Tuesday, May 16, 2017

सूरह 20 : ता हा [Ta Ha]



सूरह 20: ता हा [Ta Ha]

01-08: क़ुरआन उतारने का मक़सद 

09-36: मूसा (अलै) की कहानी: उनका मिशन 

37-40: मूसा के बचपन और शुरुआती ज़िंदगी की कहानी 

41-48: मूसा और हारून को फिरऔन के पास भेजा गया 

49-76: मूसा (अलै) का फिरऔन के साथ संघर्ष 

77-79: मिस्र से इसराईल की संतानों का निकलना 

80-82: इसराईल की संतानों से किए गए वादे

83-98: बछड़े से जुड़ी पूरी घटना  

99-101: मूसा (अलै) की कहानी का अंत 

102-112: अंतिम दिन की घटनाएं 

113-114: क़ुरआन अरबी भाषा में है 

115-127: आदम से लिया हुआ शपथ 

128-132: रसूल के लिए कुछ आदेश 

133-135: रसूल से कोई चमत्कारिक निशानी दिखाने की माँग

 

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है 

ता॰ हा॰ (1)

[ऐ रसूल] हमने आप पर यह क़ुरआन इसलिए नहीं उतारी कि आप चिंता व तकलीफ़ में पड़ जाएं, (2)

यह तो इसलिए उतारी गयी है कि जो लोग (इंकार व बुरे कर्मों के नतीजे में) अल्लाह से डरने वाले हैं, उनके लिए नसीहत हो, (3)

यह उस हस्ती की तरफ़ से उतारी जा रही है जिसने ज़मीन और ऊंचे आसमानों को पैदा किया है, (4

वह (हस्ती) रहम करनेवाला रब [रहमान] है, जो अपने तख़्त पर विराजमान है। (5

जो कुछ आसमानों और ज़मीन में है, और जो कुछ इन दोनों के बीच में है, और जो कुछ धरती के नीचे है--- सब कुछ उसी (अल्लाह) का है। (6)

तुम चाहे कोई बात ऊँची आवाज़ में कहो (या चुपके से), वह तुम्हारे राज़ [secret] की बातें भी जानता है, और यहाँ तक कि तुम्हारे (दिल के अंदर) छिपी हुई बातें भी जानता है। (7)

वह अल्लाह--- कि उसके सिवा कोई पूजने के लायक़ नहीं--- सारी ख़ूबियों वाले अच्छे नाम उसी के लिए हैं। (8)
 

[ऐ रसूल] क्या आपने मूसा [Moses] की कहानी सुनी? (9
जब उसने (दूर से) आग देखी तो अपने घरवालों से कहा, "तुम लोग यहीं ठहरो! मुझे (दूर में) आग दिखायी दी है। शायद तुम्हारे (आग तापने के) लिए उसमें से एक अंगारा ले आऊँ या उस अलाव पर सही मार्ग का पता चल जाए।" (10)

फिर जब वह आग के पास पहुँचा, तो (एक आवाज़ ने) उसे पुकारा, "ऐ मूसा! (11)

मैं तेरा रब हूँ। अपने जूते उतार दे: तू इस वक़्त ‘तुवा’ की पवित्र घाटी में खड़ा है। (12)

मैंने (अपना संदेश पहुँचाने के लिए) तुझे चुन लिया है। अतः जो बात ‘वही’[revelation] के द्वारा कही जा रही है, उसे ध्यान लगा कर सुनो। (13)
निस्संदेह मैं ही अल्लाह हूँ; मेरे सिवा कोई भी पूजने के लायक़ नहीं। अतः तू मेरी ही बन्दगी कर और (पाबंदी से) नमाज़ अदा कर ताकि तू मुझे याद करता रहे। (14)
वह (नियत) घड़ी जल्द आनेवाली है----- हालाँकि मैं उस (समय) को अभी छिपाए रखना चाहता हूँ ---ताकि हर आदमी को उसके द्वारा की गयी कोशिशों का बदला मिल सके। (15)
देखो! ऐसा नहीं होना चाहिए कि कोई आदमी जो इस (नियत घड़ी) में विश्वास न करता हो और अपनी इच्छाओं के पीछे भागता हो, वह तुम्हें इससे बहका दे, और तुम्हारी बर्बादी का कारण बन जाए।” (16)


“ऐ मूसा! यह तेरे दाहिने हाथ में क्या है?" (17)
उसने कहा, "यह मेरी लाठी है। मैं इस पर टेक लगाता हूँ; इससे अपनी बकरियों के लिए पेड़ों के पत्ते झाड़ता हूँ; और इससे मेरी दूसरी ज़रूरतें भी पूरी होती हैं।" (18)

अल्लाह ने कहा, "मूसा! इसे नीचे फेंक दे!" (19)
उसने (लाठी) नीचे फेंक दी, और सहसा क्या देखता है कि वह एक तेज़ दौड़ता हुआ साँप बन गयी! (20)

अल्लाह ने कहा, "इसे पकड़ लो और डरो मत: हम इसे फिर इसकी असली हालत पर लौटा देते हैं। (21

(फिर आदेश हुआ): अब अपने हाथ को अपनी बग़ल [armpit] के नीचे रखो और बाहर निकालो, वह बिना किसी ख़राबी के, सफ़ेद (चमकता हुआ) निकलेगा: (लाठी के अलावा) यह दूसरी निशानी होगी।  (22

(यह दोनों निशानियाँ इसलिए दीं कि) आने वाले समय में हम तुझे अपनी निशानियों में से कुछ बड़ी निशानियाँ दिखा सकें। (23
[आदेश हुआ]: ऐ मूसा! फ़िरऔन [मिस्र का राजा, Pharaoh] के पास जाओ, कि सचमुच वह बहुत ज़ालिम हो गया है।" (24

मूसा ने कहा, "मेरे रब! मेरे दिल में उम्मीद व जोश जगा दे (ताकि बड़े से बड़ा बोझ उठा सकूँ) (25
और मेरे काम को मेरे लिए आसान बना दे। (26)  
मेरी ज़बान की लड़खड़ाहट ठीक कर दे, (27
ताकि मेरी बात लोगों की समझ में आ जाए, (28
और मेरे घरवालों में से मेरे लिए एक सहायक दे दे,  (29
हारून [Aaron] के रूप में, जो मेरा भाई है --- (30)
उसके द्वारा मेरी ताक़त बढ़ा दे।  (31
और उसे मेरे काम में हाथ बँटानेवाला बना दे, (32)
ताकि हम अधिक से अधिक तेरी बड़ाई का बखान कर सकें (33)
और अक्सर तेरी याद में लगे रहें:  (34
तू तो हमेशा ही हम पर नज़र रखनेवाला है।" (35)

अल्लाह ने कहा, "मूसा, जो कुछ तूने माँगा है, मैंने मंज़ूर कर लिया। (36)
(तू जानता है) हम तुझ पर पहले भी एक बार एहसान कर चुके हैं,  (37)
जब हमने तेरी माँ के दिल में यह बात डालते हुए कहा था, (38)
“तुम अपने बच्चे को बक्से में रख दो, फिर उसे (नील) नदी में डाल दो। नदी उस बक्से को बहाते हुए स्वंय किनारे पर लगा देगी, और फिर वह उस (बच्चे) को उठा लेगा जो मेरा दुश्मन है, और उस बच्चे का भी दुश्मन है।” मैंने तुझ पर अपना ख़ास प्यार बरसाया था (कि जो देखता तुम से प्यार कर बैठता), और ऐसी योजना बनायी थी, ताकि तेरा पालन-पोषण मेरी ख़ास निगरानी में हो सके। (39)

तेरी बहन (घर से) बाहर निकली, और (फ़िरऔन की लड़की से) कहने लगी, “क्या मैं तुम्हें उस (औरत) का पता बता दूँ जो इस (बच्चे) को दूध पिला सकती है”, इस तरह, हमने तुझे फिर तेरी माँ के पास (सुरक्षित) पहुँचा दिया, ताकि खुशी में उसकी आँख ठंडी रहें और वह दुखी न रहे। कुछ समय बाद तुमने (मिस्र में) एक आदमी को मार डाला था, लेकिन हमने तुझे उस चिंता व परेशानी से मुक्ति दी थी, और फिर तुझे और भी कई तरीक़े से परखा। फिर तुम कई सालों तक मदयन [Midian] के लोगों के बीच रहे, और उसके बाद मेरे तय किए हुए इरादे के मुताबिक़, ऐ मूसा, तुम यहाँ आ पहुँचे। (40)

हमने तुझे अपने (संदेश पहुँचाने के) लिए चुन लिया है। (41)

अब तुम और तुम्हारा भाई, दोनों मेरी निशानियों के साथ जाओ, और देखो! इस बात का ध्यान रहे कि मुझे याद करते रहना। (42)

दोनों मिलकर फ़िरऔन के पास जाओ, कि उसने (मर्यादा की) तमाम हदें तोड़ डाली हैं। (43)

मगर देखो, उससे नर्मी से बात करना, शायद कि वह उस पर ध्यान दे या कुछ आदर दिखलाए।" (44)
 
दोनों ने कहा, "ऐ हमारे रब! हमें डर है कि कहीं वह हमें कोई बड़ा नुक़सान न पहुँचाए या मर्यादा की सीमाएं न तोड़ डाले।" (45)

अल्लाह ने कहा, "डरो नहीं, मै तुम दोनों के साथ हूँ। मैं सब सुनता भी हूँ और देखता भी हूँ। (46)

जाओ और जाकर उससे कहो, “हम तेरे रब के भेजे हुए रसूल [Messengers] हैं, अत: इसराईल की सन्तान को हमारे साथ भेज दे, और उनके साथ ज़ुल्म न करे। हम तेरे पास तेरे रब की निशानी लेकर आए हैं, और जो कोई भी सीधे रास्ते पर चले, उसके लिए सलामती है; (47)
हमें ‘वही’ [Revelation] द्वारा (अल्लाह की तरफ़ से) यह बात बतायी गयी है कि जो कोई भी सच्चाई को मानने से इंकार करेगा और उससे मुँह फेरेगा, तो उसके ऊपर यातना आ पड़ेगी।" (48)

फ़िरऔन ने पूछा, "अच्छा, तुम दोनों का रब कौन है, मूसा?" (49)

मूसा ने कहा, "हमारा रब वह है जिसने हर चीज़ को उसकी सही आकृति [Form] दी, फिर उसके (विकास के) लिए ज़रूरी रास्ता भी बता दिया।" (50) 

फ़िरऔन ने कहा, "अच्छा तो उन पीढ़ियों का क्या होगा, जो पहले गुज़र चुकी हैं?" (51)

मूसा ने कहा, "इन सब का ज्ञान तो केवल मेरे रब के पास ही है, जो एक किताब में लिखा हुआ है; मेरा रब न चूकता है और न भूलता है।" (52)

"वह (अल्लाह) है जिसने तुम्हारे लिए ज़मीन को फ़र्श की तरह बिछा दिया, और उसमें से रास्ते निकाल दिए। उसने आसमान से बारिश उतार भेजी। इसी पानी से हमने तरह तरह के पेड़-पौधे निकाले, (53)

अत: ख़ुद भी खाओ, और अपने चौपायों को भी चराओ! निस्संदेह इन सब में समझदार लोगों के लिए बहुत-सी निशानियाँ हैं।  (54)

इसी ज़मीन (की मिट्टी) से हमने तुम्हें पैदा किया था, इसी के अंदर हम तुम्हें वापस ले जाएंगे, और फिर इसी से दूसरी बार उठाए जाओगे।" (55)

हक़ीक़त यह है कि हमने फ़िरऔन को अपनी सब निशानियाँ दिखायीं, मगर उसने उन्हें झुठलाया और मानने से इंकार कर दिया। (56

उसने कहा, "ऐ मूसा! क्या तू हमारे पास इसलिए आया है कि अपने जादू से हमको अपनी ज़मीन से निकाल बाहर कर दे? (57)

अच्छा, हम भी तेरे जादू का मुक़ाबला जादू से ही करेंगे: एक (मुनासिब) जगह ठहरा लो जिस पर दोनों पक्ष राज़ी हों, और (मुक़ाबले का) एक समय तय कर लो, जिसे हम दोनों में से कोई भी तोड़ न पाए।" (58)

मूसा ने कहा, "ठीक है, हमारे बीच वह दिन तय रहा, जिस दिन उत्सव मनाया जाता है, और यह कि लोग दिन चढ़े वहाँ इकट्ठे हो जाएँ।" (59)


फ़िरऔन (वहाँ से) चला गया, फिर उसने अपने सारे (शैतानी) हथकंडे जुटाए, और (नियत समय पर) आ गया। (60)

मूसा ने उन लोगों से कहा, "ख़बरदार! अल्लाह के बारे में झूठी बातें न गढ़ो, वरना वह [अल्लाह] तुम्हें ऐसी सज़ा देगा कि तुम बर्बाद हो जाओगे। याद रहे, जिस किसी ने भी झूठ गढ़ा, वह असफल रहेगा।" (61)
इस पर वे आपस में अपनी योजना के बारे में विचार-विमर्श करने लगे, और चुपके-चुपके कानाफूसी करते हुए, (62)

कहने लगे, "ये दोनों जादूगर हैं, इनका मक़सद है कि अपने जादू से तुम्हें अपनी ज़मीनों से निकाल बाहर कर दें, और तुम्हारी उत्तम संस्कृति को बर्बाद कर डालें।" (63)

अतः अपने सभी हथकंडों [resources] को जुटा लो, फिर मुक़ाबले के लिए पंक्तिबद्ध हो जाओ। आज जो भी जीतेगा, असल कामयाबी उसी की होगी।" (64)

जादूगरों ने कहा, "ऐ मूसा! पहला दांव तुम चलोगे या फिर हम चलें?” (65

मूसा ने कहा, "तुम्हीं पहले चलो।" फिर (जादूगरों ने अपने दांव फेंके), अचानक जादू के असर से उनकी रस्सियाँ और लाठियाँ (साँप की तरह) दौड़ती हुई महसूस होने लगीं! (66)

मूसा अपने जी में थोड़ा डरा, (67)

मगर हमने कहा, "डरो मत! निस्संदेह तुम ही (मुक़ाबले में) भारी पड़ोगे। (68)

तुम्हारे दाहिने हाथ में जो (लाठी) है, उसे नीचे फेंक दो: जो कुछ (जादू से) उन्होंने रचा है, वह उसे निगल जाएगी। जो कुछ उन्होंने रचा है, वह तो बस जादूगर के करतब हैं, और जादूगर चाहे किसी रास्ते से आए, उसे कभी कामयाबी नहीं मिलती।" (69)


[ऐसा ही हुआ, और] सारे जादूगर घुटनों के बल (सज्दे में) गिरा दिए गए। वे बोले, "हमने विश्वास कर लिया, हारून और मूसा के रब पर।" (70)
फ़िरऔन ने (जादूगरों से) कहा, "मेरी इजाज़त लेने से पहले ही तुम्हारी यह मजाल कि तुमने इनके रब पर विश्वास कर लिया? यह ज़रूर तुम्हारा उस्ताद होगा, जिसने तुम्हें जादू सिखाया है। अब अवश्य ही मैं तुम्हारा एक तरफ़ का हाथ और दूसरी तरफ का पाँव कटवा दूँगा, और खजूर के तनों पर तुम्हें सूली चढ़ा दूँगा। तब तुम्हें अवश्य ही मालूम हो जाएगा कि हममें से किसकी यातना अधिक कठोर और लम्बे समय तक रहने वाली है!" (71)

जादूगरों ने कहा, "हम यह कभी नहीं कर सकते कि जो (सच्चाई की) स्पष्ट निशानियाँ (अल्लाह की तरफ़ से) हमारे सामने आ चुकी हैं, उन्हें छोड़कर तेरा आदेश मान लें, और न ही जिस अल्लाह ने हमें पैदा किया है, उससे मुँह फेरकर तेरा हुक्म मान लें: अत: तू जो चाहे, फ़ैसला कर ले: वैसे भी तू तो बस इसी सांसारिक जीवन के मामलों का ही फ़ैसला कर सकता है----- (72)

हमने तो अपने रब पर विश्वास कर लिया, (इस आशा में) कि शायद वह हमारे गुनाहों को माफ़ कर दे औऱ इस जादूगरी को भी जिसे दिखाने के लिए तूने हमें मजबूर किया---- अल्लाह ही सबसे अच्छा और हमेशा बाक़ी रहने वाला है।" (73)


शैतानियाँ करने वाले लोग जब अपने रब के पास लौटकर आएंगे, तो (अपने कर्मों के) बदले में जहन्नम पाएंगे: वहीं उन्हें (हमेशा) रहना है, जहाँ वे न मर सकेंगे, न जी सकेंगे। (74)

मगर वे लोग जिन्होंने (अल्लाह में) विश्वास रखा और अच्छे कर्म किए, जब अपने रब के पास लौटकर आएंगे, तो इनाम में उनके लिए ऊँचे से ऊँचा दर्जा होगा,  (75)

बहती हुई नहरों के बीच, फैले हुए सदाबहार (परम आनंदवाले) बाग़ होंगे, जहाँ वे हमेशा रहेंगे। यह इनाम है उन लोगों के लिए, जिसने स्वयं को (बुराइयों से) बचाए रखा था। (76)

हमने मूसा को ‘वही’ [Revelation] भेजी, "रातों रात मेरे बन्दों [इसराईल की संतान] को लेकर (मिस्र से) निकल पड़ो, और उनके लिए दरिया में सूखा मार्ग निकाल लो। और देखो, तुम्हें न तो (फ़िरऔन द्वारा) पीछा किए जाने व पकड़े जाने का डर हो, और न कोई चिंता व दुख तुम्हें सताए।" (77)

फ़िरऔन ने अपनी सेना के साथ उनका पीछा किया और अन्ततः समंदर की लहरें उन पर इस तरह छा गयीं कि पूरी तरह से डुबाकर रख दिया।  (78)

फ़िरऔन ने सचमुच अपनी क़ौम के लोगों को पथभ्रष्ट किया; और उन्हें सही मार्ग न दिखाया।  (79)


ऐ इसराईल की सन्तान! हमने तुम्हें तुम्हारे दुश्मनों से बचा लिया। तूर पहाड़ के दाहिनी तरफ़ जब तुमसे (बरकतों का) वादा किया था, और फिर (सीना के रेगिस्तान में खाने के लिए) तुम पर ‘मन्ना’ और ‘सलवा’ [quails] उतारा, (80)

(तुम्हें कहा गया), "जो कुछ रोज़ी हमने दे रखी है, उसमें से अच्छी चीज़ें खाओ, मगर (मर्यादा की) एक हद से आगे न बढ़ो, वरना मेरा ग़ुस्सा तुम पर आ गिरेगा। और जिस किसी पर मेरा ग़ुस्सा उतरा, तो सचमुच वह बहुत नीचे गिर गया।  (81)

इसके बावजूद, मैं उन लोगों को बेहद माफ़ करनेवाला हूँ, जो (अपने किए पर) तौबा करते हैं, ईमान रखते हैं, अच्छे कर्म करते हैं, और सीधे मार्ग पर जमे रहते हैं।" (82)
 
[मूसा अपनी क़ौम को हारून की निगरानी में छोड़कर तूर पहाड़ पर ध्यान लगाने आए थे, तब अल्लाह ने कहा], "ऐ मूसा! अपनी क़ौम को पीछे छोड़कर तुझे इतनी जल्दी यहाँ आने पर किस चीज़ ने उभारा?" (83)
उसने कहा, "वे मेरे मार्ग का अनुसरण करते हुए पीछे-पीछे चले आ रहे हैं, ऐ रब! मैं तेरे पास लपककर आ गया, ताकि तू ख़ुश हो जाए।" (84

लेकिन अल्लाह ने कहा, "तेरी अनुपस्थिति में हमने तेरी क़ौम के लोगों की परीक्षा ली: सामरी ने उन्हें बहका दिया है।" (85)

तब मूसा बेहद ग़ुस्सा और दुखी मन से अपनी क़ौम के लोगों के पास वापस गया। उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! क्या तुम्हारे रब ने तुम से अच्छा वादा नहीं किया था? क्या इस बात को हुए बहुत लम्बा समय गुज़र गया था या तुम यही चाहते ही थे कि तुम पर तुम्हारे रब का ग़ुस्सा टूट पड़े? इसीलिए तुमने मुझ से किए हुए वादे को तोड़ डाला?" (86)

उन लोगों ने कहा, "हमने आप से किए हुए वादे को जान-बूझकर नहीं तोड़ा, बल्कि असल में (मिस्र से निकलते समय) लोगों के पास भारी भारी ज़ेवर थे जिसके बोझ तले हम दबे हुए थे, (और फिर सफ़र की मुसीबतों से बचने व ईमान की सफ़ाई के लिए ज़ेवरों को फेंक देना तय हुआ), अत: हमने उनको फेंक दिया था, और सामरी ने (उन्हें जमा करके आग में) डाल दिया था।" (87)

फिर सामरी ने उस (पिघले हुए ज़ेवरों) से एक बछड़े की मूर्ति बना दी, जिसमें से गाय के पुकारने जैसी आवाज़ आती थी, और लोग देखकर कहने लगे, "यही तुम्हारा ख़ुदा है और मूसा का भी ख़ुदा यही है, मगर वह [मूसा] भूल गए हैं।" (88)

क्या उन्होंने नहीं देखा था कि वह (बछड़ा आवाज़ तो निकालता है, पर) उनकी किसी बात का जवाब नहीं देता था, और यह कि उसमें न तो किसी को कोई नुक़सान पहुँचाने की ताक़त थी और न फ़ायदा? (89)

हारून ने हालाँकि उन्हें बता दिया था, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! यह बछड़ा तुम लोगों के लिए एक परीक्षा है, तुम्हारा असल रब तो रहम करनेवाला रब [रहमान] है, अतः तुम मेरे पीछे चलो, और मेरा आदेश मानो।" (90)

मगर उन्होंने जवाब दिया, "जब तक मूसा लौटकर हमारे पास न आ जाएं, तब तक हम इसकी भक्ति करना नहीं छोड़ेंगे।" (91)


मूसा ने कहा, "ऐ हारून! जब तुम समझ गए कि ये पथभ्रष्ट हो चुके हैं, तो किस चीज़ ने तुम्हें रोके रखा था,  (92)

मेरे पीछे-पीछे चले आने से? तुम मेरे आदेश की अवहेलना कैसे कर सकते हो?" (93)

हारून ने कहा, "ऐ मेरी माँ के बेटे! मेरी दाढ़ी और मेरा सिर न नोच!---- मुझे डर था कि तू कहेगा, “तूने इसराईल की सन्तान में फूट डाल दी और मेरी बात पर ध्यान नहीं दिया।" (94)

(मूसा ने) कहा, "और ऐ सामरी! तेरा क्या मामला था?" (95

उसने जवाब दिया, "मैंने कुछ ऐसा देखा था, जो इन लोगों ने नहीं देखा; मैंने रसूल की कुछ शिक्षाएं तो ली थीं, मगर फिर उन्हें (अपने मन से) निकालकर एक तरफ़ डाल दिया: मेरे जी ने ही मुझे ऐसा करने के लिए उकसाया था।" (96)

मूसा ने कहा, "चला जा यहाँ से! अब इस जीवन में तेरे लिए यही है कि तू कहता रहे, “मत छूओ मुझे!” मगर हाँ, तेरे लिए (अल्लाह के सामने हाज़िर होने का) एक निश्चित समय तय किया हुआ है, जिससे बच निकलने का कोई रास्ता नहीं है। देख अपने इस प्रभु को जिसकी भक्ति में तू जमा बैठा था----  हम इसे चूर-चूर करके दरिया में बिखेर देंगे।" (97
“[लोगो] तुम्हारा असल ख़ुदा तो बस एक अल्लाह है, जिसके अलावा कोई पूजने के लायक़ नहीं----- उसके ज्ञान ने हर चीज़ को घेर रखा है।" (98)

इस तरह से [ऐ रसूल], हम पुराने ज़माने की कहानियों से आपका रिश्ता जोड़ देते हैं। हमने आपको अपनी तरफ़ से एक नसीहत का सामान [क़ुरआन] दिया है। (99)

जिस किसी ने इससे मुँह मोड़ा, वह निश्चय ही क़यामत के दिन (अपने जुर्म का) बड़ा भारी बोझ उठाएगा, (100)

वे इसी बोझ तले दबे रहेंगे। कैसा भयानक बोझ है जो क़यामत के दिन यह लिए फिरेंगे! (101)

जिस दिन नरसिंघे [Trumpet] को फूँक मारकर बजा दिया जाएगा, और हम मुजरिमों को अंधों के रूप में इकट्ठा करेंगे, (102)

वे आपस में चुपके-चुपके पूछेंगे कि "हम (क़ब्रों में) दस दिन से ज़्यादा क्या रहे होंगे?"---- (103)

जो कुछ वे कह रहे होंगे, हम उसे अच्छी तरह जानते हैं---- मगर उनमें से सबसे समझदार आदमी कहेगा, "हम बहुत रहे होंगे तो बस एक दिन रहे होंगे।" (104)

[ऐ रसूल] वे आपसे पहाड़ों के बारे में पूछते हैं: कह दें, "(क़यामत के दिन) मेरा रब उन पहाड़ों को (चूर-चूर करके) धूल की तरह उड़ा देगा (105)
और धरती को एक समतल मैदान बनाकर छोड़ेगा, (106)

जिसमें न तो कोई ऊँचाई दिखेगी और न ही पस्ती।" (107)

उस दिन सब लोग पुकारनेवाले के पीछे-पीछे चल पड़ेंगे, और उससे बच निकलने का कोई रास्ता न होगा; रहम करनेवाले रब [रहमान] के सामने हर एक आवाज़ दबकर रह जाएगी; बस केवल फुसफुसाने की आवाज़ ही सुनाई देगी। (108)

उस दिन किसी की सिफ़ारिश काम न आएगी सिवाय उसके, जिसको रब [रहमान] ख़ास इजाज़त दे दे, और जिसकी बात को मंज़ूर कर ले ---- (109)

जो कुछ लोगों के सामने है और जो उनके पीछे गुज़र चुका, वह सारी बातों को जानता है, हालाँकि वे उस [अल्लाह] को पूरी तरह समझ नहीं सकते---- (110)

सभी चेहरे उस हमेशा ज़िंदा रहनेवाले, हर समय निगरानी रखनेवाले [अल्लाह] के आगे झुकें होंगे। ऐसे लोग जिन पर बुरे कर्मों का बोझ होगा, वे निराशा में डूब जाएंगे,  (111)

पर जिस किसी ने अच्छे कर्म किए हैं, और (सच्चाई पर) ईमान रखा है, तो उसे न तो किसी नाइंसाफ़ी का डर होगा और न हक़ मारे जाने का।” (112)

हमने क़ुरआन को अरबी ज़बान में उतारा है, और हमने इसमें हर तरह से (इंकार व बुरे कर्मों के नतीजे की) चेतावनियाँ दे दी हैं, ताकि वे (भटकने से) सावधान रह सकें या इस पर ध्यान दे सकें---  (113)

बड़ी ऊँची शान है अल्लाह की, जिसे हर एक चीज़ पर पूरा नियंत्रण है।
 
[ऐ रसूल] जब क़ुरआन (की आयतें) उतारी जा रही हों, तो उसे पूरी तरह उतरने से पहले ही पढ़ने में जल्दी न किया करें, बल्कि कहें, "मेरे रब, मेरे ज्ञान में बढ़ोत्तरी कर दे!" (114)

असल में हमने आदम को पहले से ही बताकर शपथ ले ली थी, फिर वह भूल गया और हमने उसमें इरादे की मज़बूती न पाई। (115

जब हमने फ़रिश्तों से कहा था, "आदम के सामने झुक जाओ", तो सब झुक गए थे, मगर इबलीस ने (झुकने से) इंकार किया, (116)

इस पर हमने कहा, "ऐ आदम! (देख लो), इबलीस तुम्हारा दुश्मन है, तुम्हारा और तुम्हारी बीवी का दुश्मन: कहीं ऐसा न हो कि यह तुम दोनों को जन्नत से निकलवा दे और तुम तकलीफ़ में पड़ जाओ। (117)

तुम्हारे लिए अब ऐसी ज़िंदगी है कि (जन्नत के) बाग़ में तुम न कभी भूखे रहोगे, और न ही नंगापन महसूस करोगे,  (118)

न प्यासे रहोगे और न धूप की तकलीफ़ उठाओगे।" (119)

लेकिन फिर शैतान ने आदम को बहकाया, और कहने लगा, "ऐ आदम! क्या मैं तुझे एक ऐसे पेड़ का पता दे दूँ जिससे जीवन अमर हो जाए, और ऐसी शक्ति मिल जाए जो कभी घटे नहीं?" (120)

और (फिर आदम और उसकी पत्नी) दोनों ने उस (पेड़) में से कुछ खा लिया, जिसके नतीजे में उन्हें (शर्म से) अपने जिस्म को छिपाने की ज़रूरत महसूस हुई, और वे बाग़ के पत्तों से अपने जिस्म को ढकने लगे। आदम अपने रब के कहने पर न चला और वह (जन्नत की ज़िंदगी से) भटक गया----- (121)

लेकिन बाद में, उसका रब उसे फिर अपने नज़दीक ले आया, उसकी तौबा [repentance] क़बूल कर ली, और उसका मार्गदर्शन किया ---- (122)

अल्लाह ने कहा, "तुम दोनों इस जन्नत से चले जाओ!, (आदम और शैतान) तुम दोनों एक दूसरे के दुश्मन होगे।
(अब धरती पर) अगर मेरी ओर से तुम (लोगों) को कोई मार्गदर्शन पहुँचे, तो जिस किसी ने मेरे मार्गदर्शन को अपनाया, वह न तो गुमराह होगा और न किसी तकलीफ़ में पड़ेगा। (123)

और जिस किसी ने मेरी नसीहत से मुँह मोड़ा, तो उसका जीवन सख़्त परेशानी में गुज़रेगा। क़यामत के दिन हम उसे अंधा करके खड़ा करेंगे।" (124

वह कहेगा, "ऐ मेरे रब! तू मुझे यहाँ अंधा करके क्यों लाया? पहले तो मैं देख सकता था!" (125)

अल्लाह कहेगा, "ऐसा ही होना था: जब हमारी निशानियाँ [आयतें] तेरे पास आती थीं, तो तू उन्हें नज़रअंदाज़ [ignore] कर देता था, अत: आज तुझे भी भुला दिया जाएगा।" (126)

जो कोई मर्यादा को तोड़कर बहुत आगे चला जाता है, और अपने रब की आयतों पर विश्वास नहीं रखता, तो इसी तरह हम उसे बदला देते हैं। और आख़िरत [Hereafter] की सज़ा तो बेहद कठोर और बहुत देर तक रहने वाली है। (127)

पहले की कितनी ही पीढ़ियों को हम (उनके जुर्मों के नतीजे में) बर्बाद कर चुके हैं जिनके खंडहरों से होकर तुम लोग आते जाते हो, तो क्या उनसे कोई सबक़ नहीं सीखते? समझदार आदमी के लिए सचमुच इसमें बहुत-सी निशानियाँ हैं! (128)


[ऐ रसूल] अगर आपके रब ने (सज़ा देने के समय) की बात पहले से ही तय न कर दी होती, तो अब तक उन्हें तबाह कर दिया गया होता। उनका समय तय हो चुका है, (129)

अतः [ऐ रसूल] जो कुछ वे कहते हैं, आप उस पर धीरज [सब्र] से काम लें---- मन से अपने रब का गुणगान करें, सूरज निकलने और डूबने से पहले, और रात की घड़ियों में भी उसका गुणगान करें, और दिन के शुरू और ख़त्म होने पर [दोपहर के लगभग] भी, ताकि आपको संतोष मिल सके ---- (130)

हमने उनमें से कुछ लोगों को इस ज़िंदगी की बहार लूटने और मज़े करने का मौक़ा दिया है: हम उसके द्वारा उनकी परीक्षा लेते हैं, मगर आप इन चीज़ों को चाहत की नज़र से न देखें, आपके रब की दी हुई रोज़ी उत्तम भी है और देर तक रहने वाली भी।  (131)

आप अपने लोगों को नमाज़ पढ़ने का आदेश दे दें, और स्वयं भी उसपर जमे रहें। हम आपसे कोई रोज़ी नहीं माँगते; रोज़ी तो हम ही देते हैं, और आख़िरत का इनाम तो उन्हीं लोगों के लिए है जो (अल्लाह की) भक्ति में डूबे होते हैं। (132)


विश्वास न करनेवाले कहते हैं, "यह (रसूल) अपने रब की ओर से हमारे पास कोई निशानी क्यों नहीं लाते?" मगर क्या उन्हें स्पष्ट प्रमाण (के रूप में क़ुरआन) नहीं दिया गया, जो पहले की (आसमानी) किताबों में लिखी हुई बातों की पुष्टि करती है? (133)

अगर इस रसूल के आने से पहले, हम सज़ा के तौर पर इन्हें तबाह व बर्बाद कर देते, तो वे ये कहते "ऐ हमारे रब, काश, तूने हमारे पास कोई रसूल भेजा होता, तो हम अपमानित और बदनाम होने से पहले ही तेरी आयतों के अनुसार चलते!" (134)

[ऐ रसूल] कह दें, "हम सब (आने वाले समय का) इंतज़ार कर रहे हैं, अतः तुम भी इंतज़ार करो: जल्द ही तुम्हें मालूम हो जाएगा कि कौन सीधे मार्ग पर चलने वाला है और कौन मंज़िल तक पहुँचता है।" (135)



नोट:

1: राज़ी के अनुसार ता.हा. अलग-अलग अक्षर नहीं हैं, बल्कि यमनी ज़बान की एक शाख़ में "ताहा" का मतलब "ऐ इंसान!" होता है। कुछ लोग कहते हैं कि यह अल्लाह का एक नाम है, जबकि कुछ लोग इसे मुहम्मद (सल्ल) का एक नाम भी मानते हैं। 

2: जब क़ुरआन की नसीहतों पर मक्का के लोग विश्वास नहीं करते थे, तो मुहम्मद (सल्ल) को तकलीफ़ होती थी। इसका एक मतलब यह भी बताया जाता है कि शुरू में आप सारी रात खड़े होकर इबादत करते थे जिससे आपके पाँव सूज जाते थे, इस आयत में उन्हें इतनी तकलीफ़ें उठाने से मना किया गया है।

9: "क्या आपने ...कहानी सुनी?"... यह एक अरबी मुहावरा है जिसका मतलब है, "इसके बारे में अच्छी तरह सोचें.... या इससे सबक सीखें।" 

10: मूसा (अलै.) काफी लम्बी अवधि मदयन में गुज़ारकर मिस्र की तरफ़ जा रहे थे, उनके साथ उनका परिवार भी था। जब वे सीना [Sinai] के रेगिस्तान से गुज़र रहे थे, तब यह घटना हुई। 

11: कहा जाता है कि जब मूसा (अलै.) आग के पास पहुँचे, तो देखा कि वह आग पेड़ के ऊपर शोले मार रही है, मगर पेड़ का कोई पत्ता जलता नहीं है! 

12: तूर पहाड़ के नीचे जो घाटी है, उसका नाम "तुवा" है। 

18: ".... मैं इस (लाठी) से पेड़ के पत्ते झाड़ता हूँ" का एक और अनुवाद है, " मैं इससे अपनी भेड़ों को क़ाबू में रखता हूँ।"  

27: बचपन में मूसा (अलै.) ने ग़लती से अपने मुँह में आग का अंगारा रख लिया था जिसकी वजह से ज़बान लड़खड़ाती थी। 

39: फ़िरऔन के सामने किसी ने भविष्यवाणी की थी कि तुम्हारी सल्तनत का अंत इसराईल की संतान का एक आदमी करेगा, इसलिए उसने हुक्म दे रखा था कि इसराईल की संतानों के यहाँ अगर कोई बेटा पैदा हो, तो उसे मार दिया जाए। जब मूसा पैदा हुए, तो उनके मारे जाने का डर हो गया था। इसीलिए उनकी माँ ने अल्लाह के हुक्म से उन्हें बक्से में रखकर नील नदी में डाल दिया था......... मेरा और बच्चे का दुश्मन यानी फिरऔन ......

40:  फ़िरऔन के लोगों ने बक्सा उठा लिया और बच्चे को जब फ़िरऔन की बीवी ने देखा तो उसको पालने का इरादा कर लिया और फ़िरऔन को भी इस पर राज़ी कर लिया। फिर ऐसा हुआ कि बच्चा किसी का भी दूध नहीं पी रहा था, इसी बीच मूसा की बहन पता करते हुए वहाँ पहुँची, और उसने एक औरत यानी अपनी माँ के बारे में बताया जो कि बच्चे को दूध पिला सकती थी....... मूसा (अलै) ने एक बेकसूर इसराइली को बचाने के लिए एक ज़ालिम को एक घूंसा मारा था, मगर वह मर गया हालाँकि उनका इरादा उसे क़त्ल करने का नहीं था, देखें सूरह क़सस (28: 15) 

51: फ़िरऔन यह पूछना चाहता था कि जो क़ौमें पहले गुज़र चुकीं हैं और जो एक ख़ुदा को नहीं मानती थीं , इसके बावजूद वह ज़िंदा रहीं और उनपर कोई यातना नहीं आयी। जवाब में कहा गया है कि यह अल्लाह ही तय करता है कि किसे दुनिया ही में सज़ा देना है और किसकी सज़ा को आख़िरत/परलोक तक टाले रखना है।

61: अल्लाह के संदेश की सच्चाई को मानने से इंकार करना, अल्लाह के बारे में झूठी बातें गढ़ने जैसा है। 

69: जब मूसा (अलै.) ने अपनी लाठी फेंकी, तो वह अजगर बनकर जादूगरों के बनाए हुए नक़ली साँपों को एक-एक करके निगल गई। जादूगरों ने मूसा (अलै) का यह चमत्कार देखा तो वे एकदम से सज्दे में गिर पड़े। 

77: जादूगरों की घटना के बाद कई साल मूसा (अलै)  मिस्र में अल्लाह का संदेश पहुंचाते रहे, फिर उन्हें इसरायली लोगों के साथ समंदर [लाल सागर] में से होकर जाने का हुक्म मिला, जिसका ज़िक्र सूरह यूनुस (10: 89-92) और सूरह शुअरा (26: 60-66) में आया है। 

83: सीना के रेगिस्तान में ठहरने के दौरान अल्लाह ने मूसा (अलै) को तूर पहाड़ पर बुलाया था, ताकि वह 40 दिन तक अल्लाह की भक्ति में ध्यान लगाएं, तो उन्हें तोरात [Torah] दी जाए। मूसा (अलै) थोड़ा पहले ही चले गए थे, उन्होंने सोचा कि बाक़ी साथी भी पीछे से आ रहे होंगे, लेकिन वे लोग नहीं आए।

85: सामरी एक जादूगर था, जो ऊपरी मन से मूसा (अलै) में विश्वास रखता था, मगर असल में वह पाखंडी था। 

86: "अच्छा वादा" का मतलब तूर पहाड़ पर तोरात जैसी किताब देने का वादा था। 

87: मिस्र से निकलते वक़्त इसराईल की संतानों के पास बहुत सारे ज़ेवर थे जो कि मिस्र के लोगों से उधार पर लिए गए थे, चूँकि वह ज़ेवर इन लोगों के नहीं थे, इसलिए यह फ़ैसला हुआ कि जब तक मूसा (अलै.) आ नहीं जाते, उन्हे गड्ढे में डाल दिया जाए। कुछ लोग कहते हैं कि हज़रत हारून (अलै) के कहने पर यह तय हुआ था। जब सारे लोगों ने अपने ज़ेवर फेंक दिए, तो सामरी भी कोई चीज़ मुठ्ठी में दबाकर लाया, और हारून (अलै) से इसे गड्ढे में डाल देने की इजाज़त माँगी, उन्होंने यह सोचते हुए कि ज़ेवर होगा कह दिया कि डाल दो। इस पर सामरी ने कहा कि आप मेरे लिए दुआ कर दें कि जो कुछ मैं चाहता हूँ वह पूरा हो जाए, उन्होंने दुआ कर दी। असल में वह ज़ेवर की जगह मिट्टी लेकर आया था, उसने वही मिट्टी उन ज़ेवरों पर डालकर उन्हें पिघलाया, और उनसे एक बछड़े की सी सुनहरी मूर्ति बना ली जिसमें से आवाज़ निकलती थी। 

90: इस आयत से साफ़ हो गया कि बाइबिल में जो बात कही गयी है कि हारून (अलै) ख़ुद भी बछड़े की पूजा करने लगे थे, ग़लत है। (देखें Exodus: 1-6)

96: इसका शाब्दिक अनुवाद है कि .."मैंने रसूल [जिबरईल] के पैरों के निशान से एक मुठ्ठी मिट्टी उठाई और फेंक दी"..... कुछ लोगों ने इसका अजीब मतलब बताया है, कि मूसा (अलै) के लशकर के साथ जिबरईल (अलै) इंसानी शक्ल में घोड़े पर सवार होकर चल रहे थे, सामरी ने देखा कि घोड़े के पाँव जहाँ-जहाँ पड़ते, वहाँ की मिट्टी,पत्थर, झाड़ियाँ आदि जीवित हो जाते थे। सो उसने पाँव के नीचे की एक मुठ्ठी मिट्टी लेकर बछड़े पर डाल दी, और फिर बछड़े की मूर्ति में से आवाज़ आने लगी। इस बात की सच्चाई का कोई ठोस सबूत नहीं है, कुछ लोग  कहते हैं कि खोखली मूर्ति में कई महीन छेद थे, जिनसे हवा के गुज़रने से सीटी जैसी आवाज़ निकलती थी। जैसा कि सूरह अ'राफ़ (7: 148) में भी है कि वह एक बेजान मूर्ति थी जो न बोल सकती थी और न रास्ता दिखा सकती थी। 

97: कुछ लोग "मत छुओ मुझे" का मतलब यह बताते हैं कि उसका सामाजिक बहिष्कार [social outcast] हो गया। 

114: मुहम्मद (सल्ल) पर जब आयतें उतरती थीं, तो आप उनको जल्दी-जल्दी दुहराते थे क्योंकि उन्हें  लगता था कि कहीं भूल न जाएं। कभी ऐसा भी हुआ कि अभी पूरी आयत नहीं उतरी, और आपने उसे हड़बड़ी में दोहराना शुरू कर दिया, देखें सूरह क़ियामह (75: 16-19) 

115: असल में अल्लाह ने आदम से एक ख़ास पेड़ का फल न खाने की शपथ ली थी , देखें सूरह बक़रा (2: 34-39), .... उनका इरादा अगर मज़बूत होता तो वह शैतान के बहकावे में आकर भूल न कर बैठते। 

124: जब लोग क़ब्र से उठाकर हिसाब-किताब के लिए हश्र की तरफ़ लाए जाएंगे, उस समय ये लोग अंधे होंगे, लेकिन बाद में उनकी आँख की रौशनी उन्हें दे दी जाएगी, क्योंकि फिर वह जहन्नम की आग को देखेंगे। देखें सूरह कहफ़ (18: 53). 

130: मुहम्मद (सल्ल) को तसल्ली दी जा रही है कि ये लोग आपके विरोध में जो कुछ बातें करते हैं, उनका जवाब देने के बजाए धीरज से काम लें, और अल्लाह का गुणगान करते रहें। गुणगान करने का सबसे अच्छा तरीक़ा है नमाज़ पढ़ना.... सूरज निकलने से पहले और डूबने से पहले यानी फ़ज्र, ज़ोहर, और अस्र, फिर रात में इशा, और दिन के किनारों पर मग़रिब की नमाज़। अल्लाह को इस तरह याद करते रहने के कारण इन कर्मों के चलते मिलने वाले इनाम और इस दुनिया में मिलने वाली नेमतों से आपको संतोष हो जाएगा।

133: मक्का के लोग मुहम्मद साहब से हमेशा निशानी दिखाने की माँग करते रहते थे। लेकिन क़ुरआन से बढ़कर और क्या निशानी हो सकती थी, जिसमें उन पुरानी घटनाओं का उल्लेख मिलता है जो पुरानी आसमानी किताबों (तोरात, इंजील, ज़बूर आदि) में भी आया है (जबकि मुहम्मद (सल्ल) पढ़े-लिखे नहीं थे), और उन किताबों में मुहम्मद (सल्ल) के आने की सूचना भी दी गई है। 

135: "आने वाला समय" इस दुनिया में भी हो सकता है और फ़ैसले का दिन भी हो सकता है, तब तक इंतज़ार करना होगा कि क्या परिणाम [अंजाम] होता है।  




 

 

 








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