Thursday, April 13, 2017

सूरह 23 : अल मो’मिनून [ईमानवाले, The Believers]

सूरह 23: अल-मोमिनून 
[ईमानवाले, The Believers]



01-11: ईमानवालों की विशेषताएं 

12-16: अल्लाह की क़ुदरत: ज़िंदगी की निशानियाँ 

17-22: अल्लाह की क़ुदरत: प्रकृति की निशानियाँ 

23-30: नूह (अलै) की कहानी 

31-41: एक रसूल जिनका नाम नहीं लिया गया

42-44: एक के बाद एक कई रसूल भेजे गए 

45-48: मूसा और हारून (अलै) 

49-56: ईसा और मरियम (अलै) 

57-61: ईमानवाले भलाई के काम में तेज़ी दिखाते हैं 

62-77: विश्वास न करने वालों के साथ अल्लाह निपटेगा 

78-83: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ 

84-92: अल्लाह एक है 

93-98: अल्लाह के रसूल की दुआ 

99-100: मरते समय की तौबा 

101-115: अंतिम दिन, दोबारा ज़िंदा उठाया जाना, और फ़ैसला 

116-118: अल्लाह ही अकेला बादशाह है 

 
 

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

बेशक कामयाब हैं वह, जो ईमान रखते हैं ! (1)

जो पूरे दिल से अपनी नमाज़ों में (अल्लाह के सामने) झुकते हैं, (2)

जो बेकार व फ़ालतू बातों से दूर रहते हैं, (3)

जो (ज़रूरतमंदों को) ज़कात [Alms] देते रहते हैं, (4)

और जो अपने आपको (दूसरों के साथ शारीरिक संबंध बनाने से) रोके रखते हैं (5)

सिवाय अपने पति/पत्नियों [spouses] और अपने दास/दासियों [slaves] के ----- कि जिनके साथ (शारीरिक संबंध बनाने में) कोई बुराई नहीं है,  (6)
 
मगर जो कोई इस (बतायी हुई सीमा) के अलावा (किसी और से भी संबंध बनाने) की चाहत रखता हो, तो ऐसे ही लोग सीमा को तोड़ने वाले हैं---- (7)

और जो अपने ऊपर किए गए भरोसे को और अपनी प्रतिज्ञा को ईमानदारी से निभाते हैं (8) 

और अपनी नमाज़ों को पाबंदी से व सही ढंग से अदा करते हैं, (9)

तो ऐसे ही लोग हैं जिन्हें विरासत में दिया जाएगा---- (10)

जन्नत का सबसे अच्छा बाग़ [फ़िरदौस], जो उनका अपना हो जाएगा, वे उसमें हमेशा के लिए रहेंगे। (11)


हमने इंसान को (पहली बार) मिट्टी के सत [essence] से पैदा किया, (12)

फिर हमने उसे एक टपकी हुई बूँद [वीर्य, Semen] के रूप में एक सुरक्षित ठहर जाने वाली जगह [कोख] में रखा, (13) 

फिर हमने उस बूँद को (जोंक की तरह) चिमटे हुए जीव जैसा रूप दे दियाफिर हमने उस (जोंक जैसे) जीव को मांस का एक लोथड़ा बनाया, फिर हमने उस लोथड़े को हड्डियों के ढाँचे में बदल दिया, फिर उन हड्डियों पर मांस की तह चढ़ा दीफिर उसके बाद हमने उसे एक अलग ही रूप देकर (आदमी की शक्ल में) खड़ा कर दिया--- तो कितना महान है अल्लाहरचना करने वालों में सबसे बेहतर!--- (14)

फिर (इस पैदाइश के बाद) तुम्हारी मौत हो जाएगी, (15)

और फिर क़यामत के दिन, तुम दोबारा ज़िंदा करके उठाए जाओगे। (16)

हमने तुम्हारे ऊपर (आसमान में) सात तहों में (चक्कर लगाने के) रास्ते [Orbits] बना दिए: और हम कभी भी अपनी की हुई रचना से बेख़बर नहीं हैं।   (17)

और हमने आसमान से सही मात्रा में पानी बरसाया, फिर हमने उसे धरती में (ज़रूरत के अनुसार) ठहरा दिया---- और अगर हम चाहें, तो जितनी मात्रा (में पानी) हमने दे रखा है, उसे वहाँ से उड़ा ले जाने की ताक़त भी हमारे पास है---- (18)

फिर हमने इसी पानी की मदद से तुम्हारे लिए खजूरों और अंगूरों के बाग़ पैदा किए--- इन बाग़ों में तुम्हारे खाने के लिए बहुत-से फल पैदा होते हैं, (19)

और सीना के पहाड़ [Mount Sinai] पर उगने वाला वह (ज़ैतून का) पेड़जिससे तेल निकलता है और जो खाने में मसाले के रूप में काम आता है। (20)

निश्चय ही (पालतू) जानवरों में भी तुम्हारे लिए एक सीख है: जो कुछ (गंदी चीज़ें) उनके पेट में भरी होती हैं, उसी में से तुम्हारे पीने के लिए (दूध जैसी अच्छी चीज़) हम पैदा कर देते हैं। और तुम्हारे लिए उनमें बहुत-से दूसरे फ़ायदे भी हैं: तुम उन्हें खाते भी हो, (21)

और (धरती पर) उनकी सवारी भी करते हो, जैसे (पानी में) नौकाओं पर सवार होते हो। (22)


हमने नूह [Noah] को उसकी क़ौम के लोगों के पास (मार्गदर्शन के लिए) भेजा था, तो उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! अल्लाह की बन्दगी करो, तुम्हारे लिए पूजने के लायक़ तो बस एक ही ख़ुदा है, तो क्या तुम (बुरे कामों के नतीजे से) डरते नहीं?" (23) 

मगर उनकी क़ौम के सरदारजिन्होंने (नूह की बातों को मानने से) इंकार किया था, (एक दूसरे से) कहने लगे, "यह तो तुम्हारे ही जैसा एक (मामूली) आदमी है, जो तुम पर अपनी बड़ाई की धाक जमाना चाहता है। अगर अल्लाह चाहता तो उसने (मामूली आदमी के बदले) फ़रिश्तों को भेजा होता; और तो और, ऐसी कोई बात हमने अपने बाप-दादा से कभी सुनी ही नहीं। (24)

यह तो बस एक ऐसा आदमी है जिस पर पागलपन सवार है, अतः (इसकी बात मत सुनो और) कुछ समय तक प्रतीक्षा करके देख लो कि इसके साथ क्या होता है।" (25)

नूह ने दुआ में कहा, "ऐ मेरे रब, मेरी मदद कर! ये लोग मुझे झूठा कहते हैं,”  (26) 

और तब हमने नूह के पास 'वही' [revelation] भेजी: "हमारी देखरेख में और हमारी 'वही' के मुताबिक़ एक नौका बनाओ। फिर जब हमारा आदेश मिल जाए, और ज़मीन का पानी उबलकर बाहर आने लगे, तो (हर तरह के जीव-जंतुओं की) प्रत्येक प्रजाति में से दो-दो, जोड़े में, उस (नौका) में साथ रख लो और अपने परिवार के लोगों को भी (इसमें सवार कर लो)मगर घर के ऐसे आदमी को नहीं जिनके विरुद्ध पहले ही फ़ैसला हो चुका है--- शैतानियाँ करने वालों के पक्ष में मुझसे सिफ़ारिश मत करना: वे तो डूब कर रहेंगे---- (27)

फिर जब तुम और तुम्हारे साथी नौका पर अच्छी तरह सवार हो जाओ, तो अपनी ज़बान से कहो,  “शुक्र है अल्लाह काजिसने हमें शैतान लोगों से छुटकारा दिया”, (28) 

और यह भी कहोऐ मेरे रब! मुझे अपनी बरकत के साथ किनारे उतार दे: और तू ही नौका को सबसे बेहतर किनारे लगानेवाला है।" (29)

बेशक इन सब (घटनाओं) में (समझने वालों के लिए) कितनी ही निशानियाँ हैं: और यहाँ ज़रूर ऐसा होता है कि हम लोगों को परीक्षा में डालें।   (30)


फिर उन लोगों के बाद, हमने क़ौमों की एक दूसरी पीढ़ी को उठाया, (31)

और उनके अपने लोगों में से एक को रसूल के रूप में उनके पास भेजा (उसने भी यही कहा): "अल्लाह की बन्दगी करो, कि तुम्हारे लिए पूजने के लायक़ तो बस एक ही ख़ुदा है, तो क्या तुम (इंकार के बुरे नतीजे से) डरते नहीं?" 32)

मगर उनकी क़ौम के वे सरदारजिन्होंने (रसूल की बातों में) विश्वास नहीं किया था, और आख़िरत [परलोक, Hereafter] में (अल्लाह के सामने) होने वाली मुलाक़ात को मानने से भी इंकार किया थाऔर जिन्हें हमने सांसारिक जीवन में आराम व ढेर सारे सुख दे रखे थे, (लोगों से) कहने लगे, "यह तो बस तुम्हारे ही जैसा एक आदमी है--- जो कुछ तुम खाते होवही यह भी खाता है और जो कुछ तुम पीते होवही यह भी पीता है--- (33)

तो अगर तुम अपने ही जैसे एक (मर-खप जानेवाले) आदमी की आज्ञा मानने लगे, तो सचमुच ही तुम भारी घाटे में पड़ोगे। (34)

आख़िर यह आदमी तुमसे ऐसा वादा कैसे कर सकता है कि जब तुम मरकर मिट्टी और (सड़ी-गली) हड़्डियों का चूरा होकर रह जाओगे तो तुम फिर से ज़िंदा निकाले जाओगे? (35)

जिस बात का तुमसे वादा किया जा रहा है, वह समझ से परे है, बहुत दूर की बात है! (36)

(भला दोबारा ज़िंदा होना कैसी बात है!) हमारा जीवन तो केवल इसी संसार का जीवन है: (पीढ़ी दर पीढ़ी) यहीं हम मरते हैं, यहीं जीते हैं, मगर हमें कभी भी दोबारा ज़िंदा करके उठाया नहीं जाएगा। (37) 

वह तो बस एक आदमी है जिसने अल्लाह के बारे में झूठी बातें गढ़ ली हैं। हम उसकी बातों में कभी भी विश्वास करने वाले नहीं हैं।" (38)

इस पर उस रसूल ने दुआ में कहा, "ऐ मेरे रब! मेरी मदद कर, वे लोग तो मुझे झुठा कहते हैं," (39)

और तब अल्लाह ने कहा, "बहुत जल्द ही वे अपने किए पर पछताएंगे।" (40)

और फिर ऐसा हुआ कि उन्हें एक भयानक धमाके ने आ घेरा, और हमने उन्हें तिंकों व गंदी झाग की तरह बहाकर रख दिया। अतः फिटकार हैऐसे शैतान व ज़ालिम लोगों पर! (41)

फिर हमने उनके बाद क़ौमों की दूसरी पीढ़ियों को पैदा किया---- (42)

(अल्लाह के क़ानून के मुताबिक़ हर क़ौम की अवधि तय है) कोई क़ौम [community] न तो अपने निर्धारित समय से पहले आ सकती है, और न समय पूरा हो जाने के बाद ठहर सकती है----- (43)

फिर हमने एक के बाद एक अपने रसूल [messengers] भेजे: जब भी किसी क़ौम के पास (मेरा संदेश लेकर) कोई रसूल आयातो हमेशा ऐसा हुआ कि लोगों ने (उसकी बात नहीं मानते हुए) उसे झुठा कहा, नतीजे में हम उन क़ौमों को एक के बाद एक बर्बाद करते चले गए, और उनकी हस्तियाँ (सबक़ सीखने वाली) कहानियाँ बनकर रह गयीं। फिटकार हो उन लोगों पर जो सच्चाई पर विश्वास नहीं करते! (44)


फिर हमने मूसा [Moses] और उसके भाई हारून [Aaron] को अपनी निशानियों और स्पष्ट प्रमाण के साथ, (45)

फ़िरऔन [Pharaoh] और उसके सरदारों के पास भेजा, मगर वे बड़े अहंकार से पेश आए: वे थे भी घमंडी लोग।   (46)

सो वे कहने लगे, "क्या हम अपने ही जैसे दो (मामूली) आदमियों में विश्वास कर लेंऔर जबकि उनकी क़ौम के लोग [इसराइली] तो हमारे सेवक हैं?" (47) 

और इस तरह, उन लोगों ने दोनों को झूठा बताया: और बर्बाद हो जाने वालों में शामिल हो गए। (48)

(इस घटना के बाद) हमने मूसा को किताब [तोरात] प्रदान कीताकि वे [इसराईल की संतानें] सही मार्ग पर चल सकें। (49)

(और इसी तरह) हमने मरयम के बेटे [ईसा] और उसकी माँ को (अपनी सच्चाई की) एक निशानी बनाया; और हमने उन्हें एक ज़रा ऊँची शांत जगह पर, बहते हुए पानी के बीच, शरण दी (जहाँ उनके बेटे का जन्म हुआ)। (50)


"ऐ पैग़म्बरो! अच्छी चीज़ें खाओ और अच्छे कर्म करो: जो कुछ तुम करते हो उसे मैं अच्छी तरह जानता हूँ। (51)

और यह जो तुम्हारी क़ौम है, वह असल में एक (समान विचारधारा वाली) ही क़ौम हैऔर मैं तुम्हारा रब हूँ। अतः मुझे अपने मन में बसाओ (व बुरे कर्मों के नतीजे से डरो)"---- (52) 

(सभी पैग़म्बरों की शिक्षाएं समान थीं) मगर लोगों ने अपनी क़ौम को अलग-अलग (सोच वाले) फ़िरक़ों [sects] में तोड़ डाला है, और हर एक फ़िरक़ा अपनी सोच के साथ ख़ुश व मगन है। (53)

तो [ऐ मुहम्मद] आप कुछ समय के लिए उन्हें जिहालत [ignorance] में डूबा रहने के लिए छोड़ दें। (54)

क्या वे समझते हैं कि हमने जो दौलत और सन्तान उन्हें दे रखी है, (55)

तो क्या हम उन्हें अच्छी चीज़ों को देने में जल्दी मचा रहे हैं? (56)

असल में, उन्हें (सच्चाई का) कोई अंदाज़ा है ही नहीं! जो लोग अपने रब के डर से सहमे रहते हैं, (57)

जो लोग अपने रब की आयतों (संदेशों) में विश्वास रखते हैं, (58)

जो लोग अपने रब के साथ किसी और को (ख़ुदायी में) उसका साझेदार [Partner] नहीं ठहराते, (59)

जो (उसकी राह में) जितना कुछ देते हैं हमेशा दिल से देते हैं, और (फिर भी) उनके दिल यह सोचकर काँप जाते हैं कि उन्हें अपने रब के सामने (हिसाब-किताब के लिए) लौटकर जाना है; (60)

तो बेशक यही वे लोग हैंजो भलाई के कामों में तेज़ी दिखाते हैं, और यही हैं जो इस राह में सबसे आगे निकल जाने वाले हैं! (61)

और हम किसी जान पर (ज़िम्मेदारी का) उतना ही बोझ लादते हैं जितना कि वह उसे उठा सके-----  हमारे पास (इन सब की हालत व क्षमता के लिए) एक किताब हैजो (सब कुछ) ठीक-ठीक बता देती है---- और ऐसा कभी नहीं हो सकता कि किसी जान के साथ अन्याय हो। (62)

मगर (असल में) उन (विश्वास न करनेवालों) के दिल इन बातों को नहीं जानते और अज्ञानता में डूबे हुए हैं; और इसके अलावा और भी कई (बुरे) कर्म हैं जो वे हमेशा करते रहते हैं। (63) 

(वे करते रहेंगे) यहाँ तक कि जब हमारी यातना आ पहुँचेगी और उनके बिगड़े हुए धनी लोगों को अपने घेरे में ले लेगी, तब वे मदद के लिए रोने-चिल्लाने लगेंगे: (64)

(कहा जाएगा,) "बंद करो आज रोना-चिल्लानातुम्हें हमारी ओर से कोई मदद मिलने वाली नहीं है। (65)

एक समय था कि तुम्हें बार बार मेरी आयतें सुनाई जाती थींमगर तुम घमंड में उल्टे पाँव वहाँ से चल देते थे, (66)

 और लोगों के बीच अपनी शामें उस [क़ुरआन] का मज़ाक़ उड़ाने में लगा देते थे।” (67)


क्या उन्होंने इस [अल्लाह की वाणी] पर विचार नहीं किया? क्या उनके पास ऐसी कोई अजीब चीज़ आ गई है जो उनके बाप-दादा के पास नहीं आई थी? (68)

या क्या वे अपने रसूल को (पहले से) जानते ही न थे, इसलिए वे इसे मानने से इंकार करते हैं? (69) 

या वे कहते हैं कि इस रसूल पर जुनून सवार हो गया है? नहीं, (इनमें से कोई बात नहीं हो सकती) बल्कि वह उनके पास सच्चाई लेकर आए हैं मगर उनमें से ज़्यादातर लोग सच से नफ़रत करते हैं, (70) 

लेकिन सच्चाई अगर कहीं उनकी इच्छाओं के मुताबिक़ हो जाती, तो आसमान, ज़मीन और वह सब जो इनमें हैसब बर्बाद हो जाते। हम उनके पास उनकी सीख के लिए (नसीहत का) संदेश लेकर आए हैं, और वे हैं कि इस संदेश से मुँह मोड़ लेते हैं। (71)

क्या [ऐ रसूल] (वे समझते हैं कि) आप इनसे अपने लिए कोई धन-दौलत माँगते हैंहालाँकि आपके लिए तो आपके रब का दिया ही सबसे अच्छा है: और वही सबसे अच्छी रोज़ी देनेवाला है (72)

सच यह है कि आप बेशक उन्हें सीधे मार्ग की ओर बुला रहे हैं, (73)

मगर जो लोग आख़िरत [Hereafter] में विश्वास नहीं रखते, वे इस मार्ग से भटके हुए हैं। (74)

यहाँ तक कि अगर हम उनपर (कुछ और) दया करें और उनसे उनकी तकलीफ़ें भी दूर कर दें (तो क्या वे शुक्र अदा करेंगे?, नहीं), तब भी वे भटकते हुए मर्यादाओं को तोड़ने में और अधिक लगे रहेंगे। (75)

हम उन्हें पहले भी (कुछ) सज़ा दे चुके हैं, तब भी वे अपने रब के आगे झुके नहीं: वे विनम्र भाव से उस समय तक नहीं झुकेंगे (76) 

जब तक कि हम उन पर कठोर यातना का द्वार न खोल दें---- और तब वे अचानक पूरी तरह से निराशा में डूबकर रह जाएंगे। (77)


वह अल्लाह ही है जिसने तुम्हारे (सुनने के) लिए कान, (देखने के लिए) आँखे और (सोचने के लिए) दिल बनाए-----(मगर) बहुत कम ऐसा होता है कि तुम शुक्र अदा करो! (78) 

वही है जिसने तुम्हें धरती में (चारों ओर) फैला दिया, और वही है जिसके सामने तुम इकट्ठा करके लाए जाओगे:  (79)

वही है जो ज़िंदगी और मौत देता है; रात और दिन का बारी बारी से आना जाना भी उसी के हाथ में है; तो क्या तुम बुद्धि से काम नहीं लोगे? (80)

लेकिन, अपने से पहले गुज़र चुके लोगों की तरह, (81)

वे कहते हैं, "क्या? जब हम मर जाएंगे, और मिट्टी और हड्डियों के चूरे में बदल जाएँगेतो क्या सचमुच हमें दोबारा ज़िंदा उठाया जाएगा? (82)

हमने ऐसे वादे पहले भी सुन रखे हैं, और ऐसी बातें हमारे बाप-दादा भी सुनते आए थे। यह तो बस पुराने ज़माने की कहानियाँ हैं।" (83)

[ऐ रसूल]  आप कहें, "यह सारी ज़मीन और इसमें बसनेवालों का मालिक कौन है, बताओ अगर तुम (बहुत) जानते हो?" (84)

और वे बोल पड़ेंगे, "अल्लाह!" कहें, "फिर तुम होश में क्यों नहीं आते?" (85)

कहें, "सात आसमानों का मालिक कौन है? आलीशान सिंहासन का मालिक कौन है?" (86)

और वे जवाब देंगे, "अल्लाह।" कहें, "फिर अल्लाह का डर क्यों नहीं रखते?" (87)

कहें, "कौन है जिसके हाथ में हर चीज़ का नियंत्रण [control] है?, कौन है जो सब की रक्षा करता है, जबकि उसके विरुद्ध कोई शरण नहीं मिल सकतीबताओ अगर तुम (बहुत) जानते हो?" (88)

वे जवाब देंगे, "अल्लाह।" कहें, "फिर तुम कैसे इतने धोखे में पड़े हुए हो?" (89)

हक़ीक़त यह है कि हमने सच्चाई उन्हें साफ़-साफ़ बता दी है, और निश्चय ही वे बिल्कुल झूठे हैं। (90)

अल्लाह ने न तो कभी किसी को अपना बेटा बनाया, और न उसके अलावा पूजने लायक़ कोई दूसरा ख़ुदा हो सकता है---- अगर कोई और (भी ख़ुदा) होता, तो हर ख़ुदा अपनी सृष्टि को लेकर अलग हो जाता और एक-दूसरे पर क़ब्ज़ा करने की कोशिश करता। अल्लाह उन बातों से कहीं ऊँचा है, जिसके बारे में वे बयान करते हैं! (91)

वह उसे भी जानता है जो (चीज़) दिखायी नहीं पड़ती और उसे भी जो दिखायी देती हैं; वे अल्लाह के साथ जिन्हें (उसकी ख़ुदायी में) साझेदार ठहराते हैं, अल्लाह उन चीज़ों से कहीं ऊपर है! (92)

[ऐ रसूल] दुआ में कहें, "ऐ मेरे रब! जिस यातना की धमकी उन्हें दी गयी है, अगर वह यातना मेरे सामने ही घटित होने वाली है, (93)

तो मेरे रब! मुझे उन शैतानी करने वाले लोगों के गिरोह में शामिल न कीजिओ!" (94) 

यक़ीनन हम इस पर पूरी तरह सक्षम हैं कि जिस यातना की धमकी उन्हें दी जा रही है, हम उसे आपको (इसी जीवन में) दिखा सकते हैं। (95) 

(मगर जब तक वह नियत समय न आ जाए, ऐ रसूल!) बुराई को (बुराई से नहीं) अच्छाई से दूर करें----- जो कुछ बातें वे बनाते हैं, हम उसे अच्छी तरह जानते हैं--- (96)

और (दुआ में) कहें, "ऐ मेरे रब! मैं शैतानों की उकसाहटों से तेरी शरण चाहता हूँ;  (97)

और ऐ रब! मैं तेरी शरण चाहता हूँ ताकि वे मेरे नज़दीक न आ सकें।"(98)


(इंकार करनेवालों का हाल यह होगा कि) जब उनमें से किसी एक की मौत सिर पर आ खड़ी होगी, तब वह पुकारेगा, "ऐ मेरे रब! मुझे (संसार में) वापस जाने दे  (99)

ताकि वहाँ जाकर अच्छे कर्म कर सकूँ जिन्हें मैंने छोड़ रखा था।" हुक्म होगा: हरगिज़ नहीं! यह तो बस एक कहने की बात है जो यह कह रहा है, अब ऐसा होने वाला नहीं: ऐसे लोगों के पीछे एक रोक [barrier] लगी हुई हैजो उस दिन तक रहेगी जब वे दोबारा उठाए जाएँगे। (100)

फिर जब वह (क़यामत की) घड़ी आ जाएगी जब नरसिंघे [Trumpet] में फूँक मारी जाएगी, तो उनके बीच के सब रिश्ते-नाते ख़त्म हो जाएंगे और वे एक-दूसरे को नहीं पूछेंगे: (101)

फिर जिनके पलड़े अच्छे कर्मों से भारी हुए तॊ वही हैं जो कामयाब हो जाएंगे, (102)

मगर वे लोग जिनके पलड़े हल्के हुएतो वही हैं जिन्होंने अपने आपको बर्बादी में डाल दिया और वे हमेशा के लिए जहन्नम में रहेंगे---- (103)

आग उनके चेहरों को झुलसा देगी और उनके होंठ दर्द से ऐंठ जाएंगे। (104)

(उनसे कहा जाएगा) "क्या तुम्हें मेरी आयतें बार-बार सुनाई नहीं जाती थींतब भी तुम उन्हें मानने से इंकार करते रहते थे?" (105)

वे कहेंगे, "ऐ हमारे रब! हमारा मनमौजी व अड़ियल रवैय्या हम पर हावी हो गया था, और हम रास्ते से भटक जाने वालों में हो गए। (106)

हमारे रब! हमें यहाँ से बाहर निकाल दे! अगर हम दोबारा वैसा ही कर्म करें, तब हम ज़रूर ही शैतानियाँ करने वाले होंगे।" (107)

अल्लाह कहेगा, "फिटकार हो! इसी (जहन्नम में) में पड़े रहो! और मुझ से बात न करो। (108)

हमारे बन्दों में कुछ लोग ऐसे भी थे जो कहते थे हमारे रब! हम विश्वास करते हैं। हमें क्षमा कर दे और हम पर दया कर: तू सबसे बढ़कर दया करने वाला है।  (109)

मगर तुम उन लोगों की हँसी उड़ाने में लगे रहे: तुम हँसी उड़ाने में इतने मगन थे कि मेरी चेतावनियों को भी भुला बैठे। (110)

आज (देखो) मैंने उनको धैर्य व सब्र रखने के बदले में इनाम दिया है: यही वे लोग हैं जो कामयाब हो गए।" (111)

उनसे कहा जाएगाः तुम धरती पर कितने वर्ष रहे”? (112) 

वॆ जवाब में कहेंगेः, "हम बस एक दिन या एक दिन का कुछ भाग रहे होंगे (हमें समय का ठीक अंदाज़ा नहीं), मगर उन लोगों से पूछें जो हिसाब रखते हैं।“  (113)

अल्लाह कहेगा, "तुम ज़मीन पर बहुत ही थोड़ा ठहरेक्या अच्छा होता कि तुम जानते होते! (114)

क्या तुमने यह समझा था कि हमने तुम्हें यूँ ही बेकार (बेमक़सद) पैदा किया था, और यह कि तुम्हें हमारी ओर (हिसाब-किताब के लिए) लौटना नहीं है?" (115)


बहुत ऊँची शान है अल्लाह की, जो सही मायने में बादशाह है, उसके सिवा कोई पूजने के लायक़ नहींवह महान सिंहासन का मालिक है!  (116)

जो कोई अल्लाह के साथ किसी दूसरे देवता को भी पूजता है---- ऐसे देवता को जिसके मौजूद होने का उसके पास कोई सबूत नहीं है--- तो बस रब के सामने उसका हिसाब होना है। निश्चय ही (सच्चाई से) इंकार करनेवाले कभी सफल नहीं होंगे। (117) 


[ऐ रसूल] आप कहें, "मेरे रब! मुझे क्षमा कर दे और मुझ पर दया कर: तुझसे ज़्यादा दया करनेवाला कोई नहीं।" (118)
 
 
 
नोट:

2: नमाज़ पढ़ते समय पूरा ध्यान उसी की तरफ़ होना चाहिए। 


4: 'ज़कात' का शाब्दिक अर्थ है किसी चीज़ को पाक-साफ़ करना। अपने माल में से कुछ हिस्सा ग़रीबों के लिए निकालने से उनका बाक़ी माल पाक-साफ हो जाता है। इसका एक मतलब अपने आपको बुरे कर्मों और बुरे आचरण से पाक-साफ़ करना भी होता है।   


6: उस ज़माने में सारी दुनिया की तरह अरब में भी ग़ुलामी की प्रथा थी, मगर शारीरिक संबंध ऐसी ही लौंडियाँ के साथ जायज़ था जो ग़ुलामी की हालत में पड़ी हुई हों और जिनसे निकाह कर लिया गया हो।


12: एक गीली मिट्टी जो काफ़ी समय तक सड़ी-गली हालत में रही, उसी के सत से पहली बार ज़िंदगी की नींव पड़ी और आदम (अलै.) के रूप में पहला इंसान बना। 

 

20: ज़ैतून के दाने में बहुत चिकनाई होती है और इसका तेल शरीर के लिए बहुत फ़ायदामंद होता है।  

 

27: इस घटना का वर्णन सूरह हूद (11: 25-48) में कुछ विस्तार से है। ........ हज़रत नूह (अलै.) का बेटा ईमान नहीं लाया था, जिसका ज़िक्र सूरह हूद में है। 


32: शायद यहाँ रसूल का मतलब हज़रत सालेह (अलै.) हैं,  जिन्हें समूद की क़ौम की तरफ़ भेजा गया था, देखें सूरह अ'राफ़ (7:65-73) 


50: जहाँ मरयम ने बच्चे को जन्म दिया; देखें सूरह मरयम (19: 22-26). 

कुछ विद्वान कहते हैं कि यहाँ जिस इलाक़े का ज़िक्र है वह शायद मिस्र में नील नदी का ऊपरी इलाक़ा था जो पानी से भरपूर था। ईसा (अलै) के पैदा होने के बाद उनके घरवाले फ़िलिस्तीन से यहाँ आकर बस गए थे।


55: कुछ लोगों को यह ग़लतफ़हमी थी कि जिनको काफ़ी दौलत और संतान मिली हुई है, इसका मतलब यह है कि अल्लाह उनसे बहुत ख़ुश है। 


69: मुहम्मद साहब रसूल बनने से पहले उन्हीं लोगों के बीच 40 साल रहे थे, तो वहाँ के लोग तो उन्हें अच्छी तरह से जानते थे कि वह एक सच्चे, ईमानदार और भरोसेमंद आदमी थे। 


75: अल्लाह ने मक्का के लोगों को झिंझोड़ने के लिए उन्हें अकाल और आर्थिक बदहाली में डाला था, यह आयत ऐसे ही मौक़े पर उतरी थी। 


84: अरब के इंकार करने वाले लोग भी यह मानते थे कि सारी ज़मीन व आसमान का मालिक अल्लाह है, इसके बावजूद वह उसके साथ कई ख़ुदाओं को भी मानते थे। 


113: परलोक [आख़िरत] की यातना इतनी भयानक होगी कि जहन्नम में रहने वालों को दुनिया की सारी  ज़िंदगी में बितायी गयी अवधि एक दिन या उससे भी कम लगेगी। 



Surah/सूरह 1: Al-Fatiha/अल-फ़ातिहा [(किताब की) शुरुआत/ The Opening]

       सूरह 1: अल-फ़ातिहा    [(किताब की) शुरुआत/ The Opening] यह एक मक्की सूरह है। पूरे क़ुरआन में अल्लाह का जो संदेश आया है , उसका इस सूरह मे...