02-03: अवैध सेक्स करने के लिए सज़ा
04-10: झूठे इल्ज़ाम लगाने पर सज़ा
11-20: एक झूठी बात गढ़ने का मामला
21 : अश्लीलता और बुराई के रास्ते पर मत चलो
22 : नातेदारों, ग़रीबों और घर-बार छोड़कर आने वालों की मदद करो
23-25: निर्दोष औरतों पर लांछन लगाने की दर्दनाक सज़ा
26 : अच्छे या बुरे मर्दों की शादियाँ उनके ही जैसी औरतों से होनी चाहिए
27-29: दूसरों के घरों में बिना इजाज़त नहीं घुसना चाहिए
30-31: मर्द और औरत को एक दूसरे से शर्म और लिहाज़ रखने पर ज़ोर
32-33: शादी करने की सलाह
34: स्पष्ट आयतें, साफ़ निशानियाँ
35-38: अल्लाह की रौशनी [नूर] की मिसाल
39-40: विश्वास न करने की मिसाल
41-46: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ
47-54: अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा मानो
55-57: ईमानवालों को अल्लाह का वादा
58-60: घरों में आने का सही तरीक़ा
61 : एक-दूसरे के घरों में खाना खाना
62 : मजलिस से उठकर जाने के लिए रसूल की अनुमति लेना
63 : रसूल के बुलाने पर तुरंत हाज़िर होना चाहिए
64 : अल्लाह सब जानता है
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यन्त दयावान है।
2: अपनी पत्नी या पति के अलावा [extra-marital], एक मर्द या औरत के बीच किया गया सेक्स [sexual intercourse] "ज़िना" के अपराध में आता है। अगर ज़िना करने वाला मर्द या औरत शादी-शुदा नहीं [unmarried] हो, तो उसे 100 कोड़े लगाए जाएंगे।
लेकिन अगर ज़िना करने वाला मर्द या औरत शादी-शुदा [married] हुआ, तो यह अपराध और भी संगीन माना जाएगा और उसे संगसार यानी तब तक पत्थरों से मारा जाएगा जबतक कि उसकी मौत न हो जाए। यह सज़ा क़ुरआन में साफ़ तौर से नहीं है, मगर इस बात के प्रमाण हैं कि मुहम्मद (सल्ल) ने अपने ज़माने में कुछ मुक़दमों में यह सज़ा सुनाई थी।
3: यहाँ कोई हुक्म नहीं दिया गया है, बल्कि ज़िना करने वाले मर्द और औरत दोनों के अपराध पर ज़ोर डालते हुए उसकी निंदा की गई है, जो कि एक ईमानवाले के लिए बिल्कुल ही हराम है।
4: जिस तरह ज़िना एक बेहद घिनौना अपराध है जिसके लिए कड़ी सज़ा का प्रावधान है, उसी तरह किसी शरीफ़ और विवाहित औरत पर ज़िना करने का लांछन लगाना भी संगीन जुर्म है, इसीलिए झूठा आरोप लगाने वाले को 80 कोड़े मारने की सज़ा है। यह नियम शरीफ़ और विवाहित मर्दों पर भी झूठा आरोप लगाने पर लागू होता है। इस सज़ा के साथ एक और दंड यह है कि ऐसे झूठे आदमी की आगे कभी भी किसी मामले में कोई गवाही नहीं मानी जाएगी।
5: अगर अपराधी सच्चे दिल से गुनाहों की माफ़ी मांग लेता है, तो अल्लाह माफ़ कर सकता है, मगर दुनिया में मिलने वाली सज़ा तो उसे भुगतनी ही होगी।
6: अगर कोई आदमी अपनी बीवी को दूसरे मर्द के साथ ज़िना करते हुए देख ले, मगर उसके पास अपने सिवा चार गवाह न हों, तो वह उस पर इल्ज़ाम किस तरह लगाए, क्योंकि गवाह न होने की सूरत में उसे झूठा आरोप लगाने की सज़ा के रूप में 80 कोड़े खाने पड़ेंगे।
यहाँ ऐसे मामले के लिए एक रास्ता बताया गया है, जिसे "लिआन" कहते हैं। इसका तरीक़ा यह है कि पहले क़ाज़ी दोनों को झूठ बोलने के नतीजे से डराएगा क्योंकि दुनिया के मुक़ाबले आख़िरत में मिलने वाली सज़ा कहीं सख़्त होगी। फिर क़ाज़ी के सामने पहले शौहर क़समें खाएगा कि उसने बीवी पर सच्चा इल्ज़ाम लगाया है, फिर अगर बीवी उसके इल्ज़ाम को मान ले, तो उसे ज़िना की सज़ा दी जाएगी, लेकिन अगर बीवी भी क़समें खा ले कि उसका शौहर झूठ बोल रहा है, तो फिर दोनों को कोई सज़ा नहीं होगी, मगर क़ाज़ी दोनों की शादी तोड़ देगा, और बाद में अगर कोई बच्चा पैदा हुआ जिसे उसके शौहर ने मानने से इंकार किया तो फिर वह बच्चा माँ के नाम के साथ जाना जाएगा।
10: यहाँ से आयत 22 तक एक ख़ास घटना के बारे में कहा गया है जिसका संबंध मुहम्मद (सल्ल) की बीवी हज़रत आयशा (रज़ि) से जुड़ा हुआ है। क़रीब 6 हिजरी में मुहम्मद (सल्ल) ने अरब के एक क़बीले बनु अलमुस्तलक़ पर हमला किया था, इस अभियान में उनकी बीवी आयशा (रज़ि) भी साथ गई थीं। वहाँ से वापस आते हुए मदीना से कुछ पहले एक जगह रात में पड़ाव डाला गया था। रात के पिछले पहर आयशा (रज़ि) शौच के लिए जंगल की तरफ़ गईं, वहाँ से वापस आते हुए उन्हें एहसास हुआ कि उनका हार कहीं गिर गया है, वह उसे खोजते हुए फिर से दूर निकल गईं, इस बीच काफ़िले को चलने का हुक्म हो गया। क़ायदे के मुताबिक़ हज़रत आयशा की डोली उठाकर ऊँट पर रख दी गयी, चूँकि वह काफ़ी हल्की थीं इसलिए डोली उठाने वालों को पता न चला कि आप उसमें नहीं हैं। फिर जब हज़रत आयशा पड़ाव की जगह वापस आयीं, तब तक क़ाफ़िला जा चुका था, वह इधर-उधर जाने के बजाए उसी जगह लेट गईं। क़ायदे के मुताबिक़ क़ाफ़िले के पीछे एक आदमी को रखा जाता था ताकि अगर कोई चीज़ छूट गई हो या गिर-पड़ गई हो, तो वह उसे ला सके, इस काम के लिए वहाँ सफ़वान बिन मुअत्तल (रज़ि) पीछे रह गए थे। जब ज़रा उजाला हुआ तो सफ़वान पड़ाव की जगह देखने लगे, इतने में उनकी नज़र हज़रत आयशा पर पड़ी, वह समझ गए कि आप छूट गई हैं, उन्हें अपने ऊँट पर बैठाया और ख़ुद उसकी लगाम पकड़े हुए मदीना पहुँच गए। उन्हें इस तरह आते हुए कई लोगों ने देखा जिनमें पाखंडियों [मुनाफ़िक़ों] का सरदार अब्दुल्लाह बिन उबई भी था, उसने झट एक बेहूदा बात गढ़ी और हज़रत आयशा (रज़ि) के बारे में यह बात मशहूर कर दी कि उन्होंने अकेले में सफ़वान के साथ ग़लत काम किया है। इस लांछन की बात काफ़ी दिनों तक एक दूसरे की ज़बानी शहर में फैलती रही जिसमें पाखंडियों के साथ कुछ मुसलमान भी शामिल हो गए थे। क़रीब एक महीने तक मुहम्मद (सल्ल), हज़रत आयशा (रज़ि) और सफ़वान (रज़ि) को सख़्त मानसिक तकलीफ़ें उठानी पड़ीं, फिर यह आयतें उतरी जिनमें इस लांछन को झूठा क़रार दिया गया और मुसलमानों को बताया गया कि आगे से ऐसी बेबुनियाद बातों को एक दूसरे से कहने से पहले उसकी छानबीन करना ज़रूरी है। इस घटना ने पूरे समाज को झकझोर दिया था, इससे सबसे बड़ा फ़ायदा यह हुआ कि जो पाखंडी लोग मुसलमानों में शामिल होकर उनके साथ छल कर रहे थे, उनके चेहरे सामने आ गए, और साथ में मुसलमानों के आचरण में सुधार के लिए कई नियम-क़ायदे भी बनाए गए ताकि समाज में बुराई और अश्लीलता फैलने की संभावना पर रोक लगाई जा सके।
22: हज़रत आयशा (रज़ि) पर लांछन लगाने वालों में यूँ तो कई मुसलमान भी शामिल हो गए थे, मगर उनमें ख़ासकर तीन सीधे-साधे लोग भी थे जो पाखंडियों द्वारा फैलायी गई बेहूदा बातों में आ गए थे, उनमें एक मस्तह बिन असासा (रज़ि) भी थे जो हज़रत अबु बकर (रज़ि) के रिश्तेदारों में थे, जब अबु बकर (रज़ि) को उनकी इस हरकत का पता चला, तो उन्होंने क़सम खा ली कि अब कभी उनकी आर्थिक मदद नहीं करेंगे। मस्तह ने अल्लाह से अपने गुनाहों की तौबा कर ली थी, और इस आयत के उतरने के बाद अबु बकर (रज़ि) ने अपनी क़सम तोड़ते हुए फिर से उनकी मदद करनी शुरू कर दी।
26: इसका अनुवाद ऐसे भी किया गया है, "भ्रष्ट चीज़ें भ्रष्ट लोगों के लिए हैं, और भ्रष्ट लोग भ्रष्ट चीज़ों के लिए हैं; अच्छी चीज़ें अच्छे लोगों के लिए हैं, और अच्छे लोग अच्छी चीज़ों के लिए हैं।" यहाँ भ्रष्ट और अच्छी चीज़ें को भ्रष्ट और अच्छी बातों से समझा जा सकता है जिसे ज़िना के झूठे लांछन के संदर्भ में देखा जा सकता है; इसका मतलब यह हुआ कि भ्रष्ट चीज़ें केवल भ्रष्ट लोग ही बोल सकते हैं या भ्रष्ट चीज़ें भ्रष्ट लोगों के ही बारे में कही जाती हैं, और अच्छे लोग भ्रष्ट चीज़ों से पाक व निर्दोष होते हैं, जैसे हज़रत आयशा और सफ़वान।
29: "ऐसे घरों में जहाँ कोई न रहता हो" से मतलब ऐसी जगह जो आम लोगों के इस्तेमाल की हो और जहाँ कोई permanently न रहता हो, जैसे सड़क के किनारे मुसाफ़िरों के लिए कोई सराय या कोई टूटा-फूटा मकान आदि।
30: नज़रें नीची रखना और अपने गुप्त अंगों की रक्षा करना केवल औरतों के लिए ही नहीं हैं, इसलिए यहाँ मर्दों को भी तमीज़ सिखायी गई है जिनका पालन करना समाज में फैली बुराइयों को दूर करने के लिए बहुत ज़रूरी है। परायी औरतों के सामने उन्हें अपनी नज़रें नीची रखनी चाहिए, इसका मतलब यह है कि राह चलती औरतों पर पहली बार नज़र पड़ जाने में कोई ख़राबी नहीं, लेकिन यह कि उन्हें बार-बार देखना या घूरते रहना बेहद ग़लत है, साथ में हर तरह की बेहूदा और गिरी हुई हरकतों [sexual misconduct] से अपने आपको क़ाबू में रखना भी ज़रूरी है।
31: यह औरतों के पर्दे के बारे में है, जैसाकि कुछ विद्वान कहते हैं कि औरतें (ख़ास समारोह आदि के मौक़े पर) जो बनाव-श्रृंगार और ज़ेवर-गहने आदि पहनती हैं, उन्हें पराये लोगों से छिपाना चाहिए, सिवाए चेहरे और हाथ-पाँव के। बाक़ी आम हालतों में जब उन्होंने कोई सजावट नहीं की हुई हो, तो फिर छिपाने की ज़रूरत नहीं। कुछ विद्वानों का मत है कि औरतों का चेहरा ही उनकी असल सजावट का केंद्र है, इसलिए इसे छिपाना चाहिए, और इसकी दलील सूरह अहज़ाब (33: 59) से दी जाती है जहाँ घर से निकलते हुए औरतों को इस तरह चादर ओढ़ने का हुक्म है कि चेहरे पर घूंघट हो। हालाँकि कुछ दूसरे विद्वान इस तर्क को नहीं मानते क्योंकि सूरह अहज़ाब में चादर ओढ़ने का मक़सद पर्दा करना नहीं था, बल्कि इसलिए था कि उन्हें शरीफ़ और आज़ाद औरत के रूप में पहचाना जा सके और कोई उनके साथ छेड़छाड़ न कर सके। देखें 33:59
33: जब ग़ुलामी की प्रथा थी, तो उस समय कभी-कभी कोई ग़ुलाम अपने मालिक से यह समझौता कर लेता था कि अगर तय की हुई रक़म वह चुका देगा, तो उसे आज़ाद कर दिया जाएगा। यहाँ इस तरीक़े को बढ़ावा दिया गया है कि अगर ग़ुलाम ऐसा चाहे तो उसके साथ "लिखित समझौता" कर लेना चाहिए, और मुसलमानों को ऐसे ग़ुलामों/लौंडियों को आर्थिक मदद देनी चाहिए ताकि वे आज़ाद हो सकें।
दासियों/लौंडियों को वैश्या बनाने पर मजबूर करने से भी मना कर दिया गया। इस्लाम से पहले जाहिलियत के ज़माने में यह आम बात थी।
35: यह एक बहुत ही मशहूर आयत है जिसका मतलब विद्वानों ने कई तरह से लगाया है। अल्लाह आसमानों और ज़मीन के हर जीव को सही रास्ता दिखाने वाली रौशनी [नूर] है। इस रौशनी की मिसाल ऐसे चिराग़ से दी गई है जो अँधेरे में ख़ूब तेज़ और साफ़ रौशनी दे रहा हो, क्योंकि वह ज़ैतून के ऐसे पेड़ के तेल से जल रहा हो जो पेड़ पूरब या पश्चिम में नहीं, बल्कि किसी ऊँची और बीच की जगह में लगा हुआ हो जहाँ दिनभर अच्छी धूप पड़ती हो, उसका फल अच्छी तरह पक जाता है और उसका तेल बहुत साफ होता है।
इस नूर की मिसाल सूरज से नहीं बल्कि चिराग़ की रौशनी से दी गई है, क्योंकि यह गुमराही के छाए हुए अँधेरे के बीच में सही रास्ता दिखाने वाली है, जिस तरह चिराग़ अँधेरों के बीचो-बीच रौशनी पैदा कर देता है, जबकि सूरज की रौशनी में चारों तरफ़ कोई अँधेरा बाक़ी नहीं रहता है।
39: सच्चाई पर विश्वास न करने वाले नेकी और भलाई के जो काम पुण्य समझकर करते हैं, उनका बदला अल्लाह इसी दुनिया में चुका देता है, मगर चूंकि उन लोगों ने एक अल्लाह और उसके रसूल पर विश्वास नहीं किया, सो आख़िरत में उनके कर्म मरीचिका की तरह बेहक़ीक़त होकर रह जाएंगे।
40: यहाँ सच्चाई पर विश्वास न करने वाले काफ़िरों की मिसाल दी गयी है। उनके कर्म दो तरह के होते हैं, एक तो वह जो भलाई के काम इस उम्मीद में करते हैं कि उससे उन्हें कुछ पुण्य मिलेगा, मगर उनकी हक़ीक़त मरीचिका की तरह यानी धोखे के सिवा कुछ भी नहीं है। और कुछ कर्म तो ऐसे हैं जो वे भलाई समझकर नहीं करते, उनकी मिसाल उन अँधेरों की है जिनमें रौशनी की कोई किरण नहीं होती। फिर उनका झूठे ख़ुदाओं को पूजना और सच्चाई को मानने से इंकार करने की ज़िद्द व हठधर्मी को समंदर में एक के ऊपर एक अंधेरे की परतों से मिसाल दी गयी है जिससे वे हक़ीक़त को देख नहीं पाते।
41: सूरह इसरा (17:44) में भी है कि कायनात की कोई चीज़ भी ऐसी नहीं जो अल्लाह की बड़ाई के साथ उसका गुणगान न कर रही हो।
47: पाखंडी लोगों ने दिखावे के लिए तो विश्वास कर लिया था, लेकिन असल में ईमान नहीं रखते थे। इस आयत के पीछे की बात यह बतायी जाती है कि एक बार ऐसा हुआ कि बशर नाम के एक पाखंडी का एक यहूदी से झगड़ा हो गया, यहूदी जानता था कि मामला अगर मुहम्मद (सल्ल) के पास जाएगा तो वह बिल्कुल सही फ़ैसला करंगे, सो उसने बशर से कहा कि चलो मुहम्मद (सल्ल) के पास फ़ैसला कराने के लिए चलते हैं, मगर बशर के मन में चोर था, इसलिए वह एक यहूदी काब बिन अशरफ़ के पास फ़ैसला कराने गया।
61: कई बार अंधे, लंगड़े या मजबूर आदमी यह सोचते थे कि उन्हें मिल-बैठकर खाने वाली जगहों पर जाकर नहीं खाना चाहिए, क्योंकि हो सकता है उनके साथ बैठने में कुछ आदमी को तकलीफ़ हो, या वे अनजाने में कुछ ज़्यादा खा लें, दूसरी तरफ़ कुछ लोग ऐसा भी सोचते थे कि ऐसे मजबूर लोग शर्म-लिहाज़ की वजह से खाना बहुत कम खाएं। इस आयत में बताया गया है कि सब मिलकर साथ खा सकते हैं और इतनी बारीकी से सोचने की ज़रूरत नहीं है।
कुछ लोग जब कहीं जंग लड़ने बाहर चले जाते थे तो वे अपनी घर की कुंजियाँ किसी को देकर जाते थे और साथ में उन्हें घर में रखे खाने-पीने के सामान को भी इस्तेमाल करने की इजाज़त देकर जाते, तब भी लोग उनके सामान नहीं इस्तेमाल करते थे, मगर इस आयत ने उन्हें ऐसा करने की अनुमति दे दी।
62: यहाँ अहज़ाब की लड़ाई [सूरह 33] के ठीक पहले की घटना के बारे में बताया गया है जब मदीना की रक्षा के लिए लोगों को खाई खोदने के लिए बुलाया गया था। सारे मुसलमान तो इस काम में चुस्ती से लगे हुए थे, लेकिन जो पाखंडी [मुनाफ़िक़] लोग थे, वे आने में बहुत सुस्ती करते थे, किसी तरह बहाने बनाकर चले जाते थे या कभी-कभी बिना अनुमति के धीरे से खिसक लेते थे।
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