01-02: किताब की आयतें (निशानियाँ)
03-06: मूसा (अलै) की कहानी: परिचय
07-14: मूसा का बचपन और उनकी शुरुआती ज़िंदगी
15-28: मूसा की जवानी के दिन
29-35: मूसा को पुकारा गया
36-42: मूसा का फिरऔन के साथ संघर्ष
43-51: मूसा की कहानी की (सच्चाई की) पुष्टि [confirmation]
52-55: जिन्हें पहले किताब दी गई थी, वे क़ुरआन पर विश्वास करते हैं
56-59: मक्कावालों को मुहम्मद (सल्ल) का रास्ता अपनाने से नुक़सान का डर
60-61: इस सांसारिक जीवन से आने वाली (आख़िरत की) ज़िंदगी कहीं बेहतर होगी
62-67: फ़ैसले के दिन के दो दृश्य
68-73: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ
74-75: फ़ैसले का एक दृश्य
76-82: क़ारून की कहानी
83-84: आख़िरत [परलोक] का घर
85-88: रसूल का उत्साह बढ़ाना
4: फ़िरऔन के एक भविष्यवक्ता ने उसे बताया था कि इसराईल की संतानों में से एक आदमी तुम्हारी सल्तनत समाप्त करेगा, इसीलिए उसने हुक्म दिया था कि उनके यहाँ जो भी बेटा पैदा हो, उसे मार दिया जाए।
7: दरिया यानी नील नदी।
12: फ़िरऔन की बीवी का नाम ‘आसिया’ बताया जाता है, जब उन्होंने तय कर लिया कि बच्चे को पालना है, तो दूध पिलाने वालियों की खोज शुरू हुई। इतने में वहाँ मूसा (अल.) की बहन पहुँच गईं।
17: फ़िरऔन की हुकूमत में मिस्र के लोग इसराइलियों पर ख़ूब अत्याचार किया करते थे, इस घटना के बाद मूसा (अलै.) ने फ़ैसला किया कि अब वे फिरऔन और उनके कारिंदों से अलग-थलग हो जाएंगे और उनकी कोई मदद नहीं करेंगे।
19: मूसा (अलै) ने शायद अपना हाथ उस मिस्री की तरफ़ उठाया था ताकि उसे एक इसराइली को मारने से रोक सकें।
22: फ़िरऔन की सल्तनत के बाहर मदयन नाम की एक बस्ती थी जहाँ की क़ौम के बीच हज़रत शोएब (अलै.) को पैग़म्बर बनाकर भेजा गया था।
26: “मज़दूरी” यानी जानवरों को चराने और उनको पानी पिलाने का काम।
34: जैसा कि सूरह ताहा (20: 25) में आया है कि बचपन में मूसा (अलै.) ने ग़लती से एक अंगारा ज़बान पर रख लिया था, जिसकी वजह से उनकी ज़बान थोड़ी सी लड़खड़ाती थी।
48: मूसा (अलै.) को पूरी तोरात एक ही बार में दी गयी थी, कुछ लोग यह कहते थे कि क़ुरआन भी उसी तरह एक ही बार में क्यों नहीं उतरी?
51: क़ुरआन के हिस्से ज़रूरत के हिसाब से थोड़ा-थोड़ा करके उतरते थे।
52: यानी यहूदी और ईसाई जिनको आसमानी किताबें दी गयी थीं, उनमें से कुछ लोग क़ुरआन पर विश्वास कर लेते थे।
57: मक्का के बहुदेववादियों को लगता था कि काबा में जो इतने बुत हैं उन्हीं की वजह से पूरे अरब में उनकी इज़्ज़त है, और अगर उन लोगों ने इस्लाम अपना लिया तो उनकी इज़्ज़त, व्यापार आदि सब ख़त्म हो जाएगा और उन्हें वहाँ से निकाल बाहर किया जाएगा।
68: यहाँ रसूल या पैग़म्बर चुनने की बात हो रही है, मक्का के लोग यह भी कहते थे कि अल्लाह ने अगर चुना भी तो मुहम्मद को ही क्यों चुना, मक्का या तायफ़ के बड़े सरदारों को क्यों नहीं!
80: क़ुरआन में “सब्र” का मतलब यह है कि इंसान को चाहिए कि अपने मन की बेजा इच्छाओं को नियंत्रण में रखते हुए अपने आपको अल्लाह की आज्ञाओं को मानने वाला और उसपर जमे रहना वाला बनाना चाहिए।
85: असली घर या “लौटने की जगह” से मतलब यहाँ मक्का बताया गया है। यह आयत उस समय उतरी जब मुहम्मद (सल्ल) मक्का से (हिजरत करके) मदीना जा रहे थे, जब आप “जुहफ़ा” पहुँचे जहाँ से मक्का का रास्ता अलग होता था, तो आपको अपना घर छोड़ने का दर्द हुआ, यहाँ आपको तसल्ली दी गयी है कि आपको आपके असली घर में पहुँचा दिया जाएगा। कुछ विद्वानों ने लौटने की जगह का मतलब जन्नत से लिया है जहाँ आपको अंत में पहुँचा दिया जाएगा।
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