Saturday, July 14, 2018

सूरह 22 : अल-हज्ज [हज / The Pilgrimage]

सूरह 22: अल-हज्ज 
[हज/The Pilgrimage]


01-04: आख़िरी दिन 

05-07: दोबारा ज़िंदा उठाया जाना तय है 

08-13: कुछ लोगों के ईमान में स्थिरता नहीं होती 

14-16: विश्वास करने वाले और विश्वास से इंकार करने वाले की तुलना 

17-18: धार्मिक समुदायों के बीच अल्लाह फ़ैसला कर देगा 

19-24: विश्वास रखनेवालों और इंकार करने वालों के अंजाम की तुलना 

25  : पवित्र मस्जिद [काबा] से रोकने वालों को दंड 

26-29: इबराहीम (अलै) ने हज की घोषणा 

30-33: हज से जुड़े नियम-क़ायदे 

34-38: जानवरों की क़ुर्बानी 

39-41: विश्वास न करने वालों के ख़िलाफ़ लड़ने की अनुमति 

42-51: पिछली पीढ़ियों को सज़ा: एक चेतावनी 

52-54: रसूलों के काम में शैतान की फ़ितना डालने की कोशिश 

55-57: फ़ैसले का दिन 

58-60: घर छोड़कर मदीना आने वाले [मुहाजिर] 

61-66: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ 

67-70: हर मज़हब में इबादत [पूजा] करने का तरीक़ा अलग-अलग 

71-72: विश्वास करने से इंकार करने वालों का अंजाम 

73-74: झूठे ख़ुदाओं में कोई ताक़त नहीं 

75-76: अल्लाह अपने संदेश भेजने के लिए रसूलों को चुनता है 

77-78: ईमानवालों का उत्साह बढ़ाया गया 


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यन्त दयावान है
ऐ लोगो! अपने रब की यातना से डरो, क्योंकि (क़यामत की) अंतिम घड़ी में जो भूचाल होगा वह बड़ी ज़बरदस्त घटना होगी: (1)
(जिस दिन वह घड़ी आ जाएगी) उस दिन तुम देखोगे: हर एक दूध पिलानेवाली माँ अपने दूध पीते बच्चे को भूल जाएगी, हर एक गर्भवती औरत अपना गर्भ (समय से पहले) गिरा देगी। लोगों को देखकर तुम्हें लगेगा कि वे नशे में मदहोश हैं जबकि वे नशे में न होंगे, अल्लाह की यातना इतनी दिल दहला देने वाली होगी। (2)
इसके बावजूद कुछ ऐसे भी हैंं जो बिना जाने-बूझे अल्लाह के बारे मेंं झगड़ा करते हैं, और हर बाग़ी शैतान के पीछे चल पड़ते हैं, (3)
जबकि शैतान के लिए यह बात लिख दी गयी है कि जो कोई उसका दोस्त हुआ, उसे वह ज़रूर सीधे रास्ते से भटका देगा, और उसे (जहन्नम की) भड़कती आग तक पहुँचा कर रहेगा। (4)

लोगो! अगर तुम्हें (मर के) दोबारा जी उठने के बारे में कोई सन्देह हो तो (याद रखो!), कि हमने तुम्हें (पहले) मिट्टी से पैदा किया, फिर वीर्य [sperm] की बूंद से, जो फिर जोंक की तरह सटी हुई चीज़ बन जाती है, फिर गोश्त का लोथड़ा बन जाता है जिसमें (कभी) पूरी शक्ल बन जाती है और (कभी) पूरी नहीं बनती: यह इसलिए कि हम चाहते हैं कि हमारी शक्ति व क़ुदरत (के करिश्मे) तुम्हारी समझ में ठीक से आ जाएं। फिर जिस वीर्य को हम चाहते हैं, उसे (औरत के) गर्भ में एक नियत समय तक ठहराए रखते हैं, फिर तुम्हें एक बच्चे के रूप में बाहर लाते हैं और फिर तुम बड़े होते हुए अपनी जवानी की अवस्था को पहुँच जाते हो। तुममें से कुछ लोग तो (बुढ़ापे से) पहले ही मर जाते हैं, और कुछ लोग (बुढ़ापे की) इतनी उम्र तक ज़िंदा बचे रहते हैं कि जो कुछ वे जानते थे, सब भुला बैठते हैं। कभी कभी तुम देखते हो कि ज़मीन सूखी-बेजान पड़ी है, फिर जब हम उसपर पानी बरसा देते हैं, तो अचानक लहलहाने और उभरने लगती है और उसमें हर क़िस्म की ख़ुशनुमा चीज़े उग आती हैं:   (5)
ऐसा इसलिए है कि अल्लाह ही सच्चाई है; वह मुर्दों को फिर से ज़िंदा करता है; उसे हर चीज़ करने की ताक़त है। (6)

इस बात में कोई संदेह नहीं कि क़यामत की घड़ी आकर रहेगी, और न इसमें कोई शक है कि अल्लाह मुर्दों को उनकी क़ब्रों से उठा खड़ा करेगा,  (7)
कुछ लोग ऐसे हैं कि न तो उनके पास ज्ञान है, न किसी तरह का मार्गदर्शन है, और न ही ज्ञान की रौशनी देने वाली किताब है, तब भी वे अल्लाह के बारे में झग़ड़ा करते हैं, (8)
घमंड से अपने पहलू मोड़ लेते हैं, ताकि दूसरों को अल्लाह के मार्ग से भटका दें। ऐसे आदमी के लिए दुनिया में भी बेइज़्ज़ती है, और क़यामत के दिन हम उसे आग में जलने का मज़ा चखाएँगे। (9)
(उनसे कहा जाएगा), "यह सब तेरे उन करतूतों का नतीजा है जो ख़ुद तेरे हाथों ने जमा कर रखा है: अल्लाह अपने बंदों पर कभी ज़ुल्म करने वाला नहीं है। (10)

और (देखो!), कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अल्लाह की बंदगी तो करते हैं, मगर उनके ईमान में स्थिरता नहीं होती: अगर उन्हें (दुनिया में) कोई फ़ायदा पहुँच गया, तो वे उससे सन्तुष्ट हो गए, लेकिन अगर उनकी परीक्षा ली गयी, तो उल्टे पाँव (इंकार करने की) हालत पर लौट आएं, (इस तरह) दुनिया भी हार बैठे और आने वाली दुनिया भी हाथ से निकल गयी---- यह बात साफ़ है कि यही बहुत बड़ा घाटा है।  (11)
वे अल्लाह को छोड़कर (ज़रूरत के समय) उसे पुकारते हैं, जो न उन्हें नुक़सान पहुँचा सके और न उनकी मदद कर सके------ सही रास्ते से बहुत दूर भटक जाना यही है-----  (12)
या वे ऐसे (झूठे ख़ुदा) को पुकारते हैं जिससे फ़ायदा होने के बजाए कहीं अधिक नुक़सान होना तय है। कितना बुरा मददगार है और कितना बुरा साथी है वह! (13)
मगर जिन लोगों ने विश्वास रखा और अच्छे कर्म किए, उन्हें अल्लाह ऐसे बाग़ों में दाखिल करेगा, जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी। अल्लाह जो चाहता है, करता है।  (14)
जो कोई (निराश होकर) ऐसा सोचता है कि अल्लाह दुनिया और आख़िरत [परलोक] में उसकी कोई मदद करने वाला नहीं, तो उसे चाहिए कि वह छत से एक रस्सी तान ले और (अपने आपको फाँसी लगाकर) ज़मीन से अपना रिश्ता काट दे, फिर देखे कि उस उपाय से उसका ग़ुस्सा दूर होता है कि नहीं।  (15)
(देखो), इस तरह हम इस (क़ुरआन) को स्पष्ट संदेशों के रूप में उतार भेजते हैं, और अल्लाह जिसे चाहता है, सही रास्ते पर लगा देता है। (16)

रहे वे लोग जो ईमान रखते हैं, जो यहूदी मत के मानने वाले हैं, जो साबी [Sabians] हैं, जो ईसाई हैं, जो मजूसी [Magians] हैं, और जो मुशरिक [बहुदेववादी /Idolaters] हैं, अल्लाह क़यामत के दिन इन सबके बीच फ़ैसला कर देगा; अल्लाह सब कुछ देखता है। (17)
[ऐ रसूल] क्या आप नहीं समझते कि आसमानों और ज़मीन की हर चीज़ अल्लाह (के हुक्म) के सामने झुकी रहती है: सूरज, चाँद, तारे, पहाड़, पेड़, और जानवर? और बहुत सारे आदमी भी (सज्दे में झुके रहते हैं), मगर हाँ, बहुत-से आदमी ऐसे भी हैं जो इसी लायक़ हैं कि उन्हें सज़ा मिलनी ही चाहिए। और जिसे अल्लाह बेइज़्ज़त कर दे, तो उसे इज़्ज़त देने वाला कोई नहीं: अल्लाह जो चाहता है, करता है। (18)
ये (ईमानवाले और काफ़िर) दो तरह के आदमी हैं जो अपने रब के बारे में मतभेद रखते हैं। जो लोग विश्वास नहीं करते, उनके पहनने के लिए आग का कपड़ा होगा; उनके सिरों पर खौलता हुआ पानी डाला जाएगा, (19)
इससे उनके पेट के अंदर की चीज़ें भी गल उठेंगी और उनके बदन के चमड़े भी; (20)
उन्हें क़ाबू में रखने के लिए लोहे की छड़ियाँ होंगी; (21)
जब कभी वे परेशान होकर उससे निकल भागना चाहेंगे, तो वे उसी में वापस धकिया दिये जाएंगे और कहा जाएगा, "अब आग में जलने का मज़ा चखो!" (22)
मगर जो लोग ईमान रखते हैं और उन्होंने अच्छे कर्म किए, तो अल्लाह उन लोगों को ऐसे बाग़ों में दाखिल करेगा जिनके नीचें नहरें बह रही होंगी; वहाँ वे सोने के कंगनों और मोतियों से सजाए जाएँगे; उनके पहनने के लिए वहाँ रेशमी कपड़ा होगा।  (23)
उन्हें ऐसी बात की तरफ़ ले जाया गया था जो अच्छी व पाकीज़ा बात थी, और उन्हें ऐसे रास्ते पर चलाया गया था जो उस (ख़ुदा) का रास्ता है जो सारी तारीफ़ों के लायक़ है। (24)

रहे वे लोग जिन्होंने विश्वास करने से इंकार किया, जो दूसरों को अल्लाह के मार्ग से और पवित्र मस्जिद [काबा] से रोकते हैं---- जिसे हमने सारे लोगों (की इबादत) के लिए एक समान बनाया है, चाहे वहाँ का निवासी हो या बाहर से आया हो ---- और (याद रहे कि) जो कोई ज़ुल्म करके इन (नियमों) को तोड़ने की कोशिश करेगा, उसे हम दर्दनाक सज़ा का मज़ा चखाएँगे। (25)
(याद करो!) जब हमने इबराहीम को उस (पवित्र) घर [काबा] की जगह दिखायी और कहा था, "मेरे साथ किसी चीज़ को (मेरी ख़ुदायी में) साझेदार [Partner] न ठहराना। मेरे घर को उन लोगों के लिए पाक-साफ़ रखना जो इसके गिर्द फेरा [तवाफ़] लगाते हैं, जो इबादत के लिए खड़े होते हैं, और जो रुकू [bow] और सज्दे [prostrate] में झुकते हैं। (26)
(और हुक्म दिया था कि) लोगों के बीच हज करने की घोषणा कर दो। वे (दूर दूर से) गहरे पहाड़ी दर्रों से होते हुए तेरे पास आया करेंगे, पैदल भी और हर तरह की तेज़ सवारियों पर भी,   (27)
ताकि वे यहाँ आने का फ़ायदा उठा सकें, और निर्धारित दिनों में, जो चौपाए अल्लाह ने उन्हें दे रखे हैं, उनपर अल्लाह का नाम लें (और उनकी क़ुर्बानी कर) सकें ------- फिर उस (क़ुर्बानी के गोश्त) में से ख़ुद भी खाओ और ग़रीब-बदहाल लोगों को भी खिलाओ---- (28)
फिर (हज में आए हुए) लोगों को चाहिए कि साफ़-सुथरे हो जाएं, अपनी मन्नतें पूरी करें और इस पुराने घर [काबा] का (सात बार) चक्कर [तवाफ़] लगाएं।" (29)
ये सारी चीज़ें [अल्लाह ने आदेश की हैं]: जो कोई अल्लाह द्वारा तय की गयी मर्यादाओं का आदर करेगा, तो वह अपने रब से इसका बहुत अच्छा बदला पायेगा।

तुम्हारे लिए सारे चौपाए हलाल [lawful] कर दिए गए हैं, सिवाए उनके जिनके बारे में ख़ास तौर से मना किया गया है। मूर्तिपूजा से जुड़ी धारणाओं और रीतियों (जैसे चौपाया जानवरों को मूर्तियों पर बलि चढ़ाए जाने) की गन्दगी से बचकर रहो, और झूठी बातों से भी बचते रहो। (30)
पूरी भक्ति से अल्लाह के ही सामने झुको और उसके साथ किसी को (उसकी ख़ुदायी में) साझेदार [Partner] न ठहराओ, क्योंकि जिस किसी ने ऐसा किया, तो उसका हाल ऐसा होगा जैसे उसे आसमानों से नीचे फेंक दिया गया हो और उसे (हवा में) कोई पक्षी उचक ले जाए, या हवा का झोंका उसे किसी दूर-दराज़ इलाक़े में ले जाकर फेंक दे।  (31)
ये सारी चीज़ें (अल्लाह के हुक्म से होती हैं): जो लोग अल्लाह की रीतियों [rituals] को मानते हुए उसका आदर करते हैं, तो ये (चीज़ें) उनके दिलों में बुराइयों से बचने की भावना को दिखाती हैं।  (32)
एक नियत समय तक चौपाये तुम्हारे लिए बहुत फ़ायदे के हैं। उसके बाद उन्हें पुराने घर [काबा] के पास क़ुर्बानी के लिए ले जाना है: (33)
(और देखो!) हर समुदाय के लिए हमने भक्ति का तरीक़ा तय कर दिया कि जब वे हमारे दिए हुए पालतू चौपायों (को काटकर खाना चाहें, तो उन) पर अल्लाह का नाम ले लें: तुम्हारा अल्लाह तो एक ही है, अत: पूरी भक्ति से उसी के हो रहो, (ऐ रसूल!), आप विनम्र लोगों को (कामयाबी की) अच्छी ख़बर दे दें, (34)
जब कभी ऐसे (नेक) लोगों के सामने अल्लाह का ज़िक्र किया जाता है, तो उनके दिल दहल उठते हैं, जो भी मुसीबत उन पर आती है, उस पर धीरज से काम लेते हैं, जो नमाज़ को पूरी पाबंदी से पढ़ने में लगे रहते हैं, और जो कुछ रोज़ी हमने उन्हें दे रखी है उसे (सही रास्ते में) ख़र्च करते रहते हैं। (35)

(और देखो, क़ुर्बानी के) ऊँटों को हमने तुम्हारे लिए अल्लाह की पवित्र निशानियों में से बनाया है। तुम्हारे लिए उनमें बहुत सी अच्छाइयाँ हैं। अतः जब वे कुर्बानी के लिए क़तार में खड़े किए जाएं, तो उनपर अल्लाह का नाम लो, फिर जब वे (ज़बह होकर) गिर पड़ें, तो उनके गोश्त में से ख़ुद भी खाओ औऱ साथ में उनको भी खिलाओ, जो चाहे मांगते हों या न मांगते हों। इस तरह हमने इन (जानवरों) को तुम्हारे वश में कर दिया है, ताकि तुम शुक्र अदा करने वाले बन जाओ।  (36)
(याद रहे! क़ुर्बानी के जानवर का) न तो गोश्त और न ही ख़ून अल्लाह तक पहुँचता है, वहां अगर कुछ पहुंचता है तो वह तुम्हारे दिल की नेकी [तक़वा /paiety] है! उसने इन (जानवरों) को इस तरह तुम्हारे वश में कर दिया है कि जो सही रास्ता अल्लाह ने तुम्हें दिखाया है, उस पर शुक्र अदा करो, और अल्लाह की बड़ाई बयान करो।

जो लोग अच्छा काम करते हैं, उन्हें (सच्चाई क़बूल करने की) ख़ुशख़बरी सुना दो: (37)
ईमान रखनेवालों को अल्लाह (ज़ालिमों से) बचा लेगा; अल्लाह ऐसे लोगों को पसंद नहीं करता जो न विश्वास करने योग्य हों और न ही (नेमतों के लिए) शुक्र अदा करते हों। (38)
जिन (ईमानवाले) लोगों पर हमला किया गया है, उन्हें हथियार उठाने की अनुमति दी जाती है, क्योंकि उन पर साफ़ तौर से ज़ुल्म किया गया है ----- अल्लाह उनकी मदद करने की पूरी ताक़त रखता है।  (39)
वे लोग जो अपने घरों से बिना किसी हक़ के, केवल इसलिए भगा दिए गए कि वे कहते थे, "हमारा रब अल्लाह है।" अगर अल्लाह एक-दूसरे के द्वारा कुछ लोगों को हटाता न रहता तो बहुत सारी मठें [Monasteries], गिरजाघर [churches], यहूदियों की इबादतगाहें [Synagogues] और मस्जिदें, जिनमें अल्लाह के नाम का ज़िक्र बार-बार किया जाता है, सब बर्बाद कर दी जातीं। अल्लाह ऐसे लोगों की मदद ज़रूर करेगा, जो उसकी (सच्चाई के पक्ष में) मदद करते हैं ---- अल्लाह बड़ा मज़बूत, बेहद ताक़तवाला है ---- (40)
ये वह लोग हैं, जिनके क़दम जब हम ज़मीन पर मज़बूती से जमा (कर हुकूमत दे) देते हैं, तो वे नमाज़ का आयोजन करते हैं, निर्धारित ज़कात [alms] देते हैं, भलाई के कामों का हुक्म देते हैं, बुराई से रोकते हैं: सारे मामलों का नतीजा अल्लाह के ही हाथ में है। (41)

[ऐ रसूल], अगर वे आपको झूठा कहकर ठुकराते हैं, तो आपसे पहले नूह [Noah] की क़ौम के लोगों ने भी ऐसा किया था, और ऐसा ही आद [Aad], समूद [Thamud],  (42)
इबराहीम [Abraham], लूत [Lot], मदयन [Midian] की क़ौम के लोग भी कर चुके हैं। (43)
मूसा [Mose] को भी झूठा कहा गया था। मैंने विश्वास न करने वालों को थोड़े समय के लिए ढील दी, मगर अंत में मैंने उन्हें सज़ा दी। तो (देखो) मेरी पकड़ उनके लिए कैसी थी कि बेकार होकर रह गए! (44)
कितनी ही बस्तियाँ हम बर्बाद कर चुके हैं जो ज़ुल्म करने वाली थीं, हम ने उन्हें पूरी तरह खंडहर बना के छोड़ दिया; कितने ही वीरान पड़े हुए कुएँ; कितने ही ऊँचे-ऊँचे महल! (45)
क्या ये (मक्का के) लोग ज़मीन पर एक जगह से दूसरी जगह चले फिरे नहीं कि सीख ले पाते? उनके पास दिल होते और समझते-बूझते, कान होते और कुछ सुन पाते? असल में लोगों की आँखें अंधी नहीं हुई हैं, बल्कि उनके सीनों में जो दिल हैं, वे अंधे हो गए हैं। (46)

(ऐ रसूल), वे आपसे यातना जल्दी ले आने की चुनौती दे रहे हैं। ऐसा हो नहीं सकता कि अल्लाह अपना वादा पूरा न करे ----- मगर आपके रब के यहाँ एक दिन, तुम लोगों की गिनती में एक हजार साल जैसा है। (47)
कितनी ही बस्तियाँ थीं जो ग़लत कामों में डूबी हुई थीं जिनको मैंने कुछ और मुहलत दी, फिर उन्हें (पकड़ लिया और) मिटाकर रख दिया: अंत में उन सबको मेरी ही पास लौटकर आना है। (48)

[ऐ रसूल!] आप कह दें, "ऐ लोगो! मैं केवल इसीलिए भेजा गया हूँ कि तुम्हें (इंकार व बुरे कर्मों के नतीजे से) साफ़ व स्पष्ट ढंग से सावधान कर दूँ।" (49)
फिर जिन लोगों ने विश्वास किया और अच्छे कर्म किए, उनकी ग़लतियों को माफ़ कर दिया जाएगा और उनके लिए इज़्ज़त की रोज़ी होगी। (50)
लेकिन जो लोग हमारे संदेशों का विरोध करने में लगे रहे और उन्होंने हमें हरा देने की बेकार कोशिश की, उनके भाग्य में (जहन्नम की) आग में जाना लिखा है।  (51)
[ऐ रसूल], हमने आपसे पहले कभी कोई रसूल और नबी [Prophet] ऐसा नहीं भेजा कि जब भी उसने (सुधार करने की) कामना की हो, और शैतान ने उसमें कोई फ़ितना डालने की कोशिश न की हो। मगर अल्लाह शैतान के फ़ितनों [insinuations] को दूर कर देता है, और फिर अल्लाह अपने संदेशों [निशानियों] को और मज़बूत बना देता है। अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, और बड़ी समझ-बूझ रखनेवाला है। (52)
शैतान के फितनों को अल्लाह केवल उन लोगों के लिए आज़माइश बना देता है, जिनके दिलों में रोग है और जिनके दिल (सच्चाई के विरोध में) कठोर हो गये हैं--- ज़ुल्म करने वाले (सच्चाई के) ज़बरदस्त विरोधी हैं----- (53)
और जिन्हें ज्ञान मिला है, अल्लाह चाहता है कि वे जान लें कि जो आयतें उतरी हैं, ये सच्चाई हैं जो तुम्हारे रब की तरफ़ से आयी हैं, ताकि वे इस पर विश्वास कर सकें और उसके सामने उनके दिल झुक जाएँ: अल्लाह ईमान रखने वालों को सीधा मार्ग दिखा देता है। (54)
विश्वास न करने वाले उस वक्त तक संदेह मे ही डूबे रहेंगे, जब तक कि क़यामत की घड़ी अचानक उनपर न आ जाए या एक ऐसे दिन की यातना उनपर न आ पहुँचे जिस दिन सारी आस टूट जाए। (55)
उस दिन सारा नियंत्रण व बादशाही अल्लाह ही की होगी: वह उन सब के बीच फ़ैसला कर देगा। जिन लोगों ने विश्वास किया और अच्छे कर्म किए, वे ख़ुशियों भरे बाग़ों (जन्नतों) में दाख़िल किए जाएंगे,  (56)
और जिन लोगों ने विश्वास करने से इंकार किया और हमारी आयतों कोे झूठ समझते हुए ठुकरा दिया, उनके लिए अपमानित कर देने वाली यातना होगी। (57)

अल्लाह उन लोगों को (परलोक में) दिल खोलकर रोज़ी देगा, जो अल्लाह के रास्ते में घर-बार छोड़कर (मदीना) चले आए, फिर मारे गए या जिनकी मौत हो गयी। और अल्लाह ही सबसे बेहतर रोज़ी देने वाला है। (58)
वह उन्हें ऐसी जगह पहुँचा देगा जिससे वे ख़ुश हो जाएँगे: अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, बेहद सहनशील है। (59)
ये बात तय है कि अगर एक आदमी किसी (दुश्मन) के आक्रामक रवैये का ठीक वैसा ही बदला ले जैसा उसके साथ किया गया हो, और उसके बाद (उसका दुश्मन) उस पर फिर ज़ुल्म करने लग जाए, तो अल्लाह उस (निर्दोष) की ज़रूर मदद करेगा: अल्लाह (बुराइयों को) अनदेखा करने वाला, बहुत माफ़ करने वाला है। (60)
ऐसा इसलिए है कि अल्लाह ही है जो रात को दिन से मिला देता है और दिन को रात से मिला देता है, और यह कि अल्लाह सब कुछ सुनता, सब कुछ देखता है। (61)
ऐसा इसलिए भी है कि अकेला अल्लाह ही है जो सच्चाई है, और उसके सिवा वे जिस किसी को पुकारते हैं, निरा झूठ व मिथ्या हैं: वह अल्लाह है जो सबसे ऊँचा, सबसे महान है। (62)

(ऐ रसूल!), क्या आपने ध्यान नहीं दिया कि कैसे हम आसमान से पानी बरसाते हैं और अगले दिन (सूखी) ज़मीन हरी-भरी होकर लहलहाने लगती है? अल्लाह सचमुच बहुत बारीक नज़र रखने वाला, हर चीज़ की ख़बर रखने वाला है; (63 )
आसमानों और ज़मीन की हर चीज़ उसी की है; केवल अल्लाह ही है जो किसी पर निर्भर नहीं, हर तरह की तारीफ़ों के लायक़ है। (64)
क्या तुमने ध्यान नहीं दिया कि कैसे अल्लाह ने ज़मीन की हर एक चीज़ को तुम्हारे काम में लगा रखा है? कि उसी के हुक्म से समंदर में जहाज़ चलते हैं? उसने आसमानों को इस तरह रोक रखा है कि बिना उसकी अनुमति के वे ज़मीन पर नहीं गिर सकते। अल्लाह इंसानों के लिए बड़ा तरस खानेवाला, बेहद दयावान है----- (65)
वही है जिसने तुम (लोगों) को ज़िन्दगी दी, वही तुम्हें मौत देगा, और फिर वही तुम्हें दोबारा ज़िंदा करने वाला है---- मगर आदमी सचमुच शुक्र अदा करने वाला नहीं है। (66)

हर समुदाय के लिए हमने इबादत (पूजा-पाठ) करने का तरीक़ा तय कर रखा है, जिसका पालन उसके लोग करते है, अतः इस मामले में उन्हें (ऐ रसूल) आपसे झगड़ने की ज़रूरत नहीं है। आप उन्हें अपने रब की ओर बुलाएं---- आप बिल्कुल सीधे मार्ग पर हैं---- (67)
और अगर (इस पर भी) वे आपसे झगड़ा करें तो कह दें, "तुम जो कुछ कर रहे हो अल्लाह उसे अच्छी तरह से जानता है।” (68)
तुम जिन बातों में आपस में एक दूसरे से झगड़ा करते रहते हो, क़यामत के दिन अल्लाह तुम्हारे बीच फ़ैसला करके हक़ीक़त साफ़ कर देगा। (69)
(ऐ रसूल), क्या आपको मालूम नहीं कि वे सारी चीज़ें जो आसमानों और ज़मीन में हैं, उन्हें अल्लाह जानता है? ये सारी चीज़ें एक किताब में लिखी हुई हैं; यह अल्लाह के लिए बहुत आसान है। (70)

तब भी ये लोग अल्लाह को छोड़कर उन चीज़ों की बंदगी करते हैं जिनके लिए न तो उसने कोई प्रमाण [authority] भेजा, और न तो उनके पास (आसमानी) ज्ञान की कोई रौशनी है: (याद रहे) कोई न होगा जो शैतानी करने वालों की मदद कर सके।  (71)
[ऐ रसूल!], जब हमारे संदेश उनके सामने साफ़-साफ़ पढ़कर सुनाए जाते हैं, तो विश्वास न करने वालों के चेहरों पर आप दुश्मनी के भाव साफ़ देख सकते हैं: ऐसा लगता है मानो हमारी आयतों को सुनाने वालों पर ये हमला कर बैठेंगे। कह दें, "क्या मैं तुम्हें बता दूँ कि तुम जैसा अभी महसूस कर रहे हो, इससे कहीं बुरी चीज़ क्या है? 'आग' है वह! जिसका वादा अल्लाह ने विश्वास न करने वालों के लिए कर रखा है! क्या दुख भरा अंत है यह!"  (72)
ऐ लोगों! एक मिसाल पेश की जाती है, उसे ध्यान से सुनो: अल्लाह को छोड़कर तुम (ज़रुरत के समय) जिन्हें पुकारते हो, वे एक मक्खी भी पैदा नहीं कर सकते चाहे वे अपनी सारी ताक़तें एक साथ जोड़ भी लें, और अगर मक्खी उनसे कोई चीज़ छीन ले जाए तो वे उसके चंगुल से उसको छुड़ा भी नहीं सकते। कितने बेबस और असहाय हैं मदद मांगने वाले और कितने कमज़ोर हैं ये जिनसे मदद माँगी जाती है! (73)
उन्होंने असल में अल्लाह के सही मक़ाम [True measure] को पहचाना ही नहीं: अल्लाह सचमुच बहुत मज़बूत, बेहद प्रभुत्वशाली है। (74)

अल्लाह फ़रिश्तों में से भी संदेश पहुँचाने वाले को चुनता है और इंसानों में से भी। अल्लाह हर बात सुनता है, हर चीज़ देखता है:  (75)
वह जानता है जो कुछ उनके आगे होने वाला है और जो कुछ उनके पीछे हो चुका है। और सारे मामले अल्लाह ही की ओर लौटकर आते हैं। (76)
ऐ ईमानवालो! (अल्लाह के सामने) रुकू में झुको, (माथा टेकते हुए) सज्दे में झुको, और अपने रब की बंदगी करो, और अच्छा व नेक काम करो ताकि तुम कामयाब हो सको। (77)
अल्लाह के रास्ते में जान लड़ा दो, (उसके रास्ते में) जान लड़ाने का जो हक़ है, उसे पूरा करो: उसने तुम्हें चुन लिया है और उसने तुम्हारे दीन [धर्म] में कोई तंगी और कठिनाई नहीं रखी, वह तरीक़ा तुम्हारा हुआ जो तुम्हारे बाप इबराहीम का तरीक़ा था। अल्लाह ने तुम्हें मुस्लिम [आज्ञाकारी] के नाम से पुकारा है----- पहले भी और इस (क़ुरआन) में भी------ ताकि यह रसूल तुम पर (सच्चाई के) गवाह रहें और तुम दूसरे लोगों पर गवाह रहो। अतः नमाज़ पाबंदी से पढ़ा करो, तय किया हुआ ज़कात [alms] दिया करो, और अल्लाह का सहारा मज़बूती से पकड़े रहो: वही तुम्हारा रखवाला है---- तो क्या ही अच्छा रखवाला है वह और कितना अच्छा मददगार! (78)



नोट:

6: अल्लाह का ही वजूद ऐसा है जो किसी का मुहताज नहीं, बाक़ी सारी चीज़ें उसी की क़ुदरत से वजूद [अस्तित्व] में आती हैं, चाहे एक बच्चे का पैदा होना हो या ज़मीन से पौधा उगाना हो। अत: वह मुर्दों को भी दोबारा ज़िंदा करने की ताक़त रखता है। 

7: मरे हुए आदमियों को दोबारा ज़िंदा उठाने का मक़सद यही है कि दुनिया में जिस किसी ने अच्छे और भलाई के काम किए, उन्हें इसका इनाम दिया जाए और जिस किसी ने बुरे कर्म किए, उसे सज़ा दी जाए। अगर ऐसा न किया गया तो लोगों के साथ सही इंसाफ़ नहीं होगा।

11:  अरब के कुछ देहाती लोग [बद्दू] और मदीना के पाखंडी लोग ऐसे थे कि उन्होंने इस्लाम तो अपना लिया था, मगर उनका ईमान पक्का नहीं था और यह अभी तक उनके दिल में ठीक से उतरा नहीं था। वे हमेशा एक संदेह की हालत में रहते थे, जब तक उन्हें कुछ आर्थिक फ़ायदा पहुँचता रहता, वे संतुष्ट रहते, मगर जैसे ही किसी संकट में डाले जाते जहाँ उन्हें कोई नुक़सान होता, वे फिर से अपने पुराने धर्म में वापस चले जाते, जबकि ईमानवालों का तरीक़ा यह होता है कि जब ख़ुशहाली हो, तो अल्लाह का शुक्र अदा करे और जब कोई नुक़सान हो, तो सब्र और धीरज से काम ले। 

15: "अल्लाह 'उसकी' कोई मदद करने वाला नहीं है", यहाँ "उसकी" का मतलब कुछ विद्वानों ने मुहम्मद (सल्ल) से लिया है, इस तरह पूरे वाक्य का मतलब यह है कि कुछ लोग सोचते थे कि अल्लाह मुहम्मद (सल्ल) की कोई मदद नहीं करेगा, लेकिन ऐसा हुआ नहीं, अब वे सख़्त ग़ुस्से और झुंझलाहट में या तो अपना गला घोंट लें या आसमान तक रस्सी तानकर ऊपर जाएं और वहाँ से मुहम्मद साहब का संपर्क तोड़ दें।

17: साबी [Sabeans] कौन थे, इनकी पहचान कई लोगों से की गई है। ये एक अल्लाह को मानने वाले [monotheistic] लोग थे, मगर इन लोगों ने मुहम्मद (सल्ल) को अल्लाह का रसूल नहीं माना। कुछ लोग कहते हैं कि इनके पास अलग से कोई किताब या रसूल नहीं था, कुछ कहते हैं कि ये नूह (अलै) या यह्या अलै [John, the Baptist] के बताए हुए तरीक़े पर चलते थे, कुछ लोग कहते हैं कि ये तारों और ग्रहों को मानते थे। ये लोग  सीरिया या ईरान व इराक़ के दक्षिणी हिस्से में बसे हुए थे। 

मजूसी [Magians] एक ख़ुदा पर विश्वास रखने वाले प्राचीन फ़ारसी धर्म [Persian and Median religion] को मानने वाले थे जिनकी पहचान आम तौर से पारसी धर्म [ Zoroastrianism] से की जाती है।

25: पवित्र मस्जिद [काबा] और उसके आसपास की वे जगहें जो हज की रीतियों से जुड़ी हुई हैं, जैसे सफ़ा व मर्वा की पहाड़ियों के बीच दौड़ने की जगह, मिना, अरफ़ात, मुज़दलिफ़ा आदि पर दुनिया भर के मुसलमानों का समान अधिकार है। ..... जो कोई अल्लाह को छोड़कर किसी और को अपना ख़ुदा बना बैठा या इस पवित्र मस्जिद के अहाते में धन का लेनदेन करने लगा, तो वह ज़ुल्म करेगा और वहाँ के नियमों को तोड़ेने वाला होगा। 

26: जैसा कि सूरह बक़रा (2: 127) में आया है कि जहाँ अल्लाह के घर [काबा] के अवशेष बचे थे, वह जगह अल्लाह ने हज़रत इबराहीम (अलै) को दिखायी और वहाँ इसे नये सिरे से बनाने का हुक्म दिया। काबा के गिर्द सात (7) बार चक्कर लगाने [तवाफ़] को हज और उमरा [छोटा हज] की ज़रूरी रीतियों में माना जाता है। 

28: हज के लिए "निर्धारित दिन" इस्लामी कैलेंडर के बारहवें महीने [ज़ुल-हिज्जा] की दस तारीख़ से तेरह तारीख तक माना जाता है। हज की रीतियों में जानवरों की क़ुर्बानी भी एक ज़रूरी काम है। 

29: हज के दौरान बाल या नाख़ुन काटना मना होता है, जब हज की रीतियाँ पूरी करके जानवर की क़ुर्बानी कर दी जाती है, उसके बाद ही सिर के बाल मुंडवाना /काटना और नाख़ुन काटना आदि कर सकते हैं, इसे ही "साफ़-सुथरे" होना कहा गया है। इसके बाद काबा का सात बार चक्कर [तवाफ़ ए ज़ियारत] लगाया जाता है। लोगों के इबादत करने के लिए बनाया गया सबसे पहला घर "काबा" को माना जाता है (3: 96), इसलिए इसे "पुराना घर" [बैत ए अतीक़] कहा गया है।

30: सभी जानवरों को क़ुर्बानी के लिए और खाने के लिए हलाल [वैध/lawful] कर दिया गया है, सिवाए मुर्दा जानवर (का सड़ा गोश्त), ख़ून, सूअर का गोश्त और वह जानवर जिसको काटते समय अल्लाह के सिवा किसी और का नाम लिया गया हो, इसके अलावा इस बारे में विस्तार से देखें सूरह मायदा (5: 3).

31: अल्लाह की ख़ुदायी में किसी को साझेदार [Partner] बनाना ऐसा है जैसे कि उसे आसमान से नीचे गिरा दिया गया हो यानी उसके ईमान में बहुत गिरावट आ गई हो, नतीजा यह होता है कि वह अपने मन की इच्छाओं के चलते इधर-उधर भटकता फिरता है जैसे कि उसे किसी पक्षी ने हवा में उचक लिया हो और यहाँ-वहाँ लिए फिरता हो, फिर वह शैतान के बहकावे में आकर सही रास्ते से बहुत दूर जा पड़ता है जैसे कि हवा ने उसे किसी दूर जगह फेंक दिया हो।

32: रीतियों [शुआएर] का मतलब वह निशानियाँ जिनको देखकर कोई दूसरी चीज़ याद आए। हज के दौरान की जाने वाली रीतियाँ [rituals/rites] और जिन जिन जगहों पर इन रीतियों को करना है, सब पवित्र और आदर की चीज़ें हैं। 

33: जब तक किसी चौपाए जानवर को हज की क़ुर्बानी के लिए मान न लिया हो, तब तक उससे हर क़िस्म का फ़ायदा उठाया जा सकता है, जैसे सवारी करना, दूध निकालना, ऊन निकालना आदि, लेकिन एक बार इसे क़ुर्बानी करने के लिए मान लिया, तब उससे कोई फ़ायदा उठाना सही नहीं होगा।     

36: अनुवाद में ऊँट लिखा गया है, मगर असल शब्द "बुद्न" है जो गाय के लिए भी बोला जाता है। 

38: मक्का में विश्वास न करनेवालों ने मुसलमानों पर क़रीब 13 साल ज़ुल्म किया और उन्हें घर-बार छोड़कर जाने को मजबूर किया, मगर मक्का की ज़िंदगी के दौरान क़ुरआन में मुसलमानों को सब्र व धीरज से काम लेने के लिए कहा गया था। यहाँ अल्लाह ने वादा किया है कि वह मुसलमानों को ज़ालिमों से बचा लेगा, इसलिए अगली आयत 39 में अब उन ज़ालिमों के ख़िलाफ़ पहली बार हथियार उठाने की इजाज़त दी जा रही है। 

40: हथियार उठाने की अनुमति क्यों दी गई? यहाँ बताया गया है कि ईमानवालों पर केवल इस बात के लिए इतना ज़ुल्म किया गया और घरों से निकाला गया कि उन्होंने अपना रब अल्लाह को मान लिया था। जितने भी नबी [Prophets] दुनिया में आए, सब ने अल्लाह की इबादत करने का संदेश दिया, और इबादतगाहें बनायीं जहाँ अल्लाह को बराबर याद किया जाता है, मगर हर दौर में विश्वास न करनेवालों ने उन इबादतगाहों को मिटाना चाहा, इसीलिए ज़रूरी है कि उनसे लड़ा जाए और उन्हें बुरे काम से रोका जाए।  

41: यहाँ बताया गया है कि जब ईमानवालों की अल्लाह की मदद से जीत हो जाए और उनकी हुकूमत क़ायम हो जाए तो उन्हें क्या करना चाहिए। नमाज़ पढ़ने और ज़कात देने के अलावा अहम काम यह है कि भलाई व नेकी के काम करने का हुक्म देना है और बुराई से रोकना है। 

47: अल्लाह के यहाँ का एक दिन दुनिया के एक हज़ार साल जैसा है, इस बात के कई मतलब बताए जाते हैं। अल्लाह ने छ: दिनों में आसमान, ज़मीन और पूरी कायनात बनायी थी (25: 59; 32: 4; 50: 38). वहाँ का एक दिन उसी छ: दिनों में से एक दिन के बराबर है। दूसरा मतलब यह भी बताया जाता है कि काफ़िरों के लिए क़यामत का दिन डर और बदहवासी के कारण एक हज़ार साल जैसा लगेगा।  

52: चूँकि नबी/रसूल कोई फ़रिश्ते नहीं थे, बल्कि इंसान थे, इसलिए उनके भी जज़्बात थे, उन पर भी शैतानों द्वारा डाले गए शक व संदेह का कुछ समय के लिए थोड़ा असर हो सकता था, मगर चूँकि उनकी हिफ़ाज़त अल्लाह करता था, इसलिए उन पर ऐसे फ़ितनों का कोई असर नहीं पड़ता था। 

60: यहाँ इशारा उन मुसलमानों की तरफ़ है जिनके साथ मक्का में ज़ुल्म किया गया, उन्हें उनके घरों से निकाला गया, तो जितना ज़ुल्म उन मक्का वालों ने किया, ठीक उतना ही बदला उनसे लिया जा सकता है। ध्यान रहे कि मक्का में उतरी हुई सूरतों में हमेशा ज़ुल्म के जवाब में सब्र और धीरज रखने का हुक्म दिया गया था, मगर जैसा आयत 39 में है, उन्हें ज़ुल्म के ख़िलाफ हथियार उठाने की अनुमति दे दी गई।  

61: जिस तरह मौसम बदलने पर दिन और रात के समय में बदलाव आता रहता है, उसी तरह कभी अल्लाह जिन लोगों पर ज़ुल्म हो रहा हो, उन्हें जीत दिला देता है, और जो ज़ालिम और ताक़तवाले हैं उन्हें नीचा दिखा देता है। 

78: अल्लाह के रास्ते में जान लड़ा देने [जिहाद] का मतलब संघर्ष करना और कोशिश करना होता है। अल्लाह के रास्ते में हर तरह का संघर्ष चाहे हथियारों से लड़ना हो, या शांतिपूर्ण तरीक़े से कोशिश करना हो या अपने आपको सुघारने के लिए की गई कोशिश हो, सभी शामिल है।

मुहम्मद (सल्ल) अपनी उम्मत के लोगों के लिए गवाही देंगे कि ये लोग ईमानवाले थे, देखें 2: 147. 







Surah/सूरह 1: Al-Fatiha/अल-फ़ातिहा [(किताब की) शुरुआत/ The Opening]

       सूरह 1: अल-फ़ातिहा    [(किताब की) शुरुआत/ The Opening] यह एक मक्की सूरह है। पूरे क़ुरआन में अल्लाह का जो संदेश आया है , उसका इस सूरह मे...