01-05: अल्लाह एक है
06-11: अल्लाह की पैदा करने की ताक़त
12-34: फ़ैसले का दिन: कर्मों के हिसाब-किताब का दृश्य
35-39: रसूल की कही बात सही साबित होगी
40-61: जन्नत की ख़ुशियाँ
62-68: जहन्नम की पीड़ा
69-74: पिछले रसूलों की कहानियों का परिचय
75-82: नूह (अलै)
83-98: इबराहीम (अलै) की कहानी
99-111: इबराहीम अपने बेटे को क़ुर्बान करने के लिए तैयार हो गए
112-113: इबराहीम और इसहाक़ (अलै)
114-122: मूसा और हारून (अलै)
123-132: इदरीस [Elijah] (अलै)
133-138: लूत (अलै)
139-148: यूनुस [Jonah] (अलै)
149-166: अल्लाह की न कोई औलाद है, और न कोई साझेदार [Partner]
169-179: कुछ समय के लिए विश्वास न करने वालों से मुँह मोड़ लें
180-182: आख़िर में अल्लाह की बड़ाई का बयान
2: फ़रिश्ते शैतानों को डाँटते-फटकारते हैं जब वे ऊपर आसमान से कुछ ख़बर पता लगाने की कोशिश करते हैं।
10: इस बात का वर्णन सूरह हिज्र (15: 17-18) में भी आया है।
11: बिना किसी चीज़ के [Out of nothing] पूरी सृष्टि की रचना कर देने वाले अल्लाह के लिए मिट्टी से बने इंसान को उसकी मौत के बाद दोबारा पैदा करने में क्या मुश्किल हो सकती है!
65: कुछ लोगों ने इसका अनुवाद “साँपों का सिर” भी किया है, और इसीलिए ज़क़्क़ूम के पेड़ को “नागफनी” का पेड़ समझा है।
82: नूह (अलै) और उनकी क़ौम का पूरा विवरण सूरह हूद (11: 36) में आया है।
98: इस घटना का वर्णन सूरह अंबिया (21: 68-70) में आया है।
99: हज़रत इबराहीम इराक़ के रहने वाले थे, इस घटना के बाद वह सीरिया की तरफ़ चले गए थे।
102: यह तो एक सपना था, मगर नबियों का सपना सच होता है जिसमें अल्लाह का संदेश छिपा होता है।
107: हज़रत इबराहीम की छुरी हज़रत इस्माईल के बजाए एक मेंढे पर चली, जिसे अल्लाह ने अपनी क़ुदरत से उसे वहाँ भेज दिया, और इस्माइल (अलै.) ज़िंदा बच गए।
123: सुलैमान (अलै.) के बाद जब इसराईल की संतानों में एक ख़ुदा को छोड़कर धीरे-धीरे बहुदेववाद शुरू हुआ, तो अल्लाह ने इल्यास (अलै.) को वहाँ पैग़म्बर बनाकर भेजा। बाइबल में है कि राजा अख़िअब की बीवी अज़ाबील ने “बाल” नामक देवता की पूजा शुरू की थी, जब इल्यास (अलै.) ने उन्हें रोका, तो उनको क़त्ल कर देने की योजनाएं बनने लगीं। अल्लाह ने उनकी योजना असफल कर दी और उन लोगों को मुसीबतों में डाल दिया और हज़रत इल्यास को अपने पास बुला लिया।
139: हज़रत यूनुस (अलै.) का वर्णन सूरह यूनुस (10: 98) और सूरह अंबिया (21: 87) में भी है। वह इराक़ के शहर नैनवा में भेजे गए थे, वहाँ काफ़ी समय तक वह अल्लाह का संदेश देते रहे। जब उन्होंने देखा था कि उनकी क़ौम के लोग एक अल्लाह पर विश्वास नहीं करते और ग़लत कामों से नहीं रुक रहे हैं, तो उन्होंने लोगों को कड़ी चेतावनी दी कि अब तुम पर तीन दिन के अंदर भयानक यातना आकर रहेगी। वहाँ के लोगों ने यह तय किया कि अगर हज़रत यूनुस बस्ती छोड़कर चले जाते हैं, तो यह इशारा होगा कि वह ठीक कह रहे हैं। इस बीच अल्लाह के हुक्म से हज़रत यूनुस (अलै,) बस्ती छोड़कर चले गए। इधर बस्ती के लोगों ने देखा कि हज़रत यूनुस बस्ती में नहीं हैं, उन्हें यातना के आने का यक़ीन हो गया। उन लोगों ने अल्लाह के सामने झुकते हुए तौबा की जिसके नतीजे में उनसे यातना टल गई। इधर तीन दिन गुज़र जाने के बाद हज़रत यूनुस ने देखा कि जब कोई यातना नहीं आयी, तो उन्हें डर हुआ कि अगर बस्ती वालों ने उन्हें देख लिया तो उन्हें झूठा कहेंगे और हो सकता है कि क़त्ल कर दें। सो वह बस्ती में जाने के बजाए समंदर की तरफ़ निकल गए। अल्लाह को यह बात पसंद नहीं आयी कि बिना इजाज़त उन्होंने बस्ती छोड़ने का फ़ैसला क्यों कर लिया। इधर वह एक नौका में सवार हो गए जो आदमियों से भरी हुई थी, ज़्यादा वज़न हो जाने के कारण नौका डूबने को आई, ऐसे में नौका से एक आदमी को कम करने के लिए उनके नामों की लाटरी लगाई गई जिसमें हज़रत यूनुस का ही नाम निकला, अत: उन्हें पानी में फेंक दिया गया, उन्हें एक बड़ी मछली ने निगल लिया, कुछ अवधि आप पेट में ही रहे, फिर अल्लाह के हुक्म से मछली ने आपको किनारे पर उगल दिया।
149: मक्का के बहुदेववादी लोग फ़रिश्तों को अल्लाह की बेटियाँ कहा करते थे, हालाँकि अल्लाह को औलाद की ज़रूरत नहीं। मज़े की बात यह कि ख़ुद ये लोग बेटियों को बिल्कुल पसंद नहीं करते थे, बल्कि कुछ लोग बेटियों को ज़िंदा दफ़न कर देते थे।
158: एक और मान्यता थी जिसके अनुसार जिन्नों के सरदारों की बेटियाँ फ़रिश्तों की माताएं मानी जाती थी।
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