Thursday, June 27, 2019

Chronological Quran : Later Meccans-1/ उत्तर मक्की दौर-1 [620-623 AD]


Later Meccans-1 [620-623 AD]


सूरह 41 : फ़ुस्सिलत/अस-सज्दा [स्पष्ट आयतें, Verses made distinct]

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

हा॰ मीम॰ (1)

सब पर मेहरबानी करनेवाले, बेहद दयावान [रब] की ओर से यह (किताब) उतारी [reveal] जा रही है;  (2)


अरबी में क़ुरआन के रूप में एक ऐसी किताब, जिसकी आयतों को स्पष्ट और अलग पहचान वाली बनाया गया है, उन लोगों के लिए जो समझ-बूझ रखते हैं,  (3)

जो अच्छी ख़बर देनेवाली और सावधान करनेवाली (किताब) है। फिर भी उनमें से अधिकतर लोगों ने इससे मुँह मोड़ रखा है, सो वे सुनते ही नहीं हैं। (4)

वे [रसूल से] कहते हैं कि "जिस चीज़ (में विश्वास कर लेने) के लिए तुम हमें बुलाते हो, उसके ख़िलाफ़ तो हमारे दिलों पर परत चढ़ी हुई है; हमारे कान बहरे हैं; हमारे और तुम्हारे बीच (रोक के लिए) एक पर्दा है। अतः तुम जो कुछ चाहते हो करो, हमें जो अच्छा लगेगा वह हम करेंगे।" (5)

[ऐ रसूल] आप कह दें, "मैं तो तुम्हारे जैसा ही एक इंसान हूँ, (मगर) मुझ पर यह बात उतारी गयी है कि तुम्हारा ख़ुदा असल में एक ही ख़ुदा है। अतः तुम उसी (ख़ुदा) की ओर जानेवाले सीधे रास्ते को अपनाओ और उसी से (गुनाहों की) माफ़ी माँगो। बड़ी तबाही है उन [मुशरिकों/Idolaters] की, जो एक अल्लाह के साथ (दूसरों को) उसका साझेदार [Partner] ठहराते हैं, (6)

जो ज़कात [दान] नहीं देते और आने वाली दुनिया [आख़िरत/Hereafter] को मानने से इंकार करते हैं!  (7)

वे लोग जो ईमान रखते हैं, और अच्छे कर्म करते रहते हैं, तो उनके लिए (बदले में) ऐसा इनाम है जिसका सिलसिला कभी टूटनेवाला नहीं।" (8)

कह दें, "तुम उस (अल्लाह) का इंकार कैसे कर सकते हो, जिसने धरती को दो दिनों [कालों] में पैदा किया? तुम दूसरों को उस (अल्लाह) के बराबर का कैसे ठहरा सकते हो? वह तो सारे संसारों का पालनहार है!  (9)

उसने उस (धरती) में ठोस पहाड़ों को जमा दिया जो उभरे रहते हैं, और उसके अंदर (खनिज पदार्थ आदि से) बरकत [blessing] डाल दी, और उसमें उन सब के लिए जो उन्हें पाना चाहते हों, ठीक अंदाज़े के साथ क़िस्म क़िस्म के खाने-पीने व जीवन जीने के सामान रख दिए --- और यह सब कुछ चार दिन [काल] में हो गया। (10)

फिर उस [अल्लाह] ने आसमान की ओर ध्यान दिया, जो कि उस समय मात्र धुआँ था-- और उसने उस [आसमान] से और ज़मीन से कहा, 'चले आओ (हमारा आदेश मानते हुए), खुशी के साथ या अनिच्छा से।' उन्होंने कहा, 'हम ख़ुशी ख़ुशी आते हैं--- '  (11)

और उसने दो दिनों में (अपने फ़ैसले के मुताबिक़) सात आसमानों को बना डाला, और प्रत्येक आसमान में उससे सम्बन्धित आदेश भेज दिए। हमने इस दुनिया से सबसे नज़दीक वाले आसमान को दीपों [तारों व ग्रहों] से सजाया और उसे ख़ूब सुरक्षित कर दिया। ऐसी है व्यवस्था, अत्यंत प्रभुत्वशाली और सब कुछ जाननेवाले (रब) की।" (12)

(फिर भी) अगर वे लोग ध्यान न दें और मुँह मोड़ें तो आप कह दें, "मैंने तुम्हें उस कड़कदार धमाके [thunderbolt] से सावधान कर दिया है, जैसा धमाकाआद और समूदपर आ पड़ा था": (13)

जब उन लोगों के पास रसूलों के संदेश आए, (कभी) उनके आगे से और (कभी) उनके पीछे से [हर दृष्टिकोण से उन्हें समझाया गया] कि "अल्लाह के सिवा किसी की बन्दगी न करो", मगर उन्होंने कहा, "अगर हमारा रब चाहता तो उसने फ़रिश्तों को भेज दिया होता। अतः जिस संदेश के साथ तुम्हें भेजा गया है, हम उस पर विश्वास नहीं करते।" (14)

आद की क़ौम के लोग ज़मीन पर हर जगह घमंड में चूर रहे और वह सब किया जिसका उन्हें कोई अधिकार न था, और कहते थे, "कौन है जो हमसे शक्ति में बढ़कर है?" क्या उन्हें यह नहीं सूझा कि जिस अल्लाह ने उन्हें पैदा किया, वह उनसे शक्ति में कहीं बढ़कर है? वे हमारी आयतों को मानने से इंकार ही करते रहे,  (15)

सो हमने उन लोगों पर कुछ दिनों के लिए (तबाह कर देने वाली) एक अत्यंत तेज़ आँधी छोड़ दी, ताकि उन्हें सांसारिक जीवन में अपमानित करने वाली यातना का मज़ा चखा दें; हालाँकि आने वाले जीवन [आख़िरत/परलोक] की यातना तो इससे कहीं बढ़कर अपमानित करने वाली होगी, और उनको कोई सहायता भी नहीं दी जाएगी। (16)

और रहे समूद (के लोग), तो हमने उन्हें सीधा मार्ग दिखाया था, मगर सही मार्ग अपनाने के बजाए उन्होंने अन्धा रहना ही ज़्यादा पसन्द किया। नतीजा यह हुआ कि जो कुछ (बुरे कर्मों की) कमायी वे करते रहे थे, उसके बदले में एक कड़कदार धमाके ने उन्हें जकड़ लिया जो बेइज्ज़त कर देनेवाला दंड था।  (17)

और हमने उन लोगों को बचा लिया जो (अल्लाह में) विश्वास [ईमान] रखते थे और बुरे कामों से बचते थे। (18)

एक दिन आएगा, जब अल्लाह के शत्रुओं को इकट्ठा करके (जहन्नम की) आग की ओर हँकाया जाएगा, फिर उन्हें श्रेणियों में बाँट कर खड़ा किया जाएगा, (19)

यहाँ तक कि जब वे उस (आग) के पास पहुँच जाएँगे, तो उनके कान, उनकी आँखें और उनकी खालें उनके विरुद्ध उन बातों की गवाही देंगी, जो कुछ (बुरे कर्म) वे करते रहे थे। (20)

वे अपनी खालों से कहेंगे, "तुमने हमारे विरुद्ध क्यों गवाही दी?" वे कहेंगी, "हमें उसी अल्लाह ने बोलने की शक्ति दी है, जिसने हर चीज़ को बोलने की ताक़त दी है-- उसी ने तुम्हें पहली बार पैदा किया और उसी के पास तुम्हें वापस लाया गया है--  (21)

तब भी, तुमने अपने आपको अपने कानों से, अपनी आँखों से और अपनी खालों से छुपाने की कोशिश नहीं की, ताकि तुम अपने कानों, आँखों और खालों को अपने ही विरुद्ध गवाही देने से रोक पाते. तुमने तो यह समझ रखा था कि अल्लाह तुम्हारे बहुत-से कामों को जानता ही नहीं है जो कुछ तुम करते रहे थे, (22)

इस तरह, अपने रब के बारे में जो तुमने एक (ग़लत) सोच पाल रखी थी, वही तुम्हें बर्बादी की ओर ले गयी, और तुम उन लोगों में शामिल हो गए जो पूरी तरह घाटे में पड़ गए।” (23)

अब चाहे वे धीरज रखते हुए (यातना) झेलने के लिए तैयार हों, तब भी (जहन्नम की) आग ही उनका ठिकाना है, और अगर वे अपनी ग़लतियों को सुधारने के लिए मौक़ा दिए जाने का निवेदन करें, तब भी उन्हें ऐसा करने की अनुमति नहीं दी जाएगी।  (24)

हमने (दुनिया में) उन (विश्वास न रखनेवालों) के लिए कुछ साथियों [शैतानों] को नियुक्त कर दिया है जो उनके बीते हुए कल और आज के समय को इस तरह दिखाते हैं, जो उनको सही और सुहाना लगने लगता है, मगर उनके लिए सज़ाओं का फ़ैसला पहले ही तय हो चुका है, इनमें जिन्नों और इंसानों की वे पीढियाँ भी शामिल हैं जो उनसे पहले गुज़र चुकी थीं : वे घाटा उठानेवालों में से थे।  (25)

जिन लोगों ने इंकार किया, उन्होंने (एक दूसरे से) कहा, "इस क़ुरआन को सुनो ही मत; और (अगर कोई इसे सुना रहा हो तो) इसके बीच में बेकार बातों से हल्ला-ग़ुल्ला मचा दिया करो, ताकि तुम अपनी बड़ाई बनाए रख सको।" (26)

अतः हम अवश्य ही विश्वास न रखनेवालों को कठोर यातना का मजा चखाएँगे। हम उनके कर्मों का बदला, उनके द्वारा किए गए सबसे बुरे कर्मों के हिसाब से  देंगे---  (27)

अल्लाह के दुश्मनों के लिए यही (उचित) बदला है--– (जहन्नम की) आग ही उनके लिए हमेशा रहने का ठिकाना होगा, हमारी आयतों को ठुकराने की यही मज़दूरी है। (28)

जिन लोगों ने इंकार किया [काफिर], वे कहेंगे, "ऐ हमारे रब! हमें उन जिन्नों और आदमियों को दिखा दे, जिन्होंने हमको रास्ते से भटका दिया था, ताकि हम उन्हें अपने पैरों तले ऐसा कुचल डालें कि वे सबसे नीचे वालों में जा पड़ें।”  (29)

(दूसरी तरफ़) जिन लोगों ने कहा कि "हमारा रब अल्लाह है,"फिर उसकी तरफ़ जानेवाले सीधे रास्ते पर जमे रहे, तो बेशक उन पर फ़रिश्ते (यह कहते हुए) उतरेंगे कि "अब न दिल में कोई डर रखो और न किसी बात पर दुखी हो, बल्कि उस जन्नत (के पाने) की ख़ुशियाँ मनाओ, जिसका तुमसे वादा किया जाता था। (30)

हम इस संसार में भी और आनेवाली दुनिया [आख़िरत] में भी, तुम्हारे दोस्त व मददगार हैं, और वहाँ [जन्नत में] तुम्हारे दिल में जिस चीज़ की भी इच्छा होगी और जिस चीज़ की भी तुम माँग करोगे, तुम्हारे लिए वह सब कुछ (हाज़िर) होगा---- (31)

एक तोहफ़े के रूप में, जो तुम्हारे स्वागत में सबसे ज़्यादा माफ़ करनेवाले और बड़ी मेहरबानी करनेवाले [रब] की तरफ़ से दिया जाएगा।" (32)

बातचीत करने में उस आदमी से अच्छा कौन हो सकता है जो लोगों को अल्लाह की ओर बुलाए, और अच्छे कर्म करे और कहे, "मैं उनलोगों में से हूँ जो एक अल्लाह पर पूरी भक्ति से झुकनेवाले [मुस्लिम] हैं?" (33)

अच्छाई और बुराई के काम बराबर नहीं हो सकते। [ऐ रसूल], आप बुराई [बुरे व्यवहार] का जवाब अच्छे से अच्छे व्यवहार से दिया करें, और आप देखेंगे कि आपका दुश्मन भी आपके पुराने और घनिष्ठ दोस्त जैसा हो गया,  (34)

मगर केवल वही लोग ऐसी अच्छाई (के मुक़ाम) तक पहुँचेंगे, जो धीरज रखते हुए (भलाई के) काम में लगे रहते हैं, और जिन पर (अल्लाह ने) नेकी के रास्ते पर चलने के लिए ख़ास करम [blessing] किया है। (35)

अगर शैतान (तुम्हारे ग़ुस्से को) इस तरह से उकसा दे कि तुम भड़क उठो, तो अल्लाह की शरण [पनाह] माँग लिया करो : वह सब कुछ सुनता है और सब जानता है।  (36)

यह रात, यह दिन, यह सूरज, यह चाँद, ये तो उस (अल्लाह) की केवल चंद निशानियाँ हैं। सूरज या चाँद के आगे पूजा करने के लिए मत झुक जाया करो, बल्कि उस अल्लाह के सामने सिर झुकाओ, जिसने उन्हें पैदा किया, अगर सचमुच तुम उसी (अल्लाह) की बन्दगी करते हो।  (37)

अगर विश्वास न रखनेवाले [काफ़िर], इतने ही घमंडी हैं (कि मेरे सामने झुक नहीं सकते), [तो याद रखें, ऐ रसूल, कि], आपके रब के पास जो (फ़रिश्ते) हैं, वे रात-दिन बिना थके व उकताए हुए उसका गुणगान करते ही रहते हैं।  (38)

उसकी अन्य निशानियों में यह भी है : तुम देखते हो कि धरती (सूखे से) मुरझाई पड़ी है; फिर ज्यों ही हमने उस पर पानी बरसाया कि उसमें हलचल आ गयी और फिर फलने-फूलने लगी। हक़ीक़त यह है कि जिसने उस (मुरझाई हुई) धरती को फिर से ज़िंदा कर दिया, वही मुर्दों को भी (क़यामत में दोबारा) ज़िंदा करनेवाला है। वह हर चीज़ (करने) की ताक़त रखता है।  (39)

जो लोग हमारी आयतों (के मतलब) के साथ छेड़-छाड़ करते हैं, वे हमसे छिपे हुए नहीं हैं। भला बताओ कि जो आदमी जहन्नम की आग में झोंक दिया जाए, वह अच्छा है या वह जो क़यामत के दिन बिना किसी डर-भय के आराम से आएगा? तुम्हारा जो जी चाहे वह करो, मगर तुम जो भी करते हो, याद रखो कि अल्लाह हर काम को देख रहा है। (40)

जिन लोगों ने क़ुरआन (की नसीहतों) को मानने से इंकार किया, जब वह उनके बीच (चर्चा में) आयी -- हालाँकि वह एक बड़ी इज़्ज़तवाली (व हर तरह की त्रुटियों से दूर) किताब है!, (41)

जिसे असत्य (न आगे से और न पीछे से) किसी भी तरफ़ से छू भी नहीं सकता; यह उस [रब] की ओर से उतारी गयी है जो बहुत समझ-बूझ रखनेवाला और हर प्रशंसा के योग्य है--  (42)

(आप इस बात को याद रखें, ऐ रसूल! कि) आपसे ऐसी कोई बात नहीं कही जा रही है, जो आप से पहले गुज़र चुके रसूलों को नहीं कही गयी थीं : आपका रब तो (गुनाहों की) माफ़ी देनेवाला रब है, मगर (साथ में) वह दर्दनाक दंड देनेवाला भी है। (43)

यदि हम इस (क़ुरआन) को अरबी छोड़ कर किसी दूसरी भाषा में लाते, तो वे कहते कि "काश, कि उसकी आयतें (हमारी भाषा में) स्पष्ट तरीक़े से बयान की जातीं! यह क्या? कि वाणी तो किसी अलग भाषा में है और आदमी अरबी?" कह दें, "जो लोग ईमान रखते हैं, उन लोगों के लिए यह (क़ुरआन) तो सही रास्ता दिखानेवाली और दर्द पर मरहम लगानेवाली है, किन्तु जो लोग (एक अल्लाह में) विश्वास नहीं रखते, उनके कानों पर यह (क़ुरआन) बोझ है, वे इस पर थोड़ा भी ध्यान नहीं देते, ऐसा लगता है मानो उनको किसी बड़े दूर की जगह से पुकारा जा रहा हो।" (44)

हमने मूसा [Moses] को भी किताब दी थी, पर उसमें भी झगड़े निकाले गए--- अगर पहले ही उस (फ़ैसले के समय) पर तुम्हारे रब की ओर से फ़रमान जारी न हो गया होता, तो उनके बीच अब तक फ़ैसला हो चुका होता —--- और हक़ीक़त यह है कि वे अभी तक उस (क़ुरआन) के बारे में ऐसे सन्देह में पड़े हुए हैं जो उलझन में डाल देनेवाला है।  (45)

जिस किसी ने अच्छा कर्म किया तो अपने ही फ़ायदे के लिए किया और जिस किसी ने बुराई की, तो अपने ही नुक़सान के लिए की : तुम्हारा रब अपने बंदों पर कभी भी नाइंसाफ़ी नहीं करता।  (46)

(क़यामत की आनेवाली) घड़ी की जानकारी केवल अल्लाह को ही है, और बिना उसकी जानकारी के न तो कोई फल अपने शगूफ़े [कोष, sheath] से निकलता है, न कोई मादा गर्भवती होती है, और न ही बच्चा जनती है। जिस दिन वह उन (काफ़िरों) से पूछेगा, "कहाँ हैं मेरी (ख़ुदायी के) साझेदार [Partner]?" वे जवाब देंगे, "हम तेरे सामने इस बात को स्वीकार करते हैं कि हममें से कोई भी उन [गढे हुए साझेदारों] को देख नहीं पा रहा है": (47)

जिन ख़ुदाओं को वे पहले पुकारा करते थे, वह सब वहाँ से ग़ायब हो चुके होंगे; और वे समझ लेंगे कि उनके लिए अब कोई भागने की जगह नहीं है।  (48)

आदमी का हाल यह है कि वह (अपने लिए) भलाई माँगने से नहीं थकता, किन्तु अगर उसे कोई तकलीफ़ छू जाती है, तो वह निराश होकर आस छोड़ बैठता है।  (49)

उसकी तकलीफ़ व परेशानी के बाद, जब कभी हम उसे अपनी थोड़ी सी रहमत [दयालुता] का मज़ा उठाने देते हैं, तो वह यह बात ज़रूर कहता है, "यह सब तो मेरी ही कोशिशों का नतीजा है : मैं नहीं समझता कि क़यामत की घड़ी कभी आने वाली है, लेकिन अगर मुझे अपने रब की ओर वापस ले जाया भी गया, तो अवश्य ही उसके पास मेरे लिए सबसे अच्छा इनाम होगा।" मगर हम उन काफ़िरों को ज़रूर बताएंगे जो कुछ कर्म उन्होंने किए होंगे, और हम उन्हें अवश्य ही कठोर यातना का मज़ा चखाएँगे।  (50)

जब कभी हम आदमी पर अपनी ख़ास कृपा करते हैं तो वह मुँह मोड़ लेता है और अकड़ कर हम से दूर चला जाता है, लेकिन जैसे ही उसे कोई तकलीफ़ छू जाती है, तो वह लम्बी-चौड़ी प्रार्थनाएँ करने लगता है। (51)

[ऐ रसूल] कह दें, "क्या तुमने कभी विचार किया, कि अगर यह उतारी हुई (क़ुरआन की) आयतें सचमुच अल्लाह की ओर से ही हुईं, और इसके बावजूद  तुमने उसको मानने से इंकार कर दिया? तो उससे बढ़कर भटका हुआ और कौन हो सकता है जो (अल्लाह से) अपने संबंध काटकर दूर जा पड़ा हो?" (52)

हम उन्हें पृथ्वी के हर एक क्षेत्र में अपनी निशानियाँ दिखाएँगे और स्वयं उनके अपने भीतर भी, यहाँ तक कि उन पर यह बात खुल कर सामने आ जाएगी कि यह (क़ुरआन) सत्य है। क्या यह बात काफ़ी नहीं कि तुम्हारा रब सारी चीज़ों का गवाह है?  (53)

तब भी उन्हें इस बात पर संदेह है कि सचमुच उन्हें अपने रब से मिलना होगा; सचमुच, अल्लाह (की जानकारी और ताक़त) हर चीज़ पर छायी हुई है।  (54)



सूरह 42 : अश-शूरा [राय-मशविरा/परामर्श, Consultation]

 अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

हा॰ मीम॰ (1)

ऐन॰ सीन॰ क़ाफ़॰ (2)

अल्लाह जो बहुत ताक़तवाला, और बड़ी गहरी समझ-बूझ रखनेवाला है, आप पर [ऐ रसूल!], इसी तरह से 'वही' [revelations] उतारता है जैसा कि आपसे पहले गुज़र चुके (रसूलों पर) उतारता था।  (3)

जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन पर है, सब उसी का है : वही है जो बड़ाई में सबसे ऊँचा और महान है। (4)

फ़रिश्ते इस तरह अपने रब की तारीफ़ के साथ उसका गुणगान करते रहते हैं, और धरती पर रहनेवालों के लिए माफ़ी की प्रार्थना करते रहते हैं कि लगता है कि आसमान ऊपर की तरफ़ से (इनके बोझ से) फट पड़ेगा। (याद रखो!)  अल्लाह सचमुच सबसे बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है। (5)

और जिन लोगों ने अल्लाह को छोड़कर अपने लिए कुछ दूसरे संरक्षक [Protector] बना रखे हैं, अल्लाह उन पर नज़र रखे हुए है; [ऐ रसूल], आप उनके लिए ज़िम्मेदार नहीं हैं। (6)

अत: हमने आपकी ओर अरबी में यह क़ुरआन उतार भेजी है, ताकि आप केंद्रीय शहर [मक्का], और उसके आसपास रहनेवाले लोगों को (बुरे कर्मों के नतीजे से) सावधान कर दें। और उनको उस दिन की (ख़ास करके) चेतावनी दे दें, जिस (क़यामत के) दिन सबको इकट्ठा किया जाएगा, जिसके आने में कोई सन्देह नहीं, जब एक गिरोह बाग़ [जन्नत] में जाएगा और एक गिरोह (जहन्नम की) भड़कती हुई आग में।  (7)

अगर ऐसा अल्लाह चाहता, तो उन सबको एक ही समुदाय बना देता, मगर वह जिस किसी को चाहता है, उसे अपनी रहमत [mercy] में शामिल कर लेता है; शैतानियाँ करने वालों का न तो कोई रखवाला होगा और न ही कोई मददगार।  (8)

उन लोगों ने अल्लाह को छोड़कर दूसरों को कैसे अपना रखवाला बना रखा है? रखवाला तो बस अल्लाह ही है; वही मुर्दों को जीवित करता है; और उसको हर चीज़ (करने) की ताक़त है। (9)

किसी चीज़ के बारे में तुम जो कुछ भी मतभेद रखते हो, उसका फ़ैसला तो अल्लाह को ही करना है। [आप कह दें], “ऐसा है अल्लाह, मेरा रब। उसी पर मैं भरोसा करता हूँ, और उसी की सामने (अपना सिर) झुकाता हूँ, (10)

जो आसमानों और ज़मीन का पैदा करनेवाला है।उसने तुम लोगों में से ही तुम्हारे लिए जोड़े बनाए --- और चौपायों के जोड़े भी--- ताकि तुम्हारी नस्ल बढ सके। कोई नहीं है जो उसके जैसा हो : वह हर बात सुनता है, सब कुछ देखता है।  (11)

आसमानों और ज़मीन की सारी कुंजियाँ उसी के क़ब्ज़े में हैं; वह जिसके लिए चाहता है उसकी रोज़ी को ख़ूब बढा देता है और जिसके लिए चाहता है उसकी रोज़ी को घटा देता है; उसे सारी चीज़ों की पूरी जानकारी है। (12)

धर्म के मामलों में, उसने तुम (लोगों) के लिए वही नियम-क़ायदे तय किए हैं जैसे आदेश उसने नूह [Noah] को दिए थे, और जो हमने [ऐ रसूल] आपके पास उतारा [revealed] है, और जिसका आदेश हमने इबराहीम [Abraham]  और मूसा [Moses] और ईसा [Jesus] को दिया था : "तुम (इसी) दीन [धर्म] पर क़ायम रहो और उसके अंदर अलग-अलग गुटों में न बँट जाओ" --- फिर भी, बहुदेववादियों [Idolaters] को जिस बात की तरफ़ आप बुला रहे हैं, वह चीज़ उन के लिए बहुत कठिन व भारी है; अल्लाह जिसे चाहता है उसे अपने लिए चुन लेता है, और जो उसकी ओर पूरी भक्ति के साथ (गुनाहों की माफ़ी के लिए) झुकता है, उसे अपने तक पहुँचने का रास्ता दिखा देता है। (13)

आपसी ज़िद व दुश्मनी के कारण वे लोग (धर्म के मामले में) बँट गए, हालाँकि ऐसा करने के समय तक उनके पास सच्चा ज्ञान आ चुका था, और, अगर तुम्हारे रब की ओर से एक नियत अवधि तक के लिए उन्हें मुहलत दिए जाने का आदेश पहले से ही न पारित हो गया होता, तो अब तक उनका फ़ैसला पहले ही हो चुका होता। उनके बाद के लोग, जो (आसमानी) किताब के वारिस [inheritor] हुए, वे उसके बारे में संदेह के चलते सख़्त उलझन में पड़े हुए हैं।  (14)

अतः [ऐ रसूल] आप उन लोगों को उसी (सच्चे दीन) की ओर बुलाते रहें, और ख़ुद सीधे रास्ते पर चलते रहें, जैसा कि आपको हुक्म दिया गया है। उनलोगों की इच्छाओं का पालन न करें, और कह दें, "अल्लाह ने जो भी किताब उतारी है, मैं उसमें विश्वास रखता हूं। मुझे तो आदेश हुआ है कि मैं तुम्हारे बीच न्याय करूँ। अल्लाह तो हमारा भी रब है और तुम्हारा भी रब है --- हमारे लिए हमारे कर्म हैं और तुम्हारे लिए तुम्हारे कर्म---  हमारे और तुम्हारे बीच (अब) कोई झगड़ा-बहस नहीं होना चाहिए ---- अल्लाह हम सबको (एक दिन) एक साथ इकट्ठा करेगा, और अन्ततः उसी के पास सबको लौट कर जाना है।" (15)

रहे वे लोग जो अल्लाह की पुकार को स्वीकार कर लेने के बाद भी, उस [अल्लाह] के विषय में (अभी तक) बहस करते रहते हैं, उनके रब के सामने ऐसी (झूठी) बातों का कोई मोल नहीं है : (अल्लाह का) क्रोध उनपर टूट पड़ेगा और उनके लिए बड़ी दर्दनाक यातना होगी।  (16)

वह अल्लाह ही है जिसने सच्चाई पर आधारित किताब उतारी और (प्रकृति के नियमों का और इंसाफ़ का) संतुलन स्थापित किया। तुम्हें क्या मालूम? शायद क़यामत की घड़ी जल्दी ही आ जाए :  (17)

जो लोग उस [क़यामत] में विश्वास नहीं रखते, वे चाहते हैं कि यह घड़ी जल्दी आ जाए, किन्तु जो इसमें विश्वास रखते हैं, वे तो उससे डरे-सहमे रहते हैं। वे जानते हैं कि यह सत्य है; जो लोग उस घड़ी के बारे में (सन्देह डालनेवाली) बहसें करते रहते हैं, वे सही रास्ते से बहुत ज़्यादा भटके हुए हैं। (18)

अल्लाह अपने बन्दों [सभी जीवों] पर बेहद दयालु है; वह जिसे चाहता है रोज़ी (बढा के) देता है; वह बहुत ताक़तवाला, अत्यन्त प्रभुत्वशाली है। (19) 

अगर कोई आदमी आने वाली दुनिया [आख़िरत/परलोक] में (अपने लिए) फ़सल [harvest] चाहता है, तो हम उसकी फ़सल को और बढाकर देंगे; और अगर कोई (केवल) इसी दुनिया की फ़सल चाहता है, तो हम उसे उसी में से कुछ हिस्सा दे देंगे, मगर (फिर) आने वाली दुनिया में उसका कोई हिस्सा नहीं होगा।  (20)

वे लोग ऐसे (ठहराए हुए अल्लाह के) साझेदारों [Partners] पर कैसे विश्वास कर सकते हैं, जो उनके लिए दीन [Faith] के ऐसे तरीक़ों का हुक्म देते हैं जिसकी मंज़ूरी अल्लाह ने दी ही नहीं? अगर अंतिम निर्णय के बारे में अल्लाह का आदेश पारित न हो गया होता, तो उनके बीच फ़ैसला पहले ही किया जा चुका होता। शैतानी करनेवालों को बड़ी दर्दनाक सज़ा होगी---  (21)

तुम उन [ज़ालिमों] को देखोगे कि जो बुरे कर्म उन्होंने कर रखे हैं, उसके नतीजे में डरे-सहमे हुए होंगे : मगर सज़ा तो उनको मिल कर ही रहेगी--- किन्तु जिन लोगों ने विश्वास [ईमान] रखा और अच्छे कर्म किए, वे (जन्नत में) फूलों से लदे हुए बाग़ों में होंगे। अपने रब से वे जिस चीज़ की भी इच्छा करेंगे, उन्हें वह सब कुछ मिलेगा : यही सबसे बड़ा इनाम है(22)

यही तो है वह चीज़ जिसकी ख़ुशख़बरी अल्लाह अपने उन बंदों को देता है जो ईमान रखते हैं और अच्छे कर्म करते हैं।

[ऐ रसूल] आप कहें, "मैं इस (अच्छाई की तरफ़ बुलाने के काम) के बदले में तुमसे कोई मज़दूरी नहीं माँगता, बस नातेदारी के कारण थोड़ा सा स्नेह चाहता हूँ.अगर कोई आदमी कुछ भलाई का काम करेगा, तो हम उसके लिए उसकी अच्छाई को और बढा देंगे; अल्लाह बड़ा माफ़ करनेवाला और (अच्छाई की) बहुत क़द्र करनेवाला है। (23)

वे ऐसा कैसे कह सकते हैं कि "इस आदमी [रसूल] ने अल्लाह के नाम से झूठी बातें गढ कर बना ली हैं?"

अगर अल्लाह चाहता, तो आपके दिल को ठप्पा लगाकर बंद कर देता और  झूठ को मिटा देता : अल्लाह अपने शब्दों से सच्चाई की पुष्टि करता है। जो कुछ सीनों में छुपा है, वह उसकी पूरी जानकारी रखता है--- (24)

वही तो है जो अपने बंदों के (गुनाहों से) तौबा करने को क़बूल करता है और बुरे कर्मों को माफ़ करता है---- (हालाँकि) जो कुछ तुम करते हो, वह सब जानता है।  (25)

और वह उन लोगों की दुआएं सुनता है जो (एक अल्लाह पर) ईमान रखते हैं और अच्छे कर्म करते हैं, और अपनी उदारता से उन्हें और ज़्यादा इनाम देता है। रहे (सच्चाई से) इंकार करनेवाले [काफ़िर], तो उनके लिए दर्दनाक यातना है। (26)

अगर अल्लाह अपने (पैदा किए हुए) सभी जीवों के लिए रोज़ी को ख़ूब बढा देता, तो वे धरती पर अकड़ते और बदतमीज़ी पर उतर आते। मगर वह जितनी (रोज़ी) चाहता है, एक सही अंदाज़े के साथ उतार भेजता है, क्योंकि वह अपने बन्दों को अच्छी तरह से जानता है, और उनपर नज़र रखता है :  (27)

जब लोग सारी उम्मीद छोड़ चुके होते हैं, तो वही है जो बारिश से राहत पहुँचाता है और अपनी रहमत [mercy] को दूर दूर तक फैला देता है। वही है सबका रखवाला, हर प्रशंसा के लायक़।  (28)

आसमानों और ज़मीन की रचना और वे सारे जीवधारी जो उस (अल्लाह) ने इनमें चारों ओर फैला रखे हैं, अल्लाह की निशानियों में से हैं : वह जब कभी चाहे, उन्हें एक-साथ इकट्ठा करने की ताक़त भी रखता है। (29)

जो भी मुसीबत तुम (लोगों) को पहुँचती है, वह तुम्हारे अपने हाथों किए गए कर्मों का नतीजा है--- अल्लाह तो बहुत कुछ माफ़ कर देता है--- (30)

धरती पर तुम कहीं भी उससे बचकर निकल नहीं सकते : अल्लाह को छोड़कर न तुम्हारा कोई संरक्षक है और न कोई मददगार। (31)

उसकी निशानियों में से हैं समुद्र में चलने वाले (ऊँचे) जहाज़, जो पानी में तैरते हुए पहाड़ों जैसे लगते हैं :  (32)

अगर वह चाहे, तो हवा को ठहरा दे, जिससे वे (जहाज़) समुद्र की सतह पर बिना किसी हरकत के खड़े रह जाएँ --– सचमुच इसमें बड़ी निशानियाँ हैं हर उस आदमी के लिए, जो धीरज से काम लेता हो और शुक्र अदा करने वाला हो ---- (33)

या अगर वह [अल्लाह] चाहे, तो यात्रियों के (बुरे) कर्मों के चलते उन (जहाज़ों) को नष्ट कर दे --- वैसे अल्लाह बहुत माफ़ करनेवाला है ----  (34)

तो जो लोग हमारे संदेशों में झगड़े निकालते हैं, उन्हें जान लेना चाहिए कि उनके लिए भाग निकलने की कोई जगह नहीं है।  (35)

तुम्हें जो चीज़ मिली है, वह तो सांसारिक जीवन की (तेज़ी से) समाप्त होनेवाली सुख-सामग्री मात्र है। इससे कहीं बेहतर और लम्बे समय तक बाक़ी रहने वाली चीज़ तो अल्लाह अपने उन बंदों को देगा, जो अपने रब में विश्वास और भरोसा रखते हैं; (36)

जो बड़े-बड़े गुनाहों और अश्लील कर्मों [indecencies] से बचते है; जब उन्हें (किसी पर) ग़ुस्सा आता है तो वे क्षमा कर देते हैं; (37)

अपने रब का हुक्म मानते हैं; नमाज़ क़ायम करते हैं; काम-काज के मामलों में एक दूसरे से सलाह-मशविरा करते हैं; और जो कुछ (रोज़ी) हमने उन्हें दे रखी है उसमें से दूसरों पर भी ख़र्च करते हैं; (38)

और जब उन पर ज़ुल्म किया जाता है तो वे अपनी रक्षा करते हैं।  (39)

बुराई (नुक़सान) के बदले में ठीक उसी के बराबर बुराई (हानि) की जा सकती है, हालाँकि जो कोई माफ़ कर देता है और (मामले में) सुधार करता है, तो उसका इनाम उसे ख़ुद अल्लाह से मिलेगा --- वह ज़ुल्म करनेवालों को पसन्द नहीं करता।  (40)

अपने ऊपर ज़ु्ल्म होने के बाद, अगर कोई आदमी अपनी रक्षा करता है, तो उसके ख़िलाफ़ कार्रवाई करने का कोई कारण नहीं है, (41)

मगर उनके ख़िलाफ़ ज़रूर क़दम उठाना चाहिए जो लोगों पर ज़ुल्म करते हैं और धरती पर न्याय की तमाम सीमाओं को तोड़ डालते हैं---- ऐसे लोगों के लिए दर्दनाक यातना होगी---- (42)

किन्तु जो आदमी धीरज से काम लेता है और क्षमा कर देता है, तो यह बहुत हिम्मत (और महानता) का काम है। (43)

जिस आदमी को अल्लाह भटकता छोड़ दे, तो उसके बाद कोई और नहीं होगा जो उसकी मदद कर सके : [ऐ रसूल], आप ज़ालिमों को देखेंगे कि जब वे यातना को देख लेंगे तो कह रहे होंगे, "क्या अब लौटने का भी कोई रास्ता है?" (44)

और आप देखेंगे कि उन्हें उस (जहन्नम की) आग के सामने इस हालत में लाया जाएगा कि बेबसी और अपमान के कारण दबे हुए, और नज़रें चुरा रहे होंगे। जबकि जो लोग ईमान रखते थे, वे उस समय कहेंगे कि "निश्चय ही असल घाटे में वही हैं जिन्होंने क़यामत के दिन अपने आपको और अपने लोगों को घाटे में डाल दिया।सचमुच! शैतान लोग [ज़ालिम] कभी न ख़त्म होने वाली यातना में पड़े होंगे;  (45)

और उनके कोई साथी व मददगार भी न होंगे, जो अल्लाह के ख़िलाफ़ उनकी मदद कर सकें। (याद रहे) जिसे अल्लाह भटकता छोड़ दे, तो उसके लिए फिर (आगे बढने का) कोई रास्ता नहीं। (46)

[ऐ लोगो!] अपने रब की बात उस दिन के आने से पहले पहले मान लो जिसे अल्लाह की ओर से टाला नहीं जा सकता--- उस दिन तुम्हारे लिए न कोई शरण लेने की जगह होगी और न तुम्हारे लिए (अपने गुनाहों से) इंकार करना संभव होगा। (47)

अगर वे तब भी आपकी बातों से मुँह मोड़ें--- तो (याद रखें ऐ रसूल!) कि हमने आपको उन पर निगरानी रखनेवाला बनाकर तो भेजा नहीं है : आप पर तो केवल संदेश पहुँचा देने की ज़िम्मेदारी है। हाल यह है कि जब हम आदमी को अपनी ओर से दयालुता का मज़ा चखाते हैं, तो वह बहुत ख़ुश हो कर इतराने लगता है, और अगर ख़ुद अपने हाथों किए गए करतूत के कारण ऐसे लोगों को जब कोई मुसीबत आ पड़ती है, तो वह बड़ा नाशुक्रा [कृतघ्न /ungrateful] बन जाता है। (48)

अल्लाह की ही बादशाहत है आसमानों और ज़मीन पर; वह जो चाहता है पैदा करता है--- जिसे चाहता है लड़की प्रदान करता है, और जिसे चाहता है लड़का प्रदान करता है,  (49)

या लड़के और लड़कियाँ दोनों मिलाकर देता है, और जिसे चाहता है निस्संतान रखता है : वह सब कुछ जाननेवाला, बहुत ताक़तवाला है।  (50)

किसी इंसान की इतनी हैसियत नहीं कि अल्लाह उससे (सीधे-सीधे) बात करे, बल्कि (अल्लाह की बात) 'वही' [revelation] के द्वारा, या परदे के पीछे से (बिना दिखे) होती है, या यह कि वह एक संदेश लानेवाला (फ़रिश्ता) भेज दे, जो अल्लाह के हुक्म से 'वही' का संदेश पहुँचा दे : वह बहुत ऊँची शानवाला, बहुत समझ-बूझ रखनेवाला है। (51)

और इस तरह, [ऐ रसूल] हमने अपने आदेश से आपकी ओर 'वही'[revelation] के द्वारा एक रूह (क़ुरआन) उतारी है : आप इससे पहले न यह जानते थे कि किताब क्या होती है और न यह कि ईमान क्या होता है, मगर हमने इस किताब (क़ुरआन) को एक रौशनी बनाया, जिसके द्वारा हम अपने बन्दों में से जिसे चाहते हैं, मार्ग दिखाते हैं। इसमें कोई शक नहीं कि आप, लोगों को सीधा रास्ता दिखाते हैं,  (52)

जो अल्लाह का मार्ग है, वह अल्लाह, जिसके क़ब्ज़े में वह सब कुछ है जो आसमानों और ज़मीन में है : हक़ीक़त यह है कि सारे मामले अंत में अल्लाह  के ही ओर लौटेंगे।  (53)




सूरह 43: अज़-ज़ुख़रुफ़ [सोने के ज़ेवरों से सजावट / Ornaments of Gold]

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

हा॰ मीम॰ (1)

क़सम है उस किताब की जो चीज़ों को (साफ़ व) स्पष्ट करती है,  (2)

हमने इस क़ुरआन को अरबी भाषा में बनाया है ताकि तुम (लोग) समझ सको।  (3)

बेशक हमारे पास रखी हुईमूल किताब’ [लौह ए महफ़ूज़/Preserved Tablet] में इस [क़ुरआन] का बहुत ऊँचा स्थान है, और यह गहरी समझ-बूझ की बातों से भरी हुई है। 4

क्या हम तुम्हें नज़रअंदाज़ कर दें, और जो नसीहतें (क़ुरआन में) उतारी जा रही हैं, वह तुम पर से हटा लें, इसलिए कि तुम मर्यादाहीन लोग हो? (5)

हमने पहले के लोगों के पास कितने ही रसूल भेजे  (6)

और उन लोगों ने हर एक रसूल का मज़ाक़ उड़ाया; (7)

अन्ततः हमने उन लोगों को तबाह व बर्बाद कर दिया जो उन [मक्का के काफ़िरों] से ताक़त में कहीं अधिक थे और पहले के लोगों की मिसालें इतिहास में गुज़र-चुकी हैं।  (8)

अगर आप [ऐ रसूल], उनसे पूछें कि "आसमानों और ज़मीन को किसने पैदा किया?" तो वे अवश्य कहेंगे, "उन्हें ज़बरदस्त ताक़त [प्रभुत्व] वाले, सब कुछ जाननेवाले [रब] ने पैदा किया।" (9

वही है जिसने तुम्हारे लिए धरती को एक बराबर (बिछौने जैसा) कर दिया औऱ उसमें तुम्हारे लिए रास्ते बना दिए, ताकि तुम अपना रास्ता ढूंढ सको।   (10)

जो आसमान से (ज़रूरत के मुताबिक़) एक अन्दाज़े से पानी उतारता है --- हम उसके द्वारा मुर्दा ज़मीन को ज़िंदा कर देते हैं, ठीक इसी तरह, तुम्हें भी क़ब्रों से (ज़िंदा करके) निकाला जाएगा----   (11

उसने हर तरह की चीज़ें पैदा कीं, तुम्हें वे नौकाएँ (व जहाज़) और जानवर प्रदान किए, जिन पर तुम (पानी व धरती पर) सवार होते हो, (12

ताकि तुम जब उनपर बैठ कर सवारी करो, तो अपने रब की नेमतों को याद करो और कहो, "कितना महिमावान है वह जिसने इन (सवारियों) को हमारे वश में कर दिया; वरना हम में यह ताक़त नहीं थी कि उसे क़ाबू में कर सकते (13

और इसमें शक नहीं कि हम अपने रब की ओर लौट कर जानेवाले हैं।" (14)

इसके बावजूद, उन (मक्का के बहुदेववादियों) ने अल्लाह के अपने बन्दों में से (फ़रिश्तों को) उसकी औलाद [बेटी] ठहरा दिया! हक़ीक़त यह है कि आदमी बिल्कुल भी शुक्र अदा नहीं करता!  (15

भला क्या अल्लाह ने अपने लिए तो बेटियाँ पसंद की हैं और तुम्हें चुन लिया है बेटों के लिए? (16)

मगर हाल यह है कि जब उनमें से किसी को (बेटी पैदा होने की) ख़ुशख़बरी सुनायी जाती है, जबकि उस (बेटी) को इन लोगों ने अपने रहम करनेवाले रब [रहमान] के साथ जोड़ रखा है, तो उसका चेहरा काला पड़ जाता है और वह दुख में घुटता रहता है----  (17

(इस्लाम आने के पहले ऐसा माना जाता था..) “(लड़की) वह है जो सोने-चाँदी के ज़ेवरों के बीच पले बढे और जो वाद-विवाद में अपनी कोई बात ठीक ढंग से खुल कर रख भी न पाए”?  (18)

फ़रिश्तों को, जो रहम करनेवाले रब के बन्दे होते हैं, वे महिला मानते हैं। क्या वे उनकी रचना के समय मौजूद थे? उनके दावों को लिख लिया जाएगा, और उनसे इस बारे में (क़यामत के दिन) पूछताछ होगी। (19)

वे कहते हैं कि "यदि रहम करनेवाला रब [रहमान] चाहता, तो हमने उन (बुतों/फरिश्तों) की पूजा न की होती," मगर सच्चाई यह है कि उन्हें इसकी कोई जानकारी नहीं है; वे तो बस अटकल से काम ले रहे हैं----- ‌(20)

या क्या हमने इस किताब से पहले उनको कोई किताब दी थी जिसे यह थामे बैठे हैं? (21)

बिल्कुल नहीं! बल्कि वे कहते हैं, "हमने तो अपने बाप-दादाओं को इसी परम्परा पर चलते हुए पाया; हम तो उन्हीं के क़दमों के निशान पर चलते हुए सही मार्ग पर जा रहे हैं।" (22)

[ऐ रसूल] हमने आपसे पहले जब भी किसी बस्ती में सावधान करने के लिए कोई रसूल भेजा, तो वे लोग जो दौलत के नशे में बिगड़े हुए थे, उन लोगों ने भी वही कहा था कि "हमने तो अपने बाप-दादा को इसी परम्परा पर चलते हुए देखा है; और हम उन्हीं के पद-चिन्हों पर चलते हुए सही मार्ग पर जा रहे हैं। “  (23)

रसूल ने कहा, "अगर मैं तुम्हारे बाप-दादा की परम्पराओं से ज़्यादा सही मार्गदर्शन तुम्हारे लिए लेकर आऊँ, तो क्या तब भी तुम अपने बाप-दादा के ही रास्ते पर चलोगे?" उन्होंने जवाब में कहा, "तुम्हें जो संदेश देकर भेजा गया है, हम उसे मानने से इंकार करते हैं।" (24)

अन्ततः हमने उन्हें दंड दिया : आप सोचें कि किस तरह सच्चाई से इंकार करनेवाले अपने अंत को पहुँचे।  (25)

याद करें, जबकि इबराहीम [Abraham] ने अपने बाप और अपनी क़ौम से कहा था, "तुम जिनको पूजते हो, उन्हें मैं त्याग चुका हूँ;   (26)

मैं केवल उसी की इबादत करता हूँ जिसने मुझे पैदा किया, और वही मुझे सही मार्ग दिखाएगा,"  (27)

और इबराहीम इन बातें को अपनी संतानों के लिए वसीयत में छोड़ गया, ताकि वे (केवल अल्लाह की ओर) लौट सकें। (28)

मैंने उन लोगों को और उनके बाप-दादा को लम्बे जीवन का सुख उठाने दियाऔर अब मैंने उन्हें 'सच्ची बात' [क़ुरआन] और एक रसूल दिया है, ताकि वह चीज़ों को साफ़-साफ़ समझा सके---  (29)

फिर जब वह 'सच्ची बात' उनके पास पहुँच गयी, तो वे कहने लगे, "यह तो जादूगरी है. हम इसमें विश्वास नहीं करते हैं,"  (30)

और कहने लगे, "इस क़ुरआन को इन दो शहरों [मक्का या ताएफ़] के किसी बड़े आदमी पर क्यों नहीं उतारा गया?" (31)

(रसूलों को चुनना तो अल्लाह की रहमत है) तो भला क्या वे लोग आपके रब की रहमत [grace] को (अपने हिसाब से) बाँट सकते हैं? सांसारिक जीवन में उनकी रोज़ी-रोटी के साधन हमने ही उनके बीच बाँट रखे हैं, और हमने ही उनमें से कुछ लोगों को श्रेणियों में दूसरे लोगों से ऊँचा रखा है, ताकि वे एक-दूसरे से काम ले सकें : आपके रब की रहमत तो उस [दौलत] से कहीं अच्छी है जिसे वे जमा कर रहे हैं।  (32)

अगर इस बात की सम्भावना न होती कि सारी मानव-जाति [विश्वास न रखनेवाले-- काफ़िरों की] एक समुदाय हो जाएगी, तो जो लोग रहम करनेवाले रब [रहमान] को मानने से इंकार करते हैं, उनके लिए हम उनके घरों की छतें चाँदी की कर देते, और सीढ़ियाँ भी जिनपर वे चढ़ते हैं,  (33)

और घरों के दरवाज़े भी (चाँदी के कर देते) और वे तख़्त भी जिन पर वे तकिया लगा कर बैठते हैं, (34)

और बल्कि सोने के ज़ेवर (से सज़ा देते)। मगर सच्चाई यह है कि यह सब चीज़ें तो बस इसी सांसारिक जीवन के सुख व मज़े के सामान हैं; और आपके रब ने आने वाली दुनिया (के सुखों) को उन लोगों के लिए रखा है जो अल्लाह से डरते हुए अपने आपको बुराइयों से बचाए रखते हैं।  (35

जो कोई भी दयालु रब [रहमान] के ज़िक्र या उसकी याद से मुँह मोड़ता है, हम उसपर एक शैतान नियुक्त कर देते हैं, जो उसका साथी बन जाता है : (36

औऱ ये शैतान, लोगों को सीधे मार्ग से रोकते रहते हैं, जबकि (इंकार करनेवाले) यह समझते हैं कि वे ठीक मार्ग पर हैं, (37

यहाँ तक कि जब ऐसा आदमी हमारे पास आएगा, तो (अपने शैतान साथी से) कहेगा, "ऐ काश, मेरे और तेरे बीच इतनी दूरी होती जितनी पूरब और पश्चिम के दोनों किनारों में होती है, तू तो बहुत ही बुरा साथी निकला!" (38)

(उन लोगों से कहा जाएगा)तुम ने ग़लत काम किया है, और आज यह बात तुम्हें कुछ भी राहत न पहुँचा सकेगी कि यातना में तुम एक-दूसरे के साझेदार [Partner] हो।”  (39

तो क्या [ऐ रसूल] आप किसी बहरे को सुना सकते हैं? या उन्हें रास्ता दिखा सकते हैं जो अंधे हों या जो पूरी तरह से भटक चुके हों? (40)

अब तो यह होगा कि या तो हम आपको दुनिया से उठा लें और उन्हें दंड दें--- और वह तो हम ज़रूर दे कर रहेंगे ---   (41

या हम आपके सामने ही उनको वह सज़ा दें, जिसकी धमकी हमने उन्हें दे रखी है; वे पूरी तरह से हमारे क़ाबू में हैं। (42

अतः आप पर जो 'वही' [revelation] उतारी गयी है उसको मज़बूती से थामे रहें --- आप सचमुच सीधे मार्ग पर हैं---  (43)

क्योंकि यह (क़ुरआन), आपके लिए और आपकी क़ौम के लिए भी सचमुच एक याद दिलाने वाली [reminder] चीज़ है : तुम सबसे (इस पर अमल करने के बारे में) पूछा जाएगा।  (44

आप से पहले हम ने जो भी रसूल भेजे, उनसे पूछ लें :क्या हम ने कभी भी रहम करनेवाले रब [रहमान] को छोड़ कर, किन्हीं देवताओं [gods] को पूजने के लिए नियुक्त किया था?” (45)

और (देखो!), हमने मूसा [Moses] को अपनी निशानियों के साथ फ़िरऔन [Pharaoh] और उसके सरदारों के पास भेजा, तो उसने जाकर कहा, "मैं सचमुच सारे संसार के रब का रसूल हूँ।" (46

लेकिन जब उसने हमारी निशानियाँ उनके सामने पेश कीं, तो वे लगे उन (निशानियों) की हँसी उड़ाने,  (47)

हालाँकि हम ने उन्हें जो भी निशानी दिखायी, उसमें हर एक निशानी पिछली वाली से बढ़-चढ़कर थी। हमने उन्हें कड़ी यातना में भी डाला, ताकि वे सीधे रास्ते पर लौट सकें।   (48)

वे (यातना देख कर मूसा से) कहने लगते, "ऐ जादूगर! तेरे रब ने तुझ से जो प्रतिज्ञा कर रखी है, उस आधार पर अपने रब से हमारे लिए प्रार्थना कर दो : निश्चय ही हम (तुम्हारे मार्गदर्शन में) सीधे मार्ग पर आ जायेंगे, " (49)

फिर जैसे ही हम उनपर से यातना हटा देते, पल भर में वे प्रतिज्ञा तोड़ डालते थे।  (50

फ़िरऔन ने अपनी क़ौम के बीच पुकारकर कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! क्या मिस्र की सल्तनत मेरी नहीं? और ये नदियाँ जो मेरे (महलों के) नीचे बहती हैं, क्या यह मेरी नहीं? तो क्या तुम्हें दिखायी नहीं देता?  (51)

क्या मैं इस तुच्छ व गिरे हुए आदमी [मूसा] से बेहतर नहीं हूँ जो अपनी बात साफ़-साफ़ बोल भी नहीं पाता? (52

(यदि यह अल्लाह का भेजा हुआ रसूल है, तो) फिर उसके लिए सोने के कंगन क्यों नहीं दिए गए (जिसे यह पहन कर आता)? या फ़रिश्तों का दल उसकी अगुवाई में यहाँ साथ क्यों नहीं आया?" (53)

इस तरह, उसने अपनी क़ौम के लोगों को (अपनी बातों से) मोह लिया, औऱ उन्होंने उसकी बात मान ली ---  सचमुच वे भ्रष्ट [perverse] लोग थे। (54)

अन्ततः जब उन्होंने (मूसा की बात न मानकर) हमें अप्रसन्न कर दिया, तो हमने उन्हें सज़ा दी और उन सबको दरिया में डूबो दिया : (55)

इस तरह, हमने उन्हें एक गुज़री हुई चीज़ बना डाला और आगे आनेवाली पीढियों के लिए एक उदाहरण [Example] बना दिया।  (56)

और जब मरयम के बेटे [ईसा/Jesus] की मिसाल दी जाती है, तो उसपर [ऐ रसूल] आपकी क़ौम के लोग हँसते हैं, चिल्ला कर व्यंग्य करते हैं,  (57)

और कहते हैं, "हम जिन (फ़रिश्तों) को (अल्लाह की बेटी मानते हुए) पूजा करते हैं, वे बेहतर हैं या वह (ईसा, जिन्हें ईसाई अल्लाह का बेटा मानते हैं)?"---  वे केवल आपको चुनौती देने के लिए उनका उदाहरण देते हैं : वे बड़े ही झगड़ालू लोग हैं ----  (58

वह [ईसा मसीह] तो बस एक बंदे हैं, जिन पर हमने अपना ख़ास करम [favour] किया था और हमने उनको इसराईल की सन्तानों के लिए एक नमूना बनाया था :  (59)

अगर हमारी ऐसी इच्छा रही होती, तो (ठीक वैसे ही जैसे ईसा को बिना बाप के पैदा किया था), हम तुम में से फ़रिश्ते पैदा कर देते, जो धरती पर एक दूसरे के उत्तराधिकारी होते।  (60)

वह [क़ुरआन या ईसा का दोबारा आना] क़यामत की घड़ी की जानकारी देता है : अतः तुम उसके बारे में संदेह न करो। मेरी बात मानो कि यही सीधा रास्ता है; (61)

और (देखो!) ऐसा न हो कि शैतान तुम्हें कहीं उस रास्ते से रोक दे, क्योंकि वह तुम्हारा पक्का दुश्मन है। (62

जब ईसा स्पष्ट निशानियों के साथ आए, तो उन्होंने (लोगों से) कहा, "मैं तुम्हारे पास ज्ञान व समझदारी की बातें लेकर आया हूँ; मैं तुम्हारे लिए तुम्हारे कुछ मतभेदों को भी दूर करने आया हूँ। अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते रहो और मेरी बात मान लो : (63)

अल्लाह ही मेरा भी रब है और तुम्हारा भी, तो उसी की बन्दगी करो : यही सीधा मार्ग है।" (64

इसके बावजूद उनमें से कई गुट आपस में एक दूसरे से सहमत न हुए -– तबाही है शैतानी करनेवालों की : वे एक दर्दनाक दिन की यातना को झेलेंगे!  (65

ये लोग किस बात का इंतज़ार कर रहे हैं, क्या उस (क़यामत की) घड़ी का, जो अचानक उन पर आ पड़ेगी और उन्हें उसकी ख़बर तक न होगी? (66)

उस दिन सभी दोस्त एक-दूसरे के दुश्मन होंगे, मगर नेक व बुराइयों से बचनेवाले [मुत्तक़ी] लोगों को छोड़ कर ---- (67)

(मुत्तक़ी लोगों के बारे में कहा जायेगा) "ऐ मेरे बन्दों! आज तुम्हारे लिए न तो  कोई डर होगा, और न तुम (किसी बात पर) दुखी होगे" ---- (68

वे लोग जिन्होंने हमारी आयतों (की सच्चाई) में विश्वास किया और पूरी भक्ति से अपने आपको हमारे सामने झुकाया,  (69

[उनसे कहा जाएगा], "तुम और तुम्हारे जोड़ीदार [मर्द/औरत, spouses] दोनों, जन्नत के अंदर दाख़िल हो जाओ! : तुम ख़ुशी से खिल उठोगे!" (70

वहाँ [जन्नत में] उनके आसपास सोने की प्लेटें और प्याले घुमाए जाते रहेंगे और, दिल जिस चीज़ की भी इच्छा करे और आँखे जिससे ख़ुशी पाएँ, वह सब कुछ मौजूद होगा।" वहाँ तुम हमेशा के लिए रहोगे :  (71

यह है वह जन्नत, जो तुम्हें दिया जाता है, और अब से यह तुम्हारा अपना हुआ, यह नतीजा है उन कर्मों का जो तुम (दुनिया में) किया करते थे,  (72)

तुम्हारे खाने के लिए वहाँ बड़ी मात्रा में फल होंगे।" (73)

मगर शैतानियाँ करने वाले लोग जहन्नम की यातना में हमेशा रहेंगे,  (74)

जिससे कभी उन्हें कोई राहत (छूट) नहीं दी जाएगी : वे उस में बेहद निराश पड़े रहेंगे। (75)

हमने उनपर कभी कोई ज़ुल्म नहीं किया; असल में वे ही ज़ुल्म करनेवाले लोग थे। (76)

वे (जहन्नम के फ़रिश्ते से) पुकार कर कहेंगे, "ऐ मालिक! अच्छा हो कि तुम्हारा रब हमारा काम ही तमाम कर दे", मगर वह जवाब देगा, "नहीं, तुम्हें तो इसी हाल में रहना है।" (77

हम तुम्हारे पास सच्चाई लेकर आए हैं, मगर तुममें से अधिकतर लोग सच्चाई से नफ़रत करते हो।  (78)

क्या इन विश्वास न रखनेवाले (काफ़िरों) ने कोई नयी चाल सोची है? अगर ऐसा है, तो हम भी (इनके ख़िलाफ) प्लान बना रहे हैं।  (79)

क्या वे सोचते हैं कि हम उनकी छिपी बातें और उनकी कानाफूसी को सुन नही सकते? बिल्कुल सुन सकते हैं : हमारे भेजे हुए (फ़रिश्ते) उनके नज़दीक ही हैं, वे हर बात लिखते रहते हैं।" (80)

[ऐ रसूल] आप कह दें , "अगर रहम करनेवाले रब [रहमान] की (सचमुच) कोई औलाद होती, तो सबसे पहले मैं उनकी बंदगी करता, मगर ----- (81)

महिमा हो उसकी, जो आसमानों और ज़मीन का रब है, जो सिंहासन का स्वामी है--- वह उन बातों से कहीं ऊपर है जो वे उसके बारे में ग़लत बयान करते रहते हैं!" (82)

[ऐ रसूल] आप छोड़ दें उन्हें, ताकि वे व्यर्थ की बहस में पड़े रहें और बेकार के खेलों में लगे रहें, यहाँ तक कि उनका सामना उस दिन से हो जाए जिसका वादा उनसे किया जाता है।  (83)

वही [अल्लाह] है जो आसमानों में भी ख़ुदा है और धरती पर भी ख़ुदा है; वह (हर बात में) बहुत समझ-बूझ रखनेवाला, सब कुछ जाननेवाला है। (84

बड़ी ऊँची शान है उस [अल्लाह] की, जिसके क़ब्ज़े में हर वह चीज़ है जो आसमानों में है, जो ज़मीन पर है और जो कुछ उन दोनों के बीच में है; उसी के पास (आने वाली क़यामत की) घड़ी की जानकारी है; और उसी के पास तुम सब को लौटकर जाना होगा। (85)

यह लोग उस (अल्लाह) को छोड़कर जिन ख़ुदाओं को पुकारते हैं, उन्हें तो (अल्लाह से) पैरवी करने का भी कोई अधिकार नहीं है, हाँ उन लोगों की बात अलग है (जिन्हें अल्लाह ने ऐसा करने की अनुमति दी हो) जिन्होंने सच्ची बात की गवाही दी, और उस (सच्चाई) को पहचाना। (86)

और अगर आप [ऐ रसूल] इन लोगों से पूछें कि उनको किसने पैदा किया है, तो वह अवश्य ही यह कहेंगे किअल्लाह ने." इसके बावजूद कोई उन्हें कैसे बहका देता है? (87

अल्लाह के रसूल ने कहा कि, ”ऐ मेरे रब! यह ऐसे लोग हैं जो (एक अल्लाह में) विश्वास नहीं रखते,” (88

अत: [ऐ रसूल!] आप इनकी परवाह ना करें और कह दें, ”सलामती हो!”: बहुत जल्द इन्हें ख़ुद पता चल जायेगा!  (89)


सूरह 44 : अद-दुख़ान [धुआँ / The Smoke]

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

हा॰ मीम॰ (1)

क़सम है उस किताब की, जो चीज़ों (की सच्चाई) को स्पष्ट कर देती है,  (2)

सचमुच हमने उसे एक मुबारक [शुभ] रात में उतारा है—- हम ने हमेशा ही सावधान करने के लिए चेतावनियाँ भेजी हैं --  (3)

उस रात, जब समझ-बूझ [wisdom] के हर एक मामले को साफ़ व स्पष्ट कर दिया गया, (4)

हमारे हुक्म पर --- हम ने हमेशा ही आदमियों के पास (रसूलों द्वारा अपने) संदेश भेजे हैं --- (5)

जो (असल में, ऐ रसूल) आपके रब की रहमत [mercy] है, वह रब जो हर बात को सुनने वाला और हर चीज़ को जानने वाला है, (6)

जो सारे आसमानों और ज़मीन का और जो कुछ उन दोनों के बीच है, उन सबका रब है---- अगर तुम लोग सचमुच पक्का विश्वास रखनेवाले हो ---(7)

उस [अल्लाह] के अलावा कोई ख़ुदा नहीं : वही ज़िंदगी भी देता है और मौत भी --- वह तुम्हारा भी रब है और तुम्हारे बाप-दादाओं का भी रब है---  (8)

तब भी वे [इंकार करनेवाले] संदेह (की हालत) में पड़े रहते हैं, और किसी भी चीज़ को गंभीरता से नहीं लेते। (9)

सो, [ऐ रसूल] आप उस दिन का इंतज़ार करें, जब आसमान से धुएं के बादल आते दिखायी देंगे। (10)

जो लोगों को पूरी तरह से ढँक लेंगे । (वे चिल्ला कर कहेंगे)यह तो एक दर्दनाक सज़ा है! (11)

ऐ हमारे रब! हम पर से यह यातना हटा दे! अब हम (एक अल्लाह में) विश्वास करते हैं!" (12)

(मगर) उनके (अचानक) विश्वास कर लेने का तब क्या फ़ायदा होगा? जब उनके पास एक रसूल आया था जिसने साफ़ शब्दों में चेतावनियाँ दी थीं,  (13)

फिर भी उन्होंने यह कहते हुए उसकी ओर से मुँह मोड़ लिया कि, "यह तो सिखाया-पढ़ाया हुआ है!, दीवाना है!" (14)

"(अच्छा) हम इस यातना को थोड़ी देर के लिए रोक देते हैं---  तुम्हें लौटकर (हमारे पास) आना ही होगा -----  (15)

और जिस दिन हम (उन लोगों) को अपनी मज़बूत पकड़ में ले लेंगे, तो उस दिन हम पूरा बदला लेकर ही रहेंगे। (16)

उनसे पहले हम ने फ़िरऔन की क़ौम के लोगों की परीक्षा ली थी : उनके पास एक बहुत ही इज़्ज़त व गरिमा वाले रसूल [मूसा] को भेजा,   (17)

यह कहते हुए कि "तुम अल्लाह के बन्दों [इसराईल की संतानों] को मेरे हवाले कर दो! मैं विश्वास करने योग्य रसूल हूँ जो तुम्हारे पास भेजा गया हूँ। (18)

अपने आपको अल्लाह से ऊँचा न समझो! मैं तुम्हारे लिए एक स्पष्ट प्रमाण लेकर आया हूँ। (19)

और मैं इस बात से अपने रब और तुम्हारे रब की शरण लेता हूँ कि तुम मुझे बेइज़्ज़त करो या मुझ पर पत्थर बरसाओ,  (20)

किन्तु अगर तुम मेरी बात का विश्वास नहीं करते, तो (कम से कम) मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो!" (21)

(परेशान हो कर मूसा ने) अपने रब को पुकारा, "ये बड़े शैतान लोग हैं!" (22)

(अल्लाह ने जवाब दिया), "तुम रातों रात मेरे बन्दों को लेकर निकल भागो, निश्चय ही तुम्हारा पीछा किया जाएगा। (23)

अपने पीछे समुद्र के बीच से बने रास्ते को (पार करके) वैसा ही छोड़ जाना, (वहीं) उस [फ़िरऔन] के पूरे दल-बल को डुबा दिया जाएगा‌।" (24)

वे अपने पीछे (शहर में) कितनॆ ही बाग़ और पानी के सोते छोड़ गए,  (25)

और कितने खेत और शानदार रहने के मकान,  (26)

और सुख सामग्री, जिनमें उन्होंने मज़े किए थे :  (27)

हमने एक दूसरी क़ौम के लोगों को इन सभी (छोड़ी हुई) चीज़ों का वारिस बना दिया।  (28)

फिर न तो उनपर आसमान रोया और न ज़मीन, और न उन्हें कुछ मुहलत ही दी गयी। (29)

और हमने इसराईल की सन्तानों पर चली आ रही अपमानजनक यातना से छुटकारा दे दिया, (30)

जो फ़िरऔन के हाथों हो रही थी : वह बड़ा ही ज़ालिम था जिसने मर्यादा की सभी हदें पार कर ली थीं। (31)

और हमने उन (इसराईल की संतानों) को जानते-बूझते हुए सारे संसार की क़ौमों में से चुना था  (32)

और हमने उन्हें अपनी निशानियाँ [ revelations] दी थीं, जिनमें उनके लिए (इनाम के साथ) स्पष्ट परीक्षा थी।  (33)

ये लोग यहाँ (मक्का में) बड़ी दृढ़ता से कहते हैं, (34)

"बस हमारी पहली मृत्यु के बाद का जीवन कुछ नहीं है : हमें दोबारा ज़िंदा नहीं किया जाएगा।  (35)

(आगे कहते), अगर जो कुछ तुम कह रहे हो वह सच है, तो उठा लाओ हमारे बाप-दादा को!" (36)

क्या ये (लोग) यमन के बादशाहों [तुब्बा] की क़ौम से या उन क़ौम के लोगों से बेहतर हैं जो उनसे पहले गुज़र चुके? हमने उन सबको तबाह बर्बाद कर दिया---  सचमुच वे अपराधी थे। (37)

हमने आसमानों और ज़मीन को और जो कुछ उनके बीच में है, उन्हें बिना किसी मक़सद के खेल-तमाशे के लिए नहीं बनाया; (38)

हमने उन्हें एक सच्चे मक़सद के साथ पैदा किया है, मगर उनमें से अधिकतर लोग समझते नहीं हैं। (39)

फ़ैसले का दिन [क़यामत] उन सबके (ज़िंदा उठाए जाने के) लिए एक पहले से तय किया हुआ समय है;  (40)

जिस दिन कोई दोस्त, किसी दूसरे के कुछ काम न आ सकेगा।  (41)

उनमें से किसी की कोई मदद नहीं की जाएगी, सिवाए उन लोगों के जिन पर अल्लाह दया कर दे : वह बहुत ताक़तवाला, और बेहद दयावान रब है। (42)

ज़क़्क़ूम [काँटेदार फल] का पेड़  (43)

गुनहगारों का भोजन होगा :  (44)

पिघले हुए धातु जैसा (गर्म), वह लोगों के पेटों में (इस तरह) खौलेगा, (45)

जैसे गर्म पानी खौलता है।  (46)

(आदेश होगा), "पकड़ो उसे! और जहन्नम की गहराइयों के बीच तक घसीटते हुए ले जाओ!  (47)

फिर सज़ा के तौर पर उसके सिर पर खौलते हुए पानी को उंडेल दो!" (48)

"लो चखो मज़ा, तुम तो बड़े ताक़तवर, और इज़्ज़तदार आदमी बनते थे! (49)

यही तो है (वह जहन्नम), जिसके बारे में तुम संदेह करते थे।" (50)

(दूसरी तरफ़) वे लोग जिन्होंने अल्लाह का डर रखते हुए अपने आपको बुराइयों से बचाया होगा, वे सुरक्षित व अमन वाली जगह में होंगे, (51)

बाग़ों और पानी के सोतों [springs] के बीच,  (52)

रेशम और महीन ज़री के कपड़े पहने हुए, एक-दूसरे के आमने-सामने बैठे होंगे : (53)

ऐसा ही होगा। और हम बड़ी बड़ी व काली आँखोंवाली हूरों से उनकी शादी कर देंगे। (54)

वे वहाँ सुकून व इत्मिनान से (बैठे हुए) हर तरह के फल व मेवे मँगवा रहे होंगे। (55)

(दुनिया की) एक मौत के बाद, वहाँ (जन्नत में) वे मौत का मज़ा फिर कभी नहीं चखेंगे। अल्लाह उन्हें (जहन्नम की) आग की यातना से बचाए रखेगा,  (56)

यह सब तुम्हारे रब की तरफ़ से इनाम [bounty] है, और (इंसान के लिए) यही सबसे बड़ी कामयाबी है।  (57)

हमने इस (क़ुरआन) को समझने में आसान बनाया है --- [ऐ रसूल] आपकी अपनी (अरबी) भाषा में-- ताकि वे ध्यान दें और नसीहत ले सकें।  (58)

तो आप बस इंतज़ार करें; वे [अल्लाह पर विश्वास न रखनेवाले] भी इंतज़ार कर रहे हैं। (59)


सूरह 45 : अल जासिया [घुटनों के बल बैठना, Kneeling]

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

हा॰ मीम॰ (1)

इस किताब [क़ुरआन] को अल्लाह की तरफ़  से उतारा जा रहा है, जो बहुत ताक़त व इज़्ज़तवाला, गहरी समझ-बूझ रखनेवाला है।  (2)

सचमुच आसमानों और ज़मीन में विश्वास रखनेवालों के लिए बहुत-सी निशानियाँ हैं :  (3)

ख़ुद तुम्हारी रचना में, और सभी जीव-जंतुओं में जिनकी रचना करके अल्लाह ने धरती पर फैला रखा है, इनमें उन लोगों के लिए निशानियां हैं जो पक्का ईमान रखते हैं;  (4

रात और दिन के बारी बारी आने जाने में, और उस बारिश में जिसे अल्लाह आसमान से नीचे बरसाता है, जिससे मरी हुई धरती फिर से ज़िंदा हो उठती है, और (इसी तरह) हवाओं की दिशा बदल देने में भी उन लोगों के लिए बहुत-सी निशानियाँ हैं जो बुद्धि से काम लेते हैं।  (5)

[ऐ रसूल!] ये अल्लाह की निशानियाँ हैं, जिनके द्वारा हम आपको सच्चाई (दिखा और) सुना रहे हैं। अब अगर वे अल्लाह और उसकी उतारी गयी आयतों को भी मानने से इंकार करते हैं, तो आख़िर ये किस बात पर विश्वास करेंगे? (6)

तबाह हो जाए हर झूठ बोलनेवाला गुनहगार आदमी, (7)

जिसके सामने जब अल्लाह की उतारी गयी आयतें पढ़कर सुनाई जाती हैं, तो वह सुन लेता है, मगर तब भी वह घमंड के साथ (अपने इंकार पर) अड़ा रहता है मानो उसने कभी कुछ सुना ही नहीं----  अतः उसको दर्दनाक यातना कीसूचनादे दें! --- (8)

और जब वह हमारी उतारी गयी आयतों में से किसी बात को भी अगर जान लेता है, तो वह उसकी हँसी उड़ाता है!  ऐसे लोगों के लिए बेइज़्ज़त कर देनेवाली यातना होगी :   (9)

जहन्नम उनके पीछे (घात में लगी) है, जो भी (धन) उन्होंने कमाया, न तो वह उनके कुछ काम आएगा और न ही वे (झूठे देवता) काम आएंगे जिन्हें इन लोगों ने अल्लाह को छोड़कर अपने संरक्षक ठहरा रखे हैं --- एक ज़बरदस्त यातना उनके इंतज़ार में है। (10)

यह [क़ुरआन] एक दम सच्चा व सही मार्गदर्शन है; और जिन लोगों ने अपने रब की आयतों को मानने से इंकार किया, उन्हें हिला देनेवाली दर्दनाक यातना होगी।  (11)

वह अल्लाह ही है जिसने समुद्र को तुम्हारे लिए काम पर लगा दिया है--- उसके आदेश से उसमें जहाज़ें चलती हैं ताकि तुम उससे अपने लिए रोज़ी तलाश कर सको और उस (अल्लाह) का शुक्र अदा कर सको--- (12)

उसने अपनी तरफ़ से तोहफ़े के रूप में, आसमान और ज़मीन में जो कुछ भी है, उन सबको तुम्हारे फ़ायदे के लिए काम पर लगा रखा है। सचमुच उन लोगों के लिए इसमें निशानियाँ हैं जो सोच-विचार करते हैं।  (13)

[ऐ रसूल!] जो लोग ईमान रखते हैं उनसे कह दें कि, "वे उन लोगों (द्वारा किए गए बुरे सुलूक) को क्षमा कर दें जो लोग अल्लाह के (इस दुनिया में दंड देने वाले) दिनों का डर नहीं रखते----जैसे भी कर्म उन लोगों ने किए हैं, वह [अल्लाह] उन लोगों को उसका उचित बदला देगा।  (14)

जो कोई भी अच्छा कर्म करता है तो अपने ही फ़ायदे के लिए करता है, और जो कोई बुरा कर्म करता है तो वह अपना ही नुक़सान करता है : तुम सब को अपने रब की ओर ही लौट कर जाना होगा। (15

हमने इसराईल की सन्तानों को किताब, (नियम-क़ानून की) समझ-बूझ और पैग़म्बरी [Prophethood] प्रदान की थी; और हमने उन्हें अच्छी चीज़ो से रोज़ी दी और उन्हें सारे संसारवालों पर श्रेष्ठता दी थी; (16)

हमने इस (धर्म के) मामले में उन्हें साफ़ व स्पष्ट प्रमाण दिए थे। मगर इन (आदेशों) को जान लेने के बाद भी, आपसी दुश्मनी और जलन के कारण ही उन लोगों का आपस में मतभेद हो गया : आपका रब क़यामत के दिन उन बातों का फ़ैसला कर देगा, जिनमें वे आपस में मतभेद रखते थे। (17)

अब हमने आपको [ऐ रसूल] इस (धर्म के) मामले में साफ़ रास्ते (शरीअत) पर डाल दिया है, अतः आप उसी रास्ते पर चलते जाएं। और उन लोगों की इच्छाओं का पालन न करें जो सच्चाई की जानकारी नहीं रखते--- (18)

वे अल्लाह के मुक़ाबले में वैसे भी आपके कुछ काम नहीं आ सकते। हक़ीक़त यह है कि ग़लत काम करनेवालों के पास बस एक दूसरे का ही सहारा है; जबकि अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचनेवालों का मददगार ख़ुद अल्लाह है। (19

यह [क़ुरआन] लोगों में गहरी समझ-बूझ पैदा करने वाली, सही रास्ता दिखाने वाली, और पक्का विश्वास रखनेवाले लोगों के लिए (अल्लाह की) रहमत [mercy] है। (20)

क्या वे लोग जो बुरे कर्म करते रहते हैं, वे सचमुच ऐसा समझ बैठे हैं कि हम उनके साथ वैसा ही बर्ताव करेंगे जैसा कि उन लोगों के साथ करेंगे जो (अल्लाह में) विश्वास रखते हैं और अच्छे कर्म करते हैं, और यह कि उन (अच्छे और बुरे कर्म करने वालों) का जीना और मरना एक बराबर हो जाएगा? (अगर उनका यही फ़ैसला है तो) कितना ग़लत है उनका फ़ैसला!  (21)

अल्लाह ने आसमानों और ज़मीन को एक ख़ास मक़सद के साथ पैदा किया है : ताकि हर एक जान को उसके कर्मों के अनुसार बदला दिया जाए, और देते समय उन पर अन्याय न किया जाए।  (22)

[ऐ रसूल], आप उसके बारे में विचार करें जिसने अपने अंदर की इच्छाओं को ही अपना ख़ुदा बना लिया है, जिसे अल्लाह ने उसकी हालत जानते हुए भटकता छोड़ दिया, और उसके कानों और दिल को ठप्पा लगाकर बंद कर दिया, और उसकी आँखों पर पर्दा डाल दिया--- अब अल्लाह (की ऐसी मर्ज़ी) के बाद कौन है जो उसे मार्ग पर ला सकता है? तो क्या तुम (लोग) इससे शिक्षा नहीं लोगे? (23)

वे कहते हैं, "जो कुछ हमारी ज़िंदगी है वह तो बस इसी संसार की ज़िंदगी है : (इसी में) हम मरते हैं, जीते हैं, और कोई और नहीं बल्कि हमें तो काल (समय) ही मार डालता है।" हालाँकि इस बात की उनके पास कोई जानकारी नहीं है; वे तो बस अटकलें ही दौड़ाते हैं।  (24)

और जब उनके सामने हमारी स्पष्ट आयतें पढ़ कर सुनायी जाती हैं, तो वे अपने तर्क में केवल यही कहते हैं, "यदि तुम सच्चे हो, तो हमारे बाप-दादाओं को (ज़िंदा करके) ले आओ।" (25

[ऐ रसूल] आप कह दें, "अल्लाह ही तुम्हें जीवन देता है, फिर वहीं तुम्हें मौत देता है, फिर वही तुम सब को क़यामत के दिन इकट्ठा करेगा जिसमें कोई संदेह नहीं, मगर अधिकतर लोग यह बात नहीं समझतेI” (26)

आसमानों और ज़मीन की हर चीज़ अल्लाह के नियंत्रण व क़ाबू में है। जिस दिन वह (क़यामत की) घड़ी आ जाएगी, उस दिन असत्य पर जमे रहनेवाले भारी घाटा उठाएंगे।  (27

और (उस दिन) तुम हर एक गिरोह को देखोगे कि वह घुटनों के बल झुका हुआ है। हर गिरोह को अपने कर्मों का हिसाब देने के लिए बुलाया जाएगा : "आज तुम्हें उन कर्मों का बदला दिया जाएगा, जो तुम किया करते थे। (28)

"यह हमारा (तैयार किया हुआ) बही-खाता है, जो तुम्हारे बारे में सच सच बता रहा है : तुम जो कुछ भी करते थे, हम वह सब कुछ लिखवाते रहे हैं।" (29)

अतः जो लोग (अल्लाह में) विश्वास रखते थे और उन्होंने अच्छे कर्म किए, उन्हें तो उनका रब (दया दिखाते हुए) अपनी रहमत [mercy] में दाख़िल कर लेगा ----- यही सबसे स्पष्ट कामयाबी है --- (30)

रहे वे लोग जिन्होंने (सच्चाई पर) विश्वास करने से इंकार किया व कुफ़्र पर अड़े रहे (उनसे पूछा जाएगा), “तुम्हारे सामने जब हमारी आयतें पढ़कर सुनाई जाती थीं, तो क्या उस वक़्त तुम घमंड में चूर और कुकर्मों में डूबे हुए न थे?  (31)

और जब तुम से कहा जाता था, “अल्लाह का वादा सच्चा है : उस (क़यामत की) घड़ी में कोई संदेह नहीं है,” तो तुम जवाब में ऐसा नहीं कहते थे कि, "हम नहीं जानते कि वह घड़ी क्या है? हमारे विचार में तो बस यह अटकल लगाने जैसा लगता है, सो हम इसे सच नहीं मानते?“ (32)

(एक दिन आएगा कि) जो कुछ कुकर्म वे करते रहे थे, उसकी बुराइयाँ खुल कर उनके सामने आ जायेंगी, और जिस (दंड) की वे हँसी उड़ाया करते थे, वही उन्हें घेर लेगा।  (33)

और उनसे कह दिया जाएगा कि "आज हम तुम्हें ठीक वैसे ही भुला देंगे जैसे कि (दुनिया में) तुम इस बात को भुलाए बैठे थे कि तुम्हें इस दिन का सामना करना पड़ेगा। तुम्हारा ठिकाना अब (जहन्नम की) आग है और अब कोई तुम्हारी मदद करनेवाला नहीं है,  (34)

यह सब इसलिए कि तुमने अल्लाह की आयतों [संदेशों] की हँसी उड़ाई थी और सांसारिक जीवन ने तुम्हें धोखे में डाल रखा था।" अतः उस दिन न तो ऐसे लोगों को उस (आग) से बाहर निकाला जाएगा और न उन्हें अपनी ग़लती सुधारने का कोई मौक़ा ही दिया जाएगा। (35

अतः सारी तारीफ़ें अल्लाह ही के लिए हैं जो ज़मीन और आसमानों का मालिक है और सारे जहानवालों को पालनेवाला है। (36)

आसमानों और ज़मीन में असली महानता उसी की है : वह बहुत ताक़तवाला और (अपनी हर बात में) समझ-बूझ रखनेवाला है। (37)







Surah/सूरह 1: Al-Fatiha/अल-फ़ातिहा [(किताब की) शुरुआत/ The Opening]

       सूरह 1: अल-फ़ातिहा    [(किताब की) शुरुआत/ The Opening] यह एक मक्की सूरह है। पूरे क़ुरआन में अल्लाह का जो संदेश आया है , उसका इस सूरह मे...