Sunday, April 3, 2016

सूरह 44 : अद-दुख़ान [धुआँ / The Smoke]


सूरह 44: अद-दुख़ान 
[धुआँ / The Smoke]


02-08: यह किताब अल्लाह की तरफ़ से है

09-16: यातना आने ही वाली है

17-33: फ़िरऔन की कहानी और इसराईल की संतानें 

34-42: विश्वास न करने वालों ने दोबारा ज़िंदा उठाए जाने को ठुकराया 

43-50: बुरे लोगों की सज़ा 

51-57: अच्छे व नेक लोगों के लिए इनाम 

58-59: अंत में रसूल को सलाह 




अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

हा॰ मीम॰ (1)

क़सम है उस किताब [क़ुरआन] की, जो चीज़ों (की सच्चाई) को स्पष्ट कर देती है,  (2)

सचमुच हमने उसे एक मुबारक [शुभ] रात में उतारा है—- हमने हमेशा ही (लोगों को) सावधान करने के लिए चेतावनियाँ भेजी हैं ---  (3)

उस रात, जब समझ-बूझ [wisdom] के हर एक मामले को साफ़ व स्पष्ट कर दिया जाता है, (4)

हमारे हुक्म पर --- हमने हमेशा ही आदमियों के पास (रसूलों द्वारा अपने) संदेश भेजे हैं --- (5)

जो (असल में, ऐ रसूल) आपके रब की रहमत [mercy] है, वह रब जो हर बात को सुननेवाला और हर चीज़ को जाननेवाला है, (6)

जो सारे आसमानों और ज़मीन का और जो कुछ उन दोनों के बीच है, उन सबका रब है---- अगर तुम लोग सचमुच पक्का विश्वास रखने वाले हो ---(7)

उस [अल्लाह] के अलावा कोई ख़ुदा नहीं: वही ज़िंदगी भी देता है और मौत भी --- वह तुम्हारा भी रब है और तुम्हारे बाप-दादाओं का भी रब है---  (8)

तब भी वे [इंकार करनेवाले] संदेह (की हालत) में पड़े रहते हैं, और किसी भी चीज़ को गंभीरता से नहीं लेते। (9)


सो, [ऐ रसूल] आप उस दिन का इंतज़ार करें, जब आसमान से धुएं के बादल आते दिखायी देंगे। (10)

जो लोगों को पूरी तरह से ढँक लेंगे। (वे चिल्लाकर कहेंगे)यह तो एक दर्दनाक सज़ा है! (11)

ऐ हमारे रब! हम पर से यह यातना हटा दे! अब हम (एक अल्लाह में) विश्वास करते हैं!" (12)

(मगर) उनके (अचानक) विश्वास कर लेने का तब क्या फ़ायदा होगा? जब उनके पास एक रसूल आया था जिसने साफ़ शब्दों में चेतावनियाँ दी थीं,  (13)

फिर भी उन्होंने यह कहते हुए उसकी ओर से मुँह मोड़ लिया कि, "यह तो सिखाया-पढ़ाया हुआ है!, दीवाना है!" (14)

"(अच्छा) हम इस यातना को थोड़ी देर के लिए रोक देते हैं--- तुम ज़रूर (हमारे पास) लौट आओगे -----  (15)

और जिस दिन हम (उन लोगों) को अपनी मज़बूत पकड़ में ले लेंगे, तो उस दिन हम पूरा बदला लेकर ही रहेंगे। (16)


उनसे पहले हमने फ़िरऔन की क़ौम के लोगों की परीक्षा ली थी: उनके पास एक बहुत ही इज़्ज़त व गरिमावाले रसूल [मूसा] को भेजा,   (17)

यह कहते हुए कि "तुम अल्लाह के बन्दों [इसराईल की संतानों] को मेरे हवाले कर दो! मैं विश्वास करने योग्य रसूल हूँ जो तुम्हारे पास भेजा गया हूँ। (18)

अपने आपको अल्लाह से ऊँचा न समझो! मैं तुम्हारे लिए एक स्पष्ट प्रमाण लेकर आया हूँ। (19)

और मैं इस बात से अपने रब और तुम्हारे रब की शरण लेता हूँ कि तुम मुझे बेइज़्ज़त करो या मुझ पर पत्थर बरसाओ,  (20)

किन्तु अगर तुम मेरी बात का विश्वास नहीं करते, तो (कम से कम) मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो!" (21)


(परेशान होकर मूसा ने) अपने रब को पुकारा, "ये बड़े शैतान लोग हैं!" (22)

(अल्लाह ने जवाब दिया), "तुम रातों रात मेरे बन्दों को लेकर निकल भागो, निश्चय ही तुम्हारा पीछा किया जाएगा। (23)

अपने पीछे समुद्र के बीच से बने रास्ते को (पार करके) वैसा ही छोड़ जाना, (वहीं) उस [फ़िरऔन] के पूरे दल-बल को डुबा दिया जाएगा‌।" (24)

वे अपने पीछे (शहर में) कितनॆ ही बाग़ और पानी के सोते छोड़ गए,  (25)

और कितने खेत और शानदार रहने के मकान,  (26)

और सुख-सामग्री, जिनमें उन्होंने मज़े किए थे:  (27)

हमने एक दूसरी क़ौम के लोगों को इन सभी (छोड़ी हुई) चीज़ों का वारिस बना दिया।  (28)

फिर न तो उनपर आसमान रोया और न ज़मीन, और न उन्हें कुछ मुहलत ही दी गयी। (29)

और हमने इसराईल की सन्तानों पर चली आ रही अपमानजनक यातना से छुटकारा दे दिया, (30)

जो फ़िरऔन के हाथों हो रही थी: वह बड़ा ही ज़ालिम था जिसने मर्यादा की सभी हदें पार कर ली थीं। (31)

और हमने उन (इसराईल की संतानों) को जानते-बूझते हुए सारे संसार की क़ौमों में से चुना था  (32)

और हमने उन्हें अपनी निशानियाँ [revelations] दी थीं, जिनमें उनके लिए (इनाम के साथ) स्पष्ट परीक्षा थी।  (33)


ये लोग यहाँ (मक्का में) बड़ी दृढ़ता से कहते हैं, (34)

"बस हमारी पहली मृत्यु के बाद का जीवन कुछ नहीं है: हमें दोबारा ज़िंदा नहीं किया जाएगा।  (35)

(आगे कहते), अगर जो कुछ तुम कह रहे हो वह सच है, तो उठा लाओ हमारे बाप-दादा को!" (36)

क्या ये (लोग) यमन के बादशाहों [तुब्बा] की क़ौम से या उन क़ौम के लोगों से बेहतर हैं जो उनसे पहले गुज़र चुके? हमने उन सबको तबाह-बर्बाद कर दिया--- सचमुच वे अपराधी थे। (37)

हमने आसमानों और ज़मीन को और जो कुछ उनके बीच में है, उन्हें बिना किसी मक़सद के खेल-तमाशे के लिए नहीं बनाया; (38)

हमने उन्हें एक सच्चे मक़सद के साथ पैदा किया है, मगर उनमें से अधिकतर लोग समझते नहीं हैं। (39)


फ़ैसले का दिन [क़यामत] उन सबके (ज़िंदा उठाए जाने के) लिए एक पहले से तय किया हुआ समय है;  (40)

जिस दिन कोई दोस्त, किसी दूसरे के कुछ काम न आ सकेगा।  (41)

उनमें से किसी की कोई मदद नहीं की जाएगी, सिवाए उन लोगों के जिन पर अल्लाह दया कर दे: वह बहुत ताक़तवाला, और बेहद दयावान रब है। (42)

ज़क़्क़ूम [काँटेदार फल] का पेड़  (43)

गुनहगारों का भोजन होगा:  (44)

पिघले हुए धातु जैसा (गर्म), वह लोगों के पेटों में (इस तरह) खौलेगा, (45)

जैसे गर्म पानी खौलता है।  (46)

(आदेश होगा), "पकड़ो उसे! और जहन्नम की गहराइयों के बीच तक घसीटते हुए ले जाओ!  (47)

फिर सज़ा के तौर पर उसके सिर पर खौलते हुए पानी को उंडेल दो!" (48)

"लो चखो मज़ा, तुम तो बड़े ताक़तवर, और इज़्ज़तदार आदमी बनते थे! (49)

यही तो है (वह जहन्नम), जिसके बारे में तुम संदेह करते थे।" (50)

(दूसरी तरफ़) वे लोग जिन्होंने अल्लाह का डर रखते हुए अपने आपको बुराइयों से बचाया होगा, वे सुरक्षित व अमनवाली जगह में होंगे, (51)

बाग़ों और पानी के सोतों [springs] के बीच,  (52)

महीन रेशम और गाढ़े ज़री के कपड़े पहने हुए, एक-दूसरे के आमने-सामने बैठे होंगे: (53)

ऐसा ही होगा! और हम बड़ी-बड़ी व काली आँखोंवाली हूरों से उनकी शादी कर देंगे। (54)

वे वहाँ सुकून व इत्मिनान से (बैठे हुए) हर तरह के फल व मेवे मँगवा रहे होंगे। (55)

(दुनिया की) एक मौत के बाद, वहाँ (जन्नत में) वे मौत का मज़ा फिर कभी नहीं चखेंगे। अल्लाह उन्हें (जहन्नम की) आग की यातना से बचाए रखेगा,  (56)

यह सब तुम्हारे रब की तरफ़ से इनाम [bounty] है, और (इंसान के लिए) यही सबसे बड़ी कामयाबी है।  (57)


हमने इस (क़ुरआन) को समझने में आसान बनाया है --- [ऐ रसूल] आपकी अपनी (अरबी) भाषा में-- ताकि वे ध्यान दें और नसीहत ले सकें।  (58)

तो आप बस इंतज़ार करें; वे [अल्लाह पर विश्वास न रखनेवाले] भी इंतज़ार कर रहे हैं। (59)
 
 
 
नोट:

3: मुबारक रात से मतलब वही “क़द्र की रात” है जो रमज़ान के आख़िरी 10 रातों में से एक रात होती है, इसी रात क़ुरआन “लौह-ए-महफ़ूज़”[Preserved Tablet] से दुनिया के आसमान पर उतरी, और वहाँ से थोड़ा-थोड़ा करके मुहम्मद (सल्ल) पर उतरती रही।

4: यानी उस एक साल में जो महत्वपूर्ण घटनाएं होने वाली हैं, जैसे कि अमुक आदमी कब पैदा होगा, उसे कितनी रोज़ी दी जाएगी, कोई आदमी कब मरेगा आदि, इन सारी बातों पर अमल करने के लिए फ़रिश्तों को काम पर लगा दिया जाता है।

9: शाब्दिक अर्थ है कि “संदेह में पड़े हुए खेल करते रहते हैं।“

11: कुछ विद्वान उस धुएं वाले दिन को मुहम्मद साहब की ज़िंदगी के दौरान मक्का में होने वाले भयंकर सूखे और अकाल से जोड़ते हैं, जब ज़बरदस्त भूख के कारण जब वे आसमान की तरफ़ देखते तो उन्हें धुआँ ही धुआँ नज़र आता था, फिर उन लोगों ने वादा किया कि अगर अकाल ख़त्म हो जाए, तो वे विश्वास कर लेंगे, मगर जैसे ही मुसीबत टल गई, वे फिर अपने देवताओं की तरफ़ लौट आए…... मगर ज़्यादा सही यही लगता है कि यहाँ क़यामत के दिन के बारे में कहा गया है।

15: अगर ऊपर की आयत में क़यामत का दिन माना जाए, तो मतलब यह हो सकता है कि उस यातना को रोका नहीं जाएगा, बल्कि थोड़ी देर के लिए राहत दी जाएगी, और ऐसे में विश्वास न करने वाले [काफ़िर] फिर अपने पुराने विश्वास पर लौट आएंगे।

20: असल शब्द “र-ज-मा” है जिसका मतलब गालियाँ देना, बे-इज़्ज़त करना, पत्थर मारना, निकाल बाहर करना आदि होता है।

24: इस घटना का विस्तार से वर्णन सूरह यूनुस (10: 90-92) और सूरह शुअरा (26: 56-67) में देखा जा सकता है।

33: निशानियों का मतलब यहाँ पर वे इनाम हैं जो अल्लाह ने इसराईल की संतानों पर किए थे, जैसे खाने के लिए “मन और सलवा” का उतारा जाना, पत्थर् से पानी के सोतों का फूटना आदि जिसका ज़िक्र सूरह बक़रा (2: 47-58) में आया है।

37: “तुब्बा” यमन के बादशाहों की उपाधी थी, प्राचीन काल में दक्षिण अरब के क्षेत्रों में इनकी हुकूमत काफ़ी सालों तक रही थी जहाँ एक के बाद एक बड़े मज़बूत शासक हुए थे।

39: सच्चा मक़सद यही है कि दुनिया में किए गए कर्मों के अनुसार अच्छा कर्म करने वालों को इनाम मिले और बुरे कर्म करने वालों को दंड मिले।

59: मुहम्मद (सल्ल) को मक्का के अपने विरोधियों के ख़िलाफ़ मदद के लिए और मिलने वाली जीत के लिए इंतज़ार करने को कहा गया है। जबकि मक्का के विरोधी मुहम्मद साहब की तबाही और उनकी मौत का इंतज़ार कर रहे थे।  

  

 



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