Thursday, August 2, 2018

सूरह 13 : अर-रा'द/Ar Ra'd [बादल की गरज / Thunder]

सूरह 13: अर-रा'द 
[बादल की गरज / Thunder]



01 : यह किताब की आयतें हैं 

02-04: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ 

05-06: विश्वास न करने वाले दोबारा ज़िंदा उठाए जाने को नहीं मानते 

07     : चमत्कार दिखाने की माँग 

08-17: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ 

18     : इनाम और सज़ा 

19-29: ईमानवाले और इंकार करने वाले एक समान नहीं हो सकते 

30-32: रसूल का उत्साह बढ़ाना 

33-34: विश्वास करने से इंकार करने वालों को दंड 

35     : बाग़ या आग 

36-43: रसूल का उत्साह बढ़ाना 

 

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

अलिफ़॰ लाम॰ मीम॰ रा॰

ये (अल्लाह की) किताब [क़ुरआन] की आयतें हैं। [ऐ रसूल], जो कुछ (आयतें) आपके रब की ओर से आप पर उतारी गयी हैं, वह सब सच हैं, फिर भी अधिकतर लोग (इस पर) विश्वास नहीं कर रहे। (1)

यह अल्लाह ही है जिसने आसमानों को इतना ऊँचा बनाया, और तुम देखते हो कि वह बिना किसी पाये के टिका हुआ है, और फिर अल्लाह ने अपने आपको सिंहासन पर स्थापित कर लिया (और आदेश जारी हो गए); उसने सूरज और चाँद को (इस तरह से) काम पर लगा रखा है कि हर एक अपने नियत समय तक (अपनी कक्षा में) चला जा रहा है; वह सारी चीज़ों को नियमित करता है, और वह अपनी आयतें [निशानियाँ] साफ़ व स्पष्ट तरीक़े से बयान करता है ताकि तुम्हें यक़ीन हो जाए कि (एक दिन हिसाब देने के लिए) अपने रब से मिलना है;  (2)

वही है जिसने ज़मीन की सतह फैला दी, उसमें मज़बूत पहाड़ों को जमाया और नदियाँ बहा दीं, और उसमें हर तरह के फलों के दो-दो क़िस्म उगा दिए; वही है जो दिन की रौशनी पर रात की चादर ओढ़ा देता है। सचमुच इस बात में उन लोगों के लिए निशानियाँ हैं जो सोच-विचार से काम लेते हैं। (3)

(और आसपास के इलाक़े को देखो!), धरती पर एक दूसरे से सटे हुए ज़मीन के टुकड़े हैं, उनमें अंगूरों के बाग़ हैं, (अनाज की) खेतियाँ हैं, खजूर के पेड़ हैं जिनमें कुछ तो झुंड में लगे होते हैं, कुछ अकेले खड़े होते हैं, सबको एक ही पानी से सींचा जाता है, फिर भी हम उनमें से कुछ फलों का मज़ा दूसरे फलों से बेहतर बना देते हैं: सचमुच इस बात में उन लोगों के लिए निशानियाँ हैं, जो बुद्धि से काम लेते हैं। (4)
 

[ऐ रसूल!], अगर कोई चीज़ आपको आश्चर्य में डालती हो, तो आपको इस बात पर ज़रूर आश्चर्य होना चाहिए जब वे [इंकार करनेवाले] पूछते हैं, "क्या? जब हम मरके (सड़-गलकर) मिट्टी हो जाएँगे, तो क्या हम फिर नये सिरे से पैदा किए जाएंगे?" यही वे लोग हैं जिन्होंने अपने रब (की शक्ति को मानने से) इंकार किया, जिनकी गर्दनों मे लोहे के तौक़ [collars] पड़े होंगे और वही हैं जो (जहन्नम की) आग में रहने वाले हैं, जहाँ उन्हें हमेशा रहना है। (5)

[ऐ रसूल!], वे (दया या माफ़ी जैसे) अच्छे बदले की गुहार लगाने के बजाए आपसे (व्यंग्य करते हुए) यातना को जल्दी ले आने के लिए कहते हैं, हालाँकि उनसे पहले गुज़र चुकी कई क़ौमों की (बर्बादी की) मिसालें उनके सामने रही हैं----- आपका रब लोगों को उनकी ग़लतियों व गुनाहों के बावजूद माफ़ कर देता है, मगर (याद रहे!) वह सज़ा देने में भी सचमुच बहुत कठोर है। (6

विश्वास न करनेवाले [काफ़िर] कहते हैं, "उस (रसूल) पर उसके रब की तरफ़ से कोई चमत्कार क्यों नहीं उतारा गया?" मगर आपका तो बस काम यही है कि आप लोगों को (इंकार व बुरे कर्मों के नतीजे से) सावधान कर दें: (पहले ग़ुज़र चुकी) हर क़ौम के पास कोई रास्ता दिखानेवाला ज़रूर हुआ है। (7)
 
हर एक मादा की कोख में क्या (जन्म ले रहा) है, अल्लाह उसे जान रहा होता है, और यह भी कि उनके गर्भ कितने सिकुड़ते हैं या कितने फूल जाते हैं ---- उसके यहाँ हर चीज़ का एक अन्दाज़ा ठहराया हुआ है; (8)

वह उसे भी जानता है जो चीज़ दिखायी नहीं देती, और उसे भी जो दिखायी देती है; वह महान है, सबसे ऊँचा है। (9)

(अल्लाह को) इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि तुममें से कोई चुपके से कोई बात कहता हो या ज़ोर से, चाहे तुम रात के अंधेरे में छिपे हुए हो या दिन की रौशनी में चल-फिर रहे हो, उसके लिए सब (स्थितियाँ) बराबर हैं: (10

हर आदमी के आगे और पीछे देखभाल करनेवाले फ़रिश्ते लगे होते हैं, जो अल्लाह के हुक्म से (दिन और रात में) बारी-बारी उसकी निगरानी करते रहते हैं। अल्लाह किसी क़ौम के लोगों की हालत उस वक़्त तक नहीं बदलता, जब तक कि वे ख़ुद अपने हालात में बदलाव न ले आएं, लेकिन अगर वह किसी क़ौम को (उसके कुकर्मों के नतीजे में) नुक़सान पहुँचाना चाहे, तो कोई नहीं है जो इसे टाल सकता हो ------ उसके सिवा कोई नहीं, जो उनकी रक्षा कर सके।  (11)

वही है जो तुम्हें बिजली की चमक दिखाता है, जो दिलों में डर भी पैदा करती है और (बारिश की) आशा भी जगाती है; वह (पानी की बूंदों से) बोझिल बादलों को बनाता है; (12)

गरजते हुए बादल भी उसी का गुणगान करते हैं, और फ़रिश्ते भी जो उसके डर से सहमे रहते हैं; वही कड़कती हुई बिजलियाँ भेजता है, और जिस किसी पर चाहता है, गिरा देता है। इसके बावजूद इंकार करनेवाले [काफ़िर] अल्लाह (की क़ुदरत) के बारे में बहसें करते रहते हैं------ उसकी ताक़त बड़ी ज़बरदस्त और अटल है। (13)

सच्ची भक्ति से पुकारना हो, तो केवल वही है जिसे पुकारना चाहिए: अल्लाह को छोड़कर जिनको वे पुकारते हैं, वे उनकी पुकार का कोई जवाब नहीं देते। यह ऐसा ही है जैसे कोई (प्यासा) अपने दोनों हाथ पानी की ओर फैला भर दे और सोचे कि पानी उसके मुँह में (अपने आप) पहुँच जाएगा ------ ऐसा नहीं हो सकता: (सच्चाई से) इंकार करने वालों की दुआ व पुकार इसके सिवा कुछ नहीं कि बेकार रास्तों में भटकती फिरे।  (14

वह तमाम चीज़ें जो आसमानों और ज़मीन में हैं, केवल अल्लाह के ही आगे (सज्दे में) झुकती हैं, चाहे अपनी मर्ज़ी से झुकें या मजबूरी से, और यही हाल उनकी परछाइयों का भी है, जो सुबह में और शाम में (सज्दे में) झुक जाती हैं।  (15)
 
(ऐ रसूल) आप (इंकार करनेवालों से) पूछें, "आसमानों और ज़मीन का रब कौन है?" आप कहें, "वह अल्लाह है", कह दें, "फिर उसे छोड़कर तुमने दूसरों को क्यों अपना रखवाला बना रखा है, यहाँ तक कि जो न तो अपने आपको कोई फ़ायदा पहुँचा सकता है और न ही कोई नुक़सान?" कह दें, "क्या आँख से अंधा उन लोगों के बराबर हो सकता है जो देख सकते हों? और क्या गहरा अँधेरा और उजाला बराबर हो सकता है?" वे जिन्हें अल्लाह का साझेदार [Partner] ठहराते हैं, क्या उन्होंने भी अल्लाह की तरह किसी चीज़ की रचना की है जिसे देखकर दोनों (रचनाओं) में अंतर कर पाना मुश्किल हो गया है?" कह दें, "अल्लाह ही हर चीज़ को पैदा करनेवाला है: वह अकेला है, सब पर छाया हुआ है!" (16)

वह आसमान से पानी बरसाता है जिससे नदी-नाले अपनी-अपनी समाई के अनुसार भरकर बह निकलते हैं। पानी के बहाव के साथ नदी की सतह पर झाग की परतें जमा हो जाती हैं, ऐसा ही झाग तब भी उठता है जब ज़ेवर और औज़ार बनाने के लिए किसी धातु को आग में पिघलाया जाता है: अल्लाह इस तरीक़े से सच और झूठ की मिसाल बयान करता है ---- जो झाग है वह तो सूखकर ग़ायब हो जाता है, मगर जो कुछ आदमी के फ़ायदे की चीज़ है, वह बची रह जाती है ---- अल्लाह ऐसी ही मिसालें दिया करता है। (17)

जो लोग अपने रब की पुकार सुनकर उसके हुक्म मान लेते हैं, उनके लिए बेहतरीन इनाम होगा; मगर वे लोग जिन्होंने उसकी पुकार का कोई जवाब न दिया, तो (क़यामत के दिन) अगर उनके पास वह सब कुछ हो जो ज़मीन में है, बल्कि उसका दुगना भी हो, तब भी अपनी मुक्ति के बदले में वे ख़ुशी-ख़ुशी सब दे डालें, क्योंकि उनसे जो हिसाब लिया जाएगा, वह बड़ा भयानक होगा। जहन्नम ही उनका घर होगा, और उनके आराम करने के लिए दुःख भरा बिछौना होगा।   (18)
 
ला वह आदमी जो जानता है कि जो कुछ आप पर आपके रब की तरफ़ से उतरा है वह सच्चाई है, कभी उस जैसा हो सकता है जो अंधा हो? परन्तु समझते तो वही हैं जो बुद्धि और समझ रखते हैं; (19

जो लोग अल्लाह के नाम से किए गए क़रार (Agreement) को पूरा करते हैं, और अपनी की गयी प्रतिज्ञा को नहीं तोड़ते;  (20)

जो ऐसे हैं कि अल्लाह नॆ जिन रिश्ते को जोड़ने का आदेश दिया, उन्हें जोड़े रखते हैं; जो अपनॆ रब से डरते रहते हैं और (होने वाले) हिसाब की कठोरता के ख़्याल से घबराये रहते हैं; (21)

जो लोग अपने रब की ख़ुशी की चाहत में अपनी (ग़लत) इच्छाओं को मारते हुए धीरज से काम लेते हैं; जो पाबंदी से नमाज़ पढ़ते हैं; जो कुछ हमने उन्हें दे रखा है, उसमें से ढँके-छिपे भी और सबके सामने भी ख़र्च करते हैं; जो भलाई के द्वारा बुराई को दूर करते हैं। तो यही लोग हैं जिनके लिए (आख़िरत में असली) घर का इनाम मिलेगा: (22)

वे हमेशा रहने के बाग़ [जन्नत] में ख़ुद भी दाख़िल होंगे और साथ में उनके बाप-दादा, उनके पति/पत्नियों और उनकी सन्तानों में से जो नेक होंगे, वे भी (वहाँ जगह पाएंगे); वहाँ हर दरवाज़े से फ़रिश्ते उनके पास आएंगे, (23)

(और कहेंगे) "चूँकि तुमने (दुनिया में) धीरज व सब्र से काम लिया था, इसलिए (आज) तुम पर सलामती हो!" तुम्हारा घर तुम्हारे लिए क्या बेहतरीन इनाम है!  (24)

मगर जो लोग अल्लाह के नाम से किए गए पक्के क़रार को तोड़ डालते हैं, अल्लाह ने जिन रिश्तों को जोड़ने का आदेश दिया, उसे काट डालते हैं और जो ज़मीन में फ़साद पैदा करते हैं: वही हैं जिनके लिए (आख़िरत में) बहुत बुरा घर होगा ---- (25

अल्लाह जिसको चाहता है, भरपूर रोज़ी देता है, औऱ जिसकोे चाहता है बहुत थोड़ी देता है ---- और हालांकि वे इस दुनिया की ज़िन्दगी में मौज-मस्ती कर सकते हैं, मगर आने वाली ज़िन्दगी के मुक़ाबले में यह तो बस बहुत थोड़े समय का आराम है। (26)

(सच्चाई से) इंकार करनेवाले कहते हैं, "इन (रसूल) पर उनके रब की तरफ़ से कोई (चमत्कारिक) निशानी क्यों नहीं उतारी गयी?" [ऐ रसूल!] आप कह दें, "अल्लाह जिसे चाहता है उसे (सही रास्ते से दूर) भटकता छोड़ देता है, और जो उसकी तरफ़ भक्ति-भाव से जाता है, उसे वह अपनी तरफ़ बढ़ने का रास्ता दिखा देता है,  (27)

वे लोग जो ईमान रखते हैं, और जिनके दिलों को अल्लाह की याद से शांति मिलती है ----- सचमुच अल्लाह का ज़िक्र व उसकी याद ही ऐसी चीज़ है जिससे दिलों को सुकून व शांति मिलती है ----- (28)

जो लोग ईमान रखते हैं, और नेक व अच्छे कर्म करते हैं: वहां उनके लिए ख़ुशियाँ हैं जो उनके इंतज़ार में हैं, और उनका आख़िरी पड़ाव बेहद शानदार होगा।" (29)

अत: [ऐ रसूल!], हमने आपको एक ऐसी उम्मत [समुदाय] में भेजा है ----- जहाँ दूसरी उम्मतें उनसे बहुत पहले गुज़र चुकी हैं----- ताकि जो कुछ हमने आप पर ('वही' द्वारा) उतारा है, उसे आप उन्हें पढ़कर सुना दें। फिर भी वे दया करनेवाले रब [रहमान] पर विश्वास नहीं करते। कह दें, "वही मेरा रब है: उसके सिवा कोई पूजने के लायक़ ख़ुदा नहीं। उसी पर मैंने भरोसा किया है और उसी के पास मुझे लौटकर जाना है।" (30

अगर कोई ऐसी भी क़ुरआन उतरती जिससे पहाड़ चलाए जाते या ज़मीन फाड़ दी जाती या उसके द्वारा मुर्दों से बात कर ली जाती [तो वह यही क़ुरआन होती! मगर तब भी ये लोग ईमान नहीं लाते!], मगर हर चीज़ सचमुच अल्लाह के ही अधिकार में है। फिर क्या ईमान रखनेवाले इस बात को नहीं समझते कि अगर अल्लाह ने ऐसा ही चाहा होता, तो सारे ही इंसानों को सीधे मार्ग पर लगा देता? और (याद रखो!) इंकार करनेवालों पर, उनकी करतूतों के बदले में, कोई न कोई मुसीबत निरंतर आती ही रहेगी, या उनके घर के नज़दीक ही कहीं उस वक़्त तक (बलाएं) उतरती रहेंगी, जब तक कि अल्लाह का वादा पूरा न हो जाए: अल्लाह कभी भी अपने वादे के विरुद्ध नहीं जाता।" (31

[ऐ रसूल!], आपसे पहले भी कितने ही रसूलों की हँसी उड़ायी जा चुकी है, मगर मैंने विश्वास न करनेवालों को पहले मुहलत दी थी: अंत में, मैंने उन्हें अपनी पकड़ में ले लिया ----- तो (देखो!) मेरी सज़ा कितनी दर्दनाक थी! (32)

भला क्या वह हस्ती जो हर एक जान के हर अच्छे-बुरे कर्म पर नज़र रखती है (उसे अपनी ख़ुदायी में किसी साझेदार की ज़रूरत है)? फिर भी, वे लोग अल्लाह के साथ साझेदार [Partner] ठहराते हैं। आप कहें, "ज़रा उनके नाम तो बताओ", या क्या तुम उस (अल्लाह) को ज़मीन के बारे में कोई ऐसी बात बता सकते हो जिसके अस्तित्व की उसे ख़बर तक नहीं, या क्या यह बस शब्दों का दिखावा मात्र है?" मगर वे जो मक्कारी की बातें बनाते हैं, वह बातें (सच्चाई से) इंकार करनेवालों के लिए बड़ी लुभावनी बना दी गयी हैं और उन्हें सही मार्ग पर चलने से रोक दिया गया है: जिसे अल्लाह (ही) भटकता छोड़ दे, उसे कोई सही रास्ते पर नहीं ला सकता। (33)

उनके लिए इस दुनिया में भी सज़ा है, मगर आने वाली दुनिया [आख़िरत/Hereafter] में उनकी सज़ा बहुत ही कठोर होगी ---- अल्लाह (की यातना) से उन्हें बचाने वाला कोई न होगा। (34)
 
वे लोग जो अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते हैं, उनके लिए जिस जन्नत का वादा किया गया है, उसकी तस्वीर कुछ ऐसी है: एक बाग़ है, उसके नीचे बहती हुई नहरें हैं, उसके फल हैं जो कभी ख़त्म नहीं होते, और पेड़ों की छाँव है जो हर समय बनी रहती है। यह इनाम उन लोगों के लिए है, जो अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से बचते हैं; जबकि विश्वास न करनेवालों का बदला (जहन्नम की) आग है। (35)

[ऐ रसूल!], जिन लोगों को हमने (आसमानी) किताब दी है, वे (क़ुरआन की) उन बातों से ख़ुश होते हैं जो आप पर उतारी गयी है; उनमें कुछ (यहूदी व ईसाई) गिरोह के ऐसे लोग भी हैं जो उस (क़ुरआन) की कुछ बातों को मानने से इंकार करते हैं। आप कह दें, "मुझे तो बस यह हुक्म हुआ है कि मैं अल्लाह की बन्दगी करूँ, और किसी को भी उसकी ख़ुदायी में साझेदार [Partner] न ठहराऊँ: उसी की (बातों की) तरफ़ तुम्हें बुलाता हूँ और उसी की तरफ़ मुझे लौटकर जाना है।" (36)

इस तरह, हमने इस (क़ुरआन) को अरबी ज़बान में फ़ैसला कर देने के लिए उतार भेजा है। [ऐ रसूल!], अब वह ज्ञान जो आपके पास आ चुका है, इसके बाद भी, अगर आप उन लोगों की इच्छाओं के पीछे चलें, तो कोई न होगा जो आपकी मदद कर सके या आपको अल्लाह से बचा सके। (37

[ऐ रसूल!], हमने आपसे पहले (अपने संदेश के साथ) कई रसूल भेजे और हमने उन्हें बीवियाँ और बच्चे भी दिए थे; किसी भी रसूल को यह शक्ति नहीं दी गयी थी कि वह बिना अल्लाह की अनुमति के, कोई चमत्कार (या एक आयत) लाकर दिखा सके। हर ज़माने (में रास्ता दिखाने) के लिए एक आसमानी किताब [Scripture] रही है: (38)

(अपने हुक्म में से) अल्लाह जो चाहता है मिटा देता है, और जो चाहता है, उसकी पुष्टि कर देता है, और मूल किताब तो उसी के पास है। (39)

हमने (विश्वास न करनेवालों को) जिस (बुरे) नतीजे की धमकी दे रखी है, हो सकता है कि उसमें से कुछ हिस्सा, [ऐ रसूल] आपको (आपकी ज़िंदगी में ही) दिखा दें, या (उससे पहले ही) आपको दुनिया से उठा लें, मगर आपका कर्तव्य तो बस (सच्चाई का) सन्देश पहुँचा देना है: हिसाब लेने का काम तो हमारा है। (40)

क्या वे [मक्का के इंकार करनेवाले] नहीं देखते कि हम (उनकी) सरज़मीन पर किस तरह चले आ रहे हैं, और कैसे उनकी सीमाएं सिकुड़ती जा रही हैं? और अल्लाह ही फ़ैसला करता है ---- कोई नहीं है जो उसके फ़ैसले टाल सके ---- और वह हिसाब लेने में बहुत तेज़ है। (41)

जो लोग इनसे पहले गुज़र चुके हैं, वे भी (सच्चाई के ख़िलाफ़) चालें चला करते थे, मगर (याद रहे!) सारी चालें तो अल्लाह ही के क़ब्ज़े में हैं: हर एक आदमी जो कुछ भी करता है, अल्लाह सब जानता है। अंत में, (सच्चाई से) इंकार करनेवालों को मालूम हो जाएगा कि (परलोक में) किसके हिस्से में सबसे बेहतर घर आया। (42)

[ऐ रसूल!], (सच्चाई से) इंकार करनेवाले कहते हैं, "तुम अल्लाह की तरफ़ से भेजे हुए नहीं हो।" आप कह दें, "मेरे और तुम्हारे बीच अल्लाह की गवाही काफ़ी है: आसमानी किताबों [Scripture] का सारा ज्ञान उसी के पास से आता है।" (43)





नोट:

2: अल्लाह ने अपने आपको "सिंहासन पर स्थापित कर लिया", इसका मतलब दुनिया की तरह किसी गद्दी पर बैठ जाना ठीक नहीं होगा, बल्कि इसका मतलब यह है कि अल्लाह ने हर चीज़ की व्यवस्था संभाल ली और आदेश जारी होने लगे। 

3: हर वनस्पति यानी पौधों के भी जोड़े (नर और मादा) होते हैं।

5: जब अल्लाह ने पहली बार कायनात की रचना की थी, तब कुछ भी नहीं था, तो जो अल्लाह बिना किसी चीज़ के ऐसी रचना कर सकता है, तो उसके लिए मुदों को फिर से ज़िंदा करना क्या मुश्किल हो सकता है, सचमुच यह बात आश्चर्य करने की है। जैसे कि अगर किसी के गले में लोहे का तौक़ [Iron-collar] पड़ा हो तो वह इधर-उधर नहीं देख पाता, इसी तरह ये लोग अल्लाह की ताक़त और उसकी क़ुदरत को न ठीक से देख पाए और न समझ पाए।

7: मुहम्मद (सल्ल) को यूँ तो कई निशानियाँ दी गई थीं, मगर मक्का के विश्वास न करनेवाले उनसे बराबर नए चमत्कार दिखाने की माँग किया करते थे, मगर क़ुरआन ने यह

बात साफ कर दी है कि जब तक अल्लाह न चाहे, कोई रसूल अपनी तरफ़ से चमत्कार नहीं दिखा सकता, वैसे भी उनका काम लोगों को (सच्चाई से) इंकार और बुरे कर्मों के नतीजे से सावधान करना है। 

8: अल्लाह सब जानता है कि माँ की कोख में जो बच्चा है, वह लड़का होगा या लड़की, लम्बा होगा या नाटा, स्वस्थ होगा या बीमार, और सबसे अहम बात कि बच्चे की तक़दीर में क्या है, इत्यादि। गर्भ [womb] के घटने और बढ़ने से मतलब यह है कि वह यह भी जानता है कि बच्चा कितने दिनों तक कोख में रहेगा। 

13: गरजते हुए बादल भी अल्लाह की बड़ाई का गुणगान करते रहते हैं, इसे literal अर्थ में भी लिया जा सकता है जिसे आम लोग नहीं समझते, देखें 17: 44. और इसका मतलब यह भी हो सकता है कि जो भी आदमी बादलों के गरज-चमक के कारणों पर और उसके होने वाले नतीजे पर ध्यान देगा कि किस तरह दुनिया के कोने-कोने में पानी पहुंचाने की व्यवस्था की गई है, तो वह हैरत में पड़कर उसके पैदा करने वाले की बड़ाई और गुणगान करने पर मजबूर हो जाएगा और समझ जाएगा कि उस मालिक को अपनी ख़ुदायी के लिए किसी साझेदार [Partner] की ज़रूरत नहीं है।   

16: चूँकि मक्का के बहुदेववादियों [Idolaters] के बारे में पता था कि अगर उनसे पूछा जाए कि आसमानों और ज़मीन को किसने पैदा किया, तो सिवाए "अल्लाह" कहने के उनके पास कोई और जवाब न था, इसीलिए उनसे यह पूछने को कहा गया। एक बार जब वे इस बात को मान गए तो फिर तो यह बेतुकी बात हुई कि अल्लाह को छोड़कर जिन देवताओं को उन्होंने अपना रखवाला बना रखा है, असल में उन्हें तो अपने आपको भी फ़ायदा या नुक़सान पहुँचाने की ताक़त नहीं है, तो वे दूसरों को क्या फ़ायदा पहुँचाएंगे। 

17: "झूठ" चाहे थोड़ी देर के लिए हावी भी हो जाए, मगर वह झाग की तरह गंदा व बेकार होता है और मिट जाता है, जबकि "सच्चाई" उस साफ़ पानी या शुद्ध धातु की तरह है जो फ़ायदामंद है और बाक़ी रहने वाला है। देखें 17:81. 

21: अल्लाह ने इंसानों से रिश्ता बनाए रखने पर ज़ोर दिया है, जिसमें अपने ख़ानदानी रिश्तेदारों के साथ और ग़रीबों और ज़रूरतमंदों के साथ रिश्ता निभाना ज़रूरी है। 

26: किसी को बहुत रोज़ी देना और किसी को तंगी देना, यह पूरी तरह से अल्लाह के हाथ में है, मगर अच्छी रोज़ी और ख़ुशहाली मिलने से यह शक नहीं होना चाहिए कि उसके कर्म को भी अल्लाह ने पसंद कर लिया हो, क्योंकि यह ज़रूरी नहीं है। इस तरह विश्वास न करनेवाले दुनिया की ज़िंदगी में मस्त रह सकते हैं मगर आनेवाली ज़िंदगी के मुक़ाबले यह थोड़ी देर का ही आराम है! 

31: यहाँ उन चमत्कारों का ज़िक्र किया गया है जिसकी मांग मक्का के विश्वास न करनेवाले लोग बराबर किया करते थे, वे मुहम्मद साहब को कहते थे कि अगर तुम मक्का के आसपास के जो पहाड़ हैं उनको हटा दो, या ज़मीन को फाड़कर उसमें से दरिया बहा दो या हमारे बाप-दादाओं को ज़िंदा करके उनसे हमारी बात करवा दो, तब हम तुम्हारी बातों पर ज़रूर ईमान लाएंगे। यहाँ अल्लाह ने बताया है कि अगर ये सारी मांगें पूरी कर भी दी जाएं, तब भी ये लोग हठधर्मी के चलते विश्वास नहीं करने वाले। इसी तरह की मांगों का ज़िक्र सूरह अल-इसरा (17: 90-93) में भी आया है। 

कभी-कभी ईमान रखनेवाले भी ऐसा सोचते थे कि अगर ये चमत्कार दिखा दिए जाते तो वे लोग विश्वास कर लेते। मगर उन्हें समझना चाहिए कि अल्लाह नहीं चाहता कि हर आदमी ज़बरदस्ती ईमान लाए, बल्कि दुनिया को एक इम्तिहान की जगह बनाया गया है जहाँ हर आदमी अपनी मर्ज़ी से सोच-समझकर फ़ैसला करे, उसे रास्ता दिखाने के लिए नबी और किताबें हैं, अब अगर वह सच्चाई पर विश्वास करके अच्छे काम करता है, तो उसे इनाम मिलेगा, और अगर वह अविश्वास पर अड़ा रहता है और बुरे कर्म करता है, तो उसे दंड झेलना होगा। 

33: जब कोई आदमी इस ज़िद्द पर अड़ा रहे कि जो कुछ भी वह कर रहा है, वही अच्छा काम है, और उसके मुक़ाबले में बड़ी से बड़ी दलील को भी सुनने और मानने के लिए तैयार न हो, तो अल्लाह उसको गुमराही में भटकता छोड़ देता है. और फिर उसके बाद कोई उसे सीधे रास्ते पर लाने वाला नहीं है।  

36: जिन लोगों को किताब [क़ुरआन] दी गई यानी मुहम्मद (सल्ल) के सहाबी [companions] और वे लोग जिन्होंने इसकी सच्चाई पर विश्वास कर लिया था, ऐसे लोग तो क़ुरआन की बातों से ख़ुश होते थे, मगर यहूदियों और ईसाइयों में कुछ गिरोह ऐसे थे जो क़ुरआन की उन बातों को तो मानते थे जो कि तोरात और बाइबिल के आदेशों से मिलती-जुलती थी, पर जो बातें ख़ासकर इस्लाम से जुड़ी हुई थीं, उन्हें इन लोगों ने मानने से इंकार कर दिया था, जैसे मुहम्मद (सल्ल) का पैग़म्बर [Prophet] होना।  

37: क़ुरआन अरबों की ज़बान में सच और झूठ के बीच फ़ैसला कर देनेवाली किताब है या यह कहें कि यह नियम-क़ायदे [Rulings] बताने वाली है। मगर इसका मतलब यह नहीं है कि मुहम्मद (सल्ल) केवल अरबों के लिए या जो अरबी [Arabic] जानते हैं, उन्हीं के लिए रसूल बनाकर भेजे गए थे, बल्कि वह सारे इंसानों के लिए रसूल बनाए गए थे (34:28).

क़ुरआन अरबी ज़बान में इसलिए उतरी, क्योंकि अल्लाह ने अपना संदेश लोगों तक पहुँचाने के लिए एक अरब के आदमी [मुहम्मद सल्ल] को रसूल बनाया, और हर रसूल अपनी क़ौम की ज़बान में ही संदेश देता है ताकि वह लोगों को बात ठीक ढंग से समझा सके (14:4). 

38: कुछ लोगों ने यह आपत्ति जतायी थी कि यह कैसा रसूल है जिसके बीवी-बच्चे हैं? क़ुरआन में दूसरी जगहों पर यह भी आया है कि यह कैसा रसूल है "जो खाता-पीता है और बाज़ारों में चलता-फिरता है!" (25:7) 

39: मूल किताब यानी "लौह ए महफ़ूज़" [Preserved Tablet] शुरू से अल्लाह के पास है, उसमें से हर ज़माने में लोगों के मार्गदर्शन के लिए किताबें उतरती रही हैं, और चूँकि हर ज़माने में हालात थोड़े बहुत बदलते रहते हैं, इसलिए पुराने हुक्मों में से कुछ को मिटा दिया जाता है और कुछ को वैसा ही छोड़ दिया जाता है। 

41: अरब में विश्वास न करने वालों का धीरे-धीरे प्रभाव घटता जा रहा था, पहले मदीना में मुसलमानों की आज़ाद हुकूमत बनीं और फिर आहिस्ता-आहिस्ता आसपास के इलाक़ों पर उनका दबदबा बढ़ता चला गया, इस तरह, मक्का के उन विश्वास न करने वालों की सीमाएं सिकुड़ती चली गईं।

 

 


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Surah/सूरह 1: Al-Fatiha/अल-फ़ातिहा [(किताब की) शुरुआत/ The Opening]

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