01 : अंतिम फ़ैसला होकर रहेगा
02 : "वही" लेकर फ़रिश्ते का उतरना
03-18: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ
19-23: अल्लाह सब जानता है
24-29: अंतिम फ़ैसले का दृश्य: विश्वास न करने वालों के लिए
30-32: अंतिम फ़ैसले का दृश्य: विश्वास करने वालों के लिए
33-34: विश्वास न करने वाले अपने आपको ही नुक़सान पहुँचाते हैं
35-37: मूर्तिपूजकों के पास कोई बहाना नहीं है
38-40: दोबारा ज़िंदा उठाया जाना तय है
41-42: घर-बार छोड़कर मदीना आए हुए लोगों [मुहाजिरों] को इनाम मिलेगा
43-44: रसूल और उनपर उतरी किताबें
45-47: सुरक्षित रहने की झूठी आशा
48-50: अल्लाह की पैदा की हुई हर चीज़ अल्लाह से डरी-सहमी रहती है
51-55: अल्लाह एक है
56-64: बुतों की पूजा और बच्चियों को मार देने की निंदा
65-74: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ
75-76: दो मिसालें
77 : फ़ैसले की घड़ी
78-83: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ
84-89: अंतिम फ़ैसले के दृश्य
90 : अल्लाह न्याय करने का आदेश देता है
91-97: प्रतिज्ञा करना और शपथ लेना
98-100 : क़ुरआन का पढ़ना
101 : अल्लाह द्वारा एक आयत से दूसरी आयत को बदलना
102-105: क़ुरआन का उतारा जाना
106-109: ईमानवाले को विश्वास करने से इंकार करने पर कड़ी सज़ा होगी
110-111: घर-बार छोड़कर मदीना आये हुए लोगों को इनाम मिलेगा
112-113: विश्वास न करने की मिसाल
114-119: खाने-पीने की चीज़ों के नियम
120-123: इबराहीम हनीफ़ (अलै)
124 : सब्त का दिन
125 : रसूल के लिए हुक्म
126-128: सब्र करना बदला लेने से अच्छा है
क्योंकि अल्लाह उनके साथ है जो उसका डर रखते हुए बुराइयों से बचते हैं और अच्छा काम करते रहते हैं। (128)
4: अल्लाह ने इंसान को एक नापाक बूंद से बनाया है, फिर उसे सभी जीवों में सबसे उत्तम बनाया, मगर इंसान केवल उसी अल्लाह को नहीं मानता, बल्कि उसका साझेदार ठहरा लेता है, जो कि एक तरह से अल्लाह को चुनौती देने जैसा है।
9: जब यह सूरह उतरी, उस ज़माने में ऐसी बहुत सी सवारियाँ नहीं थी, जो आज मौजूद हैं, उदाहरण के लिये बस, रेलगाड़ी, जहाज़ आदि। आगे आने वाले समय में भी नई सवारियाँ आ सकती हैं जिनके बारे में अभी हम सोच भी नहीं सकते।
23: चूंकि अल्लाह घमंड करने वालों को पसंद नहीं करता, इसलिए उन्हें दंड भी ज़रूर देगा, और इसके लिए परलोक में होने वाले हिसाब-किताब को मानना और विश्वास करना ज़रूरी है।
35: उनका यह कहना कि अगर वे अल्लाह के साथ दूसरे देवताओं की उपासना करते हैं, तो इसमें भी ज़रूर अल्लाह की मर्ज़ी होगी, केवल उनकी ज़िद्द और हठधर्मिता के कारण ही था। इसलिए मुहम्मद साहब को बताया गया है कि आपका काम ऐसे ज़िद्दी लोगों को रास्ते पर लाने का नहीं है, बल्कि उन लोगों तक अल्लाह का संदेश पहुंचा देने भर का है, मगर वे अपने हिसाब से कर्म करने के लिए आज़ाद हैं। उन लोगों ने यह भी कहा कि अगर अल्लाह न चाहता, तो हमने कुछ जानवरों का मांस खाना हराम (forbidden) न किया होता, यह उन जानवरों की तरफ़ इशारा है जो उन लोगों ने कुछ देवताओं के नाम से हराम कर रखा था, जिसका ज़िक्र सूरह अना'म (6: 139-145) में आया है।
37: जो दूसरों को बहकाते हैं, उसके नतीजे के लिए देखें आयत 25.
40: मरे पड़े लोगों को दोबारा ज़िंदा किए जाने पर लोगों को यक़ीन नहीं था, यहां बताया गया है कि यह अल्लाह के लिए बहुत ही आसान है, उसे कुछ करने के लिए केवल इरादा करना होता है।
41: यह उन ईमानवाले लोगों के बारे में है जो मक्का में ज़ुल्म से तंग आकर हब्शा [इथोपिया] जाकर बस गए थे।
47: अल्लाह चूंकि बहुत दयावान है, इसलिए वह एक बार में दंड नहीं देगा, बल्कि धीरे-धीरे उनकी ताक़त कम करता चला जाएगा।
56: लोग अपनी पैदावार और अपने जानवरों में से एक हिस्सा अपने देवताओं के नाम पर चढ़ावा देते थे, जिसका ज़िक्र सूरह अना'म (6: 136) में आया है।
57: अरब के कुछ बहुदेववादी, फ़रिशतों को अल्लाह की बेटी मानकर पूजते थे, जबकि ख़ुद अगर उनको बेटी हो जाती थी, तो शर्म से मुंह छुपाते थे, और कुछ क़बीले तो बेटियों को ज़िंदा गाड़ तक देते थे!
63: मक्का के बहुदेववादी अपने देवताओं [मूर्तियों] की क़समें खाते थे, इसलिए यहाँ अल्लाह ने ख़ुद की क़सम खायी है।
67: मक्का में जिस समय यह सुरह उतरी थी, उस समय तक शराब पीना मना नहीं हुआ था।
68: शहद की मक्खी से किस तरह शहद बनता है, इस पर विचार करने पर पता चलता है कि यह अल्लाह की क़ुदरत का कमाल है।
71: जिस तरह कोई आदमी अपने ग़ुलाम को अपने बराबर का हिस्सेदार कभी नहीं बनाता, उसी तरह जिन देवताओं को तुम अल्लाह का दास समझकर पूजते हो, तो अल्लाह अपने दासों को किस तरह अपना हिस्सेदार बना सकता है!
72: उन लोगों का यह विश्वास था कि ये नेमतें उनके ठहराए हुए देवताओं की तरफ़ से हैं।
74: मक्का के लोगों ने दुनिया के राजाओं को देखकर अल्लाह के बारे में भी यह कल्पना कर रखी थी कि जिस तरह राजा अपने काम अलग-अलग विभागों में बांट देता है, उसी तरह शायद अल्लाह ने भी अलग-अलग कामों के लिए छोटे छोटे देवताओं को रखा होगा।
84: क़यामत के दिन हर समुदाय के रसूल को इस बात की गवाही देने के लिए बुलाया जाएगा कि उन्होंने ईमानदारी से अल्लाह का संदेश लोगों तक पहुंचा दिया था, और उनके समुदाय के लोगों ने सच्चाई को मानने से इंकार किया था।
86: उस दिन उन देवताओं [गढ़े गए बुतों और शैतानों] को इकट्ठा किया जाएगा, जिन्हें ये लोग पूजते थे, मगर वे देवता इस बात से साफ़ इंकार कर देंगे कि ये लोग उनको पूजते थे। हो सकता है कि उस समय उन बुतों को भी अल्लाह बोलने की शक्ति दे देगा।
92: अल्लाह के नाम से कोई प्रतिज्ञा करके उसे तोड़ देने की मिसाल एक औरत से दी गई है। कहा जाता है कि मक्का में "ख़रक़ा' नाम की एक दीवानी औरत थी जो दिनभर बड़ी मेहनत से सूत कातती थी, और फिर रात में धागा-धागा अलग कर देती थी, यानी अपने ही हाथों अपनी सारी मेहनत बर्बाद कर देती थी।
96: धीरज [सब्र] से काम लेने का मतलब अपने मन की इच्छाओं को क़ाबू में रखना भी होता है, और तकलीफ़ को चुपचाप झेलना भी होता है।
98: हर अच्छे काम में शैतान आदमी को बहकाता है। यहां बताया गया है कि क़ुरआन को पढ़ने से पहले शैतान के बहकावे से बचने के लिए अल्लाह से पनाह मांग लेनी चाहिए।
101: अल्लाह ने हालात के मुताबिक कभी-कभी अपने दिए हुए आदेश में बदलाव किए थे, जैसे जेरूसलम के "बैतुल मक़दिस" की जगह काबा की तरफ़ मुंह करके नमाज़ पढ़ने का आदेश देना, जो कि सूरह बक़रा में आया है। इस पर लोगों का कहना था कि अल्लाह का अगर आदेश होता, तो उसमें बदलाव नहीं आता, यह ज़रूर मुहम्मद साहब की तरफ़ से होगा जो अपने हिसाब से इसमें फेरबदल कर देते हैं। मगर यह अल्लाह ही जानता है कि उसे कब कौन सा आदेश देना है, और कब किसमें बदलाव करना है।
103: मक्का में एक लोहार था, जो कि मुहम्मद सल्ल की बातें बड़े ध्यान से सुनता था, इसलिए आप (सल्ल) कभी कभी उसके पास जाते थे। वह कभी कभी आपको इंजील की कुछ बातें सुना देता था, इसी वजह से मक्कावालों ने यह कहना शुरू किया कि वही मुहम्मद सल्ल को कुछ सिखा-पढ़ा देता है, मगर वह आदमी अरब का नहीं था, और अरबी अच्छी तरह नहीं जानता था, जबकि क़ुरआन साफ़ और बेहतरीन अरबी भाषा में है।
106: जो आदमी सच्चाई पर विश्वास कर लेने के बाद, बिना किसी दबाव के, अगर कुफ्र यानी सच्चाई को मानने से इंकार कर दे, तो उस पर अल्लाह का गुस्सा उतरेगा।
112: कुछ लोग कहते हैं कि यहां शायद मक्का शहर की मिसाल दी गई है, जो कि काफ़ी ख़ुशहाल जगह थी, फिर आहिस्ता-आहिस्ता लोगों ने अल्लाह की दी हुई नेमतों का शुक्र अदा करना छोड़ दिया, नतीजे में बड़ा भारी अकाल पड़ा, लोग चमड़ा तक खाने के लिए मजबूर हुए, फिर मुहम्मद साहब की दुआ से अकाल ख़त्म हुआ। देखें सूरह दुख़ान।
114: लोगों की जिस नाशुक्री की पीछे की आयतों में निंदा की गई है, उनकी एक सूरत यह भी थी कि बहुत सी खाने की नेमतों को अपने मनघड़ंत तरीके से हराम कर रखा था, जिसका ज़िक्र सूरह अना'म (6: 139-145) में आया है।
115: इसका विस्तार से वर्णन सूरह मायदा (5: 3) में देखें।
118: यहां बताया गया है कि मक्का के विश्वास न करने वाले भी अपने को इबराहीम के दीन का मानने वाला कहते थे। हालांकि जिन चीजों को इन लोगों ने खाने से रोक रखा था, वह चीज़ें इबराहीम अलै के ज़माने से ही हलाल चली आयी थी। हां, यहूदियों को सज़ा के तौर पर कुछ चीजों को जरूर हराम किया गया था, जिसका ज़िक्र सूरह अना’म (6: 146) में आया है। बाक़ी चीज़ें हमेशा से ही हलाल चली आयी थीं।
124: यह दूसरी चीज़ थी जो इबराहीम अलै के बाद यहूदियों के लिए हराम (वर्जित) की गई थी, और वह थी सब्त यानी शनिवार के दिन कोई भी ऐसा काम न करना जिससे कोई आमदनी या आर्थिक लाभ होता हो। इस हुक्म को भी किसी ने माना, किसी ने नहीं माना!
128: यहां हर तरह का अच्छा काम करने को [एहसान], कहा गया है, इसमें अल्लाह की इबादत भी शामिल है जो इस तरह से होनी चाहिए कि मानो आप अल्लाह को देख रहे हों या यह अहसास हो कि अल्लाह आपको देख रहा है।
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