नहीं भेज दिया, (208)
जो हमारी तरफ़ से उन्हें याद दिला दें [reminder]: हम कभी ना-इंसाफ़ी नहीं करते हैं। (209)
वह कोई जिन्न [या शैतान] नहीं है जो इस क़ुरआन को लेकर उतरा है: (210)
न तो वे इस काम के लायक़ हैं, और न ही उन्हें ऐसा करने की शक्ति है, (211)
सच तो यह है कि वे इसके सुनने से भी दूर रखे गए हैं। (212)
अतः [ऐ रसूल] आप अल्लाह के अलावा दूसरे ख़ुदाओं को कभी न पुकारें, अन्यथा आप भी सज़ा पाने वालों में होंगे, (213)
और अपने नज़दीकी नातेदारों को सावधान कर दें, (214)
और जो भी विश्वास रखनेवाले आपके रास्ते पर चलते हैं, उनके लिए स्नेह दिखाते हुए अपने कंधे झुका दें। (215)
अगर वे आपकी आज्ञा न मानें, तो कह दें, "जो कुछ तुम करते हो, उसके लिए मैं ज़िम्मेदार नहीं हूँ।" (216)
उस प्रभुत्वशाली और बेहद दया करनेवाले पर भरोसा रखें, (217)
जो आपको देख रहा होता है, जब आप (नमाज़ के लिए) खड़े होते हैं (218)
और जब सज्दे में झुकने वालों के पास आते-जाते हैं: (219)
वह सब कुछ सुनता है, सब जानता है। (220)
क्या मैं बताऊँ कि शैतान किन लोगों पर उतरते हैं? (221)
वे हर ढोंग रचनेवाले झूठे व गुनाहगार पर उतरते हैं, (222)
जो सुनी सुनायी बातों पर कान लगाते हैं, और उनमें से अधिकतर झूठे हैं: (223)
और कवियों के पीछे तो केवल वही लोग चलते हैं जिन्होंने अपने आपको ग़लतियों में गुम कर लिया हो। (224)
क्या तुमने देखा नहीं कि वे हर (काल्पनिक) घाटी में बेमक़सद भटकते फिरते हैं; (225)
और यह कि, वह जो बात कहते हैं, करते नहीं? (226)
हाँ, उन (कवियों) की बात अलग है जो (रसूल की बातों में) विश्वास करते हैं, अच्छे कर्म करते हैं, और अल्लाह को अक्सर याद करते हैं, और जब भी बदमाशों ने उनपर निशाना साधा, तो (कविता के द्वारा) वे अपना बचाव करते हैं। शैतानियाँ करनेवालों को जल्द ही पता चल जाएगा कि वे किस अंजाम की तरफ़ लौटकर जाने वाले हैं। (227)
नोट:
1. ता.सीम.मीम भी पढ़ सकते हैं।
4: इंसान को दुनिया में भेजने का मक़सद यह नहीं है कि उसे (सच्चाई पर) विश्वास कर लेने पर ज़बरदस्ती मजबूर किया जाए, अल्लाह यह चाहता है कि इंसान सोच-समझकर ईमान का रास्ता चुने। इसलिए अगर लोग विश्वास नहीं कर रहे हैं, तो इस बात की बहुत ज़्यादा फ़िक्र करना ठीक नहीं।
14: मूसा (अलै.) ने ज़ुल्म करने वाले को एक मुक्का मारा था जिसके कारण वह मर ही गया और उन पर क़त्ल का इल्ज़ाम लग गया था, देखें सूरह क़सस ( 28: 15-20)
17: इसराईल की संतान असल में हज़रत याक़ूब (अलै.) की संतानों को कहते हैं, जो फ़िलिस्तीन के कनआन के रहने वाले थे। याक़ूब (अलै) के बेटे हज़रत यूसुफ़ (अलै.) जब मिस्र के प्रशासक बने, तो उन्होंने अपने सारे ख़ानदान के लोगों को मिस्र बुलाकर बसा दिया था। एक अवधि तक तो वे लोग वहाँ चैन से रहे, मगर यूसुफ़ (अलै.) के बाद वहाँ के बादशाहों [फ़िरऔन] ने उनको ग़ुलाम बनाकर ज़ुल्म करना शुरू कर दिया। इसलिए मूसा (अलै.) ने कहा कि इन्हें मेरे साथ फ़िलिस्तीन के इलाक़े में जाने दो।
18: देखें सूरह ताहा (20: 39)
19: देखें सूरह क़सस (28: 15-20)
20: देखें सूरह नम्ल (27: 10-11)
21: मूसा (अलै.) मिस्र से भागकर मदयन चले गए थे, देखें सूरह क़सस (28: 21-22)
44: देखें सूरह ताहा (20 : 66)
64: देखें सूरह यूनुस (10: 91-92)
86: हज़रत इबराहीम (अलै.) ने अपने बाबा से वादा किया था कि वह उनके गुनाहों की माफ़ी के लिए दुआ करेंगे, (सूरह मरयम 19: 47), लेकिन जब अल्लाह ने उन्हें ऐसा करने से मना कर दिया, तो फिर उन्होंने दुआ नहीं की, (सूरह तौबा: 9: 114).
120: देखें सूरह हूद (11: 25-48)
139: देखें सूरह अ'राफ़ (7: 65), सूरह हूद (11:50-59)
141 देखें 7:72, 11-61-68
158: देखें सूरह हूद (11: 68)
166: देखें सूरह हूद (11: 77-83) और सूरह हिज्र (15: 58-76)
171: बुढ़िया का मतलब हज़रत लूत (अलै.) की बीवी से है, जो बुरे चरित्र वाली क़ौम का साथ देती थी, और अंत में जब भयानक यातना आ गयी तो अपने घरवालों के साथ शहर से बाहर निकलने के बजाए वह पीछे रह गई और उसके चपेट में आ गई।
173: उन लोगों पर पत्थरों की बारिश हुई, जैसा कि सूरह हिज्र (15: 74) में आया है।
176: " एका" असल में घने जंगल को कहते है। हज़रत शुऐब (अलै.) जिस क़ौम की तरफ़ भेजे गए थे, वह ऐसे ही किसी घने जंगलों के पास स्थित थी। कुछ लोग कहते हैं कि उस बस्ती का नाम "मदयन था, कुछ का कहना है कि वह कोई दूसरी बस्ती थी, और शुऐब (अलै.) उस क़ौम की तरफ़ भी भेजे गए थे। इसका विवरण सूरह अ'राफ़ (7: 85-93) में आया है।
189: कई दिन तक बहुत तेज़ गर्मी के बाद एक बादल का टुकड़ा उनकी बस्ती के नज़दीक आया जिसके नीचे देखने से लगता था कि ठंढी हवा चल रही थी, बस्ती के सब लोग उस बादल के नीचे जमा हो गए, तो उस बादल ने उनके ऊपर अंगारे बरसाए जिससे वे सब मारे गए।
196: पिछली आसमानी किताबों यानी तोरात [Torah], ज़बूर [Psalm], इंजील [Gospel] और दूसरे नबियों के सहीफ़े।
197: कुछ पढ़े-लिखे यहूदियों ने मुहम्मद (सल्ल) को पहचान लिया था और इस बात को माना था कि उनके आने के बारे में तोरात/इंजील में ज़िक्र है।
199: क्योंकि उनका विश्वास न करना किसी पक्की दलील की वजह से न था, बल्कि केवल उनकी ज़िद्द और हठधर्मी के कारण था।
204: चूँकि यातना के आ जाने का उन्हें विश्वास नहीं था, इसलिए मज़ाक़ उड़ाते हुए उसे जल्दी ले आने की माँग करते थे।
210: मक्का के लोग क़ुरआन के बारे में दो तरह की बातें कहते थे: कुछ लोग कहते थे कि मुहम्मद (सल्ल) एक "काहिन" हैं, यानी उनके क़ब्ज़े में कुछ जिन्न हैं जो उनको छिपी चीज़ों की ख़बर देते हैं। लेकिन यहां बताया गया है कि वह जिन्न असल में शैतान हैं और उनमें क्षमता नहीं कि नेकी की ऐसी अच्छी बातें कर सकें। कुछ लोग यह भी मानते थे कि मुहम्मद (सल्ल) असल में "शायर [कवि] हैं और क़ुरआन शायरी की किताब है।
214: माना जाता है कि यह पहली आयत है जिसमें मुहम्मद साहब को ख़ास करके कहा गया कि आप मक्का में अल्लाह का संदेश अपने नज़दीकी रिश्तेदारों को पहुँचाना शुरू कर दें।