सूरह 75: अल-क़ियामह
[क़यामत/ The Resurrection]
01-15: क़यामत के दिन दोबारा ज़िंदा करके उठाया जाएगा
16-19: क़ुरआन को पढ़ने का तरीक़ा
20-30: क़यामत का आना तय है
31-40: एक विश्वास न करने वाले की कड़ी निंदा
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
मैं क़सम खाता हूँ क़यामत के दिन की (1)
और मैँ कसम खाता हूँ (बुराइयों पर) कचोटने वाली आत्मा की! (2)
क्या इंसान यह समझता है कि हम उसकी हड्डियों को (जो मरने के बाद चूर-चूर होकर बिखर जाएगी) कभी फिर से इकट्ठा नहीं करेंगे? (3)
क्यों नहीं! हम तो यहाँ तक कर सकते हैं कि उसकी उंगलियों के पोर-पोर [fingertips] तक को (दोबारा) ठीक (वैसा ही) कर दें। (4)
इसके बावजूद, आदमी उस (जीवन) से इंकार करना चाहता है, जो उसके आगे (आख़िरत/ Hereafter में) आने वाला है: (5)
वह (व्यंग्य से) पूछता है, “तो वह क़यामत का दिन कब होगा?” (6)
जब आँखें चौंधिया जाएंगी (7)
और चाँद (अपनी) रौशनी खो देगा, (8)
जब सूरज और चाँद इकट्ठे कर दिए जाएंगे, (9)
उस दिन आदमी पुकार उठेगा, “भागकर जाएं तो कहाँ जाएं?” (10)
नहीं! सचमुच, छिपने की कोई जगह नहीं होगी: (11)
उस दिन तुम्हारे रब के पास ही ठिकाना होगा जहाँ लौटकर सबको जाना होगा। (12)
उस दिन आदमी को बता दिया जाएगा, जो कुछ (दुनिया में कर्म करके) उसने आगे भेजा था और जो कुछ (कर्मों का असर मरने के बाद) उसने पीछे छोड़ा था। (13)
बल्कि, सच तो यह है कि आदमी (अपने किए गए अच्छे-बुरे कर्मों पर) ख़ुद ही गवाह है, (14)
चाहे वह अपनी ओर से कितने ही बहाने पेश करे। (15)
[ए रसूल!] आप (कुरआन की) आयतों को याद करने की हड़बड़ी में, अपनी ज़बान को जल्दी-जल्दी न चलाया करें: (16)
बेशक उसे (आपको) याद कराना और (आपकी ज़बान से) पढ़ाना हमारी ज़िम्मेदारी है। (17)
तो जब हम उस आयत को (जिबरील की ज़बानी) पढ़कर सुना दें, तब आप भी उसे (उसी तरह) पढ़कर दोहरा लिया करें (18)
और फिर इन (आयतों) के मतलब समझाना भी हमारी ही ज़िम्मेदारी है। (19)
सचमुच, तुम लोग बहुत थोड़े समय चलने वाली दुनिया (की ज़िंदगी) से बहुत लगाव रखते हो (20)
और तुम इसके बाद आने वाली दुनिया [आख़िरत/ Hereafter] को भुलाए बैठे हो। (21)
(एक तरफ़) बहुत से चेहरे उस दिन खिले हुए और चमकते हुए होंगे, (22)
और अपने रब (की नेमतों) को देख रहे होंगे, (23)
और कितने ही चेहरे उस दिन बिगड़ी हुई हालत में (उदास और काले पड़ गये) होंगे। (24)
वे समझ जाएंगे कि उनके ऊपर भारी मुसीबतों का पहाड़ टूटने ही वाला है। (25)
सचमुच, जब जान [soul] (निकलती हुई) गले तक आ पहुँचेगी; (26)
जब यह कहा जाएगा, "कि है कोई जो झाड़-फूंक करके जान बचा सके?"; (27)
जब वह समझ जाए कि (अब सबसे) जुदाई का समय आ गया है; (28)
जब उसके पैरों को एक साथ (कफ़न लपेटने के लिए) लाया जाएगा: (29)
उस दिन उसे अपने रब की तरफ़ हँकाकर ले जाया जाएगा। (30)
उसने न (अल्लाह और रसूल की बातों पर) विश्वास किया और न नमाज़ पढ़ी, (31)
बल्कि उसने (सच्चाई को) मानने से इंकार किया और (ईमान से) मुँह मोड़ लिया, (32)
फिर अकड़ता हुआ अपने लोगों की तरफ़ शान से चल दिया। (33)
तुम से (क़यामत की घड़ी) नज़दीक से और नज़दीक आती जा रही है। (34)
तुम से और नज़दीक, और ज़्यादा नज़दीक! (35)
क्या इंसान यह समझता है कि उसे यूँ ही (बिना हिसाब-किताब लिए) छोड़ दिया जाएगा? (36)
क्या वह (अपने जीवनकाल के शुरू में) वीर्य [sperm] की एक टपकी हुई बूँद मात्र न था, (37)
जो कि (कोख में) जोंक की तरह चिपका हुआ एक लोथड़ा बन गया, फिर अल्लाह ने उसे (इंसानी) शक्ल-सूरत दे दी, फिर सभी अंगों को (सही अनुपात में) ठीक-ठाक किया, (38)
फिर उसी से दो तरह के लिंग [Gender] बनाए: मर्द और औरत? (39)
तो क्या वह [अल्लाह] जो यह सब कर सकता है, उसे इस बात की ताक़त नहीं कि मुर्दों को फिर से ज़िंदा कर दे? (40)
नोट:
1: अल्लाह ने क़ुरआन में कई चीज़ों की क़समें खाई हैं.... (देखें 56:75; 69:38-39; 81:15-18; 84:16-18; 90:1, 3)
2: "कचोटने वाली आत्मा" से मतलब इंसान का वह ज़मीर है जो उसे गलत कामों पर कचोटता है। अल्लाह ने हर इंसान के अस्तित्व के अंदर यह एहसास
[ज़मीर] रखा है। इंसान को इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि आख़िर इस ज़मीर को
क्यों रखा गया है? अगर आने वाली आख़िरत [परलोक] की जिंदगी न होती, जहाँ इंसान को उसके अच्छे बुरे कर्मों का बदला मिलने वाला है, तो भला, बुराई से रोकने के लिए इस ज़मीर की क्या आवश्यकता थी!
4: अंगुलियों के पोरों का ख़ास करके ज़िक्र इसलिए किया गया है कि इन पोरों मेंं जो महीन-महीन लकीरें होती हैं, वह हर इंसान की दूसरे से अलग होती हैं, यहाँ तक कि करोड़ों लोगों की अंगुलियों की लकीरें भी एक
दूसरे से नहीं मिलती। इनकी लकीरों के अंतर को याद रखकर
दोबारा वैसी ही लकीरें बना देना अल्लाह के सिवा किसी से संभव नहीं है।
13: यानी कौन से काम वह दुनिया में कर आया है जो उसके कर्मों के लेखा-जोखा में दर्ज हो चुके हैं और कौन से काम वह छोड़ आया है जो उसे
करने चाहिए थे लेकिन उसने नहीं किए।
14: आदमी ख़ुद अपने किए गए अच्छे-बुरे कर्मों की गवाही देगा ..... इस बात को समझने के लिए देखें 24:24; 36:65; 41:20.
29: या (मरने के क़रीब) जब एक पैर दूसरे से मिल
जाएगा....
34: इसका एक अनुवाद यह भी हो सकता है "तबाही है तुम्हारे लिए (मरते समय), फिर तबाही है (मरने के बाद की हालत में)।
35: या यह भी अनुवाद हो सकता है, " फिर तबाही है तुम्हारे लिए (क़यामत के दिन), फिर तबाही है तुम्हारे लिए (जहन्नम की)।
36: इंसान बनने के सभी चरणों का वर्णन सूरह मोमिनून (23:14) में भी आया है।
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