01-06: कर्मों के हिसाब का समय नज़दीक है
07-10: सभी रसूल आदमी ही हैं
11-15: पिछली पीढ़ियों को सज़ा: एक चेतावनी
16-18: ज़मीन-आसमान को खेल-तमाशे के लिए नहीं पैदा किया गया
19-20: फ़रिश्ते अल्लाह की बंदगी करने से नहीं थकते
21-25: अल्लाह एक है, कई नहीं
26-29: अल्लाह की कोई संतान नहीं
30-33: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ
34-41: रसूल पर ऐतराज़ करने को रद्द किया गया
42-47: दूसरे ख़ुदाओं में कोई ताक़त नहीं
48-50: मूसा और हारून (अलै)
51-71: इबराहीम (अलै) की कहानी
72-73: इसहाक़ और याक़ूब (अलै)
74-75: लूत (अलै)
76-77: नूह (अलै)
78-82: दाऊद और सुलैमान (अलै)
83-84: अय्यूब (अलै)
85-86: इसमाईल, इदरीस, और ज़ुल-किफ़्ल
87-88: ज़ुल-नून [मछलीवाले: यूनुस]
89-90: ज़करिया
91-94: मरयम
95-100: क़यामत के दिन बर्बाद किए गए समुदाय दोबारा उठाए
जाएंगे
101-103:
नेक और सच्चे लोग तकलीफ़ नहीं झेलेंगे
104-106:
नेक व अच्छे बन्दे ही (परलोक में)
ज़मीन के वारिस होंगे
107-112: रसूल को
सारे लोगों के लिए रहम करने वाला बनाकर भेजा गया है
4: मक्का के लोग आपस में ख़ुफ़िया तरीक़े से जो बातें किया करते थे, वह भी कई बार मुहम्मद (सल्ल) को 'वही' के द्वारा पता चल जाती थी, इन बातों को वे लोग जादू समझ लेते थे।
13: यह व्यंग्य से कहा गया है, मतलब यह है कि जब तुम भोग-विलास में रह रहे थे, तो घर के नौकर-चाकर पूछा करते थे कि क्या हुक्म है? अब वापस घर जाओ और देखो, शायद नौकर तुम्हारा हुक्म पूछे, मगर सच तो यह है कि घरों का तो नाम व निशान ही मिट चुका होगा।
21: मक्का के लोगों में कुछ लोग यह मानते थे कि आसमान का ख़ुदा कोई और है और ज़मीन का कोई और। अल्लाह को आसमान का ख़ुदा मानते, और ज़मीन का ख़ुदा किसी देवता को मानते थे और यह भी मानते थे कि यह देवता धरती को नई ज़िंदगी देता है और उससे धरती हरी-भरी हो जाती है।
26: अरब के लोग फ़रिश्तों को अल्लाह की बेटियाँ कहा करते थे।
30: इसका एक मतलब यह भी बताया गया है कि आसमान के बंद होने का अर्थ यह है कि बारिश नहीं होती थी, और ज़मीन के बंद होने का मतलब है कि इसमें कोई पैदावार नहीं होती थी। सो दोनों को खोल दिया गया।
34: मक्का के विश्वास न करनेवाले इस बात के इंतज़ार में थे कि कब मुहम्मद (सल्ल) की मौत होती है, ताकि वे ख़ुशियाँ मना सकें और उनका दीन उनके साथ ही ख़त्म हो जाए, देखें सूरह तूर (52: 30).
44: अरब और उसके आसपास के क्षेत्रों में धीरे-धीरे बहुदेववादियों का असर और प्रभाव कम होता जा रहा था, जिसे सीमा का सिकुड़ना कहा गया है, देखें सूरह रा'द (13: 41)
47: क़यामत के दिन हर आदमी के साथ इंसाफ़ होगा और वह इंसाफ़ होता हुआ सब लोगों को दिखायी भी देगा।
58: वह कोई त्यौहार का दिन था जब सारे लोग शहर से बाहर कहीं जश्न मनाने जाते थे, उस दिन हज़रत इबराहीम (अलै.) किसी बहाने से उन लोगों के साथ नहीं गए थे, देखें सूरह साफ़्फ़ात (37: 88)
69: इस घटना को थोड़े विस्तार से सूरह (37: 97) में किया गया है। माना जाता है कि यह आग बादशाह नमरूद [Nimrod] के हुक्म पर लगायी गई थी।
71: इस घटना के बाद इबराहीम और लूत (अलै) इराक़ से निकलकर सीरिया के इलाक़े में चले गए।
74: सदूम के लोगों के बुरे कर्मों के बारे में सूरह हूद (11: 77-83) और दूसरी आयतों में भी ज़िक्र आया है।
78: इस घटना के बारे में बताया जाता है कि एक बार ऐसा हुआ कि एक आदमी की भेड़-बकरियाँ रात में किसी दूसरे के खेत में घुस गईं और फ़सल बर्बाद कर डाली। खेतवाला मुक़दमा लेकर दाऊद (अलै.) के पास आया। उन्होंने फ़ैसला सुनाया कि चूँकि बकरियों के मालिक की यह ज़िम्मेदारी थी कि वह अपनी बकरियों को बाँधकर रखता, मगर उसने ऐसा नहीं किया था, इसके चलते खेतवाले को नुक़सान हुआ, इसलिए बकरीवाले को चाहिए कि वह खेतवाले के हुए नुक़सान के बराबर मूल्य की बकरियाँ उसे भरपाई के रूप में दे। जब सुलैमान (अलै) ने इस फ़ैसले के बारे में सुना, तो कहा कि उनके पास एक बेहतर उपाय है, और वह यह है कि बकरीवाला कुछ अवधि के लिए अपनी बकरियाँ खेतवाले को दे दे जिनके दूध आदि से खेतवाला लाभ उठाता रहे, और खेतवाला अपना खेत बकरीवाले को दे दे कि वह इसमें खेती करे, और जब फ़सल इतनी हो जाए जितनी बर्बाद होने से पहले थी, तो उस समय बकरीवाला खेतवाले को खेत वापस कर दे और खेतवाला बकरियाँ वापस कर दे, इसमें दोनों पक्षों का फ़ायदा था। इस फ़ैसले को दाऊद (अलै.) और दोनों पक्षों ने भी पसंद किया था।
80: सूरह सबा (34: 10) में है कि दाऊद (अलै) लोहे को जिस तरह चाहते मोड़ लेते थे और इससे जंग में लड़ने के लिए अच्छे क़िस्म के कवच बनाते थे।
81: सुलैमान (अलै) अपने तख़्त पर बैठकर फिलिस्तीन से जहाँ चाहते, हवा उन्हें उड़ा ले जाती थी, इससे वह एक महीने की दूरी सुबह के सफ़र में और एक महीने की दूरी शाम के सफर में पूरा कर लेते थे, देखें सूरह सबा (34: 12).
82: देखें सूरह सबा (34: 13)
83: अय्यूब (अलै) को कोई बड़ी बीमारी हो गई थी जिसके चलते वह काफ़ी समय तक तकलीफ़ में रहे, मगर धीरज नहीं खोया और अल्लाह से बीमारी ठीक करने की दुआ करते रहे, यहाँ तक कि उनकी बीवी को छोड़कर ख़ानदान के सब लोगों ने उनका साथ छोड़ दिया, फिर अल्लाह ने उनकी दुआ सुन ली।
85: हज़रत इस्माईल और इदरीस (अलै.) का ज़िक्र तो सूरह मरयम (19) में भी है, हज़रत ज़ुल-किफ़्ल के बारे में किसी घटना का ज़िक्र क़ुरआन में नहीं है। कुछ लोग कहते हैं कि वह हज़रत यसा' के ख़लीफ़ा थे, और नबी नहीं थे, लेकिन बड़े ऊँचे दर्जे के वली थे।
87: देखें सूरह साफ़्फ़ात (37: 139-148)
90: देखें सूरह आल-इमरान (3: 37-40)
95: इसका एक और अनुवाद है....."कोई भी समुदाय [क़ौम] जिन्हें हमने (उनके गुनाहों के कारण) बर्बाद कर डाला था, उसके लिए मुमकिन नहीं है कि वह लौटकर (दुनिया में) आ जाएं।"
96: क़यामत के आने की निशानी में से है कि याजूज और माजूज जैसे वहशी और दरिंदे क़बीले बहुत बड़ी संख्या में दुनिया पर हमला बोल देंगे, जिन्हें ज़ुल-क़रनैन ने एक मज़बूत दीवार बनाकर दुनिया में आने से रोक दिया था, सूरह कहफ़ (18: 94-99).
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