सूरह 35: फ़ातिर
[पैदा करनेवाला / The Creator]
01-17: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ
18-26: रसूल का उत्साह बढ़ाना
27-28: प्रकृति और लोग भिन्न-भिन्न तरह के हैं
29-40: इनाम और सज़ाएं
41-45: विश्वास न करने वाले ज़िद्दी और हठधर्म हैं
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
सारी की सारी प्रशंसाएं अल्लाह के लिए हैं, जो आसमानों और ज़मीन का पैदा करनेवाला है, जिसने दो-दो, तीन-तीन और चार-चार परोंवाले फ़रिश्तों को संदेश ले जाने के लिए रखा है। वह जब चाहता है अपनी की हुई रचना में कुछ और चीज़ जोड़ देता है: बेशक अल्लाह हर चीज़ की ताक़त रखता है। (1)
अल्लाह अपनी रहमत [blessing] को अगर लोगों के लिए खोल दे, तो कोई नहीं है जो उसे रोक सके, और जिसे वह रोक ले, तो कोई नहीं है जो उसके बाद उसे जारी कर सके: उसे हर चीज़ की ताक़त है, और उसे हर चीज़ की समझ-बूझ है। (2)
ऐ लोगो! याद करो उन नेमतों को जो अल्लाह ने तुम पर की हैं, क्या अल्लाह को छोड़कर कोई और पैदा करने वाला है, जो तुम्हें आसमान और ज़मीन से रोज़ी देता हो? उसके सिवा कोई पूजने योग्य नहीं है। तो आख़िर, तुम किस धोखे में पड़े हुए हो? (3)
[ऐ रसूल] अगर वे आपको झूठा बता रहे हैं, तो (जान लें कि) आपसे पहले भी रसूलों को झूठा बताया जा चुका है: सारे मामले अल्लाह की तरफ़ ही लौटकर जाने वाले हैं। (4)
ऐ लोगो! यक़ीन करो कि अल्लाह का वादा सच्चा है, अतः सांसारिक जीवन तुम्हें कहीं धोखे में न डाल दे। और देखना, कहीं वह धोखेबाज़ [शैतान] तुम्हें अल्लाह के बारे में धोखे में न डाल पाए: (5)
शैतान तुम्हारा दुश्मन है---- अतः तुम उसके साथ दुश्मनों जैसा ही बर्ताव करो---- वह तो अपने माननेवालों को केवल इसीलिए बुलाता है कि उन्हें (जहन्नम की) दहकती आग में जाने वालों का साथी बना सके। (6)
वे लोग जिन्होंने विश्वास करने से इंकार किया, उनको कठोर दंड दिया जाएगा; किन्तु जिन लोगों ने विश्वास रखा और अच्छे कर्म किए--- उनके (गुनाहों को) माफ़ कर दिया जाएगा, और उन्हें बड़ा इनाम दिया जाएगा। (7)
उन लोगों के बारे में क्या कहा जाए जिनके लिए उनके बुरे कर्मों को आकर्षक बना कर पेश किया गया हो, ताकि वे उन कर्मों को (बुरा समझने के बजाए) अच्छा समझें? (तो क्या वे बुराई को छोड़ेंगे)? निश्चय ही अल्लाह जिसे चाहता है, मार्ग से भटकता छोड़ देता है, और जिसे चाहता है सीधा मार्ग दिखा देता है। अतः [ऐ रसूल] आपको इन लोगों के दुख में घुलकर अपनी जान गँवाने की कोई ज़रूरत नहीं: अल्लाह भली-भाँति जानता है जो कुछ वे करते हैं। (8)
वह अल्लाह ही है जो हवाएँ भेजता है; वह (हवाएं) बादलों को ऊपर उठाती हैं; फिर हम उसे किसी सूखी पड़ी हुई मुर्दा ज़मीन की ओर ले जाते हैं, फिर हम उस (बारिश) के द्वारा मुर्दा ज़मीन में एक नयी जान डाल देते हैं: इसी तरह (मुर्दा पड़े लोगों को) दोबारा जीवित कर उठाया जायेगा। (9)
अगर कोई इज़्ज़त व ताक़त हासिल करना चाहता हो, तो (वह यह जान ले कि) इज़्ज़त व ताक़त तो सारी की सारी अल्लाह के क़ब्ज़े में है; साफ़ व अच्छी बातें उस [अल्लाह] तक (चढ़कर) पहुँचती हैं, और वही अच्छे कर्मों को (दर्जे के मुताबिक़) ऊँचा उठाता है, मगर जो लोग शैतानी चालें चलते रहते हैं, उनके लिए दर्दनाक यातना होगी और उनकी तमाम चालें बेकार होकर रह जाएंगी। (10)
वह अल्लाह है जिसने तुम्हें मिट्टी से पैदा किया, फिर उसके बाद एक बूँद (वीर्य, semen) से; फिर तुम्हें (मर्द और औरत के) जोड़े में बनाया; उसकी जानकारी के बिना न कोई औरत गर्भवती होती है और न बच्चे को जन्म देती है; न कोई आदमी लम्बी आयु पाकर बुढ़ापे को पहुँचता है और न किसी की आयु में कमी हो जाती है--- यह सब एक किताब में लिखे अनुसार होता है: और यह सब अल्लाह के लिए बहुत ही आसान है। (11)
पानी के दो सागर एक समान नहीं होते---- एक मीठा, प्यास बुझानेवाला और पीने में मज़ेदार और दूसरा खारा और कड़ुवा है--- मगर तब भी तुम दोनों से ताज़ा (मछलियों का) माँस खाते हो और आभूषण (मोती, मूंगा) निकालते हो जिसे तुम पहनते हो, और दोनों में ही तुम नौकाओं (जहाज़ों) को देखते हो कि पानी को चीरती हुई उसमें चली जा रही हैं, ताकि तुम उस [अल्लाह] की दी हुई रोज़ी को (व्यापार द्वारा) तलाश कर सको और (उसकी दी हुई नेमतों का) आभार मानो। (12)
वह रात को दिन में मिला देता है और दिन को रात में मिला देता है; उसने सूरज और चाँद को (एक व्यवस्था के अनुसार) काम में लगा रखा है---- (इनमें) प्रत्येक एक नियत अवधि तक के लिए (अपने मार्ग पर) चल रहा है। वही अल्लाह तुम्हारा रब है: सारी चीज़ पर उसी का क़ब्ज़ा है। उसको छोड़कर जिन (देवताओं) को तुम पूजते हो, वे एक खजूर की ग़ुठली के छिलके के बराबर भी कोई अधिकार नहीं रखते; (13)
अगर तुम उन्हें पुकारो, तो वे तुम्हारी पुकार सुनेंगे ही नहीं; और अगर वे सुन पाते, तो भी कोई जवाब नहीं दे पाते; और क़यामत के दिन वे ख़ुद तुम्हारी मूर्तिपूजा को अस्वीकार करते हुए तुम से अलग हो जाएंगे। [ऐ रसूल] कोई भी आपको ऐसी ख़बर नहीं बता सकता जैसी कि वह [अल्लाह] बताता है जो हर चीज़ की पूरी ख़बर रखता है। (14)
ऐ लोगो! यह तुम ही हो जिसे (हर चीज़ के लिए) अल्लाह की ज़रूरत है--- अल्लाह को तो किसी चीज़ की ज़रूरत नहीं, सारी प्रशंसा के योग्य वही है--- (15)
अगर वह चाहे तो तुम्हें मिटा दे और (उसकी जगह) एक नई सृष्टि [creation] ले आए, (16)
और यह काम अल्लाह के लिए कुछ भी मुश्किल नहीं। (17)
कोई बोझ उठानेवाला किसी दूसरे (के गुनाहों) का बोझ नहीं उठाएगा: यहाँ तक कि अगर कोई भारी बोझ से दबा हुआ आदमी भी मदद के लिए पुकारे, तब भी उसका बोझ कोई नहीं उठाएगा, चाहे वह उसका नज़दीकी सम्बन्धी ही क्यों न हो। मगर [ऐ रसूल] आप तो केवल उन्हें सावधान कर सकते हैं जो अपने रब से डरते हों, हालाँकि उसे देख भी नहीं सकते, और नमाज़ को पाबन्दी से पढ़ते हों---- और जिस किसी ने (बुराइयों से) अपने आपकी शुद्धी की, तो यह काम उसने अपने ही भले के लिए किया--- और हर चीज़ को लौटकर अल्लाह ही के पास जाना है। (18)
आँख से अंधा और आँखोंवाला बराबर नहीं होते, (19)
और न अँधेरा और उजाला, (20)
और न ज़िंदा और मरा हुआ बराबर है। निश्चय ही अल्लाह जिसे चाहता है (अपना संदेश) सुनाता है: तुम उन लोगों को नहीं सुना सकते, जो क़ब्रों में पड़े हों। (22)
आप तो बस एक सावधान करनेवाले हैं---- (23)
हमने आपको सच्चाई की बात देकर इस तरह भेजा है कि आप (नेक लोगों को) अच्छी ख़बर सुना दें, और (बुरे लोगों को) अल्लाह का डर सुनाकर सावधान कर दें --- और कोई क़ौम ऐसी नहीं हुई जहाँ उन्हें सावधान करने वाला न आया हो। (24)
यदि वे [मक्का के काफ़िर] आपको झूठा बतला रहे हैं, तो जो (काफ़िर लोग) उनसे पहले गुज़र चुके हैं, उन्होंने भी (अपने रसूलों) को झूठा बताया था। कई पैग़म्बर [messengers] उनके पास स्पष्ट निशानियाँ, आसमानी सहीफ़े [ज़बूर/ Psalms] और (ज्ञान से भरी) रौशन किताब लेकर आए थे, (25)
फिर मैंने (सच्चाई से) इंकार पर अड़े लोगों को धर दबोचा--- तो फिर देखो कि कैसी भयानक थी मेरी सज़ा! (26)
क्या [ऐ रसूल] आपने नहीं देखा कि अल्लाह ने आसमान से पानी बरसाया, फिर उसके द्वारा हमने रंग बिरंग के फल निकाले; (इसी तरह) पहाड़ों में भी सफ़ेद और लाल रंगों की रंग बिरंगी धारियाँ हैं, और कुछ बिल्कुल काली भी; (27)
और यह कि इंसानों, जानवरों और चौपायों के रंग भी तरह तरह के हैं? और अल्लाह से सही मायने में तो उसके वही बंदे डरते हैं, जो (इन सच्चाइयों को) अच्छी तरह जानते-समझते हैं। निश्चय ही सारी ताक़त भी अल्लाह के पास है, और सबसे ज़्यादा माफ़ करने वाला भी वही है। (28)
जो लोग अल्लाह की किताब पढ़ते हैं, नमाज़ के पाबन्द हैं, और जो कुछ (रोज़ी) हमने उन्हें दे रखी है, उसमें से (अच्छे कामों पर) छिपाकर भी और दिखाकर भी ख़र्च करते हैं, वे एक ऐसे व्यापार की आशा रख सकते हैं जो कभी मंदा न होगा: (29)
अल्लाह उन्हें इसका पूरा पूरा इनाम देगा, बल्कि अपने ख़ज़ाने से और बढ़ाकर देगा। इस में शक नहीं कि वह बहुत माफ़ करनेवाला और अच्छाई की बहुत क़द्र करनेवाला है। (30)
[ऐ रसूल] हमने जो किताब आपके पास उतारकर भेजी है, वह सच्ची है और अपने से पहले की (आसमानी) किताबों की (सच्चाई की) पुष्टि [confirm] करती है। निश्चय ही अल्लाह अपने बन्दों की पूरी ख़बर रखता है और सब कुछ देखता है। (31)
फिर हमने अपने चुने हुए बंदों को इस किताब का उत्तराधिकारी बनाया: उनमें से कुछ तो ऐसे थे जिन्होंने ख़ुद अपनी जानों पर ज़ुल्म किया, कुछ थे जो (सही और ग़लत के) बीच-बीच में रहनेवाले थे, और उनमें कुछ अल्लाह की कृपा से, अच्छे कामों में आगे-आगे रहने वाले थे। यही सबसे बड़ा फ़ज़ल [favour] है: (32)
वे हमेशा रहने वाले बाग़ों [Gardens] में प्रवेश करेंगे जहाँ उन्हें सोने के कंगनों और मोतियों से सजाया जाएगा, और वहाँ वे रेशम के कपड़े पहनेंगे। (33)
वे कहेंगे, "सब प्रशंसा अल्लाह के लिए है, जिसने हमसे हर तरह के दुख दूर कर दिए! सचमुच हमारा रब बड़ा माफ़ करनेवाला और (भलाई की) बहुत क़द्र करनेवाला है: (34)
जिसने अपनी असीम कृपा से, हमें सदैव रहने के ऐसे घर में ठहराया जहाँ हमें न कोई मशक़्क़त उठानी पड़ेगी और न कोई थकान ही होगी।" (35)
मगर जिन लोगों ने सच्चाई (को मानने) से इंकार किया, वे जहन्नम की आग में रहेंगे, न उनका काम तमाम किया जाएगा कि मर ही जाएँ और न उनसे जहन्नम की यातना ही कुछ हल्की की जाएगी: और हम ऐसा ही बदला शुक्र न अदा करनेवाले हर काफ़िर को देते हैं। (36)
वे जहन्नम में चिल्ला-चिल्लाकर कहेंगे कि "ऐ हमारे रब! हमें यहाँ से बाहर निकाल दे, और अब हम अच्छे कर्म करेंगे, पहले की तरह (बुरे कर्म) नहीं करेंगे!"—-- (जवाब में कहा जाएगा), "क्या हमने तुम्हें इतनी ज़िंदगी नहीं दी थी कि अगर तुम समझना चाहते तो उन चेतावनियों को सुनकर होश में आ जाते? और तुम्हारे पास सावधान करनेवाला [रसूल] भी तो आया था, तो अब चखो मज़ा अपनी सज़ा का!” शैतानी करने वालों को मदद करने वाला कोई नहीं होगा! (37)
निस्संदेह अल्लाह आसमानों और ज़मीन की छिपी हुई तमाम चीज़ों को जानता है; वह तो दिलों के अंदर पैदा होने वाले ख़्याल तक को जानता है; (38)
वही है जिसने तुम (लोगों) को ज़मीन में (पहले गुज़र चुके लोगों का) उत्तराधिकारी [ख़लीफ़ा] बनाया। अब जो सच्चाई को मानने से इंकार करेगा, उसे इसका नतीजा भुगतना होगा: उन लोगों का इंकार उनके रब के ग़ुस्से को और ज़्यादा भड़का देगा, और इससे उनका नुक़सान ही बढ़ेगा। (39)
[ऐ रसूल] आप कहें, "क्या तुमने अपने उन (अल्लाह के) ‘साझेदारों [Partners] के बारे में विचार किया, जिन्हें तुम अल्लाह को छोड़कर पुकारते हो? मुझे ज़रा दिखाओ उन्होंने धरती का कौन-सा भाग पैदा किया है? या आसमानों के कितने भाग के वह मालिक हैं?" क्या हमने उन्हें कोई किताब दे रखी है जिसमें इन बातों का कोई स्पष्ट प्रमाण मौजूद है? बिल्कुल नहीं! असल में, मुशरिक लोग [Idolaters] आपस में एक-दूसरे से केवल धोखे का वादा करते हैं। (40)
अल्लाह ने आसमानों और ज़मीन को इस तरह थाम रखा है कि वे (अपनी जगह और रास्ते से) हट नहीं सकते; और अगर वे हट जाएँ, तो उसके बाद कोई नहीं जो उन्हें थाम सके। निस्संदेह, वह बहुत सहनशील, बड़ा माफ़ करनेवाला है। (41)
उन (मुशरिक लोगों/ The Idolaters] ने बड़ी-बड़ी क़समें खाई थीं कि यदि उनके पास कोई सावधान करने वाला [रसूल] आए, तो वे अन्य दूसरी क़ौमों से बढ़कर सीधे मार्ग को अपनाएंगे, किन्तु जब उनके पास एक सावधान करने वाला आ गया, तो वे (सच्चाई से) और ज़्यादा दूर भाग गए, (42)
इसलिए कि ज़मीन में वे (अपने को बड़ा समझते हुए) और भी घमंडी हो गए, और उनकी शैतानी चालों में और भी तेज़ी आ गयी--- मगर जो शैतानी चालें चलते हैं, वह ख़ुद ही अपनी चालों के घेरे में आ जाते हैं। जैसा उनसे पहले गुज़र चुके लोगों के साथ हुआ, क्या वे उससे कुछ अलग बर्ताव की उम्मीद लगाए बैठे हैं? वैसे तुम अल्लाह की रीति में कभी कोई परिवर्तन नहीं पाओगे; और न तुम कभी उसमें कोई फेर-बदल ही पाओगे। (43)
क्या उन लोगों ने ज़मीन में चल-फिर कर देखा नहीं कि उनसे पहले गुज़रे हुए लोगों का कैसा परिणाम हुआ? हालाँकि वे शक्ति में उनसे कही बढ़-चढ़कर थे? और आसमानों और ज़मीन में कोई चीज़ भी ऐसी नहीं जो अल्लाह को तंग [आजिज़/ frustrate] कर सके: निस्संदेह वह सब जानता है, और हर चीज़ की ताक़त रखता है। (44)
अगर अल्लाह लोगों को उनके ग़लत काम करने के चलते (उसी समय) दंड देने लग जाए, तो इस ज़मीन की सतह पर एक भी जीव बाक़ी न बचेगा। किन्तु वह उन्हें एक नियत समय तक ढील देता है, और फिर जब उनका नियत समय आ जाता है, तो अल्लाह ख़ुद ही अपने बंदों को देख लेगा। (45)
नोट:
8: यहाँ यह मतलब नहीं है कि अल्लाह जिसको चाहता है, उसे ज़बरदस्ती गुमराह कर देता है, बल्कि बात यह है कि जब कोई आदमी अपनी ज़िद और हठधर्मी के चलते ग़लत रास्ता अपना लेने पर अड़ा रहता है, तो फिर अल्लाह भी उसके दिल को ठप्पा लगाकर बंद कर देता है, और उसे भटकता छोड़ देता है। देखें सूरह बक़रा [2: 7]
10: अच्छी व भलाई की बातें अल्लाह तक पहुँचती हैं, और वह उन बातों को अच्छे कर्मों के ज़रिये क़बूल करता है।
22: यहाँ मुहम्मद (सल्ल) को तसल्ली दी गई है कि अगर मक्का के लोग आपके द्वारा लाए गए संदेश की सच्चाई को क़बूल नहीं कर रहे हैं, तो आप दुखी न हों, आप इसके लिए ज़िम्मेदार नहीं हैं।
32: मुसलमानों को किताब का वारिस बनाया गया है, फिर ईमान रखने के बावजूद उनमें भी तीन तरह के लोग पाए जाते हैं:
(क) जो अल्लाह के हुक्म के अनुसार काम नहीं करते, और हर तरह के गुनाह भी करते रहते हैं, यानी वे अपनी जानों पर ज़ुल्म कर रहे हैं।
(ख): जो ज़रूरी हुक्मों को मानते हैं, बुराइयों से भी बचते हैं, मगर भलाई के बहुत से ऐसे काम हैं जो उन्हें करने चाहिए, मगर वे नहीं करते। वह बीच के दर्जे के हैं।
(ग): जो वह सारे भलाई के काम करते हैं जो चाहे ज़रूरी हों, या optional हों। वह इबादत में भी उसी लगन से लगे रहते हैं।