Monday, August 5, 2013

सूरह 78 : अन नबा [(क़यामत की) घोषणा / The Announcement]

सूरह 78: अन-नबा
[(क़यामत की) घोषणा / The Announcement]


01-05: क़यामत का आना पक्का है 

06-16: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ 

17-40: फ़ैसले का दिन 

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है 


ये (काफ़िर) लोग आपस में किस (चीज़) के बारे में सवाल कर रहे हैं? (1)

उस सबसे महत्वपूर्ण घोषणा [क़यामत] की  (2)

जिसके बारे में वे मतभेद रखते हैं।  (3)

(यह घोषणा इंकार के योग्य) नहीं! उन्हें (सच्चाई का) पता लग जाएगा। (4)

अंत में उन्हें सचमुच पता लग जाएगा। (5)

क्या हमने धरती को फ़र्श की तरह (आराम करने के लिए) बिछा नहीं दिया,  (6)

और इसका संतुलन बनाए रखने के लिए (इसमें) पहाड़ों को गाड़ दिया? (7)

क्या हमने तुम्हें (नस्ल बढ़ाने के लिए) जोड़े में पैदा नहीं किया, (8)

हमने (थकान से) आराम के लिए तुम्हें नींद दी,  (9)

रात को (उसके अंधेरे के कारण) पर्दा डाले हुई बनाया,  (10)

और हमने दिन को रोज़ी‌-रोटी कमाने का (समय) बनाया?  (11)

और (देखो!) क्या हमने तुम्हारे ऊपर सात मज़बूत (आसमान) नहीं बनाए, (12)

और (सूरज को) रौशनी और ताप का (ज़बरदस्त) स्रोत बनाया? (13)

क्या हमने भरे बादलों से मूसलाधार पानी नहीं बरसाया (14)

ताकि हम इस (बारिश) के द्वारा (धरती से) अनाज और वनस्पति उगाएँ, (15)

और घने-घने उद्यान (उगाएँ)?  (16)

फ़ैसले के दिन [क़यामत] के लिए एक समय तय किया हुआ है:   (17)

जिस दिन नरसिंघा [Trumpet] फूँककर बजा दिया जाएगा, तो तुम गिरोह के गिरोह (अल्लाह के सामने) चले आओगे,  (18)

और जब आसमान (की पर्तें को) फाड़ दिया जाएगा, तो (फटने से जैसे) वह चौड़े-चौड़े दरवाजों की तरह खुल जाएगा,  (19)

और जब पहाड़ (धुआँ बनकर उड़ा दिए जाएंगे, तो वे) मिरीचिका [mirage] की तरह (नज़र का धोखा मात्र होकर) ग़ायब हो जाएंगे। (20)

जहन्नम (बुरे लोगों की ताक में) घात लगाकर बैठी हुई है, (21)

(सच्ची बातों को न मानने वाले) ज़ालिमों का यही घर होगा, (22)

(जहाँ) उन्हें बहुत लम्बे-लम्बे समय तक पड़े रहना है, (23)

न वे इसमें (किसी तरह की) ठंढक का मज़ा चखेंगे, और न किसी पीने की चीज़ का, (24)

सिवाय खौलते हुए पानी और (जहन्नमियों के घावों से) बहती हुई पीप के ---- (25)

यही (उनके कर्मों का) एकदम सही बदला है, (26)

क्योंकि वे (फैसले के दिन होने वाले) हिसाब-किताब से बिल्कुल नहीं डरते थे, (27)

और उन्होंने हमारे संदेशों [आयतों] को झुठ मानते हुए ठुकरा दिया। (28)

हमने हर (छोटी बड़ी) चीज़ को लिखकर खाते में सुरक्षित कर रखा है। (29)

(ऐ इंकार करने वालो!), “अब तुम (अपने किए का) मज़ा चखो: हमारी तरफ़ से तुम्हें कुछ नहीं मिलेगा, सिवाय और अधिक यातना के।” (30)
 

जो लोग अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से बचने वाले हैं, उनके लिए सबसे बड़ी कामयाबी है:  (31) 

(उनके लिए) निजी बाग़ होंगे और अंगूर (के बाग़ीचे), (32)

ख़ूबसूरत भरी-पूरी, बराबर उम्र की साथी (companions) (होंगी), (33)

और (तहूर के) छलकते हुए जाम (होंगे)।   (34)

वहाँ वे (लोग) कोई बेकार या झूठी बात नहीं सुनेंगे:  (35)

यह तुम्हारे रब की तरफ से इनाम होगा, और (कर्मों के हिसाब से) एक उपयुक्त तोहफ़ा होगा,  (36)

उस रब की तरफ़ से जो आसमानों और ज़मीन का, और जो कुछ इन दोनों के बीच में है, (सब) का पालनहार है, बड़ी ही रहमतवाला है।


(लेकिन क़यामत के दिन) उन्हें अल्लाह के सामने कुछ बोलने की अनुमति नहीं होगी।   (37)

उस दिन जब जिबरील [रूहुल अमीन] और (सभी) फरिश्ते क़तार में खड़े होंगे, वे कुछ नहीं बोलेंगे सिवाय उनके, जिन्हें रहम करनेवाले रब [रहमान] ने बोलने की इजाज़त दी हो, और जो वही बात कहेगा जो सही हो।  (38)

वह (फैसले का) दिन तो सच्चाई का दिन है। अत: जो कोई (कामयाबी) चाहता है, उसे ऐसा रास्ता अपनाना चाहिए जो उसके रब के पास ले जाता हो। (39)

हमने तुम्हें उस यातना से सावधान कर दिया है जो जल्द ही आने वाली है, उस दिन जब हर आदमी उन (कर्मों) को अपनी आँखों से देख लेगा जो उसके हाथों ने आगे भेज रखे हैं, और जब विश्वास न रखनेवाला कहेगा, "काश! मैं  मिट्टी होता! (कि यातनाओं से बच जाता!)" (40)
 
 
नोट: 

3: इससे मतलब यहां पर क़यामत और परलोक की जिंदगी है।अरब के काफ़िर लोग क़यामत के बारे में तरह-तरह की बातें बनाया करते थे, कोई उसका मज़ाक़ उड़ाता, कोई बेकार की बहस करता, कोई मुसलमानों से इसकी विस्तार से जानकारी चाहता कि यह् कब होगी, मगर सवाल पूछने का मकसद सच्चाई की खोज नहीं था बल्कि उसकी हंसी उड़ाना था। इन आयतों में उनके इसी तरीके की तरफ इशारा है। 

इसके बाद अल्लाह ने ब्रह्मांड में फैली हुई अपनी निशानियों का ज़िक्र किया है कि जब तुम यह मानते हो कि यह सब कुछ अल्लाह ने पैदा किया है, तो फिर इस बात को क्यों नहीं मानते कि अल्लाह इस दुनिया को एक बार ख़त्म करके दोबारा पैदा कर देगा।

18: नरसिंघे को फूंक मारकर बजाना : अंतिम दिन [क़यामत] की घोषणा करना (देखें 6:73; 18:99; 20:102; दोबारा बजाना 39:68; 69:13; 74:8). 

23: सच्चाई को ना मानने वाले जालिम लोग जहन्नम में बहुत लंबे लंबे समय तक रहेंगे या वह इसमें से बाहर नहीं निकल पाएंगे। कुछ लोगों का विचार है कि शायद एक लंबा समय गुजारने के बाद जहन्नम से बाहर निकल आएंगे, हालांकि कुरआन में बहुत सारी जगहों पर यह उल्लेख मिलता है कि वह जहन्नम से कभी नहीं निकलेंगे बल्कि वह सदा इसी में रहेंगे, देखें सूरह मायदा (5: 37).

37: यानी जिसको जो कुछ इनाम में दे दिया जाएगा, उसके विरुद्ध किसी को बोलने की अनुमति नहीं होगी।

40: कुछ हदीसों से मालूम होता है कि कि जिन जानवरों ने दुनिया में एक दूसरे पर जुल्म किया था, क़यामत के दिन हश्र के मैदान में उनको भी जमा करके उनसे उनके जुल्म का बदला दिलवाया जाएगा, यहां तक कि अगर किसी सींगवाली बकरी ने किसी बिना सींगवाली बकरी को सींग मारा था तो उसका भी बदला दिलवाया जाएगा और जब यह बदला पूरा हो जाएगा तो इन जानवरों को मिट्टी में मिला दिया जाएगा। उस वक्त वे काफिर लोग जिन्हें जहन्नम का अंजाम नजर आ रहा होगा, वे यह तमन्ना करेंगे कि काश! हम भी मिट्टी हो जाते।

 

 

Saturday, August 3, 2013

सूरह 77: अल-मुरसलात [हवाएं-- जो भेजी जाती हैं / WINDS- SENT FORTH]

सूरह 77: अल-मुरसलात 
[हवाएं-- जो भेजी जाती हैं / WINDS- SENT FORTH]



01-07: क़यामत ज़रूर आयेगी

08-13: अंतिम दिन की निशानियाँ 

14-50: फ़ैसले के दिन इंकार करने वालों की तबाही

 


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर महरबान है, अत्यंत दयावान है
उन (हवाओं) की क़सम जो एक के बाद एक भेजी जाती हैं,   (1)

फिर जो आँधी बनकर ज़बरदस्त झोंकों से चलती हैं,   (2)

और जो (बादलों को) लाकर दूर-दूर तक फैला देती हैं,   (3)

फिर जो (उन्हें) फाड़कर अलग अलग कर देती हैं,    (4)
जो (दिलों में अल्लाह की) याद दिलाती हैं,   (5)


(अच्छाई और बुराई को) सबूत के तौर पर बताने के लिए, या (सच्चाई से इंकार करने के नतीजों से) सावधान करने के लिए:   (6)

जिस (क़यामत का) तुम से वादा किया जा रहा है, वह घटना ज़रूर हो कर रहेगी।   (7)

जब सितारों की रौशनी मद्धिम पड़ जाएगी  (8)

और जब आसमान को फाड़ दिया जायेगा,  (9)

जब पहाड़ (चूर चूर करके) उड़ा दिए जाएंगे,  (10)

जब सभी पैग़म्बर निर्धारित समय पर (अपनी अपनी उम्मतों /communities पर गवाही के लिए) जमा किए जाएंगे ------ (11)

(तो भला) किस दिन के लिए (इन सब मामलों की) अवधि तय कर दी

Friday, August 2, 2013

सूरह 76 : अल इंसान/ अद दहर [Man]

सूरह 76: अल-इंसान/ अद-दहर 
[आदमी/ Man]



01-03:  इंसानों का पैदा किया जाना

04-22: नेक लोगों का इनाम 

23-26: रसूल को धीरज से काम लेने की सलाह

27-31: एक चेतावनी 

 

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

क्या इंसान पर समयकाल का एक ऐसा वक़्त नहीं गुज़र चुका है कि जब वह कोई उल्लेखनीय चीज़ ही न था? (1)

हमने इंसान को (मर्द व औरत के) मिले-जुले तरल पदार्थ की बूंदों से पैदा किया जिसे हम (बच्चा पैदा होने तक एक चरण से दूसरे चरण तक) पलटते और जाँचते रहते हैं, इसलिए हमने उसे (क्रम से) सुनने वाला (और फिर) देखने वाला बनाया है। (2)

हमने इसे (सही और ग़लत, सच और झूठ में फर्क़ करने की समझ-बूझ के लिए) रास्ता भी दिखा दिया, (अब) चाहे वह (अल्लाह का) आभार मानने वाला हो या आभार न मानने वाला [ungrateful] हो जाए। (3)

हमने विश्वास न रखने वालों के लिए (पैर की) ज़नजीरें और (गर्दन के) तौक़ [iron collars] और (जहन्नम की) दहकती आग तैयार कर रखी है। (4)

निष्ठावान और नेक बंदे (पाकीज़ा शराब के) ऐसे जाम पियेंगे जिसमें काफ़ूर [एक मीठा सुगंधित पौधा] की मिलावट होगी। (5)

(ये जाम वहाँ) के एक बहते हुए सोते [spring] के होंगे जिससे ख़ुदा के ख़ास बंदे पिया करेंगे (और) जहां चाहेंगे (दूसरों को पिलाने के लिए) इसे छोटी नहरों के रूप में बहाकर (भी) ले जाएंगे। (6)

(ये अल्लाह के वे ख़ास बंदे हैं) जो (अपनी) नज़रें [मन्नतें] (मान लेते हैं तो उसे) पूरी करते हैं, और उस दिन से डरते हैं जिसकी सख़्ती बड़ी व्यापक होगी। (7)

और वे (अपना) खाना अल्लाह की मुहब्बत में (स्वयं खाने की चाहत रखने और भूखा  होने के बावजूद) ग़रीबों, अनाथों और क़ैदियों को खिला देते हैं। (8)

(और कहते हैं कि): ”हम तो केवल अल्लाह की खुशी के लिए तुम्हें खिला रहे हैं, न तुम से बदले में कोई चीज़ हमें चाहिए और न (यह इच्छा है कि) तुम हमारा शुक्र अदा करो।"  (9)

हमें तो अपने रब से उस दिन का डर रहता है जो (चेहरों को) बहुत काला (और) भद्दा कर देने वाला है। (10)

सो अल्लाह उन्हें (अपना डर रखने के कारण) उस दिन की सख़्ती से बचा लेगा और उन्हीं (चेहरों पर) रौनक़ और ताज़गी और (दिलों में) मस्ती व खुशी भर देगा। (11)

और (हमेशा) सब्र व धीरज (से नेक कामों पर डटे रहने) के बदले उन्हें (इनाम के तौर पर रहने को) जन्नत और (पहनने को) रेशमी कपड़े प्रदान करेगा। (12)

वे उसमें तख़्तों पर तकिये लगाए बैठे होंगे, न वहाँ धूप की तेज़ गर्मी पाएंगे और न सर्दी की ठिठुरा देने वाली तेज़ी। (13)

और (जन्नत के पेड़ों के) साये उन पर झुक रहे होंगे और उनके (फलों के) गुच्छे झुककर लटक रहे होंगे। (14)

और (सेवक लोग) उनके आसपास चांदी के बर्तन और (साफ़-सुथरे) शीशे के गिलास लिए फिरते होंगे। (15)

(और) शीशे भी चांदी की तरह के (बने) होंगे जिन्हें सेवकों ने (हर एक की ख़्वाहिश के अनुसार) ठीक-ठीक अनुपात में भरा होगा। (16)

और उन्हें वहां (पाकीज़ा शराब के) ऐसे जाम पिलाए जायेंगे जिनमें सोंठ/अदरक (जैसी महक) की मिलावट होगी। (17)

(वह शराब जन्नत) में “सलसबील” नाम के एक सोते [spring] से बनी होगी। (18) 

और उनके आसपास ऐसे सदाबहार नौजवान लड़के (सेवा में) घूमते रहेंगे कि जब आप उन्हें देखेंगे तो ऐसा लगेगा मानो वे बिखरे हुए मोती हों। (19)

जब आप (जन्नत पर) नज़र डालेंगे तो वहां (बेशुमार) नेमतें और (हर तरफ़) बड़े  साम्राज्य के लक्षण दिखायी देंगे। (20)

उन (के शरीरों) पर महीन रेशम के हरे और गाढ़े ब्रोकेड के कपड़े होंगे, और उन्हें चांदी के कंगन पहनाए जाएंगे और उनका रब उन्हें पवित्र शराब पिलाएगा। (21) 

(उनसे कहा जाएगा): “यह तुम्हारा इनाम है और (संसार में नेक राह पर चलने में की गयी) तुम्हारी मेहनत की सराहना की जाती है।“ (22)

(ऐ रसूल), हमने आप पर क़ुरआन थोड़ा-थोड़ा करके उतारा [नाज़िल किया] है। (23) 

सो आप अपने रब के आदेश पाने के लिए धीरज (बनाए) रखें और किसी पापी या सच्चाई से इंकार करने वाले की बात पर कान न धरें।  (24)

और सुबह और शाम अपने रब के नाम का स्मरण किया करें, (25)

और रात की कुछ घड़ियों में (अल्लाह) के सामने सज्दे में सर झुकाया करें और रात के (शेष) लंबे हिस्से में उसकी बड़ाई बयान किया करें। (26)

यह (दुनिया की चाहत रखने वाले) जल्दी से हासिल हो जाने वाली चीज़ (संसार) से प्रेम रखते हैं और एक सख़्त भारी दिन (की याद) को छोड़े बैठे हैं। (27)

(वे नहीं सोचते कि) हम ही ने उन्हें पैदा किया और उनके जोड़-जोड़ को मज़बूत बनाया है और हम जब चाहें उनके बदले में उन्हीं जैसे लोगों को पैदा कर दें। (28)

बेशक यह (क़ुरआन) एक नसीहत है (जो आदमी को सीधे रास्ते पर चलने के लिये याद दिलाती रहती है), सो जो कोई चाहे अपने रब की तरफ़ (पहुंचने का) रास्ता अपनाले। (29)

और तुम खुद कुछ नहीं चाह सकते सिवाय इसके जो अल्लाह चाहे, बेशक अल्लाह ख़ूब जानने वाला, बड़ी समझ-बूझवाला है। (30)

वह जिसे चाहता है अपनी रहमत [दयालुता के दायरे] में ले लेता है, और ज़ालिमों के लिए उसने दर्दनाक अज़ाब [यातना] तैयार कर रखा है। (31)



नोट:

1. यहाँ पैदा होने से पहले के समयकाल के बारे में कहा गया है; जिस तरह से अल्लाह ने इंसानों को पहली बार पैदा किया, उसी तरह वह उन्हें क़यामत के दिन दोबारा पैदा करने की ताक़त रखता है (देखें 19:9, 67).
   

2: मर्द और औरत के मिले-जुले पदार्थ यानी शुक्राणु और अंडाणु के मिश्रण (intermingling of sperm & ovum) से पैदा किया।

 

28: इसका एक मतलब तो यह है कि अगर अल्लाह चाहे तो इन सबको मारकर उनकी जगह दूसरे इंसान पैदा कर दे। दूसरा मतलब यह हो सकता है कि जिस तरह अल्लाह ने उन्हें शुरू में पैदा किया था, उसी तरह वह जब चाहे उनके मरने के बाद भी उन्हें दोबारा पैदा कर देगा।

 


Surah/सूरह 1: Al-Fatiha/अल-फ़ातिहा [(किताब की) शुरुआत/ The Opening]

       सूरह 1: अल-फ़ातिहा    [(किताब की) शुरुआत/ The Opening] यह एक मक्की सूरह है। पूरे क़ुरआन में अल्लाह का जो संदेश आया है , उसका इस सूरह मे...