16-36: मरयम और ईसा (अलै) की कहानी
37-40: ईसा (अलै) के बारे में झगड़ने वालों को चेतावनी
41-50: इबराहीम, इसहाक़ और याक़ूब (अलै)
51-53: मूसा और हारून (अलै)
54-55: इसमाईल (अलै)
56-57: इदरीस (अलै)
58-63: अल्लाह के ख़ास नबियों का समूह
64-65: फ़रिश्तों का काम
66-72: दोबारा ज़िंदा उठाया जाना तय है
73-87: सच्चाई पर विश्वास न करने और मूर्तिपूजा की सज़ा
88-96: अल्लाह की कोई औलाद नहीं
97-98: अंत में रसूल को सलाह
5: नबी के रूप में लोगों को भलाई के कामों की तरफ़ बुलाना और बुरे कामों से रोकने के जिस मिशन में वह लगे हुए थे, उन्हें संदेह था कि उनके मरने के बाद उनके भाई-बंधु इस काम को ठीक से आगे बढ़ा पाएंगे।
17: शायद वह नहाने या अकेले में इबादत के लिए अलग-थलग हो गयी थीं।
24: हज़रत मरयम जिस जगह चली गयी थीं, वह एक छोटी पहाड़ी पर स्थित थी, शायद यही जगह "बैतुल-लहम" कहलाती है जो बैतुल मक़दिस से कुछ मील की दूरी पर है।
28: हो सकता है कि हज़रत मरयम के भाई का नाम "हारून" हो, या यह हो सकता है कि वह हारून (अलै.)/ [Aaron] के क़बीले से हों।
30: हज़रत मरयम की चाल-चलन पर जब सवाल उठने लगे, तो अल्लाह ने छोटे से बच्चे [ईसा] को बोलने की शक्ति दे दी..... "मुझे नबी बनाया और किताब [इंजील] दी" का मतलब बड़े होकर नबी बनाया जाएगा और किताब दी जाएगी, और यह बात इतनी पक्की है जैसे हो ही चुकी।
34: संदेह में ईसाई और यहूदी दोनों ही पड़े हुए थे, यहूदी उन्हें अल्लाह का नबी मानते ही नहीं थे, और ईसाई उन्हें अल्लाह का बेटा मानते थे।
36: कुछ विद्वान कहते हैं कि यह बात ईसा (अलै) ने नहीं कही, बल्कि मुहम्मद (सल्ल) के द्वारा कही गयी है।
45: ....."आप शैतान के साथी होकर रह जाएं" या "आप शैतान की मदद करने वाले बन जाएं।"
47: इबराहीम (अलै) अल्लाह से अपने बाप के गुनाहों की माफ़ी माँगना चाहते थे, मगर जैसा सूरह तौबा (9: 114) से पता चलता है कि जब उन्हें लगा कि वह एक अल्लाह पर विश्वास नहीं करने वाले, तो वह अपने बाबा से अलग हो गए, और उनकी माफ़ी के लिए दुआ भी नहीं की।
54: यूँ तो हर रसूल/नबी अपने वादे के पक्के होते हैं, मगर यहाँ इसमाईल (अलै.) का ख़ास करके ज़िक्र है, शायद इसलिए कि जब उनके बाप इबराहीम (अलै) को उन्हें क़ुर्बान [sacrifice] करने का हुक्म हुआ, तो इसमाईल ने वादा किया था कि ज़बह होते समय वह सब्र [धीरज] करेंगे।
56: इदरीस (अलै.) के बारे में ज़्यादा जानकारी नहीं मिलती। कुछ लोग उन्हें बाइबल में आए Enoch से मिलाते हैं जो कि नूह (अलै) के परदादा थे, जिन्हें अल्लाह ने ज़िंदा आसमान पर उठा लिया था। हज़रत इदरीस के बारे में कहा जाता है कि वह पहले आदमी थे जिसने क़लम से लिखा था, उन्हें गणित और ग्रह-नक्षत्र की भी जानकारी थी, और पहली बार उन्होंने जानवरों की खाल की सिलाई करके कपड़ा पहना था। कुछ लोग इन्हें हज़रत इल्यास (अलै) से भी जोड़ते हैं जिनका ज़िक्र सूरह अनाम (6: 85) और सूरह साफ़्फ़ात (37: 123 ) में भी आया है।
64: कभी-कभी ऐसा होता था कि कुछ अवधि के लिए फ़रिश्ता जिबरईल अल्लाह की तरफ़ से आयतें लेकर आना बंद कर देते थे जिससे मुहम्मद (सल्ल) बेचैन हो जाते थे, क्योंकि मक्का के लोग आपका मज़ाक़ उड़ाया करते थे कि उनके अल्लाह ने उन्हें छोड़ दिया है, इसीलिए उन्होंने जिबरईल (अलै) से अनुरोध किया था कि वह जल्दी जल्दी आया करें, मगर उन्होंने यहाँ बताया है कि बिना अल्लाह के हुक्म के वह ऐसा नहीं कर सकते। (सही बुख़ारी)
71: "तुममें से हर एक को", इसका मतलब या तो वे विश्वास न करनेवाले हैं, या फिर सारे ही अच्छे-बुरे लोग हैं जिन्हें "पुल सिरात" से ग़ुज़रना ही होगा, यह पुल जहन्नम पर ही बना हुआ है। नेक और अच्छे लोग इस पर से आराम से गुज़र जाएंगे, और बुरे कर्म करने वाले और विश्वास न करने वाले लोग जहन्नम में गिरा दिए जाएंगे। जिनके दिलों में ईमान होगा, वे अपने बुरे कर्मों की सज़ा भुगतने के बाद वहाँ से निकाल लिए जाएंगे।
77: मक्का के कुछ लोगों में ऐसी मान्यता थी कि इस दुनिया में अगर उसके पास धन-दौलत और औलाद हैं, तो इसका मतलब यह है कि अल्लाह उनसे ख़ूश है, और ये सब उसे परलोक में भी ज़रूर मिलेगा।
81: मक्का के कुछ विश्वास न करने वाले यह कहा करते थे कि हम "लात, उज़्ज़ा, मनात" आदि की पूजा इसलिए करते हैं कि वे अल्लाह के पास हमारी सिफ़ारिश करेंगे, देखें सूरह यूनुस (10: 18).