Saturday, November 24, 2018

Surah/सूरह 5 : अल- माइदा [Al- Ma’ida / The Table Spread With Food / तरह-तरह के खाने से भरा थाल]

सूरह 5: अल-माइदा [Al-Ma’ida]
[The Table Spread With Food/ तरह-तरह के खाने की दावत]




01-05: दायित्वों को पूरा करने, खाना-पीना, हज की रीतियाँ, और शादी-ब्याह से जुड़े नियम-क़ायदे  

06-07: नमाज़ पढ़ने से पहले की तैयारी 

08-10: बिना किसी का पक्ष लिए सच्ची गवाही देना 

11   : अल्लाह ने ख़तरा टाल दिया 

12-19: किताबवाले लोगों की कड़ी निंदा 

20-26: इसराईल की संतानों ने पवित्र भूमि में दाख़िल होने से इंकार कर दिया

27-31: आदम (अलै) के दो बेटों की कहानी 

32   : क़त्ल करने की सज़ा 

33-34: अल्लाह और उसके रसूल के ख़िलाफ़ लड़ने की सज़ा 

35-37: अल्लाह के रास्ते में लड़ना 

38-40: चोरी की सज़ा 

41-43: अविश्वास के माहौल में रसूल का उत्साह बढ़ाना 

44-47: तौरात और इंजील 

48-50: रसूल की किताब 

51-53: यहूदियों और ईसाइयों के गठ-जोड़ के ख़िलाफ़ ख़तरा 

54-56: अपने दीन को छोड़ने पर चेतावनी 

57-66: दीन का मज़ाक़ उड़ाने वालों के ख़िलाफ़ चेतावनी 

67-69: किताबवाले लोगों से अपील 

70-71: इसराईल की संतानों की कड़ी निंदा 

72-77: ईसाई ट्राइनिटी के सिद्धांत के ख़िलाफ़ कड़ी निंदा 

78-81: इसराईल के संतानों में से कुछ को दाऊद और ईसा (अलै) ने ठुकरा दिया

82-86: यहूदियों और बहुदेववादियों से ज़्यादा ईसाईमुसलमानों के प्रति नरम हैं   

87-96: खाना-पीना, क़समें, शराब और जुए के बारे में नियम-क़ायदे 

97-99: अल्लाह ने काबा को स्थापित किया 

100  : बुराई और अच्छाई कभी बराबर नहीं होती 

101-102: ज़्यादा खोद-खोदकर सवाल पूछने से मना किया गया 

103-105: बहुदेववादियों की कड़ी निंदा 

106-108: वसीयत बनाते समय गवाह रखने का आदेश 

109   : रसूलों से पूछताछ होगी 

110   : ईसा (अलै) के चमत्कार 

111-115: खाने से भरा थाल भेजने का चमत्कार 

116-120: ईसा (अलै) ने अपनी और अपनी माँ की पूजा करने को कभी नहीं कहा था 

  


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यन्त दयावान है

ऐ ईमानवालो! अपने (धार्मिक) दायित्वों [obligations] को पूरा करो। मवेशी चौपाये (का मांस) खाना तुम्हारे लिए वैध [हलाल/ lawful] कर दिया गया है, सिवाए उनके जो तुम्हें आगे बताया जा रहा है। (याद रहे), जब तुम हज/ उमरे की (तीर्थ) यात्रा पर रहो, तो (इहराम की हालत में) शिकार करना तुम्हारे लिए वैध नहीं [हराम] है------- अल्लाह जैसा चाहता है, आदेश देता है,  (1)

अत: ऐ ईमानवालो! तुम अल्लाह की निशानियों [हज से जुड़े संस्कारों, रीति-रिवाजों] का अनादर न करो, न उन (चार) महीनों का जो पवित्र ठहराये गए हैं, न क़ुर्बानी के जानवरों का, न उन जानवरों के गले में पड़े हुए पट्टों का, और न उन लोगों का जो अपने रब के फ़ज़ल [bounty] और उसकी ख़ुशी की चाह में पवित्र घर [काबा] को जा रहे हों------- मगर जब तुम हज से जुड़ी रीतियों को पूरा कर चुको, तब शिकार कर सकते हो। और (देखो!), जिन लोगों ने (हुदैबिया की संधि के समय) तुम्हें उस पवित्र मस्जिद [काबा] में (हज के लिए) जाने से रोक दिया था, उनसे तुम्हारी नफ़रत कहीं तुम्हें इस बात पर न उभार दे कि तुम नियमों को तोड़ डालो: भलाई के कामों को करने और बुराई के कामों से बचने में एक दूसरे की मदद किया करो; गुनाह के काम करने और ज़ुल्म व अत्याचार के कामों में (कभी भी) एक दूसरे की मदद न करो। अल्लाह (के आदेश न मानने के नतीजे) से डरो, क्योंकि उसकी सज़ा बड़ी कठोर होती है। (2)

[मुसलमानो!], तुम्हारे लिए (खाने की) ये चीज़ें हराम [Forbidden] कर दी गयी हैं: मरे हुए जानवर का (सड़ा-गला) मांस; ख़ून; सूअर का मांस, कोई भी जानवर जिस पर (काटते समय) अल्लाह को छोड़कर किसी और का नाम लिया गया हो; कोई भी जानवर जिसका गला घोंटकर मारा गया हो, या ज़ोरदार चोट खाकर मर गया हो, या ऊँचाई से गिरकर या सींग लगने से मरा हो या जिसे किसी हिंसक पशु ने फाड़ खाया हो--- मगर हाँ, वह (हराम नहीं) जिसे (मरने से पहले) तुमने (सही तरीक़े से) ज़बह कर लिया हो; और (किसी जानवर का मांस) जो मूर्तिपूजकों के बलि देने की जगह पर काटा गया हो, हराम [Forbidden] है। तुम्हारे लिए यह भी हराम किया जाता है कि लोगों के बीच (मांस के) हिस्सों का बंटवारा निशान लगी हुई जुए की तीरों से किया जाए----- यह बड़े गुनाह की रीति है ----- आज (सच्चाई से) इंकार करनेवाले इस बात की सारी उम्मीद छोड़ चुके हैं कि तुम अपना धर्म छोड़ दोगे। अत: उनसे न डरो: मुझसे डरो। आज के दिन मैंने तुम्हारे दीन को तुम्हारे लिए (हर तरह से) पूरा कर दिया, तुम पर अपनी नेमत पूरी कर दी और मैंने तुम्हारे दीन के रूप में "इस्लाम" [एक अल्लाह पर पूरी भक्ति] को पसन्द कर लिया: लेकिन अगर तुममें से कोई भूख से ऐसा मजबूर हो जाए कि उसे हराम चीज़ें खानी पड़ जाएं, तो अगर उसका इरादा गुनाह करने का नहीं था, तो (कोई बात नहीं) अल्लाह बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है।  (3)


[ऐ रसूल!], वे आपसे पूछते हैं कि "क्या क्या चीज़ें उनके खाने के लिए हलाल [वैध/ lawful] हैं?" कह दें, "सारी अच्छी चीज़ें तुम्हारे लिए हलाल हैं।" (इनमें वह भी शामिल हैं) जिन शिकारी चिड़ियों और जानवरों को तुमने शिकार पकड़ने के लिए सधा रखे हों, फिर जैसे अल्लाह ने तुम्हें सिखा दिया है, उन्हें भी सिखा दो, अत: वे जिस जानवर को (शिकार करके) तुम्हारे लिए बचाए रखें, उसको (बिना झिझक) खा सकते हो, मगर (शिकारी जानवर को शिकार के लिए छोड़ते हुए) अल्लाह का नाम ले लिया करो। अल्लाह (के हुक्म को न मानने के नतीजे) से डरते रहो: (याद रहे) अल्लाह (कर्मों का) हिसाब लेने में बहुत तेज़ है।" (4

आज सारी अच्छी चीज़ें तुम्हारे लिए हलाल कर दी गयी हैं, जिन [यहूदी व ईसाई] लोगों को (तुमसे) पहले (आसमानी) किताब दी गयी थी, उनका खाना तुम्हारे लिए हलाल है और तुम्हारा खाना उनके लिए हलाल है। इसी तरह, शरीफ़ और ईमानवाली औरतें तुम्हारे लिए हलाल हैं, और साथ में, जिन्हें तुमसे पहले किताब दी गयी थी [यहूदी व ईसाई], उन लोगों की भी शरीफ़ औरतें तुम्हारे लिए हलाल हैं, शर्त यह है कि तुमने उनकी मेहर [bride-gifts] अदा कर दी हो और उनसे शादी की हो। (ध्यान रहे), न तो इसका मक़सद (बिना निकाह के) प्यार-मोहब्बत करना हो, और न ही चोरी-छिपे रखैलों को रखने का होना चाहिए। जिस किसी ने (सच्चाई पर) विश्वास करने से इंकार किया, उसका सारा किया-धरा (कर्म) बेकार हो गया, और आख़िरत [परलोक] में वह घाटा उठाने वालों में गिना जाएगा। (5)


ऐ ईमान रखनेवालो! जब तुम नमाज़ के लिए उठो तो अपने चहरों को और हाथों को कुहनियों तक धो लिया करो और अपने सिरों पर हाथ फेर लो और अपने पैरों को भी टखनों तक धो लो। और अगर (सेक्स करने या वीर्य/Semen निकल जाने के कारण) तुम नापाक हो गए हो, तो अच्छी तरह (नहा-धोकर) पाक हो जाओ। अगर तुममें से कोई बीमार हो, या सफ़र में हो, या शौच करके आया हो या उसका किसी औरत से शारीरिक मिलन हुआ हो, और फिर पानी न मिले तो थोड़े सी साफ़ मिट्टी को लेकर उसे अपने मुँह और हाथों पर फेर लो। अल्लाह तुम पर किसी तरह का बोझ डालना नहीं चाहता: वह तो केवल तुम्हें पाक-साफ़ करना (और हराम चीज़ों से बचाना) चाहता है और तुम पर अपनी नेमत [हिदायत] पूरी कर देना चाहता है, ताकि तुम शुक्र अदा करनेवाले बनो। (6

याद करो उन नेमतों Blessings] को, जो अल्लाह ने तुम पर उतारीं, और वह वचन जिससे तुम्हें बाँधा गया था, जबकि तुमने कहा था: "हमने सुना और हमने (आदेश) मान लिया।" अल्लाह से डरते रहो: वह दिलों के अंदर छिपे हुए राज़ की भी पूरी जानकारी रखता है। (7)

ऐ ईमानवालो! तुम अल्लाह की भक्ति में मज़बूती से जमे रहो और निष्पक्ष होकर गवाही देने वाले बनो: ऐसा नहीं होना चाहिए कि दूसरों के प्रति नफ़रत तुम्हें इस बात पर उभार दे कि तुम न्याय करना छोड़ दो। बल्कि हर हाल में न्याय करो, कि यह अल्लाह का डर रखने के ज़्यादा निकट है। अल्लाह से डरते रहो: जो कुछ भी तुम करते हो, अल्लाह उसकी ख़बर रखता है।  (8)

जिस लोगों ने (सच्चाई पर) विश्वास किया [ईमान] और अच्छे कर्म किए, उनके लिए (गुनाहों की) माफ़ी और बड़े इनाम का अल्लाह ने वादा कर रखा है;  (9)

जिन्होंने विश्वास करने से इंकार किया और हमारी आयतों को ठुकरा दिया, वे (जहन्नम की) भड़कती हुई आग में पड़ने वाले हैं।  (10


ऐ ईमानवालो! तुम अल्लाह की उस मेहरबानी को याद करो जो उसने तुम पर किया था, जब कुछ लोग तुम्हारे ख़िलाफ़ (ज़ुल्म करने और मार डालने के लिए) हाथ उठाने वाले थे, और अल्लाह ने उनके हाथ (तुम तक पहुँचने से) रोक दिए थे। अत: अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते रहो: ईमानवालों को अल्लाह ही पर भरोसा करना चाहिए। (11)


अल्लाह ने इसराईल की सन्तान से वचन लिया था। हमने (उनके बारह क़बीले के लिए) उनके बीच से बारह सरदार खड़ा किए, और अल्लाह ने कहा था, "मैं तुम्हारे साथ हूँ: अगर तुम पाबंदी से नमाज़ पढ़ो, निर्धारित ज़कात दो, मेरे रसूलों पर विश्वास करो और उनका साथ दो, और (मेरे रास्ते में ख़र्च करके बाद में कई गुना ज़्यादा पाने के लिए) अल्लाह को अच्छा क़र्ज़ दो, तो मैं तुम्हारे गुनाहों को मिटा दूँगा, और तुम्हें (जन्नत के) ऐसे बाग़ों में दाख़िल करूँगा, जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी, तुममें से कोई भी अगर अब भी इस (वचन) को नज़रअंदाज़ करता है, तो वह सही रास्ते से बहुत दूर जा पड़ेगा।" (12)

मगर उन लोगों ने अपने वचन तोड़ दिए, तो फिर हमने उन्हें (अपनी रहमत से) दूर कर दिया, और उनके दिल कठोर कर दिए। वे (उतारी गयी किताब के) शब्दों में हेर-फेर करके उसके अर्थ को बिगाड़ देते हैं, और जो चीज़ उन्हें याद रखने के लिए बोली गयी थी, उसमें से एक बड़ा हिस्सा तो वे बिल्कुल भुला बैठे हैं: (ऐ रसूल) आप उनके कुछ लोगों को छोड़कर बाक़ी सारे लोगों में धोखा देने की प्रवृत्ति पाएंगे। आप इस पर ध्यान न दें, और उन्हें माफ़ कर दें: अल्लाह उन्हें पसंद करता है जो अच्छा कर्म करते हैं। (13)
 
हमने उन लोगों से भी वचन लिया था, जो कहते हैं, "हम ईसाई [Christians] हैं", मगर वे भी उनमें से कुछ चीज़ों को भुला बैठे जिसे उन्हें याद रखने के लिए बोला गया था, अत: हमने उनके बीच क़यामत तक के लिए (आपस में) दुश्मनी और नफ़रत की आग भड़का दी, जब अल्लाह उन्हें बता देगा, जो कुछ उन्होंने किया होगा।  (14)
 
ऐ किताबवालो [यहूदियों व ईसाइयों]! हमारा रसूल तुम्हारे पास आ चुका है, ताकि वह तुम्हें (आसमानी) किताब की बहुत सी बातों को समझा सके जो तुम लोगों ने छिपा रखी थीं, और (जो कुछ तुमने किया है), उनमें से बहुत सी चीज़ों को नज़रअंदाज़ [overlook] कर सके। तुम्हारे पास अल्लाह की तरफ़ से (रसूल के रूप में) एक रौशनी आ चुकी है, और साथ में चीज़ों को स्पष्ट कर देनेवाली एक किताब [क़ुरआन] भी, (15

जिसके द्वारा अल्लाह उन लोगों को सलामती की राह दिखाता है, जो ऐसी चीज़ के पीछे चलते हैं जिससे अल्लाह ख़ुश होता है, जो उन्हें अल्लाह की मर्ज़ी से, अँधेरों से बाहर निकालकर रौशनी की तरफ़ लाता है, और उन्हें सीधा रास्ता दिखाता है। (16

जो लोग कहते हैं, "अल्लाह तो वही मरयम [Mary] का बेटा मसीह [Jesus] है", वे तो खुले-आम सच्चाई को झुठला रहे हैं। कह दें, "अगर अल्लाह मरयम के बेटे, मसीह को, साथ में उसकी माँ को और ज़मीन पर बसने वाले बाक़ी सबको बर्बाद करना चाहे, तो क्या कोई भी उसे ऐसा करने से रोक सकता है? आसमानों और ज़मीन और जो कुछ उसके बीच में है, उसका सारा नियंत्रण अल्लाह ही के क़ब्ज़े में है: वह (बिना बाप के मसीह की तरह) जैसा चाहता है, पैदा करता है। अल्लाह को हर चीज़ (करने) की ताक़त है।" (17)

यहूदी और ईसाई कहते हैं, "हम तो अल्लाह के बच्चे और उसके चहेते हैं।" कह दें, "तो फिर वह तुम्हारे गुनाहों पर तुम्हें दंड क्यों देता है? बात यह नहीं है, बल्कि तुम एक मामूली आदमी हो, जो उसकी पैदा की हुई सृष्टि का एक हिस्सा है: वह जिसे चाहता है, क्षमा कर देता है और जिसे चाहता है, दंड देता है।" आसमानों और ज़मीन और जो कुछ उसके बीच में हैं, हर चीज़ का नियंत्रण अल्लाह ही के हाथ में है: सबको अंत में उसी के पास पहुंचना है। (18

ऐ किताबवालो! हमारे रसूलों के आने का सिलसिला एक मुद्दत से बन्द था, मगर अब तुम्हारे पास हमारा रसूल आ गया है, ताकि तुम्हारे लिए वह (हमारे आदेशों को) स्पष्ट कर दे और तुम यह न कह सको कि "हमारे पास (नेक काम की) ख़ुशख़बरी देनेवाला और (बुरे कर्मों के नतीजे से) सावधान करनेवाला कोई नहीं आया।" तो देखो! अब तुम्हारे पास ख़ुशख़बरी देनेवाला और सावधान करनेवाला आ चुका है: अल्लाह को हर चीज़ करने की शक्ति है। (19) 


मूसा [Moses] ने अपनी क़ौम के लोगों से कहा था, "ऐ लोगो! तुम पर की गयी अल्लाह की नेमतों को याद करो: कैसे उसने तुम्हारे बीच से नबियों [Prophets] को खड़ा किया और तुम्हें बादशाह बनाया और (उस ज़माने में) तुमको कुछ ऐसी चीज़ें दीं, जो किसी और क़ौम के लोगों को नहीं मिली थीं। (20)

"ऐ मेरे लोगो! इस पवित्र सरज़मीन [सीरिया व फ़िलिस्तीन क्षेत्र] में (हिम्मत करके) दाख़िल हो जाओ, जो अल्लाह ने तुम्हारे लिए पहले से तय कर रखा है------  (देखो!) उल्टे पाँव न लौट आओ, वर्ना नुक़सान उठाने वालों में हो जाओगे।" (21

लोगों ने (जवाब में) कहा, "ऐ मूसा! इस सरज़मीन पर तो बड़े ताक़तवर (और डरावने) लोग रहते हैं। जब तक वे लोग वहाँ से चले नहीं जाते, हम तो वहाँ क़दम रखने वाले नहीं। हाँ, अगर वे वहाँ से निकल जाएँ, तो हम ज़रूर दाख़िल हो जाएँगे।" (22)

तब भी, उन डरनेवाले लोगों में से दो आदमियों ने जिन्हें अल्लाह ने (ईमान की) नेमत दी थी, बोल उठे, "तुम हिम्मत करके उन पर चढ़ाई कर दो और (शहर के) दरवाज़े से जा घुसो और एक बार तुम अंदर घुस गए, तो जीत तुम्हारी ही होगी। अगर तुम पक्के ईमानवाले हो, तो अल्लाह पर भरोसा रखो।" (23)

उन लोगों ने कहा, "ऐ मूसा! जब तक वे लोग वहाँ हैं, हम तो वहाँ कभी दाख़िल नहीं होंगे। अगर लड़ना ही है तो तुम और तुम्हारा रब, दोनों वहाँ जाकर उनसे लड़ते रहना, हम तो यहीं बैठे रहेंगे।" (24

मूसा ने कहा, "मेरे रब! मुझे अपने और अपने भाई के अलावा किसी और पर कोई अधिकार नहीं है: हम दोनों और इन आज्ञा न माननेवालों के बीच अब तू ही फ़ैसला कर।" (25

अल्लाह ने कहा, "ठीक है, तो अब उनके लिए चालीस साल तक इस ज़मीन पर जाने से रोक लगा दी गयी है: (इस दौरान) ये धरती पर मारे-मारे फिरेंगे, सो (ऐ मूसा!) जो लोग आज्ञा नहीं मानते, उनकी हालत पर शोक न करो।" (26)


[ऐ रसूल!], आप उन्हें आदम के दो बेटों की कहानी की सच्चाई के बारे में बता दें: दोनों ने (अल्लाह के सामने) अपनी-अपनी क़ुर्बानी पेश की, उनमें से एक [हाबील/ Abel] की क़ुर्बानी क़बूल हो गई और दूसरे [क़ाबील/ Cain] की क़बूल नहीं हुई। इस पर (क़ाबील ने जलते हुए हाबील से) कहा, "मै तुझे अवश्य मार डालूँगा।" मगर हाबील ने कहा, "अल्लाह तो उन्हीं की क़ुर्बानी क़बूल करता है, जो उससे डरते हुए बुराइयों से बचते हैं। (27

अगर तू मुझे क़त्ल करने के लिए हाथ उठाएगा, तो मैं तुझे मारने के लिए अपना हाथ नहीं उठाउँगा। मैं डरता हूँ अल्लाह से, जो सारे संसार का रब है,  (28

मैं तो चाहता हूँ कि तू मेरे गुनाह और साथ में अपने गुनाहों का बोझ अपने ही सिर ले ले, और (जहन्नम) की आग में बसने वालों में से हो जा: शैतानियाँ करने वालों का बदला ऐसा ही होता है।" (29

मगर उसकी आत्मा ने उसे अपने भाई की हत्या के लिए उकसाया: उसने अपने भाई (हाबील) की हत्या कर डाली और हारे हुए लोगों में शामिल हो गया।  (30)

तब अल्लाह ने एक कौआ भेजा जो ज़मीन कुरेदने लगा, ताकि उसे दिखा दे कि वह अपने भाई की लाश को कैसे छिपाए। यह देखकर (क़ाबील) कहने लगा, "हाय, अफ़सोस मुझ पर! क्या मैं इस कौए जैसा भी न हो सका कि अपने भाई की लाश (ज़मीन खोदकर) छिपा देता?" (अपनी हालत पर) बाद में वह बहुत शर्मिंदा हुआ। (31)

इसी के चलते, हमने इसराईल की सन्तान के लिए यह आदेश लिख दिया था कि अगर कोई आदमी किसी को क़त्ल कर डालता है, तो मानो उसने सारे इंसानों का ख़ून कर दिया, और जिस किसी ने किसी आदमी की जान बचा ली, तो मानो उसने सारे इंसानों की ज़िंदगी बचा ली ------सिवाय इसके कि यह हत्या किसी और की जान के बदले में हो, या देश में लूट-मार मचाने वालों को सज़ा देने के लिए की गयी हो। हमारे रसूल उनके पास स्पष्ट प्रमाणों के साथ आते रहे (और ज़ुल्म करने से रोकते रहे), मगर फिर भी उनमें बहुत-से लोग ऐसे निकले जो ज़मीन पर ज़्यादतियाँ करते ही रहे।  (32

जो लोग अल्लाह और उसके रसूल के विरुद्ध जंग करते हैं और ज़मीन पर फ़साद फैलाने के लिए (डाकू, लुटेरे बनकर) दौड़ते फिरते हैं, (जुर्म के अनुसार) उनकी सज़ा तो यही है कि क़त्ल कर दिए जाएं या सूली पर चढ़ाए जाएँ या उनके हाथ-पाँव विपरीत दिशाओं में काट डाले जाएँ [बायाँ हाथ और दायाँ पाँव या दायाँ हाथ और बायाँ पाँव] या उन्हें देश-निकाला दे दिया जाए: यह अपमान और तिरस्कार तो इस दुनिया के लिए है, और फिर परलोक में भी उनके लिए बड़ी भयानक यातना है,  (33)

मगर (हाँ), इससे पहले कि तुम उन पर क़ाबू पाते हुए गिरफ़्तार कर लो, अगर वे (अपने गुनाहों से) तौबा कर लें------- तो ऐसी हालत में तुम्हें ध्यान रहे कि अल्लाह बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है।  (34)

ऐ ईमान रखनेवालो! अल्लाह (की आज्ञा न मानने के नतीजे) से डरते रहो, और अल्लाह के नज़दीक पहुँचने का ज़रिया ढूंढो, और उसके मार्ग में जी-तोड़ संघर्ष करो, ताकि तुम्हें कामयाबी मिल सके। (35)

अगर विश्वास न करने वालों के हाथ में वह सब कुछ (धन-दौलत) आ जाए जो सारी ज़मीन में है और उतना ही और भी (कहीं से) पा लें, फिर वे ये सब कुछ क़यामत के दिन की यातना से बचने के लिए अपनी जान के बदले में देने को तैयार हों, तब भी उनकी ये चीज़ें स्वीकार नहीं की जाएँगी---- उन्हें दर्दनाक यातना होगी।  (36)

वे चाहेंगे कि (जहन्नम की) आग से बाहर निकल आएँ, मगर वे उससे निकल नहीं सकेंगे: उनके लिए कभी न ख़त्म होने वाली यातना है। (37)

चोर चाहे मर्द हो या औरत, उसके हाथ काट डालो, जो कुछ उन्होंने किया है यह उसकी सज़ा है और अल्लाह की ओर से इस (बुराई) को रोकने का एक तरीक़ा: अल्लाह सब पर प्रभुत्व रखनेवाला, (और आदेश देने में) समझ-बूझ रखनेवाला है।  (38

लेकिन अगर किसी ने अपने बुरे काम [चोरी] से (दिल से) तौबा कर ली और अपनी ग़लतियों को सुधार लिया, तो अल्लाह उसकी तौबा क़बूल कर लेगा: अल्लाह बड़ा माफ़ करनेवाला, दयावान है। (39

[ऐ रसूल!], क्या आप नहीं जानते कि आसमानों और ज़मीन का सारा नियंत्रण [बादशाही] केवल अल्लाह के पास है? वह जिसे चाहे यातना दे और जिसे चाहे माफ़ कर दे: अल्लाह को हर चीज़ करने की शक्ति है। (40)

ऐ रसूल! जो लोग (सच्चाई पर) विश्वास न करने में एक दूसरे को पीछे छोड़ देने की दौड़ में लगे हैं, उनके लिए आप दुखी न हों----- वे (पाखंडी) लोग जो अपने मुँह से कहते हैं, "हमने विश्वास कर लिया," मगर (असल में) उनके दिल में थोड़ा भी ईमान नहीं, वे यहूदी लोग जो झूठी बातें कान लगाकर सुनते हैं और वे लोग जो तुम्हारे पास आकर मिले तक नहीं, वे (तौरात के) शब्दों में हेर-फेर करके उसके अर्थ बिगाड़ देते हैं और (एक दूसरे से) कहते हैं, "(जो तौरात का आदेश हमने बताया है) अगर वैसा ही आदेश तुम्हें (मुहम्मद साहब से) मिले, तो इसे मान लेना और अगर वैसा आदेश न मिले, तो बचकर रहना!"-----(इनकी हरकत देखकर) अगर अल्लाह ही चाहे कि ऐसे लोगों को भटकता छोड़ दे, तो अल्लाह के सामने आपका कोई बस नहीं चलेगा कि आप उनके लिए कुछ कर पाएं। ये वही लोग हैं जिनके दिलों (के मैल) को अल्लाह साफ़ करना नहीं चाहता। इनके लिए इस संसार में भी अपमान और तिरस्कार है और फिर आख़िरत [परलोक] में भी बड़ी भारी यातना है -------  (41)

वे झूठी बातें कान लगा-लगाकर सुनते हैं, और बुरे तरीक़ों से (हराम का) माल खाते हैं। [ऐ रसूल], अगर वे आपके पास (किसी मामले का) फ़ैसला कराने के लिए आएं, तो आप या तो उनके बीच फ़ैसला कर दें या चाहें तो मना कर दें ---- अगर आप (फैसला करने से) मना कर दें, तो वे आपका कुछ भी बिगाड़ नहीं सकते, लेकिन अगर आप उनके बीच फ़ैसला करें, तो इंसाफ़ के साथ फ़ैसला करें: अल्लाह इंसाफ़ करने वालों को पसंद करता है------ (42) 

मगर वे आपके पास फ़ैसला कराने के लिए आते ही क्यों हैं, जबकि उनके पास तौरात [Torah] है, जिसमें अल्लाह का हुक्म मौजूद है, इसके बावजूद वे (तौरात के आदेश से) मुँह मोड़ते हैं? असल में वे ईमान नहीं रखते। (43

इसमें संदेह नहीं कि हमने तौरात उतारी, जो रास्ता दिखानेवाली और रौशनी फैलानेवाली थी, और अल्लाह के नबी [Prophets] जो उसकी आज्ञा माननेवाले थे, इसी के (हुक्म के) अनुसार यहूदियों के लिए फ़ैसला किया करते थे। इसी तरह, सभी संतों [rabbis] और किताबों के ज्ञानियों [scholars] ने भी अल्लाह की किताब के उस हिस्से के मुताबिक़ ही फ़ैसले दिए जिसको सुरक्षित रखने की ज़िम्मेदारी उन्हें सौंपी गयी थी, और वे उसके (आदेशों पर) गवाह भी थे। अत: [ऐ अल्लाहवालो और ज्ञानियों], लोगों से न डरो, बल्कि मुझ से डरो; मेरे संदेशों को (दुनिया के फ़ायदे के लिए) सस्ते दामों में न बेच दो; (याद रखो!), जो लोग अल्लाह के उतारे हुए विधान के अनुसार फ़ैसला न करें, तो ऐसे लोग (अल्लाह की शिक्षाओं को) ठुकरानेवाले [काफ़िर] हैं।  (44

हमने तौरात में यहूदियों के लिए (हुक्म) निर्धारित कर दिया था कि जान के बदले जान, आँख के बदले आँख, नाक के बदले नाक, कान के बदले कान, दाँत के बदले दाँत, ज़ख्म के बदले वैसा ही ज़ख़्म होगा: अगर कोई भलाई की नीयत से अपना बदला लेना माफ़ कर दे, तो यह उसके लिए (बुरे कर्मों का) प्रायश्चित होगा। जो लोग अल्लाह के उतारे गए विधान के अनुसार फ़ैसला नहीं करते, वे लोग बड़े ज़ालिम हैं।  (45)

और फिर (उन नबियों के बाद) उन्हीं के बताए हुए रास्ते पर हमने मरयम के बेटे, ईसा (Jesus) को भेजा, ताकि उससे पहले उतरी हुई किताब 'तौरात' [Torah] की सच्चाई की पुष्टि हो जाए: हमने उसे इंजील [Gospel] दी, रास्ता दिखानेवाली, रौशनी फैलानेवाली, और अपने से पहली उतरी किताब तौरात की पुष्टि करनेवाली ------ जो अल्लाह का डर रखनेवालों के लिए (अच्छाई का) रास्ता दिखानेवाली और नसीहत बनकर आयी थी। (46

अतः इंजील के माननेवालों को चाहिए कि उसी के विधान के अनुसार फ़ैसला करें, जो अल्लाह ने उसमें उतारा है। (याद रखो!) जो कोई अल्लाह की उतारी हुई किताब के अनुसार फ़ैसला न करे, तो ऐसे ही लोग नियमों को तोड़ने वाले हैं।  (47)

[ऐ मुहम्मद] हमने आपके पास यह किताब [क़ुरआन] सच्चाई के साथ भेजी है, जो इससे पहले आयी हुई सारी आसमानी किताबों की पुष्टि करती है, और जो उन सब पर निर्णायक [final authority] की हैसियत रखती है: अतः जो हुक्म अल्लाह ने उतारा है, आप उसी के मुताबिक़ लोगों के बीच फ़ैसला करें। जो सच्चाई आपके पास आ चुकी है उससे हटकर उनकी इच्छाओं के पीछे न चलें। तुममें से हर एक गिरोह के लिए हमने अलग-अलग 'एक क़ानून' [शरीअत] और 'एक रास्ता' [तरीक़ा] निश्चित कर दिया है। अगर अल्लाह चाहता तो तुम सबको एक समुदाय बना देता, मगर वह चाहता था कि जो कुछ उसने तुम्हें दिया है, उसके द्वारा वह तुम्हारी परीक्षा ले, अतः भलाई के कामों में एक-दूसरे से आगे निकलने की कोशिश करो: तुम सबको अल्लाह के पास लौटकर जाना है, फिर वह तुम्हें बता देगा कि जिन मामलों में तुम मतभेद रखते थे, उसकी हक़ीक़त क्या थी। (48)

अत: [ऐ रसूल], जो कुछ अल्लाह ने आप पर उतारा है, उसी के अनुसार आप उन लोगों के बीच फ़ैसला करें। उनकी इच्छाओं के पीछे न चलें, और उनकी तरफ़ से सावधान रहें कि कहीं ऐसा न हो कि वे आपको धोखे में डालकर किसी ऐसे हुक्म से हटा दें, जो अल्लाह ने आप पर उतारा है। फिर अगर वे (अल्लाह के हुक्म से) मुँह मोड़ें, तो याद रखें कि उनके द्वारा किए गए कुछ गुनाह के कारण अल्लाह उन्हें सज़ा देना चाहता है: इनमें से बहुत सारे लोग नियमों को तोड़ने वाले हैं। (49

अब क्या वे ऐसा फ़ैसला चाहते हैं जो जाहिलियत [ignorance] के ज़माने के नियमों के अनुसार हो? पक्का ईमान रखनेवालों के लिए क्या कोई अल्लाह से बेहतर फ़ैसला करनेवाला हो सकता है? (50)

ऐ ईमानवालो! तुम यहूदियों और ईसाइयों को (जो तुम्हारी दुश्मनी में लगे हैं) अपना साथी व संरक्षक न बनाओ: वे केवल एक-दूसरे के साथी हैं। अब जो कोई उनको अपना संरक्षक बनाएगा, तो वह उन्हीं लोगों में से समझा जाएगा ----- अल्लाह ऐसा ज़ुल्म करने वालों को मार्ग नहीं दिखाता-------- (51

इसके बावजूद, [ऐ रसूल], आप देखेंगे कि जिनके दिलों में रोग है, वे अपनी हिफ़ाज़त के लिए यह कहते हुए उनके पास दौड़े हुए जाते हैं कि, "हमें डर है कि कहीं हमारा भाग्य, हमारे ही विरुद्ध न हो जाए।" मगर हो सकता है कि अल्लाह तुम्हारे लिए जीत ले आए या उसकी ओर से कोई और बात सामने आ जाए: फिर तो ये लोग जो कुछ राज़ अपने जी में छिपाए हुए थे, उसपर अफ़सोस करेंगे, (52

और उस समय ईमानवाले कहेंगे, "क्या ये वही लोग हैं जो अल्लाह की कड़ी-कड़ी क़समें खाकर विश्वास दिलाते थे कि हम तुम्हारे साथ हैं?" इनका किया-धरा सब बेकार गया: वे सब कुछ खो बैठे हैं।  (53)

ऐ ईमान रखनेवालो! तुममें से जो कोई अगर अपने पिछले धर्म की ओर लौटता है (और उन्हें अपना मददगार बनाता है), तो अल्लाह जल्द ही तुम्हारे बदले में ऐसे लोगों को ले आएगा जिन्हें वह पसंद करता है और वे उसे पसंद करते हों, वे ईमानवालों के साथ नर्मी से पेश आएंगे और विश्वास न करनेवालों के साथ कठोरता अपनाएंगे, और वे बिना बुरा-भला कहने वालों की परवाह किए, अल्लाह की राह में जी-तोड़ संघर्ष करेंगे। यह है अल्लाह का फ़ज़ल [bounty], वह जिसे चाहता है प्रदान करता है। अल्लाह के पास कभी न ख़त्म होने वाला फ़ज़ल भी है और ज्ञान भी।  (54

तुम्हारे सच्चे संरक्षक व मददगार तो अल्लाह, उसका रसूल और वे ईमानवाले हैं ---- जो पाबंदी से नमाज़ पढ़ते हैं, निर्धारित ज़कात देते हैं, और बंदगी में झुके रहते हैं।  (55)

जो लोग अपनी हिफ़ाज़त के लिए अल्लाह, उसके रसूल और ईमानवालों की तरफ़ झुकते हैं, [वे अल्लाह के दलवाले हैं]: और अल्लाह के दलवालों की जीत निश्चित है। (56)

ऐ ईमानवालो! तुम उन्हें अपना साथी व संरक्षक न बनाओ, जो तुम्हारे दीन को अपमानित करते हैं, और उसकी हँसी उड़ाते हैं ----- चाहे वे लोग हों जिन्हें तुमसे पहले किताब दी गई थी, या विश्वास न करनेवाले लोग हों ---- और अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते रहो, अगर तुम सच्चे ईमानवाले हो। (57)

जब तुम नमाज़ के लिए (अज़ान) पुकारते हो, तो वे उसे तमाशा बनाते हैं, और उसकी हँसी उड़ाते हैं: यह इस कारण से है कि ये लोग बुद्धि से काम नहीं लेते। (58)

[ऐ रसूल], आप कह दें, "ऐ किताबवालो! हमें नापसंद करने का तुम्हारे पास और तो कोई कारण नहीं है सिवाय इसके, कि हम अल्लाह पर ईमान रखते हैं, और उस (सच्चाई) पर ईमान रखते हैं जो हम पर उतारी गई, और उस पर भी जो हमसे पहले उतारी जा चुकी हैं, जबकि तुममें से ज़्यादातर लोग (तौरात की) आज्ञाओं का पालन नहीं करते?" (59)

आप कहें, "क्या मैं बताऊँ कि (तुम जो हमारे लिए सज़ा चाहते हो, उससे) कहीं बुरी सज़ा का हक़दार कौन है? वे लोग जिनसे अल्लाह ने अपने आपको दूर कर लिया, जिनसे वह बहुत नाराज़ हुआ, और उनमें से कितनों को बन्दर और सूअर (की तरह) कर दिया, और वे जो मूर्तियों की पूजा करने लगे: यही वे लोग हैं जो सबसे निचले दर्जे में हैं, और सीधे मार्ग से सबसे ज़्यादा भटके हुए हैं।" (60)

[ईमानवालो], जब वे [मदीना के कुछ यहूदी] लोग तुम्हारे पास आते हैं, तो कहते हैं, "हमने (सच्चाई पर) विश्वास किया," मगर वे मन में (सच्चाई से) इंकार करते हुए आए भी थे और उस पर विश्वास किए बिना चले भी गए हैं ------ वे जो कुछ अपने दिलों में छिपाते हैं, अल्लाह उसे अच्छी तरह जानता है। (61

[ऐ रसूल!], आप देखेंगे कि उनमें से ढेर सारे लोग गुनाहों के काम में, अत्याचार करने में और हराम (का माल) खाने में बड़ी तेज़ी दिखाते है। क्या ही बुरे काम हैं जो ये दिन-रात कर रहे हैं! (62

उनके सन्तों और किताब का ज्ञान रखने वालों को क्या हो गया है कि उन्हें गुनाह की बात बकने और हराम (का माल) खाने से रोकते नहीं? (अफ़सोस!) कितने बुरे हैं कर्म उनके!  (63

और यहूदियों ने कहा, "अल्लाह ने (देने से) अपनी मुट्ठी बंद कर ली है," मगर (सच्चाई यह है कि) उन्हीं लोगों ने (कंजूसी से) अपनी मुट्ठियाँ बंद कर रखी हैं, और जो कुछ उन्होंने कहा है उसके चलते उन्हें ठुकराया जाता है। सचमुच, अल्लाह के हाथ तो (देने के लिए) पूरी तरह खुले हुए हैं: वह जिस तरह चाहता है, (अपने फ़ज़ल से) देता है। (इसीलिए आप देखेंगे कि) जो कुछ [क़ुरआन] आपके रब ने आप पर उतारा है, उससे (सबक़ सीखने के बजाए) उनमें अधिकतर लोगों के अंदर बुरे व्यवहार और आज्ञा न मानने की प्रवृत्ति और बढ़ जाएगी। (नतीजे में) हमने उनके कई समुदायों के बीच क़यामत तक के लिए दुश्मनी और नफ़रत का बीज बो दिया है। वे जब भी युद्ध की आग भड़काते हैं, अल्लाह उसे (फैलने से बचाते हुए) बुझा देता है। वे ज़मीन में ख़राबी फैलाने की कोशिश करते हैं, मगर अल्लाह फ़साद मचाने वालों को पसन्द नहीं करता।  (64)

अगर किताबवाले लोग ईमान रखते और (अल्लाह का) डर रखते, तो हम ज़रूर उन पर से उनकी बुराइयों (के प्रभाव) को दूर कर देते और उन्हें नेमत भरी जन्नतों में दाख़िल कर देते। (65

अगर वे तौरात [Torah] और इंजील [Gospel] को, और जो कुछ (किताब) उनके रब की तरफ़ से उनके पास भेजी गयी, उन पर (सच्चाई के साथ) जमे रहते, तो उन्हें अपने ऊपर [आसमान] से भी और अपने नीचे [ज़मीन] से भी भरपूर (रोज़ी) मिली होती: उनमें से कुछ लोग सीधे मार्ग पर चलने वाले हैं, मगर उनमें से अधिकतर ऐसे हैं कि जो भी करते हैं, बुरा ही करते हैं।  (66) 

ऐ रसूल! आपके रब की तरफ़ से जो कुछ आप पर उतारा गया है, उसे (बंदों तक) पहुँचा दें---- अगर ऐसा न किया, तो (मतलब यह हुआ कि) आपने अल्लाह के सन्देश को पहुँचाने का काम (पूरा) नहीं किया --- और अल्लाह आपको लोगों (की साज़िशों) से सुरक्षित रखेगा। अल्लाह उन्हें सही रास्ता नहीं दिखाता, जो उसपर विश्वास न करने पर अड़े रहते हैं (और हुक्म नहीं मानते)। (67

आप कह दें, "ऐ किताबवालो! जब तक कि तौरात और इंजील, और जो (किताब) तुम्हारे रब की तरफ़ से तुम्हारे पास भेजी गयी है, उस पर मज़बूती से जमे नहीं रहते, तब तक सही मायने में तुम्हारे दीन का कोई आधार नहीं है," मगर [ऐ रसूल] जो कुछ (संदेश) आपके रब ने आपके पास उतार भेजा है, वह अवश्य ही उनमें से बहुतों के अंदर बुरे व्यवहार और आज्ञा न मानने की प्रवृत्ति को और बढ़ा देगा: सो आप (सच्चाई से) इंकार और अल्लाह के हुक्म को न माननेवालों के बारे में चिंता न करें। (68

जो लोग [क़ुरआन पर] ईमान रखते हैं, जो यहूदी हैं, जो साबई [Sabians] हैं, जो ईसाई हैं ----- जो कोई भी अल्लाह और अन्तिम दिन [क़यामत] पर ईमान रखेगा और अच्छा कर्म करेगा --- उनके लिए (आने वाली दुनिया में) न तो कोई डर है, और न वे दुखी होंगे। (69)

हमने इसराईल की सन्तान से दृढ़ वचन लिया, और उनकी तरफ़ रसूल भेजे। जब कभी उनके पास कोई रसूल ऐसा संदेश लेकर आया जो उन्हें पसन्द न आया, तो उनमें से कुछ पर तो उन्होंने झूठ बोलने का इल्ज़ाम लगा दिया और कुछ दूसरों को जान से मार डाला;  (70)

वे समझ बैठे कि उन्हें कोई नुक़सान नहीं पहुँच सकता, इसलिए वे (अल्लाह से) अंधे और बहरे बन गए। फिर अल्लाह ने (तौबा क़बूल करते हुए) उन पर दया-दृष्टि डाली, मगर उनमें से बहुत-से लोग फिर से (सच्चाई को देखने और सुनने से) अंधे और बहरे हो गए: अल्लाह उनके कामों की पूरी जानकारी रखता है।  (71

जो लोग कहते हैं, "अल्लाह तो वही मरयम का बेटा, मसीह है", उन्होंने (सच्चाई से इंकार करते हुए) अल्लाह के आदेश को चुनौती दी है। वैसे ख़ुद मसीह ने कहा था, "ऐ इसराईल की सन्तानों! अल्लाह की बन्दगी करो, जो मेरा और तुम्हारा रब है।" जिस किसी ने अल्लाह के साथ (उसकी ख़ुदायी में) किसी को साझेदार [Partner] ठहराया, तो अल्लाह ने उसके जन्नत में जाने पर रोक लगा दी, और उसका ठिकाना जहन्नम होगा। कोई न होगा जो ऐसे बुरे काम करने वालों की मदद करेगा।" (72

जो लोग यह कहते हैं कि, "अल्लाह तीन [Trinity] [ख़ुदाओं-- यानी बाप, बेटा, और पवित्र रूह] में से तीसरा है", वे सचमुच सच्चाई से इंकार करते हैं: अल्लाह तो केवल एक ही है। जो कुछ वे कह रहे हैं, अगर ऐसा ही कहने पर अड़े रहे, तो उनमें से जो लोग (सच्चाई से) इंकार करने पर तुले हुए हैं, उन्हें दर्दनाक यातना धर दबोचेगी। (73)

तो फिर क्यों इन लोगों का झुकाव अल्लाह की तरफ़ नहीं होता कि उससे अपने गुनाहों की माफ़ी माँगें, जबकि अल्लाह बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है?  (74

मरयम का बेटा, मसीह तो केवल एक रसूल था; उससे पहले भी बहुत-से रसूल आए और चले गए; उसकी माँ सच्ची व बड़ी नैतिकतावाली औरत थी; दोनों ही (मर-खप जानेवाले लोगों की तरह) खाते-पीते थे। देखो, किस तरह से हम इन निशानियों को उनके लिए स्पष्ट कर देते हैं; फिर भी देखो, ये कैसे धोखे में पड़े हुए हैं!  (75

कह दें, "तुम अल्लाह को छोड़कर किसी और की बन्दगी कैसे कर सकते हो, जिनके पास न तो तुम्हें नुक़सान पहुँचाने की ताक़त है, न फ़ायदा? वह अल्लाह ही है जो सब बात सुननेवाला, और सब चीज़ जाननेवाला है।" (76)

कह दें, "ऐ किताबवालो! अपने दीन में तुम सच्चाई की सीमा से पार न चले जाओ, और उन लोगों की इच्छाओं के पीछे न चलो, जो तुम से पहले रास्ते से भटक गए ---- उन्होंने दूसरे बहुत से लोगों को भी रास्ते से भटका दिया, और ख़ुद भी (सच्चाई की) सीधी राह से भटकते फिरे।"  (77)

(तो देखो!) इसराईल की सन्तानों में से जिन लोगों ने (सच्चाई को मानने से) इंकार किया था, वे दाऊद [David] और मरयम के बेटे ईसा [Jesus] की ज़बान से ठुकरा दिए गए, क्योंकि उन्होंने आज्ञा नहीं मानी, वे बराबर मर्यादा तोड़ते रहे थे, (78

वे एक दूसरे को ग़लत काम करने से रोकते न थे। कितने ज़्यादा बुरे थे उनके कर्म! (79)

(ऐ रसूल), आप देखते हैं कि उन (यहूदियों) में बहुत से लोग ऐसे हैं जिन्होंने अपने आपको (मक्का के) विश्वास न करनेवालों के साथी व सहायक के रूप में जोड़ लिया है। कितना बुरा है जो कुछ उनकी जानों ने उनके (हिसाब-किताब के) लिए जमा कर रखा है: अल्लाह उनसे बहुत ग़ुस्सा है और वे यातना में ही फँसे रहेंगे। (80

अगर उन्होंने अल्लाह पर, उसके रसूल पर, और  जो (किताब) उनके पास भेजी गयी उसपर विश्वास किया होता, तो उन्होंने कभी भी विश्वास न करनेवालों को अपना साथी व सहायक न बनाया होता, मगर उनमें अधिकतर लोग तो बाग़ी हैं।  (81)


(ऐ रसूल) यह पक्की बात है कि आप यहूदियों को और (अरब के) वे लोग जो दूसरे देवताओं को अल्लाह के साथ जोड़ते हैं उनको, ईमानवालों का सबसे बड़ा विरोधी पाएंगे; और ईमानवालों की दोस्ती में सबसे नज़दीक उन लोगों को पाएंगे, जो कहते हैं कि “वे ईसाई हैं,” क्योंकि उनके बीच ऐसे लोग हैं जो ज्ञान को सीखने में लगे रहते हैं और संयासी हैं। ये लोग घमंड नहीं करते,  (82)

और जब ये (ईसाई) उस (संदेश) को सुनते हैं जो अल्लाह के रसूल पर उतारा गया है, तो आप देखेंगे कि उनकी आँखें आँसुओं से छलकने लगती हैं क्योंकि वे उस बात की सच्चाई पहचान लेते हैं। वे पुकार उठते हैं, "हमारे रब! हमने विश्वास कर लिया, बस हमें भी इन्हीं में से लिख ले जो तेरी (सच्चाई की) गवाही देने वाले हैं। (83

हम अल्लाह पर और जो सच्चाई हमारे पास पहुँची है, उस पर क्यों न विश्वास करें, जबकि हम आशा करते हैं कि हमारा रब हमें अच्छे व नेक इंसानों के दल में शामिल  करेगा?" (84

तो (देखो), इस बात को कहने पर अल्लाह ने उन्हें बदले में (जन्नत के) ऐसे बाग़ प्रदान किए, जिनके नीचे नहरें बहती हैं, जिनमें वे हमेशा रहेंगे: यह है उन लोगों का इनाम, जो अच्छा कर्म करते हैं।  (85

जो लोग सच्चाई को ठुकरा देते हैं और हमारे संदेशों को मानने से इंकार करते हैं, वे (जहन्नम की) भड़कती आग (में पड़ने) वाले हैं। (86)

ऐ ईमानवालो! जो अच्छी चीज़ें अल्लाह ने तुम्हारे लिए वैध [हलाल] कर दी हैं, उन्हें 'हराम' [अवैध] न ठहरा लो ----- (रोक-टोक में) हद से आगे न बढ़ो: अल्लाह हद पार करनेवालों को पसंद नहीं करता। ------ (87)

मगर जो कुछ अल्लाह ने हलाल और अच्छी रोज़ी तुम्हें दे रखी है, उन्हें (बेझिझक) खाओ और अल्लाह (की आज्ञा न मानने के नतीजे से) डरते रहो, जिसपर तुमने विश्वास कर लिया है।  (88

अल्लाह तुम्हारी उन क़समों के लिए तुम से हिसाब नहीं लेगा जो बे सिर-पैर की हों, हाँ जो क़सम सोच समझकर खायी गयी हो, उन पर जरूर तुम्हारी पकड़ होगी: अगर क़सम तोड़नी पड़े तो उसकी भरपाई [atonement] इस तरह होगी कि तुम्हें दस ग़रीब लोगों को खाना खिलाना होगा जैसा कि तुम आमतौर से अपने घर के लोगों को खिलाते हो, या उन्हें कपड़े देना होगा या एक गुलाम को आज़ाद करना होगा ----- अगर कोई आदमी की हैसियत यह सब करने की न हो, तो उसे चाहिए कि वह तीन दिन तक रोज़े रखे। यही तुम्हारी क़समों को तोड़ने की भरपाई है---- (याद रखो) जब क़सम खा लो, तो उसे पूरा किया करो। इस तरह से अल्लाह अपनी आयतों को तुम्हारे सामने स्पष्ट करता है, ताकि तुम उसका शुक्र अदा करनेवाले बनो। (89)

ऐ ईमानवालो! शराब और जुआ, मूर्तिपूजा से जुड़ी (बलि चढ़ाने की) रीतियाँ, जुए की तीरें --- ये सब बहुत बुरे और शैतानी काम हैं। तो इनसे बचकर रहो, ताकि तुम कामयाब हो सको।  (90)

शैतान तो यही चाहता है कि शराब और जुए के द्वारा तुम्हारे बीच दुश्मनी और नफ़रत का भाव पैदा कर दे, और तुम्हें अल्लाह की याद से और नमाज़ से रोक दे। तो क्या तुम (ऐसी बुरी आदतों को) नहीं छोड़ोगे? (91

और (देखो!) अल्लाह की आज्ञा मानो, उसके रसूल की आज्ञा मानो, और (बुराइयों से) बचते रहो: अगर तुमने (मुँह मोड़ा और) इस पर कोई ध्यान नहीं दिया, तो जान लो कि हमारे रसूल की ज़िम्मेदारी तो बस (हमारे संदेश को) साफ़ व स्पष्ट रूप से पहुँचा देने की है।  (92

जिन लोगों ने (सच्चाई पर) विश्वास कर लिया और अच्छे कर्म किए, तो (हराम चीज़ों के हुक्म से) पहले वे जो कुछ खा-पी चुके हों, उसके लिए उनपर कोई गुनाह नहीं है, शर्त यह है कि वे अल्लाह से डरते हुए (आगे इन चीज़ों से) दूर रहें, ईमान पर क़ायम रहें और अच्छे कर्म करते रहें, फिर (जब उन्हें किसी बात से रोका गया तो) अल्लाह से डरते हुए रुक गए, और (अल्लाह के हुक्म पर) विश्वास किया, इसी तरह (आगे भी) अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचता रहे और अच्छे कर्म करता रहे: अल्लाह अच्छा कर्म करने वालों को बहुत पसंद करता है। (93)

ऐ ईमानवालो! [हज की यात्रा के दौरान] अल्लाह उस शिकार के द्वारा तुम्हें ज़रूर परखेगा जब (जानवर) तुम्हारे हाथ और भाले [spear] की पहुँच तक आ जाए, ताकि अल्लाह को पता चल जाए कि कौन है जो (शिकार से हाथ रोक लेता है, और) उससे डरता है, हालाँकि वह उसे देख तक नहीं सकता: अब इस (हुक्म) के बाद भी अगर कोई हद पार करे, तो उसके लिए (आने वाली दुनिया में) दर्दनाक यातना होगी। (94

ऐ ईमानवालो! (हज के लिए जाते हुए) जब तुम इहराम [pilgrim sanctity] की हालत में रहो, तो तुम शिकार के जानवर को न मार डालो। अगर कोई जान-बूझकर उसे मार डाले, तो उसे इसका दंड देना होगा, और (वह यह होगा कि) उसने जो जानवर मारा हो, चौपायों में से ठीक उसी जैसा एक जानवर -- जिसका फ़ैसला तुम्हारे दो न्यायप्रिय आदमी कर दें -- काबा पहुँचाकर क़ुर्बान किया जाए; अगर यह संभव न हो, तो फिर भरपाई के रूप में ज़रूरतमंदों को (उसके दाम के बराबर) खाना खिलाए, या उनकी गिनती के बराबर रोज़े रखे, ताकि वह अपने किए का मज़ा चख ले। जो कुछ पहले हो चुका, उसे अल्लाह ने माफ़ कर दिया; लेकिन अगर किसी ने फिर ऐसा किया, तो अल्लाह उससे बदला लेगा: अल्लाह बहुत ताक़तवाला, सख़्त बदला लेने वाला है।  (95)

तुम्हारे लिए समंदर (में पाए जाने वाले) जीव का शिकार करना और उसका खाना वैध [हलाल] है ----  तुम भी और दूसरे मुसाफ़िर भी इससे मज़े उठा सकते हैं ---- मगर (हज यात्रा में) जब तुम इहराम की हालत में हो, तो थल [land] का शिकार करना हराम है। अल्लाह (के हुक्म न मानने के नतीजे) से डरते रहो, जिसके पास तुम सबको इकट्ठा करके ले जाया जाएगा।  (96) 


अल्लाह ने पवित्र घर 'का'बा' को लोगों के लिए जीविका [support] (और अमन) का साधन बनाया (जहाँ हर जगह के लोग आकर व्यापार कर सकते हैं), और आदर के महीने, (हज के लिए) क़ुर्बानी के जानवर, और वे जानवर जिनके गले में पट्टे पड़े हुए हों: यह सब कुछ (अमन और सुरक्षा के साधन बनाए गए हैं)। तुम जान लो कि अल्लाह जानता है जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में है, और यह कि अल्लाह हर चीज़ की पूरी ख़बर रखता है। (97)

यह भी जान लो कि अल्लाह (हज की मर्यादाओं को तोड़ने की) सज़ा देने में बहुत कठोर है, मगर साथ ही, बहुत माफ़ करनेवाला, दयावान भी है। (98)

रसूल की ज़िम्मेदारी तो बस लोगों तक सन्देश पहुँचा देने की है: जो कुछ तुम सबके सामने करते हो और जो कुछ तुम छिपाकर करते हो, अल्लाह सब जानता है।  (99)

[ऐ रसूल] आप कह दें, "बुरी चीज़ और अच्छी चीज़ कभी बराबर नहीं हो सकती, चाहे बुरी चीज़ों की बहुतायत तुम्हें अच्छी ही क्यों न लगने लगे।" अतः ऐ समझ-बूझ रखनेवालो! अल्लाह (की आज्ञा न मानने के नतीजे) से डरो, ताकि तुम कामयाब हो सको। (100

ऐ ईमानवालो! ऐसी चीज़ों के बारे में (खोद-खोदकर) न पूछा करो, कि अगर तुम्हें बता दी जाएं, तो हो सकता है कि उसके कारण तुम मुश्किल में पड़ जाओ ----- अगर तुम उन चीज़ों को ऐसे समय में पूछोगे, जबकि क़ुरआन उतारी जा रही हो, तो वे चीज़ें तुम्हें बता दी जाएँगी (जिससे तुम मुश्किल में फँस सकते हो) ---- (आगे से इससे बचो) क्योंकि अल्लाह ने उनके बारे में साफ़ कुछ नहीं कहा था: अल्लाह बहुत माफ़ करनेवाला, सहनशील [forbearing] है। (101

(देखो!) तुमसे पहले, (इसराईल की संतानों में से) कुछ लोगों ने किसी चीज़ के बारे में ऐसे ही सवाल पूछे थे, मगर फिर (जवाब पर) अमल नहीं कर सके और (सच्चाई से) इंकार करनेवाले होकर रह गए। (102)

अल्लाह ने तो मूर्तियों की भक्ति के लिए (आज़ाद छोड़े गए) किसी जानवर [ऊँट] को न तो 'बहीरा' ठहराया था, न 'सायबा', न 'वसीला' और न 'हाम'; मगर (सच्चाई से) इंकार करनेवालों ने अल्लाह के बारे में झूठी बातें गढ़ लीं। उनमें अधिकतर लोग समझ-बूझ से काम नहीं लेते:  (103)

जब उनसे कहा जाता है कि, "आओ उस चीज़ [क़ुरआन] की ओर जो अल्लाह ने उतार भेजी है, और उस रसूल की तरफ़", तो वे कहते हैं, "जो तरीक़ा हमने अपने बाप-दादा से ग्रहण किया है, हमारे लिए तो वही काफ़ी है," हालाँकि उनके बाप-दादा न तो कुछ जानते थे, और न ही वे सही मार्ग पर थे।  (104

ऐ ईमानवालो!, तुम अपनी जानों के लिए ख़ुद ही ज़िम्मेदार हो; अगर कोई दूसरा (सही रास्ते से) भटक जाता है, तो तुम्हें उस वक़्त तक उससे कोई नुक़सान नहीं होगा, जब तक तुम सही रास्ते पर रहोगे; तुम सबको (अंत में) अल्लाह के पास लौटकर जाना होगा, और वह तुम्हें बता देगा, जो कुछ तुम करते रहे होगे।  (105)


ऐ ईमानवालो! जब तुममें से किसी के मरने का समय आ जाए, तो तुममें से दो न्याय पसंद करनेवाले आदमी को चाहिए कि वसीयत [bequest] बनते समय गवाह के रूप में मौजूद रहें, या अगर तुम कहीं यात्रा पर गए हो और तुम्हारे मरने का समय क़रीब आ पहुँचे, (और मुसलमान गवाह न मिल पाए) तो दूसरे लोगों में से दो आदमी गवाह बन जाएँ। अगर तुम्हें (उनकी सच्चाई पर) कोई सन्देह हो, तो नमाज़ के बाद उन दोनों को रोक लो और उन्हें अल्लाह की क़समें खिलाओ कि (वे कहें), "हम किसी क़ीमत पर भी अपनी गवाही नहीं बेचेंगे, चाहे मामला किसी नज़दीकी रिश्तेदार का ही क्यों न हो। हम अल्लाह के लिए सच्ची गवाही को कभी नहीं छिपायेंगे, क्योंकि अगर हमने ऐसा किया, तो हम गुनाह करने वालों में शामिल हो जाएंगे।" (106)

अगर बाद में पता चल जाए कि उन दोनों ने (झूठी गवाही देकर) गुनाह कर डाला है, तो फिर उनकी जगह, जिन लोगों का हक़ [rights] मारा गया है, उनमें से दो आदमी खड़े हो जाएँ, क्योंकि उन्हें गवाही देने का ज़्यादा हक़ बनता है। फिर वे दोनों अल्लाह की क़सम खाकर कहें, "हमारी गवाही उन दोनों की गवाही से ज़्यादा सच्ची है। हमने जो कहा, सच के सिवा कुछ न कहा, अगर झूठ कहा हो, तो हम ज़ालिमों में से होंगे": (107

इस तरह (क़समें दिलाने) से इस बात की सम्भावना ज़्यादा है कि वे सच्ची और सही गवाही देंगे, या (कम से कम) डरेंगे कि उनकी क़समों को दूसरे गवाहों द्वारा बाद में झूठा साबित किया जा सकता है। (देखो!) अल्लाह का (हुक्म न मानने के नतीजे से) डरते रहो और सुनो; अल्लाह उन लोगों को सही मार्ग नहीं दिखाता, जो उसका क़ानून तोड़ते हैं। (108)


उस दिन जब अल्लाह सब रसूलों को इकट्ठा करेगा और फिर पूछेगा, "(अपने लोगों के बीच शिक्षा देने से) उनकी तरफ़ से तुम्हें क्या प्रतिक्रिया [response] मिली (यानी उनका अमल कैसा रहा)?" वे कहेंगे, "हमें इसकी कोई जानकारी नहीं: एक तू ही है जो छिपी बातों को भी जानता है।" (109

उसके बाद अल्लाह कहेगा, "ऐ मरयम के बेटे, ईसा [Jesus]! याद करो मेरे उस ख़ास करम [favour] को, जो मैंने तुम पर और तुम्हारी माँ पर किया: किस तरह मैंने पवित्र आत्मा [holy spirit] से तुम्हें ताक़त दी थी, कि जब तुम (छोटे बच्चे थे, तो) पालने में भी लोगों से बात करते थे और बड़े उम्र के आदमी के रूप में भी; फिर किस तरह मैंने तुम्हें किताब और समझ-बूझ, तौरात [Torah] और इंजील [Gospel] सिखा दी थी; किस तरह, तुम मेरे आदेश से, मिट्टी से चिड़िये की शक्ल जैसी चीज़ बनाते, फिर उसमें फूँक मारते थे, तो वह मेरे आदेश से (सचमुच की) चिड़िया बन जाती थी; किस तरह, तुम मेरे आदेश से, अंधे और कोढ़ी [leper] मरीज़ को बिल्कुल चंगा कर देते थे; किस तरह, तुम मेरे आदेश से, मरे हुए आदमी को फिर से ज़िंदा खड़ाकर देते थे; और याद करो किस तरह, मैंने इसराईल की संतानों को तुम्हें नुक़सान पहुँचाने से रोके रखा जब तुम उनके पास साफ़-साफ़ निशानियाँ लेकर पहुँचे थे, उनमें से जो विश्वास नहीं करनेवाले थे, वे कहने लगे, यह तो कुछ और नहीं, साफ़ जादूगरी है";  (110)

और (देखो!), किस तरह मैंने (ईसा के) शिष्यों [disciples] के दिल में यह बात डाली कि मुझ पर और मेरे रसूल पर विश्वास करो -----  तो उन्होंने कहा था, "हम विश्वास करते हैं, और (ऐ ख़ुदा) तू गवाह रहना कि हम अपने आपको (अल्लाह की भक्ति में) समर्पित करते हैं।" (111)


और (देखो!) जब (ईसा के) शिष्यों ने कहा, "ऐ मरयम के बेटे, ईसा! क्या तुम्हारा रब हमलोगों के लिए आसमान से खाने से भरा थाल उतार सकता है?" ईसा ने कहा, "अल्लाह से डरो, (और ऐसी फ़रमाइश न करो) अगर तुम पक्का ईमान रखते हो।" (112)

वे बोले, "हम चाहते हैं कि उसमें से खाएँ; ताकि हमारे दिलों को संतोष मिल जाए; हम जान लें कि तूने जो कुछ बताया, वह सच था, और इस पर हम गवाह रहें।" (113)

तो मरयम के बेटे, ईसा ने दुआ की, "ऐ अल्लाह, हमारे रब! हम पर आसमान से खाने से भरा थाल उतार दे, जो ख़ुशी का एक त्योहार बन जाए ----हममें से पहले और हममें से आख़िरी (आदमी) के लिए----- और तेरी तरफ़ से एक निशानी हो। हमें रोज़ी दो, कि तू सबसे बेहतर रोज़ी देनेवाला है।" (114

अल्लाह ने कहा, "मैं तुम्हारे लिए (खाने का थाल) भेज दूँगा, मगर इसके बाद भी अगर किसी ने विश्वास नहीं किया, तो उसे सज़ा दी जाएगी, ऐसी सज़ा जो पूरी दुनिया में किसी और को नहीं दूँगा।" (115)

जब अल्लाह कहेगा, 'ऐ मरयम के बेटे, ईसा! क्या तूने लोगों से यह कहा था कि "अल्लाह के साथ मुझे और मेरी माँ को ख़ुदा बना लो?" ईसा कहेगा, "महिमावान है तू! मैं वह बात कभी नहीं कह सकता, जिसको कहने का मुझे कोई हक़ नहीं है ------ अगर मैंने ऐसा कहा होगा, तो ज़रूर तुझे मालूम होगा: तू जानता है, जो कुछ मेरे मन में है, हालाँकि मैं नहीं जानता जो कुछ तेरे मन के भीतर है, केवल तू ही है जो छिपी हुई सारी बातों को जाननेवाला है ----- (116

मैंने उन लोगों को केवल वही बताया था, जिसका तूने मुझे आदेश दिया था: "अल्लाह की बन्दगी करो, जो मेरा और तुम्हारा रब है।" जब तक मैं उनके बीच रहा, मैं उनके हाल पर नज़र रखता था। फिर जब से तूने मुझे उठा लिया, उस समय से तू ही अकेला उनकी निगरानी करता रहा है: तू तो सारी चीज़ों का गवाह है,  (117

और अगर तू उन्हें यातना देना चाहे, तो ये तो तेरे ही बन्दे हैं; अगर तू उन्हें माफ़ कर दे, तो तू सबसे ज़्यादा ताक़तवाला, और (हर काम में) समझ-बूझ रखनेवाला है।" (118

अल्लाह कहेगा, "यह वह दिन है कि सच्चे इंसानों को उनकी सच्चाई काम आएगी। उनके लिए (जन्नत में) ऐसे बाग़ हैं, जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी, उनमें वे हमेशा के लिए रहेंगे। अल्लाह उनसे ख़ुश हुआ और वे अल्लाह से ख़ुश हुए: यही सबसे बड़ी कामयाबी है।" (119)

आसमानों की और ज़मीन की और जो कुछ उनमें है, सब पर अल्लाह ही की बादशाही [नियंत्रण] है: उसे हर चीज़ करने की ताक़त है।  (120)




नोट:

1: मवेशी यानी चरने वाले [Grazing] चौपाये, जैसे गाय, ऊँट, बकरी, भेड़ आदि या उनसे मिलते-जुलते चौपाये जैसे हिरन, नील गाय आदि।

3: इस्लाम से पहले अरब के बहुदेववादियों में एक रिवाज यह था कि कुछ लोग मिलकर ऊँट को ज़बह करते और फिर उसके मांस के बंटवारे के लिए जुए की तीरों का सहारा लेते, हर तीर पर मांस का हिस्सा लिखकर थैले में डाल दिया जाता था और फिर जिसके नाम की तीर निकलती, उसके मुताबिक़ उतना हिस्सा दे दिया जाता था। इसी तरह लोग तीरों से अपनी क़िस्मत का और आगे घटनेवाली घटना का भी अनुमान लगाते थे। 

4: शिकारी कुत्ता या बाज़ आदि अगर सधा हुआ [trained] हो, जो शिकार करके हलाल जानवर ख़ुद न खाए बल्कि अपने मालिक के लिए बचा रखे, तो ऐसा मांस हलाल [वैध] होगा अगर उसे शिकार के लिए छोड़ने से पहले अल्लाह का नाम लिया गया हो। 

5: किताबवाले यानी यहूदियों और ईसाइयों के यहाँ का मांस खाना जायज़ [वैध] है, अगर उन्होंने सही तरीक़े से जानवर को ज़बह किया हो, उसी तरह उनसे शादी-ब्याह भी जायज़ है। 

6: नमाज़ से पहले पाक होने को "वुज़ू" कहते हैं। वुज़ू के लिए आम तौर से हाथ, मुँह के साथ पाँव को टख़नों तक धोना होता है, मगर कुछ विद्वानों के अनुसार पाँव को धोने के बजाए उस पर गीला हाथ फेर देना [मसह] काफ़ी होता है। 

8: आयत 1-2 में जो हुक्म दिया गया है, वह यहाँ फिर से शुरू हो रहा है। 

11: मक्का में मुसलमानों पर होनेवाले ज़ुल्म और उसके बाद बहुदेववादियों के हमलों के बावजूद अल्लाह ने मुसलमानों को बड़ी तबाही से बचा लिया और फिर उन्हें मज़बूत हालत में ला खड़ा किया। इसके साथ-साथ ख़ुद मुहम्मद (सल्ल) को कई बार मार डालने की साज़िश बहुदेववादियों ने भी की और यहूदियों ने भी, मगर अल्लाह ने हर बार उन्हें बचा लिया।

12: अल्लाह को "अच्छा क़र्ज़" देने का मतलब बिना दिखावा किए हुए किसी ग़रीब की मदद करना या कोई भलाई के काम में ख़र्च करना जिसका बदला अल्लाह कई गुना बढ़ाकर देगा। दूसरी जगह भी इसका ज़िक्र देखें 57:18; 64:17

13 : इसराइलियों द्वारा अल्लाह से किए गए पक्के वचन [Covenant] तोड़ देने की बात बाइबल में और क़ुरआन में कई जगहों पर आयी है, देखें 2: 63,83,93; 4:155; 7:169. यहूदियों को वचन तोड़ने की यह सज़ा मिली कि अल्लाह ने उन्हें अपने से दूर कर दिया।

14: वचन तोड़ने की सज़ा ईसाइयों को यह मिली कि उनके यहाँ ज़बरदस्त धार्मिक मतभेद के चलते कई गुट बन गए जिनमें आपस में काफ़ी ख़ून-ख़राबा और मारपीट हुई। 

15: बताया जाता है कि मुहम्मद (सल्ल) के पास फ़ैसले के लिए एक यहूदी मर्द और औरत के बीच ज़िना [Adultery] का मामला आया था, तोरात और बाइबल के हुक्म के मुताबिक़ यहूदियों को पता था कि पत्थर मारने की सज़ा होगी, मगर वे इस निर्धारित दंड को छुपा रहे थे, लेकिन आप (सल्ल) ने भी तोरात के मुताबिक़ यही सज़ा सुनायी और इस तरह यह बात सबके सामने आ गई। ऐसी और भी कई मिसालें हैं।

21: फ़िलिस्तीन, सीरिया और जार्डन के इलाक़े को पवित्र सरज़मीन [Holy Land] इसलिए कहते हैं कि इस इलाक़े में बहुत सारे नबियों को अल्लाह ने समय-समय पर भेजा था। यहाँ उस घटना की तरफ़ इशारा है जब मूसा (अलै) इसराइल की संतानों को मिस्र से निकालकर इस पवित्र भूमि यानी फ़िलिस्तीन के नज़दीक बसाने के लिए लाए थे। उस समय शहर पर काफिरों की हुकूमत थी जिन्हें "अमालक़ा" [Amalekites] कहते थे, वे बड़े लम्बे-चौड़े डील-डौल के लोग थे जो शायद "आद" की क़ौम के वंशज थे। अल्लाह ने वादा किया था कि अमालक़ा से युद्ध में इसराइलियों की जीत होगी, मगर इसराइली अपने ख़तरनाक दिखनेवाले दुश्मन के डील-डौल से डरकर मुक़ाबले के लिए किसी तरह तैयार न हुए।

23: मूसा (अलै) ने इसराईल की संतानों को 12 क़बीले में बाँटा था, बताया जाता है कि हर क़बीले के सरदार को शहर में घुसने से पहले वहाँ का निरीक्षण करने के लिए भेजा गया था, उन्हीं में से दो सरदारों ने अपने लोगों की हिम्मत बढ़ायी थी जिनका नाम हज़रत यूशा’ [Joshua] और हज़रत कालिब [Caleb] बताया जाता है।

26: अल्लाह का हुक्म नहीं मानने के नतीजे में उन्हें दंड मिला, वे फ़िलिस्तीन में बसने के बजाय 40 साल तक सीना के रेगिस्तानों में मारे-मारे फिरे, उन्हें पीछे मिस्र जाने का भी रास्ता नहीं मिल सका। इस सज़ा के बावजूद उनके साथ चूंकि हज़रत मूसा, हारून, यूशा' और कालिब (अलै) थे, इसलिए अल्लाह ने उनपर बहुत सी मेहरबानियाँ की थीं, जैसे बादल से उनपर छाया करना, खाने के लिए "मन और सलवा" उतारना, पीने के लिए 12 चश्मों का फूटना आदि (2: 57-60). इसी रेगिस्तान में हज़रत हारून और मूसा (अलै) की मौत हुई, फिर हज़रत यूशा' नबी बने जिनके ज़माने में सीरिया के इलाक़े पर क़ब्ज़ा हुआ, फिर बाद में हज़रत सैमुएल के ज़माने में कुछ और इलाक़ों में जीत हुई, देखें 2: 142-152. इस तरह, वह पवित्र सरज़मीन इसराइलियों के क़ब्ज़े में अल्लाह के वादे के मुताबिक़ आ गयी। 

27: ऊपर की आयतों में अल्लाह ने इसराईल की संतानों से अमालीक़ की क़ौम से युद्ध करने का हुक्म दिया था जिसे उन लोगों ने नहीं माना, जबकि बाद में उन लोगों ने कई बार बिना किसी हिचकिचाहट के बेगुनाहों का क़त्ल किया। इस तरह, एक अच्छे मक़सद के लिए अल्लाह के हुक्म के बावजूद युद्ध नहीं करना और दुनिया के थोड़े से फ़ायदे के लिए किसी बेगुनाह का क़त्ल करना बिल्कुल ग़लत है। इस आयत में दुनिया के पहले क़त्ल का ज़िक्र है जबकि हज़रत आदम (अलै) के बेटे क़ाबील ने अपने बेगुनाह भाई हाबील को इस जलन की वजह से मार डाला था कि क्यों उसकी क़ुर्बानी क़बूल नहीं हुई जबकि उसके भाई की क़बूल हो गई। 

33: जो लोग अल्लाह और उसके रसूल के आदेश नहीं मानते, वे एक तरह से उनसे जंग लड़ते हैं, और जो डाकू-लुटेरे बनकर चारों तरफ फ़साद मचाते रह्ते हैं, उनकी यहाँ चार तरह की सज़ाएं बतायी गई हैं। विद्वानों ने हदीसों के हवाले से बताया है कि (i) अगर किसी डाकू ने बिना माल लूटे हुए किसी का क़त्ल कर दिया, तो उसे भी क़त्ल किया जाए, (ii) अगर डाकू ने माल भी लूटा हो और क़त्ल भी किया हो, तो उसे सूली चढ़ाया जाए, (iii) अगर केवल माल लूटा हो, तो उसका दायाँ हाथ और बायाँ पाँव काट दिया जाए, और (iv) अगर किसी डाकू ने केवल डराया-घमकाया हो मगर लूटपाट न की हो, तो उसे या तो क़ैद किया जाए या देश-निकाला दिया जाए। 

34: अगर डाकू-लुटेरे पकड़े जाने से पहले अपने जुर्म से तौबा करते हुए हाकिम के सामने समर्पण [surrender] कर दें, तो उनकी सज़ा माफ़ हो जाएगी, मगर जिसका माल लूटा है, उसे वापस करना होगा। इसी तरह, जिसका क़त्ल किया हो, उसके वारिसों को जान के बदले हरजाना देना होगा। 

35:  अल्लाह के नज़दीक पहुँचने का ज़रिया [वसीला] वह नेक और अच्छे कर्म हैं जो अल्लाह की ख़ुशी हासिल करने के लिए किए जाएं। अल्लाह के रास्ते में जी-तोड़ संघर्ष करने को "जिहाद" कहते हैं, वह चाहे दुश्मनों से अपने बचाव में लड़कर हो या अपने अंदर की बुराइयों को दूर करने के लिए हो। 

39: चोरी की सज़ा हाथ काटना बताया गया है, मगर यह सज़ा तब दी जाती थी जब कि एक बड़ी रक़म या कोई  क़ीमती सामान चोरी हो जाए, क़ानून के हिसाब से कम से कम 3 दिरहम (3 ग्राम चांदी) या आम तौर से 1/4 दिनार (1 ग्राम सोना) के बराबर क़ीमत का सामान चोरी हुआ हो, तब यह सज़ा थी। अगर चोर सच्चे दिल से अपनी बुराई की तौबा कर ले और फिर कभी चोरी न करने की ठान ले, तो अल्लाह आख़िरत में उसके गुनाह माफ़ कर देगा। मगर याद रहे, दुनिया में मिलने वाली सज़ा उसे ज़रूर मिलेगी। 

41: यहाँ से आयत 50 तक कही गयी बातों के पीछे वे घटनाएं हैं जो मदीना के कुछ यहूदियों से जुड़ी हुई हैं। उनमें से एक घटना (आयत 41-44) यह थी कि ख़ैबर के आसपास रहनेवाले दो शादी-शुदा यहूदी मर्द और औरत ने एक-दूसरे से "ज़िना" [नाजायज़ सेक्स] किया और मदीना के कुछ यहूदी इस मामले को मुहम्मद (सल्ल) के पास  फ़ैसला कराने के लिए इस उम्मीद पर लाए कि हो सकता है कि आप (सल्ल) कुछ हल्की सज़ा देंगे, जबकि तोरात के मुताबिक़ इस जुर्म के लिए पत्थर मारने की सज़ा थी। उन्हें यह सिखाकर भेजा गया था कि अगर हल्की सज़ा दें तो मान लेना और अगर वही पत्थर मारने वाली सज़ा दें तो मत मानना। जब आप (सल्ल) ने यहूदी विद्वानों से पूछताछ की, तो पता चला कि उनके विद्वान तोरात के आदेशों में रिश्वत लेकर फेर-बदल कर डालते हैं और ज़रूरत के अनुसार ग़लत तरीक़े से कुछ का कुछ मतलब निकाल लेते हैं, इस तरह, तोरात के साफ़ आदेश के होते हुए भी उन लोगों ने ऐसे जुर्म के लिए पत्थर मारने के बजाए कोड़ा मारने या मंह काला कर देने की सज़ा देनी शुरू कर दी, खासकर तब, जबकि मामला समाज के बड़े आदमी से जुड़ा हो। फिर जब एक यहूदी विद्वान ने मान लिया कि तोरात में इस जुर्म के लिए पत्थर से मार देने की सज़ा है, तो मुहम्मद (सल्ल) ने भी इस मामले में उन्हें वही सज़ा सुनायी जो तोरात के मुताबिक़ थी। 

45: मदीना में यहूदियों के दो क़बीले थे: बनु नज़ीर और बनु क़ुरैज़ा। बनु नज़ीर क़बीला ज़्यादार मालदार और ताक़तवर था, इसलिए उन लोगों ने क़त्ल से जुड़े हुए मामले में अपने मन-मर्ज़ी के नियम बना लिए थे, उस नियम के अनुसार, अगर बनु नज़ीर के क़बीले के किसी आदमी ने बनु क़ुरैज़ा के आदमी को क़त्ल किया, तो जान के बदले जान [क़सास] नहीं देनी होगी, केवल "ख़ून-बहा" [हरजाना] देना होगा। लेकिन अगर बनु क़ुरैज़ा के किसी आदमी ने बनु नज़ीर के किसी आदमी को क़त्ल किया तो ‘जान के बदले जान’ भी ली जाएगी और ‘ख़ून-बहा’ भी लिया जाएगा और वह भी दुगना!   

48: हर ज़माने में मूल धर्म एक ही रहा है जिसमें हमेशा एक अल्लाह को मानने और अच्छा व नेक काम करने की शिक्षा दी जाती रही है, मगर हर युग की ज़रूरत और परिस्थिति के मुताबिक़ क़ानून [शरिअत] और ज़िंदगी जीने का तरीक़ा अलग-अलग रहा है। ज़्यादातर विद्वान तो यह मानते हैं कि क़ुरआन में जो क़ानून और तरीक़ा बताया गया है, वह चूँकि इस ज़माने की परिस्थिति के अनुसार है, इसलिए किताबवालों यानी यहूदियों और ईसाइयों के मामलों का फ़ैसला क़ुरआन के आदेशों के अनुसार ही होना चाहिए, हाँ कुछ निजी मामले जैसे शादी, तलाक़, इबादत आदि के तरीक़े उनके अपने नियमों के मुताबिक़ होने चाहिए। 

मगर कई विद्वान इसका मतलब यह बताते हैं कि किताबवालों के मामलों का फ़ैसला उनकी किताबों यानी तोरात [Torah] और इंजील [Gospel] के मुताबिक़ होना चाहिए, जैसा कि मुहम्मद (सल्ल) ने फ़ैसला किया था जिसका ज़िक्र आयत 41-43 में आया है। इस तरह अल्लाह ने भी नहीं चाहा कि दुनिया में एक ही समुदाय हो, बल्कि सभी अपने-अपने नियम-क़ायदे पर चल सकते हैं, मगर ध्यान देने की असल बात यहाँ यह है कि सभी समुदाय को आपस में इस बात पर मुक़ाबला करना चाहिए कि कौन है जो भलाई के कामों में आगे निकलता है।   

51: यहाँ मदीना के उन मुसलमानों से कहा गया है कि वे ऐसे यहूदियों और ईसाइयों को अपना साथी या संरक्षक न बनाएं जो उस समय मुसलमानों के खिलाफ़ दुश्मनी में लगे हुए थे, ख़ासकर यहूदियों ने तो मक्का के काफिरों के साथ भी सांठ-गांठ कर ली थी जबकि दूसरी तरफ़ उन लोगों ने मुसलमानों के साथ शांति-समझौता भी कर रखा था। ध्यान रहे कि इस आयत का मतलब यह नहीं है कि हर दौर के मुसलमानों को यहूदियों व ईसाइयों से दोस्ती करने से मना किया गया है। 

52: यहाँ मदीना के पाखंडियों [मुनाफ़िक़ों] के बारे में कहा गया है जो उहुद की जंग में मुसलमानों को नुक़सान उठाने के बाद यह सोचकर कि अब मुसलमान तबाह हो जाएंगे, मदद के लिए यहूदियों-ईसाइयों की तरफ़ लपके थे। यहाँ अल्लाह ने इशारा किया है कि हो सकता है कि मुसलमानों को जल्दी ही जीत मिल जाए, जो मक्का की मिलने वाली जीत (8 हिजरी/ 630 ई) की तरफ़ इशारा था। 

64: जब मदीना के यहूदियों ने मुहम्मद सल्ल के संदेश को मानने से इंकार कर दिया तो अल्लाह ने उनकी आंखें खोलने के लिए कुछ दिन उनकी रोज़ी में तंगी कर दी, उस पर यहूदियों ने कहा कि लगता है कि अल्लाह देने में कंजूसी कर रहा है, जबकि ख़ुद कंजूसी करने में यहूदी लोग मशहूर थे।

69: क़रीब-क़रीब यही बात 2: 62 में भी कही गई है, इसकी तुलना 22: 17 से भी करें, जहाँ कहा गया है कि क़यामत के दिन अल्लाह ईमान रखनेवालों, ईसाइयों, यहूदियों, साबई और मजूसियों के बीच फ़ैसला कर देगा। 

73: ईसाइयों में जो लोग Trinity के सिद्धांत में विश्वास रखते थे, उनकी यहाँ निंदा की गई है। इस सिद्धांत के अनुसार ख़ुदा में तीन अलग-अलग वजूद यानी ‘बाप (ख़ुदा), बेटा (ईसा) और ‘पवित्र आत्मा’ मिला हुआ है, और यह भी कहा जाता है कि तीनों मिलकर एक हैं।

78: यानी इसराईल की संतानों में से जिन लोगों ने सच्चाई को मानने से इंकार किया था, उनकी हरकतों पर "ज़बूर [Psalms] और "बाइबल" [Gospel] में भी कड़े शब्दों में निंदा की गई है।

82: यहाँ अरब के उस ज़माने में रहनेवाले ईसाइयों का ज़िक्र है जिनमें काफ़ी लोग ज्ञान की खोज में लगे रहते थे, घमंड नहीं करते थे और उनमें से काफ़ी लोग दुनिया की चमक-दमक से दूर होकर संयासी थे। जब मुसलमानों पर मक्का में वहाँ के मुश्रिकों ने बहुत ज़ुल्म किए थे, उस वक़्त भी मुसलमानों के एक दल नें इथोपिया में जाकर ईसाई बादशाह "नजाशी" के यहाँ शरण ली थी। कुल मिलाकर ईसाइयों का रवैया मुसलमानों के प्रति यहूदियों की तुलना में कहीं अच्छा था।

83: मदीना में एक बार हब्शा [इथोपिया] से ईसाइयों का एक प्रतिनिधिमंडल आया था, उनके सामने जब क़ुरआन पढ़कर सुनायी गई, तो उन लोगों ने सच्चाई को पहचान लिया और उनकी आँखों में आँसू आ गए थे। 

90: शराब को हराम किए जाने के क्रम की यह चौथी और आख़िरी आयत है, पहले 16: 67 में यह ज़िक्र है कि अल्लाह ने ऐसे फल पैदा किए हैं जिनके रस से तुम अपने लिए पीने की चीज़ें बनाते हो, फिर 2: 219 में कहा गया कि शराब और जुए में थोड़ा फ़ायदा तो है मगर इससे नुक़सान कहीं ज़्यादा है, उसके बाद 4:43 में लोगों को नशे की हालत में नमाज़ से दूर रहने को कहा गया, और अब यहाँ शराब, जुए और मूर्तिपूजा से जुड़ी जानवरों की बलि चढ़ाने और तीरों से उसके मांस बांटने की रीतियों से पूरी तरह से बचने को कहा गया है। 

94: हज की यात्रा में जब इहराम की हालत हो, तो थल पर हर तरह के शिकार करना हराम है, चाहे आसानी से हाथ आ जानेवाली चिड़ियों का शिकार हो या भाले या किसी हथियार से बड़े जानवर का शिकार।

95: अगर जान बचाने के लिए किसी जानवर का शिकर करना पड़े तो वह किया जा सकता है। अगर हज के यात्री ने जान-बूझकर शिकार कर लिया, तो फिर उसे भरपाई में मरे हुए जानवर की क़ीमत के बराबर का एक जानवर क़ुर्बान करना होगा, या उतनी क़ीमत के बराबर ग़रीबों को खिलाना होगा, और अगर यह न हो सके, तो फिर रोज़े रखने होंगे। रोज़े की गिनती का हिसाब हनफ़िया के अनुसार यह है कि "पौने दो सेर गेंहू की क़ीमत" के बराबर एक रोज़ा माना जाएगा।

100: बुरी या हराम चीज़ का चलन चाहे कितना ही हो जाए, मगर उसे आँख बंद करके नहीं अपना लेना चाहिए, क्योंकि बुरी चीज़ और अच्छी चीज़ कभी बराबर नहीं हो सकती।

 02: क़ुरआन में कई जगह पर पुरानी क़ौमों के क़िस्से आए हैं जहाँ उन लोगों ने किसी चीज़ के बारे में बहुत सारे सवाल पूछे और फिर उस पर अमल नहीं कर सके। देखें 2: 246-247 जब इसराइलियों ने अपने लिए एक राजा की माँग की और जब Saul को राजा बनाने का हुक्म हुआ तो लोग उसकी क्षमता पर सवाल उठाने लगे। इसी तरह, देखें 2: 67-71 जहाँ गाय को मारने की घटना का ज़िक्र है कि किस तरह इसराइलियों ने मूसा (अलै) से लगातार सवाल पूछे थे। 

103: अरब के बहुदेववादियों के बीच ऐसी मान्यताएं काफ़ी ज़माने से रही थीं, जहाँ कुछ ख़ास तरह के ऊँटों को वे लोग पवित्र समझकर उसे बुतों के लिए समर्पित कर देते थे और फिर न उसे खाते, न दूध निकालते और न ही उस पर सवारी करते, बल्कि उसे आज़ाद चरने के लिए छोड़ देते थे। "बहीरा" उस जानवर को कहते थे जिसके कान चीरकर उसका दूध किसी बुत के नाम समर्पित कर दिया जाता था। "सायबा" वैसा जानवर था जिसे किसी बुत के नाम करके आज़ाद छोड़ दिया जाता और फिर उससे किसी तरह का फ़ायदा उठाना हराम था। "वसीला" उस ऊँटनी को कहते थे जो लगातार मादा बच्चे जनती और बीच में कोई नर न होता। "हाम" उस नर ऊँट को कहते थे जिसके बच्चों के बच्चे हो चुके हों, उससे भी कोई काम न लेते हुए आज़ाद छोड़ दिया जाता था। 

105: समाज में अगर ढेर सारे लोग सही रास्ते से भटक जाएं, तो दूसरों को सुधारने से ज़्यादा पहले हर आदमी को अपनी फ़िक्र करनी चाहिए क्योंकि वह अपने कामों के लिए ही जवाबदेह होगा। जब लोगों में अपने आपको सुधारने की सोच पैदा होगी, तो समाज में ख़ुद ही सुधार आ जाएगा। 

106:  इस्लामी क़ानून के मुताबिक़ कोई आदमी मरने से पहले किसी को अपनी संपत्ति में से ज़्यादा से ज़्यादा एक तिहाई हिस्सा वसीयत में दे सकता है। चूँकि 4:11-12 में सभी वारिसों का हिस्सा बता दिया गया है, इसलिए विद्वानों की राय यह है कि वसीयत में केवल उन्हें ही दिया जा सकता है जो 4:11-12 में बताए गए वारिसों में नहीं हों।

इस आयत के पीछे एक कहानी बतायी जाती है। एक मुसलमान आदमी अपने दो ईसाई दोस्तों के साथ सीरिया व्यापार के लिए गया, वहाँ उसकी तबियत बिगड़ गई तो उसने अपने दोनों दोस्तों को वसीयत की कि मदीना जाकर मेरा सामान मेरे घरवालों को दे देना, उसके दोस्तों ने वापस आकर उसका सामान उसके वारिसों को दे दिया, मगर एक चांदी का प्याला जो काफ़ी क़ीमती था, ख़ुद अपने पास रख लिया। जब मरे हुए आदमी के वारिसों ने उस प्याले को उसके दोस्तों के पास देखा, तो उसे पहचानते हुए पूछताछ की, उनलोगों ने बताया कि यह प्याला उसने अपने दोस्त से ख़रीद लिया था, मगर वे इस पर कोई गवाह नहीं पेश कर पाए। फिर वारिसों की तरफ़ से दो आदमियों की गवाही पर वह प्याला उन ईसाई दोस्तों से लेकर सही वारिसों को दे दिया गया।  

109: हर रसूल अपनी-अपनी क़ौम के लोगों के लिए गवाही देंगे [4:41; 16: 89], मगर जब अल्लाह उनकी क़ौमों के अमल के बारे में पूछेंगे तो वे ख़ामोश रहेंगे क्योंकि अल्लाह को आदमी का ज़ाहिरी और छिपा हुआ हर अमल अच्छी तरह मालूम होगा।

110: यहाँ अल्लाह ने ईसा (अलै) को उन चमत्कारों [miracles] के बारे में याद दिलाया है जो वह अपनी क़ौम के सामने अल्लाह के हुक्म से दिखाया करते थे। उनके चमत्कारों का ज़िक्र बाइबल में भी है, उनमें से एक था "बच्चे की हालत में उनका बोलना" जिसका ज़िक्र 3: 46 और 19: 29-30 में भी आया है, मगर यह बात बाइबल में नहीं मिलती। 


116: हालाँकि ईसाइयों के "Trinity" यानी "तीन में से एक ख़ुदा" के सिद्धांत में हज़रत मरयम [Mary] को ट्रिनिटी का हिस्सा नहीं माना जाता है, मगर जिस तरह से हर एक चर्च में उनके पुतले और तस्वीरों को हज़रत ईसा (अलै) के साथ रखा जाता है और उन्हें इबादतों में प्रमुखता से शामिल किया जाता है, इसीलिए यह सवाल उठाया गया है।

Surah/सूरह 1: Al-Fatiha/अल-फ़ातिहा [(किताब की) शुरुआत/ The Opening]

       सूरह 1: अल-फ़ातिहा    [(किताब की) शुरुआत/ The Opening] यह एक मक्की सूरह है। पूरे क़ुरआन में अल्लाह का जो संदेश आया है , उसका इस सूरह मे...