Sunday, July 9, 2017

सूरह 18 : अल-कहफ़ [गुफ़ा, The Cave]


सूरह 18: अल-कहफ़
[गुफ़ा / The Cave]



01-08:  क़ुरआन का मक़सद 

09-26:  गुफावाले लोगों की कहानी 

27-31:  रसूल का उत्साह बढ़ाना 

32-44:  दो आदमियों की मिसाल 

45-46:  बारिश और पौधों की मिसाल 

47-49:  फ़ैसले का दृश्य 

50-51:  मूर्तिपूजा असल में इबलीस [शैतान] और जिन्नों की पूजा है

52-53:  अंतिम फ़ैसले का दृश्य 

54-59:  विश्वास न करने पर अड़े रहना और उसका परिणाम 

60-82:   मूसा (अलै) और अल्लाह के बंदे [ख़िज़्र] की कहानी 

83-98:   ज़ुल-क़रनैन की कहानी 

99-102:  अंतिम फ़ैसले का एक दृश्य 

103-108: सज़ा और इनाम 

109       : अल्लाह के संदेश ख़त्म नहीं होने वाले 

110       : रसूल भी आदमी ही है




अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

सारी तारीफ़ें अल्लाह के लिए हैं जिसने अपने बन्दे पर यह किताब [क़ुरआन] उतार भेजी, और उसे बिना किसी टेढ़ेपन के (सीधी) बनाया, (1)

(उस किताब को) ठीक व सीधी बनाया, जो लोगों को उस (अल्लाह) की ओर से कठोर सज़ा की चेतावनी देनेवाली है, और विश्वास करनेवालों को उनके अच्छे कर्मों के लिए ख़ुशख़बरी सुनाने वाली है---कि (उनके लिए) क्या ही अच्छा इनाम होगा, (2)

जिसका मज़ा वे हमेशा वहाँ उठाएंगे। (3)

यह उन लोगों को चेतावनी देती है, जो यह कहते हैं कि, "अल्लाह की कोई औलाद है।" (4)

इसके बारे में उन्हें न तो कोई जानकारी है, न ही उनके बाप-दादा को थी--- यह बड़ी गम्भीर बात है जो उनके मुँह से निकलती है: जो कुछ वे कहते हैं वह सिवाए झूठ के कुछ नहीं है। (5)

मगर [ऐ रसूल], अगर वे (अल्लाह के) इस संदेश में विश्वास नहीं करते हैं, तो क्या उसकी चिंता में आप अपनी जान ही दे देंगे? (6)


हमने धरती को बड़ी आकर्षक चीज़ों से सजाया है, ताकि हम, लोगों की परीक्षा लें और जान सकें कि उनमें से किन लोगों ने बेहतरीन कर्म किए, (7)

मगर हम (धरती की) इन सारी चीज़ों को (समाप्त करके) एक दिन चटियल मैदान बना डालेंगे। (8)

[ऐ रसूल!] क्या हमारी अन्य निशानियों में से आपको गुफा [Cave] और रक़ीम (नामक शहर के) लोगों (की घटना) ज़्यादा ही अजूबा लगी? (9)

(जब ऐसा हुआ था कि) उन नौजवान लड़कों ने गुफा में शरण लेनी चाही थी और कहा था,  "ऐ हमारे रब! हम पर रहम कर और इस हालत में हमारे लिए भलाई का कोई रास्ता निकाल दे।" (10)

फिर हमने उन्हें कई वर्षों के लिए  गुफा में (इस तरह सुला दिया कि) उनके कान (दुनिया की आवाज़ सुनने से) बंद कर दिए गए, (11)

फिर हमने उन्हें जगा दिया, ताकि मालूम कर सकें कि  (लड़कों के) उन दो समूहों में से कौन सा समूह है  जो अपने वहाँ रहने की अवधि के बारे में ज़्यादा सही गिनती बता सकता है। (12)


[ऐ रसूल] असल में जो घटना हुई थी हम उसकी सही सही कहानी आपको सुना देते हैं: वे कुछ नौजवान थे जो अपने रब में विश्वास रखते थे, और हमने उनका ज़्यादा से ज़्यादा मार्गदर्शन किया था। (13)
हमने उनके दिलों को (ईमान की ताक़त से) मज़बूत कर दिया था, सो (एक दिन) वे उठ खड़े हुए और कहा, "हमारा रब तो वह है जो आसमानों और ज़मीन का रब है। हम उसे छोड़कर कभी भी किसी दूसरे प्रभु को नहीं पुकारेंगे, क्योंकि अगर ऐसा हुआ तो यह बिल्कुल बेकार व सच्चाई से हटी हुई बात होगी। (14)

ये हमारी क़ौम के लोग हैं जिन्होंने उस (अल्लाह) को छोड़कर अन्य (देवताओं को) अपना प्रभु बना रखा है। (अगर ये सही हैं तो) आख़िर ये उनके बारे में कोई स्पष्ट प्रमाण क्यों नहीं लाते? उस आदमी से बढ़कर ज़ालिम कौन हो सकता है जो अल्लाह के बारे में झूठी बातें गढ़े? (15)

(साथियो), अब जबकि तुम इन लोगों से अलग हो चुके हो, और उनसे भी जिनको ये अल्लाह के बजाए पूजते हैं, तो अब चलकर (किसी) गुफा में शरण ली जाए। अल्लाह तुम पर ज़रूर अपनी रहमत की बारिश करेगा और तुम्हारे काम में आसानी के साधन जुटा देगा।" (16)

अगर आप उस (गुफा) को देखते जिसके भीतर एक बड़ी सी जगह में वे सोए हुए थे, तो वह ऐसी थी कि जब सूरज निकलता था तो उसकी किरणें गुफा के दाहिनी तरफ़ से बचकर निकल जाती थीं और जब वह डूबने लगता तो उसकी किरणें गुफा के बायीं ओर से निकल जाती थीं। यह अल्लाह की निशानियों में से है: जिसे अल्लाह मार्ग दिखाए, वही सही मार्ग पानेवाला है और जिसे वह भटकता छोड़ दे, तो कोई बचानेवाला ऐसा नहीं जो उसे सीधे मार्ग पर ले आए। (17)

आप (उन्हें देखकर) यही समझते कि वे जागे हुए हैं, हालाँकि वे सोए हुए थे। हम उन्हें दाएँ और बाएँ करवट दिलाते रहते थेऔर उनका कुत्ता चौखट पर अपने (आगे के) दोनों पाँव फैलाए हुए (बैठा) था। अगर आप उन्हें कहीं देख लेते, तो आप में उनका डर समा जाता और वहाँ से उलटे पाँव भाग खड़े होते। (18)

फिर जब समय (पूरा) हो गया तो हमने उन्हें (नींद से) उठा दिया, और वे आपस में पूछताछ करने लगे। उनमें से एक ने पूछा, "तुम कितनी देर यहाँ रहे होगे?" (किसी ने) जवाब दिया, "यही कोई एक दिन या एक दिन का कोई भाग होंगे", मगर फिर (कुछ और लोगों) ने कहा, "तुम्हारा रब ही सही जानता है कि तुम यहाँ असल में कितनी अवधि तक रहे। तुममें से कोई एक चाँदी के सिक्के के साथ शहर चला जाए, और वहाँ पता लगाए कि सबसे अच्छा खाना कहाँ मिलता है, फिर उसमें से कुछ खाने को ले आए। मगर होशियार रहना कि कहीं किसी को तुम्हारे बारे में ख़बर न होने पाए: (19)

अगर उन्हें तुम्हारे बारे में पता चल गया तो वे तुम्हें पत्थरों से मार डालेंगे या तुम्हें अपने धर्म में लौट आने पर मजबूर करेंगे, और तब तो तुम कभी भी कामयाब न हो पाओगे।" (20)

इस तरह हम उन (गुफावालों) की घटना पर (शहर के) लोगों का ध्यान खींच पाए, ताकि वे जान सकें कि (मरने के बाद दोबारा उठाए जाने का) अल्लाह का वादा सच्चा है, और यह कि क़यामत की घड़ी के आने में कोई सन्देह नहीं है, (हालाँकि) लोग इसके बारे में आपस में बहस करते रहते हैं।

फिर (कुछ लोगों ने) कहा, "इस गुफा के ऊपर एक भवन बना दो: उनके बारे में उनका रब ही बेहतर जानता है।" उनमें से असरदार लोगों ने कहा,  "हम अवश्य इसके ऊपर (यादगार के तौर पर) एक इबादत करने की जगह बनाएँगे।" (21)

(कुछ लोग) कहते हैं, "वे [गुफावाले] तीन थे और चौथा उनका कुत्ता था",  कुछ दूसरे कहते हैं, "वे पाँच थे और छठा उनका कुत्ता था" ----- वे अँधेरे में तीर चलाते हैं---- और कुछ यह भी कहते हैं, "वे सात थे और आठवाँ उनका कुत्ता था।" [ऐ रसूल] आप कह दें, "मेरा रब ही बेहतर जानता है कि असल में वे कितने थे।" बहुत ही कम लोग हैं जिनको उन (गुफावालों) की सही जानकारी है, अत: इस पर बहस न करें, मगर जो बात स्पष्ट है उसपर जमे रहें, और उनके बारे में इन लोगों में किसी से भी कुछ न पूछें; (22)

और ऐसी बात कभी न कहें कि, "मैं कल इसे कर दूँगा",  (23)

बल्कि (यह जोड़ दें) कि “अल्लाह ने चाहा तो” (कर दूँगा), और, जब कभी आप भूल जाएं, तो अपने रब को याद कर लें और कहें, "आशा है कि मेरा रब सही चीज़ की तरफ़ ही मेरा मार्गदर्शन कर दे।" (24)

(कुछ लोग कहते हैं), “गुफा में सोनेवाले वहाँ तीन सौ साल तक रहे थे”, कुछ इसमें नौ वर्ष और जोड़ देते हैं। (25)

[ऐ रसूल] कह दें, "अल्लाह ही बेहतर जानता है कि असल में वे (गुफा में) कितने दिन रहे।" आसमानों और ज़मीन की हर ढकी छिपी चीज़ उसकी जानकारी में है---- क्या ख़ूब वह देखनेवाला है! क्या ही अच्छा वह सुननेवाला है!---- उस (अल्लाह) के सिवा उन्हें बचानेवाला कोई नहीं है; और वह अपनी हुकूमत (या अपने फ़ैसले) में किसी को हिस्सेदार नहीं बनाता है। (26)

[ऐ रसूल] अपने रब की क़िताब से जो कुछ ‘वही’ [revelation] के द्वारा आप पर उतारा गया है, उसे पढ़कर सुनाएं: उसके शब्दों को कोई बदल नहीं सकता, और न ही उसके सिवा आपको कोई शरण लेने की जगह मिल सकती है। (27)

आप धीरज मन से उन लोगों के साथ जमे रहें जो सुबह-शाम अपने रब की इबादत में इस इच्छा से लगे रहते हैं कि वह ख़ुश होकर क़बूल कर ले, और देखें, ऐसा न हो कि सांसारिक जीवन की चमक-दमक को पाने के मोह में आप अपने ही लोगों से नज़रें फेर लें: कहीं दबाव में आकर ऐसे लोगों की बात न मान लें जिनके दिलों को हमने ऐसा कर दिया है कि वह मेरे संदेशों को भुला बैठे हैं, और वे बस अपनी नीच इच्छाओं के पीछे चले जा रहे हैं, और वे अपने मामलों में बेलगाम हैं। (28)

कह दें, "तुम्हारे रब की ओर से अब सच्चाई आ चुकी है: तो जो लोग इसमें विश्वास करना चाहें, वे विश्वास कर लें और जो लोग इसे मानने से इंकार करना चाहें, वे इंकार कर दें।" हमने ग़लत काम करने वालों के लिए एक आग तैयार कर रखी है, जो उनको चारों तरफ़ से घेर लेगी। अगर वे (अपनी हालत में) थोड़ी सी राहत के लिए फ़रियाद करेंगे तो उन्हें राहत के तौर पर ऐसा पानी मिलेगा जो किसी पिघले हुए धातु जैसा होगा, जो उनके चेहरों को भून डालेगा। कितनी बुरी है वह पीने की चीज़! कैसी दर्दनाक है वह आराम करने की जगह!  (29)

रहे वे लोग जो ईमान रखते हैं और अच्छे कर्म करते हैं---- तो जिस किसी ने भी अच्छा कर्म किया, उसके कर्मों के इनाम [reward] को हम कभी बेकार नहीं जाने देते---(30)

उनके लिए परम आनंद के सदाबहार बाग़ होंगे जहाँ नहरें बह रही होंगी। वहाँ उन्हें सोने के कंगनों से सजाया जाएगा। वहाँ वे हरे रंग के महीन रेशम और ज़री के कपड़े पहनेंगे और ऊँचे (गद्देदार) तख़्तों पर तकिया लगाए बैठे होंगे। क्या ही अच्छा इनाम है! कितनी हसीन जगह है आराम करने की! (31)

[ऐ रसूल] आप उनको दो आदमियों की मिसाल बता दें: उनमें से एक को हमने अंगूरों के दो बाग़ दे रखे थे, जो चारों तरफ़ से खजूरों के पेड़ों से घिरे हुए थे और उन दोनों बाग़ों के बीच अनाज के खेत लगे हुए थे; (32)

दोनों बाग़ में ख़ूब फल हुए और पैदावार में किसी तरह की भी कमी न हुई; और उन दोनों के बीच हमने (सिंचाई के लिए) एक नहर भी बहा दी थी, (33)

इस तरह, उसे भरपूर फल हासिल हुए। एक दिन वह अपने दोस्त से बातचीत करते हुए कहने लगा, "मैं तुझसे माल व दौलत में बढ़कर हूँ और मेरे पीछे चलने वाले (लोग) भी कहीं ज़्यादा हैं।" (34)

(फिर बातें करते हुए) वह अपने बाग़ में गयाऔर यह कहकर अपने आपको नुक़सान में डाल बैठा कि, "मुझे नहीं लगता कि ऐसा हरा-भरा बाग़ कभी बर्बाद भी हो सकता है। (35)

और यह कि मैं नहीं समझता कि वह (क़यामत की) घड़ी कभी आएगी--- और अगर मुझे कभी अपने रब के पास वापस ले भी जाया गया, तो मुझे यक़ीन है कि मुझे वहाँ इससे भी बेहतर चीज़ मिलेगी।" (36)

उसके साथी ने उससे बातचीत करते हुए जवाब में कहा, "क्या तू उस (रब) में विश्वास नहीं रखता, जिसने तुझे (पहली बार) मिट्टी से बनाया, फिर वीर्य [sperm] की बूँद से पैदा कियाउसके बाद तुझे एक पूरा आदमी बना दिया? (37)

मगर मेरे लिए तो, मेरा रब वही (अल्लाह) है, और मैं कभी भी किसी को अपने रब के साथ साझेदार [Partner] नहीं बनाउंगा। (38)

जब तू अपने बाग़ में दाख़िल हो रहा था, काश कि तूने ऐसा कहा होता,  “जो भी होता है सब अल्लाह की मर्ज़ी से होता है, और उसकी मदद के बिना किसी में कोई ताक़त नहीं।हालाँकि तू देखता है कि मैं धन-दौलत और औलाद में तुझसे कम हूँ, (39)

मगर मेरा रब चाहे, तो मुझे कोई ऐसी चीज़ दे सकता है जो तेरे बाग़ से अच्छी हो, और तेरे इस बाग़ पर आसमान से कोई बिजली गिरा सकता है जिससे वह बंजर ज़मीन का ढेर बनकर रह जाए; (40)

या उस बाग़ का पानी धरती की सतह से इतना नीचे चला जाए कि फिर तू किसी तरह भी उस तक न पहुँच सके।" (41)

और ऐसा ही हुआ: उसके फल पूरी तरह से बर्बाद हो गए, उसने बाग़ पर जो कुछ ख़र्च किया था उसपर वह दुखी मन से बस हाथ मलता रह गया, जबकि बाग़ अपनी टट्टियों [Trellis] पर गिरा पड़ा था, वह कहने लगा, "ऐ काश! मैंने अपने रब के साथ किसी को साझेदार [Partner] न बनाया होता!" (42)

अल्लाह को छोड़कर अब उसके पास (गढ़े हुए ख़ुदाओं की) कोई ताक़त ऐसी न थी जो उसकी कोई मदद कर सकती--- वह तो ख़ुद अपनी भी कोई मदद नहीं कर सका। (43)

ऐसी हालत में, शरण लेने की केवल एक ही जगह है और वह है अल्लाह की शरण, वही असली ख़ुदा है (जिसके पास हर चीज़ की ताक़त है): वही सबसे अच्छा बदला [reward] देता है और वही सबसे अच्छा अंजाम दिखाता है। (44)

[ऐ रसूल] उन लोगों को इस दुनिया की ज़िंदगी की मिसाल भी बता दें कि यह ऐसी है जैसे: हमने आसमान से पानी बरसाया, धरती के पेड़-पौधों ने उसे अपने अंदर सोख लिया और हरे-भरे हो गए, फिर कुछ समय बाद ऐसा होता है कि पेड़-पौधे सूखी घांस व भूंसों में बदल जाते हैं जिसे हवाएँ उड़ा ले जाती हैं: अल्लाह को हर चीज़ करने की पूरी पूरी ताक़त है। (45)

धन दौलत और बच्चे तो केवल इसी सांसारिक जीवन के आकर्षण हैंमगर असल मेंबाक़ी रहने वाले तो अच्छे कर्म हैं, जिसके लिए अल्लाह के यहाँ बेहतर बदला मिलेगा और यही (अच्छे नतीजे की) उम्मीद लगाए रहने का कारण भी होगा। (46)

एक दिन आएगा जब हम पहाड़ों को चला देंगे, और तुम धरती को खुले हुए चटियल मैदान की तरह देखोगे। हम सभी लोगों को एक साथ इकट्ठा करेंगे, कोई भी पीछे छूट नहीं पाएगा। (47)

वे तुम्हारे रब के सामने लाइनों में खड़े किए जाएँगे: "जैसा हमने तुम्हें पहली बार पैदा किया था, उसी तरह आज तुम्हें हमारे सामने आना पड़ाहालाँकि तुम तो यह दावा करते थे कि तुम से दोबारा मिलने का कोई समय हमने तय नहीं कर रखा है।" (48)

और (उस वक़्त) उनके कर्मों की बही [record of deeds] जब खोलकर सामने रख दी जाएगी, तो अपराधियों को देखोगे कि उसमें लिखी हुई (बातों को) देखकर घबरा जाएंगे, और कहेंगे, "हाय, हमारा दुर्भाग्य! यह (कर्मों की) कैसी किताब है! छोटे से छोटा और बड़े से बड़ा, कोई भी कर्म ऐसा नहीं जिसे इस किताब में लिखा न गया हो।" वह सब अच्छे–बुरे कर्म जो उन्होंने कभी भी किए होंगे, सब सामने मौजूद पाएँगे: तुम्हारा रब किसी के साथ भी नाइंसाफ़ी नहीं करेगा। (49)

और जब (ऐसा हुआ था कि) हमने फ़रिश्तों से कहा था, "आदम के सामने झुक जाओ", तो सब (फरिश्ते सज्दे में) झुक गए, मगर इबलीस नहीं झुका: वह जिन्नों में से था और उसने अपने रब के आदेश को मानने से इंकार कर दिया था। तो क्या तुम (लोग) मुझे छोड़कर उस [इबलीस] को और उसकी संतानों को अपना स्वामी बनाना चाहते हो, बावजूद इसके कि वे तुम्हारे दुश्मन हैं? शैतानियाँ करने वालों के पास कितना बुरा विकल्प है! (50)

मैंने आसमानों और ज़मीन को बनाते समय इन [शैतानों] को नहीं बुलाया था कि वे उस (प्रक्रिया) को देख पाते, और न वे ख़ुद अपनी सृष्टि के समय वहाँ हाज़िर थे; मैं ऐसे लोगों को अपना मददगार नहीं बनाता जो दूसरों को राह से भटका देते हैं। (51)

एक दिन आएगा जब अल्लाह कहेगा, "बुलाओ उन सबको जिनके बारे में तुम दावा करते थे कि वे (ख़ुदायी में) मेरे साझेदार [Partners] हैं”,  वे उनको पुकारेंगे, मगर उनसे कोई जवाब नहीं मिलेगा; हम उनके बीच एक भयानक खाई बना देंगे। (52)

शैतानियाँ करने वाले लोग उस भड़कती आग को देखेंगे और समझ जाएंगे कि वे उसमें गिरने ही वाले हैं: वे वहाँ से बच निकलने का कोई रास्ता न पाएँगे। (53)

हमने लोगों के फ़ायदे के लिए इस क़ुरआन में हर तरह के विषयों को मिसाल के साथ बार-बार बयान किया है, मगर आदमी बड़ा ही झगड़ालू होता है! (54)

अब जबकि उनके पास मार्गदर्शन आ चुका है, तो उस पर विश्वास करने से और अपने रब से (अपने कर्मों की) माफ़ी माँगने से उन्हें किस चीज़ ने रोक रखा है? क्या वे इस इंतज़ार में हैं कि उनका अंजाम भी वैसा ही विनाशकारी हो जैसा कि उनके पीछे गुज़र चुकी पीढ़ियों का हुआ था, या यह कि उनकी यातना उनके बिल्कुल सामने आ खड़ी हो? (55)

रसूलों [Messengers] को हम केवल इसलिए भेजते हैं कि वे (ईमान व अच्छे कर्म के लिए) ख़ुशख़बरी सुना दें और (बुरे कर्म करनेवालों को) चेतावनी दे देंमगर इसके बावजूद (सच्चाई से) इंकार पर अड़े लोग अपनी झूठी दलीलों से सच्चाई को ग़लत साबित करना चाहते हैं, और मेरे संदेशों [आयतों] और मेरी चेतावनियों का मज़ाक़ उड़ाते हैं। (56)

उस आदमी से बढ़कर ज़ालिम कौन हो सकता है जिसे उसके रब के संदेशों द्वारा जब याद दिलाया जाता है, तो वह उनसे मुँह फेर लेता है, और इस बात को भूल जाता है कि कितने बुरे कर्म वह पहले कर चुका है? (उनके कुकर्मों के चलते) हमने उनके दिलों पर ग़िलाफ़ [cover] चढ़ा दिए हैं, सो वे इस (क़ुरआन) को समझ नहीं सकतेऔर उनके कानों में (बहरेपन का) बोझ डाल दिया है सो वे सुन नहीं सकते: हालाँकि [ऐ रसूल] आप उन्हें सीधे मार्ग की ओर बुलाते हैं, मगर वे कभी मार्ग पाने वाले नहीं! (57)

[ऐ रसूल] आपका रब बेहद माफ़ करनेवाला, बड़ा ही रहम करनेवाला है: जो गुनाह उन लोगों ने किए हैं, अगर वह [अल्लह] इसके लिए उन्हें पकड़ना चाहता, तो जल्दी ही उन पर यातना ले आता। मगर उनके लिए एक तय किया हुआ समय निश्चित है, और उससे बच निकलने का कोई रास्ता नहीं होगा, (58)

(ठीक वैसे ही) जैसे हमने पुरानी क़ौमों को उनके गुनाह की वजह से बर्बाद कर दिया: हमने उनके विनाश का समय भी निश्चित कर रखा था। (59)

(उस समय की घटना सुनिए कि) जब मूसा ने अपने (जवान) सेवक से कहा था, "मैं अपनी यात्रा तब तक नहीं रोकूँगा, जब तक कि मैं उस जगह न पहुँच जाऊँ जहाँ दो समंदर आपस में मिलते हैं, चाहे मुझे वहाँ पहुँचने में बरसों लग जाए!”  (60)

मगर जब वे दोनों उस जगह पर पहुँचे जहाँ दो समंदर मिलते थे, तो उस मछ्ली का उन्हें ध्यान न रहा (जो उन्होंने रख ली थी), और वह (मछली) समंदर में सुरंग जैसा रास्ता बनाती हुई भाग निकली। (61)

जब वे आगे बढ़े तो (एक जगह) मूसा ने अपने सेवक से कहा,  "लाओ! खाना खा लें! हमारी यह यात्रा बड़ी थका देने वाली है",  (62)

और उस (सेवक) ने कहा, "याद है आपको, जब हम (समंदर के किनारे) उस चट्टान के पास आराम कर रहे थे? मैं तो आपको मछली के बारे में बताना ही भूल गया--- उसने अजीब तरीक़े से समंदर में अपना रास्ता बना लिया था--- और यह शैतान का ही काम है कि मैं इसके बारे में आपको बताना भूल गया।" (63)

(मूसा ने) कहा,  "कितनी अजीब बात है! तब तो हो न हो, यह वही जगह थी जिसे हम तलाश कर रहे थे।" अत: दोनों अपने क़दमों के निशान देखते हुए वापस (उसी जगह को) चल दिए, (64)

(जब उस चट्टान के पास पहुँचे तो) वहाँ उनको हमारे ख़ास बंदों में से एक बंदा [ख़िज़्र] मिला ----  एक ऐसा आदमी जिस पर हमने अपनी विशेष दया की थी और उसे अपने पास से एक विशेष ज्ञान दिया था। (65)

मूसा ने उनसे कहा, "क्या मैं आपके साथ रह सकता हूँ ताकि आपको जो कुछ ज्ञान दिया गया है, उसमें से सही मार्गदर्शन की कुछ बातें मैं भी सीख सकूँ?" (66)

उस आदमी ने कहा, "हाँ, मगर तुम मेरे साथ रहकर धीरज नहीं रख पाओगे, (67)

जो चीज़ तुम्हारी जानकारी की सीमा से बाहर हो, उस पर तुम धीरज रख भी कैसे सकते हो?" (68)

(मूसा ने) कहा, "अगर अल्लाह ने चाहा, तो आप मुझे सब्र करने वाला पाएँगे। मैं आपके किसी भी आदेश को नहीं तोड़ूंगा।" (69)

उन्होंने कहा, "अच्छा, अगर तुम मेरे साथ चलोगे तो मैं चाहे कुछ भी करूं, तुम मुझसे कोई भी सवाल मत पूछना, जब तक कि  मैं ख़ुद ही तुम्हें वह बात बता न दूं।" (70)


इस तरह, वे दोनों चल पड़े, फिर  जब वे नौका में सवार हुए तो उस आदमी ने नौका में एक जगह छेद कर दिया, (यह देखते ही) मूसा ने कहा, "आप ऐसा कैसे  कर सकते हैं कि (आपने) इस नौका में छेद  कर दिया? क्या आप इसमें बैठे हुए मुसाफिरो़ को डुबा देना चाहते हैं? आपने तो एक ख़तरनाक हरकत कर डाली!" (71)

उन्होंने कहा, "क्या मैंने कहा नहीं था कि तुम मेरे साथ धीरज न रख सकोगे?" (72)

मूसा ने कहा, "आप मुझे माफ़ कर दें, यह बात तो मैं भूल ही गया था। कृपया इस मामले को मेरे लिए इतना कठिन न बनाएं कि आपके साथ रहना मुश्किल हो जाए।" (73)

और इस तरह वे दोनों फिर चल पड़े। फिर जब (एक बस्ती के पास पहुँचे तो) ऐसा हुआ कि उन्हें एक नौजवान लड़का मिला, तो उस आदमी ने उसे मार डाला, मूसा ने कहा, "आप एक बेगुनाह आदमी का क़त्ल कैसे कर सकते हैं? उसने तो किसी की हत्या नहीं की थी!, यह तो आपने बहुत ही बुरा किया!" (74)

उन्होंने जवाब दिया, "क्या मैंने तुमसे कहा नहीं था कि तुम धीरज रखते हुए कभी भी मुझे सहन नहीं कर पाओगे?" (75)

मूसा ने कहा, "अब इसके बाद, अगर मैं आपसे कुछ भी पूछूं, तो आप मुझे साथ न रखें---  पहले ही आप मुझे काफ़ी हद तक बर्दाश्त कर चुके हैं।" (76)

फिर से वे दोनों आगे चल दिए। उसके बादजब वे एक बस्ती के पास पहुँचे, तो वहां के निवासियों से खाना  माँगा, किन्तु  उन लोगों ने खाना खिलाने से इंकार कर दिया, इसी बीच  वहाँ उन्हें एक (पुरानी) दीवार दिखाई दी जो बस गिरने ही वाली थी, तो उस आदमी ने उस (दीवार) की मरम्मत करके उसे मज़बूत कर दिया। (मूसा ने) कहा, "लेकिन अगर आप चाहते तो इस काम के लिए कुछ मज़दूरी ले सकते थे।" (77)

उसने कहा, "अब मेरे और तुम्हारे अलग होने का समय आ गया है। अब मैं तुमको उन चीजों के मतलब बता देता हूँ, जिन पर तुम धीरज न धर सके": (78)

वह जो नौका थी, कुछ ग़रीब लोगों की थी जिनकी रोज़ी-रोटी समंदर से ही होती थी और मैंने उनकी नौका इसलिए ख़राब कर दी क्योंकि मुझे मालूम था कि वे जिधर बढ़ रहे थे वहाँ एक राजा था जो हर एक (अच्छी) नौका को ज़बरदस्ती छीन लेता था। (79)

और रहा वह जवान लड़का, तो उसके माँ-बाप तो ईमानवाले थेमगर यह आशंका थी कि वह अपनी शैतानी और ईमान न रखने के चलते उन्हें तकलीफ़ पहुँचाएगा, (80)

इसलिए मैंने चाहा कि उनका रब उन्हें इसके बदले दूसरी संतान दे---जिसका दिल अधिक साफ़ हो और जिसमें ज़्यादा दया का भाव हो। (81)

और रही वह दीवार, तो वह उस बस्ती में रहने वाले दो अनाथ लड़कों की थी और उस दीवार के नीचे उनका ख़जाना गड़ा हुआ था, (दीवार गिरने से भेद खुल जाता, सो दीवार खड़ी कर दी)। उनका बाप एक सच्चा व अच्छा आदमी था, इसलिए तुम्हारे रब ने चाहा कि जब वे अपनी जवानी को पहुँच जाएं, तो अपने रब की दया से अपना ख़जाना सुरक्षित निकाल लें। असल में, मैंने अपनी मर्ज़ी से ये सब  नहीं किया: यह है वास्तविकता उन चीजों की, जिन पर तुम धीरज न रख सके।" (82)

(ऐ रसूल) वे आपसे ज़ुलक़रनैन [दो सींगों वाले] के बारे में पूछते हैं। कह दें, "मैं उसके बारे में तुम्हें कुछ बताता हूँ।" (83)

हमने धरती पर उसकी सत्ता स्थापित की थीऔर उसे हर चीज़ हासिल करने के  लिए संसाधन दिए थे। (84)

उसने एक बार (पश्चिम के) रास्ते पर अपना अभियान शुरू किया; (85)

फिर जब वह सूरज डूबने की जगह के पास पहुँचातो उसे ऐसा लगा मानो सूरज दलदल जैसे काले पानी की एक झील में डूब रहा हो। नज़दीक ही उसे कुछ लोग दिखाई दिए, और हमने कहा, "ऐ ज़ुलक़रनैन! तुझे अधिकार है कि चाहे तो उन्हें दंड दे या उनके साथ अच्छा व्यवहार कर।" (86)

उसने जवाब दिया, "जिन लोगों ने शैतानियां की हैं, हम उन्हें दंड देंगे, और फिर जब वह अपने रब के पास लौटकर जाएंगे तो वह उन्हें और भी कठोर यातना देगा, (87)

जबकि जिन लोगों ने (सच्चाई पर) विश्वास किया और अच्छे कर्म किए, तो उनके लिए तो बेहतरीन बदला होगा:  हम उन्हें ऐसे ही काम का आदेश करेंगे जो उनके लिए आसान होगा।" (88)

वह उसके बाद एक और यात्रा पर (पूरब की तरफ़) निकला; (89)

फिर जब वह सूरज निकलने की जगह पर पहुँचा, तो उसने सूरज को ऐसे लोगों पर निकलते हुए पाया जिनके लिए हमने सूरज की गर्मी से बचने के लिए कोई छाया नहीं रखी थी। (90)

और वहाँ की हालत ऐसी ही थी: हमें उसकी पूरी जानकारी थी। (91)

बाद में, वह एक और सफ़र पर निकल पड़ा; (92)

जब वह दो पर्वतों के बीच (mountain barrier) पहुँचा, तो उसे उनके बीच ऐसी क़ौम के लोग मिले, जो लगता था कि कोई बात नहीं समझते। (93)

उन्होंने कहा, "ऐ ज़ुलक़रनैन! याजूज और माजूज  (Gog and Magog) इस भूभाग में उत्पात मचाते रहते हैं। क्या तुम उनके और हमारे बीच एक रोक बना दोगे, अगर हम तुम्हें इस काम के लिए उचित मुआवज़ा दें?” (94)

उसने जवाब दिया, "मेरे रब ने मुझे जो कुछ अधिकार एवं शक्ति दी है वह किसी मुआवज़े से कहीं बेहतर है, लेकिन अगर तुम लोग मेरे काम में हाथ बटाओतो मैं तुम्हारे और उनके बीच एक मज़बूत दीवार खड़ी कर सकता हूँ: (95)

 मुझे लोहे के टुकड़े लाकर दो!", और फिर, जब वह दोनों पहाड़ों के बीच की ख़ाली जगह को पाटकर बराबर कर चुका, तो (उसने कहा), "अब आग दहकाओ!", फिर जब वह (दीवार) आग की तरह लाल हो गयी, तब उसने कहा, "मुझे पिघला हुआ ताँबा लाकर दो, ताकि मैं उसपर उँडेल दूँ!" (96)

अब न तो उनके दुशमन (याजूज-माजूज) उस दीवार पर चढ़कर आ सकते थे, और न वे उसमें सेंध ही लगा सकते थे, (97)

और उसने कहा, "यह मेरे रब की तरफ़ से रहमत [Mercy] है (कि ऐसी दीवार बन गयी)। मगर जब मेरे रब के वादे का समय पूरा हो जाएगा, तो वह इस दीवार को गिराकर बराबर कर देगा: मेरे रब की कही हुई बात सच है, टलने वाली नहीं!" (98)

और एक दिन आएगा जब हम उनकी ऐसी हालत कर देंगे कि एक क़ौम के लोग दूसरी क़ौम के लोगों से लहरों की तरह टकरा रहे होंगे, और फिर, नरसिंघे [Trumpet] को फूँक मारकर बजा दिया जाएगा और हम उन सबको एक साथ इकट्ठा कर देंगे। (99)

हम (सच्चाई से) इंकार करने वालों के सामने जहन्नम को इस तरह ला खड़ा करेंगे, जैसे एक चीज़ नज़र के सामने दिखायी दे, (100)

वे इंकार करनेवाले जिनकी आँखें मेरी निशानियों को देखने से अंधी थीं, और वे लोग (जिनके कानों में बोझ था कि) कोई बात सुन नहीं सकते थे, (101)

क्या वे ऐसा सोचते थे कि मुझे छोड़कर वे मेरे ही बन्दों को अपना रखवाला बना लेंगे? हमने ऐसे इंकार करनेवालों की आवभगत के लिए जहन्नम तैयार कर रखी है। (102)


[ऐ रसूल] आप कह दें, "क्या हम तुम्हें बताएं कि कौन है जो अपने कर्मों के चलते सबसे ज़्यादा नुक़सान उठाएगा, (103)

वह--- जिसकी सारी दौड़-धूप इस दुनिया में ग़लत दिशा में होती है, हालाँकि वे इसी धोखे में रहते हैं कि वे बहुत अच्छा कर्म कर रहे हैं? (104)

यही वे लोग है जिन्होंने अपने रब के संदेशों पर विश्वास नहीं किया और इस बात से भी इंकार किया कि उन्हें अपने रब के सामने पेश होना है।" अत: उनके सारे कर्म बेकार गए: क़यामत के दिन हम उनके (कर्मों के) वज़न को स्वीकार नहीं करेंगे। (105)

उनका बदला तो वही जहन्नम होगा, इसलिए कि उन्होंने (सच्चाई पर) विश्वास करने से इंकार किया था और मेरे संदेशों और मेरे रसूलों की हँसी उड़ायी थी। (106)

मगर जिन लोगों ने (सच्चाई में) विश्वास किया और अच्छे कर्म किए, तो उनको (जन्नत के) बाग़ दिए जाएंगे। (107)

जिनमें वे हमेशा रहेंगे, और कभी वहाँ से हटना पसंद नहीं करेंगे।" (108)


[ऐ रसूल] आप कह दें, "अगर सारे समंदर मेरे रब की बातों को लिखने के लिए स्याही बन जाएं, तो स्याही सूख जाएगी मगर मेरे रब की बातें ख़त्म न होंगी--- यहाँ तक कि हम एक और समंदर जोड़ लें, तब भी नहीं।" (109)

कह दें, "मैं तो बस तुम्हारे ही जैसा एक आदमी हूँ, जिस पर यह बात (वही द्वारा) उतारी गयी है कि तुम्हारा ख़ुदा वही एक है। अतः जो कोई अपने रब के सामने खड़े होने से डरता होउसे चाहिए कि अच्छा कर्म करे और अपने रब की बन्दगी में किसी को साझेदार [Partner] न ठहराए।" (110)
 
 
 
नोट:

4: औलाद से मतलब बेटा और बेटी दोनों ही होता है। चूँकि यह सूरह मक्का में उतरी थी, इसलिए यहाँ मतलब शायद बेटी से है क्योंकि मक्का के लोग फ़रिश्तों को अल्लाह की बेटियाँ मानते थे। 

7: जब मुहम्मद (सल्ल) देखते कि मक्का के लोग अल्लाह के संदेश की सच्चाई पर विश्वास नहीं कर रहे हैं तो वह बहुत दुखी हो जाते थे। यहाँ उन्हें तसल्ली देते हुए यह कहा गया है कि इस दुनिया को  लोगों की परीक्षा के लिए बहुत आकर्षक बनाया गया है, ताकि देखा जा सके कि कौन है जो दुनिया की सजावट में गुम होकर अल्लाह को भूल जाता है, और कौन है जो अल्लाह के हुक्म के अनुसार कर्म करता है। 

9: "अल-रक़ीम" के कई मतलब बताए गए हैं। कुछ लोग कहते हैं कि जिस पहाड़ या घाटी में यह गुफा थी, उसी पहाड़ का नाम रक़ीम था, कुछ लोग कहते हैं कि यह शहर का नाम था जो फिलिस्तीन के दक्षिण में स्थित था, मगर कुछ लोग इसे आजकल के जार्डन [अम्मान] या तुर्की के इफ़सस [Ephesus] से जोड़ते हैं। कुछ लोगों का मानना है कि यह असल में एक "शिलालेख" [Inscription] था जिसमें "गुफा की घटना" को तख़्ती पर लिखवाकर गुफा के दरवाज़े पर लगा दिया गया था।  

10: ईसाई परम्परा में भी “Seven Sleepers of Ephesus” नाम की मिलती-जुलती घटना पायी जाती है। इसके मुताबिक एक ज़माने में वहाँ Decius नाम का राजा था, जिसे अरब के लोग "दक़्युस" या "दक़ियानूसकहते हैं, कहा जाता है कि वह पारसी धर्म मानता था और ईसाइयों पर काफ़ी अत्याचार करता और उन्हें एक ख़ुदा को छोड़कर अपने देवताओं को मानने पर मजबूर करता था। जब राजा के लोग ईसाइयों में से कुछ नौजवानों के पीछे पड़ गए, तब उनलोगों ने शहर से किनारे भागकर एक गुफा में पनाह ली। वहाँ अल्लाह ने अपनी क़ुदरत से उन्हें क़रीब 309 साल तक गहरी नींद में सुला दिया, और जब वे दोबारा सोकर उठे, तो उनके शरीर सड़े-गले नहीं थे, और उन्हें लगा कि वे थोड़ी ही देर सोए होंगे। 

17: वह एक बड़ी सी गुफा थी जहाँ ताज़ा और ठंढी हवा आती थी, और अच्छी बात यह थी कि सीधी धूप नहीं पड़ती थी जिससे वे तेज़ गर्मी से बचे रहे। 

 19: बताया जाता है कि उनमें से एक जब चाँदी का सिक्का लेकर बाज़ार गया तो दुकानदार देखकर चौंक गया कि यह तो राजा दक़ियानूस के ज़माने का सिक्का है, जबकि अब तो एक ईसाई राजा थियोडोसिस [Theodocius] की हुकूमत है जो बड़ा नेक इंसान है। फिर उन लोगों की पूरी कहानी राजा तक पहुँच गयीराजा ने उनका बड़ा सम्मान किया। कहा जाता है कि वे लोग वापस उसी गुफा में चले गए और फिर वहीं उनकी मौत हो गयी। 

21: गुफावालों के साथ असल में क्या घटना घटी, वे कितने साल सोए रहे, वे कुल कितने लोग थे, इस पर बाद के लोग बहस करते रहते थे, मगर सही बात अल्लाह के सिवा कोई नहीं जानता। असल में सीखने चीज़ यह है कि अल्लाह की क़ुदरत पर पूरा विश्वास रखा जाए, जिस तरह उसने कुछ लोगों को तीन सौ सालों से ऊपर नींद से सुला दिया और फिर यूँ ज़िंदा उठा दिया जैसे कुछ हुआ ही न हो, उसके लिए सभी इंसानों को मरने के बाद दोबारा उठाना कोई मुश्किल बात नहीं है। 

23: मक्का के जो लोग मुहम्मद (सल्ल) को अल्लाह का रसूल नहीं मानते थे, उन्होंने (यहूदियों के उकसाने पर) मुहम्मद साहब को गुफावाले और ज़ुल-क़रनैन के बारे में बताने की चुनौती दी थी। इस उम्मीद पर कि अल्लाह ज़रूर उन्हें इसके बारे में बता देगा, मुहम्मद (सल्ल) ने कह दिया कि वह कल तक जवाब दे देंगे। मगर ऐसा हुआ कि क़रीब 15 दिन गुज़र गए, लेकिन अल्लाह ने "वही" [Revelation] नहीं भेजी। उसके बाद जवाब तो भेज दिया, मगर एक सबक़ भी दे दिया कि "वही" का भेजना अल्लाह की मर्ज़ी पर निर्भर है, इसलिए किसी बात पर यह न कहा जाए कि मैं कल ऐसा करूँगा, बल्कि यह कहना मुनासिब होगा कि "अगर अल्लाह ने चाहा [इन शा अल्लाह], तो मैं कल करूँगा।

27: मक्का के जो लोग विश्वास नहीं करते थे, वे मुहम्मद (सल्ल) से कहते थे कि आप अगर क़ुरआन में हमारी इच्छाओं और मान्यताओं के मुताबिक थोड़ा सा फेर-बदल कर दें, तो हम आप पर विश्वास कर लेंगे। 

 28: मक्का के सरदारों की यह कोशिश थी कि वे मुहम्मद (सल्ल) को इस बात के लिए मना लें कि उनके पीछे चलने वालों में जो ग़रीब और छोटे लोग हैं, उन्हें किनारे कर दें और हमलोगों की बात अलग से सुनें। देखें  सूरह इसरा (17: 73-74), और सूरह अबसा (80: 1-10).

50: देखें सूरह बक़रा (2: 31-36)

60: आयत 60--82 तक मूसा (अलै) और हज़रत ख़िज़्र (अलै) के बीच होने वाली मुलाक़ात का वर्णन है। मूसा (अलै) की यह घटना अकेली ऐसी घटना है जिसका ज़िक्र बाइबल में नहीं है। हज़रत ख़िज़्र के बारे में माना जाता है कि वह भी अल्लाह के पैग़म्बर हैं जिनकी आम इंसानों से अलग ही ज़िंदगी है, वह रहती दुनिया तक के लिए ज़िंदा हैं और अल्लाह ने उन्हें कुछ ऐसी चीज़ों का ज्ञान दिया है जो आम इंसानों की जानकारी से परे है। हदीसों से पता चलता है कि एक बार किसी ने मूसा (अलै.) से पूछा था कि दीन का सबसे बड़ा जानकार कौन है? उन्होंने जवाब में अपना ही नाम लिया, मगर यह बात अल्लाह को पसंद नहीं आयी, इसलिए अल्लाह ने मूसा (अलै) को ज्ञान का कुछ ऐसा हिस्सा दिखाना चाहा जो उनके ज्ञान के दायरे से बाहर था। उन्हें हुक्म हुआ कि जहाँ दो समंदर मिलता हो, वहाँ जाकर हज़रत ख़िज़्र से मिलें, ताकि उन्हें एक अलग तरह के ज्ञान का अनुभव हो। 

63: मूसा (अलै) के सेवक ने मछली को पानी में भागते हुए देखा था, मगर मूसा अलै को उस समय आँख लग गयी थी, जब उनकी नींद खुली, तब उनका सेवक उनको बताना भूल गया। हदीसों में सेवक की पहचान हज़रत यूशा [Joshua] से की गयी है जो अभी छोटे थे और मूसा (अलै) के शिष्य थे, बाद में यह भी नबी बने। 

68: चूँकि मूसा (अलै.) को इन चीज़ों की जानकारी नहीं दी गयी थी जो दिखायी नहीं देती हो, या आगे होने वाली हो, इसलिए उन घटनाओं पर धीरज रखना कठिन था जो ऊपर से देखने पर ग़लत लगती हो।

83: ज़ुलक़रनैन यानी "दो सींगोंवाला", यह एक बादशाह की उपाधि थी। पहले के विद्वानों ने इसकी पहचान सिकंदर महान से की थी, मगर कुछ आधूनिक विद्वानों ने इसकी पहचान ईरान के बादशाह साइरस से की है, जिसने इसराईल की संतानों को जो अपने देश बाबिल से निकाले गए थे, उन्हें दोबारा फ़िलिस्तीन में बसाया। 

93: मालूम होता है कि यह सफ़र उत्तर की तरफ़ हुआ था क्योंकि उस तरफ़ पहाड़ों का सिलसिला है। 

94: याजूज माजूज दो जंगली क़बीले थे जो उन पहाड़ों के पीछे रहते थे और थोड़े-थोड़े अंतराल में वे पहाड़ों के बीच के दर्रे से इस इलाक़े में  आकर मार-पीट और लूटमार किया करते थे, इसीलिए लोगों ने ज़ुलक़रनैन से अनुरोध किया कि वह दर्रे को मज़बूत दीवार बनाकर बंद कर दे। 

98: ज़ुलक़रनैन द्वारा बनायी गयी दीवार कहाँ है और अभी तक टूटी है कि नहीं? आधूनिक रिसर्च के मुताबिक यह दीवार रूस के इलाक़े दाग़िस्तान में दरबंद के स्थान पर बनायी गयी थी, और अब यह टूट चुकी है। इतिहास के अलग-अलग दौर में याजूज-माजूज के हमले विभिन्न आबादियों पर होते रहे हैं, और इनका आख़िरी हमला क़यामत से कुछ पहले होगा। 

 99: या तो याजूज-माजूज और बाक़ी इंसानों में टकराव होगा, या इंसानों और जिन्नों में लड़ाई होगी। यह भी हो सकता है कि यह क़यामत के समय आम लोग बदहवासी में एक दूसरे से टकरा रहे होंगे। 

 109: रब की बातों का मतलब अल्लाह की विशेषताओंउसके ज्ञान और गहरी समझ-बूझ का वर्णन। देखें सूरह लुक़मान (31: 27) 












 



 

 

 

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