03-06: विश्वास न करने वाले क़यामत के आने पर संदेह करते हैं
07-09: विश्वास न करने वाले मरने के बाद दोबारा उठाए जाने को नहीं मानते
10-14: दाऊद और सुलैमान (अलै.)
15-21: सबा के लोग
22-24: मूर्तिपूजकों को चुनौती
25 : हर आदमी का उसके कर्मों के अनुसार फ़ैसला होगा
26 : अल्लाह फ़ैसला करेगा
27 : मूर्तिपूजकों को चुनौती
28 : रसूल का मिशन
29-30: क़यामत आने का मज़ाक़ उड़ाया गया
31-33: कर्मों के हिसाब-किताब का दृश्य
34-39: धन-दौलत और ताक़त के नशे में डूबे लोगों पर फ़ैसला
40-42: जिन्नों की पूजा
43-45: विश्वास न करने वालों की आपत्तियाँ
46-50: रसूल का जवाब
51-54: कर्मों के हिसाब-किताब का दृश्य
14: सुलैमान (अलै.) ने जिन्नों को “बैतुल मक़दिस” के निर्माण कार्य में लगा रखा था, ये जिन्न केवल उन्हीं के नियंत्रण में रहते थे और उनकी निगरानी में ही काम करते थे। अभी यह काम चल ही रहा था कि सुलैमान (अलै.) की मौत का वक्त आ गया, अब यह डर था कि जिन्नों को जैसे ही यह बात पता चलेगी, वे काम बंद कर देंगे। इसलिए उन्होंने ऐसा किया कि वह अपनी लाठी पर टेक लगाकर अपनी इबादतगाह में खड़े हो गए और इसी हाल में उनकी मौत हो गई। अल्लाह ने उन्हें कई दिनों तक उसी हाल में खड़ा रखा, जिन्न उन्हें देखते और काम करते रहते, जब काम पूरा हो गया तब उनकी लाठी में कीड़ा लग गया, लाठी कमज़ोर होकर टूट गई और वह गिर पड़े, तब जाकर पूरी बात पता चली।
15: सबा की क़ौम यमन में आबाद थी और एक ज़माने में अपनी सभ्यता और संस्कृति के लिए जानी जाती थी। ज़मीनें बड़ी उपजाऊ थीं, सड़कों के दोनों तरफ़ फलदार बाग़ों का सिलसिला था, चारों तरफ़ ख़ुशहाली थी, राजनीतिक स्थिरता भी थी; लेकिन आहिस्ता-आहिस्ता ये लोग अपनी अय्याशियों में ऐसे मगन हुए कि अल्लाह और उसके हुक्म को भुला बैठे और उसे छोड़कर दूसरे देवताओं की पूजा करने लगे, फिर उन्हें सुधारने के लिए अल्लाह ने वहाँ कई नबियों को कुछ कुछ अंतराल पर भेजा, मगर लोग नहीं माने। फिर अल्लाह ने उन्हें दंड देने का फैसला किया, हुआ यह कि मआरिब नाम के स्थान पर जो एक बाँध था, जिससे कि सारी ज़मीनों पर सिंचाई होती थी, वह बाँध टूट गया, इस तरह, पूरी बस्ती बाढ़ में घिर गई और सारे बाग़ बर्बाद हो गए।
19: "हमारे रब ने हमारी यात्राओं के दौरान पड़ाव डालने वाली जगहों के बीच बहुत लम्बी दूरी रख दी है”, इसका अनुवाद कुछ विद्वानों ने ऐसा भी किया है, “हमारे रब! हमारी यात्रा में आने वाले पड़ावों के बीच के फ़ासले को दूर दूर कर दे", ताकि शायद यात्रा और दिलचस्प और साहसिक बन सके!
20: यानी इबलीस ने आदम (अलै.) की पैदाइश के समय जो विचार रखा था कि मैं आदम की औलाद को बहकाउंगा, वह बात इन हुक्म न मानने वालों के लिए सही निकली कि इन लोगों ने शैतान की बात मान ली।
21: यहाँ ध्यान देने की बात यह है कि शैतान को केवल बहकाने की सलाहियत दी गई है, मगर कोई आदमी गुनाह करने पर मजबूर नहीं होता। अगर आदमी अपनी अक़्ल और ईमान पर डटा रहे, तो शैतान उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। मगर इंसान की आज़माइश इसी तरह होती है।
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