02-08: यह किताब अल्लाह की तरफ़ से है
09-16: यातना आने ही वाली है
17-33: फ़िरऔन की कहानी और इसराईल की संतानें
34-42: विश्वास न करने वालों ने दोबारा ज़िंदा उठाए
जाने को ठुकराया
43-50: बुरे लोगों की सज़ा
51-57: अच्छे व नेक लोगों के लिए इनाम
58-59: अंत में रसूल को सलाह
3: मुबारक रात से मतलब वही “क़द्र की रात” है जो रमज़ान के आख़िरी 10 रातों में से एक रात होती है, इसी रात क़ुरआन “लौह-ए-महफ़ूज़”[Preserved Tablet] से दुनिया के आसमान पर उतरी, और वहाँ से थोड़ा-थोड़ा करके मुहम्मद (सल्ल) पर उतरती रही।
4: यानी उस एक साल में जो महत्वपूर्ण घटनाएं होने वाली हैं, जैसे कि अमुक आदमी कब पैदा होगा, उसे कितनी रोज़ी दी जाएगी, कोई आदमी कब मरेगा आदि, इन सारी बातों पर अमल करने के लिए फ़रिश्तों को काम पर लगा दिया जाता है।
9: शाब्दिक अर्थ है कि “संदेह में पड़े हुए खेल करते रहते हैं।“
11: कुछ विद्वान उस धुएं वाले दिन को मुहम्मद साहब की ज़िंदगी के दौरान मक्का में होने वाले भयंकर सूखे और अकाल से जोड़ते हैं, जब ज़बरदस्त भूख के कारण जब वे आसमान की तरफ़ देखते तो उन्हें धुआँ ही धुआँ नज़र आता था, फिर उन लोगों ने वादा किया कि अगर अकाल ख़त्म हो जाए, तो वे विश्वास कर लेंगे, मगर जैसे ही मुसीबत टल गई, वे फिर अपने देवताओं की तरफ़ लौट आए…... मगर ज़्यादा सही यही लगता है कि यहाँ क़यामत के दिन के बारे में कहा गया है।
15: अगर ऊपर की आयत में क़यामत का दिन माना जाए, तो मतलब यह हो सकता है कि उस यातना को रोका नहीं जाएगा, बल्कि थोड़ी देर के लिए राहत दी जाएगी, और ऐसे में विश्वास न करने वाले [काफ़िर] फिर अपने पुराने विश्वास पर लौट आएंगे।
20: असल शब्द “र-ज-मा” है जिसका मतलब गालियाँ देना, बे-इज़्ज़त करना, पत्थर मारना, निकाल बाहर करना आदि होता है।
24: इस घटना का विस्तार से वर्णन सूरह यूनुस (10: 90-92) और सूरह शुअरा (26: 56-67) में देखा जा सकता है।
33: निशानियों का मतलब यहाँ पर वे इनाम हैं जो अल्लाह ने इसराईल की संतानों पर किए थे, जैसे खाने के लिए “मन और सलवा” का उतारा जाना, पत्थर् से पानी के सोतों का फूटना आदि जिसका ज़िक्र सूरह बक़रा (2: 47-58) में आया है।
37: “तुब्बा” यमन के बादशाहों की उपाधी थी, प्राचीन काल में दक्षिण अरब के क्षेत्रों में इनकी हुकूमत काफ़ी सालों तक रही थी जहाँ एक के बाद एक बड़े मज़बूत शासक हुए थे।
39: सच्चा मक़सद यही है कि दुनिया में किए गए कर्मों के अनुसार अच्छा कर्म करने वालों को इनाम मिले और बुरे कर्म करने वालों को दंड मिले।
59: मुहम्मद (सल्ल) को मक्का के अपने विरोधियों के ख़िलाफ़ मदद के लिए और मिलने वाली जीत के लिए इंतज़ार करने को कहा गया है। जबकि मक्का के विरोधी मुहम्मद साहब की तबाही और उनकी मौत का इंतज़ार कर रहे थे।
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