Thursday, June 1, 2017

सूरह 19 : मरयम [Mary]

सूरह 19: मरयम [Mary]


 02-15: ज़करिया और यह्या [Zachariah & John] की कहानी 

16-36: मरयम और ईसा (अलै) की कहानी 

37-40: ईसा (अलै) के बारे में झगड़ने वालों को चेतावनी 

41-50: इबराहीम, इसहाक़ और याक़ूब (अलै) 

51-53: मूसा और हारून (अलै) 

54-55: इसमाईल (अलै)

56-57: इदरीस (अलै) 

58-63: अल्लाह के ख़ास नबियों का समूह 

64-65: फ़रिश्तों का काम 

66-72: दोबारा ज़िंदा उठाया जाना तय है 

73-87: सच्चाई पर विश्वास न करने और मूर्तिपूजा की सज़ा 

88-96: अल्लाह की कोई औलाद नहीं 

97-98: अंत में रसूल को सलाह 


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

काफ॰ हा॰ या॰ ऐन॰ साद॰ (1)
[ऐ रसूल] यह आपके रब की उस रहमत [Mercy] का बयान है, जो उसने अपने बंदे ज़करिया [Zachariah] पर दिखायी थी, (2)
जब उसने अपने रब को मन ही मन में (दबी आवाज़ से) पुकारा था, (3)
"ऐ मेरे रब! मेरी हड्डियाँ कमज़ोर हो गई हैं, और मेरे सिर के बाल बुढ़ापे से बिल्कुल सफ़ेद हो गए हैं, मगर ऐ रब!, कभी ऐसा नहीं हुआ कि मैंने तुझसे कोई दुआ माँगी हो और तूने मेरी माँग पूरी न की हो: (4)
मुझे अपने मरने के बाद अपने भाई-बन्धुओं की ओर से डर है (कि पता नहीं वे क्या करेंगे), और मेरी पत्नी तो बाँझ है। अतः तू मुझे अपने पास से एक उत्तराधिकारी [Successor] प्रदान कर----जो तेरी ओर से एक इनाम हो----  (5)
जो मेरा भी वारिस [heir] हो और याक़ूब [Jacob] के वशंज का भी वारिस हो। और ऐ रब! उसे ऐसा बना देना कि (तू और तेरे बंदे) सब उसे पसंद करें।" (6)
(जवाब मिला), "ऐ ज़करिया! हम तुझे एक लड़के (के पैदा होने) की ख़ुशख़बरी सुनाते हैं, जिसका नाम यह्या [John] होगा---- इससे पहले हमने किसी के लिए भी यह नाम नहीं चुना।" (7)

उसने (हैरान होकर) कहा, "मेरे रब! मेरे यहाँ लड़का कैसे हो सकता है! मेरी पत्नी बाँझ है और मैं बूढ़ा और बहुत कमज़ोर हो चुका हूँ?" (8)
कहा गया, 'ऐसा ही होगा! तेरा रब कहता है, “यह मेरे लिए कोई मुश्किल बात नहीं, इससे पहले मैं ख़ुद तुझे पैदा कर चुका हूँ,  हालाँकि (उस समय) तेरे वजूद [अस्तित्व] का कोई अता-पता न था।" (9)

इस पर ज़करिया ने कहा, "मेरे रब! मेरे लिए इस बारे में कोई निशानी ठहरा दे।" कहा, "तेरे लिए निशानी यह है कि तू तीन (दिन और) रात तक लोगों से बात न कर पाएगा।" (10)
अतः वह इबादतगाह से बाहर निकलकर अपने लोगों के पास आया और (बिना मुँह से बोले हुए) उनसे इशारों में कहा कि सुबह-शाम अल्लाह की बड़ाई का बखान करते रहो।" (11

(हमने कहा), "ऐ यह्या! अल्लाह की किताब [तोरात] को मज़बूती से थाम ले।" वह अभी छोटा लड़का ही था कि हमने उसे गहरी समझ-बूझ दे दी थी, (12)
और ख़ास अपने पास से दिल की नर्मी और मन की शुद्धि भी दे दी थी। सचमुच वह बड़ा परहेज़गार था, (13)
अपने माँ-बाप की सेवा करनेवाला था, कड़े मिज़ाज का और आज्ञा न माननेवाला न था। (14)
"सलामती थी उस पर, जिस दिन वह पैदा हुआ और जिस दिन उसकी मृत्यु हो गयी, और सलामती होगी उस पर जिस दिन वह फिर से ज़िंदा उठाया जाएगा!" (15)

[ऐ रसूल] इस क़ुरआन में मरयम [Mary] की कहानी को बयान करें। ऐसा हुआ कि वह अपने घरवालों से अलग होकर एक ऐसी जगह चली गयीं जो पूरब की तरफ़ थी (16)
और वहाँ वह पर्दा करके उन सबसे अलग-थलग हो गयीं; तब हमने उसके पास अपनी रूह [फ़रिश्ते] को भेजा जो उसके सामने एक पूरे आदमी के रूप में प्रकट हुआ। (17)
(मरयम उसे देखकर घबरायीं और) बोलीं, "मैं रहम करनेवाले रब [रहमान] के नाम से तुझसे अपनी हिफ़ाज़त माँगती हूँ: अगर तुझे (अल्लाह का) कुछ भी डर है (तो मुझसे दूर हट जा)!" (18)
मगर फ़रिश्ते ने कहा, "मैं तो केवल तेरे रब का संदेश लेकर आया हूँ, ताकि तुझे तोहफ़े में एक नेक बेटा दे सकूँ।" (19)
मरयम ने कहा, "मुझे बेटा कैसे हो सकता है जबकि मुझे किसी आदमी ने छुआ तक नहीं? और न ही मैं बदचलन हूँ", (20)
फरिश्ते ने कहा, "मगर होगा ऐसा ही! तेरा रब कहता है, “यह मेरे लिए कुछ भी मुश्किल नहीं---हम उसे सारे लोगों के लिए एक निशानी बना देंगे, जो हमारी तरफ़ से एक रहमत [blessing] होगी।" और यह ऐसी बात थी जिसका होना पहले से ही तय हो चुका था: (21)
फिर उसे उस (होनेवाले बच्चे) का गर्भ ठहर गया। वह लोगों से अलग हटकर एक दूर के स्थान पर चली गई (22)
और, फिर प्रसव के दर्द [Labour pain] की बेचैनी उसे एक खजूर के पेड़ के नीचे ले आई। (जहाँ वह उसके तने के सहारे बैठ गयी) और वह कहने लगी, "क्या ही अच्छा होता कि मैं इससे पहले ही मर चुकी होती और लोग मुझे भूल जाते!" (23)
उस समय (पहाड़ी के) नीचे से एक पुकारनेवाले (फ़रिश्ते) की आवाज़ सुनाई दी, "चिंता न कर: तेरे रब ने तेरे क़दमों तले पानी का एक सोता [Stream] बहा दिया है (24)
और, अगर तू खजूर के पेड़ के तने को पकड़कर अपनी ओर हिलाएगी तो तेरे ऊपर ताज़ा पकी-पकी खजूरें टपक पड़ेंगी, (25)
अतः खाओ, पियो और ख़ुश रहो, फिर अगर कोई आदमी नज़र आ जाए (जो कुछ पूछ बैठे) तो उसे (इशारे से) कह देना, “मैंने अपने रब [रहमान] के लिए (चुप रहने के) रोज़े [मौन व्रत] की मन्नत मान रखी है, इसलिए मैं आज किसी आदमी से बातचीत नहीं कर सकती।" (26)

फिर (ऐसा हुआ कि) वह उस बच्चे को साथ लिए हुए अपनी क़ौम के लोगों के पास वापस आई। (लड़के को गोद में देखकर) वे बोल उठे, "मरयम, यह तूने क्या कर डाला! (27)
ऐ हारून की बहन! न तो तेरा बाप ही कोई बुरा आदमी था और न तेरी माँ ही बदचलन थी!" (28)
इस पर मरयम ने लड़के की तरफ़ इशारा किया (कि यही बताएगा)। वे कहने लगे, "भला हम एक (पालने के) बच्चे से कैसे बात कर सकते हैं?" (29)
(मगर लड़का) बोल उठा, "मैं अल्लाह का बन्दा हूँ। उसने मुझे किताब [Scripture] प्रदान की; मुझे नबी [Prophet] बनाया; (30)
मुझे बरकतवाला [blessed] बनाया, चाहे मैं जहाँ भी रहूँ। और जब तक मैं ज़िंदा रहूँ, मुझे हुक्म दिया नमाज़ पढ़ने का, (ग़रीबों को) ज़कात [alms] देने का, (31)
और अपनी माँ की (प्यार से) देखभाल करने का। उसने मुझे पत्थर-दिल या बेरहम नहीं बनाया। (32)
(अल्लाह की ओर से) सलामती थी मुझ पर, जिस दिन मैं पैदा हुआ और उस दिन भी मुझ पर सलामती होगी जिस दिन मैं मरूँगा, और जिस दिन दोबारा ज़िंदा करके उठाया जाऊँगा!" (33)

ऐसा था मरयम का बेटा, ईसा [Jesus]!
यह है असल में सच्ची बात जिसके बारे में वे सन्देह में पड़े हुए हैं: (34)
अल्लाह के लिए यह बात कभी भी उपयुक्त नहीं कि वह किसी को अपना बेटा बनाए। वह इन चीज़ों से बहुत ऊँचा है: उसकी शान तो यह है कि जब वह कोई काम करने का फ़ैसला करता है तो बस हुक्म देता है, "हो जा!" तो बस वह हो जाता है। (35)
और (ईसा यही तो कहते थे), "निस्संदेह अल्लाह मेरा भी रब है और तुम्हारा भी, अतः तुम उसी की बन्दगी करो: यही (सच्चाई का) सीधा मार्ग है।" (36)
मगर फिर उसके बाद विभिन्न गुटों [factions] का आपस में मतभेद होने लगा, तो जिन लोगों ने सच्चाई की बातों (पर संदेह किया) और उसे मानने से इंकार किया, उनकी हालत पर अफ़सोस! वे कितनी दर्दनाक मुसीबत में पड़ जाएंगे जिस दिन वह भयानक दिन आ जाएगा! (37)
जिस दिन वे हमारे सामने हाज़िर होंगे, उनके कान और उनकी आँखें सुनने और देखने में कितनी तेज़ होंगी, मगर अभी इन ज़ालिमों का हाल यह है कि यह रास्ते से पूरी तरह भटके हुए हैं! (38)  
[ऐ रसूल] आप उन्हें ‘पछतावे के दिन’ [Day of Remorse] से सावधान कर दें, जब इन मामलों का फ़ैसला कर दिया जाएगा, मगर उनका हाल यह है कि वे इन बातों पर ध्यान ही नहीं देते और उनको भुलाए बैठे हैं, और वे ईमान भी नहीं रखते हैं। (39)
हम ही (अंतत:) ज़मीन के वारिस होंगे, और उन सभी लोगों के भी (वारिस) होंगे जो इस ज़मीन पर बसे हुए हैं, और हमारे ही पास सबको लौटकर आना है। (40)

इस क़ुरआन में इबराहीम [Abraham] की कहानी को भी बयान करें। निस्संदेह वह सच्चाई की मूर्ति था, अल्लाह का नबी था। (41)

जब उसने अपने बाप से कहा, "ऐ बाबा! आप उस चीज़ को क्यों पूजते हैं, जो न सुन सकती है, न देख सकती है, और न आपके किसी काम आ सकती है? (42)

बाबा! मैं सच कहता हूं, ज्ञान की एक रौशनी जो आपको नहीं मिल पायी थी, वह मुझे मिल गई है, अतः आप मेरे पीछे चलें: मैं आपको सीधा मार्ग दिखाऊँगा। (43)

बाबा! शैतान की बन्दगी न कीजिए---- शैतान तो दयालु रब [रहमान] की आज्ञा को मानने से ही इंकार कर चुका है। (44)

बाबा! मैं डरता हूँ कि कहीं ऐसा न हो कि आपको रहम करनेवाले [रहमान] की तरफ़ से कोई यातना आ पकड़े, और आप (जहन्नम में) शैतान के साथी होकर रह जाएँ।" (45)

बाप ने (यह बातें सुनकर) कहा, "ऐ इबराहीम! क्या तू मेरे देवताओं को रद्द करता है? याद रख! अगर तू ऐसी बातों से बाज़ न आया तो मैं तुझे पत्थर से मरवाउंगा। अगर तू अपनी जान चाहता है, तो मेरे रास्ते से अलग हट जा!" (46)

इबराहीम ने कहा, "अच्छा तो सलाम है आपको: (आपसे अलग होकर भी) मैं आपके लिए रब से माफ़ी की दुआ करूँगा---- वह तो मुझ पर बहुत मेहरबान है --- (47)

मगर अब, मैं आप सबको छोड़ता हूँ, और उन (मूर्तियों) को भी, जिन्हें अल्लाह को छोड़कर आपलोग पुकारा करते हैं, और मैं तो अपने रब को पुकारूँगा। मुझे भरोसा है कि अपने रब को पुकारकर  मुझे किसी चीज़ की कमी नहीं होगी।" (48)

फिर जब वह उन लोगों से और उन सबसे जिन्हें वे अल्लाह के सिवा पूजते थे, अलग हो गया, तो हमने (उसकी नस्ल में बरकत दी और) उसे इसहाक़ [Isaac] और (इसहाक़ का बेटा) याक़ूब [Jacob] प्रदान किया और उन दोनों को हमने नबी [Prophet] बनाया था: (49)

हमने उनपर अपनी ख़ास दया-दृष्टि डाली थी, और उन सबको सच्चाई की आवाज़ें बुलंद करनेवाला बनाकर बड़ी प्रतिष्ठा दी। (50)


और इस किताब [क़ुरआन] में मूसा [Moses] की कहानी भी बयान कर दें। निस्संदेह वह ख़ास चुना हुआ बंदा था, जो एक रसूल [Messenger] और नबी [Prophet] था: (51)  

हमने उसे 'तूर' पहाड़ के दाहिनी ओर से पुकारा और (‘वही’ द्वारा) रहस्य की बातें करने के लिए उसे अपने से नज़दीक किया; (52)

और अपनी रहमत से उसके भाई हारून [Aaron] को (उसकी मदद के लिए) नबी बनाकर उसे दिया। (53)

और (ऐ रसूल), इस किताब [क़ुरआन] में इसमाईल [Ishmael] की भी चर्चा करें। निस्संदेह वह अपने वायदे का पक्का था और (अल्लाह का) रसूल और नबी था। (54)

वह अपने घर के लोगों को नमाज़ पढ़ने और (ग़रीबों को) ज़कात देने का हुक्म देता था और वह (अपनी सारी बातों में) अपने रब के यहाँ बहुत पसंद किया जाता था। (55)

और (ऐ रसूल) इस किताब में इदरीस की भी चर्चा करें। बेशक वह भी सच्चाई की मूर्ति था​, और एक नबी था। (56)

और हमने उसे बड़े ही ऊंचे दर्जे तक पहुंचा दिया था। (57)


ये लोग उन नबियों में से थे जिन पर अल्लाह ने ख़ास कृपा की थी---आदम की सन्तान में से, और उन लोगों के वंशज में से जिनको हमने नूह के साथ (नौका में) सवार किया था, और इबराहीम और इसराईल (याक़ूब) के वंशज में से----और उन गिरोहों में से जिनको हमने सीधा मार्ग दिखाया और (अच्छाई ​के लिए) चुन लिया। ये वे लोग हैं कि जब उन्हें दयालु रब [रहमान] की आयतें सुनाई जाती थी, तो वे सुनते ही सज्दे में झुक जाते थे और उनकी आंखों से आंसू निकल पड़ते थे, (58)

मगर फिर उनके बाद ऐसे बुरे लोगों की कई पीढ़ियां गुज़रीं, जो नमाज़ की (हक़ीक़त) को भुला बैठे और मन की इच्छाओं के पीछे बढ़ चले। अतः जल्द ही ऐसा होगा कि उनकी गुमराही (के नतीजे) उनके सामने आ जाएं, (59)

मगर हां, जो कोई (गुनाहों से) तौबा कर ले, (सच्चाई पर) विश्वास कर ले, और अच्छे कर्मों​ में लग जाए, तो बेशक ऐसे लोगों के लिए कोई डरने की बात नहीं। वे जन्नत में प्रवेश करेंगे। उनके हक़ के साथ थोड़ी सी भी नाइंसाफी नहीं होगी: (60)

वे सदाबहार रहने वाली जन्नत में दाख़िल होंगे, जिसका वादा दयालु रब [रहमान] ने अपने बन्दों से कर रखा है---- और वह वादा एक अनदेखी चीज़ का है (जिसे इस ज़िन्दगी में वे महसूस नहीं कर सकते, मगर) उसका वादा तो ऐसा है जैसे एक बात घट चुकी है। (61)

उस (जन्नत की ज़िन्दगी में) कोई व्यर्थ बात उनके कानों में नहीं पड़ेगी। जो कुछ सुनेंगे, वह बस सलामती की ही आवाज़ होगी; वहां सुबह-शाम उनकी रोज़ी उन्हें बराबर मिला करेंगी। (62)

यह है वह जन्नत जिसका वारिस हम अपने बन्दों में से हर उस आदमी को बनाएँगे, जो परहेज़गार (devout) हो। (63)


(फ़रिश्ता जिबरईल रसूल से कहेंगे), “हम आपके रब की आज्ञा के बिना आपके पास (''वही' लेकर) नहीं आते-----  जो कुछ हमारे सामने है, और जो कुछ हमारे पीछे​ गुज़र चुका है और जो कुछ इन दोनों वक़्तों के बीच हुआ, सब उसी के हुक्म से है----और आपका रब कभी भी कोई चीज़ भूलनेवाला नहीं है। (64)  

वह आसमानों और ज़मीन का रब है और उन सबका भी रब है, जो इन दोनों के बीच है, अतः (ऐ रसूल) आप उसी की बन्दगी करें: उसकी बंदगी की राह में जो कुछ घटे, उस पर धीरज से जमे रहें। क्या आपकी जानकारी में उस जैसा कोई है? (65)


और (सच्चाई से बेख़बर) इंसान कहता है, "क्या! जब मैं मर गया तो फिर क्या ऐसा होने वाला है कि फिर से ज़िंदा उठाया जाऊँ?" (66)

मगर क्या इंसान को यह बात याद नहीं रही कि हमने उसे पहली बार तब पैदा किया था, जब उसका कोई वजूद न था? (67)

अतः (ऐ रसूल) आपके रब की क़सम, हम उन सबको और उनके साथ सारे शैतानों को ज़रूर इकट्ठा करेंगे। फिर उन सबको जहन्नम के गिर्द हाज़िर होने का आदेश देंगे, इस दशा में कि वे घुटनों के बल झुके होंगे​;  (68)

फिर हर गिरोह में से उन लोगों को (चुन-चुनकर) अलग कर लेंगे जो (अपनी ज़िंदगी में) रहम करनेवाले रब [रहमान] की बनायी गयी सीमाओं को तोड़ने वाला होगा----(69)

फिर यह बात भी हम ही जानते हैं कि कौन जहन्नम में झोंके जाने के सबसे ज़्यादा योग्य है --- (70)

(याद रखो) तुममें से हर एक को इस मंज़िल से गुज़रना ही पड़ेगा, यह एक तय किया हुआ फ़ैसला है जिसे पूरा करना तेरे रब ने ज़रूरी ठहरा लिया है। (71)

फिर हम ऐसा करेंगे कि जो परहेज़गार होंगे, उन्हें तो हम बचा लेंगे और जो शैतानी करने वाले ज़ालिम हैं, उन्हें हम जहन्नम में घुटनों के बल पड़े हुए छोड़ देंगे। (72)


और (देखो) जब हमारी आयतें लोगों को स्पष्ट करके सुनाई जाती हैं, तो जो लोग (सच्चाई पर) विश्वास न करने पर अड़े हुए हैं, वे ईमानवालों से कहते हैं, "दोनों गिरोहों में ज़्यादा अच्छी स्थिति में कौन है? और किस गिरोह के पीछे चलने वाले अधिक हैं?" (73)

उनसे पहले हम कितनी ही कौमों को बर्बाद कर चुके हैं जो तरह तरह के सामान, धन-दौलत और बाहरी चकाचौंध में इनसे कहीं आगे थीं! (74)

(ऐ रसूल) कह दें, "जो कोई गुमराही में पड़ा तो दयालु रब [रहमान] का क़ानून यही है कि उसे उस वक़्त तक बराबर ढील देता जाता है जब तक कि वह अपनी आँखों से वह बात देख न ले जिसका उनसे वादा किया गया था---चाहे (इसी जीवन की) यातना हो या क़यामत की घड़ी (का फ़ैसला)--- तो वे उस समय जान लेंगे कि कौन था जिसकी स्थिति सबसे बदतर हुई और किसका गिरोह सबसे कमज़ोर निकला।" (75)

मगर जिन लोगों ने (सही) मार्ग पा लिया, तो अल्लाह उन्हें और ज़्यादा (कामयाबी की) राह दिखा देता है। और तुम्हारे रब की नज़र में तो बाक़ी रहनेवाली नेकियाँ ही बेहतर हैं-- सवाब [पुण्य] के हिसाब से भी और (अन्तिम) परिणाम के हिसाब से भी। (76)  

(ऐ रसूल) क्या आपने देखा उस आदमी का क्या हाल है जिसने हमारी आयतों को (मानने से) इंकार किया और कहा, "ख़ुदा की क़सम! मैं (परलोक में भी) ज़रूर धन-दौलत पाऊंगा, मैं ज़रूर औलाद पाऊंगा"? (77)

वह जो ऐसा कहता है तो क्या उसने (छिपी हुई) अनदेखी चीज़ को झाँककर देख लिया है, या रहम करनेवाले रब [रहमान] से कोई वचन ले रखा है​ कि उसे ऐसा करना ही पड़ेगा? (78)

हरगिज़ नहीं! (ऐसा कभी नहीं हो सकता!), हम इसे भी लिख लेंगे जो कुछ वह कहता है​ और उसकी यातना को बढ़ाते चले जाएँगे: (79)

यह जिस माल व औलाद का दावा करता है (अगर वह उसे मिल भी जाए तो अंत में) वह सब हमारे ही कब्ज़े में आएगा, औऱ उसे तो हमारे सामने एकदम अकेले ही हाज़िर होना है! (80)


उन लोगों ने अल्लाह को छोड़कर दूसरों को अपना प्रभु बना लिया है, ताकि वे उनके मददगार हों, (81)

लेकिन (क़यामत के दिन) उनके प्रभु उनकी पूजा किए जाने से साफ़ इंकार कर देंगे, बल्कि उल्टे वे उनके विरोधी बन जाएँगे। (82)

(ऐ रसूल) क्या आपने देखा नहीं कि हमने शैतानों को इंकार करने वालों [काफ़िरों] पर छोड़ रखा है, जो उन्हें बराबर (गुनाह करने पर) उकसाते रहते हैं? (83)

अतः उनके लिए आपको उतावला होने की कोई ज़रूरत नहीं: हम तो बस उनके लिए (नियत किए गए) समय गिन रहे हैं। (84)

उस दिन हम नेक व परहेज़गार इंसानों को अपने रब [रहमान] के सामने मेहमानों के रूप में इकट्ठा करेंगे, (85)

और अपराधियों को जहन्नम की ओर प्यासे जानवरों की तरह हँका के ले जाएँगे। (86)

उस दिन सिफ़ारिश करना-कराना किसी के अधिकार में न होगा, सिवाए उनके जिन्होंने दयालु रब [रहमान] से इसकी अनुमति पा ली हो। (87)


और उन (मक्का के काफ़िरों ने) कहा, "ख़ुदा [रहमान] की कोई औलाद है।" (88)

यह अत्यन्त भारी बात है, जो तुम कहते हो: (89)

कहीं ऐसा न हो कि आकाश फट पड़े, धरती फट के टुकड़े-टुकड़े हो जाए और पहाड़ टूटकर गिर पड़ें, (90)

इस बात पर कि लोग ख़ुदा (रहमान) के लिए औलाद रखने का दावा कर रहे हैं! (91)

यह बात ख़ुदा (रहमान) की शान के बिल्कुल ख़िलाफ़ है कि उसकी कोई औलाद हो: (92)

आसमानों और ज़मीन में जो कोई भी है वह इसीलिए है, कि ख़ुदा (रहमान) के सामने बंदगी में सर झुकाए हुए हाज़िर हो ---(93)

उसने अपनी (क़ुदरत से) उन्हें घेर रखा है, और (अपने ज्ञान से) हर एक को ठीक-ठीक गिन रखा है--- (94)

और क़यामत के दिन हर एक, उस ख़ुदा (रहमान) के सामने बिल्कुल अकेले आ खड़ा होगा। (95)
  

मगर जो लोग (सच्चाई पर) ईमान रखते हैं, और अच्छे कर्मो में लगे रहते हैं, तो उनके लिए यह बात पक्की है कि ख़ुदा (रहमान) उन लोगों को अपना प्यार देगा: (96)

इसीलिए (ऐ रसूल), हमने इस क़ुरआन को आपकी भाषा (अरबी) में उतारकर आसान कर दिया, ताकि अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचनेवालों को (कामयाबी की) ख़ुशख़बरी दे दें, और जो गिरोह सच्चाई के विरुद्ध अड़ियल रवैया अपनाने वाला है, उसे (इंकार व सीमा तोड़ने के नतीजे से) सावधान कर दें,  (97)

मगर इन सीमा तोड़नेवालों से पहले, विभिन्न क़ौमों के कितने दौर गुज़र चुके हैं जिन्हें हमने (बुरे कर्मों के नतीजे में) बर्बाद कर दिया! क्या उनमें से किसी की हस्ती भी अब तुम महसूस करते हो, या क्या उनकी कोई भनक भी तुम्हें सुनाई देती है? (98)
 
 
 
 
नोट:

5: नबी के रूप में लोगों को भलाई के कामों की तरफ़ बुलाना और बुरे कामों से रोकने के जिस मिशन में वह लगे हुए थे, उन्हें संदेह था कि उनके मरने के बाद उनके भाई-बंधु इस काम को ठीक से आगे बढ़ा पाएंगे। 

17: शायद वह नहाने या अकेले में इबादत के लिए अलग-थलग हो गयी थीं। 

24: हज़रत मरयम जिस जगह चली गयी थीं, वह एक छोटी पहाड़ी पर स्थित थी, शायद यही जगह "बैतुल-लहम" कहलाती है जो बैतुल मक़दिस से कुछ मील की दूरी पर है। 

28: हो सकता है कि हज़रत मरयम के भाई का नाम "हारूनहो, या यह हो सकता है कि वह हारून (अलै.)/ [Aaron] के क़बीले से हों। 

30: हज़रत मरयम की चाल-चलन पर जब सवाल उठने लगे, तो अल्लाह ने छोटे से बच्चे [ईसा] को बोलने की शक्ति दे दी..... "मुझे नबी बनाया और किताब [इंजील] दी" का मतलब बड़े होकर नबी बनाया जाएगा और किताब दी जाएगी, और यह बात इतनी पक्की है जैसे हो ही चुकी। 

34: संदेह में ईसाई और यहूदी दोनों ही पड़े हुए थे, यहूदी उन्हें अल्लाह का नबी मानते ही नहीं थे, और ईसाई उन्हें अल्लाह का बेटा मानते थे।

36: कुछ विद्वान कहते हैं कि यह बात ईसा (अलै) ने नहीं कही, बल्कि मुहम्मद (सल्ल) के द्वारा कही गयी है। 

45: ....."आप शैतान के साथी होकर रह जाएं" या "आप शैतान की मदद करने वाले बन जाएं।"

47: इबराहीम (अलै) अल्लाह से अपने बाप के गुनाहों की माफ़ी माँगना चाहते थे, मगर जैसा सूरह तौबा (9: 114) से पता चलता है कि जब उन्हें लगा कि वह एक अल्लाह पर विश्वास नहीं करने वाले, तो वह अपने बाबा से अलग हो गए, और उनकी माफ़ी के लिए दुआ भी नहीं की। 

54: यूँ तो हर रसूल/नबी अपने वादे के पक्के होते हैं, मगर यहाँ इसमाईल (अलै.) का ख़ास करके ज़िक्र है, शायद इसलिए कि जब उनके बाप इबराहीम (अलै) को उन्हें क़ुर्बान [sacrifice] करने का हुक्म हुआ, तो इसमाईल ने वादा किया था कि ज़बह होते समय वह सब्र [धीरज] करेंगे। 

56: इदरीस (अलै.) के बारे में ज़्यादा जानकारी नहीं मिलती। कुछ लोग उन्हें बाइबल में आए Enoch से मिलाते हैं जो कि नूह (अलै) के परदादा थे, जिन्हें अल्लाह ने ज़िंदा आसमान पर उठा लिया था। हज़रत इदरीस के बारे में कहा जाता है कि वह पहले आदमी थे जिसने क़लम से लिखा था, उन्हें गणित और ग्रह-नक्षत्र की भी जानकारी थी, और पहली बार उन्होंने जानवरों की खाल की सिलाई करके कपड़ा पहना था। कुछ लोग इन्हें हज़रत इल्यास (अलै) से भी जोड़ते हैं जिनका ज़िक्र सूरह अनाम (6: 85) और सूरह साफ़्फ़ात (37: 123 ) में भी आया है।

64: कभी-कभी ऐसा होता था कि कुछ अवधि के लिए फ़रिश्ता जिबरईल अल्लाह की तरफ़ से आयतें लेकर आना बंद कर देते थे जिससे मुहम्मद (सल्ल) बेचैन हो जाते थे, क्योंकि मक्का के लोग आपका मज़ाक़ उड़ाया करते थे कि उनके अल्लाह ने उन्हें छोड़ दिया है, इसीलिए उन्होंने जिबरईल (अलै) से  अनुरोध किया था कि वह जल्दी जल्दी आया करें, मगर उन्होंने यहाँ बताया है कि बिना अल्लाह के हुक्म के वह ऐसा नहीं कर सकते। (सही बुख़ारी) 

71: "तुममें से हर एक को", इसका मतलब या तो वे विश्वास न करनेवाले हैं, या फिर सारे ही अच्छे-बुरे लोग हैं जिन्हें "पुल सिरात" से ग़ुज़रना ही होगा, यह पुल जहन्नम पर ही बना हुआ है। नेक और अच्छे लोग इस पर से आराम से गुज़र जाएंगे, और बुरे कर्म करने वाले और विश्वास न करने वाले लोग जहन्नम में गिरा दिए जाएंगे। जिनके दिलों में ईमान होगा, वे अपने बुरे कर्मों की सज़ा भुगतने के बाद वहाँ से निकाल लिए जाएंगे। 

77: मक्का के कुछ लोगों में ऐसी मान्यता थी कि इस दुनिया में अगर उसके पास धन-दौलत और औलाद हैं, तो इसका मतलब यह है कि अल्लाह उनसे ख़ूश है, और ये सब उसे परलोक में भी ज़रूर मिलेगा।

81: मक्का के कुछ विश्वास न करने वाले यह कहा करते थे कि हम "लात, उज़्ज़ा, मनात" आदि की पूजा इसलिए करते हैं कि वे अल्लाह के पास हमारी सिफ़ारिश करेंगे, देखें सूरह यूनुस (10: 18).



 

 



 





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