06-11: पिछली पीढ़ियों को सज़ा: एक चेतावनी
12-18: अल्लाह की क़ुदरत
19-24: अल्लाह गवाह है
25-32: विश्वास न करने वालों की कड़ी निंदा
33-36: रसूल का उत्साह बढ़ाना
37-41: कोई निशानी [चमत्कार] दिखाने की माँग
42-45: पिछली पीढ़ियों को सज़ा: एक चेतावनी
46-55: विश्वास न करने वालों को चेतावनी
56-58: रसूल केवल अल्लाह की ही बंदगी करता है
59-67: अल्लाह सबसे ताक़तवर है
68-70: मूर्खता की बातों पर चर्चा करने से बचें
71-73: अल्लाह ही सही रास्ता दिखानेवाला है
74-90: इबराहीम (अलै) और उनके उत्तराधिकारियों की कहानी
91 : किसी आम आदमी पर अल्लाह का संदेश [वही] आना?
92-93: किताब [क़ुरआन] रसूल पर उतारी जा रही है?
93-94: अंतिम फ़ैसले का दृश्य
95-99: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ
100-108: मूर्तिपूजा करना मूर्खता है
109-111: कोई निशानी (चमत्कार) दिखाने की माँग
112-117: रसूल का विरोध
118-122: खाने से जुड़े हुए नियम-क़ायदे
123-127: अपराधियों के सरदार
128-135: हिसाब-किताब का दृश्य : जिन्न और इंसान
136-140: मूर्तिपूजा और बच्चियों को मार डालने की कड़ी निंदा
141-150: खाने-पीने से जुड़े नियम-क़ायदे
151-153: धार्मिक ज़िम्मेदारियों का निष्कर्ष
154-158: जो किताबें मूसा(अलै) और रसूलों को दी गईं
159-161: इबराहीम का दीन ही रसूल (सल्ल) का दीन है
162-165: अल्लाह के सामने पूरी भक्ति से झुकना
8: इस दुनिया में सच्चाई पर विश्वास करने की शर्त यही है कि बिना अल्लाह या उसके फ़रिश्ते को देखे हुए रसूल की बातों पर विश्वास करना है। अगर आदमी मौत के फ़रिश्ते को देखकर विश्वास कर भी ले, तो उसका कोई फ़ायदा नहीं। फ़रिश्ते अगर सचमुच आ गए, तो वे बिना मुहलत दिए हुए विश्वास न करने वालों को हलाक कर देंगे।
11: अरब के लोग अपने व्यापारिक कारवाँ के साथ जब सीरिया का सफ़र करते थे तो रास्ते में समूद की क़ौम और लूत (अलै) की क़ौम के खंडहरों के पास से गुज़रते थे, उन्हें उनकी तबाही से सबक़ सीखने के लिए कहा गया है।
23: शुरू में तो वे साफ़ झूठ बोल देंगे, लेकिन फिर ख़ुद उनके हाथ-पाँव उनके ही ख़िलाफ़ गवाही देंगे और उनका सारा झूठ खुल जाएगा, देखें 36: 65; और 41: 21.
35: मक्का के विश्वास न करने वाले लोग अक्सर मुहम्मद साहब से नित नए चमत्कार या निशानियाँ दिखाने की माँग करते रहते थे, कभी कभी मुहम्मद (सल्ल) को भी लगता कि अगर कोई निशानी दिखा दी जाए, तो शायद यह लोग सच्चाई पर विश्वास कर लें और गुनाहों से बच जाएं। मगर जैसा कि अल्लाह ने बताया है कि ये लोग अपनी ज़िद्द और हठधर्मी के चलते विश्वास नहीं करते और चाहे आप कोई भी निशानी ले आएं, तब भी ये लोग विश्वास नहीं करेंगे। अल्लाह ने फिर से मुहम्मद (सल्ल) को समझाया है कि अगर अल्लाह चाहता तो सब लोग एक ही दीन को अपना लेते, लेकिन असल मक़सद दुनिया में लोगों की परीक्षा है कि वह ख़ुद अपनी मर्ज़ी से सोच-समझकर सही रास्ता चुनें, सच्चाई की निशानियाँ चारों तरफ़ बिखरी पड़ी हैं, इसके साथ पैग़म्बरों और आसमानी किताबों का मार्गदर्शन भी है, मगर सही रास्ता चुनना आदमी का काम है। इसके लिए उसे बताया जा सकता है, मगर उसे मान लेने पर मजबूर नहीं किया जा सकता।
37: अल्लाह तो कभी भी कोई ऐसी निशानी उतार सकता है जिसकी मांग मक्का के लोग करते रहते हैं, मगर उस निशानी को दिखा देने के बाद भी अगर लोगों ने विश्वास नहीं किया तो इसके नतीजे में हमेशा यही हुआ है कि सच्चाई न मानने वाले लोगों को हलाक कर दिया गया है।
39: यानी ग़लत रास्ते को चुनने के कारण भटकते-भटकते सच्चाई को सुनने और कहने की सलाहियत खो बैठे हैं।
41: अरब के बहुदेववादी भी यह मानते थे कि इस कायनात की रचना अल्लाह ने ही की है, मगर साथ में वे यह भी मानते थे कि उसकी ख़ुदायी में बहुत से दूसरे देवता भी इस तरह शामिल हैं कि ख़ुदा की बहुत सी शक्तियाँ उनको मिली हुई हैं। इसीलिए वे उन देवताओं को ख़ुश करने के लिए उनकी पूजा करते थे, मगर जब कोई बहुत बड़ी मुसीबत पड़ जाती तो अल्लाह को ही मदद के लिए पुकारते थे।
51: अल्लाह के सामने कोई किसी के लिए सिफ़ारिश नहीं कर पाएगा, अलबत्ता अगर अल्लाह ही इसकी इजाज़त दे तो सिफ़ारिश हो सकती है, देखें सूरह बक़रा (2: 255)
52: मक्का में क़ुरैश के कुछ सरदारों ने कहा था कि मुहम्मद साहब के आसपास ग़रीब और निचले दर्जे के लोगों की भीड़ होती है जो अपनी इज़्ज़त बढाने या धन की लालच में आते हैं, और वे सरदार उन लोगों के साथ उनकी मजलिस में बैठने को अपनी तौहीन समझते थे।
61: निगरानी रखने वाले फ़रिश्ते वह भी हो सकते हैं जो इंसान के कर्मों को लिखने वाले होते हैं, और वह भी जो हर इंसान की शारीरिक हिफ़ाज़त के काम में लगे रहते हैं, देखें सूरह रा'द (11: 13)
73: आसमान और ज़मीन को बनाने का असल मक़सद क्या है? यही कि जो लोग यहाँ अच्छा काम करें उन्हें इनाम दिया जाए, और जो लोग बुरे काम और अत्याचार करें, उन्हें सज़ा दी जाए, मगर यह इनाम और सज़ा देने के लिए एक अलग ही दुनिया होगी [आख़िरत/परलोक], जहाँ लोगों को अपने कर्मों का हिसाब देने के लिए दोबारा ज़िंदा किया जाएगा, और यह करना अल्लाह के लिए बहुत आसान है।..... यूँ तो दुनिया में भी असली बादशाही व नियंत्रण तो अल्लाह का ही है, मगर ऊपर से हम देखते हैं कि हर देश का अलग-अलग राजा या राष्ट्र अध्यक्ष है, लेकिन क़यामत आते ही ऐसे सारे नियंत्रण ख़त्म हो जाएंगे, और तब पूरा नियंत्रण अल्लाह का ही होगा।
76: हज़रत इबराहीम (अलै) इराक़ के जिस इलाक़े नैनवा के रहनेवाले थे, वहाँ के लोग बुतों के साथ सूरज, चाँद, तारे आदि की पूजा करते थे। इबराहीम (अलै) की ज़बानी इनकी मान्यताओं को रद्द किया गया है।
80: ऐसा लगता है कि लोगों ने इबराहीम (अलै) को इस बात से डराया था कि वह उनके देवताओं और चाँद, तारों आदि के बारे में अगर बुरा-भला कहेंगे तो वे उन्हें सज़ा देंगे।
82: दूसरी हस्तियों के साथ मिलावट यानी शिर्क [Idolatory] नहीं करते जो कि ज़ुल्म या शैतानी करना है।
91: यहूदियों के एक सरदार ने एक बार मुहम्मद (सल्ल) से बहस करते हुए कहा था कि अल्लाह ने इंसानों पर कोई किताब नहीं उतारी।
95: जानदार चीज़ से बेजान चीज़ निकालना, जैसे मुर्ग़ी से अंडा निकालना, और बेजान चीज़ से जानदार निकालना, जैसे अंडे से मुर्ग़ी का निकालना।
100: यहाँ जिन्नों से मतलब शैतानों से है, जो कि बिना धुएं की आग से पैदा किए गए हैं। देखें 38: 76; 55: 15. ........... ईसाइयों ने हज़रत ईसा (अलै) को अल्लाह का बेटा कहना शुरू किया, कुछ यहूदी उज़ैर [Ezra] (अलै) को अल्लाह का बेटा मानते थे, और अरब के बहुदेववादी फ़रिश्तों को अल्लाह की बेटियाँ मानते थे।
104: यानी रसूल पर यह ज़िम्मेदारी नहीं सौंपी गई है कि सच्चाई पर विश्वास नहीं करने वालों को ज़बरदस्ती विश्वास कर लेने पर मजबूर किया जाए और उनको इंकार करने के नुक़सान से बचा लिया जाए। रसूल का काम केवल समझा देना है, मानना न मानना तो उन लोगों का काम है।
105: मक्का के लोग अच्छी तरह से जानते थे कि मुहम्मद (सल्ल) पढ़े-लिखे आदमी नहीं, सो ऐसा कलाम वह लिख नहीं सकते, इसलिए कहते थे कि कोई उन्हें सिखा-पढ़ा देता है, कभी-कभी वे एक लोहार का नाम भी लेते थे कि वह उन्हें सिखा देता है, देखें 16: 103.
107: अगर अल्लाह चाहता तो सारे लोगों को एक ही धर्म [दीन] का मानने वाला बना देता, मगर यह बात बार-बार स्पष्ट की गयी है कि यह दुनिया परीक्षा देने की जगह है, चारों तरफ़ अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ मौजूद हैं, पैग़म्बरों को भेजा गया कि वे उन निशानियों की तरफ़ लोगों का ध्यान खींच सकें, आसमानी किताबें भेजी गयीं जिससे उनका सही मार्गदर्शन हो सके और परीक्षा देना आसान हो सके। यहाँ आदमी को अपने मन से रास्ता चुनने का अधिकार है, और वह ख़ुद ही अपने कर्मों के लिए ज़िम्मेदार होगा।
108: यहाँ साफ़ तौर से मुसलमानों को इस बात से मना किया गया है कि वे उन लोगों के देवी-देवताओं को बुरा-भला न कहें, भले ही वे अल्लाह के बारे में बुरी बातें कह दें।
111: ये वही चमत्कार दिखाने की बातें थीं जिनकी माँग मक्का के लोग करते रहते थे, देखें 25: 21.
113: शैतान और उसकी चिकनी-चुपड़ी बातें सब लोगों की आज़माइश और परीक्षा के लिए हैं, जिसके अंदर सच्चाई को पाने की चाह होगी, वह इसमें से अपने लिए सही राह निकाल लेगा।
119: जो जानवर अपनी मौत मर जाता है, तो उसके (सड़े-गले) गोश्त को खाना हराम है, क्योंकि उसके मरने के समय उस पर अल्लाह का नाम नहीं लिया गया और दूसरा कि पता नहीं वह कब से मरा हुआ था। जिन जानवरों को खाने से मना किया गया है, उनका वर्णन सूरह नहल (16: 115) में आ चुका है।
120: छिपे हुए गुनाह में ईर्ष्या, जलन, पीठ पीछे बुराई, झूठ, दिखावा करना, घमंड आदि भी शामिल हैं।
121: वे इस बात के लिए अपने मानने वालों को भड़काते रहते थे कि वे मुसलमानों से बहस करें कि उनके देवताओं के नाम से काटकर बलि चढ़ाए हुए मांस में कोई ख़राबी नहीं है।
122: जब तक आदमी को सही मार्गदर्शन नहीं मिलता, वह मरे हुए आदमी जैसा है। फिर उसे ज़िंदा कर देना और उसे रौशनी देने का मतलब है, उसे क़ुरआन द्वारा सही मार्गदर्शन मिल जाना जिससे वह लोगों के बीच भलाई के काम करता हो, उसके विपरीत जिन लोगों ने सच्चाई पर विश्वास नहीं किया, वे अँधेरों में भटकते फिरते हैं, और सारे बुरे कर्म उन्हें बहुत लुभावने लगते हैं।
128: जिन्नों के पीछे चलने वाले इंसानों ने उनके बहकावे में आकर अपने मन की इच्छाओं के पीछे चलते हुए गुनाह किए और उनसे मज़ा उठाया और इस झूठी उम्मीद में रहे कि ये जिन्न उन्हें हर तरह के नुक़सान से बचा लेंगे। दूसरी तरफ़ जिन्नों ने भी अपने मानने वालों की बड़ी संख्या को देखते हुए अपने आपको बहुत ताक़तवर महसूस किया।
136: अरब के बहुदेववादियों में अजीब-अजीब सी रस्में थीं। वे अपनी पैदावार और जानवरों के गोश्त या दूध का एक हिस्सा "अल्लाह के लिए" निकालते थे (जो दोस्तों और मेहमानों के लिए था), और एक हिस्सा अपने देवताओं के लिए था जो मंदिरों पर चढ़ाते थे (जो मंदिर की देखरेख करने वालों के लिए था)। अगर देवताओं का हिस्सा कम पड़ जाता, तो वे अल्लाह के हिस्से में से ले लेते थे, मगर अल्लाह के हिस्से की भरपाई नहीं करते थे।
137: देवताओं के सेवकों ने या जिन्नों ने उन्हें बच्चों को मार देने की बात सुझाई थी।
138: यहाँ अरब में प्रचलित कुछ और रस्मों के बारे में बताया गया है। अपने देवी-देवताओं को ख़ुश करने के लिए कुछ मनगढ़ंत मान्यताएं बना ली गयी थीं और उसे अल्लाह के नाम से जोड़ दिया गया था।
140: "बिना किसी जानकारी के", यानी बिना किसी आसमानी किताब के प्रमाण के।
141: मक्का की ज़िंदगी में आम नियम यह था कि फ़सल की कटाई के समय जो भी ग़रीब आ जाए, उसे कुछ दे दिया जाए। बाद में मदीना में जाकर यह पक्का नियम बना कि फ़सल में से पैदावार का 10% गरीबों का हिस्सा होगा जहाँ dry farming होती हो, और अगर सिंचाई वाली ज़मीन हो, तो पैदावार का 5% ग़रीबों का हिस्सा होगा।
145: इन जानवरों के अलावा मुहम्मद (सल्ल) ने हर तरह के दरिंदे जानवरों का माँस [Carnivorous beasts & birds] खाना भी हराम [अवैध] बताया है।
148: अल्लाह किसी को ज़बरद्स्ती सच्चाई पर विश्वास कर लेने पर मजबूर नहीं करता, क्योंकि दुनिया लोगों की परीक्षा लेने के लिए बनाई गई है कि कौन अपनी समझ और अपनी मर्ज़ी से सही रास्ता चुनता है, जिसके मार्गदर्शन के लिए इतने सारे पैग़म्बर समय-समय पर भेजे गए।
149: दुनिया में आए पैग़म्बरों ने हर तरह से लोगों को सच्चाई पर विश्वास कर लेने की शिक्षा दी, अब यह आदमी की मर्ज़ी है कि वह उनकी बात मानते हुए उसे क़बूल कर ले या उसे मानने से इंकार कर दे। अल्लाह नहीं चाहता कि हर किसी को ज़बरदस्ती सही रास्ता दिखा दे।
151: किसी भी चीज़ को यानी चाहे मूर्तियों को, न सूरज-चाँद-सितारों को, और न ही जिन्नों को अल्लाह का साझेदार ठहराना।
154: एक बार फिर.. आयत 91-93 में कही गई बात को दोबारा ज़ोर देकर कहा गया है जो कि इस ग़लत बात के जवाब में है कि अल्लाह ने कोई "वही" [आसमाने किताब] कभी उतारी ही नहीं है।
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