Sunday, October 22, 2017

सूरह10 : यूनुस [Jonah]

सूरह 10: यूनुस [Jonah]



01 :   किताब की आयतें ज्ञान से भरी हैं 

02 :   रसूल या जादूगर 

03-06: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ 

07-10:  सज़ा और इनाम 

11 : गुनाहगार अंधे हैं 

12  : लोग शुक्र अदा नहीं करते

13-14:  पिछली पीढ़ियों की सज़ा: एक चेतावनी 

15-17:  विश्वास न करने वाले क़ुरआन का मज़ाक़ उड़ाते हैं 

18-21:  मूर्तिपूजा मूर्खता है 

22-23:  इस दुनिया की ज़िंदगी थोड़े दिनों की है 

24 :   इस दुनिया की ज़िंदगी की मिसाल 

25-27:  इनाम और सज़ा 

28-30:  फ़ैसले के दिन का एक दृश्य 

31-36:  एक ही अल्लाह होने के प्रमाण  

37-44:  क़ुरआन केवल अल्लाह की तरफ़ से ही संभव है

45-56:  कर्मों का हिसाब-किताब होना तय है 

57-65:  अल्लाह का फ़ज़ल और उसका ज्ञान 

66-67:  दूसरे ख़ुदाओं का स्तित्व बस एक ख़्याल है 

68-70:  अल्लाह की कोई औलाद नहीं 

71-73:  नूह (अलै) की कहानी

74 :   दूसरे रसूल 

75-89:  मूसा (अलै) और फिरऔन की कहानी 

90-93:  इसराईल की संतानों का मिस्र से निकलना और फिर बसना 

94-100:  रसूल को आशवासन 

101-103: प्रकृति में फैली निशानियाँ और चेतावनियाँ इनके किसी काम की नहीं 

104-107: रसूल का दीन 

108 : सच्चाई आ चुकी है 

109  : आख़िरी में रसूल को सलाह 

 अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है


अलिफ़॰ लाम॰ रा॰
ये आयतें उस किताब [क़ुरआन] की हैं, जो ज्ञान से भरी हुई है। (1)

क्या लोगों के लिए यह बड़े आश्चर्य की बात है कि हमने उन्हीं में से एक आदमी [मुहम्मद] पर अपनी आयतें उतारी हैं, ताकि वह लोगों को (सच्चाई से इंकार और बुरे कर्मों के नतीजे की) चेतावनी दे दे, और जो लोग विश्वास रखते हैं, उन्हें ख़ुशख़बरी सुना दे कि उनके रब के यहाँ उन लोगों का ऊँचा दर्जा है? (तब भी) विश्वास न करनेवाले कहने लगे, "यह आदमी तो सचमुच एक जादूगर है।" (2)

तुम्हारा रब तो वह अल्लाह है, जिसने आसमानों और ज़मीन को छः दिनों में पैदा किया, फिर हर चीज़ की शासन-व्यवस्था चलाते हुए अपने आपको सिंहासन पर स्थापित किया; कोई नहीं है जो उसके सामने सिफ़ारिश कर सके, सिवाय उसके जिसको अल्लाह ने पहले से (बोलने की) इजाज़त दे रखी हो: यह है अल्लाह, तुम्हारा रब, अतः उसी की इबादत करो। तुम ऐसा कैसे कर सकते हो कि इस पर ध्यान ही न दो? (3)

उसी के पास तुम्हें (अंतत:) लौटकर जाना होगा---- यह अल्लाह की तरफ़ से पक्का वादा है। वही तो है जिसने पहली बार (तुम्हें) पैदा किया था, और वह (मरने के बाद) दोबारा भी वैसे ही (पैदा) करेगा, ताकि जिन लोगों ने विश्वास [ईमान] रखा और अच्छे कर्म किए, तो उनके किए का बदला उन्हें न्याय के साथ दे सके। विश्वास न करने वाले लोगों के पीने के लिए खौलता हुआ पानी और दुख-भरी यातना होगी, और ऐसा इसलिए होगा कि वे (सच्चाई को) मानने से इंकार करने के अपने फ़ैसले पर अड़े रहे। (4)


वही (अल्लाह) है जिसने सूरज को तेज़ चमकता हुआ बनाया और चाँद को (उससे) रौशन बनाया, और (अपनी कक्षा में चलने के लिए) उसकी मंज़िलें [Phases] निश्चित कर दीं, ताकि तुम वर्षों की गिनती और समय का अंदाज़ा मालूम कर सको। अल्लाह ने यह सब चीज़ें बिना किसी सही मक़सद के यूँ ही नहीं बना दी; वह अपनी निशानियाँ उन लोगों को अच्छे ढंग से समझाता है जो बातों को समझते हैं। (5)

रात के पीछे दिन और दिन के पीछे रात के आने में, और जो कुछ अल्लाह ने आसमानों और ज़मीन में पैदा किया, इन सबमें उन लोगों के लिए सचमुच बड़ी निशानियाँ हैं जो अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से बचते हैं। (6)

जो लोग (मरने के बाद) हमसे मिलने की आशा नहीं रखते, और इसी दुनिया की ज़िंदगी से ख़ुश और उसी पर संतुष्ट हो रहते हैं, और हमारी निशानियों की ओर कोई ध्यान नहीं देते,  (7)

तो जो कुछ वे किया करते हैं, उसके नतीजे में ऐसे लोगों के रहने की जगह (जहन्नम की) आग होगी। (8)

रहे वे लोग जो ईमान [विश्वास] रखते हैं, और अच्छे कर्म करते हैं, तो उनका रब उनके ईमान की वजह से उनको सही रास्ता दिखाएगा। वे नेमतों के बाग़ [जन्नत] में होंगे और उनके क़दमों तले नहरें बह रही होंगी। (9)

उनकी दुआ वहाँ यह होगी, "महिमा है तेरी, ऐ अल्लाह (कि तू हर बुराई से पाक है!)", वे एक दूसरे से मिलने पर "सलाम" [सलामती हो] कहेंगे, और उनकी दुआओं का अन्त इस पर होगा, "सारी प्रशंसा अल्लाह ही के लिए है जो सारे संसार का रब है।" (10)

और (देखो!) आदमी अपने फ़ायदे की चीज़ें हासिल करने के लिए जिस तरह जल्दी मचाता है, उसी तरह, अगर अल्लाह (उसके बुरे कर्मों के चलते) उसे नुक़सान पहुँचाने में जल्दबाज़ी करता, तो उसका समय कबका पूरा हो गया होता!, मगर जो लोग (मरने के बाद) हमसे मिलने की उम्मीद नहीं रखते, हम उन (सीमा तोड़नेवालों) को उनकी सरकशी [Excesses] में अंधों की तरह भटकता छोड़ देते हैं। (11)

आदमी पर जब कोई परेशानी आ जाती है, तो वह करवट लेटे या बैठे या खड़े (चाहे जिस हाल में हो), हमको पुकारने लग जाता है। मगर जैसे ही हम उससे उसकी तकलीफ़ दूर कर देते हैं तो वह इस तरह (मुंह मोड़े हुए) चल देता है मानो अपनी परेशानी दूर करने के लिए उसने कभी हमें पुकारा ही न था। इस तरह, ऐसे मर्यादाहीन लोगों की नज़र में उनके (बुरे) कर्म, सुहावने [Attractive] बना दिए गए हैं। (12)

तुम लोगों से पहले कितनी पीढ़ियाँ गुज़र चुकी हैं, जब वे शैतानियाँ करने लगीं, तो (नतीजे में) हमने उनको तबाह-बर्बाद कर दिया---- उनके रसूल उनके पास स्पष्ट निशानियाँ लेकर आए थे, मगर उन लोगों ने उन्हें मानने से इंकार कर दिया। तो (देखो!) अपराधियों को हम (उसके अपराध का) बदला इसी तरह दिया करते हैं। (13)

फिर उन (पीढ़ियों) के बाद, हमने ज़मीन पर तुम्हें उनका उत्तराधिकारी [successor] बनाया, ताकि हम देखें कि तुम कैसे कर्म करते हो। (14)


उन लोगों के सामने जब हमारी स्पष्ट आयतें पढ़कर सुनायी जाती हैं, तो वे लोग जो (मरने के बाद) हमसे मिलने की आशा नहीं रखते, कहते हैं, "यह नहीं, कोई दूसरी क़ुरआन ले आओ या इसमें कुछ फेर-बदल कर दो।" [ऐ रसूल!], कह दें, "मुझे यह अधिकार नहीं है कि मैं अपने मन से इसमें कोई फेर-बदल करूँ; मैं तो बस उसी के हुक्म के पीछे चलता हूँ, जो मुझ पर 'वही' [Inspiration] द्वारा उतारी जाती है, क्योंकि अगर मैं अपने रब के हुक्म को न मानूँ, तो मुझे एक बड़े ज़बरदस्त दिन की यातना का डर है।" (15)

कह दें, "अगर अल्लाह ऐसा चाहता, तो मैंने तुम्हें इस (क़ुरआन) को पढ़कर न सुनाया होता, और न ही वह तुम्हें इसकी जानकारी देता। आख़िर इस (क़ुरआन) के आने से पहले, मैं तुम्हारे बीच एक पूरी ज़िंदगी [40 साल] गुज़ार चुका हूँ। तो फिर तुम समझ-बूझ से काम क्यों नहीं लेते?" (16)


उस आदमी से ज़्यादा ज़ालिम कौन हो सकता है जो अल्लाह के ख़िलाफ़ झूठी बातें गढ़े या उसकी (उतारी हुई) आयतों को मानने से इंकार करे? (याद रहे) दोषी आदमी कभी फलता-फूलता नहीं है।" (17)

वे अल्लाह के साथ-साथ ऐसी चीज़ों को भी पूजते हैं, जो न उनको कोई नुक़सान पहुँचा सकती हैं और न कोई फ़ायदा, और वे कहते हैं, "ये अल्लाह के यहाँ हमारी सिफ़ारिश करनेवाले हैं।" [ऐ रसूल!] कह दें, "क्या तुम सोचते हो कि तुम अल्लाह को कोई ऐसी बात बता सकते हो, जिसके बारे में उसे पता है कि आसमानों और ज़मीन में इसका कोई अस्तित्व नहीं है? महिमावान है वह! अल्लाह के साथ वे जिन साझेदार-ख़ुदाओं को जोड़ते हैं, अल्लाह उनसे कहीं ऊँचा है! (18)

शुरू में सभी इंसान एक ही समुदाय थे, मगर बाद में वे अलग-अलग हो गए। और अगर आपके रब की तरफ़ से पहले ही (फ़ैसला टाल देने की) बात तय न कर दी गयी होती, तो जिन बातों में उनके बीच मतभेद रहा है, उनका फ़ैसला (इसी दुनिया में) पहले ही हो चुका होता। (19)

वे कहते हैं, "उस (रसूल) पर उनके रब की तरफ़ से कोई चमत्कार वाली निशानी क्यों नहीं उतारी गयी?" तो [ऐ रसूल!] कह दें, "जिस चीज़ को हम देख नहीं सकते [ग़ैब/Unseen], उसे तो केवल अल्लाह ही जानता है, अत: इंतज़ार करो----- मैं भी (तुम्हारे साथ) इंतज़ार करता हूँ।" (20)

लोगों को किसी दु:ख-तकलीफ़ में पड़ जाने के बाद, जैसे ही हम अपनी दयालुता का मज़ा चखाते हैं, तो वे तुरंत हमारी उतारी हुई आयतों के ख़िलाफ़ चालबाज़ियाँ करने लग जाते हैं। [ऐ रसूल] आप कह दें, "(तुम्हारी चालों के जवाब में) अल्लाह योजना बनाने में ज़्यादा तेज़ है।" (याद रहे) हमारे फ़रिश्ते तुम्हारी सारी चालबाज़ियों को लिख लेते हैं। (21)


वही तो है जिसने तुम्हारे लिए थल और जल में यात्रा करना संभव बना दिया, फिर जब कभी ऐसा होता है कि तुम पानी के जहाज़ों में बैठकर अनुकूल हवा के सहारे चलते हुए जहाज़ का मज़ा ले रहे होते हो, कि अचानक समंदर में तूफ़ान आ जाता है: उस पर सवार लोगों पर चारों तरफ़ से ऊँची-ऊँची लहरें आने लगती हैं और उन्हें लगने लगता है कि अब यहाँ से बच पाना मुश्किल है। तब उस समय वे केवल अल्लाह के प्रति अपनी आस्था दिखाते हुए दिल से उसे पुकारने लगते हैं, "अल्लाह! अगर तू हमें इस (मुसीबत) से बचा ले, तो हम ज़रूर तेरे आभारी [शुक्रगुज़ार] रहेंगे।" (22)

मगर जैसे ही वह उनको बचा लेता है, वैसे ही क्या देखते हैं कि ज़मीन पर (सुरक्षित) वापस आते ही, वे मर्यादा तोड़ने और हर सही चीज़ के ख़िलाफ़ फ़साद मचाने लग जाते हैं। ऐ लोगो! एक सीमा से अधिक जो तुम्हारा उपद्रवी आचरण है, वह ख़ुद तुम्हारे ही विरुद्ध पड़ने वाला है। इस दुनिया की ज़िंदगी के थोड़े मज़े ले लो; अंत में तो तुम्हें हमारे पास लौटकर आना ही होगा और तब हम तुम्हें बताएंगे जो कुछ तुमने (दुनिया में) किया होगा। (23)


इस दुनिया की ज़िंदगी की मिसाल ऐसी है: हमने आसमान से पानी बरसाया, तो उसके कारण धरती से उगने वाली चीज़ें, जिनको आदमी और चौपाये खाते हैं, ख़ूब फली-फूलीं व घनी हो गयीं, मगर जब वह समय आया कि धरती ने (हरियाली के) सारे ज़ेवर पहन लिए, और (लहलहाते हुए खेतों व बाग़ों से) धरती सुंदर दिखायी देने लगी, और उसके मालिक समझने लगे कि अब फ़सल हमारे क़ाबू में आ गयी है, कि अचानक (उसकी बर्बादी का) हुक्म रात या दिन के समय आ पहुँचा। फिर हमने उसे एक उजड़ी-कटी हुई फ़सल में बदलकर रख दिया, मानो एक दिन पहले तक वहाँ कोई भरा-पूरा खेत ही न था। इस तरह, हम उन लोगों के लिए (सच्चाई की) निशानियाँ [आयतें] खोल-खोलकर बताते हैं, जो सोच-विचार से काम लेते हैं। (24)


मगर अल्लाह (हर एक को) सलामती के घर [जन्नत] की तरफ़ बुलाता है, और जिसे चाहता है सीधे मार्ग पर लगा देता है; (25)

जिन लोगों ने अच्छा व नेक कर्म किया, उनको इसका बदला भी अच्छा ही मिलेगा, बल्कि इससे ज़्यादा ही मिलेगा। उनके मुँह न तो (बुराइयों से) काले पड़ेंगे और न ही उनपर शर्मिंदगी छाएगी: ऐसे ही लोग हैं जन्नत में रहनेवाले, और वे हमेशा वहीं रहेंगे। (26)

रहे वे लोग जिन्होंने बुरे कर्म किए, तो हर एक बुराई का बदला भी ठीक वैसा ही होगा, और बेइज़्ज़ती उन्हें चारों ओर से घेर लेगी-----अल्लाह से उन्हें बचाने वाला कोई न होगा। ऐसा लगेगा मानो उनके चहरों पर अँधेरी रात की पर्तें चढ़ा दी गयी हैं। ये वे लोग हैं जो (जहन्नम की) आग में रहने वाले हैं, और वहीं वे हमेशा रहेंगे।  (27)


उस दिन हम उन सबको एक साथ इकट्ठा करेंगे, फिर जिन लोगों ने अल्लाह के साथ (उसकी खुदायी में) साझेदार [Partner] ठहरा रखे हैं, उनसे कहेंगे, "ज़रा अपनी जगह ठहरो, तुम भी और तुम्हारे बनाए हुए (ख़ुदा के) साझेदार [Partner-gods] भी।" फिर हम उन्हें अलग-अलग (समूह में) कर देंगे, और तब उनके ठहराए हुए (ख़ुदा के) साझेदार कहेंगे, "हम वह नहीं हैं जिसको तुम पूजते थे--- (28)

"हमारे और तुम्हारे बीच अल्लाह ही एक गवाह काफ़ी है------ हमें तो कुछ पता ही नहीं था कि तुम हमें पूजते हो।" (29)

हर आदमी उसी वक़्त समझ जाएगा कि जो कुछ वह पहले किया करता था, उसकी हक़ीक़त क्या थी। उन्हें अल्लाह के पास लौटकर जाना होगा, जो कि असली रब है, और उनके गढ़े हुए (ख़ुदा) उनको छोड़कर गुम हो जाएंगे। (30)


[ऐ रसूल!] उनसे पूछें, "कौन है जो तुम्हें आसमानों और ज़मीन से रोज़ी देता है?, कौन है जिसके क़ब्ज़े में तुम्हारा सुनना और देखना है? वह कौन है जो ज़िंदा [सजीव] को मुर्दा [निर्जीव] से निकालता है और मुर्दा को ज़िंदा से निकालता है, और हर काम की व्यवस्था कौन करता है?" इस पर वे ज़रूर कह उठेंगे कि, "अल्लाह!" तब कहें, "तो फिर तुम (सच्चाई के इंकार से) डरते क्यों नहीं?" (31)

यही अल्लाह है जो तुम्हारा रब है, और यही सच्चाई है। फिर सच्चाई के अलावा क्या बाक़ी बचता है, सिवाए रास्ता भटकने के? तो फिर तुम (सच्चाई से) मुँह फेरकर किधर चले जा रहे हो? (32)

इस तरह से, जिन लोगों ने (सच्चाई को) मानने से इंकार किया, उनके बारे में आपके रब की बात सही साबित हो गयी----- वे विश्वास करनेवाले नहीं हैं। (33)

उनसे पूछिए, "क्या तुम्हारे ठहराए हुए (खुदा के) साझेदारों [Partner-gods] में कोई है जो सृष्टि की रचना कर सकता हो, और फिर अंत में, (मरने के बाद) दोबारा उन्हें ज़िंदा कर सकता हो?" बता दें, "यह तो अल्लाह है जिसने पहले-पहल सृष्टि की रचना की, और वही इसको दोबारा ज़िंदा करेगा, तो देखो! तुम्हारी उल्टी चाल तुम्हें कहाँ लिए जा रही है?" (34)

उनसे पूछिए, "क्या तुम्हारे ठहराए हुए (ख़ुदा के) साझेदारों [Partner-gods] में कोई है जो सच्चाई का रास्ता दिखा सकता हो?", आप कहें, "अल्लाह सच्चाई का रास्ता दिखाता है। तो फिर जो सच्चाई का रास्ता दिखाता हो, क्या वह इस बात का ज़्यादा हक़दार है कि उसकी बात मानी जाए, या फिर उसकी जो ख़ुद ही सही रास्ता न पा सके जब तक कि उसे कोई रास्ता न बता दे? (अफ़सोस तुम पर!) तुम्हें क्या हो गया है? तुम कैसे फ़ैसले कर रहे हो?" (35)

उनमें से अधिकतर लोग तो ऐसे हैं जो केवल (ग़लत) धारणाओं के पीछे चलते हैं, मगर सच्चाई के मुक़ाबले में (झूठी) धारणाओं का तो कोई मूल्य हो ही नहीं सकता: जो कुछ वे करते हैं, अल्लाह उसे अच्छी तरह से जानता है। (36)


ऐसा नहीं हो सकता कि अल्लाह के सिवा किसी और ने इस क़ुरआन को अपने मन से गढ़ लिया हो। यह तो उन (आसमानी किताबों) की पुष्टि करती है जो इससे पहले उतारी जा चुकी हैं, और (अल्लाह की) किताब को विस्तार से साफ़-साफ़ बताती है----इस बारे में कोई संदेह नहीं होना चाहिए -----यह सारे संसारों के रब की तरफ़ से है। (37)

क्या फिर भी वे कहते हैं, "इस आदमी [मोहम्मद] ने ख़ुद ही इस (किताब) को लिख लिया है?", कह दें, "अगर तुम अपनी बात में सच्चे हो, तो इस जैसी एक ही सूरह लिख लाओ, और इस काम में मदद के लिए अल्लाह को छोड़कर, जिस किसी को बुलाना चाहो, बुला लो।" (38)

लेकिन जिस बात को वे ठीक ढंग से समझ नहीं सकते, उसे मानने से इंकार कर रहे हैं----असल में, इसमें बतायी गयीं भविष्य की बातें अभी उनके सामने नहीं आयी हैं। इसी तरह, इनसे पहले गुज़र चुके लोगों ने भी विश्वास करने से इंकार किया था---- फिर देख लो, उन शैतानियाँ करने वालों का अंत कैसा हुआ! (39)


[ऐ रसूल!] उनमें से कुछ लोग इस (क़ुरआन) पर विश्वास [ईमान] रखते हैं और कुछ लोग ऐसे हैं जो ईमान नहीं रखते: आपका रब उन लोगों को अच्छी तरह जानता है जो फ़साद मचाते हैं। (40)

अगर वे आप पर (समझाने के बावजूद) विश्वास न करें, तो [ऐ रसूल!] आप कह दें, "मेरा कर्म मेरे लिए है, और तुम्हारा कर्म तुम्हारे लिए। जो कुछ मैं करता हूँ उसके लिए तुम ज़िम्मेदार नहीं हो, और जो कुछ तुम करते हो उसकी ज़िम्मेदारी मुझ पर नहीं है।" (41)

उनमें से कुछ हैं जो आपकी सुनते तो हैं: मगर क्या आप किसी बहरे को सुना सकते हैं, अगर वह अपनी समझ-बूझ का इस्तेमाल नहीं करे? (42)

और उनमें से कुछ ऐसे हैं, जो आपकी ओर देखते हैं: मगर क्या आप अंधों को रास्ता दिखा सकते हैं, अगर वह देखें ही नहीं? (43)

सच्चाई यह है कि अल्लाह लोगों पर ज़रा भी ज़ुल्म नहीं करता (कि उन्हें ज़बरदस्ती बहरा या अंधा बना दे)---- असल में वही हैं जो अपने आप पर ज़ुल्म करते हैं। (44)


उस (क़यामत के) दिन जब वह उन सबको (हश्र के मैदान में) इकट्ठा करेगा, तो ऐसा लगेगा जैसे वे (इस दुनिया में) एक घड़ी से ज़्यादा नहीं ठहरे थे, और वे एक-दूसरे को पहचान लेंगे। वे लोग बड़े घाटे में रहेंगे, जिन्होंने (आख़िरत में) अल्लाह से होने वाली मुलाक़ात को मानने से इंकार किया, क्योंकि वे सही मार्ग पर नहीं चलते थे। (45)

[ऐ रसूल!] जिन सज़ाओं की धमकी हमने उन (मक्का के विश्वास न करनेवालों) को दे रखी है, उनमें से कुछ सज़ाओं को हम चाहें तो (आपके जीवन में ही) दिखा दें या हो सकता है कि (यातना आने से) पहले ही आपकी मौत आ जाए, लेकिन बहरहाल, उन्हें तो हमारी ओर लौटकर आना ही है: जो कुछ वे करते हैं, उस पर अल्लाह गवाह है। (46)

हर समुदाय [उम्मत] के लिए एक रसूल भेजा गया है, और (क़यामत के दिन) जब उनके रसूल (गवाही देने के लिए) आ जाएंगे, तो उनके बीच न्याय के साथ फ़ैसला कर दिया जाएगा; और उनपर कोई ज़ुल्म नहीं किया जाएगा। (47)

विश्वास न करनेवाले पूछते हैं, "अगर तुम अपनी बात में सच्चे हो, तो यह बताओ कि (अल्लाह की ओर से यातना आने का) वादा कब पूरा होगा?" (48)

[ऐ रसूल!] उनसे कह दें, "मुझे जो नुक़सान या फ़ायदा पहुंचता है, उसका नियंत्रण मैं नहीं करता, बल्कि अल्लाह जो चाहता है वही होता है। हर एक समुदाय के लिए एक नियत समय निश्चित है, और जब वह समय आ जाता है, तो घड़ी भर न तो उसमें देरी हो सकती है, और न घड़ी भर यह पहले हो सकता है।" (49)

कह दें, "ज़रा सोचो: अगर उसकी भेजी हुई यातना तुम्हारे पास (अचानक) आ जाए, रात या दिन के किसी समय, तो वह आख़िर (यातना का) कौन सा भाग होगा जिसे ये अपराधी लोग चाहते हैं कि वह जल्दी आ जाए? (50)

क्या जब वह (यातना) आ ही जाएगी, तब विश्वास करोगे? (उस समय तो कहा जाएगा), क्या अब (विश्वास कर लिया?), जबकि (पहले) तो तुम इसी के लिए बहुत जल्दी मचा रहे थे!" (51)

फिर शैतानियाँ करनेवालों से कहा जाएगा, "अब हमेशा होने वाली यातना का मज़ा चख़ो! तुम्हें किसी और चीज़ के लिए बदला क्यों दिया जाएगा, वह तो उन्हीं (बुरे) कर्मों के लिए होगा जैसा कुछ तुम करते रहे थे?" (52)


[ऐ रसूल!] वे आप से पूछते हैं, "क्या यह सच है?", कह दें, "हाँ, मेरे रब की क़सम! यह बिल्कुल सच है, और तुम उससे बचकर निकल नहीं सकते।" (53)

(आने वाली यातना इतनी भयानक होगी कि) हर वह आदमी जिसने ज़ुल्म व शैतानियाँ की हैं, अगर उसके पास धरती की सारी दौलत आ जाए, तो वह अपनी जान के बदले उसे देने के लिए ख़ुशी-ख़ुशी तैयार हो जाएगा। जब वे यातना को देखेंगे तो मन ही मन पछताएँगे, मगर उनके बीच न्याय के साथ फ़ैसला कर दिया जाएगा और उनपर कोई अत्याचार नहीं होगा। (54)

याद रखो! आसमानों और ज़मीन में जो कुछ है, सब असल में अल्लाह का ही है: अल्लाह का वादा सच्चा है, लेकिन ज़्यादातर लोग ऐसे हैं जो यह बात नहीं जानते। (55)

वही है जो ज़िंदगी भी देता है और मौत भी, और उसी के पास (अंत में) तुम सब को लौटकर जाना होगा। (56)


ऐ लोगो! तुम्हारे पास तुम्हारे रब की तरफ़ से उपदेश [क़ुरआन] आ गया है, जो (तुम्हारे) दिलों के रोग की दवा है, और उन लोगों के लिए रास्ता दिखानेवाली व रहमत [Mercy] है, जो इस पर यक़ीन रखते हैं। (57)

[ऐ रसूल!] कह दें, "यह अल्लाह का फ़ज़ल [Grace] और उसकी रहमत है, और इस पर ज़रूर ख़ुशी मनाना चाहिए: यह उन चीज़ों से कहीं बेहतर है, जिसे वे (दुनिया में) जमा करते रहते हैं।" (58)

कह दें, "जो रोज़ी अल्लाह ने तुम्हारे लिए पैदा की है, उसके बारे में ज़रा सोचो, उसमें से कुछ को तुमने (अपने मन से) हराम [अवैध] और कुछ को हलाल [वैध] समझ लिया है।" कहें, "क्या अल्लाह ने तुम्हें ऐसा करने की अनुमति दी है, या तुम अल्लाह के बारे में झूठी बातें गढ़ रहे हो?" (59)

जो लोग अल्लाह के बारे में झूठी बातें गढ़ते हैं, उन्होंने क़यामत के दिन को क्या समझ रखा है (क्या उन्हें वहाँ होने वाले हिसाब-किताब की ख़बर नहीं)? सच यह है कि अल्लाह तो लोगों के लिए बड़ा फ़ज़ल करनेवाला है, मगर उनमें ज़्यादातर ऐसे हैं जो उसका शुक्र अदा नहीं करते। (60)


[ऐ रसूल!] आप चाहे किसी मामले में लगे हुए हों, और क़ुरआन की कोई सी भी आयत पढ़कर सुनाते हों, और (लोगो) चाहे तुम कोई भी काम कर रहे हो, हम तुम्हें उन कामों को करते हुए देख रहे होते हैं। यहाँ तक कि ज़मीन या आसमान में कोई चीज़ ऐसी नहीं जो आपके रब की नज़र से ओझल हो, कण-भर हो या उससे कोई चीज़ छोटी हो या बड़ी: सब कुछ एक स्पष्ट किताब में लिखा हुआ है। (61)

मगर वे लोग जो अल्लाह की तरफ़ होते हैं, उन्हें न तो कोई डर होगा और न वे दुखी होंगे। (62)

ये वह लोग हैं जिन्होंने विश्वास कर लिया [ईमान] और ज़िंदगी ऐसे गुज़ारी कि बुराइयों से बचते रहे, (63)

उनके लिए इस दुनिया में भी (कामयाबी की) ख़ुशख़बरी है और आने वाली दुनिया [आख़िरत] में भी------और अल्लाह के किए हुए वादे कभी बदलने वाले नहीं---- यही असल में सबसे बड़ी कामयाबी है। (64)

[ऐ रसूल!] आप उन [इंकार करनेवालों] की बातों से दुखी न हो जाएं, सारी ताक़त व इज़्ज़त अल्लाह की ही है; वह सब कुछ सुनता है, सब जानता है; (65)

याद रखो! आसमानों और ज़मीन में जितने भी जीव हैं, सब अल्लाह के हुक्म के ग़ुलाम हैं। जो लोग अल्लाह को छोड़कर दूसरों को पुकारते हैं, वे सचमुच किसी ख़ुदा के साझेदार [Partner-gods] को मानते हुए उनके पीछे नहीं चलते; बल्कि वे तो बस अपनी मनगढ़ंत मान्यताओं के पीछे चल रहे हैं और झूठ बक रहे हैं। (66)

वही है जिसने तुम्हारे लिए रात का समय बनाया ताकि तुम उसमें आराम कर सको, और दिन को उजाला बनाया ताकि तुम देख सको------ सचमुच इस बात में उन लोगों के लिए बड़ी निशानियाँ है, जो (सच्चाई को) सुनते हैं। (67)


वे कहते हैं, "अल्लाह औलाद रखता है!" महान है वह! वह (अपने काम के लिए) किसी पर भी निर्भर नहीं; आसमानों और ज़मीन की हर एक चीज़ उसी की है, उसी के लिए है। इस बात को कहने के लिए तुम्हारे पास कोई प्रमाण [Authority] नहीं। तुम्हारी यह मजाल कि तुम अल्लाह के बारे में ऐसी बातें कहते हो, जिसकी तुम्हें कोई जानकारी नहीं? (68)

[ऐ रसूल!] कह दें, "जो लोग अल्लाह के बारे में अपने मन से झूठी बातें बनाते हैं, वे कभी कामयाबी नहीं पाने वाले।" (69)

उनके पास इस दुनिया का थोड़ा सुख हो सकता है, मगर फिर तो उन्हें हमारे पास लौटकर आना ही है। फिर जो (सच्चाई में) विश्वास न करने पर अड़े होंगे, उसके बदले में हम उन्हें कठोर सज़ा का मज़ा चखाएँगे। (70)


[ऐ रसूल!] आप उन्हें नूह [Noah] की कहानी सुनाएं। जब उसने अपनी क़ौम से कहा था, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! तुम लोगों के बीच (मार्गदर्शन के लिए) मेरा मौजूद होना और अल्लाह की निशानियों को तुम्हें याद दिलाना, अगर तुम्हें भारी पड़ता है, तो फिर मेरा भरोसा केवल अल्लाह पर है। मेरे ख़िलाफ़ जो भी कार्रवाई करना चाहते हो उसे आपस में तय कर लो, तुम और तुम्हारे ठहराए हुए ख़ुदा के साझेदारों [Partner-gods] ----- और इस बात में सकुचाने या छिपाने की ज़रूरत नहीं है ---- फिर मेरे ख़िलाफ़ जो कुछ करने का फ़ैसला किया हो, कर डालो और मुझे कोई मुहलत न दो।" (71)

फिर भी तुमने अगर मुँह मोड़े रखा, तो मैं (मार्गदर्शन देने के लिए) तुम से कोई मज़दूरी [इनाम] तो नहीं माँगता; मेरा इनाम तो बस अल्लाह के पास है, और मुझे यह आदेश मिला है कि मैं उन लोगों में शामिल रहूँ जो अल्लाह पर पूरी भक्ति से समर्पित [मुस्लिम] हैं।" (72)

मगर उन लोगों ने नूह [Noah] को मानने से इंकार कर दिया। हमने नूह को और उन लोगों को, जो उनके साथ नौका में सवार थे, (तूफ़ान में डूबने से) बचा लिया और उन्हें ज़मीन पर फिर से बसाया; और उन लोगों को डुबा दिया, जिन्होंने हमारी आयतों को मानने से इंकार किया था----- तो देख लो, जिन्हें पहले ही (इंकार के नतीजे से) सावधान किया गया था, उनका क्या अंजाम हुआ! (73)


फिर उसके बाद हमने बहुत सारे रसूलों को उनकी क़ौम के लोगों के पास भेजा जो स्पष्ट निशानियाँ लेकर आए थे, मगर जिस चीज़ को वे पहले ही मानने से इंकार कर चुके थे, उस बात में (निशानियाँ देखकर भी) वे विश्वास करनेवाले न थे: हम इसी तरह, हद से ज़्यादा फ़साद करने वालों कॆ दिलों को मुहर लगाकर बंद [seal] कर देते हैं। (74)

फिर उनके बाद हमने मूसा [Moses] और हारून [Aaron] को अपनी निशानियों के साथ फ़िरऔन [Pharaoh] और उसके दरबारियों के पास भेजा, मगर वे बड़े घमंड से पेश आए---- वे शैतान लोग थे। (75)

हमारी तरफ़ से जब सच्चाई उनके सामने आ गयी, तो वे कहने लगे, "यह तो साफ़ तौर से जादू है।" (76)

मूसा ने कहा, "क्या यही तुम्हारे विचार हैं सच्चाई के बारे में, जबकि सच्चाई अब तुम्हारे सामने आ चुकी है? क्या यह कोई जादू है? जादूगर तो कभी फलते-फूलते नहीं हैं।" (77)

उन लोगों ने कहा, "क्या तू हमारे पास इसलिए आया है कि हमें उस दीन [Faith] से हटा दे जिस पर हमने अपना बाप-दादा को चलते हुए पाया है, और इस सरज़मीन पर तुम दोनों भाइयों की महानता स्थापित हो जाए? हम तो कभी भी तुम में विश्वास करनेवाले नहीं हैं।" (78)

और फ़िरऔन ने कहा, "हर क़ाबिल जादूगर को मेरे पास ले आओ।" (79)

फिर जब जादूगर आ गए, (और मुक़ाबला शुरू हुआ) तो मूसा ने उनसे कहा, "(अपने दाँव में) जो कुछ तुम फेंकना चाहते हो, फेंको।" (80)

फिर जब जादूगरों ने (अपना दाँव) फेंका, तो मूसा ने कहा, "तुम जो कुछ भी लेकर आए हो, वह तो जादू है। अल्लाह अभी दिखा देगा कि यह सब बनावटी है। 

अल्लाह शरारत करनेवालों के काम को कभी कामयाब नहीं होने देता; (81)

"अल्लाह सच्चाई को अपने हुक्म से सच कर दिखाता है, चाहे शैतानी करनेवाले उससे कितनी ही नफ़रत करें।" (82)

मगर मूसा की बात में किसी ने भी विश्वास न किया, सिवाए उसकी क़ौम के थोड़े से (जवान) लोगों के, क्योंकि उन्हें डर था कि फ़िरऔन और उनके सरदार उन पर जुल्म ढाएंगे: फ़िरऔन था भी बड़ा दबंग, उसने धरती पर बहुत सिर उठा रखा था, औऱ वह बेहद ज़्यादती करनेवाला था। (83)


मूसा ने कहा, "ऐ मेरे लोगो! अगर तुम अल्लाह पर ईमान रखते हो और उसकी आज्ञा मानते हुए उसी के सामने झुकते हो, तो तुम्हें उसी पर अपना भरोसा रखना चाहिए।" (84)

इस पर वे बोले, "हमने अल्लाह पर ही भरोसा किया है। ऐ हमारे रब! तू हमें ज़ालिम लोगों के हाथों आज़माइश में न डाल (कि हम उस ज़ुल्म के मुक़ाबले में कोई कमज़ोरी दिखाएं) (85)

"हमें अपनी रहमत [दयालुता] से उन लोगों से बचा ले, जो (तेरे संदेशों को) मानने से इंकार करते हैं।" (86)

हमने मूसा और उसके भाई को 'वही' [Revelation] द्वारा यह बताया: "अपने लोगों को मिस्र के कुछ घरों में बसाओ, और उन घरों को इबादत करने की जगह बना लो; (उनमें) नमाज़ पाबंदी से पढ़ने की व्यवस्था करो; और ईमान रखनेवालों को (कामयाबी की) ख़ुशख़बरी दे दो!" (87)

और मूसा ने (दुआ में) कहा, "हमारे रब! तूने फ़िरऔन और उसके सरदारों को दुनिया की ज़िंदगी में बड़ी चमक-दमक की चीज़ें और धन-दौलत दिए हैं, तो ऐ रब! क्या यह इसीलिए है कि वे लोगों को तेरे मार्ग से भटकाएँ? ऐ हमारे रब! उनकी दौलत को मिटा दे, और उनके दिल को ऐसा कठोर कर दे कि वे उस समय तक विश्वास न करें जब तक कि दर्दनाक यातना को सामने देख न लें।" (88)

अल्लाह ने कहा, "तुम दोनों की दुआ क़बूल हो चुकी, अतः सही मार्ग पर डटे रहो, और उन लोगों के रास्ते पर न चलना, जो (सच्चाई को) नहीं जानते।" (89)


हमने इसराईल की संतानों को (सुरक्षित) समंदर पार करा दिया। फ़िरऔन और उसकी सेना ने घमंड और आक्रामकता के साथ उनका पीछा किया। मगर जब वह समंदर में डूबने लगा तो उस वक़्त पुकार उठा, "मुझे विश्वास हो गया है कि उसके सिवा कोई ख़ुदा नहीं है जिस पर इसराईल की सन्तान ईमान रखती है। मैं भी (अब) उसकी आज्ञा मानते हुए झुकता हूँ।" (90)

(हमने जवाब दिया), "अब ईमान लाओगे? तुम तो हमेशा से विद्रोही रहे हो, एक फ़साद मचानेवाले! (91)

"आज हम (केवल) तेरे शरीर को (डूबने से) बचा लेगें, ताकि तू बाद में आने वालों के लिए एक निशानी बनकर रह जाए। हालाँकि बहुत-से लोग ऐसे हैं जो हमारी निशानियों की तरफ़ कोई ध्यान नहीं देते।" (92)

हमने इसराईल की सन्तानों को (फिलिस्तीन/सीरिया जैसी) अच्छी जगह पर बसा दिया, और उन्हें जीवन चलाने के लिए अच्छी रोज़ी प्रदान की। फिर (सच्चे दीन पर) उनका आपस में मतभेद जब भी हुआ, उनके पास (कई रसूल) ज्ञान के साथ आते रहे थे। (फिर भी) उनके बीच जिन बातों को लेकर मतभेद रहा था, आपका रब क़यामत के दिन उसका फ़ैसला कर देगा।  (93)


अतः [ऐ रसूल!] अगर आपको उस संदेश के बारे में कोई संदेह हो, जो हमने आप पर उतारा है, तो आप उनसे पूछ लें जो आपसे पहले से (आसमानी) किताब पढ़ते रहे हैं। आपके रब की तरफ़ से आपके पास सच्चा संदेश आ चुका है, सो किसी सन्देह में न पड़ें और हमारी निशानियों को मानने से इंकार न करें---- (94)

अन्यथा आप भी घाटे में पड़ने वालों में हो जाएंगे।  (95)

जिन लोगों के ख़िलाफ़ आपके रब का फ़ैसला हो चुका है, वे कभी विश्वास नहीं करेंगे, (96)

चाहे उनके पास हर एक निशानी क्यों न आ जाए, (ये उसी वक़्त विश्वास करेंगे) जब तक वे उस दर्दनाक यातना को अपनी आँखों से देख न लें। (97)

काश कि कोई एक भी बस्ती ऐसी होती जिसने (यातना के आने से पहले ही) विश्वास किया होता, और उसका ईमान उसके लिए फ़ायदेमंद सिद्ध होता! हाँ, केवल यूनुस [Jonah] की क़ौम के लोगों ने ही (यातना से पहले) ऐसा किया, जब उन लोगों ने विश्वास कर लिया, तो हमने उस अपमानजनक यातना को उन पर से टाल दिया जो सांसारिक जीवन में आने वाली थी, और उन्हें एक अवधि तक ज़िन्दगी के मज़े उठाने का अवसर प्रदान किया। (98)

अगर आपका रब चाहता तो ज़मीन पर जितने लोग हैं, वे सब के सब (एक अल्लाह में) विश्वास कर लेते। तो क्या आप लोगों को विश्वास करने पर मजबूर कर सकते हैं? (99)

अल्लाह की मर्ज़ी के बिना कोई जान ऐसी नहीं जो (सच्चाई में) विश्वास कर ले, और (उसका क़ानून यह है कि) वह उन लोगों की इज़्ज़त गिरा देता है, जो बुद्धि से काम नहीं लेते हैं। (100)

कह दें, "देखो ज़रा, आसमानों और ज़मीन में क्या क्या कुछ है!" लेकिन ये (प्रकृति की) निशानियाँ और चेतावनियाँ उन लोगों के किस काम की हैं, जो विश्वास करने वाले नहीं हैं? (101)

वे किस चीज़ के इंतज़ार में लगे हैं, क्या वे उस सज़ा का इंतज़ार कर रहे हैं जैसी कि सज़ा उनसे पहले गुज़र चुके लोगों को मिल चुकी है? कह दें, "ठीक है, तब इंतज़ार करो, मैं भी तुम्हारे साथ इंतज़ार करता हूँ।" (102)

अंत में (जब यातना की घड़ी आ जाएगी तो) हम अपने रसूलों और विश्वास रखनेवालों को बचा लेंगे। हमारी रीति के अनुसार, ईमान रखनेवालों को बचा लेने की जिम्मेदारी ख़ुद हमारे ऊपर है। (103)


[ऐ रसूल!] आप कह दें, "ऐ लोगो! अगर तुम मेरे दीन [Faith] के बारे में किसी सन्देह में पड़े हो, तो (सुन लो), तुम अल्लाह को छोड़कर जिनको पूजते हो, मैं उनकी इबादत [पूजा] नहीं करता, बल्कि मैं उस अल्लाह की इबादत करता हूँ जो तुम्हें (एक दिन) मौत दे देगा, और मुझे आदेश हुआ है कि मैं (एक अल्लाह में) विश्वास करनेवाला रहूँ।  (104)

[ऐ रसूल], एक पक्के ईमानवाले की तरह (हर तरफ़ से हटकर) अपना मुँह अल्लाह के दीन की तरफ़ जमा लें। और उन लोगों में से मत हो जाएं जो अल्लाह के साथ (उसकी ख़ुदायी में) कोई साझेदार [Partner] ठहरा लेते हैं;  (105)

(अल्लाह के सिवा) किसी भी और (देवता) से दुआ न माँगें, जो न आपको फ़ायदा ही पहुँचा सकता है और न कोई नुक़सान: अगर आपने ऐसा किया तो आप भी शैतानियाँ करने वालों में गिने जाएंगे।  (106)

अगर अल्लाह आपको किसी तकलीफ़ में डाल दे, तो कोई न होगा जो उसके सिवा उसे दूर सके, और अगर वह आपके लिए भलाई का इरादा कर ले, तो कोई नहीं है जो उसके फ़ज़ल [Bounty] को रोक सके; वह अपने बन्दों में से जिसे चाहता है, उस पर अपना फ़ज़ल करता है। वह बहुत माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है।" (107)

आप कह दें, "ऐ लोगो! तुम्हारे पास तुम्हारे रब की तरफ़ से सच्चाई पहुँच चुकी है। अब जो कोई सही मार्ग अपनाएगा, तो वह अपने ही भले के लिए ऐसा करेगा, और जो कोई सीधे मार्ग से भटकेगा, तो उससे नुक़सान उसी का होगा: मैं तुम्हारा कोई अभिभावक [Guardian] नहीं हूँ (कि तुम्हें मजबूर करूँ)।" (108)

(ऐ रसूल) जो कुछ आप पर 'वही’ [Inspiration] द्वारा उतारा जा रहा है, आप उस पर चलते रहें, और अपने काम में धीरज के साथ जमे रहें, यहाँ तक कि अल्लाह अपना फ़ैसला कर दे, और वह फ़ैसला करने वालों में सबसे बेहतर है। (109)





नोट:

1: "हकीम" का मतलब ज्ञान व समझ-बूझ से भरी हुई; किसी मामले में फ़ैसला कर देने वाली या यह बताने वाली कि उसे बिल्कुल सटीक बनाया गया है। 


3: ज़मीन और आसमानों को छ: दिनों में पैदा किया, मगर हम जिसे एक दिन समझते हैं ये वैसा नहीं। देखें 32: 5; और 70: 4


5: अल्लाह ने पूरी कायनात बिना मक़सद के नहीं बनायी, बल्कि इसलिए बनायी है कि दुनिया में जिन लोगों ने अच्छे काम किए उन्हें परलोक [आख़िरत] में इनाम मिले और जिन लोगों ने  बुरे कर्म किए, उन्हें सज़ा मिल सके। 


19: पहले इंसान आदम (अलै) के समय तो सब एक अल्लाह के मानने वाले थे, फिर आहिस्ता-आहिस्ता अलग-अलग समुदाय बनते गए और उनकी मान्यताएं बदलती गईं। मगर अल्लाह ने कायनात की रचना करने से पहले ही यह तय कर लिया था कि इंसानों के लिए दुनिया एक इम्तिहान की जगह होगी, लोगों को सही रास्ता दिखाने के लिए पैग़म्बरों को भेजा जाएगा, लेकिन आदमी को यह आज़ादी होगी कि वह अपनी मर्ज़ी से सही या ग़लत रास्ता चुन ले, फिर उसी के हिसाब से उसे आख़िरत में इनाम या दंड मिलेगा। 


20: मुहम्मद (सल्ल) पढ़े-लिखे नहीं होने के बावजूद अपने मुँह से क़ुरआन पढ़कर सुनाते थे, जो कि ख़ुद ही बड़ा चमत्कार था, लेकिन लोग विश्वास करने वाले नहीं थे, यहाँ बताया गया है कि चमत्कार दिखाना अल्लाह की मर्ज़ी पर है, इसलिए उसके लिए इंतज़ार करो।


24: दुनिया की ज़िंदगी और उसकी चमक-दमक में जिसने अपना दिल लगाया, तो फिर अचानक जब कोई यातना आ जाए या उसके मरने का समय आ जाता है तो यह सब छोड़ते हुए उसे बहुत दुख-दर्द होगा, फिर तो एक दिन पूरी दुनिया ही ख़त्म हो जाएगी। 


31: अरब के वे लोग जो सच्चाई पर विश्वास करने से इंकार करते थे, वे भी मानते थे कि सारी कायनात की रचना अल्लाह ने ही की है, मगर साथ में उनकी यह भी मान्यता थी कि अल्लाह ने अपनी सारी शक्तियाँ अलग-अलग देवी-देवताओं में बाँट रखी हैं, इसलिए वे उन देवताओं को ख़ुश रखने के लिए उनकी पूजा किया करते थे। 


33: यानी उनकी तक़दीर में अल्लाह ने जो बात लिखी थी कि वे अपनी हठधर्मी और सरकशी के कारण सही रास्ते को नहीं अपनाएंगे और सच्चाई पर विश्वास नहीं करेंगे, वही बात सही साबित हुई। 


37: यहाँ अल्लाह की किताब को विस्तार से बताने का मतलब यह है कि अल्लाह ने जो क़ानून और तरीक़े का हुक्म ईमानवालों के लिए अपनी किताब (लौह-महफ़ूज़/Preserved Tablet) में लिख रखा है, उसे क़ुरआन साफ़-साफ़ बताती है। 


59: अरब के विश्वास न करने वाले लोगों ने अपने मन से कुछ जानवरों को अपने देवताओं के नाम करके उन्हें खाने से मना [हराम] कर दिया था, देखें 6: 138-139 


62: अल्लाह की तरफ़ वाले यानी अल्लाह के दोस्त [औलिया अल्लाह], जो कि हर समय अल्लाह की याद में लगे रहते हैं, और अपने आपको बुराइयों से बचाकर रखते हैं। इनके बारे में अल्लाह के रसूल ने कहा कि ये ऐसे होते हैं जिन्हें देखने से अल्लाह की याद आ जाए।   


73: नूह (अलै) की क़ौम के बारे में ज़्यादा विस्तार के लिए देखें 11: 25-49.


87: कहा जाता है कि फ़िरऔन ने इसराइलियों पर काफ़ी ज़ुल्म मचा रखा था, उनकी इबादतगाहों को तोड़-फोड़ दिया था, सो लोग डरे हुए भी थे, इसलिए उन्हें घरों में ही इबादत करने को कहा गया। 


92: फ़िरऔन की लाश पानी की सतह पर तैरती हुई मिली थी, जिसे शायद निकाल लिया गया था। आधूनिक रिसर्च के मुताबिक़ उस फिरऔन का नाम "मुनफ़िताह" [Remesis II] बताया जाता है जिसकी लाश को संभालकर क़ाहिरा [Cairo] के म्यूज़ियम में रखा गया है। 


98: तबाही और यातना को आँख से देख लेने के बाद विश्वास करने से कोई फ़ायदा नहीं है, क्योंकि वह माना नहीं जाता। यातना आने से ठीक पहले भी अगर कोई सच्चाई पर विश्वास  कर ले, तो ठीक है, जैसा कि यूनुस (अलै) की क़ौम ने किया था। जब यूनुस (अलै) ने अपनी क़ौम को देखा कि वे किसी तरह सच्चाई पर विश्वास करने के लिए तैयार नहीं हैं, तो उस बस्ती से यातना आने की धमकी देकर चले गए, उसके बाद उनकी क़ौम के लोगों ने कुछ ऐसी निशानियाँ देखीं, जिससे उन्हें सचमुच यक़ीन हो गया कि यातना आने ही वाली है, अत: उन लोगों ने अपने गुनाहों की माफ़ी माँगी, सो अल्लाह ने यातना टाल दी।  देखें 37: 139-148; 68: 48-50


99: सभी आदमी को अल्लाह ने यह आज़ादी दी है कि अपनी मर्ज़ी से जिस दीन को चाहे अपना ले, किसी को एक अल्लाह में विश्वास कर लेने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। जो अपनी बुद्धि से सच्चाई पर विश्वास करना चाहे, उसके लिए अल्लाह रास्ता खोल देता है। 


109: मक्का में ईमानवालों पर तरह-तरह के ज़ुल्म किए जा रहे थे, मगर अपने दुश्मनों के ख़िलाफ़ सब्र व धीरज से काम लेने के लिए कहा गया है, और लड़ने-मारने की इजाज़त अभी तक नहीं दी गई है। 




 



Surah/सूरह 1: Al-Fatiha/अल-फ़ातिहा [(किताब की) शुरुआत/ The Opening]

       सूरह 1: अल-फ़ातिहा    [(किताब की) शुरुआत/ The Opening] यह एक मक्की सूरह है। पूरे क़ुरआन में अल्लाह का जो संदेश आया है , उसका इस सूरह मे...