सूरह 61: अस-सफ़
[मज़बूत क़तारें, Solid Lines]
1: अल्लाह की महानता
2- 4: जो कहो, वह करो
05-09: इसराईल की संतानों की तरफ़ से विरोध
10-13: ईमानवालों का अल्लाह के रास्ते में संघर्ष [जिहाद] करना
14: ईमान रखने वालों को अल्लाह (के दीन) का मददगार होना
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
आसमानों और ज़मीन की हर एक चीज़ अल्लाह की बड़ाई बयान करती रहती है--- वह बेहद ताक़तवाला, बहुत समझ-बूझ रखनेवाला है। (1)
ऐ ईमानवालो! तुम ऐसी बातें क्यों कहते हो, जिन्हें बाद में करते नहीं हो? (2)
यह बात अल्लाह को सख़्त नापसंद है कि तुम जो बात कहते हो, उन्हें करते नहीं हो; (3)
अल्लाह उन लोगों को सचमुच बहुत पसंद करता है जो उसकी राह में मज़बूत क़तारों में खड़े होकर लड़ते हैं, मानो वे सीसा पिलाई हुए (ठोस) दीवार हों। (4)
और (देखो) जब मूसा [Moses] ने अपनी क़ौम के लोगों से कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! तुम मुझे क्यों दुख देते हो, हालांकि तुम जानते हो कि मैं तुम्हारे पास अल्लाह की तरफ़ से (रसूल बनाकर) भेजा गया हूँ?" फिर जब वे सच्चाई के रास्ते से भटक गए, तो अल्लाह ने भी उनके दिलों को भटकता छोड़ दिया: अल्लाह बग़ावत करनेवालों को सीधा मार्ग नहीं दिखाता। (5)
और (देखो) जब मरयम [Mary] के बेटे ईसा [Jesus] ने कहा, "ऐ इसराईल की संतानों! मैं अल्लाह की तरफ़ से तुम्हारे पास (रसूल बनाकर) भेजा गया हूँ, ताकि मैं तौरात [Torah] की (सच्चाई की) पुष्टि कर दूं, जो मुझसे पहले आयी थी, और मेरे बाद एक रसूल के आने की ख़ुशख़बरी भी दे दूं, जिसका नाम 'अहमद' होगा।" इसके बावजूद, जब वह [ईसा] उनके पास स्पष्ट निशानियों के साथ आए, तो वे लोग कहने लगे, "यह तो साफ़ तौर से जादूगरी है।" (6)
उस आदमी से ज़्यादा ग़लती पर कौन होगा, जो (लोगों को बहकाने के लिए) अल्लाह के ख़िलाफ़ झूठी बातें गढ़ता हो, जबकि उसे अल्लाह के आगे झुक जाने के लिए बुलाया जाए? ग़लत काम करने वालों को अल्लाह सीधा रास्ता नहीं दिखाता है: (7)
वे चाहते हैं कि अल्लाह की रौशनी [मार्गदर्शन/क़ुरआन] को अपने मुँह से फूँक मारकर बुझा दें। लेकिन अल्लाह अपनी रौशनी को पूरी (तरह फैला) कर रहेगा, भले ही (सच्चाई में) विश्वास न करनेवाले इससे कितनी ही नफ़रत करते हों; (8)
वही है जिसने अपने रसूल को सही मार्गदर्शन [क़ुरआन] और सच्चाई के दीन [धर्म] के साथ भेजा, ताकि यह दिखाया जा सके कि यह दूसरे सभी (झूठे) धर्मों से बढ़कर है, चाहे बहुदेववादियों को ये बात कितनी ही बुरी लगे। (9)
ऐ ईमानवालो! क्या मैं तुम्हें (एक चीज़ के बदले में) एक ऐसे फ़ायदे का काम [व्यापार] बताऊँ, जो तुम्हें दर्दनाक यातना से बचा ले? (10)
(वह यह है कि) अल्लाह और उसके रसूल पर विश्वास [ईमान] रखो, और अपनी जान व माल से अल्लाह के रास्ते में संघर्ष [जिहाद] करो----ये (ईमान व जिहाद) तुम्हारे लिए (जान व माल से) बेहतर है, अगर तुम समझ पाओ----- (11)
और वह तुम्हारे गुनाहों को माफ़ कर देगा, तुम्हें [जन्नत के] ऐसे बाग़ों में ले जाएगा जहाँ नहरें बह रही होंगी, और उन ख़ुशनुमा घरों में बसा देगा जो सदाबहार बाग़ों [Garden of Eternity] में होंगे। यही सबसे बड़ी कामयाबी है। (12)
और (इसके अलावा इस दुनिया में) वह तुम्हें कुछ और भी देगा जिससे तुम सचमुच ख़ुश हो जाओगे: अल्लाह की ओर से मदद और जल्द ही मिलने वाली जीत! [ऐ रसूल] ईमानवालों को (इस बात की) ख़ुशख़बरी सुना दें! (13)
ऐ ईमानवालो! तुम अल्लाह के (दीन के) मददगार बन जाओ। जैसा कि मरयम के बेटे ईसा [Jesus] ने अपने ख़ास शिष्यों [Disciples] से कहा था, "कौन है जो अल्लाह के काम में मेरी मदद करेगा?" उनके शिष्यों ने कहा, "अल्लाह के काम में हम मददगार होंगे।" फिर इसराईल की संतान में से कुछ ने तो विश्वास कर लिया जबकि कुछ ने विश्वास नहीं किया: जो विश्वास [ईमान] रखनेवालों के दुश्मन थे, हमने उनके ख़िलाफ़ विश्वास रखनेवालों का साथ दिया, सो वही लोग थे जिनकी जीत हुई। (14)
नोट:
1: आसमान और ज़मीन की हर चीज़ अल्लाह की बड़ाई बयान करती रहती है, भले ही हम इंसान इसे समझ नहीं पाते। देखें 24:36; 59:24; 17:44.
2: बताया जाता है कि कुछ मुसलमानों ने मदीना में यह इच्छा जतायी थी कि "अगर उन्हें मालूम हो जाए कि अल्लाह को सबसे ज़्यादा पसंद क्या काम है, तो वे वही काम करेंगे!" उस समय जंग का माहौल था, अल्लाह का आदेश आया कि "उसकी राह में जो मज़बूत क़तारों में खड़े होकर लड़ते हैं, अल्लाह उन्हें बहुत पसंद करता है" (आयत 4), मगर जब उहुद की जंग (625 ई) में लड़ने की बारी आयी, तो इसमें से कुछ लोग भाग खड़े हुए, देखें 3:121; 3:155. इसीलिए, यहाँ उन्हें ऐसी बात कहने से मना गया है जो वे करते नहीं हैं।
5: मूसा (अलै) की क़ौम ने उन्हें बहुत दुख़ दिए (33:69)। कभी लोगों ने कहा कि हमें
सामने-सामने अल्लाह को दिखा दो (4:153), कभी बछड़े की पूजा
करने लगे (2: 92-93), कभी आसमान से उतरने वाले "मन व सलवा" खाने से मना कर दिया (2:61), और तो और जब इसराईल में दाख़िल होने के लिए लड़ने को कहा गया तो उससे भी इंकार
कर दिया (5:24).
6: अल्लाह के पैग़म्बरों का तरीक़ा रहा है कि उन्होंने अपने से पहले की उतरी
किताबों की सच्चाई की पुष्टि की है और आने वाले पैग़म्बरों के बारे में ख़बर दी है।
सो ईसा (अलै) ने भी तौरात की सच्चाई की पुष्टि की और 'अहमद' नाम के आने वाले पैग़म्बर [Paraclete] की ख़बर बाइबल में दी (देखें John 14:16; 26; 15:26; 16:7)। "अहमद" और मुहम्मद नाम का मतलब "तारीफ़ के लायक़" होता है, और आपके कई नामों में से अहमद नाम भी मशहूर है, और इसकी पहचान विद्वानों ने शुरू से ही मुहम्मद (सल्ल) से की है।
...... ईसा
(अलै) ने स्पष्ट निशानियाँ दिखायी थीं, जैसे मिट्टी की चिड़िया में साँस फूँककर उड़ा देना, अंधे और कोढ़ी आदमी को ठीक कर देना, मुर्दे को ज़िंदा कर देना [5:110], मगर फिर भी इसराइली
लोगों ने इसे जादूगरी माना और ठुकरा दिया।
7: जब कोई पैग़म्बर लोगों को अल्लाह के सामने झुक जाने के लिए बुलाए, और लोग उसकी बात न सुनें और उसे पैग़म्बर मानने से इंकार कर दें, तो यह एक तरह से अल्लाह के बारे में झूठ गढ़ने जैसा है।
8: लोग चाहते हैं कि अल्लाह की रौशनी [क़ुरआन] को कभी जादूगरी, या शायरी या तांत्रिक की बातें कहकर बुझा दें। यह बात 9:32 में भी कही गई है।
10: व्यापार में जैसे कोई सामान देकर उसकी क़ीमत वसूल की जाती है, उसी तरह एक मुसलमान अपनी जान और माल अल्लाह के हवाले करता है, तो अल्लाह इसके बदले में जन्नत और यातना से उसे रिहाई दे देता है। देखें सूरह
तौबा (9:111)
13: जल्दी ही मिलने वाली जीत से मतलब मक्का की जीत है, या मुहम्मद (सल्ल) की मृत्यु के कुछ साल बाद मिलने वाली बाइज़ेंटाइन और फ़ारस पर
जीत।
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