Saturday, August 3, 2013

सूरह 77: अल-मुरसलात [हवाएं-- जो भेजी जाती हैं / WINDS- SENT FORTH]

सूरह 77: अल-मुरसलात 
[हवाएं-- जो भेजी जाती हैं / WINDS- SENT FORTH]



01-07: क़यामत ज़रूर आयेगी

08-13: अंतिम दिन की निशानियाँ 

14-50: फ़ैसले के दिन इंकार करने वालों की तबाही

 


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर महरबान है, अत्यंत दयावान है
उन (हवाओं) की क़सम जो एक के बाद एक भेजी जाती हैं,   (1)

फिर जो आँधी बनकर ज़बरदस्त झोंकों से चलती हैं,   (2)

और जो (बादलों को) लाकर दूर-दूर तक फैला देती हैं,   (3)

फिर जो (उन्हें) फाड़कर अलग अलग कर देती हैं,    (4)
जो (दिलों में अल्लाह की) याद दिलाती हैं,   (5)


(अच्छाई और बुराई को) सबूत के तौर पर बताने के लिए, या (सच्चाई से इंकार करने के नतीजों से) सावधान करने के लिए:   (6)

जिस (क़यामत का) तुम से वादा किया जा रहा है, वह घटना ज़रूर हो कर रहेगी।   (7)

जब सितारों की रौशनी मद्धिम पड़ जाएगी  (8)

और जब आसमान को फाड़ दिया जायेगा,  (9)

जब पहाड़ (चूर चूर करके) उड़ा दिए जाएंगे,  (10)

जब सभी पैग़म्बर निर्धारित समय पर (अपनी अपनी उम्मतों /communities पर गवाही के लिए) जमा किए जाएंगे ------ (11)

(तो भला) किस दिन के लिए (इन सब मामलों की) अवधि तय कर दी गयी है?  (12)

फ़ैसले के दिन के लिए,  (13)

और आपको क्या मालूम कि फ़ैसले का दिन क्या है?   (14)

उस दिन, सच्चाई से इंकार करने वालों के लिए बड़ी तबाही है!  (15)

क्या हमने पहले (आयी क़ौम के) लोगों को बर्बाद नहीं कर दिया?  (16)

फिर हम उन्हीं के पीछे-पीछे, बाद के (इंकार करने वाले) लोगों को भी (तबाही के रास्ते पर) चला देंगे:  (17)

हम अपराधियों के साथ ऐसा ही करते हैं।  (18)

सच्चाई से इंकार करने वालों के लिए बड़ी तबाही है उस दिन!  (19)

(फिर तुम क्यों सच्चाई से इंकार करते हो) क्या हमने तुम्हें मामूली पानी (की एक बूँद) से पैदा नहीं किया,  (20)

जिसे एक सुरक्षित टिकने की जगह [माँ की कोख] में रख दिया,  (21)

एक निश्चित अवधि तक?  (22)

हम (बच्चा ठहर जाने से लेकर पैदा होने तक) एक अवधि तय कर देते हैं: और हम इसको कितनी ख़ूबी से तय करते हैं!   (23)

बड़ी तबाही है उस दिन, सच्चाई से इंकार करने वालों के लिए!  (24)

क्या हमने धरती को घर की तरह (समेट लेने वाली) नहीं बनाया,  (25)

ज़िंदा के लिए भी और मुर्दों के लिए भी?  (26)

क्या हमने इस पर ऊँचे और मजबूत पहाड़ों को नहीं जमा दिया, और हमने तुम्हें मीठा पानी पिलाया? (27)

बड़ी तबाही है उस दिन सच्चाई से इंकार करने वालों के लिए!  (28)

(उनसे कहा जाएगा), "जाओ (अब) तुम उस (आग) की तरफ़, जिसे तुम झूठ समझकर मानने से इंकार किया करते थे!  (29)

जाओ उस (जहन्नम के) धुएं की छाया में! ये (धुआँ) तीन ऊँची-ऊँची लपटों से उठता है;  (30)

जो न (तो) ठंडी छाया है और न ही आग के शोलों से बचाने वाली है;  (31)

इस (आग) से जो चिंगारियाँ निकलती हैं, वह इतनी बड़ी-बड़ी होंगी जैसे कि पेड़ का तना (या महल) हो,  (32)

और इतनी चमकीली होंगी जैसे कि ताँबा (या पीले रंग का ऊँट)।  (33)

बड़ी तबाही है उस दिन सच्चाई से इंकार करने वालों के लिए!  (34)

यह ऐसा दिन होगा कि वे (कुछ) बोल भी नहीं सकेंगे,  (35)

और न ही उन्हें कोई मौक़ा दिया जाएगा कि वे कोई बहाने पेश कर सकें।  (36)

बड़ी तबाही है उस दिन सच्चाई से इंकार करने वालों के लिए!  (37)

(लोगों से कहा जाएगा), "यह फ़ैसले का दिन है: हमने तुम्हें और पहले गुज़री हुई सभी पीढ़ियों [Generations] को इकट्ठा किया है।  (38)

अगर तुम मेरे ख़िलाफ़ कोई दांव-पेंच चलना चाहते हो, तो (वह) दांव मुझ पर अभी चला लो।"  (39)

बड़ी तबाही है उस दिन सच्चाई से इंकार करने वालों के लिए! (40)

मगर जो लोग अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते हैं, वे ठंडी छाँव और पानी के सोतों [spring] में मज़े कर रहे होंगे,   (41)

और कोई भी फल या मेवे जिसकी वे इच्छा करेंगे (उनके लिए मौजूद होगा);   (42)

(उनसे कहा जाएगा),  “जी भर के खाओ और पियो, उन (अच्छे व नेक) कर्मों के बदले जो तुम (दुनिया में) करते रहे थे:  (43)

हम इसी तरह नेक काम करने वालों को बदले में इनाम दिया करते हैं।"   (44)

बड़ी तबाही है उस दिन सच्चाई से इंकार करने वालों के लिए! (45)

[ऐ सच्चाई से इंकार करनेवालो!], “(तुम) थोड़ा समय खा-पी लो और मज़े उठा लो, सचमुच तुम शैतानी करने वाले (मुजरिम) हो। (46)

बड़ी तबाही है उस दिन सच्चाई से इंकार करने वालों के लिए!  (47)

जब उनसे बोला जाता है, "तुम (अल्लाह के सामने) झुको", तो वे नहीं झुकते।   (48)

बड़ी तबाही है उस दिन, सच्चाई से इंकार करने वालों के लिए!   (49)

आख़िर वे इस (कुरआन) के बाद, और (अल्लाह की ओर से उतरी) किस बात पर विश्वास करेंगे?  (50)
 
 
 
नोट:
1: पहली पाँच आयतों में आने वाले तूफ़ानी हवाओं की क़सम खाई गई है, जो कि शायद आने वाले 'फ़ैसले के दिन' को दर्शाता है।
 

3: इस दुनिया में जो हवाएं चलती हैं, उनमें से कुछ तो ऐसी होती हैं जो इंसान को फ़ायदा पहुँचाती हैं और कुछ ऐसी होती हैं जो आँधी-तूफ़ान बनकर इंसान के लिए नुक़सान का कारण बनती हैं। इसी तरह, फ़रिश्ते जो अल्लाह का संदेश लेकर इंसानों के पास आते हैं, वे नेक लोगों के लिए ख़ुश्ख़बरी और बुरे लोगों को सावधान करने का सामान लेकर आते हैं। इस सूरह में पहली तीन आयतों में हवाओं की क़सम खाई गई है, और कुछ विद्वानों के अनुसार बाद की तीन आयतों मेंं फ़रिश्तों की क़सम खा गई है।

 

4: या उन (फरिश्तों) की क़सम जो सच और झूठ को अलग-अलग कर देते हैं।

 

5: या फिर नसीहत की बातें (अल्लाह की ओर से फ़रिश्ते) लेकर आते हैं।

 

12: विश्वास न करनेवाले अक्सर पूछा करते थे कि अगर यातना आनी है तो अभी आ क्यों नहीं जाती, देर क्या है? हालाँकि उसके आने का समय तय किया हुआ है!


13: "फ़ैसले का दिन" यानी अच्छे और बुरे लोगों को अलग-अलग कर देने का दिन (देखें 37:21; 44:40; 78:17). 

 

17: यानी जिस तरह पिछले ज़माने के (सच्चाई पर) विश्वास न करने वाले तबाह कर दिए गए, उसी तरह अरब के ये विश्वास न करने वाले लोग जो मुहम्मद साहब को झुठला रहे हैंं, ये भी बर्बाद कर दिए जाएंगे।


49: "बड़ी तबाही है उस दिन, सच्चाई से इंकार करने वालों के लिए!" यह बात इस सूरह में बार-बार (9 बार) आई है।

 



 

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