सूरह 8: अल-अनफ़ाल /Al-Anfal
[युद्ध में हाथ आया माल/ Battle Gains]
01 : युद्ध में हाथ आया माल अल्लाह और रसूल का है
02-04: सच्चे ईमानवाले
05-06: कुछ लोग युद्ध में भाग लेने को तैयार नहीं
07-14: अल्लाह की मदद आ पहुँची
15-16: युद्ध में पीठ न दिखाओ
17-19: अल्लाह ने युद्ध में साथ दिया
20-29: ईमानवालों से अपील
30-35: पहले भी विरोध हुआ
36-40: मक्कावाले आगे भी विरोध करते रहेंगे
41 : जंग से मिले लूट के माल का बंटवारा
42-44: युद्ध का नतीजा अल्लाह ने तय कर रखा था
45-48: ईमानवालों को युद्ध में मज़बूती से क़दम जमाए रखना चाहिए
49-54: पाखंडियों को सज़ा दी जाएगी
55-63: विश्वासघात करने वालों के साथ सख़्ती से पेश आना चाहिए
64-71: लड़ाई लड़ने के बारे में रसूल को ज़रूरी निर्देश
72-75: विश्वास न करने वालों के साथ रिश्ता तोड़ दो
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यन्त दयावान है।
[ऐ रसूल] वे आपसे युद्ध में हाथ आ गए माल (के बंटवारे) के बारे में पूछते हैं। कह दें, "उस (माल के बंटवारे) का मामला तो अल्लाह और उसके रसूल का है, अतः अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से बचो और आपस में मामलों को ठीक रखा करो। अगर तुम सच्चे ईमानवाले हो, तो अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा का पालन करो: (1)
सच्चे ईमानवाले तो वह लोग हैं कि जब उनके सामने अल्लाह का ज़िक्र किया जाता है, तो उनके दिल मारे डरके काँप उठते हैं, और जब उनके सामने उसकी आयतें पढ़ी जाती हैं, तो वह उनके ईमान को और बढ़ा देती हैं, और जो हर हाल में अपने रब पर भरोसा रखते हैं, (2)
जो पाबंदी से नमाज़ पढ़ते हैं और जो कुछ (रोज़ी) हमने उन्हें दे रखी है, उसमें से (एक हिस्सा) दूसरों को भी देते हैं। (3)
यही वे लोग हैं जो सचमुच ईमानवाले हैं। उनके रब के यहाँ उनका बड़ा ऊँचा दर्जा है, उनके लिए वहाँ (गुनाहों की) माफ़ी है, और दिल खोलकर दी जाने वाली रोज़ी है।” (4)
(युद्ध में हाथ आए माल के बंटवारे पर बातें हो रही हैं, मगर असल में) वह तो आपका रब था जिसने एक सच्चे मक़सद के लिए [ऐ रसूल], आपको अपने घर से बाहर (बद्र नाम की जगह) निकल पड़ने पर मजबूर किया था ----- हालाँकि ईमानवालों में से एक गिरोह ने इसे पसंद नहीं किया था। (5)
वे (अल्लाह की तरफ़ से जीत की) सच्चाई स्पष्ट हो जाने के बाद भी आपसे बहस व विवाद करते रहे, मानो वे अपनी आँखों से देख रहे थे कि उन्हें मौत के मुँह में ढकेला जा रहा हो। (6)
(ईमानवालोे!), याद करो कि किस तरह अल्लाह ने तुमसे वादा किया था कि दो गिरोहों [मक्का के व्यापारियों का कारवाँ और मक्का की सेना] में से एक तुम्हारे हाथ ज़रूर आ जाएगा: तुम चाहते थे कि वह (गिरोह) तुम्हारे हाथ आ जाए जो निहत्था गिरोह [व्यापारियों का कारवाँ] हो, मगर अल्लाह चाहता था कि अपने वचनों के मुताबिक़ सच्चाई को मज़बूती से क़ायम कर दे, और विश्वास करने से इंकार करने वालों की जड़ काटकर रख दे---- (7)
ताकि सच को सच और झूठ को झूठ साबित करके दिखा दे, चाहे अपराधियों को ये कितना ही बुरा लगे। (8)
याद करें जब आपने अपने रब से (बद्र की लड़ाई के समय) मदद के लिए फ़रियाद की थी, उसने आपकी पुकार सुनते हुए कहा, "मैं एक हज़ार फ़रिश्तों से (लड़ाई में) आपकी मदद करूँगा जो एक के बाद एक आएंगे।" (9)
अल्लाह ने यह इसलिए किया कि (लोगों में) आशा का संदेश फैल जाए और इससे तुम्हारे दिलों में फिर से यक़ीन पैदा हो जाए: मदद तो केवल अल्लाह की ही तरफ़ से होती है, वह बहुत ताक़तवाला, समझ-बूझ रखनेवाला है। (10)
याद करो जब अल्लाह ने तुम्हारी बेचैनी दूर करने के लिए (बद्र की लड़ाई से एक रात पहले) तुम्हें नींद दी, आसमान से तुम पर पानी बरसाया ताकि तुम साफ़-सुथरे हो सको, तुम्हारे अंदर (संदेह) की शैतानी गंदगियाँ दूर हो जाएं, तुम्हारे दिलों को मज़बूत बना दें और तुम्हारे पाँव (मज़बूती से) जमा दें। (11)
याद करो जब तुम्हारे रब ने फ़रिश्तों को 'वही' (Revelation) द्वारा कहा था, "मैं तुम्हारे साथ हूँ: तुम ईमानवालों के क़दम मज़बूती से जमाए रखो; मैं विश्वास न करने वालों के दिलों में डर बैठा दूँगा -----तुम उनकी गर्दनों के ऊपर वार करो, और उनकी अंगुलियों की पोर-पोर पर हमला करो।" (12)
यह इसलिए हुआ क्योंकि उन्होंने अल्लाह और उसके रसूल का विरोध किया था, और जो कोई अल्लाह और उसके रसूल का विरोध करे, तो उसे अल्लाह बहुत कठोर यातना देता है------ (13)
“यह है जो तुम्हें मिला है! अब चखो मज़ा!” ----- और (जहन्नम की) आग की यातना (सच्चाई पर) विश्वास करने से इंकार करने वालों के इंतज़ार में है। (14)
ईमानवालो, जब विश्वास न करनेवाले हमला कर दें और युद्ध में तुम्हारा उनके साथ सामना हो, तो कभी भी उन्हें पीठ न दिखाओ: (15)
अगर कोई भी ऐसे मौक़े पर पीठ दिखाता है ------ तो यह (पीठ दिखाना) अगर युद्ध में एक चाल के रूप में हो या दूसरी टुकड़ी से जा मिलने के लिए हो, तो और बात है----- नहीं तो वह अल्लाह के ग़ुस्से का भागी होगा, और जहन्नम उसका ठिकाना होगा, और क्या ही बुरा ठिकाना है वह! (16)
फिर क्या तुमने (युद्ध में) उनका क़त्ल किया?, नहीं, बल्कि अल्लाह ने उन्हें क़त्ल किया, और [ऐ रसूल!], आपने जब (जंग के मैदान में) उनकी ओर (एक मुट्ठी बालू) फेंका, तो असल में आपने (वह बालू) नहीं फेंका था (जिससे उनकी हार हुई), बल्कि वह अल्लाह ने फेंका था, ताकि वह ईमानवालों पर अपना ख़ास करम [favour] कर सके: अल्लाह हर बात को सुननेवाला, हर चीज़ को जाननेवाला है -------- (17)
"यह सब कुछ तो हो चुका"----- और यह (जान लो) कि अल्लाह इंकार करने वालों के हर मंसूबे को कमज़ोर कर देने वाला है। (18)
[ऐ मक्का के विश्वास करने से इंकार करने वालो], अगर तुम फ़ैसला चाहते थे, तो (बद्र के युद्ध में हारकर) फ़ैसला अब तुमने देख लिया है: अगर तुम (लड़ाइयों से) यहीं रुक जाओ, तो यह तुम्हारे लिए बहुत अच्छा होगा। अगर तुम (गुनाहों की तरफ़) फिर से मुड़े, तो हम भी (सज़ा देने की ओर) मुड़ेंगे, और तुम्हारा जत्था, चाहे वह (गिनती में) कितना ही बड़ा हो, तुम्हारे कुछ काम न आ सकेगा। अल्लाह ईमान रखनेवालों के साथ है। (19)
ईमानवालो, अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा का पालन करो: जब उनकी (सच्चाई की) बातें सुन रहे हो, तो मुँह न फेर लिया करो; (20)
और (देखो!) उन लोगों की तरह न हो जाना जिन्होंने (अपने मुँह से) कहा था, "हमने सुना," हालाँकि वे सुन नहीं रहे थे----- (21)
अल्लाह की नज़र में सबसे बुरा प्राणी वह है जो (जान-बूझकर) गूँगा-बहरा बना रहता है, जो बुद्धि से काम नहीं लेता। (22)
अगर अल्लाह यह जानता कि उनमें कुछ भी अच्छाई है, तो वह उन्हें सुनने की शक्ति ज़रूर देता, लेकिन अगर अल्लाह ने उन्हें (सुनने की) शक्ति दे दी होती, तब भी, उन्होंने इस पर कोई ध्यान न दिया होता, और मुँह फेरकर भाग गए होते। (23)
ईमानवालो, अल्लाह और उसके रसूल की बात मानो, जब वह तुम्हें उस चीज़ की ओर बुलाएं जो तुम्हें (रुहानी मौत की हालत से निकालकर) ज़िंदा कर दे। जान लो कि आदमी और उसके दिल (की इच्छाओं) के बीच (मौत के रूप में) अल्लाह आ जाता है, और फिर (अंत में) उसी के सामने तुम सब इकट्ठा किए जाओगे। (24)
उस विवाद से बचते रहो, जो अगर उठा, तो उसकी लपेट में केवल वही नहीं आएंगे जो तुम्हारे बीच अत्याचार करने वाले हैं: जान लो अल्लाह (बुरे कर्मों के लिए) दंड देने में बहुत कठोर है। (25)
याद करो (मक्का में) जब तुम गिनती में बहुत थोड़े थे, ज़मीन पर दबे हुए थे, डरे-सहमे रहते थे कि कहीं लोग तु्म्हें उचक कर न ले जाएं, पर अल्लाह ने (मदीना में) तुम्हें ठिकाना दिया, और अपनी मदद से तुम्हें मज़बूती दी, तुम्हें अच्छी चीज़ों की रोज़ी दी, ताकि तुम (अल्लाह का) शुक्र अदा करो। (26)
ऐ ईमान रखनेवालो!, तुम अल्लाह और उसके रसूल को धोखा न दो, या जानते-बूझते (किसी और के) भरोसे को न तोड़ो। (27)
जान लो, कि तुम्हारे माल और बाल-बच्चे तो केवल तुम्हारी परीक्षा लेने के लिए हैं, और (यह न भूलो कि) अल्लाह के पास बड़ा ज़बरदस्त इनाम है। (28)
ईमानवालो, अगर तुम अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से बचते रहे, तो वह तुम्हें (सही और ग़लत के बीच फ़र्क़ करने की) शक्ति देगा और तुमसे तुम्हारी बुराइयाँ मिटा देगा, और तुम्हें माफ़ कर देगा: अल्लाह का करम करना सचमुच बड़ी चीज़ है। (29)
(ऐ रसूल!), याद करें जब विश्वास न करने वालों ने (मक्का में) आपको क़ैद कर लेने, जान से मार देने, या (देश से) निकाल बाहर करने की साज़िश रची थी। उन लोगों ने अपनी योजना बनायी थी और अल्लाह ने अपनी: (याद रहे!) अल्लाह योजना बनाने में सबसे अच्छा है। (30)
जब कभी उनके सामने हमारी आयतें पढ़ी जाती हैं, तो वे कहते है, "हम यह सब पहले भी सुन चुके हैं---- अगर चाहें, तो इस तरह की बातें हम भी कह सकते हैं ----- यह और कुछ नहीं, बस पुराने ज़माने की कहानियाँ हैं।" (31)
उन लोगों ने यह भी कहा था, "ऐ अल्लाह! अगर सचमुच यह तेरी तरफ़ से सच्चाई की बातें हैं, तो हम पर आसमान से पत्थर बरसा दे, या हम पर कोई दर्दनाक यातना ही भेज दे।” (32)
मगर (ऐ रसूल), जब तक आप उनके बीच मौजूद हैं, अल्लाह उन लोगों पर कोई यातना नहीं भेजेगा, और न ही उन्हें सज़ा देगा, जबकि उनमें से (कुछ अपने गुनाहों की) माफ़ी मांग रहे हों, (33)
लेकिन, (आपके मक्का छोड़कर जाने के बाद) अल्लाह की ओर से अब उन्हें क्यों न सज़ा दी जाए, जबकि वे लोगों को पवित्र 'मस्जिद’ [काबा] जाने से रोकते हैं, हालाँकि वे उसके कोई (क़ानूनी) देखरेख करनेवाले नहीं हैं? उसकी असल देखरेख करनेवाले तो केवल वही हो सकते हैं, जो अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते हैं, मगर ज़्यादातर विश्वास न करने वाले इस बात को नहीं समझते। (34)
उस पवित्र घर [काबा] के पास उनकी नमाज़ तो बस सीटियाँ बजाने और तालियाँ पीटने के अलावा कुछ भी नहीं होतीं। “अतः विश्वास न करने के नतीजे में अब यातना का मज़ा चखो।” (35)
वे लोगों को अल्लाह के रास्ते से रोकने के लिए अपना धन ख़र्च करते हैं, और वे आगे भी ऐसा करते रहेंगे। अंत में यही उनके बड़े दुःख व पछतावे का कारण बनेगा: उन पर क़ाबू पा लिया जाएगा और उन्हें जहन्नम की ओर हँकाकर ले जाया जाएगा। (36)
अल्लाह अच्छों में से बुरे को छाँटकर अलग कर देगा, और बुरों को एक-के ऊपर-एक रख देगा---- एक साथ ऊपर तक ढेर बनाकर ---- फिर उन्हें जहन्नम में डाल देगा। यही लोग हैं जो घाटे में रहेंगे। (37)
(ऐ रसूल), आप (मक्का के) विश्वास न करने वालों से कह दें कि अगर वे पहले की गयी हरकतों को छोड़ दें, तो जो कुछ पहले हो चुका, उसे माफ़ कर दिया जाएगा, लेकिन अगर वे वही करते रहेंगे, तो फिर उनसे पहले गुज़र चुके लोगों का नतीजा क्या हुआ, वह उनके सामने है। (38)
[ईमानवालो!], उन लोगों से उस वक़्त तक युद्ध करते रहो, जब तक कि कोई जुल्म व अत्याचार बाक़ी न रहे, और (पवित्र काबा में) होने वाली सारी इबादतें केवल एक अल्लाह के लिए हो जाएं: अगर वे बुराइयों को छोड़ दें, तो जो कुछ वे करते हैं, अल्लाह की नज़रों से छिपा नहीं है, (39)
लेकिन अगर वे इन बातों पर कोई ध्यान नहीं देते, तो यक़ीन रखो कि अल्लाह तुम्हारा रखवाला है, और वह सबसे अच्छा रखवाला, और सबसे अच्छा मददगार है। (40)
यह बात जान लो कि युद्ध के बाद जो माल हाथ आ जाए, उसका पाँचवाँ हिस्सा अल्लाह और उसके रसूल का, उनके नज़दीकी रिश्तेदारों और यतीमों का, ज़रूरतमंदों और मुसाफ़िरों का है (जिसे अदा करना ज़रूरी है)। अगर तुम अल्लाह पर और उस (फ़रिश्तों से की गयी मदद) पर यक़ीन रखते हो जो हमने अपने बन्दे पर 'फ़ैसला कर देनेवाले दिन' उतारी थी, जिस दिन दोनों सेनाएं (बद्र के) युद्ध में टकरायी थीं। (याद रहे!) सारी चीज़ें अल्लाह के क़ाबू में हैं। (41)
याद करो जब तुम (बद्र में) घाटी के नज़दीकवाले छोर पर थे, उधर (मक्का से आते हुए) दुश्मन घाटी के दूरवाले छोर पर थे और (मक्का के व्यापारियों का) कारवाँ तुमसे नीचे की ओर था (जो समंदर के किनारे-किनारे निकल गया था)। अगर तुमने युद्ध करने का समय पहले से तय किया होता, तो तुम (विवाद के चलते) ज़रूर युद्ध न कर पाते, (मगर वह युद्ध हुआ) इसलिए कि अल्लाह ने जिस बात का होना पहले से तय कर रखा था, वह बात सामने आ सके, ताकि जिन्हें मरना लिखा था, वे स्पष्ट प्रमाण देखकर मर सकें, और जिन्हें ज़िंदा रहना था, वे भी स्पष्ट़ प्रमाण देखकर ज़िंदा रहें -----अल्लाह सब (की) सुननेवाला, सब कुछ देखनेवाला है। (42)
[ऐ रसूल], याद करें जब अल्लाह ने आपको ख़्वाब में उन (दुश्मनों) की संख्या कम करके दिखायी: अगर अल्लाह ने तुम [ईमानवालों] को उनकी संख्या ज़्यादा दिखायी होती, तो तुम ज़रूर ही हिम्मत हार बैठते और इस मामले में झगड़ने लग जाते, मगर अल्लाह ने तुम्हें (उस हालत से) बचा लिया। (याद रहे!) वह दिलों के अंदर छिपे हुए राज़ को भी जानता है। (43)
जब तुम्हारा आमना-सामना हुआ, तो अल्लाह ने तुम्हारी निगाहों में उनकी संख्या कम करके दिखायी, और अल्लाह ने तुम्हें भी उन (दुश्मनों) की निगाहों में कम करके दिखाया, ताकि जो बात होने वाली थी, वह सामने आ जाए: सारे मामले अल्लाह की मर्ज़ी पर टिके होते हैं। (44)
ईमानवालो, जब युद्ध में किसी सेना से तुम्हारा मुक़ाबला हो जाए, तो मज़बूती से अपने क़दम जमाए रखो, और ज़्यादा से ज़्यादा अल्लाह को याद करते रहो, ताकि तुम्हें कामयाबी मिल सके। (45)
अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा मानो, और आपस में झगड़ा न करो, नहीं तो हिम्मत हार बैठोगे और तुम्हारी हवा उखड़ जाएगी। (मुसीबतों में) सब्र व धीरज से काम लो: अल्लाह उनका साथी है जो धीरज रखने वाले हैं। (46)
और (देखो!) उन लोगों की तरह न हो जाना जो अपने घरों से इतराते हुए निकले थे, लोगों को अपनी शान दिखाते हुए, और दूसरों को अल्लाह के रास्ते से रोकते हुए------- जो कुछ वे करते हैं, अल्लाह को उसकी पूरी ख़बर है। (47)
फिर ऐसा हुआ कि शैतान ने उन (काफ़िरों) के कुकर्मों को उनके लिए बड़ा सुहावना बनाकर दिखाया, और कहने लगा, "आज कोई नहीं है जो तुमको हरा सकता हो, क्योंकि मैं तुम्हारे बिल्कुल साथ खड़ा रहूँगा," मगर जब सेनाएं आमने-सामने दिखायी देने लगीं, तो वह उलटे पाँव वापस हुआ, और कहने लगा, "मैं अब तुम्हारा साथ छोड़े जाता हूँ: मैं वह चीज़ देख रहा हूँ, जो तुम नहीं देख सकते, और मुझे अल्लाह से डर लग रहा है ----- अल्लाह (बुरे कर्मों की) बड़ी कठोर यातना देने वाला है।" (48)
और जब ऐसा हुआ था कि पाखंडियों [Hypocrites] और वे लोग जिनके दिलों में (ईमान की कमज़ोरी का) रोग था, कहते थे, "इन (ईमान रखनेवाले) लोगों को तो इनके धर्म ने धोखे में डाल रखा है", मगर जो कोई भी अल्लाह पर भरोसा करे, तो निश्चय ही अल्लाह बहुत ताक़तवाला, समझ-बूझ रखनेवाला है। (49)
काश कि (ऐ रसूल!) आप देख सकते जब फ़रिश्ते इंकार करनेवालों की जान निकालते हैं, किस तरह वे उनके चेहरों और उनकी पीठों पर मारते जाते हैं: उनसे कहा जाएगा, "अब (जहन्नम की) आग की सज़ा का मज़ा चखो, (50)
यह उन्हीं (बुरे कर्मों) का नतीजा है जो कुछ (कर्म) तुम्हारे हाथों ने तुम्हारे लिए जमा करके रखा: अल्लाह तो अपने प्राणियों पर कभी भी अन्याय नहीं करता। (51)
ये लोग भी फ़िरऔन [Pharaoh] के लोगों, और उनसे पहले के लोगों की तरह हैं, जिन्होंने अल्लाह की निशानियों को ठुकरा दिया, अत: अल्लाह ने उनके गुनाहों के कारण उन्हें सज़ा दी: अल्लाह बहुत ताक़तवाला, और (बुरे कर्मों की) सज़ा देने में बहुत सख़्त है। (52)
(अल्लाह ने) ऐसा इसलिए किया कि जब वह किसी क़ौम के लोगों पर अपनी नेमतें उतारता है, तो उसे उस वक़्त तक नहीं बदलता है, जब तक कि वे लोग ख़ुद अपनी हालत न बदल डालें। अल्लाह सब (की) सुनता, सब कुछ जानता है। (53)
वे सचमुच फ़िरऔन के लोगों और उनसे पहले के लोगों की तरह हैं, जिन्होंने अपने रब की निशानियों को मानने से इंकार किया था: हमने उनके गुनाहों की वजह से उन्हें तबाह व बर्बाद कर दिया, और फ़िरऔन के लोगों को दरिया में डुबा दिया था----- वे सभी शैतानियाँ करने वाले लोग थे। (54)
अल्लाह की नज़र में सबसे बुरे प्राणी वे लोग हैं, जो उसे मानने से इंकार करते हैं और वे (सच्चाई पर) कभी विश्वास करने वाले नहीं; (55)
जिनके साथ (ऐ रसूल!), आप जब कभी कोई संधि [Treaty] करते हैं, तो वे उसकी शर्तों को (हर बार) तोड़ डालते हैं, क्योंकि उन्हें (वचन तोड़ने) का कोई डर नहीं है। (56)
(ऐसी हालत में) अब अगर जंग के मैदान में तुम्हारा सामना उनके साथ हो जाए, तो उन्हें ऐसी सज़ा दो कि वे (जान लेकर) भाग खड़े हों, और उनके पीछे आने वाले (मक्का के) लोगों के लिए एक डरावनी मिसाल बन जाए, हो सकता है कि वे इससे सबक़ सीखें (कि वचन तोड़ने का नतीजा क्या होता है)। (57)
और अगर तुम्हें किसी क़ौम के लोगों की तरफ़ से विश्वासघात [treachery] होने का पता लग जाए, तो तुम उनसे की हुई संधि को समाप्त करने की साफ़-साफ़ घोषणा कर दो (ताकि दोनों गिरोह को बराबरी का मौक़ा मिल सके), क्योंकि अल्लाह विश्वासघात करने वाले लोगों को पसंद नहीं करता। (58)
विश्वास न करनेवालों को यह नहीं समझना चाहिए कि वे बच निकले हैं; वे हमारे चंगुल से निकल नहीं सकते। (59)
(ईमानवालो!) उनके साथ (युद्ध के लिए), जितना तुम इकट्ठा कर सको, सैनिकों की टुकड़ियाँ और साथ में लड़ाकू घोड़े तैयार रखो, ताकि इससे अल्लाह के दुश्मनों और अपने दुश्मनों को डरा सको, और उन दूसरे लोगों को भी चेतावनी दे सको जिन्हें तुम नहीं जानते मगर अल्लाह जानता है। अल्लाह के रास्ते में (संघर्ष के लिए) तुम जो कुछ भी ख़र्च करोगे, वह तुम्हें पूरा-पूरा चुका दिया जाएगा, और तुम्हारे साथ कोई अन्याय नहीं होगा। (60)
लेकिन अगर वे शांति व सुलह की ओर झुकें, तो (ऐ रसूल!), आप भी ज़रूर इसकी तरफ़ झुक जाएं, और अल्लाह पर अपना भरोसा रखें: वह सब (की) सुनता है, सब कुछ जानता है। (61)
अगर वे आपको धोखा देने का इरादा करें, तो आपके लिए अल्लाह काफ़ी है: वही तो है जिसने अपनी ख़ास मदद से आपको मज़बूती दी, (62)
और ईमानवालों के हाथों भी (मज़बूती दी), और उनके दिल आपस में एक-दूसरे से जोड़ दिए। अगर आपने इस ज़मीन की सारी चीज़ें भी दे दी होतीं, तब भी आप यह नहीं कर पाते, मगर अल्लाह (ने उनके दिल मिला दिए और) उन्हें एक साथ ले आया: अल्लाह बहुत ताक़तवाला, और (अपने कामों में) बहुत समझ-बूझ रखनेवाला है। (63)
ऐ नबी [Prophet]! आपके लिए और आपके पीछे चलने वाले ईमानवालों के लिए तो अल्लाह ही काफ़ी है। (64)
ऐ नबी! ईमान रखनेवालोें को आप लड़ाई लड़ने पर उभारें: अगर (लड़ाई में) तुम्हारे बीस आदमी हों जो (मुश्किल झेलते हुए) अपने क़दम जमाए रहें, तो वे दो सौ पर भारी पड़ेंगे, और अगर तुम्हारे सौ आदमी हों जो अपने क़दम जमाए रहें, तो वे (सच्चाई पर) विश्वास न करने वालों के एक हज़ार पर भारी पड़ेंगे, क्योंकि वे ऐसे लोग हैं जिनमें समझ-बूझ नहीं है। (65)
मगर अल्लाह ने यह देखते हुए कि तुम्हारे अंदर कुछ कमज़ोरियाँ हैं, अब तुम्हारा बोझ हल्का कर दिया है ---- अल्लाह के हुक्म से, अब तुम्हारे सौ आदमी अगर अपने क़दम जमाए रहें, तो वे दो सौ लोगों को हरा देंगे, और अगर तुममें से ऐसे हज़ार होंगे तो वे दो हज़ार पर जीत हासिल कर लेंगे: (याद रहे!) अल्लाह उन लोगों का साथ देता है जो सब्र के साथ अपने क़दम जमाए रखते हैं। (66)
जब तक कि युद्ध के मैदान में पूरी तरह जीत हासिल न कर ली हो, किसी नबी के लिए यह सही नहीं होगा कि वह किसी को क़ैदी बना ले। तुम (लोग) इस संसार की क्षण-भर में ख़त्म होने वाली चीज़ें चाहते हो, जबकि अल्लाह (तुम्हारे लिए) आख़िरत [Hereafter] (का इनाम) चाहता है---- अल्लाह बहुत ताक़तवाला, समझ-बूझ रखनेवाला है--- (67)
और अगर (इस बारे में) अल्लाह द्वारा पहले से ही तय किया हुआ न होता, तो जो कुछ (जंग में लूटा हुआ माल और धन की उम्मीद में पकड़े गए क़ैदी) तुमने लिया है, उसके लिए तुम पर ज़रूर कोई कठोर यातना आ चुकी होती। (68)
बहरहाल, युद्ध के बाद जो कुछ माल तुम्हारे हाथ आ गया है, उन चीज़ों का अच्छे और उचित (lawful) तरीक़े से मज़ा उठाओ और अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते रहो: वह (गुनाहों को) बहत माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है। (69)
ऐ नबी! जो युद्ध के क़ैदी आपके क़ब्जे में हैं, उनसे कह दें, “अगर अल्लाह ने तुम्हारे दिलों में कुछ भी भलाई पायी, तो जो तुमसे ले लिया गया है, उससे कहीं बेहतर चीज़ वह तुम्हें दे देगा, और वह तुम्हें माफ़ कर देगा: अल्लाह बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है।" (70)
लेकिन अगर वे तुम्हारे साथ विश्वासघात करना चाहते हों, तो वे इससे पहले अल्लाह के साथ भी विश्वासघात कर चुके हैं, और इसी के चलते तुम्हें उन पर पूरा अधिकार दे दिया है: (याद रहे), अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, बड़ा समझ बूझ रखनेवाला है। (71)
जिन लोगों ने (सच्चाई पर) विश्वास [ईमान] कर लिया और वे हिजरत (करके मदीना) चले गए, और अल्लाह के रास्ते में अपने मालों और अपनी जानों के साथ संघर्ष [जिहाद] किया, और जिन लोगों ने उन मक्कावालों को (मदीना में) शरण दी और उनकी मदद की, ऐसे सभी लोग एक-दूसरे के साथी (allies) हैं। रहे वे लोग जिन्होंने विश्वास तो कर लिया, मगर हिजरत (कर मदीना) नहीं गए, तो उनकी हिफ़ाज़त की ज़िम्मेदारी आप पर तब तक नहीं है, जब तक कि वे (मदीना तक) हिजरत न कर लें। लेकिन अगर वे (दीन के चलते) अपने ऊपर हो रहे ज़ुल्म के ख़िलाफ़ आप से मदद मांगें, तो आपका फ़र्ज़ बनता है कि आप उनकी मदद करें, सिवाए ऐसे गिरोह के मुक़ाबले में जिनके साथ आपने (दुश्मनों के अदला बदली न करने की) कोई संधि कर रखी हो: जो कुछ भी तुम करते हो, अल्लाह सब देखता है। (72)
और (देखो!) विश्वास न करनेवाले लोग भी एक-दूसरे की मदद करते हैं। अगर तुम [ईमानवाले] भी एक-दूसरे की मदद नहीं करोगे, तो ज़मीन पर अत्याचार होगा और बड़ा भारी फ़साद [corruption] पैदा होगा। (73)
जिन लोगों ने (सच्चाई पर) विश्वास किया और हिजरत कर (के मदीना चले) गए, और अल्लाह के रास्ते में संघर्ष [जिहाद] किया, और जिन लोगों ने उन (मुहाजिरों) को शरण दी और उनकी मदद की ----- वही सच्चे ईमानवाले हैं, उनके (गुनाह) माफ़ कर दिए जाएंगे और उन्हें दिल खोलकर रोज़ी दी जाएगी। (74)
और जो लोग बाद में ईमान लाए, और हिजरत कर (मदीना) पहुंचे और आपके साथ मिलकर जिहाद किया, तो ऐसे लोग भी आप ही का हिस्सा हैं, मगर अल्लाह की किताब के अनुसार (विरासत/ inheritance में) रिश्तेदारों का (दूसरों से) ज़्यादा हक़ बनता है: अल्लाह को हर चीज़ की पूरी जानकारी है। (75)
नोट:
1: बद्र की जंग के
मौक़े पर जब मक्कावालों की हार हो गई और वे मैदान छोड़कर भागने लगे तो मुसलमानों की
फ़ौज तीन हिस्सों में बँट गई-- एक हिस्सा मुहम्मद (सल्ल) की हिफ़ाज़त के लिए उनके साथ
रहा, दूसरा हिस्सा
दुश्मनों को खदेड़ने में लगा रहा, और तीसरा हिस्सा दुश्मनों के क़ैदियों और उनके छोड़े हुए माल को जमा करने में
लगा रहा। जिन लोगों के क़ब्ज़े में लूटा हुआ माल [अनफाल] आया, उन्हें लगा कि इस
माल पर केवल उन्हीं का अधिकार है, जबकि बाक़ी दोनों हिस्सों ने भी बराबरी से युद्ध में भाग लिया था, इसलिए उस लूट के
माल में उन लोगों ने भी अपने अधिकार माँगे, इस पर तीनों हिस्से के बीच आपस में बहसें होने लगीं। अभी तक क़ुरआन में ऐसे माल
के बंटवारे के बारे में कोई हुक्म नहीं आया था। इस आयत में पहली बार साफ़ तौर से
बताया गया कि लूट के माल पर अधिकार तो अल्लाह और उसके रसूल का ही है, इसलिए उसके बंटवारे
का अधिकार भी अल्लाह और उसके रसूल का ही होगा। फिर आगे आयत 41 में लूटे हुए माल
का बंटवारा किस तरह होगा उसके बारे में हुक्म भी आ गया।
5: मक्का में 13 साल तक ज़ुल्म व
सितम सहने के बाद मुसलमान अपना घर-बार छोड़ने पर मजबूर हुए और उन लोगों ने हिजरत [migration] करके मदीना में
पनाह ले ली। मक्का में रहने तक उन्हें अपनी रक्षा में भी लड़ने का कोई हुक्म नहीं दिया गया था।
मगर अब उन्हें अपनी रक्षा में हथियार उठाने के लिए कहा गया, सो उसकी शुरुआत
आते-जाते व्यापारिक कारवाँ पर छापा मारने से हुई, मगर यह काम छिटपुट ही किए गए। इतने में मुसलमानों को
ख़बर मिली कि क़ीमती सामानों से लदा हुआ मक्का का एक बहुत बड़ा कारवाँ अबु सुफ़ियान के
नेतृत्व में सीरिया से लौट रहा है, इस कारवाँ में मक्का के ढेर सारे लोगों ने काफ़ी पैसा लगाया था, इसमें मक्का से हिजरत करके
गए लोगों की छोड़ी गई संपत्तियाँ भी शामिल थीं। मगर अबु सुफ़ियान को कारवाँ पर छापा मारने की भनक लग
चुकी थी, इसलिए उसने पहले ही इस बात की ख़बर मक्का भेज दी, और कारवाँ का
रास्ता बदलते हुए (बद्र से होकर जाने वाले रास्ते को छोड़कर) दूर समुद्र के
किनारे-किनारे जाने वाले रास्ते से मक्का चल दिया। इधर मक्का में ख़बर पहुँचते ही
अबु जहल की कमान में 1000 सैनिकों की भारी फ़ौज कारवाँ की रक्षा करने और मुसलमानों
को सबक़ सिखाने के लिए तुरंत ही मदीना की तरफ़ निकल पड़ी। जब तक मुसलमान इस क़ाफ़िले पर
छापा मारने के इरादे से मदीना से 115 किमी. दूर दक्षिण-पश्चिम की तरफ़ "बद्र" नाम की जगह पहुँचे, जो कि सीरिया से
मक्का जाने वाले व्यापारिक मार्ग पर था, तब पता चला कि कारवाँ तो दूर समुद्र वाले रास्ते से चला गया, और यह कि मक्का की
एक बहुत बड़ी सेना उनके काफ़ी नज़दीक आ पहुँची है। अब मुसलमानों को यह फ़ैसला करना था
कि या तो मदीना वापस चले जाएं क्योंकि काफ़िला तो चला गया, या फिर मक्का की
बड़ी सेना से मुक़ाबला करें। मुहम्मद सल्ल ने इस बारे में जब अपने सहाबियों
[साथियों] से सलाह-मशविरा किया, तो उनमें से कुछ लोगों का कहना था कि चूँकि हम दुश्मन के मुक़ाबले में गिनती
में बहुत कम हैं इसलिए उनसे लड़ना मौत के मुँह में जाने जैसा है, और वैसे भी हम तो
क़ाफ़िले पर छापा मारने के इरादे से आए थे, इसलिए वापस मदीना चलना चाहिए, जबकि कुछ सहाबी पूरे जोश में थे और मुक़ाबला करने के लिए तैयार थे ताकि मक्का
के मुश्रिकों की कमर तोड़ दी जाए। फिर फ़ैसला मुक़ाबला करने के हक़ में हुआ।
9: मुसलमानों की मदद
के लिए बद्र की जंग में अल्लाह ने फ़रिश्ते भेजे थे, इसका ज़िक्र 3:124-126 में भी आया है। अल्लाह चाहता तो बिना फ़रिश्ता भेजे भी
मदद कर सकता था, मगर वह अपने हर काम
में किसी को ज़रिया बनाता है, और इंसान की फ़ितरत यह है कि उस ज़रिये को देखकर उसे यक़ीन व ख़ुशी मिलती है, हालाँकि आदमी को
हमेशा यह सोचना चाहिए कि यह ज़रिया भी अल्लाह का ही पैदा किया हुआ है, और असल में भरोसा
अल्लाह पर ही करना चाहिए।
11: बद्र की जंग में
मुसलमानों की फ़ौज ने जहाँ पड़ाव डाला था वह जगह रेतीली थी और वहाँ पानी की भी कमी
थी, जब बारिश हुई तो वह
रेत जम गई और क़दम ठीक से जमने लगे, पीने के पानी की भी कमी न रही। दूसरी तरफ़ दुश्मनों ने जहाँ डेरा डाला था वहाँ
की मिट्टी बारिश की वजह से कीचड़ हो गई थी।
17: जंग शुरू होने से
पहले मुहम्मद सल्ल ने अल्लाह से जीत की दुआ की और दुश्मनों की हार की निशानी के
तौर पर एक मुठ्ठी बालू और कंकर लेकर उनकी तरफ़ फेंका, जो बताया जाता है
कि उनके हर फ़ौजी की आंख में लगा जिससे उनके लश्कर में अफ़रा-तफ़री मच गई।
21: मदीना में पाखंडी
लोग ऐसे थे जो ऊपर से यह दिखावा करते थे कि वे रसूल की बातों को सुन रहे हैं, मगर असल में वे न
तो सुनते थे और न ही समझते थे, क्योंकि असल में सुनने और समझने का मतलब तो यह है कि आदमी को जिन चीज़ों से
रोका जाए उनसे रुक जाए और जिन चीज़ों को करने का हुक्म दे उसे करे।
22: इंसानों में समझने
की सलाहियत दी गई है, और उनसे यह उम्मीद
की जाती है कि वह सोच-समझकर कोई रास्ता अपनाएं, लेकिन अगर वे समझने की कोशिश ही न करें, तो फिर वे जानवरों
से भी बदतर हैं।
24: "आदमी और उसके दिल
के बीच अल्लाह आ जाता है" के कई मतलब बताए गए हैं। एक मतलब तो यह है कि अल्लाह
मौत देकर आदमी को उसके दिल की इच्छाओं से यानी ज़िंदगी से अलग कर देता है। दूसरा
मतलब यह हो सकता है कि जो आदमी सच्चाई की तलाश में लगा रहता है, और कभी उससे कोई
गुनाह होने वाला हो, तो वह अगर तुरंत
अल्लाह की तरफ़ झुककर मदद मांगे, तो अल्लाह उसके और गुनाह के बीच आड़ बन जाता है और आदमी गुनाह करने से बच जाता
है।
25: बुरे काम करना और
बुरे काम को रोकने की कोशिश नहीं करना, इनका प्रभाव पड़ता है और समाज में रहने वाले ऐसे आदमियों पर भी पड़ता है जो इन
बुरे कामों में शामिल नहीं होते, क्योंकि अक्सर आदमी के पास कोई और चारा नहीं होता, बल्कि जब वह एक
समाज में रहता है तो उस पर दूसरे लोग के कामों का असर ज़रूर पड़ता है।
28: माल और औलाद से लगाव
तो हर इंसान में क़ुदरती तौर से पाया जाता है जो एक हद तक हो तो इसमें कोई बुराई भी
नहीं, बल्कि अल्लाह के
हुक्म को मानते हुए यह मुहब्बत की जाए तो इसके लिए इनाम मिलेगा, लेकिन यही मुहब्बत
अगर हद से बढ़ जाए जिससे आदमी अल्लाह को ही भूल जाए या उसके आदेशों को मानने से
इंकार करने लगे, तो फिर यह एक वबाल
है।
29: गुनाह आदमी की
बुद्धि को ख़राब कर देता है जिससे आदमी सही को ग़लत और गलत को सही समझने लगता है।
30: मक्का में और उसके
बाहर भी इस्लाम धीरे-धीरे फैल रहा था और फिर ख़बर मिली कि मदीना में काफ़ी तेज़ी से
लोग मुसलमान हो रहे हैं, इधर मक्का में मुहम्मद (सल्ल) के चाचा अबु तालिब की मौत के बाद उनके क़बीले की
तरफ़ से मिली हुई सुरक्षा की गारंटी उनके लिए ख़त्म हो गई थी, वहाँ के लोगों ने
इस्लाम की जड़ ही काट देने के लिए एक बैठक बुलाई जिसमें मुहम्मद (सल्ल) के ख़िलाफ़
योजनाएं बनायी गईं जिसका ज़िक्र इस आयत में हुआ है। मगर अल्लाह ने सारी बातों की
ख़बर अपने रसूल को दे दी और तुरंत उन्हें वहाँ से चुपचाप मदीना चले जाने [हिजरत/migration] का आदेश दिया जिससे
दुश्मनों को इस बात की भनक तक न लग सके।
36: मक्का के लोगों ने
मुहम्मद (सल्ल) और उनके साथियों के ख़िलाफ़ सेना तैयार करने में काफ़ी धन ख़र्च किया
था, क्योंकि सीरिया से
आ रहे कारवाँ में उनके काफ़ी धन लगे हुए थे।
38: मक्का के विश्वास न
करने वालों से कहा जा रहा है कि जिस तरह उन लोगों ने ईमानवालों पर ज़ुल्म व
अत्याचार किए और रात-दिन उनके विरुद्ध योजनाएं बनायीं, अगर वे अपनी इन
हरकतों से रुक जाएं तो उन्हें माफ़ कर दिया जाएगा, लेकिन अगर उन लोगों ने इन हरकतों को जारी रखा, तो जिस तरह बद्र की
लड़ाई में उनकी हार हुई, आगे भी उनका ऐसा ही अंजाम होगा।
39: ऐसी ही आयत सूरह
बक़रा (2:193) में भी है। मक्का
के विश्वास न करनेवालों ने हिजरत से पहले जिस तरह से मुसलमानों के साथ ज़ुल्म व
अत्याचार किए, फिर हिजरत के बाद
भी जो थोड़े मुसलमान मक्का में रह गए थे, उनके साथ जैसा बर्ताव और अत्याचार हुआ, इसके ख़िलाफ मुसलमानों को लड़ने के लिए कहा गया है, और उस वक़्त तक लड़ने
को कहा गया है जबतक कि मक्का और उसके आसपास वह अत्याचार पूरी तरह समाप्त न हो जाए।
चूँकि वहाँ ज़ुल्म उन्हीं लोगों पर हो रहा था जो कि एक अल्लाह को मानने वाले थे, इसलिए यह ज़ुल्म भी
तभी ख़त्म हो सकता था जबतक कि पवित्र काबा में एक अल्लाह का दीन स्थापित न हो जाता।
41: युद्ध के बाद
दुश्मन का जो माल हाथ आ जाए, उसे "ग़नीमत" का माल कहते हैं।
आयत 1 में इस माल के
बंटवारे के बारे में जो सवाल उठाए गए थे, उसका यहाँ तरीक़ा बताया गया है। जो भी माल हाथ आ जाए उसका पाँच हिस्सा करना है, उसमें से चार
हिस्सा तो युद्ध लड़ने वालों का होगा, मगर पाँचवाँ हिस्सा [ख़ुम्स] सरकारी ख़ज़ाने में जाएगा, फिर उस पाँचवें
हिस्से को अल्लाह के रसूल, उनके नज़दीकी रिश्तेदारों (जिन्हें ज़कात लेना मना है), अनाथों, ज़रूरतमंदों और
मुसाफ़िरों में बाँटना है।
43: मक्का की हमला करने
वाली सेना में क़रीब 1000 लोग थे, जबकि मुसलमानों की
संख्या 313 बतायी जाती है। अगर
मुसलमानों को दुश्मनों की सही संख्या मालूम होती, तो हो सकता था कि वे हिम्मत हार जाते।
47: यहाँ उन मक्कावालों
का ज़िक्र है जो सीरिया से वापस आते हुए कारवाँ को बचाने के लिए (8:5) और मुहम्मद (सल्ल)
और उनके साथियों को हराने के लिए एक बड़ा भारी लश्कर लेकर अपने घरों से इतराते हुए
और शान दिखाते हुए निकले थे।
48: इसका एक मतलब तो यह
बताया जाता है कि शैतान ने असल में यह बात नहीं कही, बल्कि उसने मक्कावालों के दिलों में उनके जीतने की
बात इस तरह बैठा दी कि वे अपने घमंड में इतराते हुए जंग करने गए, मगर वहाँ पहुँचकर
जब दुश्मनों की फ़ौज देखी तो जो झूठा आत्मविश्वास शैतान की वजह से था, वह एकदम से हवा हो गया और वे
बुरी तरह डर गए।
एक दूसरा मतलब है कि मक्कावाले जब जंग के लिए निकले, तो उन्हें डर था कि
कहीं उनके मक्का में न होने से पास का एक क़बीला जिससे कुछ झमेला चल रहा था, वह मक्का पर हमला न
कर दे। बताते हैं कि शैतान भेस बदलकर उसी क़बीले का सरदार बनकर आया और उनमें ख़ूब
जोश भरने के साथ साथ यह भी भरोसा दिलाया कि वह मक्का पर हमला नहीं करेगा। वह साथ
में बद्र तक गया भी, मगर जैसे ही दोनों
सेनाएं आमने-सामने हुईं, वह मारे डर के भाग खड़ा हुआ, क्योंकि उसने दुश्मनों की फ़ौज में फ़रिश्तों को देख लिया था।
49: जब ईमानवालों ने
बहुत कम साज़-सामान के साथ इतने बड़े लश्कर से टक्कर ले ली तो पाखंडियों और उन जैसे
लोगों ने कहा था कि ये लोग अपने ईमान के घमंड में चूर हैं, वरना इतनी बड़ी फ़ौज
से टक्कर नहीं लेते।
53: अल्लाह इंसानों को
अक़्ल देता है, ताक़त देता है, काम करने की आज़ादी
देता है, ज़िंदगी जीने के लिए
अच्छी चीज़ें देता है, ताकि वे अच्छे काम
कर सकें और अल्लाह की इबादत कर सकें। मगर वे धीरे-धीरे इन नेमतों से मुंह मोड़ लेते
हैं और इसके बदले गुनाह करते हैं और अल्लाह पर ईमान खो बैठते हैं। इस तरह ऐसे लोग
नेमतें मिलने के बाद ख़ुद ही अपनी हालत बदल डालते हैं। कुछ विद्वान इसे मक्का के
क़ुरैश क़बीले के लोगों से जोड़ते हैं जिन्हें मुहम्मद (सल्ल) के रूप में इतनी बड़ी
नेमत मिली जो उन्हीं लोगों में से थे, मगर केवल अपनी ज़िद्द व हठधर्मी के चलते उन लोगों ने
सच्चाई को क़बूल नहीं किया और उन्हें घर से निकल जाने पर मजबूर किया। इस तरह जब
लोगों ने अपनी हालत इस तरह बदल ली तो अल्लाह ने नेमत के बदले उन्हें सज़ा देने का
फ़ैसला कर लिया।
56: मदीना के आसपास
रहने वाले यहूदियों के क़बीले: बनु नज़ीर और बनु क़ुरैज़ा के साथ मुहम्मद (सल्ल) ने
शांति संधि की थी, जिसमें यह शर्त थी
कि वे एक दूसरे के दुश्मन का साथ नहीं
देंगे, मगर इन दोनों
क़बीलों ने संधि की शर्तों को तोड़ते हुए मक्का के विश्वास न करनेवालों के साथ
ख़ुफ़िया सांठ-गांठ कर ली थी।
58: जिसके साथ संधि [Treaty] की गई है, अगर ऐसी आशंका है
और यह पता चलता है कि उसने धोखा देते हुए [Treachery] उसकी शर्तों को तोड़ा है, तो मुसलमानों को
चुपके से कोई कार्रवाई नहीं करनी चाहिए, बल्कि साफ़ तौर से संधि को तोड़ने की घोषणा कर देनी चाहिए। हाँ, अगर दूसरा पक्ष
उसकी शर्तों को खुले आम तोड़ देता है, तो फिर मुसलमानों को भी इस संधि को तोड़ने की घोषणा करना ज़रूरी नहीं है।
59: यह उन मक्का के
(काफ़िर) लोगों के बारे में है जो बद्र की लड़ाई में बचकर भाग निकले थे।
60: "ऐसे लोगों को
चेतावनी दे सको जिन्हें तुम नहीं जानते.." इसका मतलब ऐसे पाखंडी लोग हो सकते हैं जिनके बारे में अभी
पता नहीं था कि वे असल में दुश्मन हैं, या वे दुश्मन जिनसे बाद में लड़ाइयाँ होंगी जैसे फ़ारस और बाइज़ेंटाइन की सेनाओं
से।
65-66: मक्का में क़रीब 13 साल मुसलमानों ने
विश्वास न करने वालों के ज़ुल्म व अत्याचार सहे, मगर हथियार नहीं उठाया। फिर वे अपना घर-बार छोड़कर
मदीना जाने के लिए मजबूर हुए। वहाँ मुसलमानों की छोटी सी रियासत क़ायम हुई, पर चारों तरफ़ से
ख़तरा मंडरा रहा था, ऐसे में बद्र की
लड़ाई हुई जिसमें मुसलमानों को जीत हासिल हुई, मगर ज़ाहिर है कि दुश्मन चुपचाप बैठने वाला न था, बल्कि वह पूरी ताक़त से फिर हमला करने वाला था। इसलिए
लोगों को लड़ाई के लिए तैयार रहने के लिए उभारा गया है।
अगर दोनों पक्ष सब चीज़ में बराबर हों, यानी साज़-सामान, हथियार, साधन [resources] आदि में, तो एक ईमानवाला दस
विश्वास न करनेवाले [काफ़िर] पर भारी पड़ेगा, और इसका कारण है कि उसके पास ईमान की ताक़त होती है, वह मौत से नहीं
डरता, उसे दुनिया का कोई
लोभ नहीं होता, उसे पता है कि उसे
जन्नत में कभी ख़त्म न होने वाला आनंद मिलेगा, और ये सारी ख़ूबियाँ काफ़िरों में नहीं होती। मगर जिस समय यह आयत उतरी, यानी बद्र की लड़ाई
के बाद, उस वक़्त मुसलमानों
के पास न तो सही तरीक़े से लड़ने के साधन थे और न ही उनके पास लड़ने की ट्रेनिंग थी।
इसीलिए वे इन कमज़ोरियों के चलते लड़ाई में अपने से केवल दुगनी ताक़त के ही दुश्मन को
हरा सकते थे। बद्र की लड़ाई में वह अपने से तीन गुना ताक़त वाली सेना को हरा पाए
क्योंकि मुसलमानों को अल्लाह ने फ़रिश्तों से भी मज़बूती दी थी। बहरहाल, जब मुसलमान भी साज़
व सामान, साधन और लड़ने की
ट्रेनिंग आदि में दुश्मन के बराबर हो गए, तो उसके बाद लड़ी गई जंगों में उन्होंने दुश्मन की 5 गुना, 10 गुना और 20 गुना ज़्यादा मज़बूत सेना को भी
हराया था।
67: यहाँ बद्र की लड़ाई
में 70 आदमियों को क़ैदी
बना लेने के बाद उनकी जान के बदले धन [ransom] लेकर छोड़ देने को नापसंद किया गया है, हुआ यूँ था कि
मुहम्मद (सल्ल) ने लोगों से राय मांगी थी कि क़ैदियों को धन के बदले छोड़ दिया जाए
या इन्हें मार डाला जाए, ज़्यादातर लोगों ने धन लेकर छोड़ने की बात की थी क्योंकि एक तो वे अपने घर-बार छोड़कर आए थे और उन्हें हर काम के लिए धन
की ज़रूरत थी और दूसरे उम्मीद थी कि इनमें से कुछ लोग ईमानवाले हो जाएंगे, लेकिन चूँकि बद्र
की जंग पहली पहली जंग थी, इसलिए इस मौक़े पर सही यही होता कि दुश्मनों की ताक़त को पूरी तरह कुचल डाला जाता
जिससे आगे के लिए भी उनकी कमर टूट जाती, और वे आगे लड़ने से डरते, मगर उन्हें धन लेकर रिहा कर देने से यह हुआ कि उन
लोगों ने फिर से जाकर अपनी सेना को मज़बूती दी।
68: यह मुसलमानों के
लिए पहली जंग थी, और इससे पहले तक
नबियों के लिए यही हुक्म था कि युद्ध में लूटा हुआ माल नहीं लेना चाहिए बल्कि उसे
नष्ट कर देना चाहिए, इसी तरह क़ैदियों को
भी उस ज़माने में आम तौर से मार दिया जाता था, जैसा कि ऊपर बताया गया कि बद्र की जंग के मौक़े पर मुसलमानों द्वारा किए गए ये
दोनों काम यानी माल लूटना और धन के बदले क़ैदियों को छोड़ना अल्लाह ने पसंद नहीं किया
था, और इसके लिए वह
उन्हें कोई सज़ा देता मगर चूँकि अल्लाह ने यह दोनों काम आगे लिए वैध कर देना पहले ही
तय कर लिया था, इसीलिए उन्हें इस गलती
के लिए माफ़ कर दिया।
69: युद्ध के बाद हाथ आ
गया माल चाहे वह लूटा हुआ हो या क़ैदियों को छोड़ने के बदले हो, दोनों को अब अल्लाह
ने वैध [lawful] कर दिया, इसलिए उससे उचित
तरीक़े से फ़ायदा उठाने की अनुमति दे दी गई।
70: यानी अगर क़ैदियों
में अल्लाह और उसकी सच्चाई पर विश्वास करने की इच्छा दिखाई दी, तो जो कुछ धन उनसे
रिहा करने के लिए लिया गया है, उससे कहीं ज़्यादा आखिरत में उन्हें गुनाहों की माफ़ी की सूरत में इनाम दिया
जाएगा।
72: यहाँ ध्यान देने की
बात है कि किस तरह संधि की शर्तों को मानने पर ज़ोर दिया गया है। अगर मदीना के
मुसलमानों ने मक्का के विश्वास न करनेवालों के साथ युद्धबंदी की कोई संधि कर रखी
हो, तो फिर चाहकर भी
मक्का के ईमानवालों की मदद नहीं की जा सकती थी।
73: यहाँ मदीना के
मुसलमानों को मक्का के उन ईमानवालों की मदद करने को कहा गया है जो कि मक्का में ही
रुके रह गए और जहाँ वे काफिरों के हाथों अत्याचार सह रहे थे।
75: जब (मुहाजिर) मुसलमान
मक्का से हिजरत करके मदीना गए, तो वहाँ के (अंसार) लोगों ने उन्हें शरण दी और भाइयों जैसा बर्ताव किया, और अपनी चीज़ों में
उन (मुहाजिरों) को भी हिस्सा दिया, यहाँ तक कि आपस में ख़ून का रिश्ता नहीं होने के
बावजूद वे एक दूसरे के वारिस बने, फिर कुछ दिनों के बाद मुहाजिर जब अपने पैरों पर खड़े हो गए, तो फिर आपस में
विरासत के हक़ की ज़रूरत नहीं रही, आहिस्ता-आहिस्ता कुछ ईमानवाले जो अभी
तक मक्का में रुके हुए थे वे भी मदीना आते गए। तब भी मुहाजिरों और अंसारियों में
भाइयों के रिश्ते बने रहे और अपने माल में हिस्सेदारी और लेन-देन चलती रही। मगर
हाँ, जहाँ तक "विरासत" यानी मरने के बाद
संपत्ति के बंटवारे [Inheritance] का सवाल था, वह तो इस्लाम के क़ानून के मुताबिक़ नज़दीकी रिश्तेदारों को ही मिलना था।
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