Friday, August 18, 2017

सूरह 16 : अल-नह्ल [मधु-मक्खी/The Bee]


सूरह 16: अल-नह्ल 
[मधु-मक्खी,The Bee]


01 : अंतिम फ़ैसला होकर रहेगा 

02 : "वही" लेकर फ़रिश्ते का उतरना 

03-18: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ 

19-23: अल्लाह सब जानता है 

24-29: अंतिम फ़ैसले का दृश्य: विश्वास न करने वालों के लिए 

30-32: अंतिम फ़ैसले का दृश्य: विश्वास करने वालों के लिए

33-34: विश्वास न करने वाले अपने आपको ही नुक़सान पहुँचाते हैं 

35-37: मूर्तिपूजकों के पास कोई बहाना नहीं है 

38-40: दोबारा ज़िंदा उठाया जाना तय है 

41-42: घर-बार छोड़कर मदीना आए हुए लोगों [मुहाजिरों] को इनाम मिलेगा 

43-44: रसूल और उनपर उतरी किताबें 

45-47: सुरक्षित रहने की झूठी आशा 

48-50: अल्लाह की पैदा की हुई हर चीज़ अल्लाह से डरी-सहमी रहती है 

51-55: अल्लाह एक है 

56-64: बुतों की पूजा और बच्चियों को मार देने की निंदा 

65-74: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ 

75-76: दो मिसालें 

77 : फ़ैसले की घड़ी 

78-83: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ 

84-89: अंतिम फ़ैसले के दृश्य 

90 : अल्लाह न्याय करने का आदेश देता है 

91-97: प्रतिज्ञा करना और शपथ लेना 

98-100  : क़ुरआन का पढ़ना 

101   : अल्लाह द्वारा एक आयत से दूसरी आयत को बदलना 

102-105: क़ुरआन का उतारा जाना 

106-109: ईमानवाले को विश्वास करने से इंकार करने पर कड़ी सज़ा होगी 

110-111: घर-बार छोड़कर मदीना आये हुए लोगों को इनाम मिलेगा 

112-113: विश्वास न करने की मिसाल 

114-119: खाने-पीने की चीज़ों के नियम 

120-123: इबराहीम हनीफ़ (अलै) 

124 : सब्त का दिन 

125 : रसूल के लिए हुक्म 

126-128: सब्र करना बदला लेने से अच्छा है 

 

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

अल्लाह का फ़ैसला बस आ पहुँचा है, अत: उसे और जल्दी ले आने के लिए मत कहो। महान है वह! अल्लाह ऐसी किसी भी चीज़ से कहीं ऊँचा है जिसे वे उसकी ख़ुदायी के साथ (साझेदार के रूप में) जोड़ते हैं! (1)

 वह अपने बंदों में से जिसे चाहता है, चुन लेता है, और उस पर अपने हुक्म से वही’[रूह, Inspiration] भेजता है जिसे फ़रिश्ते लेकर उतरते हैं, ताकि लोगों को (उसकी ओर से) चेतावनी दे दें: मेरे सिवा कोई पूजने के लायक़ नहीं। अतः तुम मुझ से डरो (और सच्चाई से इंकार करना व बुरे कर्म करना छोड़ दो)।" (2)

उसने आसमानों और ज़मीन को एक सही मक़सद के साथ पैदा किया, और वह ऐसी किसी भी चीज़ से कहीं ऊँचा है जिसे वे उसकी ख़ुदायी के साथ (साझेदार/Partner के रूप में) जोड़ते हैं! (3)

 उसने इंसान को (वीर्य, Sperm की) एक बूँद से पैदा किया है, इसके बावजूद क्या देखते हैं कि इंसान खुले-आम उस [अल्लाह] को ही चुनौती देने लग गया! (4)

और रहे पालतू जानवर---- तो उसी ने इन्हें भी पैदा कियाउनकी (खाल और ऊन से ठंड के समय) तुम्हें गर्मी मिलती है, और उनसे दूसरे फ़ायदे भी हैं: उनमें से कुछ (का मांस) तुम खाते भी हो; (5)

 जब तुम शाम को उन्हें (मैदानों से चराकर) घर वापस लाते हो और जब सुबह में उन्हें चराने के लिए (मैदानों में) ले जाते हो, तो यह दृश्य तुम्हारी आँखों को कितना ख़ूबसूरत लगता है। (6)

और यही जानवर हैं जो तुम्हारा बोझ लादे हुए (दूर के) शहरों तक ले जाते हैं,  जहाँ तुम जी-तोड़ मेहनत व थकान के बिना नहीं पहुँच सकते थे---निस्संदेह तुम्हारा रब बड़ा ही उदार व दया करनेवाला है----(7)

घोड़े, ख़च्चर और गधे (अल्लाह ने पैदा किए) हैं जो तुम्हारे लिए सवारी का काम देते हैं, इनसे शोभा भी बढ़ती है, और ऐसी बहुत सी चीज़ें पैदा करता रहता है जिनके बारे में तुम (अभी) कुछ नहीं जानते। (8)

और सही रास्ता बता देना अल्लाह का काम है, (मगर लोग भटक जाते हैं) क्योंकि कुछ टेढ़े रास्ते ग़लत मंज़िल की तरफ़ ले जाते हैं: (हालाँकि) अगर वह चाहता, तो तुम सबको (एक ही) सही मार्ग दिखा सकता था। (9)


वही है जो आसमान से पानी बरसाता है, इसमें से कुछ तो तुम्हारे पीने के काम आता है, और उसी से पेड़ व झाड़ियाँ उग जाती हैं, जिनमें तुम अपने जानवरों को चराते हो। (10)

और इसी पानी से वह तुम्हारे लिए (अनाज की) फ़सलें, ज़ैतून, खजूर, अंगूर और हर तरह के फल उगा देता है। सचमुच सोच-विचार करनेवालों के लिए इसमें एक बड़ी निशानी है। (11)

और (देखो!) उसने अपने हुक्म से रात और दिन को, सूरज और चाँद को और इसी तरह तारों को भी तुम्हारे फ़ायदे के लिए काम पर लगा रखा है। सचमुच इसमें उन लोगों के लिए बड़ी निशानियाँ हैं जो बुद्धि से काम लेते हैं। (12)

और ज़मीन पर तुम्हारे फ़ायदे के लिए उसने रंग-बिरंग की चीज़ें बिखेर रखी हैंसचमुच इसमें उन लोगों के लिए बड़ी निशानियाँ है जो सोचने-समझनेवाले हैं। (13

वही है जिसने समंदर को तुम्हारे फ़ायदे के लिए काम पर लगा रखा है: तुम उसमें से मछलियों के ताज़ा मांस निकालकर खाते हो, और (सजने-सँवरने के लिए क़ीमती) ज़ेवर भी निकालते हो; तुम देखते हो कि पानी के जहाज़ किस तरह लहरों को चीरते हुए चलते हैं, (ताकि तुम इसमें सवार होकर) उसकी कृपा से रोज़ी ढूंढ सको और उसकी (नेमतों का) शुक्र अदा कर सको। (14)

और (देखो!) उसने ज़मीन पर पहाड़ों को मज़बूती से जमा दिया, ताकि तुम्हारे नीचे की ज़मीन हिलने-डुलने से बची रहे, और नदियाँ बहा दीं और रास्ते निकाल दिए, ताकि तुम (जल व थल के रास्ते) अपनी मंज़िल तक पहुँच सको,  (15)

और लोगों को रास्ते की पहचान के लिए (तरह तरह के) ख़ास निशान [Landmarks] बनाए, और (रात में) तारों से भी लोग मार्ग पा लेते हैं। (16)

अब बताओ कि वह [अल्लाह] जो हर चीज़ को पैदा करता है, क्या उसकी तुलना उससे हो सकती है जो कुछ भी पैदा नहीं कर सकता? फिर क्या तुम समझते-बूझते नहीं? (17)

अगर तुम अल्लाह की नेमतों [Blessings] को गिनना चाहो, तो वह इतनी हैं कि कभी गिन न सको: सचमुच अल्लाह बहुत माफ़ करनेवाला और बेहद दया करनेवाला है। (18)

और अल्लाह सब कुछ जानता है; वह भी जो कुछ तुम छिपाते हो और वह भी जो कुछ तुम (सबके सामने) बता देते हो। (19)

जिन (देवताओं) को वे अल्लाह को छोड़कर पुकारते हैं, वे किसी भी चीज़ को पैदा नहीं करतेबल्कि वे तो स्वयं पैदा किए गए हैं। (20)

वे बेजान हैं मरे हुए, उनमें कोई जान नहीं है, उन्हें तो यह भी मालूम नहीं कि वे कब (मौत से) उठाए जाएँगे। (21)

तुम्हारा ख़ुदा तो एक ही ख़ुदा है (इसके सिवा कोई नहीं)। वे लोग जो आनेवाली दुनिया [आख़िरत/ परलोक] में विश्वास नहीं रखते, उनके दिल सच्चाई को मानने से इंकार करते हैं, और वे अपने घमंड में चूर हैं। (22)

इसमें कोई शक नहीं कि अल्लाह ख़ूब जानता है, जो कुछ वे (अपने दिल में) छिपाते हैं और जो कुछ (ज़बान से) बता देते हैं। और वह घमंड करनेवालों को पसंद नहीं करता। (23)


 और जब उनसे पूछा जाता है कि "तुम्हारे रब ने क्या उतारा है?" तो कहते हैं, "(कुछ नहीं), बस पिछले लोगों की कहानियाँ हैं।" (24)

 (नतीजा यह होगा कि) वे क़यामत के दिन अपने (गुनाहों का) बोझ तो पूरा-पूरा उठाएँगे ही, साथ में उन लोगों के बोझ का भी एक हिस्सा उठाना होगा जिन्हें वे बिना सही जानकारी के भटका रहे हैं। क्या ही बुरा बोझ है जिसे वे अपने ऊपर लादेंगे! (25)

उनसे पहले जो लोग गुज़र चुके हैं, उन्होंने भी (सच्चाई के ख़िलाफ़) चालें चली थीं, मगर उन्होंने अपने ख़्यालों का जो महल बना रखा था, अल्लाह ने उनके महल की नीवों को ही हिलाकर रख दिया। उनकी (ही बनायी हुई) छत उनके ही दम पर आ गिरी: बस ऐसी दिशा से यातना आ गयी जिसके बारे में उन्होंने कल्पना तक न की थी। (26)

अंत में, क़यामत के दिन, अल्लाह उन्हें यह कहते हुए अपमानित करेगा, "कहाँ गए मेरे वे 'साझेदार [Partners]' (जिनको तुमने ख़ुदा बना रखा था), जिनकी ख़ातिर तुम (मेरा) विरोध करते थे?" जिन्हें ज्ञान दिया गया था, वे (उस दिन) कहेंगे, "निश्चय ही आज इंकार करनेवालों [काफ़िरों] के लिए शर्म और बदहाली से डूब मरने का दिन है!" (27)

ऐसे (काफ़िर) लोग जिनकी जान फ़रिश्ते इस हालत में लेते हैं जबकि वे (इंकार पर अड़े होने के चलते) ख़ुद अपने आप पर ज़ुल्म कर रहे होते हैं, पर इस मौक़े पर वे आज्ञा माननेवाले बन जाएंगे (और कहेंगे): "हम तो कोई शैतानी के काम नहीं कर रहे थे।" (उनसे कहा जाएगा), "बिल्कुल, तुम कर रहे थे: तुमने जो कुछ किया है, अल्लाह उसे बहुत अच्छी तरह जानता है, (28)

तो बस अब जहन्नम के दरवाज़े में घुस जाओ। तुम्हें हमेशा के लिए इसी में रहना है----सचमुच घमंड करनेवालों का कितना बुरा ठिकाना है!" (29)


लेकिन, जब नेक व सच्चे लोगों से पूछा जाता है, "तुम्हारे रब ने क्या उतारा है? "वे कहेंगे, "सारी चीज़ें जो अच्छी हैं।" जो लोग अच्छा काम करते हैं, उनके लिए तो इस दुनिया में भी अच्छा बदला है, मगर आख़िरत [परलोक] में उनका घर कहीं अच्छा है: नेक व सच्चे लोगों का क्या ही अच्छा घर होगा। (30)

 वे हमेशा-के-लिए रहने के बाग़ में दाख़िल होंगे, जिनके बीच बहती हुई नहरें होंगी, वे जो कुछ चाहेंगे, वहाँ हर एक चीज़ मौजूद होगी। अल्लाह अपने अच्छे बंदों को इसी तरह इनाम देता है, (31)

 ऐसे (परहेज़गार) लोग जिनकी जान फ़रिश्ते इस हालत में लेते हैं जबकि वे (ईमान व मन की शांति के कारण) ख़ुशहाल होते हैं। फ़रिश्ते उन्हें कहते हैं, "तुम पर सलामती हो! जन्नत में दाख़िल हो जाओ, यह उन कामों का इनाम है जो तुम किया करते थे।" (32)

[ऐ रसूल!] क्या विश्वास न करनेवाले [काफ़िर] अब इसी बात का इंतज़ार कर रहे हैं कि फ़रिश्ते उनके पास उतर आएं या आपके रब का (तय किया हुआ) फ़ैसला ही सामने आ जाए? ऐसा ही उन लोगों ने भी किया था, जो इनसे पहले गुज़र चुके हैं। अल्लाह ने उन पर कोई ज़ुल्म नहीं किया, बल्कि वे ख़ुद अपनी जानों पर ज़ुल्म करते रहे। (33)

 इस तरह, (नतीजा यह हुआ कि) जो बुरे कर्म उन्होंने किए थे उनकी बुराइयों का अंजाम उन्हें भुगतना पड़ा, और जिस चीज़ का वे मज़ाक़ उड़ाया करते थे, उसी चीज़ ने उन्हें आ घेरा। (34)


जो लोग अल्लाह के साथ दूसरों की भी पूजा करते थे, वे कहते हैं, "अगर अल्लाह चाहता तो कभी ऐसा नहीं होता कि हम या हमारे बाप-दादा उसे छोड़कर दूसरी हस्तियों की पूजा करते, और न हम बिना उसकी मंज़ूरी के किसी चीज़ को (अपने मन से) हराम [forbidden] ठहरा देते।" मगर उनसे पहले के लोगों ने भी ऐसी ही बात कही थी। तो फिर (बताओ) रसूलों की ज़िम्मेदारी इसके सिवा और क्या है कि साफ़-साफ़ (अल्लाह का) सन्देश पहुँचा दें? (35)

यह सच्चाई है कि हमने हर समुदाय में कोई न कोई रसूल ज़रूर भेजा, ताकि वह यह संदेश सुना दे, "अल्लाह की बन्दगी करो और (शैतान या बुत जैसे) झूठे ख़ुदाओं से बचो।" फिर उन (समुदायों) में से कुछ तो अल्लाह के बताए हुए रास्ते पर चले; जबकि कुछ दूसरे (समुदाय) सही रास्ते से भटककर रह गए। अत: ज़मीन पर ज़रा घूम-फिरकर देखो कि (सच्चाई से) इंकार करनेवालों का अंत में कैसा अंजाम हुआ। (36)

[ऐ रसूल] आप हालाँकि मन से बहुत चाहते हैं कि ये लोग सीधे रास्ते पर आ जाएं, मगर अल्लाह जिसे (सच्चाई से इंकार व दूसरों को बहकाने के कारण) भटकता छोड़ दे, उसे वह मार्ग नहीं दिखाया करता, और कोई न होगा जो ऐसे लोगों की मदद करेगा। (37)

 उन लोगों ने अल्लाह की क़समें खाकर कड़ी प्रतिज्ञाएं ली हैं कि मरे हुए लोगों को अल्लाह दोबारा (ज़िंदा करके) नहीं उठाएगा। मगर वह ऐसा ज़रूर करेगा--- यह तो एक पक्का व अटूट वादा है, मगर अधिकतर लोग यह बात नहीं समझते----(38)

 और यह इसलिए होगा ताकि जिस बात पर वे मतभेद रखते हैं, वह उनके सामने स्पष्ट हो जाए और यह भी कि (सच्चाई से) इंकार करनेवाले मान सकें कि वे जो कहते थे, वह झूठ था। (39)

जब हम किसी चीज़ के होने या करने का इरादा करते हैं, तो बस इतना ही कहते हैं कि "हो जा!" और वह हो जाती है। (40)

 और जिन लोगों ने दूसरों के ज़ुल्म सहने के बाद अल्लाह के लिए अपने घर-बार छोड़ दिए और दूसरी जगह जा बसे, उन्हें हम इस दुनिया में अच्छा ठिकाना तो देंगे ही, मगर काश! कि वे यह जान पाते कि आख़िरत [परलोक] में उनका इनाम कहीं बड़ा होगा। (41)

ये वे लोग हैं जो मज़बूती से जमे रहते हैं, और वे अपने रब पर पूरा भरोसा रखते हैं। (42)


[ऐ रसूल] हमने आपसे पहले भी (किसी फ़रिश्ते को नहीं, बल्कि) इंसानों को ही रसूल बनाकर भेजा था, जिन पर हमने वही’[Revelation] उतारी थी: तुम (लोग) अगर नहीं जानते, तो उन (यहूदी/ईसाई) लोगों से पूछो जो (आसमानी किताबों) के बारे में जानते हैं। (43)
हमने उन्हें स्पष्ट निशानियों और आसमानी किताबों के साथ भेजा था, (इसी तरह) हमने आप पर भी अपना संदेश [क़ुरआन] उतारा है, ताकि जो संदेश लोगों के लिए भेजा गया है, आप उन्हें अच्छी तरह से समझा सकें, और ताकि लोग इस पर सोच-विचार कर सकें। (44

फिर क्या वे लोग जो शैतानी योजनाएं बनाते हैं, उन्हें इस बात का पक्का यक़ीन है कि अल्लाह उन्हें कभी धरती के भीतर नहीं धँसा सकता है या उन पर कोई ऐसी जगह से यातना नहीं आ सकती जिसके बारे में उन्होंने सोचा तक न हो, (45
या (किसी दिन) आते-जाते उन्हें अचानक वह अपनी पकड़ में नहीं ले सकता----क्योंकि वे अल्लाह को (अपनी चालों से) रोक तो नहीं सकते---- (46
या कि ऐसा हो वह उन्हें पहले डरा के और फिर धीरे धीरे अपनी पकड़ में नहीं ले सकता? बेशक तुम्हारा रब बहुत मेहरबान और बड़ा ही दयावान है। (47)
क्या अल्लाह की पैदा की हुई चीज़ों को उन (विश्वास न करनेवालों) ने ध्यान से नहीं देखा कि अल्लाह के सामने किस तरह उनकी परछाइयाँ विनम्र भाव से झुकी हुई दाएँ और बाएँ ढलती रहती हैं? (48)
यह अल्लाह है कि जिसके सामने आसमानों और ज़मीन की हर चीज़ झुकती है,  हर एक चलता फिरता जानवर, यहाँ तक कि फ़रिश्ते भी ---- उनमें घमंड नहीं होता: (49)

वे अपने रब से डरते रहते हैं जो उनके ऊपर मौजूद है, और वही करते हैं जैसा उन्हें आदेश दिया जाता है। (50)

अल्लाह ने कहा, "पूजने के लिए दो-दो ख़ुदा न बना बैठो---- क्योंकि वह तो बस एक ही ख़ुदा है। केवल मैं ही अकेला ख़ुदा हूँ जिससे तुम्हें डरना चाहिए।" (51
आसमानों और ज़मीन की हर एक चीज़ उसी की है: (सबके लिए) उसकी आज्ञा का सदा पालन करना ज़रूरी है। तो फिर क्या अल्लाह के सिवा तुम किसी और के बारे में सोचोगे? (52)
 जो कुछ भी अच्छी चीज़ें तुम्हारे पास हैं वह अल्लाह की तरफ़ से आती हैं, फिर जब तुम्हें कोई तकलीफ़ पहुँचती है, तो तुम सिर्फ़ उसी को मदद के लिए पुकारते हो, (53
फिर जब वह उस मुसीबत को तुमसे टाल देता है--- तो देखो!---कि तुममें से कुछ लोग अपने रब के साथ दूसरों (को ख़ुदायी में) साझेदार [Partners] ठहराने लगते हैं। (54
जो कुछ मेहरबानियाँ हमने उन पर की हैं, इसके बदले में उन्हें नाशुक्री [Ingratitude] कर लेने दो; ठीक है, ज़िंदगी के थोड़े दिन कुछ मज़े कर लो---- जल्द ही तुम्हें (इसका नतीजा) मालूम हो जाएगा। (55)


फिर (देखो!) जो कुछ रोज़ी हमने उन्हें दे रखी है उसमें से कुछ हिस्सा वे (मूर्तियों के लिए) अलग कर लेते हैं, जिनकी हक़ीक़त उन्हें मालूम तक नहीं। क़सम है अल्लाह की! जो झूठ तुमने गढ़े हैं उसके बारे में तुमसे ज़रूर पूछताछ की जाएगी। (56)

(फ़रिश्तों को अल्लाह की बेटी मानते हुए) वे बेटियों को अल्लाह के साथ जोड़ते हैं----महान है वह!--- (अल्लाह के लिए बेटियाँ!) और ख़ुद अपने लिए वे (बेटा) चाहते हैं। (57)

और जब उनमें से किसी को बेटी के पैदा होने की ख़बर दी जाती है, तो सुनकर उसका चेहरा काला पड़ जाता है और वह उदास हो जाता है। (58)
इस बुरी ख़बर को सुनने के बाद वह मारे शर्म के अपने ही लोगों से छिपता फिरता है, और (मन ही मन में सोचता रहता है) कि अपमान सहन करके उस बच्ची को रहने दे या उसे मिट्टी में गाड़ दे। देखो, वे कितना बुरा फ़ैसला करते हैं! (59)

जो लोग आख़िरत [परलोक] को नहीं मानते, उन्होंने अपने दिल में (अल्लाह की विशेषताओं के बारे में) बहुत बुरी तस्वीर [image] बना रखी है, हालाँकि  अल्लाह के लिए कल्पना में भी जो तस्वीर उभरती है वह सबसे बेहतरीन होनी चाहिए:  वह  बहुत ताक़तवाला और  बहुत समझ-बूझ  रखनेवाला है। (60)
अगर  अल्लाह लोगों को उनकी शैतानियों  पर तुरंत सज़ा देने लगता, तो ज़मीन पर कोई भी जीव ज़िंदा नहीं बच पाता, किन्तु वह उन्हें एक निश्चित समय तक ढील देता  है:  फिर जब उनका  समय आ जाता है तब  उसे घड़ी भर के लिए भी टाला नहीं जा सकता और न ही नियत समय को ही बढ़ाया जा सकता है। (61)
(और देखो!) ये लोग  अल्लाह के लिए (बेटियों के रूप में) ऐसी बातें ठहराते हैं, जिसे ख़ुद अपने लिए पसन्द  नहीं करते, जबकि वे ख़ुद अपनी  ज़बान से सफ़ेद  झूठ बोलते  हैं कि सारी बेहतरीन चीज़ [बेटा] उन्हीं के हिस्से में आयी है। इसमें कोई शक नहीं कि उनके हिस्से में तो (जहन्नम की)  आग है: वहाँ (आग में) ये सबसे पहले जानेवाले हैं। (62)

क़सम है अल्लाह की!  [ऐ रसूल] हम आपसे पहले दूसरे  समुदायों  के पास भी अपने रसूल भेज चुके हैं, मगर शैतान ने उनके बुरे कर्मों को उनके लिए  बड़ा लुभावना  बनाकर पेश किया। वह  आज भी (मक्का के) विश्वास न करनेवालों [काफ़िरों] का संरक्षक बना हुआ है, और अंत में, उन सबके लिए  एक दर्दनाक यातना तैयार है। (63)
हमने यह किताब [क़ुरआन]  आप पर  इसीलिए उतारी  है ताकि जिन बातों में  वे मतभेद रखते हैं, वे बातें अच्छी तरह  उन्हें समझा दी जाएं और जो लोग ईमान रखते हैं, उनके लिए यह (किताब) रास्ता दिखानेवाली  और रहमत [mercy] है। (64)

यह  अल्लाह  है जो आसमान  से पानी बरसाता है और  इसी (पानी के)  द्वारा  मुर्दा पड़ी हुई ज़मीन में फिर से जान पड़ जाती है। सचमुच  इसमें उन लोगों के लिए बड़ी निशानी है जो बात सुनते हैं। (65)
और मवेशियों में भी तुम्हारे लिए एक सबक़ है -----  हम पेट के तत्वों में से तुम्हारे लिए  पीने की चीज़ देते हैं, उनके पेट में जो गोबर और ख़ून है, उसके बीच से हम तुम्हें साफ़ सुथरा  दूध निकाल  देते हैं जो पीनेवालों के लिए बेहद प्रिय है, (66)
 खजूरों और अंगूरों के फलों से तुम मीठे रस [शराब/ शरबत/ सिरका]  बना लेते हो, और यह एक भरपूर  रोज़ी है। सचमुच इस बात में उन लोगों के लिए बड़ी निशानी है जो बुद्धि से काम लेते है। (67)
और तुम्हारे रब ने मुधमक्खी के दिल  में यह बात डाल दी कि "तू पहाड़ों में, पेड़ों  में और लोगों के बनायी हुई (फूलों की) छत्रियों  में अपने लिए घर [छत्ते]  बना। (68)
और हर क़िस्म  के फल-फूलों को  अपनी ख़ुराक बना  और फिर उन रास्तों पर चल जिस पर चलना तेरे रब ने तेरे लिए आसान बना दिया है।" (इस तरह) उसके पेट से विभिन्न रंगों  का एक पेय [शहद] निकलता है, जिसमें लोगों की बीमारियों का इलाज है। सचमुच  ही सोच-विचार करनेवाले लोगों के लिए इसमें एक बड़ी निशानी है। (69)

यह अल्लाह है जिसने तुम्हें पैदा किया है और समय पूरा हो जाने पर वह तुम्हें मौत दे देता है। तुममें से कोई ऐसा भी होता है कि बुढ़ापे की ऐसी निरीह अवस्था तक पहुँच जाता है  जहाँ एक अच्छी समझ-बूझ रखनेवाला आदमी भी नासमझ होकर रह जाता है: सचमुच अल्लाह सब जाननेवाला, हर चीज़ की ताक़त रखनेवाला है। (70)

और (देखो!) अल्लाह ने तुममें से कुछ को दूसरों की अपेक्षा ज़्यादा अच्छी रोज़ी दे रखी है। मगर जिन्हें (कमाई में) ज़्यादा दिया गया है वह यह नहीं चाहते कि अपनी रोज़ी का हिस्सा अपने अधीन ग़ुलामों को भी दें, ताकि वह भी इनके बराबर हो जाएँ। तो फिर कैसे ये लोग अल्लाह की नेमतों को मानने से इंकार कर सकते हैं? (71)

यह अल्लाह है जिसने तुम ही में से तुम्हारे लिए जोड़े [पति/पत्नियाँ] बना दिए और फिर इनके द्वारा तुम्हारे लिए बेटे/बेटियाँ और पोते/पोतियाँ पैदा कर दिए और तुम्हें अच्छी-अच्छी चीज़ों में से रोज़ी दी गयी; फिर भी यह कैसे हो सकता है कि वे झूठ में विश्वास करें और अल्लाह की नेमतों को मानने से इंकार करें?   (72)
 
अल्लाह को छोड़कर जिनकी ये पूजा करते हैं, उनमें कोई ताक़त नहीं है कि वह आसमान या ज़मीन से उन्हें कुछ भी रोज़ी दे सकें: वे कुछ नहीं कर सकते। (73)

अतः (राजाओं को देखकर) अल्लाह के बारे में कोई तस्वीर न बना डालो: अल्लाह जानता है, तुम कुछ नहीं जानते। (74)


अल्लाह एक मिसाल बयान करता है: एक ग़ुलाम है जो अपने मालिक के नियंत्रण में है और उसे किसी भी चीज़ का कोई अधिकार नहीं है, और एक दूसरा आदमी है जिसे हमारी कृपा से अच्छी रोज़ी मिली हुई है और उसमें से वह ढके-छिपे भी और सबके सामने भी (जिस तरह चाहता है) दान देता रहता है। (अब बताओ) क्या वे दोनों बराबर हो सकते हैं? सारी तारीफ़ें अल्लाह के लिए हैं, किन्तु उनमें अधिकतर लोग हैं जो इस बात को नहीं मानते। (75)

(देखो!) अल्लाह ने एक और मिसाल बयान की है: दो आदमी हैं, उनमें से एक गूँगा है, कोई काम नहीं कर सकता, वह अपने मालिक पर एक बोझ है--- उसका मालिक जो भी काम करने को कहता है, वह कुछ भी ढंग से नहीं कर पाता----- क्या ऐसा आदमी उस दूसरे आदमी के बराबर हो सकता है जो लोगों को इंसाफ़ की बातों का आदेश देता है और स्वयं भी सीधे मार्ग पर हो? (76)

आसमानों और ज़मीन की वे सारी चीज़ें जो नज़रों से ओझल हैं, उनके (रहस्यों की) जानकारी अल्लाह ही के पास है। और उस फ़ैसले की घड़ी का (अचानक) आना ऐसा होगा जैसे आँखों का झपकना या इससे भी जल्दी: हर एक चीज़ अल्लाह के क़ाबू में है। (77)

(और देखो!) अल्लाह ने तुम्हें तुम्हारी माँओ के पेट से इस हाल में निकाला कि तुम कुछ भी नहीं जानते थे। फिर उसने तुम्हें सुनने, देखने, और सोचने-समझने की ताक़त दी ताकि तुम (अल्लाह का) शुक्र अदा कर सको। (78)

क्या वे चिड़ियों को आसमान में नहीं देखते कि किस तरह हवाओं के बीच उड़ती फिरती हैं? अल्लाह के सिवा कौन है जो उन्हें (हवा में) थामें हुए होता है। सचमुच इसमें उन लोगों के लिए बड़ी निशानियाँ हैं जो (सच्चाई में) विश्वास रखते हैं। (79)

यह अल्लाह है जिसने तुम्हारे घरों को तुम्हारे लिए आराम करने की जगह बना दिया, और जानवरों की खालों से भी तुम्हारे लिए ऐसे घर [ख़ेमा,Tent] बना दिए जिन्हें हल्का-फुल्का होने के कारण तुम सफ़र में भी अपने साथ लिए फिरते हो और जहाँ चाहते हो पड़ाव भी डाल लेते हो; फिर चौपायों के ऊन से, रोवों [Fur] से और बालों से कितने ही घरेलू सामान और ज़रूरी चीज़ें बना दीं कि एक अवधि तक काम देती हैं। (80)

यह अल्लाह है जिसने अपनी पैदा की हुई चीज़ों से तुम्हारे लिए छाँव बनायी और पहाड़ों में पनाह लेने की जगहें बनायीं; ऐसे कपड़े दिए जो तुम्हें गर्मी से बचाते हैं और कुछ ऐसे भी (लोहे के) कपड़े दिए जो युद्ध में तुम्हारे लिए बचाव का काम करते हैं। इस तरह, अल्लाह तुम पर अपनी नेमतें [blessings] पूरी करता है, ताकि तुम पूरी भक्ति से उसके आगे झुक सको। (81)

 फिर भी अगर वे [काफ़िर] मुँह मोड़ते हैं तो [ऐ रसूल!], आपकी ज़िम्मेदारी तो बस इतनी ही है कि (अल्लाह के) संदेश को उन तक साफ़-साफ़ पहुँचा दें।  (82

ये लोग अल्लाह की नेमतों को जानते हैं, मगर उसे पहचानने से इंकार करते हैं: उनमें अधिकतर ऐसे हैं (जो शुक्र अदा नहीं करते और) जिन्हें सच्चाई से इंकार है। (83)


एक दिन आएगा जब हम हर समुदाय में से एक गवाह [रसूल] खड़ा करेंगे, फिर जिन्होंने (सच्चाई में) विश्वास करने से इंकार किया होगा उन्हें इस बात की कोई अनुमति न होगी कि वे कोई बहाने बना सकें या अपनी भूल-चूक में सुधार कर सकें। (84)

जब शैतानियाँ करनेवाले लोग अपनी सज़ा भुगतेंगे, तो न उनके लिए सज़ा हल्की की जाएगी और न उन्हें थोड़ी देर की राहत ही मिलेगी। (85)

जिन लोगों ने (ख़ुदायी में) अल्लाह के साथ साझेदार [Partner] ठहराए, (क़यामत के दिन) जब वे अपने बनाए हुए साझेदारों को देखेंगे, तो कहेंगे, "हमारे रब! ये हैं हमारे वे साझेदार जिन्हें हम तेरे सिवा पुकारा करते थे।" इस पर वे [साझेदार] तुरंत पलटकर जवाब देंगे, "तुम बिलकुल झूठे हो।" (86)

 उस दिन वे सब आज्ञाकारी बने हुए अल्लाह के आगे सिर झुका देंगे: उनके बनाए हुए झूठे ख़ुदा उन्हें अकेला छोड़ जाएंगे। (87)

जो लोग अविश्वास पर अड़े रहे, और दूसरों को अल्लाह के रास्ते से रोकते रहे थे, उन लोगों ने फ़साद [corruption] मचा रखा था, और इसीलिए हम उनके लिए यातना पर यातना बढ़ाते रहेंगे।  (88)


एक दिन आएगा जब हम हर समुदाय में से उन लोगों के ख़िलाफ़ एक गवाह [रसूल] खड़ा करेंगे, और हम [ऐ रसूल] आपको इन (मक्का के) लोगों के ख़िलाफ़ गवाह के रूप में लाएंगे, क्योंकि हमने आप पर किताब [क़ुरआन] उतार भेजी है जिसमें हर चीज़ को खोल-खोलकर बता दिया गया है, यह उन लोगों के लिए एक मार्गदर्शन [Guidance] है, रहमत [Mercy] है, और अच्छी ख़बर सुनानेवाली है जो लोग पूरी भक्ति से अल्लाह के सामने झुकते हैं (89

 बेशक अल्लाह (सबके साथ) न्याय करने का, भलाई करने का और रिश्तेदारों को (उनके हक़) देते रहने का आदेश देता है और गंदी व अश्लील बातों से, हर तरह की बुराइयों से और अत्याचार व ज़्यादती करने से रोकता है। वह तुम्हें नसीहत करता है, ताकि तुम ध्यान दो व समझो। (90)

 अल्लाह के नाम से अगर कोई प्रतिज्ञा करो, तो उसे पूरा किया करो  और (इसी तरह) अगर किसी चीज़ की पक्की शपथ ले लो तो उसे मत तोड़ो, क्योंकि तुम अल्लाह को अपना गवाह बना चुके हो: अल्लाह हर एक चीज़ जानता है जो कुछ तुम करते हो। (91)

 तुम अपनी क़समों का इस्तेमाल एक दूसरे को धोखा देने के लिए मत किया करो----(प्रतिज्ञा करके अपने ही हाथों मत तोड़ दो, और) उस औरत की तरह न हो जाओ जो अपना सूत मेहनत से कातने के बाद उसे उधेड़कर धागा-धागा अलग कर देती है---केवल इसलिए कि एक गिरोह दूसरे गिरोह से गिनती व ताक़त में बढ़ गया। बात केवल यह है कि अल्लाह इस प्रतिज्ञा के द्वारा तुम्हारी परीक्षा लेता है और जिस बात पर तुम आपस में मतभेद रखते हो, उसकी सच्चाई तो वह क़यामत के दिन अवश्य ही तुम पर खोल देगा। (92)


अगर अल्लाह ऐसा चाहता, तो तुम सबको एक ही (दीन माननेवालों का) समुदाय बना देता, मगर वह जिसको चाहता है (उसकी हठधर्मी के कारण) उसको भटकता छोड़ देता है, और जिसको चाहता है सीधा मार्ग दिखा देता है। तुम जो कुछ भी करते हो उसके बारे में तुमसे अवश्य पूछताछ होगी। (93)

तुम अपनी क़समों का इस्तेमाल एक दूसरे को धोखा देने के लिए मत किया करो, कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारे क़दम मज़बूती से जम जाने के बाद लड़खड़ा जाएं। और कहीं ऐसा न हो कि अल्लाह के मार्ग से दूसरों को रोकने के बदले में तुम्हें दंड का मज़ा चखना पड़े, और तुम्हें एक भयानक यातना झेलनी पड़ जाए। (94)

अल्लाह के नाम से की गयी किसी प्रतिज्ञा को (थोड़े से फ़ायदे के लिए) मामूली दाम पर मत बेच दो: अल्लाह के पास (देने के लिए) जो है वह तुम्हारे लिए कहीं बेहतर है, काश कि तुम इस बात को समझ पाते।  (95)

 जो तुम्हारे पास है वह तो (एक दिन) समाप्त हो जाएगा, मगर जो अल्लाह के पास है वह बाक़ी रहनेवाला है। जिन लोगों ने धैर्य [सब्र] से काम लेते हुए (दुनिया की मुसीबतें झेल ली) होंगी, हम उन्हें उनके बेहतरीन कर्मों के मुताबिक़ उनका इनाम ज़रूर प्रदान करेंगे। (96)

 जो कोई मर्द हो या औरत, अगर अच्छे कर्म करता है, और ईमान भी रखता है, तो हम उसे (दुनिया में) अवश्य अच्छी ज़िंदगी देंगे और उनके बेहतरीन कर्मों के मुताबिक़ (आख़िरत में भी) उन्हें इनाम देंगे। (97)


अतः [ऐ रसूल] जब आप क़ुरआन पढ़ा करें, तो दुत्कारे हुए [Outcast] शैतान (के बहकावे) से अपनी हिफ़ाज़त के लिए अल्लाह से दुआ माँग लिया करें। (98)

 उस [शैतान] का उन लोगों पर कोई ज़ोर नहीं चलता जो ईमानवाले हैं और अपने रब पर भरोसा रखते हैं; (99)

 उसका ज़ोर तो बस उन्हीं लोगों पर चलता है जो उसे अपना साथी बनाते हैं और जो उसी (शैतान) के चलते, अल्लाह के साथ (उसकी ख़ुदायी में) साझेदार [Partner] ठहरा लेते हैं। (100)

 जब हम एक आयत की जगह दूसरी आयत बदलकर लाते हैं----- और अल्लाह ही बेहतर जानता है जो कुछ वह उतारता [Reveal] है---- तो वे कहते हैं, "तुम तो बस अपने मन से ही इसे बना लेते हो!", मगर उनमें से अधिकतर लोगों को हक़ीक़त की कोई जानकारी नहीं है। (101)

[ऐ रसूल] बता दें, "इस (क़ुरआन) को तो पवित्र आत्मा [जिबरील फ़रिश्ते] ने तुम्हारे रब की ओर से थोड़ा-थोड़ा करके ठीक-ठीक उतारा है, ताकि ईमानवालों के दिल मज़बूती से जमे रहें, और आज्ञा माननेवाले बंदों [मुस्लिम] के लिए मार्गदर्शन और ख़ुशख़बरी का सामान हो। (102)

[ऐ रसूल] हम अच्छी तरह से जानते हैं जो ये (आपके बारे में) कहते हैं, "उसको तो एक आदमी है जो (ये बातें) पढ़ा देता है।" हालाँकि जिसकी ओर वे संकेत करते हैं उसकी भाषा विदेशी है, जबकि यह [क़ुरआन] साफ़ अरबी भाषा में है। (103)

 जो लोग अल्लाह की आयतों में विश्वास नहीं रखते, अल्लाह उनको सही रास्ता नहीं दिखाता, और उन्हें तो दर्दनाक यातना होगी। (104)

 असल में, झूठ तो उन्हीं लोगों ने गढ़ा है जो अल्लाह की आयतों में विश्वास नहीं रखते: वे बिल्कुल झूठे हैं। (105)

 जो कोई (अल्लाह पर) ईमान लाने के बाद अल्लाह को मानने से इंकार कर बैठा, और उसका दिल इस इंकार पर जम गया, तो ऐसे लोगों पर अल्लाह का सख़्त ग़ुस्सा टूट पड़ेगा और उनके लिए बड़ी दर्दनाक यातना तैयार है। मगर हाँ, उनकी बात अलग है जिन्हें (डरा-धमकाकर) यह कहने पर मजबूर किया गया हो कि वे ईमान नहीं रखते, हालाँकि उनके दिलों में ईमान मज़बूती से जमा हुआ हो (तो उनकी पकड़ नहीं होगी)। (106)

यह (यातना) इसलिए होगी कि उन्हें आनेवाली दुनिया [आख़िरत] की अपेक्षा इस सांसारिक जीवन से बहुत लगाव है, और अल्लाह (का क़ानून है कि वह) उन्हें सही रास्ता नहीं दिखाता जो उसे मानने से इंकार करते हैं। (107)

 ये ऐसे लोग हैं (जो अक़्ल से काम नहीं लेते और) जिनके दिलों को, कानों को और आँखों को अल्लाह ने बंद करके मुहर लगा दी है : वे (अपने अंजाम को) बिल्कुल भुलाए बैठे हैं, (108)

 और इस बात में कोई शक नहीं कि आख़िरत में वे बड़े घाटे में रहेंगे। (109)

 जिन लोगों ने अपने ऊपर हुए ज़ुल्म के बाद घर-बार छोड़ा, फिर (सच्चाई के रास्ते में) संघर्ष [जिहाद] किया और (मुश्किल के बावजूद) दृढता से जमे रहे, तो ऐसे लोगों के लिए तुम्हारा रब बड़ा माफ़ करनेवाला और बेहद दयावान है। (110)

एक दिन आएगा जब हर एक जान (केवल) अपने-अपने बचाव की दलीलें लेकर आएगी, तब हर एक जान को उसके कर्मों के अनुसार पूरा पूरा बदला चुका दिया जाएगा--- किसी के साथ कोई नाइंसाफ़ी नहीं होगी। (111)

 अल्लाह एक ऐसे शहर की मिसाल बताता है जो अमन-चैन की जगह थी। ज़रूरत का हर सामान बड़ी मात्रा में सब जगह से आता रहता था। फिर ऐसा हुआ कि (वहाँ के लोगों ने) अल्लाह की नेमतों [blessings] पर शुक्र अदा करना छोड़ दिया, तब अल्लाह ने भी उनकी करतूतों के कारण उन पर भूख और डर का साया डाल दिया। (112)

फिर उनके पास उन्हीं में से एक रसूल आए, मगर उन लोगों ने उसे झूठा कहा। अन्ततः भयानक यातना ने उन्हें उस वक़्त धर-दबोचा जबकि वे शैतानियाँ करने में मगन थे। (113)


 अतः जो कुछ अल्लाह ने तुम्हें रोज़ी दे रखी है, उसमें से अच्छी और हलाल [Lawful] चीज़ें खाओ-पिओ, और (साथ में) अल्लाह की नेमतों का शुक्र अदा करो, अगर तुम सचमुच उसी की इबादत [पूजा] करते हो। (114)

 उसने (खाने की) केवल इन चीज़ों को तुम्हारे लिए मना [हराम] किया है: मरे जानवर का सड़ा हुआ गोश्त, ख़ून, सुअर का मांस और जिस जानवर को अल्लाह के सिवा किसी और का नाम लेकर काटा गया हो। लेकिन, अगर (हलाल खाना न मिलने पर) कोई भूख से एकदम मजबूर हो जाए, हालाँकि उसे इच्छा न हो, और बस (जान बचाने के लिए) उतना ही-सा खा ले जिससे उसकी उस वक़्त की ज़रूरत पूरी हो जाए (तो उसे खा सकता है) और अल्लाह तो बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है। (115)

 और अल्लाह के बारे में झूठी बातें गढ़ते हुए ऐसी ग़लत बातें मत कहा करो, "यह हलाल [Lawful] है और यह हराम [Forbidden] है": जो लोग अल्लाह के बारे में झूठ गढ़ते हैं, वे कभी कामयाब नहीं होंगे---- (116)

वे थोड़ा सा मज़ा (इस दुनिया में) उठा सकते हैं, मगर उन्हें (आख़िरत में) दर्दनाक यातना मिलने वाली है(117)

 और [ऐ रसूल] यहूदियों के लिए हमने जो चीज़ें हराम की थीं, उसके बारे में हम आपको पहले ही (क़ुरआन में) बता चुके हैं। हमने (पाबंदी लगाकर) उनपर कोई ज़ुल्म नहीं किया था, बल्कि वे ख़ुद ही अपने ऊपर ज़ुल्म करते रहे थे। (118)

मगर जो लोग अनजाने में ग़लतियाँ कर बैठते हैं, फिर इनसे तौबा कर लेते हैं, और उसमें सुधार करते हैं, तो उनके लिए तुम्हारा रब बड़ा क्षमा करनेवाला, बेहद मेहरबान है। (119)
 

सचमुच  इबराहीम की मिसाल पूरे समुदाय जैसी थी: वह पूरी भक्ति से झुककर अल्लाह की आज्ञा मानने वाला और ईमान का पक्का  था। वह मूर्तियों को पूजनेवाला था; (120)
वह अल्लाह की रहमतों का शुक्र अदा करनेवाला था, अल्लाह ने उसे चुन लिया था और उसे (सच्चाई का) सीधा मार्ग  दिखाया था। (121
और हमने उस पर दुनिया में भी अपनी ख़ास कृपा-दृष्टि रखी और आख़िरत में भी वह अच्छे नेक लोगों मे से होगा। (122)
फिर [ऐ रसूल] हमने आप पर अपना संदेश उतारा कि, "इबराहीम के तरीक़े पर चलो, जो ईमान का बिल्कुल पक्का था, और (एक अल्लाह को छोड़कर) कई देवी-देवताओं को माननेवालों [Idolators] में से था।" (123)
 'सब्त' [Sabbath] मनाने का दिन तो केवल उन लोगों पर अनिवार्य कर दिया गया था जिन्हें उसके बारे में आपस में मतभेद  था। क़यामत के दिन तुम्हारा रब  उनके बीच फ़ैसला कर देगा, जिन बातों में उन्हें आपस में मतभेद था। (124

( रसूल) लोगों को अपने रब के मार्ग की ओर जब बुलाया करें तो ज्ञान  और अच्छी शिक्षा के साथ बुलाएं। और उनसे आदर के साथ वाद-विवाद करें, कि आपका रब अच्छी तरह जानता है कि कौन है जो सही मार्ग से भटक गया है और कौन है जो सही  मार्ग पर है। (125)
( ईमान वालो) अगर तुम अपने ऊपर किए गए किसी हमले का बदला लो, तो बदला उतना ही होना चाहिए जितना तुम्हें कष्ट पहुँचा हो, लेकिन अगर तुम सब्र कर लो और (बदला न लो) तो निश्चय ही यह ज़्यादा अच्छा होगा। (126)
अतः ( रसूल) आप सब्र से काम लें: और आपको सब्र केवल अल्लाह ही की मदद से मिलेगा उनके हाल पर दुखी हों और उनकी विरोधी चालों से मायूस हों, (127)

क्योंकि अल्लाह उनके साथ है जो उसका डर रखते हुए बुराइयों से बचते हैं और अच्छा काम करते रहते हैं। (128)

 
  
नोट:
 1: मक्का के विश्वास न करने वालों को जब मुहम्मद (सल्ल)  इस बात के लिए डराते थे कि विश्वास न करने और दूसरे ख़ुदाओं को अल्लाह का साझेदार मानने के नतीजे में यातना आने वाली है, तो शुरू में तो कुछ दिन उन लोगों ने इंतज़ार किया, फिर जब देखा कि कोई यातना नहीं आयी, तो इसका मज़ाक़ उड़ाते हुए उस यातना को जल्दी लाने को कहते थे। 

 4: अल्लाह ने इंसान को एक नापाक बूंद से बनाया है, फिर उसे सभी जीवों में सबसे उत्तम बनाया, मगर इंसान केवल उसी अल्लाह को नहीं मानता, बल्कि उसका साझेदार ठहरा लेता है, जो कि एक तरह से अल्लाह को चुनौती देने जैसा है।  

 9: जब यह सूरह उतरी, उस ज़माने में ऐसी बहुत सी सवारियाँ नहीं थी, जो आज मौजूद हैं, उदाहरण के लिये बस, रेलगाड़ी, जहाज़ आदि। आगे आने वाले समय में भी नई सवारियाँ आ सकती हैं जिनके बारे में  अभी हम सोच भी नहीं सकते।

 23: चूंकि अल्लाह घमंड करने वालों को पसंद नहीं करता, इसलिए उन्हें दंड भी ज़रूर देगा, और इसके लिए परलोक में होने वाले हिसाब-किताब को मानना और विश्वास करना ज़रूरी है।

35: उनका यह कहना कि अगर वे अल्लाह के साथ दूसरे देवताओं की उपासना करते हैं, तो इसमें भी ज़रूर अल्लाह की मर्ज़ी होगीकेवल उनकी ज़िद्द और हठधर्मिता के कारण ही था। इसलिए मुहम्मद साहब को बताया गया है कि आपका काम ऐसे ज़िद्दी लोगों को रास्ते पर लाने का नहीं है, बल्कि उन लोगों तक अल्लाह का संदेश पहुंचा देने भर का है, मगर वे अपने हिसाब से कर्म करने के लिए आज़ाद हैं। उन लोगों ने यह भी कहा कि अगर अल्लाह न चाहता, तो हमने कुछ जानवरों का मांस खाना हराम (forbidden) न किया होता, यह उन जानवरों की तरफ़ इशारा है जो उन लोगों ने कुछ देवताओं के नाम से हराम कर रखा था, जिसका ज़िक्र सूरह अना'म (6: 139-145) में आया है।

37: जो दूसरों को बहकाते हैं, उसके नतीजे के लिए देखें आयत 25.

 40:  मरे पड़े लोगों को दोबारा ज़िंदा किए जाने पर लोगों को यक़ीन नहीं था, यहां बताया गया है कि यह अल्लाह के लिए बहुत ही आसान है, उसे कुछ करने के लिए केवल इरादा करना होता है।

 41: यह उन ईमानवाले लोगों के बारे में है जो मक्का में ज़ुल्म से तंग आकर हब्शा [इथोपिया] जाकर बस गए थे।

 47: अल्लाह चूंकि बहुत दयावान है, इसलिए वह एक बार में दंड नहीं देगा, बल्कि धीरे-धीरे उनकी ताक़त कम करता चला जाएगा।

56: लोग अपनी पैदावार और अपने जानवरों में से एक हिस्सा अपने देवताओं के नाम पर चढ़ावा देते थे, जिसका ज़िक्र सूरह अना'म (6: 136) में आया है।

57: अरब के कुछ बहुदेववादीफ़रिशतों को अल्लाह की बेटी मानकर पूजते थे, जबकि ख़ुद अगर उनको बेटी हो जाती थी, तो शर्म से मुंह छुपाते थे, और कुछ क़बीले तो बेटियों को ज़िंदा गाड़ तक देते थे!

63: मक्का के बहुदेववादी अपने देवताओं [मूर्तियों] की क़समें खाते थे, इसलिए यहाँ अल्लाह ने ख़ुद की क़सम खायी है।

 67: मक्का में जिस समय यह सुरह उतरी थी, उस समय तक शराब पीना मना नहीं हुआ था।

 68: शहद की मक्खी से किस तरह शहद बनता है, इस पर विचार करने पर पता चलता है कि यह अल्लाह की क़ुदरत का कमाल है।

 71: जिस तरह कोई आदमी अपने ग़ुलाम को अपने बराबर का हिस्सेदार कभी नहीं बनाता, उसी तरह जिन देवताओं को तुम अल्लाह का दास समझकर पूजते हो, तो अल्लाह अपने दासों को किस तरह अपना हिस्सेदार बना सकता है!

72: उन लोगों का यह विश्वास था कि ये नेमतें उनके ठहराए हुए देवताओं की तरफ़ से हैं।

74: मक्का के लोगों ने दुनिया के राजाओं को देखकर अल्लाह के बारे में भी यह कल्पना कर रखी थी कि जिस तरह राजा अपने काम अलग-अलग विभागों में बांट देता है, उसी तरह शायद अल्लाह ने भी अलग-अलग कामों के लिए छोटे छोटे देवताओं को रखा होगा।

84: क़यामत के दिन हर समुदाय के रसूल को इस बात की गवाही देने के लिए बुलाया जाएगा कि उन्होंने ईमानदारी से अल्लाह का संदेश लोगों तक पहुंचा दिया था, और उनके समुदाय के लोगों ने सच्चाई को मानने से इंकार किया था।

 86: उस दिन उन देवताओं [गढ़े गए बुतों और शैतानों] को इकट्ठा किया जाएगा, जिन्हें ये लोग पूजते थे, मगर वे देवता इस बात से साफ़ इंकार कर देंगे कि ये लोग उनको पूजते थे। हो सकता है कि उस समय उन बुतों को भी अल्लाह बोलने की शक्ति दे देगा। 

92: अल्लाह के नाम से कोई प्रतिज्ञा करके उसे तोड़ देने की मिसाल एक औरत से दी गई है। कहा जाता है कि मक्का में "ख़रक़ा' नाम की एक दीवानी औरत थी जो दिनभर बड़ी मेहनत से सूत कातती थी, और फिर रात में धागा-धागा अलग कर देती थी, यानी अपने ही हाथों अपनी सारी मेहनत बर्बाद कर देती थी।

96: धीरज [सब्र] से काम लेने का मतलब अपने मन की इच्छाओं को क़ाबू में रखना भी होता है, और तकलीफ़ को चुपचाप झेलना भी होता है।

 98: हर अच्छे काम में शैतान आदमी को बहकाता है। यहां बताया गया है कि क़ुरआन को पढ़ने से पहले शैतान के बहकावे से बचने के लिए अल्लाह से पनाह मांग लेनी चाहिए।

 101: अल्लाह ने हालात के मुताबिक कभी-कभी अपने दिए हुए आदेश में बदलाव किए थे, जैसे जेरूसलम के "बैतुल मक़दिस" की जगह काबा की तरफ़ मुंह करके नमाज़ पढ़ने का आदेश देना, जो कि सूरह बक़रा में आया है। इस पर लोगों का कहना था कि अल्लाह का अगर आदेश होता, तो उसमें बदलाव नहीं आता, यह ज़रूर मुहम्मद साहब की तरफ़ से होगा जो अपने हिसाब से इसमें फेरबदल कर देते हैं। मगर यह अल्लाह ही जानता है कि उसे कब कौन सा आदेश देना है, और कब किसमें बदलाव करना है।

 103: मक्का में एक लोहार था, जो कि मुहम्मद सल्ल की बातें बड़े ध्यान से सुनता था, इसलिए आप (सल्ल) कभी कभी उसके पास जाते थे। वह कभी कभी आपको इंजील की कुछ बातें सुना देता था, इसी वजह से मक्कावालों ने यह कहना शुरू किया कि वही मुहम्मद सल्ल को कुछ सिखा-पढ़ा देता है, मगर वह आदमी अरब का नहीं था, और अरबी अच्छी तरह नहीं जानता था, जबकि क़ुरआन साफ़ और बेहतरीन अरबी भाषा में है।

 106:  जो आदमी सच्चाई पर विश्वास कर लेने के बाद, बिना किसी दबाव के, अगर कुफ्र यानी सच्चाई को मानने से इंकार कर दे, तो उस पर अल्लाह का गुस्सा उतरेगा।

112: कुछ लोग कहते हैं कि यहां शायद मक्का शहर की मिसाल दी गई है, जो कि काफ़ी ख़ुशहाल जगह थी, फिर आहिस्ता-आहिस्ता लोगों ने अल्लाह की दी हुई नेमतों का शुक्र अदा करना छोड़ दिया, नतीजे में बड़ा भारी अकाल पड़ा, लोग चमड़ा तक खाने के लिए मजबूर हुए, फिर मुहम्मद साहब की दुआ से अकाल ख़त्म हुआ। देखें सूरह दुख़ान।

114: लोगों की जिस नाशुक्री की पीछे की आयतों में निंदा की गई है, उनकी एक सूरत यह भी थी कि बहुत सी खाने की नेमतों को अपने मनघड़ंत तरीके से हराम कर रखा था, जिसका ज़िक्र सूरह अना'म (6: 139-145) में आया है।

115: इसका विस्तार से वर्णन सूरह मायदा (5: 3) में देखें।

118: यहां बताया गया है कि मक्का के विश्वास न करने वाले भी अपने को इबराहीम के दीन का मानने वाला कहते थे। हालांकि जिन चीजों को इन लोगों ने खाने से रोक रखा था, वह चीज़ें इबराहीम अलै के ज़माने से ही हलाल चली आयी थी। हां, यहूदियों को सज़ा के तौर पर कुछ चीजों को जरूर हराम किया गया था, जिसका ज़िक्र सूरह अनाम (6: 146) में आया है। बाक़ी चीज़ें हमेशा से ही हलाल चली आयी थीं।

124: यह दूसरी चीज़ थी जो इबराहीम अलै के बाद यहूदियों के लिए हराम (वर्जित) की गई थी, और वह थी सब्त यानी शनिवार के दिन कोई भी ऐसा काम न करना जिससे कोई आमदनी या आर्थिक लाभ होता हो। इस हुक्म को भी किसी ने माना, किसी ने नहीं माना!

 128: यहां हर तरह का अच्छा काम करने को [एहसान], कहा गया है, इसमें अल्लाह की इबादत भी शामिल है जो इस तरह से होनी चाहिए कि मानो आप अल्लाह को देख रहे हों या यह अहसास हो कि अल्लाह आपको देख रहा है।



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