Saturday, February 25, 2017

सूरह 25: अल फ़ुरक़ान [सही और ग़लत के बीच फ़र्क़ बतानेवाली किताब/ The Differentiator]


सूरह 25: अल-फ़ुरक़ान

[सही और ग़लत के बीच फ़र्क़ बताने वाली किताब/ The Differentiator]



01-03: अल्लाह एक है 

04-06: (सच्चाई पर) विश्वास न करने वालों ने क़ुरआन को मानने से इंकार करते हैं 

07-10: विश्वास न करने वालों ने रसूल को मानने से इंकार कर दिया 

11-16: विश्वास करने से इंकार करने वालों को दर्दनाक सज़ा होगी

17-19: क़यामत के दिन फ़ैसले का एक दृश्य 

20-21: विश्वास न करने वालों की माँग कि फ़रिश्ते या अल्लाह को देखते 

22-29: फ़ैसला के दिन का दृश्य 

30-34: विश्वास करने से इंकार करने वालों ने क़ुरआन को ठुकरा दिया

35-40: पिछली पीढ़ियों को सज़ा: एक चेतावनी 

41-44: विश्वास न करने वाले रसूल का मज़ाक़ उड़ाते हैं 

45-62: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ 

63-76: रहम करने वाले रब के बंदे 

77:      आख़िरी चेतावनी   

 

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

बड़ी ऊँची शान है उसकी, जिसने अपने बन्दे पर एक ऐसी किताब उतारी है, जो सच को झूठ से अलग करने वाली है, ताकि सारी दुनिया के लोगों को सावधान किया जा सके। (1)

वही है जिसके पास आसमानों और ज़मीन का पूरा नियंत्रण [control] है, और उसकी कोई संतान नहीं है ---- कोई नहीं है जो उसके नियंत्रण व क़ब्ज़े में उसका साझेदार [Partner] हो--- और उसी ने सारी चीज़ें पैदा की हैं और उन्हें बिल्कुल नपे-तुले अन्दाज़े के मुताबिक़ बनाया है।  (2)
 
इसके बावजूद, विश्वास न करने वालों [काफ़िरों] ने अल्लाह को छोड़कर ऐसे देवताओं को अपना ख़ुदा बना रखा है, जो किसी चीज़ को पैदा नहीं कर सकते, बल्कि वे तो स्वयं पैदा किए जाते हैं, न तो वे कोई नुक़सान पहुँचा सकते हैं, न ही ख़ुद अपनी मदद ही कर सकते हैं, और उनके हाथ में न किसी की मौत है, न जीवन है, और न ही मरे हुए को दोबारा ज़िंदा उठाया जाना है। (3)

विश्वास न करने वाले [काफ़िर] कहते हैं, "यह (क़ुरआन) तो बस मनघढ़ंत चीज़ है जो इस (रसूल) ने दूसरों की मदद से गढ़ ली है” ---- (मगर) इन लोगों ने तो ख़ुद ही बहुत शैतानियाँ की हैं और अब झूठ बकने पर उतर आए हैं---- (4)

वे कहते हैं, "ये (क़ुरआन) तो बस पुराने ज़माने की कहानियाँ हैं, जिनको इस (रसूल) ने लिख रखा है: वह (अफ़साने) उसे सुबह और शाम लिखवाए जाते हैं।" (5)

कह दें, "इस (क़ुरआन) को उस (अल्लाह) ने उतारा है जो आसमानों और ज़मीन के रहस्य जानता है। सचमुच ही वह बहुत माफ़ करने वाला, अत्यन्त दयावान है।" (6)

उनका यह भी कहना है, "यह किस तरह का रसूल है जो (आम आदमी की तरह) खाना खाता है और बाज़ारों में चलता-फिरता है! किसी फ़रिश्ते को क्यों नहीं भेजा गया जो लोगों को सावधान करने में इसकी मदद करता? (7)

क्यों नहीं इसे ऊपर से कोई ख़ज़ाना या कोई बाग़ दे दिया गया, जिसमें से यह खाता पीता?" और यह शैतानियाँ करने वाले (मुसलमानों से) कहते हैं, "तुम लोग जिस आदमी के पीछे चल रहे हो, उस पर कुछ और नहीं, बस जादू हो गया है!" (8)

[ऐ रसूल] देखें, आपके बारे में वे कैसी-कैसी बातें सोचते हैं! वे रास्ते से पूरी तरह भटक चुके हैं और अब सही रास्ते पर नहीं आ सकते।  (9)

बड़ी ऊँची शान है उस (आल्लाह) की जो अगर चाहे, तो आपको इनसे भी बढ़िया चीज़ें दे सकता है: बहुत से बाग़ और उनके नीचे से बहती हुई नहरें, और (रहने के लिए) कई महल भी। (10)

असल में, वे लोग आने वाली (क़यामत की) घड़ी को मानने से इंकार करते हैं: और जो उस घड़ी के आने को नहीं मानता, उसके लिए हमने दहकती हुई आग तैयार कर रखी है। (11)

जब वह (जहन्नम की आग) उनको दूर से देखेगी, तो वे लोग उसके बिफरने और ग़ुस्से में चिल्लाने की आवाज़ें सुनेंगे, (12)

और जब उनके हाथ-पाँव बाँधकर उस (आग) के एक पतले से हिस्से में उन्हें फेंक दिया जाएगा, तब वे अपनी मौत को पुकारने लगेंगे। (13)

(उनसे कहा जाएगा,) "आज के दिन तुम केवल एक मौत को नहीं, बल्कि कई मौतों को पुकारो!" (14)

आप कहें, "(बताओ) यह अच्छा रहेगा या हमेशा रहने वाला वह बाग़? --- जो उनका इनाम होगा और उनके सफ़र का अंत भी---- जिसका वादा उन लोगों से किया गया है, जो अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते हैं।" (15)

उनके लिए वहाँ वह सब कुछ होगा, जो वे चाहेंगे, और वहाँ वे हमेशा रहेंगे। [ऐ रसूल] यह आपके रब की तरफ़ से एकदम पक्का वादा है। (16)

उस (क़यामत के) दिन जब अल्लाह सभी को इकट्ठा करेगा---- उनको भी, जिन्हें वे अल्लाह को छोड़कर पूजते हैं, फिर वह कहेगा, "क्या तुम ही वह [झूठे ख़ुदा] थे जिसने मेरे बन्दों को रास्ते से बहका दिया था, या वे स्वयं ही मार्ग छोड़ बैठे थे?" (17)

वे कहेंगे, "महान और बहुत ऊँचा है तू! हम ख़ुद तो तुझे छोड़कर कभी किसी और को अपना मालिक बना ही नहीं सकते थे! मगर  हुआ यह कि तूने उन्हें औऱ उनके बाप-दादा को इस जीवन में मौज-मस्ती के ख़ूब सामान दे दिए, यहाँ तक कि वे तेरी चेतावनी [Reminder] को भुला बैठे और बर्बाद होकर रहे।" (18)

[अल्लाह कहेगा], “अब जबकि तुम्हारे (ठहराए हुए) ख़ुदाओं ने भी तुम्हारी बातों को झूठी होने की घोषणा कर दी है: तो अब तुम सज़ा से बच नहीं सकते; तुम्हें कोई मदद नहीं की जाएगी.” तुममें से कोई भी अगर ऐसी शैतानी करता है, तो हम उसको ज़रूर बड़ी दर्दनाक सज़ा का मज़ा चखाएँगे। (19)
 
[ऐ मोहम्मद] आपसे पहले हमने कोई भी रसूल [Messenger] ऐसा नहीं भेजा, जो (आम लोगों की तरह) खाना न खाता हो या बाज़ारों में चलता-फिरता न हो। मगर हमने तुममें से कुछ को ऐसा बनाया है जिसके द्वारा दूसरे लोगों को जाँचा-परखा जा सके---- "तो क्या तुम धीरज [सब्र] से काम लोगे?" तुम्हारा रब तो सब कुछ देख रहा है। (20)

जिन्हें (अंत में) हमारे सामने हाज़िर होने की उम्मीद (या डर) नहीं है, कहते हैं, "फ़रिश्तों को क्यों नहीं उतारकर हमारे पास भेजा जाता है? या फिर ऐसा क्यों नहीं होता कि हम अपने रब को देख पाते?" वे घमंड में अपने आपको बहुत बड़ा समझने लगे हैं और दूसरों को बहुत छोटा समझते हुए हदें तोड़ने में लगे हैं। (21)

जिस (क़यामत के) दिन वे फ़रिश्तों को देखेंगे, वह अपराधियों के लिए कोई ख़ुशी का दिन न होगा। फ़रिश्ते कहेंगे, “तुम्हारे लिए उस (जन्नत के दरवाज़े) के अंदर जाने पर रोक [barrier] लगी हुई है।” (22)

और फिर हम (हिसाब-किताब के लिए) उनके किए गए कर्मों पर नज़र डालेंगे, और उसे धूलकण (जैसा बेकार) बना देंगे। (23)

मगर उस दिन जो लोग जन्नत [बाग़] में होंगे, उनके पास रहने की जगह भी बहुत बेहतर होगी, और आराम करने की जगह भी बहुत अच्छी होगी। (24)

उस दिन सारे आसमान और उसके बादल फट पड़ेंगे, और फ़रिश्तों को इस तरह उतारा जाएगा कि ताँता लग जाएगा, (25)

उस दिन, वास्तव में सारा अधिकार [Authority] तो रहम व दया करने वाले रब का ही होगा। विश्वास न करने वालों के लिए वह दिन बड़ा ही कठिन होगा। (26)

उस दिन शैतानी करने वाला ख़ुद अपने हाथ चबा लेगा और कहेगा, "काश! मैं भी रसूल के बताए हुए मार्ग पर चला होता! (27)

हाय मेरा दुर्भाग्य! काश, मैंने उस उस आदमी से दोस्ती न की होती! (28)

मेरे पास जबकि (अल्लाह का) संदेश आ चुका था, तब भी उस (दोस्त) ने मुझे उससे भटका दिया। शैतान ने तो हमेशा ही आदमी को धोखा दिया है।" (29)
 

रसूल ने कहा, "ऐ मेरे रब! मेरी क़ौम के लोग इस क़ुरआन के साथ ऐसा बर्ताव करते हैं जैसे कि यह कोई छोड़ देने वाली चीज़ हो," (30)

मगर हमने हमेशा हर नबी के साथ गुनाहगारों में से ही दुश्मनों को भी नियुक्त किया है: आपका रब मार्गदर्शन देने और मदद कॆ लिए काफ़ी है। (31)

विश्वास न करने वाले यह भी कहते हैं, "उसपर पूरी क़ुरआन एक ही बार में क्यों नहीं उतारी गयी?" हमने इसे इस तरह (थोड़ा–थोड़ा करके) इसलिए उतारा है ताकि इसके द्वारा [ऐ रसूल] आपका दिल मज़बूत कर सकें; और हमने इसे (फ़रिश्ते के द्वारा) ठहर-ठहर के आपको पढ़वाया है।  (32)

और जब भी वे अपनी बात को साबित करने के लिए कोई दलील या मिसाल देते हैं, तो हम (पहले ही) उस बात की असल सच्चाई को ठीक ढंग से बता देते हैं, और चीज़ों को बेहतर ढंग से स्पष्ट कर देते हैं।  (33)

जो लोग औंधे मुँह जहन्नम की ओर हँकाकर ले जाए जाएँगे, वे लोग सबसे बुरी जगह में होंगे----वे ही सीधे व सही मार्ग से सबसे ज़्यादा भटके हुए हैं।  (34)
 

हमने मूसा [Moses] को किताब [तोरात] दी थी और उनके भाई हारून [Aaron] को मददगार के रूप में उनके साथ लगा दिया था।  (35)

हमने कहा था, "तुम दोनों उन (फ़िरऔन के) लोगों के पास जाओ जिन्होंने हमारी आयतों को मानने से इंकार किया है।" बाद में हमने उन लोगों को पूरी तरह से बर्बाद करके रख दिया। (36)

और नूह [Noah] की क़ौम के लोगों ने भी: जब रसूलों को झूठा कहकर मानने से इंकार कर दिया तो हमने उन्हें पानी में डुबा डाला, और तमाम लोगों के लिए (इस घटना को) एक मिसाल बना दिया। हमने शैतानी करने वालों के लिए एक दर्दनाक यातना तैयार कर रखी है,  (37)

जैसा कि आद, समूद और अर-रस्सवाले लोगों और उनके बीच (के काल) की बहुत-सी नस्लों को भी हमने बर्बाद कर दिया। (38)

उनमें से हर एक को हमने (पहले) चेतावनियाँ दीं, और हर एक को अंत में पूरी तरह से तबाह-बर्बाद कर दिया। (39)

ये विश्वास न करने वाले लोग तो ज़रूर उस बस्ती से होकर गुज़रे होंगे, जिसे एक भयानक बारिश द्वारा तहस नहस कर दिया गया था---- क्या उन्होंने नहीं देखा? इसके बावजूद, वे मरने के बाद, दोबारा जीवित होकर उठाए जाने की आशा नहीं रखते हैं। (40)

[ऐ रसूल] वे जब भी आपको देखते हैं, आपका यह कहकर मज़ाक़ उड़ाते हैं: "क्या यही है जिसे अल्लाह ने रसूल बनाकर भेजा है? (41)

इसने तो क़रीब-क़रीब हमें अपने देवताओं से भटका ही दिया होता, अगर हम उनकी भक्ति में मज़बूती से जम न गए होते।" जब वे यातना को देखेंगे, तो वे जान जाएंगे कि कौन सही मार्ग से बहुत दूर भटका हुआ था। (42)

[ऐ रसूल] आप उसके बारे में ज़रा सोचें, जिसने अपनी ख़्वाहिशों को अपना ख़ुदा बना रखा है: तो क्या आप उसकी (देखरेख की) ज़िम्मेदारी ले सकते हैं? (43)
 
या क्या आपको ऐसा लगता है कि इनमें से ज़्यादातर लोग सुनते या समझते हैं? वे तो एकदम चौपायों की तरह हैं--- नहीं, बल्कि वे सही रास्ते से बहुत दूर जा पड़े हैं! (44)
 

क्या तुम नहीं देखते कि तुम्हारा रब कैसे छाया [shadow] को लम्बी कर देता है? अगर वह चाहता, तो उसे एक जगह स्थिर रख देता---  फिर हमने सूरज को (छाया के लिए) रास्ता दिखाने वाला [indicator] बनाया, (45)

मगर हम उस (छाया) को थोड़ा-थोड़ा करके (छोटी करते हुए) अपनी ओर समेट लेते हैं।  (46)

वही है जिसने रात को तुम्हारे लिए वस्त्र [garment] बनाया, और नींद को बनाया आराम करने के लिए, और दिन को फिर से जी उठने का समय बनाया। (47)

वही है जो हवाओं को पहले भेज देता है जो (बारिश के रूप में) अल्लाह की रहमत की ख़ुशख़बरी लेकर आती हैं। और हम ही हैं जो आसमान से साफ़ पानी उतारते हैं, (48)

ताकि हम इससे मुर्दा पड़ी हुई ज़मीन को दोबारा जीवन प्रदान करें, और उससे अपने पैदा किए हुए बहुत-से जानवरों और आदमियों के लिए पीने का सामान कर दें। (49)

और हम इस (बारिश) को लोगों के बीच (अलग-अलग जगहों पर) अलग-अलग समय बाँटते रहते हैं, ताकि वे इससे शिक्षा ले सकें, परन्तु अधिकतर लोग शुक्रिया अदा नहीं करने के आदी बन चुके हैं। (50)

अगर हम ऐसा चाहते, तो हर बस्ती में एक सावधान करने वाला भेज देते,  (51)

अतः विश्वास न करनेवालों का [ऐ रसूल] आप कहना मत मानें: इस (क़ुरआन) के द्वारा उनसे कड़ा संघर्ष [जिहाद] करें। (52)
 

वही है जिसने दो बड़े सागरों को इस तरह बहा दिया कि एक का पानी ताज़ा व मीठा है, और दूसरे का खारा और कड़ुआ, और उन दोनों के बीच उसने एक ऐसी रोक लगा रखी है कि दोनों अपनी सीमाएं नहीं लाँघते हैं। (53)

और वही है जिसने पानी से आदमी को पैदा किया, फिर उसे ख़ून और शादी के संबंधों से जोड़कर एक रिश्ते में बाँध दिया: तुम्हारा रब बहुत ताक़तवाला है! (54)

इसके बावजूद वे अल्लाह को छोड़कर, ऐसी चीज़ों को पूजते हैं जो उन्हें न कोई फ़ायदा पहुँचा सकती हैं और न ही कोई नुक़सान: विश्वास न करने वालों ने हमेशा ही अपने रब का विरोध करने के लिए कमर कस रखी है। (55)

[ऐ रसूल] हमने तो आपको केवल ख़ुशख़बरी सुनानेवाला और चेतावनी देनेवाला ही बनाकर भेजा है। (56)

कह दें, "मैं इस काम के लिए तुमसे कोई इनाम नहीं माँगता, हाँ अगर कोई (कुछ देना ही) चाहता है, तो उसे चाहिए कि वह अपने रब की ओर जाने वाले मार्ग को अपना ले।" (57)

तुम उस (अल्लाह) पर भरोसा रखो जो ज़िंदा है और जिसे कभी मौत नहीं आती, और तुम उसकी बड़ाई का गुणगान करते रहो। वह अपने बन्दों के गुनाहों की ख़बर रखने के लिए काफ़ी है: (58)

वही है जिसने आसमानों को और ज़मीन को और जो कुछ उन दोनों के बीच है, सबको छह दिनों में पैदा किया, फिर अपने सिंहासन पर विराजमान हुआ--- वह दया करनेवाला [रहमान] रब है; उसे हर चीज़ की पूरी ख़बर है। (59)

तब भी, उन लोगों से जब कहा जाता है कि "रहम करनेवाले रब [रहमान] के सामने झुक जाओ" तो वे कहते हैं, "यह रहमान क्या होता है? जिसके सामने भी तुम कहोगे, क्या हम उसके सामने अपना सर झुका देंगे?" इससे वे और भी ज़्यादा बिदक जाते हैं।  (60)

बड़ी ऊँची शान है उसकी, जिसने आसमानों में तारों के समूह [नक्षत्र] बनाए, और उसमें बनाया एक रौशनी देनेवाला चिराग़ [सूरज], और एक चमकता हुआ चाँद --- (61)

वही है जिसने रात और दिन को इस तरह बनाया कि वे बारी-बारी से एक-दूसरे के पीछे चले आते हैं--- अत: (यह बातें उसके लिए काम की हैं) जो (इन निशानियों से) सबक़ लेना चाहता हो या (अल्लाह का) शुक्र अदा करना चाहता हो। (62)
 
 
रहम करनेवाले रब [रहमान] के बन्दे वह हैं, जो धरती पर नम्रता से चलते-फिरते हैं, और जब जाहिल व बेवक़ूफ़ उनके मुँह लगते हैं, तो वे जवाब में कह देते हैं, "तुम पर सलामती हो!"; (63)

जो अपने रब की इबादत करते हुए रातें गुज़ारते हैं, कभी (सज्दे में) झुके हुए, कभी (नमाज़ में) खड़े होकर; (64)

जो यह कहते हैं, "ऐ हमारे रब! जहन्नम की यातना को हमसे दूर रख, कि झेलने के लिए सचमुच कितनी दर्दनाक यातना होगी! (65)

सचमुच यह शैतानी घर होगा, रहने की बहुत ही बुरी जगह!”  (66)

(अच्छे लोग) वे हैं जो जब ख़र्च करते हैं, तो न फ़ज़ूल-ख़र्ची करते हैं, और न ही कंजूसी से काम लेते हैं, बल्कि वे इनके बीच एक संतुलन बनाए रखते हैं; (67)
 
जो लोग अल्लाह के अलावा किसी दूसरे देवी-देवता को न कभी पूजते हैं; और न किसी की जान (बे वजह) लेते हैं जिसे अल्लाह ने हराम [forbidden] क़रार दिया है, सिवाए इसके कि (किसी को क़त्ल करना) न्यायसंगत हो, और न ही वे (किसी के साथ) अवैध शारीरिक संबंध [Adultery] बनाते हैं। (तो जो कोई भी इन बातों को न माने) और ऐसे गुनाह करता हो, तो उसे दंड मिलेगा: (68)

क़यामत के दिन उनकी यातना बढ़ाकर दोगुनी कर दी जाएगी, और वे उसी में हमेशा पड़े रहेंगे, अपमानित होकर, (69)

सिवाए उसके जो पछताया अपने गुनाहों पर, विश्वास रखा (अल्लाह पर), और अच्छे कर्म किए: तो ऐसे लोगों के बुरे कर्मों को अल्लाह अच्छे कर्मों में बदल देगा। और अल्लाह सबसे ज़्यादा क्षमा करनेवाला, बेहद दयावान है।  (70)

जो लोग (गुनाहों से) तौबा कर लेते हैं और फिर अच्छे कर्म करते हैं, तो वे (अपनी तौबा से) सचमुच अल्लाह की ओर पूरी तरह से लौट आते हैं।  (71)
 
[रहम करनेवाले रब के असल बंदे वे हैं] जो कोई झूठी गवाही नहीं देते, और वे, जब कहीं कोई बेकार की चीज़ें होते हुए देखते हैं, तो वहाँ से शालीनता से गुज़र जाते हैं; (72)

और जब उन्हें अल्लाह की निशानियाँ [आयतें] याद दिलायी जाती हैं, तो वे उन (आयतों) पर (काफ़िरों की तरह) अपने कानों और आँखों को बंद नहीं कर लेते; (73)

बल्कि वे दुआ करते हैं, "ऐ हमारे रब! हमें अपने पति/पत्नियों और अपने बाल-बच्चों के बीच ख़ुशी व आराम के साथ रख। और हमें ऐसा बना दे कि जो लोग तुझ से डरते हुए बुराइयों से बचते हैं, उनके सामने हमारी मिसालें दी जा सकें।" (74)

यही वे बंदे होंगे जिन्हें (अपने ईमान पर) जमे रहने की वजह से बदले में जन्नत की सबसे ऊँची जगह दी जाएगी। वहाँ दुआओं और सलाम से उनका स्वागत किया जाएगा। (75)

वहीं वे हमेशा रहेंगे--- एक ख़ुशनुमा घर और आराम की बेहतरीन जगह में! (76)

[ऐ रसूल, काफ़िरों से कह दें], "मेरे रब के सामने तुम्हारी औक़ात ही क्या है, जो तुम उसके सामने झुककर उससे फ़रियाद नहीं कर सकते? मगर चूँकि तुम सच्चाई को झूठ मानकर ठुकरा ही चुके हो, तो अब वह (सज़ा) तुम्हारे गले पड़ कर रहेगी।" (77)
 
 
 
नोट:
 

4: मक्का के लोगों ने मुहम्मद (सल्ल) पर यह इल्ज़ाम लगाया था कि उन्होंने किसी यहूदी और ईसाई से पुराने नबियों के क़िस्से सीख लिए हैं, और वह इन्हीं को क़ुरआन में लिखवा देते हैं। हालाँकि तोरात का ज्ञान रखने वाले जिन यहूदियों का वे ज़िक्र करते थे, वे ख़ुद ही मुसलमान बन गए थे, लेकिन अगर ऐसी बात होती तो वह मुस्लिम क्यों बनते!  


11: असल में उन लोगों को क़यामत और आख़िरत [परलोक] पर विश्वास नहीं था, इसलिए उन्हें सच्चाई पर तरह-तरह की आपत्तियाँ करने और मज़ाक़ उड़ाने में कोई डर नहीं था। 


14: वहाँ मौत नहीं आएगी, बल्कि नित नई यातनाओं से पाला पड़ेगा जो कई मौतों जैसा होगा। 


18: अल्लाह को छोड़कर लोगों ने फ़रिश्तों को, जिन्नों को या मूर्तियों को ख़ुदा बना रखा था। यह भी संभव है कि उस दिन मूर्तियों को भी बोलने की क्षमता दे दी जाए।


23: अच्छे कर्मों का बदला उन्हें दुनिया में भले ही मिल जाए, मगर उनके किए हुए अच्छे कर्म आख़िरत में  बेकार हो जाएंगे, क्योंकि वहाँ अच्छे कर्मों को तभी क़बूल किया जाएगा, अगर आदमी ने अल्लाह, रसूल और क़यामत पर ईमान रखा होगा।


38: "अर-रस्स वाले" का मतलब 'कुएं वाले', इनके बारे में कोई भी बात ठीक से नहीं मालूम, बस इतना ही पता चलता है कि इनकी क़ौम के लोग किसी कुएं के किनारे आबाद थे, उनके पास भी एक रसूल भेजे गए थे, मगर उन लोगों ने भी सच्चाई पर विश्वास नहीं किया, और नतीजे में तबाह हो गए। 


39: चेतावनियों में पुराने लोगों की बर्बादी की मिसालें दी गईं, मगर वे नहीं माने। 


40: यहाँ इशारा लूत (अलै) की क़ौम के खंडहरों से है जो सीरिया जाने के व्यापारिक मार्ग पर था। इन पर पत्थरों की बारिश हुई थी, देखें सूरह हूद (11: 77-83) .


72: "झूठी गवाही" का एक अनुवाद  "ग़लत और नाजायज़ काम" भी किया गया है। 


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