01 : यह किताब की आयतें हैं
02-04: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ
05-06: विश्वास न करने वाले दोबारा ज़िंदा उठाए जाने को नहीं मानते
07 : चमत्कार दिखाने की माँग
08-17: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ
18 : इनाम और सज़ा
19-29: ईमानवाले और इंकार करने वाले एक समान नहीं हो सकते
30-32: रसूल का उत्साह बढ़ाना
33-34: विश्वास करने से इंकार करने वालों को दंड
35 : बाग़ या आग
36-43: रसूल का उत्साह बढ़ाना
2: अल्लाह ने अपने आपको "सिंहासन पर स्थापित कर लिया", इसका मतलब दुनिया
की तरह किसी गद्दी पर बैठ जाना ठीक नहीं होगा, बल्कि इसका मतलब यह है कि अल्लाह ने हर चीज़ की व्यवस्था संभाल ली और आदेश जारी होने लगे।
3: हर वनस्पति यानी पौधों के भी जोड़े (नर और मादा) होते हैं।
5: जब अल्लाह ने पहली बार कायनात की रचना की थी, तब कुछ भी नहीं था, तो जो अल्लाह बिना किसी चीज़ के ऐसी रचना कर सकता है, तो उसके लिए मुदों को फिर से ज़िंदा करना क्या मुश्किल हो सकता है, सचमुच यह बात आश्चर्य करने की है। जैसे कि अगर किसी के गले में लोहे का तौक़ [Iron-collar] पड़ा हो तो वह इधर-उधर नहीं देख पाता, इसी तरह ये लोग अल्लाह की ताक़त और उसकी क़ुदरत को न ठीक से देख पाए और न समझ पाए।
7: मुहम्मद (सल्ल) को यूँ तो कई निशानियाँ दी गई थीं, मगर मक्का के विश्वास न करनेवाले उनसे बराबर नए चमत्कार दिखाने की माँग किया करते थे, मगर क़ुरआन ने यह
बात साफ कर दी है कि जब तक अल्लाह न चाहे, कोई रसूल अपनी तरफ़ से चमत्कार नहीं दिखा सकता, वैसे भी उनका काम लोगों को (सच्चाई से) इंकार और बुरे कर्मों के नतीजे से सावधान करना है।
8: अल्लाह सब जानता है कि माँ की कोख में जो बच्चा है, वह लड़का होगा या लड़की, लम्बा होगा या नाटा, स्वस्थ होगा या बीमार, और सबसे अहम बात कि बच्चे की तक़दीर में क्या है, इत्यादि। गर्भ [womb] के घटने और बढ़ने से मतलब यह है कि वह यह भी जानता है कि बच्चा कितने दिनों तक कोख में रहेगा।
13: गरजते हुए बादल भी अल्लाह की बड़ाई का गुणगान करते रहते हैं, इसे literal अर्थ में भी लिया जा सकता है जिसे आम लोग नहीं समझते, देखें 17: 44. और इसका मतलब यह भी हो सकता है कि जो भी आदमी बादलों के गरज-चमक के कारणों पर और उसके होने वाले नतीजे पर ध्यान देगा कि किस तरह दुनिया के कोने-कोने में पानी पहुंचाने की व्यवस्था की गई है, तो वह हैरत में पड़कर उसके पैदा करने वाले की बड़ाई और गुणगान करने पर मजबूर हो जाएगा और समझ जाएगा कि उस मालिक को अपनी ख़ुदायी के लिए किसी साझेदार [Partner] की ज़रूरत नहीं है।
16: चूँकि मक्का के बहुदेववादियों [Idolaters] के बारे में पता था कि अगर उनसे पूछा जाए कि आसमानों और ज़मीन को किसने पैदा किया, तो सिवाए "अल्लाह" कहने के उनके पास कोई और जवाब न था, इसीलिए उनसे यह पूछने को कहा गया। एक बार जब वे इस बात को मान गए तो फिर तो यह बेतुकी बात हुई कि अल्लाह को छोड़कर जिन देवताओं को उन्होंने अपना रखवाला बना रखा है, असल में उन्हें तो अपने आपको भी फ़ायदा या नुक़सान पहुँचाने की ताक़त नहीं है, तो वे दूसरों को क्या फ़ायदा पहुँचाएंगे।
17: "झूठ" चाहे थोड़ी देर के लिए हावी भी हो जाए, मगर वह झाग की तरह गंदा व बेकार होता है और मिट जाता है, जबकि "सच्चाई" उस साफ़ पानी या शुद्ध धातु की तरह है जो फ़ायदामंद है और बाक़ी रहने वाला है। देखें 17:81.
21: अल्लाह ने इंसानों से रिश्ता बनाए रखने पर ज़ोर दिया है, जिसमें अपने ख़ानदानी रिश्तेदारों के साथ और ग़रीबों और ज़रूरतमंदों के साथ रिश्ता निभाना ज़रूरी है।
26: किसी को बहुत रोज़ी देना और किसी को तंगी देना, यह पूरी तरह से अल्लाह के हाथ में है, मगर अच्छी रोज़ी और ख़ुशहाली मिलने से यह शक नहीं होना चाहिए कि उसके कर्म को भी अल्लाह ने पसंद कर लिया हो, क्योंकि यह ज़रूरी नहीं है। इस तरह विश्वास न करनेवाले दुनिया की ज़िंदगी में मस्त रह सकते हैं मगर आनेवाली ज़िंदगी के मुक़ाबले यह थोड़ी देर का ही आराम है!
31: यहाँ उन चमत्कारों का ज़िक्र किया गया है जिसकी मांग मक्का के विश्वास न करनेवाले लोग बराबर किया करते थे, वे मुहम्मद साहब को कहते थे कि अगर तुम मक्का के आसपास के जो पहाड़ हैं उनको हटा दो, या ज़मीन को फाड़कर उसमें से दरिया बहा दो या हमारे बाप-दादाओं को ज़िंदा करके उनसे हमारी बात करवा दो, तब हम तुम्हारी बातों पर ज़रूर ईमान लाएंगे। यहाँ अल्लाह ने बताया है कि अगर ये सारी मांगें पूरी कर भी दी जाएं, तब भी ये लोग हठधर्मी के चलते विश्वास नहीं करने वाले। इसी तरह की मांगों का ज़िक्र सूरह अल-इसरा (17: 90-93) में भी आया है।
कभी-कभी ईमान रखनेवाले भी ऐसा सोचते थे कि अगर ये चमत्कार दिखा दिए जाते तो वे लोग विश्वास कर लेते। मगर उन्हें समझना चाहिए कि अल्लाह नहीं चाहता कि हर आदमी ज़बरदस्ती ईमान लाए, बल्कि दुनिया को एक इम्तिहान की जगह बनाया गया है जहाँ हर आदमी अपनी मर्ज़ी से सोच-समझकर फ़ैसला करे, उसे रास्ता दिखाने के लिए नबी और किताबें हैं, अब अगर वह सच्चाई पर विश्वास करके अच्छे काम करता है, तो उसे इनाम मिलेगा, और अगर वह अविश्वास पर अड़ा रहता है और बुरे कर्म करता है, तो उसे दंड झेलना होगा।
33: जब कोई आदमी इस ज़िद्द पर अड़ा रहे कि जो कुछ भी वह कर रहा है, वही अच्छा काम है, और उसके मुक़ाबले में बड़ी से बड़ी दलील को भी सुनने और मानने के लिए तैयार न हो, तो अल्लाह उसको गुमराही में भटकता छोड़ देता है. और फिर उसके बाद कोई उसे सीधे रास्ते पर लाने वाला नहीं है।
36: जिन लोगों को किताब [क़ुरआन] दी गई यानी मुहम्मद (सल्ल) के सहाबी [companions] और वे लोग जिन्होंने इसकी सच्चाई पर विश्वास कर लिया था, ऐसे लोग तो क़ुरआन की बातों से ख़ुश होते थे, मगर यहूदियों और ईसाइयों में कुछ गिरोह ऐसे थे जो क़ुरआन की उन बातों को तो मानते थे जो कि तोरात और बाइबिल के आदेशों से मिलती-जुलती थी, पर जो बातें ख़ासकर इस्लाम से जुड़ी हुई थीं, उन्हें इन लोगों ने मानने से इंकार कर दिया था, जैसे मुहम्मद (सल्ल) का पैग़म्बर [Prophet] होना।
37: क़ुरआन अरबों की ज़बान में सच और झूठ के बीच फ़ैसला कर देनेवाली किताब है या यह कहें कि यह नियम-क़ायदे [Rulings] बताने वाली है। मगर इसका मतलब यह नहीं है कि मुहम्मद (सल्ल) केवल अरबों के लिए या जो अरबी [Arabic] जानते हैं, उन्हीं के लिए रसूल बनाकर भेजे गए थे, बल्कि वह सारे इंसानों के लिए रसूल बनाए गए थे (34:28).
क़ुरआन अरबी ज़बान में इसलिए उतरी, क्योंकि अल्लाह ने अपना संदेश लोगों तक पहुँचाने के लिए एक अरब के आदमी [मुहम्मद सल्ल] को रसूल बनाया, और हर रसूल अपनी क़ौम की ज़बान में ही संदेश देता है ताकि वह लोगों को बात ठीक ढंग से समझा सके (14:4).
38: कुछ लोगों ने यह आपत्ति जतायी थी कि यह कैसा रसूल है जिसके बीवी-बच्चे हैं? क़ुरआन में दूसरी जगहों पर यह भी आया है कि यह कैसा रसूल है "जो खाता-पीता है और बाज़ारों में चलता-फिरता है!" (25:7)
39: मूल किताब यानी "लौह ए महफ़ूज़" [Preserved Tablet] शुरू से अल्लाह के पास है, उसमें से हर ज़माने में लोगों के मार्गदर्शन के लिए किताबें उतरती रही हैं, और चूँकि हर ज़माने में हालात थोड़े बहुत बदलते रहते हैं, इसलिए पुराने हुक्मों में से कुछ को मिटा दिया जाता है और कुछ को वैसा ही छोड़ दिया जाता है।
41: अरब में विश्वास न करने वालों का धीरे-धीरे प्रभाव घटता जा रहा था, पहले मदीना में मुसलमानों की आज़ाद हुकूमत बनीं और फिर आहिस्ता-आहिस्ता आसपास के इलाक़ों पर उनका दबदबा बढ़ता चला गया, इस तरह, मक्का के उन विश्वास न करने वालों की सीमाएं सिकुड़ती चली गईं।