02 : रसूल या जादूगर
03-06: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ
07-10: सज़ा और इनाम
11 : गुनाहगार अंधे हैं
12 : लोग शुक्र अदा नहीं करते
13-14: पिछली पीढ़ियों की सज़ा: एक चेतावनी
15-17: विश्वास न करने वाले क़ुरआन का मज़ाक़ उड़ाते हैं
18-21: मूर्तिपूजा मूर्खता है
22-23: इस दुनिया की ज़िंदगी थोड़े दिनों की है
24 : इस दुनिया की ज़िंदगी की मिसाल
25-27: इनाम और सज़ा
28-30: फ़ैसले के दिन का एक दृश्य
31-36: एक ही अल्लाह होने के प्रमाण
37-44: क़ुरआन केवल अल्लाह की तरफ़ से ही संभव है
45-56: कर्मों का हिसाब-किताब होना तय है
57-65: अल्लाह का फ़ज़ल और उसका ज्ञान
66-67: दूसरे ख़ुदाओं का स्तित्व बस एक ख़्याल है
68-70: अल्लाह की कोई औलाद नहीं
71-73: नूह (अलै) की कहानी
74 : दूसरे रसूल
75-89: मूसा (अलै) और फिरऔन की कहानी
90-93: इसराईल की संतानों का मिस्र से निकलना और फिर बसना
94-100: रसूल को आशवासन
101-103: प्रकृति में फैली निशानियाँ और चेतावनियाँ इनके किसी काम की नहीं
104-107: रसूल का दीन
108 : सच्चाई आ चुकी है
109 : आख़िरी में रसूल को सलाह
अल्लाह शरारत करनेवालों के काम को कभी कामयाब नहीं होने देता; (81)
1: "हकीम" का मतलब ज्ञान व समझ-बूझ से भरी हुई; किसी मामले में फ़ैसला कर देने वाली या यह बताने वाली कि उसे बिल्कुल सटीक बनाया गया है।
3: ज़मीन और आसमानों को छ: दिनों में पैदा किया, मगर हम जिसे एक दिन समझते हैं ये वैसा नहीं। देखें 32: 5; और 70: 4
5: अल्लाह ने पूरी कायनात बिना मक़सद के नहीं बनायी, बल्कि इसलिए बनायी है कि दुनिया में जिन लोगों ने अच्छे काम किए उन्हें परलोक [आख़िरत] में इनाम मिले और जिन लोगों ने बुरे कर्म किए, उन्हें सज़ा मिल सके।
19: पहले इंसान आदम (अलै) के समय तो सब एक अल्लाह के मानने वाले थे, फिर आहिस्ता-आहिस्ता अलग-अलग समुदाय बनते गए और उनकी मान्यताएं बदलती गईं। मगर अल्लाह ने कायनात की रचना करने से पहले ही यह तय कर लिया था कि इंसानों के लिए दुनिया एक इम्तिहान की जगह होगी, लोगों को सही रास्ता दिखाने के लिए पैग़म्बरों को भेजा जाएगा, लेकिन आदमी को यह आज़ादी होगी कि वह अपनी मर्ज़ी से सही या ग़लत रास्ता चुन ले, फिर उसी के हिसाब से उसे आख़िरत में इनाम या दंड मिलेगा।
20: मुहम्मद (सल्ल) पढ़े-लिखे नहीं होने के बावजूद अपने मुँह से क़ुरआन पढ़कर सुनाते थे, जो कि ख़ुद ही बड़ा चमत्कार था, लेकिन लोग विश्वास करने वाले नहीं थे, यहाँ बताया गया है कि चमत्कार दिखाना अल्लाह की मर्ज़ी पर है, इसलिए उसके लिए इंतज़ार करो।
24: दुनिया की ज़िंदगी और उसकी चमक-दमक में जिसने अपना दिल लगाया, तो फिर अचानक जब कोई यातना आ जाए या उसके मरने का समय आ जाता है तो यह सब छोड़ते हुए उसे बहुत दुख-दर्द होगा, फिर तो एक दिन पूरी दुनिया ही ख़त्म हो जाएगी।
31: अरब के वे लोग जो सच्चाई पर विश्वास करने से इंकार करते थे, वे भी मानते थे कि सारी कायनात की रचना अल्लाह ने ही की है, मगर साथ में उनकी यह भी मान्यता थी कि अल्लाह ने अपनी सारी शक्तियाँ अलग-अलग देवी-देवताओं में बाँट रखी हैं, इसलिए वे उन देवताओं को ख़ुश रखने के लिए उनकी पूजा किया करते थे।
33: यानी उनकी तक़दीर में अल्लाह ने जो बात लिखी थी कि वे अपनी हठधर्मी और सरकशी के कारण सही रास्ते को नहीं अपनाएंगे और सच्चाई पर विश्वास नहीं करेंगे, वही बात सही साबित हुई।
37: यहाँ अल्लाह की किताब को विस्तार से बताने का मतलब यह है कि अल्लाह ने जो क़ानून और तरीक़े का हुक्म ईमानवालों के लिए अपनी किताब (लौह-महफ़ूज़/Preserved Tablet) में लिख रखा है, उसे क़ुरआन साफ़-साफ़ बताती है।
59: अरब के विश्वास न करने वाले लोगों ने अपने मन से कुछ जानवरों को अपने देवताओं के नाम करके उन्हें खाने से मना [हराम] कर दिया था, देखें 6: 138-139
62: अल्लाह की तरफ़ वाले यानी अल्लाह के दोस्त [औलिया अल्लाह], जो कि हर समय अल्लाह की याद में लगे रहते हैं, और अपने आपको बुराइयों से बचाकर रखते हैं। इनके बारे में अल्लाह के रसूल ने कहा कि ये ऐसे होते हैं जिन्हें देखने से अल्लाह की याद आ जाए।
73: नूह (अलै) की क़ौम के बारे में ज़्यादा विस्तार के लिए देखें 11: 25-49.
87: कहा जाता है कि फ़िरऔन ने इसराइलियों पर काफ़ी ज़ुल्म मचा रखा था, उनकी इबादतगाहों को तोड़-फोड़ दिया था, सो लोग डरे हुए भी थे, इसलिए उन्हें घरों में ही इबादत करने को कहा गया।
92: फ़िरऔन की लाश पानी की सतह पर तैरती हुई मिली थी, जिसे शायद निकाल लिया गया था। आधूनिक रिसर्च के मुताबिक़ उस फिरऔन का नाम "मुनफ़िताह" [Remesis II] बताया जाता है जिसकी लाश को संभालकर क़ाहिरा [Cairo] के म्यूज़ियम में रखा गया है।
98: तबाही और यातना को आँख से देख लेने के बाद विश्वास करने से कोई फ़ायदा नहीं है, क्योंकि वह माना नहीं जाता। यातना आने से ठीक पहले भी अगर कोई सच्चाई पर विश्वास कर ले, तो ठीक है, जैसा कि यूनुस (अलै) की क़ौम ने किया था। जब यूनुस (अलै) ने अपनी क़ौम को देखा कि वे किसी तरह सच्चाई पर विश्वास करने के लिए तैयार नहीं हैं, तो उस बस्ती से यातना आने की धमकी देकर चले गए, उसके बाद उनकी क़ौम के लोगों ने कुछ ऐसी निशानियाँ देखीं, जिससे उन्हें सचमुच यक़ीन हो गया कि यातना आने ही वाली है, अत: उन लोगों ने अपने गुनाहों की माफ़ी माँगी, सो अल्लाह ने यातना टाल दी। देखें 37: 139-148; 68: 48-50
99: सभी आदमी को अल्लाह ने यह आज़ादी दी है कि अपनी मर्ज़ी से जिस दीन को चाहे अपना ले, किसी को एक अल्लाह में विश्वास कर लेने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। जो अपनी बुद्धि से सच्चाई पर विश्वास करना चाहे, उसके लिए अल्लाह रास्ता खोल देता है।
109: मक्का में ईमानवालों पर तरह-तरह के ज़ुल्म किए जा रहे थे, मगर अपने दुश्मनों के ख़िलाफ़ सब्र व धीरज से काम लेने के लिए कहा गया है, और लड़ने-मारने की इजाज़त अभी तक नहीं दी गई है।