02-09: सच्चाई के साथ किताब उतारी गई है
10-17: विश्वास रखने वालों और इंकार करने वालों का अंजाम
18-20: इस्लाम ही सच्चा दीन है
21-27: यहूदियों की कड़ी निंदा
28-32: विश्वास न करने वालों के साथ गठजोड़ करने पर चेतावनी
33-34: अल्लाह के चुने हुए लोग
35-41: मरियम, ज़करिया और यहया (अलै) की कहानी
42-47: ईसा (अलै) की पैदाइश की ख़बर सुनाना
48-58: ईसा (अलै) का मिशन और उनकी दिखाई गई निशानियाँ
59-63: ईसा इंसान हैं, ख़ुदा के बेटा नहीं
64-68: किताबवाले लोगों से अपील: इबराहीम मुस्लिम थे
69-85: किताबवाले लोगों की निंदा
86-91: सच्चाई पर विश्वास करके फिर इंकार करने वालों को चेतावनी
92 : अपनी पसंदीदा चीज़ अल्लाह के रास्ते मे दे देना
93-95: यहूदियों के खाने-पीने के नियम
96-97: हज करना ईमानवालों का कर्तव्य है
98-99: किताबवाले लोगों को चेतावनी
100-109: ईमानवालों को चेतावनी
110-112: मुस्लिम सभी समुदायों में से सबसे अच्छा है
113-117: किताबवालों में से अल्लाह और अंतिम दिन पर ईमान रखने वाले लोग भी हैं
118-120: बाहर के लोगों के साथ घनी दोस्ती का रिश्ता न रखो
121-129: जंग (उहुद) में हार जाने के बाद का संबोधन
130-131: ब्याज पर क़र्ज़ देने की निंदा
132-136: जन्नत का वादा
137-138: सज़ा की धमकी
139-151: जंग में हार के बाद का संबोधन (जारी)
152-155: हार की व्याख्या
156-160: मौत पर मातम मनाने वालों को दिलासा
161-165: निष्ठा दिखाने की अपील
166-175: हार की व्याख्या (जारी)
176-180: विश्वास न करने वालों को धमकी, ईमानवालों का उत्साह बढ़ाना
181-189: यहूदियों की निंदा
190-195: ईमानवालों की दुआ क़बूल हुई
196-198: रसूल का उत्साह बढ़ाना
199 : किताबवालों में से ईमानवाले भी हैं
200 : अंतिम बात
4: सही और ग़लत के बीच फ़र्क़ स्पष्ट कर देनेवाली चीज़ "फ़ुरक़ान" यानी 'क़ुरआन' का ज़िक्र 5:48 और 25:1 में भी देखें।
6: माँ की कोख में बच्चे का किस तरह से विकास होता है, इसका वर्णन 22:5 में विस्तार से आया है।
7: क़ुरआन में बहुत सी आयतों में "इशारे" में बातें कही गई हैं जिनके एक से ज़्यादा मतलब निकाले जा सकते हैं, या कुछ बातें ऐसी हैं जिनको आदमी अपनी अक़्ल से नहीं समझ सकता, क्योंकि उसे ऐसी चीज़ों का कोई अनुभव नहीं है। जैसे "अल्लाह का हाथ" या "अल्लाह का चेहरा" जिसे आदमी को अपने जैसा नहीं सोचना चाहिए, या हज़रत ईसा (अलै) को क़ुरआन में "अल्लाह की रूह" या "अल्लाह के शब्द" कहा गया है जिससे ईसाइयों ने यह मतलब निकाला कि वह "अल्लाह के बेटे" हैं। यहाँ यह बताया गया है कि जो बातें बहुत साफ़ और स्पष्ट नहीं हैं, उनके ज़्यादा पीछे नहीं पड़ना चाहिए और अपनी मर्ज़ी के मतलब नहीं निकालने चाहिए, बल्कि हमें उन पर विश्वास होना चाहिए कि ये अल्लाह की तरफ़ से हैं।
13: देखें 8: 43-44.
27: बेजान चीज़ से जानदार चीज़ निकालना जैसे अंडे से चूज़ा निकलता है, और जानदार चीज़ से बेजान चीज़ निकालना जैसे चिड़ियों से अंडा निकलता है।
28: असल में मदीना के हालात देखते हुए इस आयत में ईमानवालों को छोड़कर दूसरे लोगों के साथ राजनीतिक गठबंधन [Allies] करने से मना किया गया है, जैसाकि पता चला था कि मदीना के कुछ पाखंडी [मुनाफ़िक़] लोग मक्का के लोगों के साथ मुसलमानों के ख़िलाफ़ गठबंधन कर रहे थे या मदीना के कुछ मुसलमानों की यहूदियों के साथ गहरी दोस्ती थी जिससे कुछ राज़ की बातें विरोधियों को पता चल जाती थीं। इसका मतलब यह नहीं समझना चाहिए कि दूसरे लोगों के साथ आम दिनों में दोस्ती और अच्छे रिश्ते रखना मना है।
33: हज़रत मरयम के बाबा का नाम इस्लामिक परम्पराओं में "इमरान" है, जबकि बाइबल में इनका कोई नाम नहीं बताया गया है। ज्ञात हो कि हज़रत मूसा (अलै) के बाबा का नाम हिब्रू में "अमरम" आया है और उन्हें भी इस्लामिक परम्परा में "इमरान" के नाम से जानते हैं।
35: बताया जाता है कि हज़रत मरयम के पैदा होने से पहले ही उनके बाबा चल बसे थे, उनकी माँ "हना" [Anne] ने दुआ की थी कि बच्चे को पूरी तरह मंदिर [बैतुल मक़दिस] की सेवा में लगायेंगे।
37: इस्लामी परम्परा के अनुसार हज़रत ज़करिया की पत्नी रिश्ते में हज़रत मरयम की मौसी [ख़ाला] लगती थीं। उनका नाम बाइबल में एलिज़ाबेथ आया है (Luke 1: 5)
39: हज़रत यह्या (अलै), ईसा (अलै) से बड़े थे और उन्होंने हज़रत ईसा के पैग़म्बर होने की पुष्टि की थी। हज़रत ईसा को "कल्मतुल्लाह" [a Word from God] यानी 'अल्लाह के शब्द' से जाना जाता है, क्योंकि वह बिना बाप के इस तरह पैदा हुए कि अल्लाह ने कहा "कुन"[हो जा], और बस माँ की कोख में उनका वजूद हो गया।
44: इस आयत से पता चलता है कि हज़रत मरयम की देखभाल की ज़िम्मेदारी जो हज़रत ज़करिया को दी गई थी, उसका फ़ैसला पाँसे के द्वारा हुआ था।
49: देखें 5: 110
50: हज़रत ईसा (अलै) से पहले जो नियम-क़ायदे [शरीअत] इसराईल की संतानों के लिए थे, उसमें खाने की कुछ चीज़ों को हराम [अवैध] कर दिया गया था, जैसे ऊँट का गोश्त, चर्बी, कुछ चिड़ियाँ, मछ्लियों की कुछ क़िस्में आदि, जिसे ईसा (अलै) ने अपने माननेवालों के लिए हलाल [वैध] कर दिया।
55: हज़रत ईसा (अलै) के विरोधियों ने उन्हें सूली पर चढ़ाने की योजना बनाई थी, मगर अल्लाह ने ईसा (अलै) को आसमान पर उठा लिया, और जो लोग आपको पकड़ने वाले थे उनमें से एक आदमी को हज़रत ईसा (अलै) जैसी शक्ल का बना दिया, जिसे ईसा समझकर सूली चढ़ा दिया गया।
58: क़ुरआन को "ज़िक्र" कहा गया है जिसका मतलब सिर्फ़ भूली हुई चीज़ को याद दिलाना ही नहीं है बल्कि किसी चीज़ को बार-बार याद दिलाना ताकि वह हर समय ध्यान में रहे, नसीहत करना, फटकार लगाना, यहाँ तक कि चेतावनी देना (जैसे 73:19; 76:29). रसूल का काम याद दिलाना या नसीहत करना होता है (88:21). अत: 50:45 में रसूल को कहा गया है कि आप क़ुरआन के द्वारा नसीहत करें (6:70; 51:55; 52:29; 87:9; 88:21)
59: आदम और ईसा (अलै) दोनों अल्लाह के शब्द "कुन" [हो जा!] से पैदा किए गए थे। उसी तरह, फिर अल्लाह ने आदम में अपनी रूह फूँकी थी (15:29; 32:9; 38:72), और पवित्र रूह से ईसा को मज़बूती प्रदान की (2:87,253; 5:110) और मरयम भी एक पवित्र रूह से गर्भवती हुईं (19:17; 21:91; 66:12), इसके बावजूद क़ुरआन के मुताबिक़ आदम और ईसा दोनों इंसान थे।
61: जब कोई विरोधी आदमी आपकी दलीलों को मान लेने के बजाए हठधर्मी पर तुल जाए, तो फिर आख़िरी चारा यह है कि उसके साथ "मुबाहिला" करना चाहिए जिसका तरीक़ा यहाँ बताया गया है। असल में यमन के नजरान शहर से ईसाइयों का एक प्रतिनिधिमंडल आया हुआ था जिसके सामने रसूल (सल्ल) ने उनके हर तरह के सवाल के जवाब दिए, मगर फिर भी वे नहीं माने, तब आपने उनसे मुबाहिला में शामिल होने को कहा और ख़ुद अपने नज़दीकी घरवालों के साथ मैदान में जमा हो गए, मगर ईसाइयों का दल इसके लिए तैयार नहीं हुआ।
63: यहाँ बिगाड़ से मतलब ईमान [Beliefs] का बिगाड़ और उससे पैदा होनेवाली सब चीज़ों से है।
70-71: यह आयतें 2: 42 से मिलती-जुलती हैं, आम तौर से समझा जाता है कि ये आयतें उन यहूदियों और ईसाइयों के बारे में हैं जिन्होंने मुहम्मद (सल्ल) को पैग़म्बर मानने से इंकार किया और उनकी पवित्र किताबों में साफ़-साफ़ भविष्यवाणी के बावजूद सच्चाई को जान-बूझकर छुपाया (7: 157).
72: कुछ यहूदियों और ईसाइयों ने यह तरीक़ा सोचा था जिससे ईमानवाले संदेह और शक में पड़ जाएं कि जो लोग सुबह में सच्चाई पर विश्वास कर लेते हैं, वे शाम होते उसे ठुकरा क्यों देते हैं!
75: एक "दिनार" एक "दिरहम" (12: 20) से ज़्यादा होता था, क़ुरआन में इन्हीं दो सिक्कों का नाम आया है। 18:19 में भी सिक्के की बात आयी है जो शायद कागज़ की मुद्रा हो सकती है।
79: यहाँ ईसाइयों की मान्यताओं को रद्द किया गया है जो हज़रत ईसा को ख़ुदा या ख़ुदा का बेटा मानने का दावा करते थे, जैसे कि ख़ुद हज़रत ईसा (अलै) ने उन्हें अपनी इबादत करने को कहा हो! यही हाल यहूदियों के कुछ समूह का था जो हज़रत उज़ैर (अलै) को ख़ुदा का बेटा मानते थे। इस आयत में यह साफ़ कर दिया गया है कि कोई भी नबी (और ख़ासकर ईसा अलै.) एक आदमी के सिवा कुछ नहीं थे।
81: नबियों से वचन लेने की बात 33: 7 में भी आयी है।
86: एक बार सच्चाई पर विश्वास करने के बाद फिर विश्वास करने से इंकार कर देना बहुत ही गम्भीर मामला है, हालाँकि तब भी तौबा किया जाए तो अल्लाह माफ़ कर सकता है (देखें 3:89)
92: सूरह बक़रा 2: 267 में है कि जब दान (सदक़े) में कोई चीज़ दो तो बेकार या रद्दी चीज़ न दो। यहाँ उससे आगे जाकर यह कहा जा रहा है कि अगर नेकी हासिल करना चाहते हो, तो अल्लाह के रास्ते में जब ख़र्च करो तो उन चीज़ों में से दो जो तुम्हें बहुत ज़्यादा पसंद हों।
93: कुछ यहूदियों ने मुसलमानों पर आपत्ति की थी कि एक तरफ़ तो ये लोग अपने आपको हज़रत इबराहीम (अलै) के तरीक़ों को माननेवाला बताते हैं और दूसरी तरफ़ ऊँट का गोश्त खाते हैं और उसका दूध पीते हैं, जो तौरात के आने के पहले से ही हराम [अवैध] था। यहाँ इस बात का जवाब दिया गया है कि असल में हज़रत इबराहीम (अलै) के ज़माने में खाने की सब चीज़ें हलाल थीं। बताया जाता है कि बाद में हज़रत याक़ूब [Jacob], जिन्हें इसराईल भी कहते हैं, को सायटिका [Sciatica] बीमारी हुई थी जिसके कारण उन्होंने ख़ुद ही अपने ऊपर ऊँट का गोश्त व दूध हराम [अवैध] कर लिया था। बाद में, इसराईल की संतानों को अल्लाह की आज्ञा न मानने की सज़ा के तौर पर कुछ और चीज़ों को भी हराम क़रार दिया गया। यहाँ यह चैलेंज किया गया है कि ऊँट का गोश्त तौरात उतरने के पहले हलाल [lawfull] था।
96: यहूदियों को एक और आपत्ति थी कि पहले से सभी नबियों का तरीक़ा यही रहा था कि वे "बैतुल मक़दिस" की तरफ़ मुँह करके इबादत किया करते थे, जबकि मुसलमानों ने अपनी इबादत की जगह बदलकर "काबा" की तरफ़ कर दिया। यहाँ यह दावा किया गया है कि "काबा" तो बैतुल मक़दिस के बनने से काफ़ी पहले बन चुका था, और वह हज़रत इबराहीम (अलै) की निशानी है।
यहाँ "बक्का" शब्द आया है जिसे मक्का का पुराना नाम माना जाता है। "पहला घर" मतलब काबा है।
97: जो कोई उस पाक जगह चला जाता है, वह सुरक्षित हो जाता है, क्योंकि उस जगह ख़ून बहाना बिल्कुल मना है।
99: मदीना में दो बड़े क़बीले "ओस और ख़ज़रज" नाम के थे जिनमें इस्लाम से पहले काफ़ी दुश्मनी रहती थी, फिर दोनों क़बीले मुसलमान होकर मेल-मिलाप से रहने लगे। यह बात यहूदियों को पसंद नहीं आई, उन लोगों ने उनकी एक महफिल में ऐसा किया कि दोनों क़बीले से कहा कि तुम लोग पुराने वक़्तों की शायरियाँ सुनाओ, शायरी में दोनों क़बीले की आपसी दुश्मनी का वर्णन था जिससे पुरानी दुश्मनी फिर से जाग उठी। मुहम्मद (सल्ल) को पता चला तो उन्होंने बीच-बचाव करके इसे ख़त्म किया और नसीहत की कि तुम्हें अपने आपको अच्छे कामों और दीन के प्रचार-पसार में लगाना चाहिए।
105: यहाँ इशारा यहूदियों और ईसाइयों की तरफ़ है।
106: एक बार सच्चाई पर विश्वास कर लेने के बाद अगर कोई उसे ठुकरा दे, तो उसका नतीजा बहुत बुरा होगा, चाहे वह पाखंडी [मुनाफ़िक़] हो जो केवल ऊपर से दिखावे के लिए ईमान रखता था या कोई भी हो।
112: इसराइलियों द्वारा नबियों को बिना अधिकार के क़त्ल करने का ज़िक्र कई जगह पर आया है, देखें 3: 121,181; 2:61
113: किताबवाले यानी यहूदियों और ईसाइयों में कई लोग ऐसे थे जिन्होंने मुहम्मद (सल्ल) और उनकी शिक्षाओं पर विश्वास किया था। शायद यहाँ ईसाइयों के बारे में कहा गया है।
117: जो लोग सच्चाई पर विश्वास नहीं रखते, उनके द्वारा दुनिया में किए गए अच्छे कर्मों का बदला इसी दुनिया में ही दे दिया जाता है, मगर उन्हें आने वाली दुनिया में कुछ नहीं मिलेगा। इसकी मिसाल ऐसी है जैसे किसी के पास अच्छा-ख़ासा खेत हो जिसमें फ़सल लगी हुई हो, और उस पर (सच्चाई से इंकार करने के चलते) बर्फ़ीली हवा की आँधी आ जाए और सब फ़सल बर्बाद हो जाए।
118: मदीना में "ओस और ख़ज़रज" नाम के दो क़बीले बहुत ज़माने से आबाद थे जिनके यहूदियों से अच्छे रिश्ते थे, जब इन क़बीले के लोग मुसलमान हो गए तब भी वे लोग वहाँ के यहूदियों के साथ दोस्ती निभाते रहे। वहाँ के यहूदी लोग भी ऊपर से तो दोस्ती ज़ाहिर करते थे, लेकिन अंदर से वे मुसलमानों से बहुत चिढ़ते थे। इसलिए उनके साथ ज़्यादा नज़दीकी रखने और राज़ की बात न बताने की सलाह दी गई है।
122: 3 हिजरी/625 ई. में मक्का से तीन हज़ार के लश्कर ने मदीना पर हमला किया, मुहम्मद (सल्ल) ने अपनी एक हज़ार फ़ौज के साथ मदीना शहर से बाहर निकलकर क़रीब 8 कि.मी दूर उहुद के पहाड़ के पास जाकर मुक़ाबला करने का फैसला किया। पाखंडियों का सरदार, अब्दुल्लाह बिन उबी का विचार था कि मुक़ाबला शहर में रहकर किया जाए, मगर जब फ़ैसला उल्टा हुआ तो वह अपने 300 आदमियों की टुकड़ी को लेकर फ़ौज से अलग हो गया। यह सोचकर कि 3000 के मुक़ाबले केवल 700 आदमी कैसे लड़ेंगे, मुसलमानों के भी दो क़बीले "बनु हारिसा और बनु सलमा" के दिल डगमगा गए थे, लेकिन अल्लाह की मदद से अंत में वे जंग में शामिल हुए।
123: बद्र की लड़ाई में मुसलमानों की संख्या केवल 313 थी, और उनके पास मात्र 70 ऊँट और दो घोड़े थे।
125: यह भी बद्र की जंग के बारे में है, जब दुश्मनों की संख्या तीन गुना थी। अल्लाह ने शुरू में तीन हज़ार फ़रिश्तों से मदद करने की ख़बर दी थी, फिर बीच में पता चला कि दुश्मनों का एक और बड़ा लश्कर आने वाला है, तब अल्लाह ने वादा किया था कि अगर वह लश्कर आया, तो पाँच हज़ार फ़रिश्तों से मदद की जाएगी।
130: बताया जाता है कि मक्का वालों ने ब्याज पर धन लेकर फ़ौज तैयार की थी, यहाँ मुसलमानों को फिर से ब्याज (सूद) लेने से मना किया गया है। पहले सूरह बक़रा 2: 275-281 में भी इसके बारे में आदेश आ चुके थे।
137: आने-जाने के रास्ते में पिछले लोगों के टूटे-फूटे खंडहर उस समय तक बाक़ी थे जिनसे सबक़ सीखा जा सकता था।
139: उहुद की जंग के शुरुआती हिस्से में मुसलमानों की जीत हुई और मक्का वालों की फ़ौज मैदान से भाग खड़ी हुई थी, इसके बाद मुस्लिम फ़ौज के लोग दुश्मनों के छोड़े हुए साज़-व-सामान लूटने में लग गए, एक टीले पर 50 तीरंदाज़ों को तायनात किया गया था, उन्हें भी लगा कि युद्ध ख़त्म हो गया सो वे भी लूट में शामिल हो गए। इसी बीच दुश्मनों ने वापस आकर ज़बरदस्त हमला किया जिसमें 70 मुसलमान शहीद हो गए, ख़ुद मुहम्मद (सल्ल) लहू-लुहान हो गए और उनका दाँत मुबारक भी शहीद हो गया। मुसलमानों की फ़ौज तितर-बितर हो गई, फिर बड़ी मुश्किल से दोबारा फ़ौज जमा हो पाई और मुक़ाबला हुआ जिससे दुश्मनों को मैदान छोड़ना पड़ा। मगर इस लड़ाई में हुए ज़बरदस्त नुक़सान से मुसलमान काफ़ी दुखी हुए। यहाँ उन्हें हिम्मत न हारने और अपनी ग़लतियों को सुधारने की शिक्षा दी गई है।
140: बद्र की लड़ाई में मक्का के दुश्मनों में से 70 सरदार मारे गए थे और 70 लोगों को क़ैद कर लिया गया था।
"शहीद" का मतलब सच्चाई की गवाही देनेवाला। वह इस दुनिया में अल्लाह द्वारा चुन लिए जाते हैं जो आसमानों में अल्लाह के सामने गवाही देंगे, इस तरह उन्हें यहाँ मौक़ा दिया जाता है कि वह दुनिया की ज़िंदगी त्यागकर अपने ईमान की गहराई की गवाही दे सकें। क़यामत के दिन रसूलों के साथ वे भी गवाही देंगे।
141: हराने का असल मक़सद ईमानवालों के बीच से सच्चाई से इंकार करने वालों को हटा देना था।
144: "मुहम्मद" नाम क़ुरआन में चार बार आया है, यहाँ पहली बार आया है, देखें 33:40; 47:2; 48:29; और 61:6 (अहमद)।
152: मुहम्मद (सल्ल) ने अपने तीरंदाज़ों को एक ऊँचे टीले पर मोर्चा बनाकर युद्ध के आख़िर तक वहीं टिके रहने का हुक्म दिया था। मगर उन्हें लगा कि उनकी फ़ौज की जीत हो चुकी है, इसलिए वे युद्ध में छोड़े गए सामान को लूटने के लिए दौड़ पड़े, इससे दुश्मन की फ़ौज को दोबारा इकट्ठा होने और पीछे से हमला करने का मौक़ा मिल गया, और इस तरह उनकी जीत हुई।
154: मदीना के पाखंडियों का कहना था कि हमारा तो कोई अधिकार है ही नहीं, क्योंकि अगर हमारी बात मानी जाती और मदीना से बाहर निकलकर दुश्मन का मुक़ाबला करने के बजाए शहर में रहकर उसकी सुरक्षा की जाती तो इतने सारे लोग मारे न जाते। मगर याद रहे कि हर आदमी की मौत का समय पहले से तय है। देखें 3: 145
155: जब उहुद में पीछे से दुश्मनों ने दोबारा ज़बरदस्त हमला किया, तो ऐसी अफ़रा-तफ़री मची कि बहुत से मुसलमान मैदान से भाग खड़े हुए, कुछ डर से, और कुछ यह अफ़वाह सुनकर कि मुहम्मद (सल्ल) नहीं रहे। उन्हें शैतान ने बहकाकर और ग़लती करने पर मजबूर किया था।
165: यह माना जाता है कि मुसलमानों ने उहुद की लड़ाई में अपने जितने लोग खो दिए, उससे दोगुना लोगों को उन लोगों ने बद्र की लड़ाई में मारा था।
169: जो अल्लाह के रास्ते में लड़ते हुए मारे जाते हैं, वह सीधे जन्नत में जाते हैं, और उन्हें क़यामत तक का इंतज़ार नहीं करना पड़ता। देखें 2: 154.
173: उहुद की जंग में मक्का के विश्वास न करनेवाले [काफ़िर] लोग मुसलमानों पर भारी पड़े थे, फिर वे मक्का की तरफ़ वापस चल पड़े, मगर कुछ दूर जाने के बाद उन्हें यह ख़्याल हुआ कि वापस जाने के बजाए उन्हें मुसलमानों को पूरी तरह कुचल देना चाहिए ताकि उनका ज़ोर हमेशा के लिए ख़त्म हो जाए, सो उन लोगों ने वापस मदीना जाने की सोची। इस बीच, मुसलमानों का थका-हारा लशकर जब मदीना पहुँचा, तो अगले ही दिन मुहम्मद (सल्ल) ने दुश्मनों का पीछा करने का इरादा कर लिया, और अपने साथियों के साथ वे लोग निकल खड़े हुए। रास्ते में कुछ लोगों ने मुसलमानों की फ़ौज को डराया कि मक्का वालों का एक बहुत बड़ा लश्कर उनकी तरफ़ आ रहा है, मगर वे लोग नहीं घबराए। इसी हौसले की वजह से मक्का की फ़ौज फिर से मुक़ाबला करने के बजाए वापस मक्का चली गई।
180: जिन चीज़ों पर अल्लाह ने ख़र्च करने का हुक्म दे रखा है, जैसे "ज़कात" देना, अगर उन पर आदमी ख़र्च न करे, तो ऐसी कंजूसी हराम है।
181: जब "ज़कात" देने का हुक्म आया तो मदीना के कुछ यहूदियों ने इसका मज़ाक़ उड़ाते हुए कहा था कि इसका मतलब यह हुआ कि "अल्लाह ग़रीब है और हम मालदार हैं।"
नबियों को मार डालने की बात 3: 21 और 2: 61 में भी आयी है।
183: पुराने नबियों के ज़माने में क़ायदा यह था कि जब वे किसी जानवर की क़ुर्बानी करते थे, तो उसका गोश्त उन्हें खाना मना था, बल्कि उस जानवर के गोश्त को किसी मैदान या टीले पर रख दिया जाता था, और अगर आसमान से आग आकर उसे खा लेती थी, तो यह माना जाता था कि अल्लाह ने वह क़ुर्बानी क़बूल कर ली। बाइबल में कई नबियों के बारे में आया है जिन्होंने ऐसी क़ुर्बानियाँ की थीं, जैसे एलिजाह (1 किंग्स 18: 22-38), दाऊद (अलै) आदि। कुछ यहूदियों ने भी मुहम्मद (सल्ल) से ऐसी क़ुर्बानी करने की माँग की थी।
199: ऊपर देखें 3: 113
200: क़ुरआन में "सब्र" [धीरज] कई अर्थों में आया है। अल्लाह का आदेश मानते हुए हर तरह की मुसीबत-परेशानी झेलना, और गुनाह करने की इच्छा को दबाना लेना भी सब्र में शामिल है।