01-03: यह किताब अल्लाह की तरफ़ से है
04 : रसूलों ने हमेशा अपनी क़ौम के लोगों की ज़बान बोली है
05 : मूसा (अलै) का मिशन
06-08: मूसा (अलै) ने अपने लोगों से अपील की
09-17: पहले भेजे गए रसूल
18 : विश्वास न करने वालों की मिसाल
19-20: अल्लाह जो चाहता है, पैदा करता है
21-23: कर्मों के फ़ैसले का दृश्य
24-27: अच्छे और बुरे पेड़ की मिसाल
28-30: विश्वास करने से इंकार करने वालों का अंजाम
31 : ईमानवालों के लिए पाबंदी से नमाज़ और ज़कात देना ज़रूरी
32-34: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ
35-41: इबराहीम (अलै) की दुआ
42-51: विश्वास न करने वालों की सज़ा निश्चित है
52 : अल्लाह का संदेश नसीहत के लिए है
[ऐ रसूल!] यह [क़ुरआन] एक किताब है जिसे हमने आप पर उतारी है, ताकि आप अपने रब के हुक्म से लोगों को गहरे अँधेरों से निकालकर रौशनी की तरफ़ ला सकें, उस रास्ते की तरफ़ ला सकें जो सबसे ज़्यादा ताक़तवाला और तमाम तारीफ़ों के योग्य (रब का) का बताया हुआ रास्ता है, (1)
वह अल्लाह, कि जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में है, सबका मालिक है। और उन लोगों पर बहुत ही सख़्त यातना होगी जो उस (अल्लाह) को नहीं मानते, (2)
वह लोग जो आनेवाली दुनिया [आख़िरत] की ज़िंदगी के मुक़ाबले इस सांसारिक जीवन को ज़्यादा पसंद करते हैं, जो दूसरों को अल्लाह के रास्ते पर चलने से रोकते हैं, और उसे टेढ़ा बनाने की कोशिश में लगे रहते हैं: ऐसे ही लोग हैं जो गुमराही में बहुत दूर जा पड़े हैं। (3)
हमने कभी भी कोई रसूल ऐसा नहीं भेजा, जिसने लोगों के सामने (हमारे संदेशों को) स्पष्ट कर देने के लिए उन्हीं की भाषा का प्रयोग न किया हो, मगर इसके बावजूद (वे नहीं समझते), फिर अल्लाह जिसे चाहता है उसे भटकता छोड़ देता है, और जिसे चाहता है उसे सीधा मार्ग दिखा देता है: वह बड़ी ताक़तवाला, गहरी समझ-बूझवाला है। (4)
और (देखो!) हमने मूसा [Moses] को अपनी निशानियों के साथ भेजा था: "अपनी क़ौम के लोगों को गहरे अँधेरों से रौशनी की तरफ़ निकाल लाओ। और उन्हें अल्लाह के उन दिनों की याद दिलाओ (जब अल्लाह ने उन पर अपनी ख़ास कृपा की थी या जब उन्हें परेशानी में डालकर आज़माया था): सचमुच इन बातों में हर उस आदमी के लिए बड़ी निशानियाँ हैं जो (परेशानी में) धीरज से काम लेता है और (अच्छे समय में) शुक्र अदा करता है।” (5)
फिर जब मूसा ने अपनी क़ौम के लोगों से कहा था, "अल्लाह ने जो तुम पर मेहरबानियाँ की थी, उन्हें याद करो कि जब उसने तुम्हें फ़िरऔन [pharaoh] के लोगों (की ग़ुलामी) से बचाया था, जो तुम्हें कैसी भयानक यातनाएं दिया करते थे, तुम्हारे बेटों को मार डालते थे और केवल तुम्हारी औरतों को (दासियों के रूप में) ज़िंदा रहने देते थे--- वह तुम्हारे रब की ओर से अत्यंत कड़ी परीक्षा थी!" (6)
याद करो जब अल्लाह ने तुम से अपना नियम बताया था, “अगर तुम शुक्र अदा करते रहे तो मैं तुम्हें और अधिक नेमतें दूँगा, लेकिन अगर तुमने शुक्र अदा करना छोड़ दिया, तो (याद रखो) मेरी यातना बहुत कठोर होती है।” (7)
और मूसा ने कहा, "अगर तुम, और ज़मीन में रहने वाला हर एक आदमी एक साथ नाशुक्री करे, तब भी (अल्लाह को तो किसी की ज़रूरत नहीं) वह तो आत्म-निर्भर [self sufficient] है, सारी तारीफ़ों के लायक़ है।" (8)
क्या आपने उन लोगों के बारे में नहीं सुना जो आपसे पहले गुज़र चुके हैं, नूह [Noah] की क़ौम के लोग, आद, समूद और उनके बाद बसने वाले वे लोग जिनको अल्लाह के सिवा (अब) कोई नहीं जानता? उनके पास उनके रसूल साफ़-साफ़ प्रमाण लेकर आए थे, मगर उन लोगों ने उन (रसूलों) का मुँह बंद कराने की कोशिश की और कहने लगे, "तुम जिस संदेश के साथ भेजे गए हो, हम उसमें विश्वास नहीं करते। और तुम जो भी हमें करने के लिए कह रहे हो, उसके बारे में हम गहरे संदेह में हैं।" (9)
उनके रसूलों ने जवाब दिया, "क्या अल्लाह के बारे में कोई संदेह कर सकता है जिसने आसमानों और ज़मीन की रचना की है? वह तुम्हें अपनी तरफ़ बुलाता है, ताकि तुम्हारे गुनाहों को माफ़ कर दे और तुम्हें एक नियत घड़ी तक ज़िंदगी का मज़ा उठाने दे।" मगर उन लोगों ने कहा, "तुम तो बस हमारे ही जैसे एक (मामूली) इंसान हो। तुम चाहते हो कि हमारे बाप-दादा जिनकी पूजा करते आए हैं, उनसे हमें रोक दो। (अच्छा, अगर तुम ला सकते हो, तो) हमारे सामने कोई स्पष्ट प्रमाण लेकर आओ।" (10)
उनके रसूलों ने जवाब दिया, "हम तो वास्तव में बस तुम्हारे ही जैसे आदमी हैं, मगर अल्लाह अपने बन्दों में से जिसे चाहता है, उस पर अपना ख़ास एहसान [favour] करके चुन लेता है। हम अपनी तरफ़ से कोई प्रमाण नहीं ला सकते, जब तक कि अल्लाह इसकी इजाज़त न दे दे, इसलिए विश्वास [ईमान] रखनेवालों को अल्लाह ही पर पूरा भरोसा रखना चाहिए---- (11)
और हम अल्लाह पर भरोसा क्यों न करें, जबकि उसी ने हमें वह (सीधा) रास्ता दिखाया है जिन पर हम चलते हैं? तुम हमें चाहे जो भी तकलीफ़ पहुँचा लो, निश्चय ही हम इसे पूरे धैर्य के साथ सह लेंगे। और भरोसा करनेवालों को तो बस अल्लाह ही पर भरोसा करना चाहिए।"(12)
इंकार करनेवालों [काफ़िरों] ने अपने रसूलों से कहा, "अगर तुम हमारे धर्म में लौटकर नहीं आए, तो हम तुम्हें अपने देश से निकाल बाहर करेंगे।" मगर तब उनके रब ने उन रसूलों की तरफ़ संदेश भेजे: "अब हम शैतानियाँ करनेवालों [ज़ालिमों] को बर्बाद कर देंगे, (13)
और उनके बाद उस ज़मीन पर बसने के लिए तुम्हें छोड़ जाएंगे। यह उन लोगों के लिए इनाम होगा, जो मुझ से (हिसाब-किताब के दिन) मिलने से और मेरी चेतावनियों से डरे रहते हैं।" (14)
उन (रसूलों) ने अल्लाह से (ज़ालिमों के ख़िलाफ़) फ़ैसले की माँग की, और (नतीजा यह हुआ कि सच्चाई के मुक़ाबले में) हर ज़िद्दी-अड़ियल और ज़ालिम बुरी तरह असफल हुआ---- (15)
जहन्नम उनमें से हर एक के इंतज़ार में है; वहाँ उसे पीने के लिए गंदा, पीप-मिला पानी दिया जाएगा, (16)
जिसे वह घूँट-घूँट पीने की कोशिश करेगा, मगर उसे गले के नीचे उतार न पाएगा; मौत उसे हर तरफ़ से घेर लेगी, मगर वह मरेगा भी नहीं; उसके आगे और अधिक कठोर यातना मौजूद होगी। (17)
जिन लोगों ने अपने रब को मानने से इंकार [कुफ़्र] किया, उनके कर्मों का हाल उस राख के ढेर जैसा होगा, जिसे किसी तूफ़ानी दिन में हवा का तेज़ झोंका उड़ा ले जाता है: जो कुछ भी उन्होंने (अपने कर्मों से) हासिल किया होगा, उनमें से कुछ भी उनके हाथ न आएगा। यही है (असल में) गुमराही में बहुत दूर जा पड़ना! (18)
[ऐ रसूल!] क्या आपने देखा नहीं कि आसमानों और ज़मीन को अल्लाह ने एक ख़ास मक़सद के साथ पैदा किया है? अगर वह चाहे, तो तुम सबको सिरे से मिटा दे, और बदले में एक नई सृष्टि की रचना कर दे: (19)
जब सारे लोग (क़यामत के दिन) अल्लाह के सामने हाज़िर होंगे, तो (समाज में) अपनी ताक़त की धाक जमानेवालों से कमज़ोर लोग कहेंगे, "हम तो (दुनिया में) तुम्हारे पीछे चलते थे, तो क्या अब तुम अल्लाह की किसी भी यातना से हमें बचा सकते हो!?” वे जवाब में कहेंगे, "अगर अल्लाह ने हमें बच निकलने का कोई रास्ता दिखाया होता, तो हम भी तुम्हें वह रास्ता दिखा देते। अब चाहे हम चिल्ला-चिल्ली करें या धैर्य [सब्र] से बर्दाश्त कर लें, कोई फ़र्क़ नहीं पड़ने वाला: बच निकलने का अब कोई उपाय नहीं है।" (21)
(क़यामत के दिन) जब हर चीज़ का फ़ैसला हो चुका होगा, तब शैतान (लोगों से) कहेगा, "अल्लाह ने जो तुमसे वादा किया था वह सच्चा था, और मैंने भी तुमसे वादा किया था, मगर वह सब झूठा था: मेरे पास तो तुम्हें क़ाबू में रखने की कोई ताक़त न थी, सिवाए इसके कि मैं तुम्हें (ग़लत काम की तरफ़) बुलाता था, और तुम मेरा कहा मान लेते थे, अत: मुझ पर इल्ज़ाम न धरो; बल्कि (अपनी हालत के लिए) अपने आपको ही मलामत करो। (आज के दिन) मैं तुम्हारी कोई मदद नहीं कर सकता हूँ और न ही तुम मेरी मदद कर सकते हो। पहले जिस तरह तुमने मुझे अल्लाह के साथ (उसकी ख़ुदायी) में साझेदार [Partner] बना रखा था, (आज) मैं उसे मानने से इंकार करता हूँ।" सचमुच ऐसे ज़ालिमों को बड़ी दर्दनाक यातना होगी, (22)
मगर जो लोग ईमान रखते थे और उन्होंने अच्छे कर्म किए थे, उन्हें ऐसे बाग़ों में लाया जाएगा जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी, अपने रब के हुक्म से वे उनमें हमेशा के लिए रहेंगे: वहाँ (हर तरफ़ से) उनका अभिवादन 'तुम पर सलामती हो' की दुआ से होगा। (23)
[ऐ रसूल!] क्या आपने देखा नहीं कि अल्लाह कैसी मिसालें पेश करता है? एक अच्छी बात उस पाकीज़ा पेड़ की तरह है जिसकी जड़ गहरी जमी हुई हो और उसकी टहनियाँ आसमान में फैली हुई हों, (24)
और वह (पेड़) अपने रब के हुक्म से हर मौसम में फल दे रहा हो---- अल्लाह लोगों के लिए ऐसी मिसालें इसलिए पेश करता है, ताकि वे इस पर सोच-विचार कर सकें--- (25)
मगर एक बुरी (व गंदी) बात की मिसाल एक सड़े हुए पेड़ की तरह है (कि जड़ें खोखली हों और) जिसे ज़मीन की सतह से ही उखाड़ लिया जाए, जिसे स्थिरता व जमाव न मिला हो। (26)
जो लोग मज़बूत जमी हुई बात [क़ुरआन] पर विश्वास रखते हैं, अल्लाह उन्हें मज़बूती से जमा देता है, इस दुनिया में भी और आनेवाली [आख़िरत/परलोक] दुनिया में भी, मगर शैतानियाँ करने वालों को अल्लाह भटकता छोड़ देता है: अल्लाह (अपनी समझ से) जो चाहता है, करता है। (27)
[ऐ रसूल!] क्या आपने उन लोगों को नहीं देखा जो, अल्लाह की मेहरबानियों (पर शुक्र करने के बजाए) उल्टा उसकी केवल नाशुक्री करते हैं और अपनी क़ौम के लोगों को बर्बादी के घर में ला उतारते हैं, (28)
यानी जहन्नम में, जिसमें वे जलाए जाएँगे? और रहने के लिए (जहन्नम) क्या ही बुरा ठिकाना है! (29)
वे (झूठे ख़ुदाओं को) अल्लाह के बराबर ठहराते हैं ताकि लोगों को उसके सही मार्ग से भटका सकें। कह दें, "अभी थोड़े दिन मज़े कर लो, मगर तुम्हारा अंतिम पड़ाव तो (जहन्नम की) आग है।" (30)
मेरे वह बन्दे जो ईमान लाए हैं उनसे कह दें कि इससे पहले कि वह [क़यामत का] दिन आ जाए जिस दिन न तो किसी सामान का लेन-देन हो सकेगा, न किसी से दोस्ती काम आएगी, (अत: इसके लिए तैयारी कर लें) वे नमाज़ को पाबन्दी से पढ़ा करें, और हमने जो कुछ उन्हें दे रखा है उसमें से (अच्छे कामों पर) छिपकर और सबके सामने भी ख़र्च किया करें। (31)
यह अल्लाह है जिसने आसमानों और ज़मीन को पैदा किया, आसमान से (ज़मीन पर) पानी बरसाया और फिर उसके द्वारा तुम्हारे खाने-पीने के लिए तरह-तरह के फल (व फ़सलें) उगा दीं; उसने जहाज़ को तुम्हारे लिए उपयोगी बनाया, जो उसके हुक्म से समंदर में तैरती चलती है, और नदियों को भी (तुम्हारे फ़ायदे की चीज़ बनाया); (32)
उसने सूरज और चाँद को भी तुम्हारे लिए बहुत उपयोगी बनाया, वे अपने रास्ते पर (नियत चाल से) चलते रहते हैं; उसने रात औऱ दिन को भी तुम्हारे लिए बड़े काम का बनाया है (33)
और (अपनी ज़रूरत के लिए) जो भी तुमने उससे माँगा है, हर चीज़ में से कुछ हिस्सा तुम्हें ज़रूर दिया गया है। अगर तुम अल्लाह की नेमतों [favours] को गिनना चाहो तो कभी भी उन्हें गिन नहीं सकोगे: इंसान सचमुच बड़ा ही ना-इंसाफ़ी करनेवाला [unjust] और ना-शुक्रा [ungrateful] है। (34)
याद करो जब इबराहीम ने (दुआ में) कहा था, "मेरे रब! इस शहर [मक्का] को अमन की जगह [safe] बना दे! और मुझे और मेरी सन्तान को इस बात से बचाते रहना कि मूर्तियों की पूजा करने लग जाएं, (35)
मेरे रब! इन (मूर्तियों) नॆ बहुत से लोगों को (सच्चाई के) रास्ते से भटका दिया है! तो जो कोई मेरे पीछे चला तो वह मेरे साथ है, मगर जिस किसी ने मेरे तरीक़े को मानने से इंकार किया---तो (उसका फ़ैसला तेरे हाथ है) बेशक तू बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद रहम करनेवाला है। (36)
हमारे रब! (तू देख रहा है कि) मैंने अपनी कुछ संतानों को एक ऐसी घाटी में लाकर बसाया है जहाँ खेती-बाड़ी नहीं होती, वह जगह तेरे पवित्र घर [काबा] से नज़दीक है, हमारे रब! (यह इसलिए किया) ताकि वे वहाँ नमाज़ क़ायम करें। अत: लोगों के दिलों को तू उनकी ओर झुका दे, और उनके लिए फलों की पैदावार से रोज़ी प्रदान कर, ताकि वे तेरा शुक्र अदा करने वाले बन सकें। (37)
हमारे रब! जो कुछ हम छिपाते हैं और जो कुछ हम ज़ाहिर करते हैं, उसे तू अच्छी तरह जानता है: कोई भी चीज़ ऐसी नहीं है जो अल्लाह से छिपी हो, न ज़मीन में और न आसमान में। (38)
(इबराहीम ने कहा:) प्रशंसा है उस अल्लाह की, जिसने बुढ़ापे की अवस्था में भी मुझे इसमाईल [Ishmael] और इसहाक़ [Isaac] (जैसे बेटे) प्रदान किए: मेरा रब सारी दुआएं सुनता है! (39)
मेरे रब! मुझे और मेरी सन्तानों को पाबंदी से नमाज़ पढ़नेवाला बना दे। ऐ हमारे रब! मेरी दुआओं को क़बूल कर ले। (40)
ऐ हमारे रब! जिस दिन (कर्मों का) हिसाब लिया जाएगा, उस दिन मुझे, मेरे माँ-बाप को और सब ईमान रखनेवालों को माफ़ कर देना।" (41)
[ऐ रसूल!] आप यह न समझें कि जो कुछ (मक्का के) ये इंकार करनेवाले [काफ़िर] कर रहे हैं, उसकी ख़बर अल्लाह को नहीं है: वह तो इन्हें बस उस दिन तक की मुहलत दे रहा है जिस दिन मारे डर के उनकी आँखे फटी-की-फटी रह जाएँगी, (42)
हैरान, घबराए हुए, अपनी गर्दनें उठाए हुए वे भागे चले जा रहे होंगे, नज़रें एक जगह से हटा भी न पाएंगे, और उनके दिल (डर के चलते विचारों से) ख़ाली हो रहे होंगे। (43)
[ऐ रसूल! आप] लोगों को उस दिन से डराएं, जब यातना उनके पास आ पहुंचेगी, उस समय इंकार करनेवाले कहेंगे, "हमारे रब! हमें थोड़ा-सा समय और दे दे: हम तेरे संदेश की पुकार को ज़रुर मान लेंगे, और रसूलों का अनुसरण करेंगे।" (उनसे कहा जाएगा), "क्या तुम वही नहीं हो जो अब से पहले क़समें खा-खाकर कहा करते थे कि ‘हमारी ताक़त तो कभी ख़त्म होनेवाली नहीं है?" (44)
तुम भी दूसरों की तरह उन्हीं बस्तियों में रह-बस चुके थे, जिन्होंने ख़ुद अपने ऊपर अत्याचार किया था, और तुम्हें साफ़ तौर से दिखाया गया था कि उनके साथ हमने कैसा सलूक किया----फिर हमने तुम्हें समझाने के लिए तरह-तरह की मिसालें बयान कर दीं (फिर भी तुमने शैतानी नहीं छोड़ी!)।" (45)
उन लोगों ने (अपनी शैतानी चालों से हर तरह का) जाल बिछाया था, मगर उनका जाल चाहे पहाड़ को भी अपनी जगह से क्यों न हटा देता, तब भी अल्लाह के पास तो उनकी हर चाल का जवाब था। (46)
अतः (ऐ रसूल) आप यह न सोचें कि अल्लाह अपने रसूलों से किए हुए वादे को तोड़ देगा: अल्लाह बेहद ताक़तवाला और सख़्त सज़ा देने की पूरी सलाहियत रखता है। (47)
एक दिन आएगा-- जब यह ज़मीन एक दूसरी ही ज़मीन में बदल जाएगी और आसमानों को भी दूसरे आसमान में बदल दिया जाएगा, और सब के सब लोग हाज़िर हो जाएँगे उस अल्लाह के सामने--- जो अकेला है, (ताक़त में) सब पर भारी है---- (48)
उस दिन आप अपराधियों को देखेंगे कि ज़ंजीरों में जकड़े हुए होंगे, (49)
उनके कपड़े तारकोल के होंगे और आग उनके चहरों को घेरे हुए होगी, (50)
(सबका फ़ैसला कर दिया जाएगा) ताकि अल्लाह हर एक जान को (उसके कर्मों का) बदला दे सके जिसका वह हक़दार है: अल्लाह हिसाब लेने में बहुत तेज़ है। (51)
यह सभी इंसानों के लिए एक सन्देश है, और इसलिए भेजा गया है कि लोगों को इसके द्वारा सावधान कर दिया जाए, और वे जान लें कि वही अकेला अल्लाह है, और इसलिए भी कि जो समझ-बूझ रखते हैं, वे इससे नसीहत ले सकें। (52)
3: रास्ते को टेढ़ा
बनाने का मतलब यह है कि दीन के तरीक़े में कोई न कोई कमी तलाश करना ताकि उस पर
आपत्ति की जा सके, या क़ुरआन में कोई
ऐसी बात खोजना जिससे उनकी झूठी धारणाओं को बल मिल जाए।
4: अरब के कुछ लोगों का कहना था कि क़ुरआन अरबी ज़बान के बदले किसी और ज़बान में उतरी होती, तब हम उसे चमत्कार मानते। ....... जो कोई सच्चाई की खोज के लिए इस किताब को पढ़ता है, उसे अल्लाह सीधा रास्ता दिखा देता है, मगर जो कोई इसे अपनी ज़िद्द और दुर्भावना के इरादे से पढ़ता है, उसे अल्लाह भटकता हुआ छोड़ देता है।
10/11: स्पष्ट प्रमाण से मतलब लोगों की माँग पर कोई "मोजज़ा" [चमत्कार] दिखाना जिससे लोग हैरान रह जाएं।
18: जो लोग अपने रब को नहीं पहचानते और सच्चाई को मानने से इंकार कर देते हैं [काफ़िर], वे भी दुनिया में कुछ अच्छे और भलाई के कर्म करते हैं, उनके अच्छे कर्मों का बदला उन्हें इस दुनिया में तो दे दिया जाता है, मगर परलोक में उन्हें कर्मों का कुछ भी बदला नहीं मिलेगा क्योंकि उन लोगों ने रब को मानने से ही इंकार कर दिया।
19: अल्लाह द्वारा इस कायनात को बनाने का ख़ास मक़सद यही है कि जो उसके हुक्म को मानते हुए इस दुनिया में ज़िंदगी गुज़ारे, उसे बदले में इनाम मिले, और जो उसके आदेशों को मानने से इंकार करता है और बुरे कामों में लगा रहता है, उसे बदले में दंड मिलना चाहिए। ...... अरब के लोग मरने के बाद दोबारा ज़िंदा किए जाने को भी नहीं मानते थे, हालाँकि जिस तरह अल्लाह ने सबको पहली बार बिना किसी चीज़ के पैदा कर दिया, तो दोबारा पैदा करना उसके लिए तो बहुत आसान है।
24: "अच्छी बात" [कल्मा तैय्यबा] यानी एक अल्लाह के सिवा कोई ख़ुदा नहीं, की सही समझ जब इंसान में पैदा हो जाती है, तो चाहे उसे जिस तरह से भी बहकाया जाए या तकलीफ़ें दी जाएं, वह अपनी सोच पर एक मज़बूत पेड़ की तरह क़ायम रहता है, और उसकी नेकियाँ ऊपर अल्लाह तक पहुँचती हैं और क़बूल की जाती हैं।
29: यहाँ मक्का के बड़े-बड़े सरदारों की तरफ़ इशारा है जिन्हें अल्लाह ने हर तरह की नेमतें दे रखी थीं, मगर वे लोग उसका शुक्र अदा करने बजाए हमेशा नाशुक्री करते रहे, और इसके नतीजे में ख़ुद भी तबाही मोल ली और अपनी क़ौम को भी तबाही के रास्ते पर ले गए।
35: इबराहीम (अलै.) ने जिस जगह अपनी बीवी हाजरा और बेटे इस्माईल को अल्लाह के हुक्म से छोड़ा था, वह तब रहने लायक़ नहीं थी, फिर वहाँ ज़मज़म का कुंआँ बन गया, उसके कुछ समय बाद पानी के चलते जुरहम नाम का क़बीला वहाँ आबाद हुआ, फिर धीरे-धीरे वहाँ मक्का शहर बस गया। ............... मक्का के विश्वास न करने वाले भी इबराहीम (अलै.) को अपना बड़ा मानते थे, इसीलिए यहाँ उनकी दुआ नक़ल की गई है जिसमें उन्होंने मूर्तिपूजा से अपनी संतानों को बचाए रखने की दुआ की थी, मगर उनकी संतानें उलटा उसी में लगी हुई थीं।
37: मक्का में हज के दिनों के अलावा भी सालों भर लोग बड़े शौक़ से जाते रहते हैं, और फलों की पैदावार की दुआ भी शायद इस तरह पूरी हुई कि मक्का के नज़दीक तायफ़ में खजूर काफ़ी मात्रा में पैदा होती है, इसके अलावा दुनिया भर से वहाँ हर तरह के फल आते रहते हैं।
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