01-03: रसूल को अल्लाह पर ही भरोसा रखना चाहिए
04-06: ख़ूनी रिश्तेदारों का हक़ मुँह-बोले रिश्ते से ज़्यादा होता है
07-08: नबियों से लिया गया वचन
09-27: यसरिब [मदीना] की घेराबंदी
28-34: रसूल की बीवियाँ
35: ईमानवालों के लिए इनाम होगा
36: अल्लाह और रसूल की आज्ञा मानो
37-39: रसूल की शादी
40: मुहम्मद (सल्ल) नबियों के सिलसिले में से आख़िरी नबी हैं
41-48: ईमानवालों और रसूल का उत्साह बढ़ाना
49: शादी के बाद हाथ लगाने से पहले ही तलाक़
50-52: शादी के लिए अल्लाह के रसूल का ख़ास अधिकार
53-54: रसूल और उनकी बीवियों को मान-सम्मान देना
55: रसूल की बीवियों को अपने नज़दीकी रिश्तेदारों से पर्दा न करने की छूट
56-58: रसूल पर रहमत भेजना चाहिए
59: औरतों के लिए सावधानियाँ ताकि वे छेड़-छाड़ से बच सकें
60-62: पाखंडियों के लिए सज़ा
63-68: विश्वास न करने वालों की सज़ा
69-71: विश्वास रखनेवालों को रसूल की बे-इज़्ज़ती नहीं करनी चाहिए
72-73: इंसानों ने समझ-बूझ और नैतिक मूल्यों की ज़िम्मेदारी उठाने की बात मानली
1: कभी-कभी विश्वास न करने वाले लोग मुहम्मद (सल्ल) को कुछ सुझाव दिया करते थे कि आप यह बात अगर मान लें तो हम आपकी बात मान लेंगे, कभी पाखंडी [मुनाफ़िक़] लोग भी ऐसे सुझावों को मान लेने की हिमायत करते थे कि ऐसा करने से बहुत सारे लोग आपके साथ हो जाएंगे, मगर ऐसी चीज़ें अक्सर ईमान की मर्यादा से बाहर होती थीं, इसलिए अल्लाह ने भी आप से कहा कि आप ऐसी बातों पर ध्यान न दें।
4: जो आदमी एक बार पूरे दिल से अल्लाह का हो रहा, वह उसकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ किसी दूसरे को ख़ुश करने की कोशिश कैसे कर सकता है? उसके पास दो दिल तो है नहीं!
6: संपत्ति के बंटवारे में ख़ून का संबंध रखनेवाले नज़दीकी रिश्तेदारों का हक़ ज़्यादा होता है, चाहे आपका संबंध किसी के साथ कितना ही अच्छा हो, लेकिन अगर वह आपका ख़ूनी रिश्तेदार नहीं है, तो उसे संपत्ति विरासत में नहीं दी जा सकती। इसी कारण मुँह बोले बेटे को भी संपत्ति में विरासत का हिस्सा नहीं दिया जा सकता। हाँ, उसे वसीयत करके कुछ संपत्ति ज़रूर दी जा सकती है जिसकी सीमा ज़्यादा से ज़्यादा एक तिहाई होगी।
7: अल्लाह ने नबियों से पक्का वचन लिया था कि वे उसके संदेश को लोगों तक ठीक-ठीक पहुँचा देंगे और उन्हें सीधा रास्ता दिखाएंगे। यही वजह है कि नबियों की ज़िम्मेदारी बहुत बड़ी होती है।
8: नबियों से यह वचन इसलिए लिया गया था ताकि लोगों तक अल्लाह का संदेश पहुँच जाए, और जब हिसाब के समय लोगों से पूछताछ हो, तो वे यह न कह सकें कि हमें तो ये बातें मालूम न थीं।
9: यहाँ से आयत 27 तक "अहज़ाब की जंग" के बारे में बताया गया है। हुआ यह था कि मदीना से निकाले गए यहूदियों के एक क़बीले "बनु नज़ीर" (जो ख़ैबर व सीरिया में बस गए थे) ने मक्का के विश्वास न करनेवालों [काफ़िरों] के साथ मिलकर एक साज़िश रची थी जिसमें तय हुआ था कि मक्का वाले अरब के कई सारे क़बीलों के साथ मिलकर मदीना पर हमला बोल दें। इस तरह, मक्का के बहुदेववादी अरब के कई क़बीलों की मिली-जुली सेना के साथ क़रीब 12 हज़ार से 15 हज़ार का लश्कर लेकर मक्का से रवाना हुए। जब मुहम्मद (सल्ल) को पता चला, तो उन्होंने सलमान फ़ारसी (रज़ि) के सुझाव पर मदीना के उत्तरी हिस्से में अपने बचाव के लिए एक साढ़े तीन मील लम्बी और पाँच गज़ गहरी खाई खुदवायी। हमला करने वाले दुश्मनों की संख्या क़रीब 4 गुना ज़्यादा थी और एक बात और पता लगी कि मदीना शहर से लगकर रहनेवाला यहूदियों का एक क़बीला बनु क़ुरैज़ा भी दुश्मनों से ख़ुफ़िया तौर से जा मिला है, जबकि उसने मुसलमानों के साथ शांति का समझौता कर रखा था। तेज़ जाड़े का मौसम था, दुश्मनों ने क़रीब एक महीने से खाई के बाहर घेरा डाल रखा था, खाने-पीने के सामान में कमी आ रही थी, हर समय पहरा दे देकर लोग थक गए थे, साथ में तीरों और पत्थरों का आदान-प्रदान होता रहता था। कड़ी परीक्षा की घड़ी इस तरह ख़त्म हुई कि अल्लाह ने दुश्मनों के लश्कर पर एक तेज़ बर्फ़ीली आँधी चला दी जिससे उनके ख़ेमे उखड़ गए, खाने की देगें उलट गईं, चूल्हे बर्बाद हो गए, और
सवारी के जानवर बिदककर भागने लगे। ऐसे में उन्हें अपनी घेराबंदी छोड़नी पड़ी, साथ में
अल्लाह ने फ़रिश्तों का लश्कर भी भेजा जिससे दुश्मनों में डर बैठ गया और वे वापस जाने के लिए मजबूर हो गए।
10: दुश्मन चारों ओर से जमा होकर आए थे, जैसे क़बीला क़ुरैज़ा, नज़ीर और ग़तफ़ान पूरब की तरफ से, और मक्का के क़ुरैश और छोटे क़बीले पश्चिम की तरफ़ से।
26: मदीना के मुसलमानों के साथ शांति का समझौता होने के बावजूद, यहूदियों के एक क़बीला बनु क़ुरैज़ा ने दुश्मनों के साथ मिलकर ख़ुफ़िया साँठ-गाँठ की और दुश्मनों की मदद की, और एक तरह से मुसलमानों के पीठ में छूरा घोंपा। इसीलिए अहज़ाब की लड़ाई ख़त्म होते ही मुहम्मद (सल्ल) ने बनु क़ुरैज़ा की घेराबंदी कर दी, क़रीब 25 दिनों तक वे अपने मज़बूत क़िले में बंद रहे, अंत में वे क़िले से नीचे उतरने और हथियार डालने पर मजबूर हो गए। इस क़बीले के धोखा देने के मामले के निपटारे के लिए अंत में दोनों पक्ष साद बिन मआज़ (रज़ि) के नाम पर तैयार हो गए, जो कि मदीना के औस क़बीले के सरदार थे और जिनके संबंध बनु क़ुरैज़ा के साथ काफ़ी दोस्ताना रहे थे। उन्होंने यह फ़ैसला दिया कि बनु क़ुरैज़ा के लड़ने वाले मर्दों को क़त्ल किया जाए, और औरतों व नाबालिग़ बच्चों को क़ैदी बनाया जाए। अत: इसी फ़ैसले पर अमल हुआ।
27: यहूदियों की बड़ी आबादी मदीना के उत्तर में स्थित ख़ैबर में आबाद थी, जो कि अंतत: 7 हिजरी/ 629 ई. में मुसलमानों के क़ब्ज़े में आ गया। इस तरह, उनकी ज़मीनें, उनके घर और उनके माल-असबाब मुसलमानों के हाथ आ गए।
28: अहज़ाब की जंग और बनु क़ुरैज़ा की घेराबंदी के बाद मुसलमानों की आर्थिक हालत में थोड़ा सुधार हुआ था, इसी को देखते हुए मुहम्मद (सल्ल) की बीवियों ने भी इच्छा ज़ाहिर की थी कि उनके खाने-ख़र्चे और रखरखाव में भी कुछ बढ़ोत्तरी होनी चाहिए, और इस सिलसिले में उन लोगों ने बादशाहों की बेगमों की मिसालें दी थीं जो बड़ी सजधज के साथ और कनीज़ों से घिरी रहती थीं। इन आयतों में साफ़ कर दिया गया है कि पैग़म्बर की
बीवियों को अपने सोचने का अंदाज़ बदलना होगा, उन्हें रसूल की आज्ञा मानते हुए सादा ज़िंदगी गुज़ारनी होगी जिसके नतीजे में उन्हें आख़िरत में अच्छा इनाम मिलेगा, लेकिन अगर उन्हें दुनिया की सज-धज चाहिए तो उन्हें रसूल से अलग होना होगा। जब मुहम्मद (सल्ल) ने अपनी बीवियों के सामने यह बात रखी, तो सभी बीवियों ने तंगी बर्दाश्त करते हुए उनके साथ रहने को ही पसंद किया।
32: रसूल की बीवियाँ आम औरतों से कहीं ऊँचा मक़ाम रखती हैं, अत: अगर वे बुराइयों से बचती रहें, तो उन्हें दोगुना पुण्य मिलेगा, लेकिन गुनाह करने पर सज़ा भी दोगुनी होगी। रसूल की बीवियों को मुसलमानों की माताएं क़रार दिया गया, और उनसे किसी और मर्द की शादी नाजायज़ कर दी गयी।
33: रसूल की बीवियों को जो घरों के अंदर रहने के लिए कहा गया है, इसका यह मतलब नहीं है कि ज़रूरत पड़ने पर भी घर से न निकलें, बल्कि जब निकलें, तो दूसरों के सामने अपनी सजधज और बनाव-शृंगार दिखाती न फिरें।
36: इस आयत में एक सामान्य बात कही गई है, लेकिन असल बात यह बतायी जाती है कि शादी-ब्याह के मामले में मदीना के मुसलमानों के बीच अभी भी "अमीरी-ग़रीबी और बड़ा ख़ानदान-छोटा ख़ानदान" जैसी सोच पायी जाती थी। मुहम्मद (सल्ल) चाहते थे कि लोग शादी के लिए केवल इन चीज़ों के चलते इंकार न करें। अत: उन्होंने अपने कई
सहाबियों [companions] के लिए अच्छे रिश्ते तय किए, मगर वे रिश्ते बराबरी के न होने के कारण उन लोगों को पसंद नहीं आए। लेकिन जब यह आयत उतरी, तो फिर उन लोगों ने इन रिश्तों को मान लिया।
इनमें सबसे अहम घटना हज़रत ज़ैद बिन हारसा से जुड़ी हुई है। ज़ैद मुहम्मद (सल्ल) के ग़ुलाम थे, जिन्हें आपने आज़ाद करके अपना मुँह बोला बेटा बना लिया था। मुहम्मद (सल्ल) ने ज़ैद की शादी का पैग़ाम अपनी फूफी की बेटी ज़ैनब के पास भेजा, लड़कीवालों और ख़ुद लड़की को भी यह रिश्ता पसंद नहीं आया, क्योंकि लड़की ऊँचे ख़ानदान से थीं और लड़का एक आज़ाद किया हुआ ग़ुलाम! बाद में उन लोगों ने मुहम्मद (सल्ल) की इच्छानुसार इस रिश्ते को मंज़ूरी दे दी।
37: ज़ैद पर मुहम्मद (सल्ल) ने एहसान करते हुए उसे अपना मुँह बोला बेटा बना लिया था। उस ज़माने में अरब के रिवाज के मुताबिक़ मुँह बोले बेटे को वे सारे अधिकार दिए जाते थे जो असली बेटे का हक़ होता था। मगर अल्लाह का क़ानून यह है कि मुँह से बोल देने से कोई किसी की माँ या बेटा नहीं हो जाता।
ज़ैद की शादी 4 हिजरी में ज़ैनब से हो तो गई थी, मगर मियाँ-बीवी के संबंध अच्छे नहीं थे, ज़ैद इस बात से दुखी रहते थे कि उनकी बीवी बातचीत में अक्सर अपने ऊँचे ख़ानदान की धौँस जमाया करती थीं। इस बीच अल्लाह ने मुहम्मद (सल्ल) को 'वही' द्वारा ख़बर
दी कि ज़ैद के अपनी बीवी ज़ैनब को छोड़ने के बाद आपको ज़ैनब से शादी करनी होगी। फिर जब ज़ैद ने अपनी बीवी को तलाक़ देने के सिलसिले में मुहम्मद (सल्ल) से सलाह-मशविरा किया, तब भी मुहम्मद (सल्ल) ने उसे रिश्ता न तोड़ने की सलाह देते हुए उसे बीवी का हक़ अदा करते रहने को कहा था। अल्लाह द्वारा ख़बर कर देने के बाद भी मुहम्मद (सल्ल) ने वह बात छुपाई क्योंकि वह जानते थे कि ज़ैनब से उनकी शादी होने पर समाज में एक धमाका हो जाएगा और लोगों को बातें बनाने का मौक़ा मिलेगा कि मुहम्मद (सल्ल) ने अपनी बहु से शादी कर ली। मगर हुआ यह कि अंतत: 5 हिजरी में ज़ैद ने अपनी बीवी को तलाक़ दे दिया, और अल्लाह की बात पूरी होकर रही। असल में इस शादी का मक़सद समाज में यह संदेश देना था कि चूँकि मुँह बोला बेटा असली बेटा नहीं होता, इसलिए उसकी तलाक़ दी हुई बीवी से शादी की जा सकती है।
40: चूँकि मुहम्मद (सल्ल) ने ज़ैद को अपना बेटा माना था, इसलिए उसे लोग "ज़ैद बिन मुहम्मद" कहते थे, लेकिन अब यह साफ़ हो गया कि मुँह बोले बेटे को अपना बेटा नहीं कहना है। वैसे हर एक ईमानवाले के लिए आप रूहानी बाप की हैसियत रखते हैं। चूँकि क़यामत तक आपके बाद अब कोई नबी नहीं होगा, इसलिए जाहिलियत के ज़माने की रस्मों को मिटाने की ज़िम्मेदारी भी आपकी ही है।
49: हाथ लगाने से पहले ही तलाक़ का मतलब यह है कि शादी के बाद अभी मियाँ-बीवी के बीच शारीरिक संबंध न बना हो, और अगर उससे पहले ही तलाक़ हो जाए, तो औरत को दूसरी शादी करने के लिए कोई "इद्दत" [waiting period] गुज़ारने की ज़रूरत नहीं है। अगर लड़के द्वारा मेहर की रक़म [bride-wealth] दे दी गई थी, तो ऐसी हालत में लड़की आधी मेहर रख लेगी।
कुछ विद्वान मानते हैं कि निकाह हो जाने के बाद अगर लड़की की "रुख़्सती" नहीं हुई है, और तलाक़ हो गई, तो दोबारा शादी के लिए इद्दत गुज़ारने की ज़रूरत नहीं। लेकिन अगर रुख़्सती हो गई, और मियाँ-बीवी को अकेले में साथ रहने का मौक़ा मिला, तो भले ही सेक्स न हुआ हो, तब भी औरत को इद्दत की अवधि [तीन माहवारी] गुज़ारनी होगी अगर तलाक़ हो जाए। बहरहाल, तलाक़ की सूरत में लड़की को कुछ तोहफ़ा [एक जोड़ा कपड़ा आदि] देकर भले तरीक़े से विदा करना चाहिए।
50: इस आयत में यह बताया गया है कि किस किस क़िस्म की औरतें मुहम्मद (सल्ल) की बीवी बन सकती हैं। यहाँ जो हुक्म दिए गए हैं, वे केवल नबी (सल्ल) के लिए ख़ास हैं। ऐसी औरतें जिन्हें मौक़ा मिलने पर भी वे हिजरत करके मदीना नहीं गईं, उनके साथ शादी वैध नहीं होगी। इसके साथ जो औरतें बिना मेहर लिए हुए ख़ुद शादी करना चाहें, तो उनके साथ बिना मेहर दिए भी शादी वैध होगी, यह हुक्म भी केवल नबी (सल्ल) के लिए ही है।
आम मुसलमान को एक समय में ज़्यादा से ज़्यादा चार शादी करने की इजाज़त है, लेकिन मुहम्मद (सल्ल) के लिए ऐसी कोई सीमा नहीं रखी गई। हज़रत ज़ैनब (रज़ि) से आप (सल्ल) की शादी के समय आपकी चार बीवियाँ मौजूद थीं, इसीलिए लोग बातें बना रहे थे, उसी के जवाब में यह आयत है। यहाँ एक बात ध्यान देने की है कि धार्मिक मामलों के साथ-साथ मुहम्मद (सल्ल) एक शासक भी थे और कई बार कूटनीति को ध्यान में रखकर भी शादियाँ होती थीं, जिस क़बीले और ख़ानदान की बेटियों से शादी के रिश्ते बँध जाते थे, उनकी तरफ़ से दुश्मनी का रास्ता भी आम तौर पर बंद हो जाता था और वे आगे के लिए दोस्त बन जाते थे।
यह बात भी याद रखनी चाहिए मुहम्मद (सल्ल) जब 25 वर्ष के थे तो उन्होंने एक 40 साल की विधवा ख़दीजा (रज़ि) से शादी की थी और पूरे 25 साल तक वही आपकी पत्नी थी, उनके मरने के बाद, फिर उन्होंने एक और बड़े उम्र की विधवा, सौदा (रज़ि) से शादी की, और अगले चार साल तक केवल वही आपकी बीवी रहीं, इस तरह, अपने जीवन के 53 साल तक उनकी एक ही बीवी रही थीं। इसलिए ऐसा सोचना कि इतनी उम्र गुज़र जाने के बाद अचानक उन्हें ज़्यादा बीवियों की इच्छा जाग गई थी, बिल्कुल ही ग़लत है।
51: जिन मुसलमानों के पास एक से ज़्यादा बीवियाँ हैं, उनके लिए ज़रूरी है कि पारी के हिसाब से हर बीवी के साथ वह बराबर रातें गुज़ारे, मगर इस मामले में भी मुहम्मद (सल्ल) को छूट दी गई कि वह चाहें तो किसी बीवी की पारी को आगे-पीछे कर सकते हैं, हालाँकि बताया जाता है कि उन्होंने इस छूट का कभी भी फ़ायदा नहीं उठाया।
69: मुहम्मद (सल्ल) की हज़रत ज़ैनब (रज़ि) से शादी के बाद (33: 37) जो लोग आपके बारे में तरह-तरह की दिल दुखाने वाली बातें कह रहे थे, उन्हें यहाँ मना किया गया है, और
बताया गया है कि वे इसराईल की संतानों की तरह न हो जाएं जिन लोगों ने हज़रत मूसा
(अलै) को तरह-तरह से सताया था। यहाँ तक कि मूसा (अलै) जो कि एक शर्मीले आदमी थे और अपना जिस्म कभी नहीं दिखाते थे, इससे कुछ लोगों को यह ग़लतफ़हमी हो गई थी कि उनके शरीर में ज़रूर कोई गड़बड़ी है, फिर एक दिन ऐसा हुआ कि जब वह नहा रहे थे तो उनके कुछ माननेवालों की अचानक उन पर नज़र पड़ गई और तब जाकर लोगों का शक दूर हुआ।
59: यहाँ सभी मुसलमान औरतों को घर से बाहर निकलते समय चादर ओढ़कर निकलने को कहा गया है, ताकि यह पता चले कि ये शरीफ़ व इज़्ज़तदार औरतें हैं, और उनमें और लौंडियों/दासियों में अंतर साफ़ पता चल सके जिससे कोई उनसे छेड़छाड़ न कर सके। चादर ऐसी हो जिससे पूरा जिस्म ढक सके, हाँ उसे कैसे और कितना ओढ़ना है, यह बहस का मुद्दा रहा है। हालाँकि जो शब्द आए हैं उसका मतलब तो यही है कि चादर का पल्लू नीचे तक लटकता रहे। कुछ विद्वानों का मानना है कि यह आयत एक ख़ास हालत में उतरी थी जो कि उस समय मदीना में पायी जाती थी, और जिसका आम हालत में पर्दा करने से कोई संबंध नहीं है। उस समय घरों में शौचालय नहीं थे और औरतें भोर या रात में ज़रूरत के लिए शहर से किनारे जाया करती थीं। वहाँ कुछ आवारा और बदचलन लोग थे जो आती-जाती मुसलमान औरतों के साथ छेड़खानी करते, उनके बारे में तरह-तरह की झूठी अफ़वाहें उड़ाते, और स्कैंडल खड़ा करने की कोशिश में लगे थे। जब उन्हें एकाध बार पकड़ा गया तो उन्होंने यह बहाना किया वह उन्हें अपनी घर की औरतें समझकर उनसे मज़ाक़ कर रहे थे। इसी बुराई को रोकने के लिए इस आयत में सभी मुसलमान औरतों को चादर ओढ़कर बाहर निकलने को कहा गया है ताकि उनकी अलग पहचान की जा सके और वे छेड़खानी से बच सकें, अगर इस पर भी बदमाशों ने अपनी हरकत नहीं छोड़ी तो आगे उन्हें सख़्त सज़ा देने के लिए कहा गया है। जब हालात ठीक हो गए तो सभी औरतों को इस तरह चादर ओढ़कर बाहर निकलने की ज़रूरत नहीं रही।
61: यहाँ मदीना के पाखंडी [मुनाफ़िक़] लोगों को चेतावनी दी गई है कि वे जो बुरे और ग़लत काम में लगे हुए हैं जिनमें ख़ास तौर से शरीफ़ औरतों को छेड़ने और बेबुनियाद अफवाहें फैलाने से अगर नहीं रुके, तो उनके ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई होगी।
72: यहाँ अमानत [Trust] का मतलब है "बिना किसी दबाव के अपनी मर्ज़ी से अल्लाह की आज्ञाओं का पालन करने की नैतिक ज़िम्मेदारी लेना।" अल्लाह ने जब अपनी सृष्टि के सामने यह प्रस्ताव रखा कि हमारे बहुत से आदेश ऐसे होंगे जिन्हें कोई चाहे तो अपनी मर्ज़ी से मानते हुए उन पर अमल करे और चाहे तो उन आदेशों को न माने, पहली सूरत में जो आदेशों को मानते हुए अमल करेगा, उसे जन्नत में हमेशा रहने का इनाम मिलेगा, और जो
आदेशों को नहीं मानेगा, उसे जहन्नम मिलेगी। इस प्रस्ताव को सुनकर आसमान, ज़मीन और पहाड़ों ने इस अमानत की ज़िम्मेदारी लेने से मना कर दिया क्योंकि आदेश न मानने पर उन्हें जहन्नम की यातना का डर था।
आदमी ने यह ज़िम्मेदारी उठाने का प्रस्ताव मान तो लिया, मगर असल में अल्लाह के हुक्मों को मानते हुए उस पर पूरी तरह से अमल न कर सका, ख़ासकर वे लोग जो विश्वास नहीं रखते [काफिर] और जो विश्वास करने का पाखंड करते हैं [मुनाफ़िक़]