02-13: ईमानवालों की परीक्षा ली जायेगी
14-15: नूह (अलै) और उनकी क़ौम की कहानी
16-27: इबराहीम (अलै) और उनकी क़ौम की कहानी
28-35: लूत (अलै) और उनकी क़ौम की कहानी
36-37: शुएब (अलै) और मदयन के लोगों की कहानी
38: 'आद' और 'समूद' के लोगों की कहानी
39-40: मूसा (अलै) और फिरऔन, क़ारून और हामान की कहानी
41-44: मकड़ी की मिसाल
45-47: तीन आसमानी किताबें
48-49: रसूल ने अपने हाथ से कोई किताब नहीं लिखी थी
50-52: कोई निशानी [चमत्कार] दिखाने की माँग
53-55: यातना जल्दी बुलाने की माँग
56-59: नेकी व भलाई के लिए इनाम
60-67: विश्वास न करने वाले असंगत बात करते हैं, और नेमतों का शुक्र अदा नहीं करते
68-69: (सच्चाई पर) विश्वास रखने वाले और इंकार करने वाले
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
6: मन की इच्छाओं पर क़ाबू पाना, शैतान के बहकावे से अपने को बचाना, अल्लाह का संदेश लोगों तक पहुँचाते हुए नसीहत करना, और अल्लाह के रास्ते में लड़ना --- सब इस संघर्ष में शामिल है।
8: अपने माँ-बाप के साथ हर हाल में अच्छा बर्ताव करना चाहिए; लेकिन अगर वह अल्लाह को छोड़कर किसी और को ख़ुदा मानने पर मजबूर करें, तो उनकी बात मानना ठीक नहीं है, सो उन्हें नर्मी से मना कर दें।
10: ऐसे पाखंडी लोगों को जैसे ही तकलीफ़ पहुँचती है तो तुरंत ही उनका विश्वास डगमगा जाता है और वे विश्वास न करने वालों से जा मिलते हैं। लेकिन अगर मुसलमानों को अल्लाह की मदद से जीत मिल जाए तो ये पाखंडी लोग तुरंत उनसे मिल जाने की कोशिश करते हैं ताकि उससे कुछ फ़ायदा उठा सकें।
13: जिन लोगों को उन्होंने गुमराह किया होगा, उनके गुनाहों का बोझ भी उन्हें उठाना होगा। और जिसने गुनाह किया, वह भी सज़ा से बच नहीं पाएगा।
15: नूह (अलै.) की घटना सूरह हूद (11:25) में भी आयी है।
24: इबराहीम (अलै.) की घटना के लिए देखें सूरह अंबिया (21: 51)
26: “जहाँ मेरा रब मुझे ले जाए”, अगर यह बात हज़रत इबराहीम (अलै.) ने कही है, तो इसका मतलब यह है कि आग से बच जाने के बाद उन्होंने समझ लिया कि बाबिल (इराक़) में अब उनका रहना ठीक नहीं है जहाँ कोई उनकी बात पर विश्वास करने वाला नहीं है, एक मात्र हज़रत लूत जो उनके भतीजे/ भांजे थे, उन्होंने ही आप पर विश्वास किया था। फिर अल्लाह की मर्ज़ी से वह सीरिया की तरफ़ चले गए, उनके साथ लूत भी थे। बाद में अल्लाह ने लूत अलै. को पैग़म्बर बनाकर सदूम और अमूरा की बस्तियों की तरफ़ अपना संदेश पहुँचाने के लिए भेजा था।
अगर यह बात हज़रत लूत (अलै.) ने कही है, तो इसका मतलब होगा कि सदूम की तबाही के बाद अब जहाँ अल्लाह की मर्ज़ी होगी, वहाँ चले जाएंगे।
31: इस घटना का ज़िक्र सूरह हूद (11: 69), और सूरह हिज्र (15: 51) में भी आया है।
37: देखें सूरह अ’राफ़ (7: 84) और सूरह हूद (11: 83)
38: देखें सूरह अ’राफ़ (7: 64-72), सूरह हूद (11: 64—72).
वे लोग दुनिया के कामों मे बड़े समझदार और होशियार थे, मगर आख़िरत/ [परलोक] की ज़िंदगी को बिल्कुल भुलाए बैठे थे।
40: आद की क़ौम के मारे जाने का विवरण: सूरह अ’राफ़ (7: 64)
समूद की तबाही: सूरह क़सस (28: 75)
क़ारून को ज़मीन में धंसा देना: सूरह क़सस (28: 75)
44: इस कायनात को बनाने का मक़सद यही है कि दुनिया में लोगों को आज़माया जाए, और फिर लोगों के कर्मों के अनुसार उन्हें इनाम या सज़ा दी जाए।
56: जब मक्का में मुसलमानों पर बहुत ज़ुल्म होने लगा और वहाँ रहते हुए उन्हें अपने दीन पर चलना बहुत मुश्किल लगने लगा, तो इस आयत में यह इशारा किया गया है कि वे कहीं ऐसी जगह चले जाएं जहाँ शान्ति से रहकर अपने दीन पर क़ायम रहा जा सकता है। इसी के बाद कुछ लोग अबीसीनिया (हिजरत करके) चले गए थे।
57: यानी दूसरी जगह जाने में अपने लोगों और माल-असबाब छोड़ने का जो डर होता है, वह बेकार का डर है क्योंकि एक दिन तो सबको मरना ही है और तब ये सारी चीज़ें छूट जाएंगी।
60: दूसरी जगह चले जाने पर रोज़ी छिन जाने का डर भी होता है, लेकिन अल्लाह ही है जो जानवरों समेत सबको रोज़ी देने वाला है।
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