02-06: यतीमों के साथ सलूक और शादी-ब्याह
07-14: संपत्ति में बंटवारे का नियम
15-28: औरतों और शादी-ब्याह से जुड़े हुए नियम-क़ायदे
29-31: जुआ खेलना और क़त्ल करना
32-33: दूसरों का माल न हड़पो
34-35: औरतों के प्रति मर्दों की ज़िम्मेदारियाँ
36 : अल्लाह की बंदगी करो
36-42: ज़रूरतमंदों को ज़कात देना बंद करने के ख़िलाफ चेतावनी
43 : नमाज़ के लिए तैयारी
44-57: किताबवाले लोगों की कड़ी निंदा
5 : अमानतों को लौटाना ज़रूरी
59-70: विवाद का निपटारे के लिए रसोल के पास जाएं
71-78: अल्लाह के रास्ते में लड़ना
79-84: रसूल का उत्साह बढ़ाना
85 : अच्छाई या बुराई के पक्ष में बोलनेवाला अच्छाई या बुराई का हिस्सेदार होगा
86 : सलाम करने वाले को अच्छा जवाब देना चाहिए
87 : दोबारा ज़िंदा उठाया जाना तय है
88-91: पाखंडियों के साथ सलूक
92-93: एक ईमानवाले को दूसरे ईमानवाले का क़त्ल नहीं करना चाहिए
94 : दुश्मन अगर लड़ाई के दौरान अपने ईमान का दावा करे, तो उसकी बात मान लो
95-96: लड़ाई में साथ जानेवाले और युद्ध में भाग न लेते हुए रुक जाने वाले
97-100 : घर-बार छोड़कर मदीना चले जाना
101-104: ख़तरे के समय नमाज़ पढ़ने का तरीक़ा
105-115: विश्वासघात करने वालों के साथ कोई नर्मी नहीं
116-122: मूर्तिपूजा और सच्चा दीन
123-124: बुराई करने वालों को सज़ा, नेकी करने वालों को इनाम
125-126: इबराहीम (अलै) का दीन
127-130: औरतों से जोड़े हुए निर्देश
131-137: विश्वास करने और इंकार करने के नतीजे
138-152: पाखंडियों और विश्वास न करने वालों की कड़ी निंदा
153-162: किताबवाले लोगों की निंदा
163-170: रसूल पर उतरने वाली 'वही', और उनसे पहले के रसूल
171-173: किताब वालों की कड़ी निंदा
174-175: ईमान के लिए अपील
176 : अप्रत्यक्ष वारिस (न कोई बच्चा, न माँ-बाप बचा हो), और उसकी विरासत के नियम
1: लोग एक-दूसरे से अपना हक़ माँगते हुए अक्सर कहते हैं कि "तुम्हें ख़ुदा का वास्ता, मेरा हक़ मुझे दे दो," तो जिस तरह हक़ लेने के लिए अल्लाह का वास्ता देते हैं, उसी तरह, जब दूसरों का हक़ अदा करना हो, तो अल्लाह से डरते हुए उसे पूरा-पूरा अदा करना चाहिए। इसी तरह, रिश्तेदारों [womb-relationship] से संबंध न तोड़ने का ज़िक्र 47:22 में भी आया है।
2: किसी मरने वाले के बच्चे जब अनाथ हो जाते हैं तो उनके बाप की विरासत में उनका भी हिस्सा होता है, मगर उस समय उनकी उम्र कम होने की वजह से वह माल उन्हें नहीं दिया जाता, बल्कि उनके सरपरस्त [अभिभावक/Guardian] जैसे चाचा, भाई आदि उसे अमानत के तौर पर अपने पास रखते हैं, और जब बच्चा बालिग़ और समझदार हो जाए, तो उसकी अमानत उसे सही-सलामत लौटा देनी चाहिए।
3: बुख़ारी की हदीस से पता चलता है कि कभी-कभी ऐसा होता कि कोई अनाथ लड़की अपने चचेरे भाई की सरपरस्ती [guardianship] में होती थी, अगर वह हसीन होती और उसकी धन-संपत्ति भी काफ़ी होती, तो उसका चचेरा भाई चाहता था कि बालिग़ होने पर वह उस लड़की से शादी कर ले ताकि पूरा माल उसी के क़ब्ज़े में रह जाए, मगर वह निकाह में मेहर इतना नहीं देना चाहता था जितना उस जैसी लड़की को देना चाहिए। दूसरी तरफ, लड़की अगर ख़ूबसूरत न होती तो उसके माल की लालच में उससे शादी तो कर लेता था, लेकिन उसके साथ अच्छा सुलूक नहीं करता था और मेहर भी कम-से-कम रखता था। इस आयत में ऐसे ही लोगों को हुक्म दिया गया है। देखें 4: 127
इसके साथ-साथ अरब में बीवियों की कोई अधिकतम गिनती तय नहीं थी, इस आयत में बीवियों की संख्या ज़्यादा से ज़्यादा चार कर दी गई, और वह भी इस शर्त के साथ कि मर्द अपनी सभी बीवियों के साथ बराबरी का सुलूक करे और अगर वह ऐसा नहीं कर सकता तो एक ही शादी पर बस करे।
7: इस्लाम से पहले जाहिलियत के ज़माने में औरतों को विरासत में कोई हिस्सा नहीं दिया जाता था।
11: विरासत के बंटवारे के समय सबसे पहले यह देखना है कि अगर मरने वाले के ऊपर कोई क़र्ज़ था तो उसे पहले चुका दिया जाए, फिर यह कि अगर उसने कोई वसीयत कर रखी हो कि फ़लाँ आदमी को इतना दे दिया जाए (जबकि वह हक़दार न हो), तो उस पर अमल किया जाएगा, हाँ, लेकिन वसीयत में कुल माल का एक-तिहाई से ज़्यादा नहीं दिया जा सकता ताकि जो वारिस असल में हक़दार हैं उन्हें नुक़सान न हो।
15: औरत अगर बदचलन हो जाए और अपना मुँह काला करा बैठे, तो यह हुक्म था कि उसे घर में बंद रखा जाए या अल्लाह ही उसके लिए कोई दूसरा रास्ता निकाल दे। बाद में सूरह नूर में ऐसी हरकत कर बैठने पर मर्द और औरत दोनों को 100-100 कोड़े मारने की सज़ा बताई गई, और मुहम्मद (सल्ल.) ने कहा था कि अब अल्लाह ने ऐसी औरतों के लिए रास्ता पैदा कर दिया है, और वह यह कि मर्द और औरत अगर विवाहित नहीं हैं तो उनकी सज़ा 100 कोड़े होगी और अगर वे विवाहित हों तो उन्हें पत्थर से मारा जाएगा।
16: इस आयत में एक मर्द का दूसरे मर्द के साथ सेक्स [Homo-sex] करने पर होने वाली सज़ा के बारे में बताया गया है।
19: इस्लाम से पहले अरब में यह रस्म भी चली आ रही थी कि जब कोई औरत विधवा हो जाती, तो मरने वाले के वारिस [घर का कोई मर्द या सौतेला बेटा] उस विधवा के भी मालिक बन बैठते थे, और तब वह उनकी इजाज़त के बिना न तो दूसरी शादी कर सकती थी और न ही ज़िंदगी के दूसरे बड़े फ़ैसले ले सकती थी। इसी तरह, एक और बुरी रस्म यह थी कि जब कोई मर्द अपनी बीवी को तलाक़ देना चाहता तो साथ में वह यह भी चाहता कि उसकी दी हुई मेहर उसे वापस मिल जाए, और इसके लिए वह अपनी बीवी को तरह-तरह से तंग करना शुरू कर देता था, ताकि बीवी तंग आकर ख़ुद ही यह कहे कि तुम अपना मेहर वापस ले लो और मुझे तलाक़ दे दो कि मेरी जान छूटे। यहाँ इन दोनों रस्मों को बंद करने का हुक्म दिया गया है।
20: ऊपर की आयत से पता चलता है कि तलाक़ देते समय बीवी से मेहर वापस नहीं ली जानी चाहिए। हाँ, अगर बीवी खुले आम कोई बदचलनी का काम कर बैठे, तो केवल उसी सूरत में तलाक़ देते समय उससे मेहर वापस ली जा सकती है। लेकिन अगर उसने ऐसा कोई काम नहीं किया है तो फिर इसका मतलब यह होगा कि मर्द को मेहर वापस लेने के लिए बीवी पर कोई झूठा इल्ज़ाम लगाना होगा जो कि और भी ग़लत होगा।
22: इस्लाम आने से पहले जाहिलियत के ज़माने में लोग अपनी सौतेली माँ से भी निकाह करना बुरा नहीं समझते थे, इस आयत ने ऐसे रिश्ते को स्वीकार करने से मना कर दिया। हाँ, जो पहले हो चुका, उसे माफ तो कर दिया गया, मगर इस शर्त के साथ कि निकाह का यह रिश्ता तोड़ दिया जाए।
23: इस्लाम में ऐसी औरतें जिन्होंने किसी बच्चे को अपना दूध पिलाया हो, वह दूध के रिश्ते से माँ होती हैं, इसी तरह, जिन-जिन बच्चों को उस औरत ने दूध पिलाया, वे सब दूध के रिश्ते से भाई-बहन हुए और उनसे भी शादी नहीं हो सकती।
24: जो लौंडियाँ [Female slaves] किसी जिहाद [युद्ध] के दौरान बंदी बनाकर लाई जाती थीं, अगर उनके पति भी साथ होते, तो उन लौंडियों के मालिकों को उन्हें छूने की इजाज़त नहीं थी। लेकिन अगर उनके पति अपने मुल्क में ही रह जाते थे, तो उनका निकाह उनके पतियों से समाप्त हो जाता था। उनके इस्लामी देश में आने के बाद जब एक माहवारी गुज़र जाती और उन्हें अपने पिछले पति से कोई बच्चा न ठहरता, तो उनका निकाह किसी मुसलमान मर्द से हो सकता था।
25: आज़ाद औरतें अगर विवाहित न हों, और अगर उन्होंने किसी मर्द के साथ सेक्स कर लिया तो उसकी सज़ा सौ कोड़े हैं जिसका ज़िक्र सूरह नूर की दूसरी आयत में आया है। इस आयत में ग़ुलाम लौंडियों के लिए उसी जुर्म की सज़ा आधी यानी पचास (50) कोड़े तय कर दी गयी है।
32: कुछ औरतों ने यह तमन्ना की थी कि काश वह मर्द होतीं और जिहाद में हिस्सा लेतीं तो उन्हें और अधिक सवाब (पुण्य) होता, लेकिन यहां यह कहा गया है कि कुछ मामलों में मर्दों को फ़ज़ीलत है और कुछ मामलों में औरतों को, मगर जिसके हाथ में जितना है, उसके अंदर रहते हुए उन्हें अधिक से अधिक नेकी के काम करने चाहिए।
33: अगर कोई आदमी इस्लाम क़ुबूल करता और उसके कोई रिश्तेदार न होते, तो जिसके द्वारा वह मुसलमान बनता, उसके हाथ पर हाथ रखकर वचन लेता कि अब से वह उसका "भाई" है, फिर संपत्ति के बंटवारे में भी वह उसका हिस्सेदार होता था, इस हक़ को "मवालात" कहते थे।
36: पड़ोसियों के साथ अच्छा व्यवहार करने पर बहुत ज़ोर दिया गया है। पड़ोसी चाहे इतने नज़दीक रहते हों कि उनके घर की दीवारें एक-दूसरे से मिलती हों, या उनके घर ज़रा सा दूर हों, चाहे वह नज़दीकी रिश्तेदार हों या अनजान हों या फिर दूसरे धर्म के मानने वाले हों। सबके साथ ख़ूब अच्छा सलूक करना चाहिए।
इसके अलावा यात्रा केे दौरान या कहीं लाइन में खड़े हुए किसी आदमी से मुलाकात हो जाती है, वह भी एक तरह के पड़ोसी हुए, उनके साथ भी अच्छा व्यवहार करना चाहिए, बल्कि इससे आगे हर मुसाफ़िर और हर रास्ता चलते आदमी के साथ भी अच्छा सलूक करना चाहिए।
41: क़यामत के दिन हर नबी को अपनी-अपनी उम्मत के अच्छे-बुरे काम की गवाही देने के लिए बुलाया जाएगा।
43: इस आयत में शराब पीकर नमाज़ न पढ़ने का हुक्म है, असल में शराब को एक बार में ही हराम [Prohibited] नहीं करके चरणों में किया गया, फिर अंत में इसे पूरी तरह हराम कर दिया गया। देखें 2: 219; 5: 90-91
46: "राइना" शब्द को अगर अच्छे ढंग से बोला जाए तो उसका मतलब होगा "हमारी ओर देखें" लेकिन जैसा 2:104 में भी आया है कि मदीना के यहूदी लोग जान बूझकर मुहम्मद (सल्ल) को बेइज़्ज़त करने के लिए इस लफ़्ज़ को तोड़-मतोड़कर बोलते थे, जिससे मतलब बदलकर यह हो जाता था कि "तुम बुद्धू हो" या "तुम हमारी भेड़ों के चरवाहे हो", इसीलिए ईमानवालों को "राइना" के बदले "उंज़ुरना" बोलने को कहा गया है।
47: तुम्हारे अंदर "दिशा की समझ को मिटा दें" या "चेहरा बिगाडकर रख दें।"
51: यहां एक सच्ची घटना का हवाला दिया गया है, बताया जाता है कि मक्का के विश्वास न करनेवालों का एक समूह मदीना के दो बड़े प्रमुख यहूदी सरदारों के पास मुहम्मद (सल्ल) की शिक्षाओं की सच्चाई के बारे में सलाह-मशविरा करने गया था, और तब यहूदी सरदारों ने उनसे कहा था कि मुसलमानों से ज़्यादा तो बहुदेववादी सही रास्ते पर हैं। मदीना के यहूदियों का मुसलमानों के साथ शांति से रहने और एक दूसरे के ख़िलाफ़ किसी बाहरी दुश्मन की मदद न करने का समझौता था। मगर इसके बावजूद उन लोगों ने मुसलमानों के दुश्मन यानी मक्का के बह़देववादियों के साथ सांठ-गांठ की।
53: यहूदियों की मुसलमानों से चिढ़ और नफ़रत की असल वजह यह थी कि वे चाहते थे कि जिस तरह पहले बहुत से नबी इसराइल की संतानों में से हुए थे, आख़िरी नबी भी उन्हीं के ख़ानदान से होते, मगर मुहम्मद सल्ल. इब्राहीम अलै. के दूसरे बेटे इस्माईल (अलै.) की संतानों में से थे। लेकिन यह तो अल्लाह ही फ़ैसला करने वाला है कि वह किसे अपना नबी बनायेगा, कोई यहूदियों को कायनात की बादशाही तो मिली नही हुई है! लेकिन अगर उनकी बादशाही होती, तो अपनी कंजूसी के चलते उनलोगों ने किसी को राई बराबर भी कुछ न दिया होता!
59: यहां बताया गया है कि अल्लाह और उसके रसूल के आदेशों को मानने के साथ साथ हाकिमों के आदेश भी मानने चाहिए। विद्वानों का कहना है कि वैसे ही हाकिमों की बात माननी चाहिए जिसके आदेश क़ुरआन और रसूल के अमल (सुन्नत) के मुताबिक़ हों।
60: यहां से मदीना के उन पाखंडियों का ज़िक्र किया गया है जो ऊपर से दिखावे के लिए मुसलमान तो बन गए थे, मगर असल में वे यहूदियों जैसे ही थे। किसी मामले में जब उन्हें यह उम्मीद होती कि मुहम्मद सल्ल. उनके हक़ में फ़ैसला करेंगे, तो वे ऐसे मामले तो उनके पास ले जाते, मगर जिन मामलों में लगता कि फ़ैसला उनके हक़ में नहीं होगा, तो वे ऐसे मामले यहूदियों के पास ले जाते थे, जो कि एक मुसलमान होने के नाते सही नहीं था।
62: फिर जब पाखंडी लोग अपने फ़ायदे के लिए मामले का फ़ैसला किसी यहूदी सरदार से करवाते हैं और वहां भी फ़ैसला उनके हक़ में नहीं होता, तो फिर मुहम्मद सल्ल. के पास बहाने बनाते हुए आते हैं कि हम तो वहां मेल-मिलाप करने गए थे, कोई फ़ैसला कराने नहीं गए थे।
66: अल्लाह ने इसराइल की संतानों को तो एक बार बड़ा कड़ा हुक्म दिया था जब गुनाहों से तौबा करने के लिए उन्हें एक दूसरे को क़त्ल करने को कहा गया था। देखें सूरह बक़रा (2: 54)
77: मक्का की ज़िंदगी में मुसलमानों ने वहाँ के काफ़िरों द्वारा किए जा रहे ज़ुल्म व सितम को बहुत दिनों तक धीरज के साथ झेला था, उस समय कुछ मुसलमानों के दिल में इनके ख़िलाफ़ बदले की भावना जागती थी, मगर तब उन्हें उन ज़ालिमों से लड़ने का हुक्म नहीं मिला था, बल्कि उन्हें धीरज रखते हुए अच्छे आचरण और नेक काम करते रहने की शिक्षा दी गई थी। अल्लाह चाहता था कि जब लड़ने का हुक्म हो तो वह अपनी निजी दुश्मनी की भावना से न हो, बल्कि अल्लाह की ख़ुशी हासिल करने के लिए हो। मगर जब वे तंग आकर हिजरत करके मदीना चले गए, तब अल्लाह की तरफ़ से उन्हें मक्कावालों से युद्ध करने का आदेश हुआ। चूँकि 13 साल अत्याचार सहने के बाद शांति का दौर आया था, अत: कुछ मुसलमान अभी लड़ाई लड़ना नहीं चाहते थे। मगर उन्हें याद दिलाया गया है कि दुनिया के आराम व सुकून को कभी भी इतना महत्व नहीं देना चाहिए कि परलोक [आख़िरत] की ज़िंदगी के फ़ायदे हाथ से निकल जाएं।
85: बताया जाता है कि एक आदमी मुहम्मद (सल्ल) के पास आया, और उसने एक दूसरे आदमी के लिए आपसे सिफ़ारिश की कि उसे युद्ध [जिहाद] में जाने से छूट दे दी जाए। यहाँ बताया गया है कि अच्छी चीज़ के पक्ष में बोलने से नेकी में हिस्सा मिलेगा और बुरी चीज़ का पक्ष लेने से उसकी बुराई में भी हिस्सेदार होगा।
86: जब कोई तुम्हें "अस्स्लाम-ओ-अलैकुम" कहे, तो जवाब में बेहतर यह है कि "वालैकुमस्सलाम व-रहमतुल्लाह व-बरकातुह" कहो, नहीं तो कम से कम "वालैकुमस्सलाम" ज़रूर कहो, अगर जवाब नहीं दिया, तो गुनाह होगा। 4: 94 भी देखें।
88-89: यहाँ कई तरह के पाखंडियों [मुनाफ़िक़ों] की चर्चा की गई है। एक क़िस्म तो ऐसे लोगों की थी जो मक्का के लोग थे, मदीना आए और ऊपरी तौर से मुसलमान हो गए, फिर कुछ समय बाद व्यापार के बहाने से मक्का चले गए। उनके बारे में कुछ मुसलमानों की राय यह थी कि वे सच्चे मुसलमान थे और कुछ लोग उन्हें पाखंडी समझते थे; लेकिन जब वे मक्का से लौटकर मदीना नहीं आए, तो उनका पाखंड सबके सामने आ गया क्योंकि उस समय मक्का से मदीना हिजरत करना ज़रूरी कर दिया गया था।
90: यहाँ पाखंडियों की दूसरी और तीसरी क़िस्म बताई गई है जिनके ख़िलाफ़ कार्र्वाई करने से मना किया गया है।
91: यहाँ पाखंडियों की चौथी क़िस्म बताई गई है जो ऊपर से तो यह ज़ाहिर करते हैं कि वे मुसलमानों से लड़ना नहीं चाहते, लेकिन जब भी उन्हें मुसलमानों के ख़िलाफ़ कोई साज़िश में भाग लेने का मौक़ा मिले, वे इसमें बेधड़क कूद पड़ेंगे।
92: ग़लती से क़त्ल होने का मतलब यह है कि बेइरादा किसी का क़त्ल हो जाना, जैसे ग़लती से गोली चल जाना या निशाना किसी जानवर पर हो और लग किसी आदमी को जाए। तो जब किसी मुसलमान के हाथों एक मुसलमान का क़त्ल हो जाए, तो एक तो उसकी भरपाई में एक ग़ुलाम आज़ाद करना होगा, या अगर ग़ुलाम न हो तो उसे लगातार दो महीने रोज़े रखने होंगे, और उसके साथ "ख़ून-बहा" भी देना होगा। हदीसों से पता चलता है कि ख़ून-बहा में 100 ऊंट या दस हज़ार दीनार मरने वालों के वारिसों को देने होंगे। अगर मरने वाला दुश्मन क़ौम से हो, लेकिन मुसलमान हो, तो उसके लिए भी भरपाई में एक ग़ुलाम आज़ाद करना होगा, मगर ख़ून-बहा देना ज़रूरी नहीं।
इसी तरह, अगर कोई ग़ैर मुस्लिम किसी मुस्लिम रियासत में अमन-शांति से रहता है, और उसका ग़लती से क़त्ल हो जाए, तो उसके वारिसों को भी भरपाई के साथ ख़ून-बहा भी देना होगा।
94: अल्लाह के रास्ते में सफ़र करने का मतलब युद्ध के लिए सफ़र करना। युद्ध के दौरान दुश्मनों के एक यौद्धा ने सलाम करके यह कहा कि वह मुसलमान हो गया है, मगर यह सोचकर कि वह अपनी जान बचाने के लिए ऐसा कर रहा है, मुस्लिम लड़ाके ने उसे मार डाला, जब मुहम्मद (सल्ल) को पता चला तो वह नाराज़ हुए। दुश्मन के फ़ौजी की बात को एकदम से नकार देने के बजाए उसकी बात मान लेनी चाहिए थी क्योंकि दिल के अंदर की बात तो केवल अल्लाह ही जानता है।
97: क़ुरआन में गुनाह कर बैठने को अपनी जानों पर ज़ुल्म करना भी कहा गया है। यहां उन ईमानवालों का ज़िक्र है जो हुक्म आ जाने के बाद भी मक्का से मदीना हिजरत करके नहीं गए, जबकि उनमें ऐसा करने की योग्यता थी। तो जब उनके गुनाहों के बारे में फ़रिश्ते पूछेंगे, तो वे कहेंगे कि हम मक्का के मुशरिक लोगों के हाथों ऐसे मजबूर हो गए थे कि हमें अपने दीन पर चलना मुश्किल था। मगर उनसे कहा जाएगा कि ऐसे में उन्हें अपना घर छोड़कर कहीं दूसरी जगह चले जाना चाहिए था जहाँ उसके लिए दीन पर चलना आसान था।
101: आम तौर से जब आप सफ़र में हों, तो अल्लाह ने यह आसानी की है कि दोपहर (ज़ुहर), शाम (अस्र) और रात (इशा) की नमाज़ आधी कर दी है जिसे "क़स्र" कहते हैं। मगर यहां एक ख़ास तरह की क़स्र नमाज़ का ज़िक्र अगली आयत में है, जो युद्ध की हालत में पढ़ी जाती है जब दुश्मनों के हमले का ख़तरा होता है, और इसीलिए यह हथियार समेत पढ़ी जाती है।
105: बताया जाता है कि यह आयत एक ख़ास घटना की पृष्टभूमि में उतरी थी। बशीर नाम का एक आदमी था जो ऊपर से अपने को मुसलमान बताता था, बनु अबीरक़ क़बीले का था। उसने एक सहाबी के घर में सेंध लगाकर अनाज की बोरियां और हथियार चुरा लिए, और चालाकी यह की कि बोरी का मुंह थोड़ा सा इस तरह खुला रखा कि उसमें से थोड़ा-थोड़ा अनाज गिरता रहे और जाकर एक यहूदी के घर के सामने बोरी का मुंह बंद कर दिया। फिर उसने चोरी के हथियार को उसी यहूदी के घर भी रखवा दिया। जब यह मामला सामने आया तो सारे सबूत यहूदी के ख़िलाफ़ थे। बशर के क़बीले वाले भी उसके समर्थन में लगे थे। मगर अल्लाह ने मुहम्मद सल्ल. को इस घटना की जानकारी दे दी और तब जाकर सही फ़ैसला हो सका और उस यहूदी को बरी किया गया, बशर वहां से भागकर मक्का के काफ़िरों से जा मिला। इससे यह बात साफ़ होती है कि ग़लत काम का साथ नहीं देना चाहिए चाहे वह किसी यहूदी या ग़ैर मुस्लिम के साथ ही क्यों न किया गया हो, और फ़ैसला हमेशा इंसाफ़ के साथ होना चाहिए।
113. यहां शायद बशर और उसके समर्थकों का ज़िक्र है जो यह चाहते थे कि बेगुनाह यहूदियों को सज़ा दी जाए।
116: किसी और को अल्लाह की ख़ुदायी में साझेदार (Partner) ठहराना, एक ऐसा गुनाह है जिसे अल्लाह कभी माफ़ नहीं करेगा। यह गुनाह तभी माफ़ हो सकता है जब आदमी इसके लिए सच्ची तौबा कर ले। इसके अलावा किया गया कोई भी गुनाह अल्लाह जब चाहे, माफ कर सकता है।
117: अरब के मूर्तिपूजक लोग ज़्यादातर देवियों की ही पूजा करते थे--- लात, मनात, उज़्ज़ा नाम की मशहूर देवियां थीं। यहां तक कि वे फ़रिशतों को भी अल्लाह की बेटियां ही समझते थे। इस आयत में इस बात की तरफ़ इशारा किया गया है कि एक तरफ़ तो वे औरतों को मर्दों के मुक़ाबले कम दर्जे की चीज़ समझते थे, मगर दूसरी तरफ़ पूजा सभी देवियों की ही की जाती थी। देखें 53: 19-20
118: मतलब यह है कि बहुत से बंदों को भटका करके उन्हें अपना बना लूंगा, और उनसे अपनी मर्ज़ी के काम कराऊंगा।
119: अरब के विश्वास न रखने वाले कुछ लोगों [Pagans] में यह भी रस्म थी कि वे कुछ चौपायों के कान चिरवाकर उन्हें किसी देवी-देवता के नाम समर्पित कर देते थे, और फिर उनसे कोई काम नहीं लिया जा सकता था। यहां इसी झूठी रस्म की तरफ़ इशारा करके कहा गया है कि यह सब असल में शैतान करवाता है, और यह एक तरह से अल्लाह की रचना में फेर-बदल करने जैसा है।
127: इस्लाम से पहले अरबों के समाज में औरतों का दर्जा बहुत ही निचले स्तर का माना जाता था, और उनके सामाजिक और आर्थिक अधिकार नहीं के बराबर थे। इस्लाम ने जब उन्हें कुछ अधिकार और ख़ासकर छोड़ी गई जायदाद में से हिस्सा देने की घोषणा की, तो अरबों के लिए ये बातें अनोखी थीं और उन्हें यह लगता था कि ये अधिकार उन्हें थोड़े समय के लिए ही दिए गए होंगे, और शायद यह कुछ समय बाद उठा लिए जाएंगे। अतः वे लोग इस बारे में मुहम्मद सल्ल से पूछते रहते थे, इसी के जवाब में यह आयत है जिसमें यह साफ़ किया गया है कि औरतों से जुड़े हुए अधिकार हमेशा के लिए हैं और इस सिलसिले में मर्द और औरतों के बीच रिश्ते से जुड़े हुए कुछ और अधिकार भी बता दिए गए हैं।
यहां फिर से यतीम (अनाथ) लड़कियों के साथ अन्याय करने से मना किया गया है। जैसा कि आयत 3 में बताया गया कि उस ज़माने की रीति के अनुसार कई बार ऐसा होता कि यतीम लड़की का अभिभावक (Guardian) उसके चचा का बेटा होता था। अगर लड़की हसीन होती और उसके बाप ने काफ़ी संपत्ति भी छोड़ी होती, तो उसका चचेरा भाई माल हथियाने के चक्कर में उससे शादी कर लेता, मगर उसे "मेहर" बहुत कम देता था, और अगर लड़की हसीन न होती तो शादी कर लेने के बाद उसके साथ प्यार से पेश भी नहीं आता था।
129: यह मुमकिन नहीं है कि कोई आदमी अपनी सभी बीवियों के साथ एक समान व्यवहार कर सके, क्योंकि दिल का झुकाव किसी एक की तरफ़ ज़्यादा होगा, हां, मगर कम से कम ऊपर के व्यवहार में समानता होनी चाहिए। जैसे हर बीवी के साथ एक बराबर रात गुज़ारना, ख़र्चा करने के लिए एक बराबर पैसे देना, किसी के साथ ऐसी बेरुख़ी के साथ न पेश आना जिससे किसी बीवी का दिल टूटता हो और उसे लगे कि वह शादी और तलाक के बीच लटकी हुई है, इत्यादि।
137: सच्चाई पर विश्वास कर लेना, फिर सच्चाई को ठुकरा देना, फिर से विश्वास कर लेना और अंत में दोबारा विश्वास करने से इंकार कर देना, और ऐसी हालत में मर जाना....यह तो लगता है कि मदीना के पाखंडियों [मुनाफ़िक़ों] के बारे में कहा गया है, मगर इनके साथ कुछ दूसरे लोग भी ऐसे थे जिन्होंने ऐसा किया था।
140: इस बात का ज़िक्र पहले एक मक्का में उतरी हुई सूरह में आ चुका है, देखें 6: 68
149: यहाँ किसी के बुरे काम को माफ कर देने से मतलब राज़ी ने यह बताया है कि अगर कोई पाखंडी आदमी अपने गुनाहों से तौबा करता है तो उसके द्वारा किए गए पहले के बुरे काम का ताना नहीं देना चाहिए।
154: इन घटनाओं का ज़िक्र सूरह बक़रा (2: 51-66) में थोड़े विस्तार से आया है। इसे भी देखें 7: 161
155: उनका मतलब यह था कि हमारे दिल पर ऐसा पर्दा चढ़ा हुआ है कि इसमें अपने धर्म के अलावा कोई और धर्म की बातें शामिल नहीं हो सकती। देखें 2: 88
मगर असल में अल्लाह ने उनकी ज़िद्द और हठधर्मी के चलते उनके दिलों पर मुहर लगा दी, जिससे वे कोई सही बात समझने में असमर्थ हैं।
160: देखें सूरह अनाम (6: 146).
176: "कलाला" उस आदमी को कहते हैं जिसके मरने के समय न तो उसके बाप-दादा जिंदा हों और न ही कोई बेटा या पोता! देखें इसी सूरह की आयत 12
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