01-06: क़ुरआन, ईमानवाले और (सच्चाई से) इंकार करने वाले
07-14: मूसा (अलै) को पुकारा गया
15-44: सुलैमान (अलै) और सबा की रानी की कहानी
45-53: सालेह (अलै) और समूद के लोगों की कहानी
54-58: लूत (अलै) और उनके लोगों की कहानी
59-64: अल्लाह जैसा कोई नहीं
65-66: सिर्फ़ अल्लाह जानता है कि भविष्य में क्या होगा
67-75: विश्वास न करने वाले दोबारा ज़िंदा उठाए जाने की बात को नहीं मानते
76-81: इसराईल की संतानों [यहूदी व ईसाई] के आपसी मतभेद को क़ुरआन स्पष्ट कर देती है
82-90: फ़ैसले के दिन का दृश्य
91-93: रसूल का मिशन
4: सच्चाई को न मानने की ज़िद्द और हठधर्मी के कारण अल्लाह ऐसे लोगों को उनके हाल पर छोड़ देता है जिसके चलते वे अपने सारे बुरे कर्मों को अच्छा समझने लगते हैं और सीधे रास्ते पर नहीं आते।
8: ... “जो इस आग के नज़दीक है", या तो यह अल्लाह के बारे में है या मूसा (अलै.) के बारे में। एक अनुवाद, "जो इस आग में है" भी है, जहाँ आग का मतलब "नूर" यानी 'अल्लाह की रौशनी' से है।
11: मूसा (अलै.) के हाथों मिस्र में जो एक आदमी मारा गया था (28: 15), यहाँ उसी की तरफ़ इशारा है।
12: इन निशानियों का वर्णन सूरह अ'राफ़ (7: 130-33) में भी आया है। दो निशानियाँ तो मूसा (अलै.) की लाठी, और उनका चमकता हुआ हाथ हुए, फिर एक के बाद एक सात (7) निशानियाँ आयीं---- अकाल, पैदावार में कमी, तूफ़ान, टिड्डी दल, घुन के कीड़े, मेंढकों की भरमार, और पानी में ख़ून।
14: इनका परिणाम क्या हुआ, इसका ज़िक्र सूरह यूनुस (10: 90-92) और सूरह शुअरा (26: 60-66) में आया है।
22: यमन के एक इलाक़े में सबा नामक क़ौम रहती थी, इसी के नाम पर उस जगह का नाम भी सबा हो गया। उस समय वहाँ एक रानी [मल्लिका] की हुकूमत थी, जिसका नाम "बिल्क़ीस" बताया जाता है।
31: इसका अनुवाद ऐसे भी किया गया है, "मेरे ख़िलाफ़ सरकशी न करो, और आज्ञाकारी बनकर मेरे पास चली आओ।"
42: कुछ लोगों का मानना है कि आख़िरी वाक्य भी रानी बिल्क़ीस ने ही कहे थे, और तब अनुवाद होगा,.... "हमें तो इससे पहले ही (आपकी सच्चाई की) जानकारी हो गई थी, और हम सिर झुका चुके थे।"
45: समूद की क़ौम और सालेह (अलै.) का विवरण सूरह अ'राफ़ (7:72) और सूरह हूद (11: 61-68) में भी आया है।
46: अच्छाई का मतलब सच्चाई पर विश्वास कर लेना।
47: असल में बुरा शगुन जैसे अकाल पड़ना आदि तो ख़ुद उनके बुरे कर्मों के चलते हुआ था।
48: हज़रत सालेह (अलै.) की क़ौम के नौ सरदार थे, जिनमें से हर एक के पीछे एक जत्था था। अंत में इन्हीं लोगों ने उस ऊँटनी को मार डाला जो अल्लाह के हुक्म से पैदा हुई थी। जब सालेह (अलै.) ने उन्हें यातना से डराया तो उन्होंने आपस में समझौता किया कि वे रात के समय उन पर ख़ुफ़िया तरीक़े से हमला करेंगे, और उनको और उनके घर वालों को मार डालेंगे।
52: सालेह (अलै.) के क़ौम की बस्तियाँ अरब के ही इलाक़े में थीं, और मदीने से कुछ दूरी पर सीरिया के व्यापारिक मार्ग पर स्थित थी जहाँ से कारवाँ गुज़रा करता था। आज भी ये वीरान बस्तियाँ और उनके खंडहर "मदायन सालेह" के नाम से मशहूर है जिससे सबक़ सीखना चाहिए।
58: लूत (अलै.) की घटना विस्तार से सूरह हूद (11: 77-83), और सूरह हिज्र (15: 58-76) में आयी है। इसके अलावा सूरह शुअरा (26: 160-175) और सूरह अ'राफ़ (7: 80) में भी आयी है।
60: मक्का के बहुदेववादी भी यह बात मानते थे कि इस कायनात को अल्लाह ने ही पैदा किया है, मगर साथ ही वे कहते थे कि उसने हर चीज़ की व्यवस्था करने के लिए बहुत से विभाग दूसरे ख़ुदाओं को सौंप दिए हैं, इसलिए उन ख़ुदाओं की इबादत [उपासना] करनी चाहिए।
61: जहाँ दो समंदर आपस में मिलते हैं, वहाँ क़ुदरत का ऐसा करिश्मा देखने को मिलता है कि दूर तक दोनों समंदर साथ-साथ बहने के बावजूद साफ़ अलग-अलग नज़र आते हैं, जैसे कि उनके बीच एक आड़ हो।
65: अनदेखी [ग़ैब] चीज़ों के बारे में अल्लाह अपने पैग़म्बरों को बता देता है, मगर उन्हें भी इन चीज़ों की पूरी जानकारी नहीं होती।
72: असल यातना तो परलोक में मिलेगी, मगर उसका कुछ हिस्सा दुनिया में भी मिलता है, सो कुछ ही साल बाद बद्र की लड़ाई में मक्का के बड़े-बड़े सरदार मारे गए और उनकी बुरी हार हुई।
82: अल्लाह एक अजीब जानवर पैदा करेगा, जो इंसानों से बात करेगा, कहा जाता है कि इसके तुरंत बाद क़यामत आ जाएगी, और तब गुनाहों से माफ़ी माँगने का अवसर भी ख़त्म हो जाएगा।
89: अल्लाह ने हर नेकी का इनाम दस गुना देने का वादा किया है।