Monday, June 18, 2018

सूरह/Surah 24 : अन-नूर/ An Noor [रौशनी/ Light]

सूरह 24: अन-नूर 
[रौशनी/ Light]


01:       यह सूरह अल्लाह की तरफ़ से है

02-03: अवैध सेक्स करने के लिए सज़ा 

04-10: झूठे इल्ज़ाम लगाने पर सज़ा 

11-20: एक झूठी बात गढ़ने का मामला 

21   : अश्लीलता और बुराई के रास्ते पर मत चलो 

22   : नातेदारों, ग़रीबों और घर-बार छोड़कर आने वालों की मदद करो 

23-25: निर्दोष औरतों पर लांछन लगाने की दर्दनाक सज़ा 

26 : अच्छे या बुरे मर्दों की शादियाँ उनके ही जैसी औरतों से होनी चाहिए 

27-29: दूसरों के घरों में बिना इजाज़त नहीं घुसना चाहिए 

30-31: मर्द और औरत को एक दूसरे से शर्म और लिहाज़ रखने पर ज़ोर 

32-33: शादी करने की सलाह 

34:    स्पष्ट आयतें, साफ़ निशानियाँ 

35-38: अल्लाह की रौशनी [नूर] की मिसाल 

39-40: विश्वास न करने की मिसाल 

41-46: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ 

47-54: अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा मानो 

55-57: ईमानवालों को अल्लाह का वादा 

58-60: घरों में आने का सही तरीक़ा 

61   : एक-दूसरे के घरों में खाना खाना

62   : मजलिस से उठकर जाने के लिए रसूल की अनुमति लेना 

63   : रसूल के बुलाने पर तुरंत हाज़िर होना चाहिए 

64   : अल्लाह सब जानता है 

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यन्त दयावान है।

यह एक सूरह है, जो हमने उतारी है और इस पर अमल करना ज़रूरी ठहरा दिया है: इसमें हमने साफ़ व स्पष्ट (आदेशों के साथ) आयतें उतारी हैं, ताकि तुम इस पर ध्यान दो और इससे शिक्षा ले सको। (1)
अगर औरत और मर्द बिना शादी किए, एक दूसरे के साथ सेक्स [ज़िना/ extra-marital sexual intercourse] करते हैं, तो ऐसे में दोनों को (सज़ा के तौर पर) सौ-सौ कोड़े मारो। अगर तुम अल्लाह और आने वाले अंतिम दिन [क़यामत] पर विश्वास रखते हो, तो (देखो) कहीं ऐसा न हो कि अल्लाह के क़ानून पर अमल करते समय उनपर तरस खाकर तुम्हारा हाथ रुक जाए------ और (यह भी ध्यान रहे कि) उन्हें दंड देते समय ईमानवालों का एक समूह वहाँ देखने के लिए मौजूद होना चाहिए। (2)
बिना शादी के, सेक्स [ज़िना] करनेवाला मर्द [Adulterer] इसी लायक़ है कि वह ज़िना (पसंद) करनेवाली औरत [Adulteress] या बहुदेववादी औरत [Idolatress] से ही (शादी के लिए) रिश्ता जोड़े, (इसी तरह) अवैध सेक्स [ज़िना] करनेवाली औरत [Adulteress] के लिए भी उपयुक्त यही है कि वह ज़िना (पसंद) करनेवाले मर्द [Adulterer] या बहुदेववादी मर्द [Idolater] से ही रिश्ता जोड़े: ऐसे आचरण ईमानवालों के लिए बिल्कुल मना कर दिए गए हैं। (3)
और जो लोग शरीफ़ (और विवाहित) औरतों पर (अवैध सेक्स करने का) आरोप लगाएँ, फिर (सबूत में) चार गवाह न ला सकें, तो उन्हें (दंड के रूप में) अस्सी कोड़े मारो और आगे कभी उनकी गवाही क़बूल न करो: ऐसे ही लोग हैं जो क़ानून तोड़ने वाले हैं, (4)
हाँ, जिन लोगों ने इस बुरे कर्म के बाद तौबा कर ली और अपने आपको सुधार लिया, तो निश्चय ही अल्लाह बड़ा माफ़ करने वाला, बेहद दयावान है। (5)

जो लोग अपनी बीवियों पर ज़िना [Adultery] करने का इल्ज़ाम लगाएं, मगर उनके पास अपने सिवा कोई दूसरा गवाह मौजूद न हो, तो ऐसे हर आदमी की गवाही इस तरह होगी कि पहले चार बार अल्लाह की क़सम खाकर यह बयान दे कि (इल्ज़ाम के बारे में) वह सच बोल रहा है,  (6)
और, पाँचवी बार, यह गवाही दे कि अगर मैं झूठ बोल रहा हूँ, तो मुझ पर अल्लाह की फिटकार हो";  (7)
(मर्द की गवाही के बाद) उसकी बीवी से (ज़िना की) सज़ा टल सकती है, अगर वह भी चार बार अल्लाह की क़सम खाकर गवाही दे कि उसका पति झूठ बोल रहा है (8)
और, पाँचवी बार, यह गवाही दे कि "अगर उसके पति का बयान सच्चा है, तो मुझ पर अल्लाह की फिटकार हो!" (9)

अगर तुम पर अल्लाह का फ़ज़ल [bounty] और उसकी रहमत [mercy] साथ न होती, और अगर अल्लाह (गुनाहों की) तौबा [repentance] क़बूल करनेवाला, और बेहद समझ-बूझ रखनेवाला न होता,.....(तो सोचो, क्या हुआ होता)! (10)
[मुसलमानो!] तुम्हारे ही लोगों के बीच एक समूह था जिसने (रसूल की बीवी हज़रत आयशा के बारे में) झूठी बातें गढ़ ली थीं--------तुम (लोग) यह न समझना कि यह तुम्हारे लिए बुरा हुआ; नहीं, बल्कि यह तुम्हारे लिए अच्छा ही हुआ------ उन झूठी बातें बनाने वालों में से हर एक के हिस्से में अपने किए का गुनाह आया है। और उनमें से वह जिसने इस (घटना) में सबसे बड़ी भूमिका निभायी, उसे दर्दनाक सज़ा होगी। (11)
जब तुमने यह झूठी बात सुनी, तो ईमान रखने वाले मर्दों और औरतों को चाहिए था कि अपने लोगों के बारे में अच्छा विचार रखते, और कह देते कि "यह तो बिल्कुल गढ़ी हुई झूठी बात है?" (12)
(अगर इस बात में दम था तो) वे इल्ज़ाम लगाने वाले क्यों इस पर चार गवाह नहीं लाए? अगर वे ऐसे गवाह नहीं पेश कर सकते, तो अल्लाह की नज़र में वही लोग झूठे हैं। (13)
[मुसलमानो!] अगर इस दुनिया और आने वाली दुनिया में तुम पर अल्लाह का फ़ज़ल [bounty] और उसकी रहमत [mercy] साथ न होती, तो जिस बात के पीछे तुम पड़ गए थे, उसके कारण तुम पर अब तक एक बड़ी सख़्त यातना आ चुकी होती। (14)
जब तुम (बिना सोचे-समझे) एक-दूसरे से उस (झूठ) को अपनी ज़बानों से कहने लगे, और तुम अपने मुँह से वह बातें कहने लगे जिसके (सच होने के) बारे में तुम्हें कोई जानकारी न थी, तुमने उसे एक मामूली व हल्की बात समझा, मगर अल्लाह के नज़दीक तो वह बहुत गंभीर बात थी। (15)
जब तुमने झूठी बात सुनी, तो तुमने ऐसा क्यों न कहा, "अल्लाह की पनाह!---हमें ऐसी बात दोबारा अपनी ज़बान पर नहीं लाना चाहिए---- यह तो बहुत बड़ा लांछन है?"(16)
अल्लाह तुम्हें चेतावनी देता है कि अगर तुम पक्के ईमानवाले हो, तो फिर कभी ऐसा काम न करना। (17)
अल्लाह अपने संदेशों को तुम्हारे लिए स्पष्ट कर देता है: अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, बहुत समझ-बूझ रखनेवाला है।  (18)
वे लोग जो चाहते हैं कि ईमान रखने वालों के बीच शर्मनाक बुराइयाँ [अश्लीलता/ Indecency] फैल जाएं, उनके लिए दुनिया और आख़िरत [परलोक] में दर्दनाक यातना होगी। (याद रखो!) अल्लाह सब कुछ जानता है, और तुम कुछ नहीं जानते!  (19)
अगर अल्लाह का फ़ज़ल और उसकी रहमत तुम्हारे साथ न होती, और यह बात न होती कि वह बड़ा नर्म दिल, और बेहद दयालु है ---------! (तॊ तुम भी नहीं बचते!) मगर अल्लाह बड़ा करुणा रखनेवाला, बेहद दयावान है। (20)
ऐ ईमानवालो! तुम शैतान के बताए हुए रास्ते पर मत चलो--------अगर उस रास्ते पर चले, तो शैतान तुम पर ज़ोर डालेगा कि तुम अश्लीलता औऱ बुराई को अपना लो। अगर अल्लाह का फ़ज़ल और उसकी रहमत तुम्हारे साथ न होती, तो तुममें से कोई भी कभी पवित्रता [Purity] हासिल न कर पाता। अल्लाह जिसे चाहता है, उसे पवित्र करके निखार देता है: अल्लाह सब कुछ सुनता है, हर चीज़ जानता है। (21)

तुममें से जिन्हें (अल्लाह की तरफ़ से) भरपूर धन-दौलत मिली है, उन्हें ऐसी क़सम नहीं खानी चाहिए कि वे आगे से नातेदारों, ग़रीबों, और अल्लाह के रास्ते में घर-बार छोड़कर आने वालों को अपने माल से कभी कोई मदद नहीं करेंगे: उन्हें चाहिए कि ऐसे लोगों की ग़लतियों को भूल जाएं, और उन्हें माफ़ कर दें। क्या तुम नहीं चाहते कि अल्लाह भी तुम्हारी गलतियों को माफ़ कर दे: अल्लाह (गुनाहों का) बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है। (22)

जो लोग इज़्ज़तदार और भोली-भाली ईमानवाली औरतों पर लांछन लगाते हैं, तो (याद रखो!) वे लोग इस दुनिया और आने वाली दुनिया में अल्लाह के द्वारा ठुकरा दिए जाएंगें। एक दर्दनाक सज़ा उनके इंतज़ार में होगी, (23)
जो कुछ वे करते रहे थे, उसके बारे में उस दिन ख़ुद उनकी ज़बानें, उनके हाथ और उनके पाँव उनके ही विरुद्ध गवाही देंगे---- (24)
उस दिन, अल्लाह उन्हें उनके कर्मों के मुताबिक़ जो उचित बदला होगा, पूरा पूरा अदा कर देगा----और वे जान लेंगे कि अल्लाह ही वह सच्चाई है जो हर चीज़ को स्पष्ट कर देती है। (25)
भ्रष्ट [corrupt] औरतें भ्रष्ट मर्दों के लिए हैं, और भ्रष्ट मर्द भ्रष्ट औरतों के लिए हैं; अच्छी औरतें, अच्छे मर्दों के लिए हैं, और अच्छे मर्द अच्छी औरतों के लिए हैं। अच्छे (व शरीफ़) मर्द और औरतों के ख़िलाफ़ जो कुछ कहा जाता रहा है, उन बातों से ये (लोग) पूरी तरह निर्दोष [पाक] हैं; उनके लिए वहाँ माफ़ी भी होगी और (दुनिया में) इज़्ज़त की रोज़ी भी। (26)

ऐ ईमानवालो! दूसरे लोगों के घऱों में तब तक न घुसा करो, जब तक कि अंदर जाने की इजाज़त न मांग लो और उन घरवालों को सलाम न कर लो----  यही तुम्हारे लिए सबसे अच्छा तरीक़ा होगा: शायद कि तुम इस बात का ध्यान रखो। (27)
अगर ऐसा लगे कि घर के अंदर कोई नहीं, तब भी अंदर तब तक न जाओ, जब तक कि अनुमति न ले लो। अगर तुमसे कहा जाए,  “वापस चले जाओ”, तो लौट जाओ----- यही तुम्हारे लिए उचित होगा। (याद रखो) अल्लाह अच्छी तरह जानता है जो कुछ तुम करते हो। (28)
ऐसे घरों के अंदर जाने में कोई दोष नहीं है, जहाँ कोई न रहता हो, और जिनमें तुम्हारे फ़ायदे की कोई चीज़ मिल सके। (याद रखो!) हर वह चीज़ जो तुम सबके सामने करते हो और हर वह चीज़ जो तुम छिपाते हो, सब कुछ अल्लाह जानता है।  (29)
(ऐ रसूल), ईमान रखनेवाले मर्दों से कह दें कि (परायी औरतों के सामने) अपनी नजरें नीची रखा करें, और अपने गुप्त अंगों (private parts) को क़ाबू में रखें: यह उनके लिए ज़्यादा शुद्ध तरीक़ा होगा। अल्लाह अच्छी तरह से जानता है, हर वो चीज़ जो वे किया करते हैं। (30)
और ईमानवाली औरतों से कह दें कि वे भी (पराए मर्दों के सामने) अपनी नजरें नीची रखें और अपने गुप्त अंगों को क़ाबू में रखें, और अपने बनाव-श्रृंगार न दिखाया करें, सिवाए (चेहरे और हाथ-पाँव के) वे हिस्से जो देखने में आ जाते हैं; और उन्हें चाहिए कि अपनी ओढ़नियों के आंचल अपने सीनों पर डाल लिया करें, और अपने बनाव-श्रृंगार किसी पर ज़ाहिर न करें सिवाए अपने पतियों के या अपने बाप के या अपने ससुर के या अपने बेटों के या अपने पतियों के बेटों के या अपने भाइयों के या अपने भतीजों के या अपने भांजों के या मेल-जोल की औरतों के या जो उनकी अपनी लौंडी/ग़ुलाम होे, या उन (बूढ़े) नौकरों के जिनमें सेक्स की इच्छा बाक़ी न रही हो, या उन कमसिन लड़कों के जो अभी औरतों के छिपे हुए अंगों से परिचित न हों; और वे अपने पाँव ज़मीन पर पटक-पटककर न चलें कि अपना जो श्रृंगार [पायल/पाज़ेब] उन्होंने छिपा रखा हो, वह सबको मालूम हो जाए। ऐ ईमानवालो! तुम सब मिलकर अल्लाह से तौबा करो, ताकि तुम्हें कामयाबी मिल सके।  (31)

तुममें से जिनकी अभी तक शादी नहीं हुई, और तुम्हारे दास व दासियों में भी जो (शादी के) योग्य हों, उनकी शादी करा दो। अगर वे ग़रीब हैं, तो अल्लाह अपने फ़ज़ल से उनकी रोज़ी की व्यवस्था कर देगा: अल्लाह के फ़ज़ल की कोई सीमा नहीं है और वह सब कुछ जाननेवाला है। (32)
जो लोग (ग़रीबी के कारण) शादी नहीं कर पा रहे हों, उन्हें चाहिए कि संयम से काम लेते हुए अपनी इज़्ज़त बचाए रखें, यहाँ तक कि अल्लाह अपने फ़ज़ल से उन्हें काफ़ी कुछ दे दे। अगर तुम्हारे ग़ुलामों में से कोई अपनी क़ीमत चुकाकर आज़ाद होना चाहता है, तो उनके साथ लिखित समझौता कर लो, अगर तुम जानते हो कि उसके अंदर योग्यता है। और जो धन-दौलत अल्लाह ने तुम्हें दे रखा है, उसमें से कुछ उन्हें देकर मदद करो। और दुनिया के अल्प समय के फ़ायदे के लिए अपनी दासियों को वैश्या बनने पर मजबूर न करो, अगर वे ख़ुद इज़्ज़त की ज़िन्दगी जीना चाहती हों। हालांकि, अगर उन्हें (वैश्यावृत्ति पर) मजबूर किया जाता है, तो (वे दुखी न हों) अल्लाह माफ़ कर देनेवाला और दयावान है। (33)

हमने तुम लोगों की तरफ़ ऐसी आयतें उतार भेजी हैं जो सही रास्ते को स्पष्ट कर देती हैं, जो उन लोगों की मिसालें देती हैं जो तुम से पहले गुज़र चुके हैं, और जो उन लोगों को नसीहत देती हैं जो अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से बचते हैं। (34)

अल्लाह आसमानों और ज़मीन की रौशनी है। (मोमिनों के दिल में) उसकी रौशनी की मिसाल ऐसी है जैसे: एक ताक़ (Niche) हो, जिसमें एक चिराग़ रखा हो - वह चिराग़ एक शीशे के अंदर हो, वह शीशा ऐसा (साफ़) हो मानो चमकता हुआ कोई तारा है। वह चिराग़ ज़ैतून के एक बरकतवाले पेड़ के तेल से जलाया गया हो, जो न पूरब की तरफ़ हो न पश्चिम की तरफ़, उसका तेल (इतना साफ़ हो कि) चाहे आग उसे छुए तक नहीं, तब भी क़रीब क़रीब हर दम तेज़ रौशनी देता हो, --- मतलब रौशनी के ऊपर रौशनी! ---- अल्लाह जिसे चाहता है, उसे अपनी रौशनी को हासिल करने का रास्ता दिखा देता है; अल्लाह लोगों के समझने के लिए ऐसी मिसालें देता है; अल्लाह हर चीज़ की पूरी जानकारी रखता है----- (35)
(उसकी रौशनी) उन इबादत करने की जगहों में चमकती रहती है। अल्लाह ने हुक्म दिया है कि उन (इबादतगाहों) को ऊँचा बनाया जाए और यह कि उनमें उसके नाम का ज़िक्र किया जाए, साथ में उनमें ऐसे लोग हों जो सुबह-शाम उसकी महानता का गुणगान करते रहते हों:  (36)
ऐसे लोग जिनका मन (अल्लाह से) कभी नहीं भटकता---- न सामान की ख़रीद-बिक्री से, न मुनाफ़े से, न अल्लाह की याद से, और न पाबंदी से नमाज पढ़ने से, और न ही तयशुदा ज़कात देने से। वे (आने वाले) उस दिन से डरते रहते हैं जिस दिन (लोगों के) दिल (डर से) उलट जाएंगे और आँखें पत्थरा जाएँगी! (37)
अल्लाह उनके कामों के मुताबिक़ ऐसे लोगों को अच्छे से अच्छा इनाम देगा, और वह अपने फ़ज़ल से उन्हें और ज़्यादा देगा: अल्लाह जिसे देना चाहता है, बेहिसाब देता है। (38)

मगर जो लोग विश्वास नहीं करते, उनके कर्म ऐसे हैं जैसे रेगिस्तान में मरीचिका (mirage) हो: प्यासा आदमी यह सोचता है कि वहाँ पानी होगा, मगर जब वहाँ पहुंचता है तो कुछ नहीं पाता, केवल अल्लाह को पाता है, जो उसे (इस बेकार कोशिश का) पूरा-पूरा हिसाब चुका देता है---- और अल्लाह हिसाब लेने में बहुत तेज़ है। (39)
या फिर ऐसा समझो कि जैसे एक गहरे समुद्र में परछाइयाँ हों जो लहरों के ऊपर लहर से घिरी हुई हों, और ऊपर बादल छाए हुए हों-----एक के ऊपर एक अंधेरे की परतें---- अगर वह अपना हाथ निकाले, तो उसे वह भी सुझाई न दे। और जिसे अल्लाह ही रौशनी न दे, फिर उसके लिए कौन सी रौशनी हो सकती है? (40)

(ऐ रसूल) क्या आप नहीं देखते कि हर चीज़ जो आसमानों और ज़मीन में है, अल्लाह का गुणगान कर रही है, जैसा कि (उड़ते हुए) पंख फैलाए हुए पक्षी भी करते हैं? हर एक को अपनी इबादत करने और गुणगान करने का तरीक़ा मालूम है: जो कुछ वे करते हैं, अल्लाह को उसकी पूरी जानकारी है। (41)
आसमानों और ज़मीन का पूरा नियंत्रण (control) अल्लाह के ही पास है: और अल्लाह ही के पास आख़िर में लौटकर जाना है। (42)
क्या तुम नहीं देखते कि अल्लाह बादलों को चलाता है, फिर उनको एक साथ मिला देता है और उसकी तहें एक दूसरे पर चढ़ जाती हैं, फिर तुम देखते हो कि उसके बीच से पानी की बूंदें टपकने लगती हैं? और वह आसमान में बादल के पहाड़ों से जिस पर चाहता है ओले बरसाता है, और जिस पर चाहता है, उस पर से हटा देता है---- इस समय बिजली की चमक ऐसी होती है कि मानो निगाहों को उचक ले जाएगी। (43)
(मगर) अल्लाह रात और दिन को बारी बारी से लाता रहता है (इसलिए कोई हालत एक जैसी नहीं होती)----- सचमुच आँखें रखने वालों के लिए इन सब चीज़ों में सीखने के लिए एक सबक़ है------(44)
और (देखो), अल्लाह ने हर जानवर को (उसके अपने) तरल पदार्थ से पैदा किया: उनमें से कोई अपने पेट के बल चलता है और कोई उनमें दो टाँगों पर चलता है और कोई चार (टाँगों) पर चलता है। अल्लाह जो चाहता है, पैदा करता है; अल्लाह को हर चीज़ करने की ताक़त है। (45)

हमने वो आयतें उतार भेजी हैं जो सीधे मार्ग को साफ़ व स्पष्ट कर देनेवाली हैं: अल्लाह जिसे चाहता है, सीधा रास्ता दिखा देता है। (46)
वे (पाखंडी लोग) कहते हैं, "हम अल्लाह और उसके रसूल पर विश्वास करते हैं, और हम उनकी आज्ञा मानते हैं," मगर इसके बाद उनमें से कुछ लोग (अल्लाह और रसूल के हुक्म से) मुँह मोड़ लेते हैं: ऐसे लोग सच्चे ईमानवाले नहीं हैं। (47)
और जब उन्हें अल्लाह और उसके रसूल के सामने हाज़िर होने के लिए बुलाया जाता है, ताकि वह उनके बीच फ़ैसला कर सकें, तो (देखो) उनमें से कुछ लोग मुंह मोड़ लेते हैं। (48)
लेकिन अगर उन्हें अपना हक़ मिलने वाला हो, तो (ख़ुशी-ख़ुशी) वे उस (रसूल) के पास आज्ञाकारी बने चले आएंगे। (49)
क्या उनके दिलों में कोई रोग है? क्या वे संदेह में पड़े हुए हैं? क्या उन्हें इस बात का डर है कि अल्लाह और उसके रसूल उनके साथ न्याय नहीं करेंगे? नहीं, बल्कि असल में वही लोग अन्याय करने वाले हैं। (50)
जब सच्चे ईमानवाले को अल्लाह और उसके रसूल के सामने हाज़िर होने के लिए बुलाया जाता है, ताकि वह उनके बीच फ़ैसला कर सकें, तो वे कहते हैं, "हमने (हुक्म) सुना और मान लिया।" यही वे लोग हैं जो कामयाबी पाने वाले हैं:  (51)
जो कोई अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा मानता है, अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचता है, और उसके प्रति अपने कर्तव्यों को पूरा करता है, तो ऐसे ही लोग कामयाब होंगे।  (52)
ये (पाखंडी लोग) अल्लाह की कड़ी-कड़ी क़समें खाते हैं कि अगर आप [रसूल] उन्हें हुक्म दें, तो वे (युद्ध के लिए घर-बार छोड़कर) ज़रूर निकल खड़े होंगे। उनसे कह दें, "क़समें न खाओ: असल चीज़ तो आज्ञा मानना है, और तुम जो कुछ भी (बहानेबाज़ियाँ) करते हो, अल्लाह उसे अच्छी तरह जानता है।" (53)
कहें, "अल्लाह की आज्ञा मानो; उसके रसूल का कहना मानो। अगर तुम मुँह मोड़ते हो तो (याद रखो) जो काम रसूल को सौंपा गया है, उसकी ज़िम्मेदारी उनके सर होगी, और तुम उस काम के लिए ज़िम्मेदार हो जिसका बोझ तुम पर डाला गया है। अगर तुम उन (रसूल) का कहना मानोगे, तो सही मार्ग पा लोगे, मगर रसूल के ज़िम्मे तो इससे ज़्यादा कुछ नहीं कि (सच्चाई का) संदेश साफ़-साफ़ पहुँचा दे। (54)

तुममें से वे लोग जो ईमान रखते हैं, और अच्छे कर्म करते हैं, अल्लाह ने उनसे वादा कर रखा है: वह उन्हें ज़मीन का ख़लीफ़ा (Successors) बनाएगा, जिस तरह उसने उनसे पहले के लोगों को बनाया था; उनके लिए अल्लाह उस दीन [religion] को मज़बूती से जमा देगा जिसे उसने उनके लिए चुना है; और उनके अंदर जो डर की हालत रही है, वह उसे ज़रूर सुरक्षा (व अमन) में बदल देगा। “वे मेरी इबादत करेंगे, और किसी भी चीज़ को मेरी ख़ुदायी के साथ नहीं जोड़ेंगे।” जो लोग इसके बाद भी हुक्म नहीं मानते, वैसे ही लोग (बाग़ी (rebels) होंगे---- (55)
(लोगो), पाबंदी से नमाज़ पढ़ा करो, (सही-सही) ज़कात दिया करो, और रसूल की आज्ञा माना करो, ताकि तुम पर दया की जाए। (56)
(ऐ रसूल!) आप ऐसा न समझें कि विश्वास न करनेवाले ज़मीन पर अल्लाह की पकड़ से बच सकते हैं; उनका अंतिम ठिकाना तो (जहन्नम की) आग है, और वह कितना बुरा अंत है! (57)

ऐ ईमानवालो, तुम्हारे ग़ुलामों और तुममें से वह बच्चे जो अभी युवावस्था को नहीं पहुँचे हैं, उनको चाहिए कि दिन के तीन समयों में तुम्हारे पास आएं तो अनुमति लेकर आया करेंँ: सुबह की नमाज़ से पहले; दोपहर की गर्मी के वक़्त जब तुम (आराम के लिए) अपने कपड़े उतारकर रखते हो; और रात की नमाज़ के बाद। ये तीन समय तुम्हारे लिए (पर्दे में) अकेले रहने के हैं; इसके अलावा दूसरे वक़्तों में तुम पर या उनपर कोई गुनाह नहीं है अगर तुम एक दूसरे के यहाँ बिना किसी रोक-टोक के आते जाते हो। तो (देखो), अल्लाह इस तरीक़े से अपने संदेशों को स्पष्ट करता है: अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, (और अपने काम में) बहुत समझ-बूझ रखनेवाला है। (58)
जब तुम्हारे बच्चे युवावस्था को पहुँच जाएँ, तो उन्हें भी चाहिए कि अंदर आने से पहले (हमेशा) अनुमति लिया करें, जैसा कि उनसे बड़े लेते हैं। इस प्रकार अल्लाह तुम्हारे लिए अपनी आयतों को स्पष्ट करता है। अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, (और अपने काम में) बहुत समझ-बूझ रखनेवाला है। (59)
बड़ी बूढ़ी औरतें जिन्हें अब निकाह करने की उम्मीद बाक़ी नहीं रही, अगर वे बिना अपना बनाव-श्रृंगार दिखाए हुए अपने ओढ़ने के कपड़े (चादरें) उतारकर रख देंं, तो उनके लिए इसमें गुनाह की कोई बात नहीं, फिर भी अगर वे (चादर उतारने से) बचें, तो उनके लिए ज़्यादा अच्छा होगा: अल्लाह सब कुछ सुननेवाला, सब कुछ देखनेवाला है। (60)

न अंधे आदमी पर कोई दोष होगा, न लँगड़े आदमी पर, न किसी बीमार पर। और ख़ुद तुम्हारे लिए भी कोई दोष की बात नहीं चाहे तुम अपने घरों में खाओ या ऐसे घरों में खाओ जो तुम्हारे बाप, मां, भाई, बहन, चाचा, फूफी [बुआ], मामूं, ख़ाला [मौसी] के घर हों या उन घरों में जिनकी कुंजियाँ तुम्हारे क़ब्जे में हों या अपने दोस्तों के यहाँ, इसमें तुम्हारे लिए कोई दोष नहीं होगा: चाहे तुम मिलकर खाओ या अलग-अलग, तुम्हें दोषी नहीं ठहराया जाएगा। हाँ, जब किसी के घरों में जाया करो, तो एक दूसरे को सलाम किया करो, कि यह अल्लाह की तरफ़ से तय की हुई बड़ी बरकतवाली और भलाई की दुआ है। अल्लाह इसी तरीक़े से तुम्हारे लिए अपने संदेशों को स्पष्ट करता है, ताकि तुम समझ सको। (61)

असली ईमानवाले तो वही लोग हैं जो अल्लाह और उसके रसूल पर (सच्चे दिल से) विश्वास रखते हैं, और वे, जब किसी सामुदायिक मामले के लिए अपने रसूल के साथ इकट्ठा होते हैं, तो वे तब तक वहाँ से नहीं जाते जब तक कि (अपने रसूल से) इसकी अनुमति न ले लें----  (ऐ रसूल!) जो लोग (ज़रूरत पड़ने पर) आप से इजाज़त मांगते हैं, वही लोग हैं जो सचमुच अल्लाह और रसूल पर ईमान रखते हैं। जब वे किसी निजी काम के लिए (जाने की) अनुमति मांगें, तो उनमें से आप जिस किसी को सही समझें, जाने की अनुमति दे दिया करें, और उन लोगों के लिए अल्लाह से माफ़ी की दुआ किया करें। अल्लाह बहुत माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है। (62)
(ऐ लोगो!) अल्लाह के रसूल जब तुम्हें हाज़िर होने के लिए बुलाएं, तो उनके बुलाने को तुम आपस में एक-दूसरे को बुलाने जैसा मत समझ बैठना ---- अल्लाह तुममें से उन लोगों को अच्छी तरह से जानता है जो (भीड़ में) छिपकर चुपके से खिसक लेते हैं---- और वे लोग जो उनके हुक्म के ख़िलाफ़ काम करते हैं, उनको डरना चाहिए कि कहीं ऐसा न हो कि वे किसी सख़्त आफ़त में पड़ जाएं या उन पर कोई दर्दनाक यातना आ पड़े। (63)

आसमानों और ज़मीन की हर चीज़ अल्लाह की है: वह अच्छी तरह जानता है तुम जिस हालत [state] में भी हो----- उस दिन जब सब लोग लौटकर उसके पास लाए जाएंगे, तो जो कुछ उन्होंने किया होगा, वह उन्हें हर चीज़ बता देगा----- अल्लाह को हर चीज़ की पूरी जानकारी है। (64)
 
 
 
नोट:

2:  अपनी पत्नी या पति के अलावा [extra-marital], एक मर्द या औरत के बीच किया गया सेक्स [sexual intercourse] "ज़िना" के अपराध में आता है। अगर ज़िना करने वाला मर्द या औरत शादी-शुदा नहीं [unmarried] हो, तो उसे 100 कोड़े लगाए जाएंगे। 

लेकिन अगर ज़िना करने वाला मर्द या औरत शादी-शुदा [married] हुआ, तो यह अपराध और भी संगीन माना जाएगा और उसे संगसार यानी तब तक पत्थरों से मारा जाएगा जबतक कि उसकी मौत न हो जाए। यह सज़ा क़ुरआन में साफ़ तौर से नहीं है, मगर इस बात के प्रमाण हैं कि मुहम्मद (सल्ल) ने अपने ज़माने में कुछ मुक़दमों में यह सज़ा सुनाई थी। 

3: यहाँ कोई हुक्म नहीं दिया गया है, बल्कि ज़िना करने वाले मर्द और औरत दोनों के अपराध पर ज़ोर डालते हुए उसकी निंदा की गई है, जो कि एक ईमानवाले के लिए बिल्कुल ही हराम है। 

4: जिस तरह ज़िना एक बेहद घिनौना अपराध है जिसके लिए कड़ी सज़ा का प्रावधान है, उसी तरह किसी शरीफ़ और विवाहित औरत पर ज़िना करने का लांछन लगाना भी संगीन जुर्म है, इसीलिए झूठा आरोप लगाने वाले को 80 कोड़े मारने की सज़ा है। यह नियम शरीफ़ और विवाहित मर्दों पर भी झूठा आरोप लगाने पर लागू होता है। इस सज़ा के साथ एक और दंड यह है कि ऐसे झूठे आदमी की आगे कभी भी किसी मामले में कोई गवाही नहीं मानी जाएगी।

5: अगर अपराधी सच्चे दिल से गुनाहों की माफ़ी मांग लेता है, तो अल्लाह माफ़ कर सकता है, मगर दुनिया में मिलने वाली सज़ा तो उसे भुगतनी ही होगी।

6: अगर कोई आदमी अपनी बीवी को दूसरे मर्द के साथ ज़िना करते हुए देख ले, मगर उसके पास अपने सिवा चार गवाह न हों, तो वह उस पर इल्ज़ाम किस तरह लगाए, क्योंकि गवाह न होने की सूरत में उसे झूठा आरोप लगाने की सज़ा के रूप में 80 कोड़े खाने पड़ेंगे।

 यहाँ ऐसे मामले के लिए एक रास्ता बताया गया है, जिसे "लिआन" कहते हैं। इसका तरीक़ा यह है कि पहले क़ाज़ी दोनों को झूठ बोलने के नतीजे से डराएगा क्योंकि दुनिया के मुक़ाबले आख़िरत में मिलने वाली सज़ा कहीं सख़्त होगी। फिर क़ाज़ी के सामने पहले शौहर क़समें खाएगा कि उसने बीवी पर सच्चा इल्ज़ाम लगाया है, फिर अगर बीवी उसके इल्ज़ाम को मान ले, तो उसे ज़िना की सज़ा दी जाएगी, लेकिन अगर बीवी भी क़समें खा ले कि उसका शौहर झूठ बोल रहा है, तो फिर दोनों को कोई सज़ा नहीं होगी, मगर क़ाज़ी दोनों की शादी तोड़ देगा, और बाद में अगर कोई बच्चा पैदा हुआ जिसे उसके शौहर ने मानने से इंकार किया तो फिर वह बच्चा माँ के नाम के साथ जाना जाएगा। 

10: यहाँ से आयत 22 तक एक ख़ास घटना के बारे में कहा गया है जिसका संबंध मुहम्मद (सल्ल) की बीवी हज़रत आयशा (रज़ि) से जुड़ा हुआ है। क़रीब 6 हिजरी में मुहम्मद (सल्ल) ने अरब के एक क़बीले बनु अलमुस्तलक़ पर हमला किया था, इस अभियान में उनकी बीवी आयशा (रज़ि) भी साथ गई थीं। वहाँ से वापस आते हुए मदीना से कुछ पहले एक जगह रात में पड़ाव डाला गया था। रात के पिछले पहर आयशा (रज़ि) शौच के लिए जंगल की तरफ़ गईं, वहाँ से वापस आते हुए उन्हें एहसास हुआ कि उनका हार कहीं गिर गया है, वह उसे खोजते हुए फिर से दूर निकल गईंइस बीच काफ़िले को चलने का हुक्म हो गया। क़ायदे के मुताबिक़ हज़रत आयशा की डोली उठाकर ऊँट पर रख दी गयी, चूँकि वह काफ़ी हल्की थीं इसलिए डोली उठाने वालों को पता न चला कि आप उसमें नहीं हैं। फिर जब हज़रत आयशा पड़ाव की जगह वापस आयीं, तब तक क़ाफ़िला जा चुका था, वह इधर-उधर जाने के बजाए उसी जगह लेट गईं। क़ायदे के मुताबिक़ क़ाफ़िले के पीछे एक आदमी को रखा जाता था ताकि अगर कोई चीज़ छूट गई हो या गिर-पड़ गई हो, तो वह उसे ला सके, इस काम के लिए वहाँ सफ़वान बिन मुअत्तल (रज़ि) पीछे रह गए थे। जब ज़रा उजाला हुआ तो सफ़वान पड़ाव की जगह देखने लगे, इतने में उनकी नज़र हज़रत आयशा पर पड़ी, वह समझ गए कि आप छूट गई हैं, उन्हें अपने ऊँट पर बैठाया और ख़ुद उसकी लगाम पकड़े हुए मदीना पहुँच गए। उन्हें इस तरह आते हुए कई लोगों ने देखा जिनमें पाखंडियों [मुनाफ़िक़ों] का सरदार अब्दुल्लाह बिन उबई भी था, उसने झट एक बेहूदा बात गढ़ी और हज़रत आयशा (रज़ि) के बारे में यह बात मशहूर कर दी कि उन्होंने अकेले में सफ़वान के साथ ग़लत काम किया है। इस लांछन की बात काफ़ी दिनों तक एक दूसरे की ज़बानी शहर में फैलती रही जिसमें पाखंडियों के साथ कुछ मुसलमान भी शामिल हो गए थे। क़रीब एक महीने तक मुहम्मद (सल्ल), हज़रत आयशा (रज़ि) और सफ़वान (रज़ि) को सख़्त मानसिक तकलीफ़ें उठानी पड़ीं, फिर यह आयतें उतरी जिनमें इस लांछन को झूठा क़रार दिया गया और मुसलमानों को बताया गया कि आगे से ऐसी बेबुनियाद बातों को एक दूसरे से कहने से पहले उसकी छानबीन करना ज़रूरी है। इस घटना ने पूरे समाज को झकझोर दिया था, इससे सबसे बड़ा फ़ायदा यह हुआ कि जो पाखंडी लोग मुसलमानों में शामिल होकर उनके साथ छल कर रहे थे, उनके चेहरे सामने आ गए, और साथ में मुसलमानों के आचरण में सुधार के लिए कई नियम-क़ायदे भी बनाए गए ताकि समाज में बुराई और अश्लीलता फैलने की संभावना पर रोक लगाई जा सके।

22: हज़रत आयशा (रज़ि) पर लांछन लगाने वालों में यूँ तो कई मुसलमान भी शामिल हो गए थे, मगर उनमें ख़ासकर तीन सीधे-साधे लोग भी थे जो पाखंडियों द्वारा फैलायी गई बेहूदा बातों में आ गए थे, उनमें एक मस्तह बिन असासा (रज़ि) भी थे जो हज़रत अबु बकर (रज़ि) के रिश्तेदारों में थे, जब अबु बकर (रज़ि) को उनकी इस हरकत का पता चला, तो उन्होंने क़सम खा ली कि अब कभी उनकी आर्थिक मदद नहीं करेंगे। मस्तह ने अल्लाह से अपने गुनाहों की तौबा कर ली थी, और इस आयत के उतरने के बाद अबु बकर (रज़ि) ने अपनी क़सम तोड़ते हुए फिर से उनकी मदद करनी शुरू कर दी। 

26: इसका अनुवाद ऐसे भी किया गया है, "भ्रष्ट चीज़ें भ्रष्ट लोगों के लिए हैं, और भ्रष्ट लोग भ्रष्ट चीज़ों के लिए हैं; अच्छी चीज़ें अच्छे लोगों के लिए हैं, और अच्छे लोग अच्छी चीज़ों के लिए हैं।" यहाँ भ्रष्ट और अच्छी चीज़ें को भ्रष्ट और अच्छी बातों से समझा जा सकता है जिसे ज़िना के झूठे लांछन के संदर्भ में देखा जा सकता है; इसका मतलब यह हुआ कि भ्रष्ट चीज़ें केवल भ्रष्ट लोग ही बोल सकते हैं या भ्रष्ट चीज़ें भ्रष्ट लोगों के ही बारे में कही जाती हैं, और अच्छे लोग भ्रष्ट चीज़ों से पाक व निर्दोष होते हैं, जैसे हज़रत आयशा और सफ़वान। 

29: "ऐसे घरों में जहाँ कोई न रहता हो" से मतलब ऐसी जगह जो आम लोगों के इस्तेमाल की हो और जहाँ कोई permanently न रहता हो, जैसे सड़क के किनारे मुसाफ़िरों के लिए कोई सराय या कोई टूटा-फूटा मकान आदि।

30: नज़रें नीची रखना और अपने गुप्त अंगों की रक्षा करना केवल औरतों के लिए ही नहीं हैं, इसलिए यहाँ मर्दों को भी तमीज़ सिखायी गई है जिनका पालन करना समाज में फैली बुराइयों को दूर करने के लिए बहुत ज़रूरी है। परायी औरतों के सामने उन्हें अपनी नज़रें नीची रखनी चाहिए, इसका मतलब यह है कि राह चलती औरतों पर पहली बार नज़र पड़ जाने में कोई ख़राबी नहीं, लेकिन यह कि उन्हें बार-बार देखना या घूरते रहना बेहद ग़लत है, साथ में हर तरह की बेहूदा और गिरी हुई हरकतों [sexual misconduct] से अपने आपको क़ाबू में रखना भी ज़रूरी है। 

31: यह औरतों के पर्दे के बारे में है, जैसाकि कुछ विद्वान कहते हैं कि औरतें (ख़ास समारोह आदि के मौक़े पर) जो बनाव-श्रृंगार और ज़ेवर-गहने आदि पहनती हैं, उन्हें पराये लोगों से छिपाना चाहिए, सिवाए चेहरे और हाथ-पाँव के। बाक़ी आम हालतों में जब उन्होंने कोई सजावट नहीं की हुई हो, तो फिर छिपाने की ज़रूरत नहीं। कुछ विद्वानों का मत है कि औरतों का चेहरा ही उनकी असल सजावट का केंद्र है, इसलिए इसे छिपाना चाहिए, और इसकी दलील सूरह अहज़ाब (33: 59) से दी जाती है जहाँ घर से निकलते हुए औरतों को इस तरह चादर ओढ़ने का हुक्म है कि चेहरे पर घूंघट हो। हालाँकि कुछ दूसरे विद्वान इस तर्क को नहीं मानते क्योंकि सूरह अहज़ाब में चादर ओढ़ने का मक़सद पर्दा करना नहीं था, बल्कि इसलिए था कि उन्हें शरीफ़ और आज़ाद औरत के रूप में पहचाना जा सके और कोई उनके साथ छेड़छाड़ न कर सके। देखें 33:59

33: जब ग़ुलामी की प्रथा थी, तो उस समय कभी-कभी कोई ग़ुलाम अपने मालिक से यह समझौता कर लेता था कि अगर तय की हुई रक़म वह चुका देगा, तो उसे आज़ाद कर दिया जाएगा। यहाँ इस तरीक़े को बढ़ावा दिया गया है कि अगर ग़ुलाम ऐसा चाहे तो उसके साथ "लिखित समझौता" कर लेना चाहिए, और मुसलमानों को ऐसे ग़ुलामों/लौंडियों को आर्थिक मदद देनी चाहिए ताकि वे आज़ाद हो सकें। 

दासियों/लौंडियों को वैश्या बनाने पर मजबूर करने से भी मना कर दिया गया। इस्लाम से पहले जाहिलियत के ज़माने में यह आम बात थी। 

35: यह एक बहुत ही मशहूर आयत है जिसका मतलब विद्वानों ने कई तरह से लगाया है। अल्लाह आसमानों और ज़मीन के हर जीव को सही रास्ता दिखाने वाली रौशनी [नूर] है। इस रौशनी की मिसाल ऐसे चिराग़ से दी गई है जो अँधेरे में ख़ूब तेज़ और साफ़ रौशनी दे रहा हो, क्योंकि वह ज़ैतून के ऐसे पेड़ के तेल से जल रहा हो जो पेड़ पूरब या पश्चिम में नहीं, बल्कि किसी ऊँची और बीच की जगह में लगा हुआ हो जहाँ दिनभर अच्छी धूप पड़ती हो, उसका फल अच्छी तरह पक जाता है और उसका तेल बहुत साफ होता है।  

इस नूर की मिसाल सूरज से नहीं बल्कि चिराग़ की रौशनी से दी गई है, क्योंकि यह गुमराही के छाए हुए अँधेरे के बीच में सही रास्ता दिखाने वाली है, जिस तरह चिराग़ अँधेरों के बीचो-बीच रौशनी पैदा कर देता है, जबकि सूरज की रौशनी में चारों तरफ़ कोई अँधेरा बाक़ी नहीं रहता है।

39: सच्चाई पर विश्वास न करने वाले नेकी और भलाई के जो काम पुण्य समझकर करते हैं, उनका बदला अल्लाह इसी दुनिया में चुका देता है, मगर चूंकि उन लोगों ने एक अल्लाह और उसके रसूल पर विश्वास नहीं किया, सो आख़िरत में उनके कर्म मरीचिका की तरह बेहक़ीक़त होकर रह जाएंगे। 

40: यहाँ सच्चाई पर विश्वास न करने वाले काफ़िरों की मिसाल दी गयी है। उनके कर्म दो तरह के होते हैं, एक तो वह जो भलाई के काम इस उम्मीद में करते हैं कि उससे उन्हें कुछ पुण्य मिलेगा, मगर उनकी हक़ीक़त मरीचिका की तरह यानी धोखे के सिवा कुछ भी नहीं है। और कुछ कर्म तो ऐसे हैं जो वे भलाई समझकर नहीं करते, उनकी मिसाल उन अँधेरों की है जिनमें रौशनी की कोई किरण नहीं होती। फिर उनका झूठे ख़ुदाओं को पूजना और सच्चाई को मानने से इंकार करने की ज़िद्द व हठधर्मी को समंदर में एक के ऊपर एक अंधेरे की परतों से मिसाल दी गयी है जिससे वे हक़ीक़त को देख नहीं पाते।  

41: सूरह इसरा (17:44) में भी है कि कायनात की कोई चीज़ भी ऐसी नहीं जो अल्लाह की बड़ाई के साथ उसका गुणगान न कर रही हो। 

47: पाखंडी लोगों ने दिखावे के लिए तो विश्वास कर लिया था, लेकिन असल में ईमान नहीं रखते थे। इस आयत के पीछे की बात यह बतायी जाती है कि एक बार ऐसा हुआ कि बशर नाम के एक पाखंडी का एक यहूदी से झगड़ा हो गया, यहूदी जानता था कि मामला अगर मुहम्मद (सल्ल) के पास जाएगा तो वह बिल्कुल सही फ़ैसला करंगे, सो उसने बशर से कहा कि चलो मुहम्मद (सल्ल) के पास फ़ैसला कराने के लिए चलते हैं, मगर बशर के मन में चोर था, इसलिए वह एक यहूदी काब बिन अशरफ़ के पास फ़ैसला कराने गया। 

61: कई बार अंधे, लंगड़े या मजबूर आदमी यह सोचते थे कि उन्हें मिल-बैठकर खाने वाली जगहों पर जाकर नहीं खाना चाहिए, क्योंकि हो सकता है उनके साथ बैठने में कुछ आदमी को तकलीफ़ हो, या वे अनजाने में कुछ ज़्यादा खा लें, दूसरी तरफ़ कुछ लोग ऐसा भी सोचते थे कि ऐसे मजबूर लोग शर्म-लिहाज़ की वजह से खाना बहुत कम खाएं। इस आयत में बताया गया है कि सब मिलकर साथ खा सकते हैं और इतनी बारीकी से सोचने की ज़रूरत नहीं है।

कुछ लोग जब कहीं जंग लड़ने बाहर चले जाते थे तो वे अपनी घर की कुंजियाँ किसी को देकर जाते थे और साथ में उन्हें घर में रखे खाने-पीने के सामान को भी इस्तेमाल करने की इजाज़त देकर जाते, तब भी लोग उनके सामान नहीं इस्तेमाल करते थे, मगर इस आयत ने उन्हें ऐसा करने की अनुमति दे दी। 

62: यहाँ अहज़ाब की लड़ाई [सूरह 33] के ठीक पहले की घटना के बारे में बताया गया है जब मदीना की रक्षा के लिए लोगों को खाई खोदने के लिए बुलाया गया था। सारे मुसलमान तो इस काम में चुस्ती से लगे हुए थे, लेकिन जो पाखंडी [मुनाफ़िक़] लोग थे, वे आने में बहुत सुस्ती करते थे, किसी तरह बहाने बनाकर चले जाते थे या कभी-कभी बिना अनुमति के धीरे से खिसक लेते थे। 




Surah/सूरह 1: Al-Fatiha/अल-फ़ातिहा [(किताब की) शुरुआत/ The Opening]

       सूरह 1: अल-फ़ातिहा    [(किताब की) शुरुआत/ The Opening] यह एक मक्की सूरह है। पूरे क़ुरआन में अल्लाह का जो संदेश आया है , उसका इस सूरह मे...