Sunday, June 12, 2016

सूरह 34 : सबा [यमन में बसे सबा के लोग, Sheba]

सूरह 34: सबा
[यमन में बसे सबा के लोग, Sheba]



01-02 : सारी तारीफ़ें अल्लाह के लिए हैं 

03-06: विश्वास न करने वाले क़यामत के आने पर संदेह करते हैं 

07-09: विश्वास न करने वाले मरने के बाद दोबारा उठाए जाने को नहीं मानते 

10-14: दाऊद और सुलैमान (अलै.)

15-21: सबा के लोग 

22-24: मूर्तिपूजकों को चुनौती

25 :   हर आदमी का उसके कर्मों के अनुसार फ़ैसला होगा 

26 :   अल्लाह फ़ैसला करेगा 

27 :   मूर्तिपूजकों को चुनौती

28 :   रसूल का मिशन 

29-30: क़यामत आने का मज़ाक़ उड़ाया गया

31-33: कर्मों के हिसाब-किताब का दृश्य 

34-39: धन-दौलत और ताक़त के नशे में डूबे लोगों पर फ़ैसला 

40-42: जिन्नों की पूजा 

43-45: विश्वास न करने वालों की आपत्तियाँ 

46-50: रसूल का जवाब 

51-54: कर्मों के हिसाब-किताब का दृश्य


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
हर तरह की प्रशंसा अल्लाह के लिए ही है, जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में है--- सब अल्लाह का है। और आने वाली दूसरी ज़िंदगी [आख़िरत] में भी सब तारीफ़ें उसी के लिए हैं। वही है जिसे (अपने हर काम की) गहरी समझ-बूझ है, और हर चीज़ की ख़बर भी।  (1)

वह उन सब चीज़ों को जानता है जो कुछ धरती के भीतर जाती हैं और जो कुछ उससे बाहर निकलती हैं; और उनको भी जानता है जो आसमान से उतरती हैं और जो कुछ उस पर चढ़ती हैं। और वही है जो बहुत दया [रहम] करने वाला और बड़ा माफ़ करने वाला है। (2)
तब भी, सच्चाई से इंकार करने पर अड़े हुए लोग [काफ़िर] यह कहते हैं कि "हम पर क़यामत की घड़ी कभी नहीं आएगी।" कह दें, "क्यों नहीं? मेरे रब की क़सम, (वह ज़रूर आकर रहेगी!) क़सम है उसकी, जो हर अनदेखी चीज़ को जानता है! यहाँ तक कि आसमानों और ज़मीन में कण-भर भी कोई चीज़ ऐसी नहीं जो उसकी नज़रों से ओझल हो सके, चाहे कोई चीज़ छोटी हो या बड़ी। हर एक चीज़ एक स्पष्ट किताब [लौह-ए-महफ़ूज़] में लिखी हुई है (3)
ताकि वह [अल्लाह] उन लोगों को इनाम दे सके जिन्होंने (अल्लाह में) विश्वास रखा और अच्छे कर्म किए: ऐसे लोगों के गुनाह माफ़ किए जाएंगे और उन्हें दिल खोलकर रोज़ी दी जाएगी।"  (4)
लेकिन जिन लोगों ने हमारे संदेश [आयतों] के विरोध में काम किया, और उसके मक़सद को नाकाम करने की कोशिश की, उनके लिए बहुत ही दर्दनाक यातना होगी।  (5)
[ऐ रसूल] जिन लोगों को ज्ञान दिया गया है वे स्वयं देख सकते हैं कि जो कुछ (संदेश) आपके रब की तरफ़ से आपको भेजा गया है वह सत्य है, और वह उस (अल्लाह) के मार्ग की ओर ले जाता है जिसके क़ब्ज़े में हर चीज़ की ताक़त है, और जो सारी तारीफ़ों के लायक़ है।  (6)
मगर (सच्चाई से) इंकार करनेवाले [काफ़िर] लोग कहते हैं, "क्या हम तुम्हें एक ऐसे आदमी [रसूल] के बारे में बताएँ जो यह दावा करता है कि जब तुम (मरने के बाद सड़-गलकर) चूर-चूर हो जाओगे, तब तुम्हें फिर से एक नए जन्म के साथ उठाया जाएगा? (7)
क्या उसने अल्लाह के बारे में झूठी बातें गढ़ ली हैं?, क्या वह दीवाना है?” बिल्कुल नहीं!, बल्कि जो लोग आने वाली दूसरी दुनिया [आख़िरत] में विश्वास नहीं रखते, वे दर्दनाक यातना झेलेंगे, क्योंकि वही लोग हैं जो भारी ग़लती पर हैं।  (8)

क्या वे लोग आसमानों और ज़मीन में मौजूद उन चीज़ों के बारे में नहीं सोचते जो उनके आगे भी हैं और उनके पीछे भी? अगर हम चाहें तो उन्हें ज़मीन में धँसा दें या उन पर आसमान से कुछ टुकड़े गिरा दें। इसमें सचमुच एक निशानी है हर उस बन्दे के लिए, जो (गुनाहों से) तौबा करने के लिए अल्लाह के सामने झुकने वाला हो। (9)
हमने दाऊद [David] को अपनी तरफ से कुछ ख़ास ख़ूबियाँ दी थीं। हमने कहा, “जब वह [दाऊद] हमारी बड़ाई बयान करें तो ऐ पर्वतो! तुम भी उनकी आवाज़ में आवाज़ मिलाया करो, और पक्षियों तुम भी!" हमने उसके लिए लोहे को नर्म कर दिया था,  (10)
और हुक्म दिया कि "लोहे की कवचें [Chainmail] बनाओ और कड़ियों को ठीक अंदाज़े से जोड़ो, और तुम सब अच्छे कर्म करो, निस्संदेह जो कुछ तुम करते हो, मैं उसे देखता हूँ।”  (11)
और (देखो!) सुलैमान [Solomon] के लिए हमने हवा को उनके वश में कर दिया था, जिसकी सुबह की यात्रा एक महीने में तय किए गए रास्ते जितनी होती, और (वापसी में) शाम की भी यात्रा एक महीने के रास्ते जितनी थी। और हमने उनके लिए पिघले हुए ताँबे/पीतल का सोता [fountain] बहा दिया, और जिन्नों में से भी कुछ (को उनके वश में कर दिया था, जो अपने रब के हुक्म से उनके अधीन काम करते थे। उन (जिन्नों) में से कोई भी अगर हमारे हुक्म से फिरता, तो हम उसे (जहन्नम की) भड़कती आग का मज़ा चखाते। (12)
वे जिन्न सुलैमान के लिए वह सब कुछ बनाते जैसा वे चाहते थे ---- बड़े-बड़े (मेहराबवाले) भवन, प्रतिमाएँ, पानी के बड़े-बड़े हौज़ और ज़मीन में जमी हुई देगें [cauldrons]। हमने कहा, "ऐ दाऊद के ख़ानदानवालो! तुम ऐसे कर्म किया करो जिससे लगे कि तुम (अल्लाह का) शुक्र अदा करने वाले हो, क्योंकि मेरे बंदों में बहुत कम ही ऐसे लोग हैं जो सचमुच शुक्र अदा करते हैं।" (13)
फिर जब हमने सुलैमान की मौत का फ़ैसला किया तो उन (मज़दूरी करने वाले) जिन्नों को उनकी मौत का पता किसी और से नहीं, बल्कि भूमि के उस कीड़े से चला जो उनकी लाठी को खा रहे थे, (असल में लाठी पर टेका लगाए हुए उनकी मौत हो गयी थी, फिर कीड़ों के खाने से लाठी कमज़ोर पड़कर टूट गयी): फिर जब वह गिर पड़े, तब जाकर जिन्नों को उनके (मरने की) बात समझ में आयी---- अगर वे (सुलैमान की मौत की) छुपी हुई अंदेखी बातों को जानते होते, तो (उनके मरने के बाद भी) इस अपमानजनक मज़दूरी में लगे न रहते।  (14)
सच्चाई यह है कि (यमन में आबाद) सबा [Sheba] के लोगों के लिए ख़ुद उस जगह एक निशानी मौजूद थी जहाँ वे रहा करते थे ---- दो बाग़ थे, एक दाहिनी तरफ़ और दूसरा बायीं तरफ़: "खाओ अपने रब की दी हुई रोज़ी में से और उसका शुक्र अदा करो, कि एक तो ज़मीन इतनी अच्छी-सी और दूसरे रब इतना माफ़ करने वाला।" (15)
मगर उन लोगों ने (मार्गदर्शन पर) कोई ध्यान नहीं दिया, तो (नतीजे में) हमने उन लोगों पर (टूटे हुए) बाँध का सैलाब छोड़ दिया और उनके दोनों बाग़ों के बदले में उन्हें ऐसे बाग़ दिए, जिनमें कड़वे-कसैले फल, झाऊ के पेड़ [Tamarisk bushes], और कुछ थोड़ी सी काँटेदार बेरियों के पेड़ [Lote tree] थे।  (16)
यह दंड हमने उन्हें इसलिए दिया कि उनलोगों ने नाशुक्री [कृतध्नता] की आदत अपना ली थी --- तो क्या ऐसा दंड हमने किसी और को दिया सिवाए उनके जो बड़े नाशुक्रे [ungrateful] लोग थे?  (17)
और हमने उनके [यमन के] और उन बरकतवाली बस्तियों [सीरिया व फ़िलिस्तीन के इलाक़े] के बीच कुछ दूसरी बस्तियाँ बसा रखी थीं जो दूर से दिखायी देती थीं, और उनकी आसानी के लिए सफ़र को कई पड़ावों में बाँट रखा था --- (और कहा था), "चाहे रात का समय हो या दिन का, इन (बस्तियों) में बिना डरे यात्रा करो"---  (18)
मगर (तब भी), उन्होंने कहा, "हमारे रब ने हमारी यात्राओं के दौरान पड़ाव डालने वाली जगहों के बीच बहुत लम्बी दूरी रख दी है।" (इस तरह) उन्होंने स्वयं अपने आप पर ही ज़ुल्म किया, और अंत में, नतीजा यह हुआ कि हमने उन्हें (अतीत की) कहानियाँ बना डाला, औऱ उन्हें टुकड़े-टुकड़े करके बिल्कुल छिन्न-भिन्न कर डाला। सचमुच, इस घटना में हर एक धीरज रखने वाले और शुक्र अदा करने वाले आदमी के लिए बड़ी निशानियाँ हैं।  (19)
सचमुच, उन लोगों के बारे में शैतान [इबलीस] का विचार सही साबित हुआ, और सब लोग उसी (शैतान) के रास्ते पर चल पड़े--- केवल ईमानवालों के एक गिरोह को छोड़कर ----  (20)
हालाँकि उस (शैतान) का उन लोगों पर कोई क़ब्ज़ा नहीं था। मगर (शैतान को बहकाने की क्षमता इसलिए दी कि) हम चाहते थे कि जो लोग आने वाली ज़िंदगी [आख़िरत] पर विश्वास रखते हैं और जो लोग इसके बारे में सन्देह में पड़े हुए हैं --- उन दोनों के बीच का अंतर साफ़-साफ़ पता चल जाए: [ऐ रसूल] आपका रब हर चीज़ पर निगरानी रखता है।  (21)
[ऐ रसूल] आप कह दें, "पुकारकर देखो उनको, जिन्हें तुमने अल्लाह को छोड़कर अपना ख़ुदा बना रखा है: आसमानों और ज़मीन में कण- भर चीज़ भी उनके नियंत्रण में नहीं है, न ही (किसी मामले में अल्लाह के साथ) उनका कोई हिस्सा है और न उनमें से कोई अल्लाह के किसी काम में सहायक है।"  (22)
और उस [अल्लाह] के सामने कोई सिफ़ारिश काम नहीं आएगी, सिवाए उस आदमी के जिसके लिए उसने ख़ुद (सिफ़ारिश करने की) अनुमति दी हो। (क़यामत के दिन) जब उनके दिलों से घबराहट दूर कर दी जाएगी, तो उनसे पूछा जाएगा, "तुम्हारे रब ने क्या कहा?" वे जवाब देंगे, "सच्ची बात। और वह सबसे ऊँचा, सबसे महान है।" (23)
[ऐ रसूल] आप कह दें, "कौन है जो तुम्हें आसमानों और ज़मीन में रोज़ी देता है?" बता दें, "अल्लाह!" (ही देता है!)। अब अवश्य ही हम (में से कोई एक गिरोह) सही मार्ग पर है और दूसरा साफ़ तौर से सही मार्ग से भटक चुका है।”  (24)

कह दें, "जो अपराध (गुनाह) हम से हुआ हो, उसके बारे में तुम से नहीं पूछा जाएगा, और जो कुछ तुम करते हो, उसके बारे में हम से कोई सवाल नहीं पूछा जाएगा।" (25)
कह दें, "हमारा रब हम सबको (क़यामत के दिन) एक साथ इकट्ठा करेगा, फिर हमारे बीच ठीक-ठीक फ़ैसला कर देगा; और वही तो है फ़ैसला करने वाला जो सब कुछ जानता है।" (26)
कह दें, "मुझे ज़रा दिखाओ तो कि कौन हैं जिनको तुमने उस (अल्लाह) के साथ हिस्सेदार [Partner] के रूप में जोड़ रखा है। हरगिज़ नहीं! अल्लाह तो केवल वही है (उसका कोई साझेदार नहीं), सारी ताक़त भी उसी की, और सारी समझ-बूझ भी उसके ही पास है।" (27)
हमने तो आपको [ऐ रसूल] भेजा ही इसीलिए है, कि तमाम लोगों को अच्छी ख़बर भी सुना दें और चेतावनी भी दे दें, मगर अधिकतर लोग समझते नहीं हैं। (28)
और वे (आपसे) कहते हैं, "तुम जो भी कहते हो अगर वह सच है, तो यह (क़यामत का) वादा कब पूरा होगा?" (29)
कह दें, "तुम्हारे लिए (वादे के मुताबिक़) एक ख़ास दिन में मिलने का समय तय किया हुआ है, जिसे एक घड़ी भर के लिए भी तुम न तो आगे बढ़ा सकते हो और न पीछे हटा सकते हो।" (30)
और (सच्चाई से) इंकार पर अड़े लोग [काफ़िर] कहते हैं, "हम न तो इस क़ुरआन पर विश्वास करेंगे और न ही उन (आसमानी किताबों) पर जो इससे पहले आ चुकी हैं।" अगर [ऐ रसूल], आप उस वक़्त का हाल देख पाते जब शैतानी करनेवाले लोग अपने रब के सामने खड़े किए जाएँगे, और कैसे वे एक-दूसरे पर इल्ज़ाम लगा रहे होंगे। जिन लोगों पर कमज़ोर समझकर (दुनिया में) ज़ुल्म किया गया था, वे अपने उन ज़ालिमों से कहेंगे, "यदि तुम न रहे होते, तो हम ज़रूर ही (अल्लाह में) विश्वास रखनेवाले [believers] होते।" (31)
ज़ालिम लोग जवाब में उनसे कहेंगे, "जब सही मार्गदर्शन तुम्हारे पास आ चुका था, तो उन्हें अपना लेने से क्या हमने तुम्हें रोका था? नहीं, बल्कि तुम स्वयं ही गुनाहगार हो।" (32)
कमज़ोर समझे गए लोग ज़ालिमों से कहेंगे, "नहीं! बल्कि यह तुम्हारी रात-दिन की मक्कारी ही तो थी (जिसने हमें रोका था) कि तुम हम पर ज़ोर डालते रहते थे कि हम (एक) अल्लाह में विश्वास न करें और दूसरों को उसके बराबर का साझेदार [Partner] ठहराएँ।" जब वे यातना देख लेंगे तो अपनी शर्म छुपाते हुए मन ही मन पछताएँगे, और हम उन इंकार पर अड़े लोगों की गर्दनों में लोहे का तौक़ [iron collar] डाल देंगे। जो कुछ कर्म उन्होंने किए हैं, किस तरह मुमकिन है कि उसका बदला उन्हें कुछ और दिया जाए? (33)
और ऐसा हमेशा ही हुआ कि जब भी हमने किसी बस्ती में कोई सावधान करने वाला [पैग़म्बर] भेजा, तो वहाँ धन-दौलत के नशे में डूबे हुए लोगों ने यही कहा कि "जो कुछ संदेश देकर तुम्हें भेजा गया है, हम तो उसको नहीं मानते।" (34)
वे यह भी कहते कि "हम तो धन और संतान में तुमसे कहीं बढ़कर हैं, और हमें कोई यातना मिलने वाली नहीं है।" (35)
आप कह दें, "इस में शक नहीं कि मेरा रब जिसके लिए चाहता है रोज़ी को बढ़ा-चढ़ाकर देता है, और जिसके लिए चाहता है उसकी रोज़ी को घटा देता है, हालाँकि अधिकांश लोग यह बात समझते नहीं हैं।" (36)
याद रहे कि न तुम्हारी धन-दौलत और न तुम्हारी सन्तान ऐसी चीज़ है जो तुम्हें हमसे नज़दीक कर दे। हाँ, मगर जिन लोगों ने (अल्लाह में) विश्वास रखा और अच्छे कर्म किए, तो ऐसे लोगों को उनके कर्मों के बदले में कई गुना इनाम दिया जाएगा, और वे (जन्नत के) ऊँचे कक्षों में आराम से निश्चिन्त होकर रहेंगे,  (37)
रहे वे लोग जिन्होंने हमारे संदेशों [आयतों] का विरोध किया और उसके प्रभाव को घटाने की कोशिश में लगे रहे, ऐसे लोगों को कड़ा दंड देने के लिए वहाँ हाज़िर किया जाएगा।  (38)
कह दें, "मेरा रब अपने बंदों में से जिसके लिए चाहता है रोज़ी को ख़ूब बढ़ाकर देता है और जिसके लिए चाहता है रोज़ी में तंगी कर देता है; और (अल्लाह के रास्ते में) जो कुछ भी तुम किसी को देते हो, उसके बदले में वह तुम्हें और देगा; और वही सबसे बेहतर रोज़ी देने वाला है।" (39)
और जिस दिन वह उन सबको एक साथ इकट्ठा करेगा, फिर फ़रिश्तों से कहेगा, "क्या सचमुच यह लोग तुम्हारी पूजा करते थे?" (40)
वे जवाब देंगे, "महान है तू! तू ही ऐसे लोगों से हमें बचाने वाला और मदद करने वाला है! असल बात यह है कि वे जिन्नों [शैतानों] को पूजते थे--- उनमें से अधिकतर उन्हीं [जिन्नों] पर विश्वास रखते थे।" (41)
"अतः आज तुममें से किसी को भी यह ताक़त नहीं है कि वह किसी और को कोई भी फ़ायदा या नुक़सान पहुँचा सके।" फिर हम उन शैतानी करने वालों से कहेंगे, "अब उस आग की यातना का मज़ा चखो, जिसे तुम झूठ बताते थे।" (42)
और जब उनके सामने हमारी आयतें पढ़कर सुनाई जाती हैं, जो (अपने मतलब में) स्पष्ट व साफ़ हैं, तो वे (रसूल के बारे में) कहते हैं, "यह तो बस ऐसा आदमी है जो चाहता है कि तुम्हें उन (देवताओं से) रोक दें जिनको तुम्हारे बाप-दादा पूजते रहे हैं।" और कहते हैं, "यह [क़ुरआन] कुछ और नहीं, बल्कि उस (पैग़म्बर) की बनायी हुई झूठी बातें हैं।" (सच्चाई से) इंकार करने वालों [काफ़िरों] के सामने जब सच्चा संदेश आ पहुँचा, तो उसके बारे में उन्होंने कहा, "यह तो बस एक साफ़-साफ़ जादू है।" (43)
हालाँकि हमने उन (मक्कावालों) के पढ़ने के लिए कोई (आसमानी) किताबें नहीं दी थीं, और न आपसे पहले उनकी ओर कोई (रसूल ही) भेजा था, जो सावधान करने वाला हो। (44)
और जो लोग वहाँ इन लोगों से पहले रहते थे, उन लोगों ने भी सच्चाई को मानने से इंकार किया था ---- और जो कुछ हमने उनसे पहले गुज़रे हुए लोगों को दिया था, ये लोग तो उसके दसवें हिस्से को भी नहीं पहुँचे हैं---- तब भी उन्होंने (भी) मेरे रसूलों को मानने से इंकार कर दिया था। तो फिर देख लो कैसी (सख़्त) रही मेरी यातना! (45)
[ऐ रसूल] कहें, "मैं तुम्हें बस एक चीज़ करने की सलाह देता हूँ: अल्लाह के सामने (पूरी भक्ति-भाव से) खड़े हो जाओ, जोड़े बनाकर या अकेले-अकेले, फिर (आपस में चर्चा करो या ख़ुद ही) ध्यान से विचार करो: तुम्हारे साथी [मोहम्मद] में पागलपन का तो कोई निशान भी मौजूद नहीं है--- वह तो एक कठोर यातना के आ जाने से पहले तुम्हें केवल सावधान करने वाले हैं।" (46)
कह दें, "अगर मैंने (दी गयी नसीहतों के) बदले में तुमसे कोई चीज़ माँगी हो, तो वह तुम अपने पास ही रख सकते हो। वह तो बस अल्लाह है जो मुझे (मेरे काम का) बदला देगा: और वह हर चीज़ पर गवाह है।" (47)

कह दें, "मेरा रब (तुम्हारे सामने झूठ के ख़िलाफ़) सच्चाई को ऊपर से भेजता रहता है (ताकि सच दिलों में बैठ जाए और झूठ की हार हो)। और उस [अल्लाह] को ऐसी सभी चीज़ों का जो अनदेखी हैं, पूरा पूरा ज्ञान है।" (48)
कह दें, "सच्चाई आ चुकी है; और झूठ में कोई दम नहीं होता (न कोई चीज़ शुरू करने का और न दोबारा करने का)।" (49)
कहें, "अगर मैं रास्ते से भटक जाता हूँ तो इसमें मेरा ही नुक़सान होगा, और यदि मैं सीधे मार्ग पर हूँ, तो यह उस 'वही' [revelations] के चलते है जो मेरा रब मेरी ओर भेजता है। बेशक, वह सब कुछ सुनता है, बहुत निकट है।" (50)
[ऐ रसूल] आप अगर उस (क़यामत के) दिन इन लोगों का हाल देख पाते कि मारे डर के घबराए हुए होंगे; फिर भाग निकलने का कोई रास्ता न होगा और वे निकट स्थान ही से पकड़ लिए जाएँगे; (51)
वे कहेंगे, "अब हम उस (सच्चाई) पर विश्वास करते हैं", मगर (विश्वास तो दुनिया में करना था) अब वे इतनी दूर की जगह से उस (विश्वास) को कैसे पा सकते हैं ---  (52)
इससे पहले तो उन्होंने हमेशा (सच्चाई को मानने से) इंकार किया, और बड़े दूर की जगह से ही (अल्लाह और आने वाली दुनिया के बारे में) अटकल के तीर चलाते रहे थे ---- (53)
(उस समय वे चाहेंगे कि काश एक बार उन्हें दुनिया में भेज दिया जाता तो वे अल्लाह पर और क़यामत में विश्वास कर लेते,) मगर तब उनके और उनकी चाहतों के बीच एक रोक लगा दी जाएगी, जिस तरह इससे पहले उनके जैसे लोगों के साथ मामला किया गया था। सचमुच वे (फ़ैसले के दिन के बारे में) गहरे शक और डाँवाडोल कर देने वाले संदेह में पड़े रहे थे।  (54)



नोट:

14:  सुलैमान (अलै.) ने जिन्नों को “बैतुल मक़दिस” के निर्माण कार्य में लगा रखा था, ये जिन्न केवल उन्हीं के नियंत्रण में रहते थे और उनकी निगरानी में ही काम करते थे। अभी यह काम चल ही रहा था कि सुलैमान (अलै.) की मौत का वक्त आ गया, अब यह डर था कि जिन्नों को जैसे ही यह बात पता चलेगी, वे काम बंद कर देंगे। इसलिए उन्होंने ऐसा किया कि वह अपनी लाठी पर टेक लगाकर अपनी इबादतगाह में खड़े हो गए और इसी हाल में उनकी मौत हो गई। अल्लाह ने उन्हें कई दिनों तक उसी हाल में खड़ा रखा, जिन्न उन्हें देखते और काम करते रहते, जब काम पूरा हो गया तब उनकी लाठी में कीड़ा लग गया, लाठी कमज़ोर होकर टूट गई और वह गिर पड़े, तब जाकर पूरी बात पता चली।

15: सबा की क़ौम यमन में आबाद थी और एक ज़माने में अपनी सभ्यता और संस्कृति के लिए जानी जाती थी। ज़मीनें बड़ी उपजाऊ थीं, सड़कों के दोनों तरफ़ फलदार बाग़ों का सिलसिला था, चारों तरफ़ ख़ुशहाली थी, राजनीतिक स्थिरता भी थी; लेकिन आहिस्ता-आहिस्ता ये लोग अपनी अय्याशियों में ऐसे मगन हुए कि अल्लाह और उसके हुक्म को भुला बैठे और उसे छोड़कर दूसरे देवताओं की पूजा करने लगे, फिर उन्हें सुधारने के लिए अल्लाह ने वहाँ कई नबियों को कुछ कुछ अंतराल पर भेजा, मगर लोग नहीं माने। फिर अल्लाह ने उन्हें दंड देने का फैसला किया, हुआ यह कि मआरिब नाम के स्थान पर जो एक बाँध था, जिससे कि सारी ज़मीनों पर सिंचाई होती थी, वह बाँध टूट गया, इस तरह, पूरी बस्ती बाढ़ में घिर गई और सारे बाग़ बर्बाद हो गए।

19: "हमारे रब ने हमारी यात्राओं के दौरान पड़ाव डालने वाली जगहों के बीच बहुत लम्बी दूरी रख दी है”, इसका अनुवाद कुछ विद्वानों ने ऐसा भी किया है, “हमारे रब! हमारी यात्रा में आने वाले पड़ावों के बीच के फ़ासले को दूर दूर कर दे", ताकि शायद यात्रा और दिलचस्प और साहसिक बन सके!  

20: यानी इबलीस ने आदम (अलै.) की पैदाइश के समय जो विचार रखा था कि मैं आदम की औलाद को बहकाउंगा, वह बात इन हुक्म न मानने वालों के लिए सही निकली कि इन लोगों ने शैतान की बात मान ली।

21: यहाँ ध्यान देने की बात यह है कि शैतान को केवल बहकाने की सलाहियत दी गई है, मगर कोई आदमी गुनाह करने पर मजबूर नहीं होता। अगर आदमी अपनी अक़्ल और ईमान पर डटा रहे, तो शैतान उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। मगर इंसान की आज़माइश इसी तरह होती है।


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