Saturday, August 26, 2017

सूरह 15 : अल-हिज्र [पत्थर का शहर, Stone City]

सूरह 15: अल-हिज्र
 [पत्थर का शहर/ Stone City]



01 : क़ुरआन की आयतें 

02-05: सज़ा मिलना तय है 

06-15: रसूलों का हमेशा लोगों ने मज़ाक़ उड़ाया है 

16-25: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ 

26-27: इंसानों और जिन्नों को पैदा किया जाना 

28-48: इबलीस [शितान] की कहानी 

49-60: इबराहीम (अलै) और उनके मेहमानों का क़िस्सा 

61-77: लूत (अलै) और उनकी क़ौम की कहानी 

78-84: जंगलों में रहने वाले, और पत्थर के शहर में बसने वाले लोग 

85-86: फ़ैसले की घड़ी का आना तय है 

87-99: रसूल का उत्साह बढ़ाया गया 

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है


अलिफ़॰ लाम॰ रा॰।
यह आयतें हैं आसमानी किताब--- क़ुरआन की, जो बातों को साफ़ व स्पष्ट कर देती है। (1)

जिन लोगों ने (इस किताब की सच्चाई को मानने से) इंकार किया है, एक समय आएगा जब वे कामना करेंगे कि क्या ही अच्छा होता कि हम इसको मानते और अल्लाह के सामने झुकनेवालों में होते! (2)

सो [ऐ रसूल!] आप उनको उनके हाल पर छोड़ दें कि खाएँ-पिएँ और मज़े उड़ाएँ, और (झूठी) आशाओं के भुलावे में मगन रहें: लेकिन बहुत जल्द उन्हें मालूम हो जाएगा (कि वे किस धोखे में पड़े हुए थे)! (3)

हमने कभी किसी बस्ती के रहनेवालों को (उस समय तक) बर्बाद नहीं किया, जब तक कि (हालात के अनुसार) उनकी बर्बादी का तय किया हुआ समय नहीं आ गया; (4)

किसी समुदाय के लोग न (तय किए हुए) समय को पहले ला सकते हैं और न तो (तय) समय को पीछे ढकेल सकते हैं। (5)

[ऐ रसूल!] वे (आपके बारे में) कहते हैं, "ऐ वह, कि तुम पर नसीहत [क़ुरआन] उतरी है! (हमारे ख़्याल से) तुम निश्चय ही दीवाने हो! (6)

अगर तुम सच बोल रहे हो, तो हमारे सामने फ़रिश्तों को क्यों नहीं ले आते?" (7)

मगर हम फ़रिश्तों को (ज़मीन पर) तभी उतारते हैं जब हमें न्याय (स्थापित) करना होता है, और तब इन लोगों को (बचने की) कोई मुहलत नहीं मिलेगी। (8)

हमने ख़ुद इस क़ुरआन को उतारा है, और हम ख़ुद ही इसकी हिफ़ाज़त करेंगे।  (9)

आपसे पहले भी [ऐ रसूल], हम बहुत सारी पुरानी क़ौमों के बीच अपने (संदेशों के साथ) रसूलों को भेज चुके हैं,  (10)

मगर कोई भी रसूल ऐसा नहीं हुआ, कि जो लोगों के बीच गया हो और उन लोगों ने उसकी हँसी न उड़ायी हो:  (11)

इस तरह हम अपराधियों के दिलों को ऐसा बना देते हैं जिनसे होकर हमारे संदेश (बिना उन पर असर डाले हुए) निकल जाते हैं। (12)

वे इस पर विश्वास नहीं करेंगे। पुराने ज़माने के लोगों ने भी ऐसा ही किया था,  (13)

और यहाँ तक कि अगर हम उनके लिए आसमान तक जाने का कोई दरवाज़ा खोल दें, और वे इतनी ऊँचाई पर चढ़कर वहाँ तक पहुँच भी जाएं, (14)

तब भी वे यही कहेंगे, "(असल में यह कुछ नहीं), बस नज़र का धोखा है। हम लोगों पर तो जादू कर दिया गया है!" (15)


हमने आसमान में तारों के समूहों (को ख़ास-ख़ास डिज़ाइन का) बनाया है जो देखनेवालों को बहुत ख़ूबसूरत लगता है,  (16)

और उसे हर दुत्कारे हुए [मरदूद] शैतान से सुरक्षित रखा है:  (17)

अगर कोई (शैतान) चोरी-छिपे कुछ सुनने की ताक में रहता है, तो एक चमकता हुआ शोला उसका पीछा करता है। (18)

और (देखो!) हमने धरती (की सतह) को (फ़र्श की तरह) फैला दिया, उसमें मज़बूत पहाड़ों को गाड़ दिया और हर एक चीज़ (सही संतुलन के साथ) नपे-तुले अन्दाज़ में उगा दी। (19)

और उसमें तुम्हारे गुज़र-बसर के सामान पैदा किए, और उन सब जीवों के लिए भी किया जिनको रोज़ी देनेवाले तुम नहीं हो। (20)

कोई भी चीज़ ऐसी नहीं जिसके भंडार हमारे पास न हों, फिर भी हम उसे सही व उचित मात्रा में उतारते हैं: (21)

और (देखो!) हम ऐसी हवाएं चलाते हैं जो बादलों को पानी से भर देती हैं, और फिर हम तुम्हारे पीने के लिए आसमान से पानी बरसाते हैं---- जहाँ से पानी निकल के आता है, उस पर तुम्हारा कोई नियंत्रण नहीं है। 22)

यह हम हैं जो ज़िंदगी और मौत देते हैं; और हम ही हैं जो (हर चीज़) के वारिस हैं। (23)

हमें एकदम ठीक-ठीक मालूम है कि कौन है जो पहले आया है, और कौन है जो बाद में आनेवाला है। (24)

[ऐ रसूल] यह आपका रब है जो (क़यामत के दिन) उन सबको एक साथ इकट्ठा करेगा: वह बेहद ज्ञानी और सब कुछ जाननेवाला है। (25)

हमने इंसान को सड़ी हुई मिट्टी के गारे से बनाया है जो सूखकर बजने लगता है---- (26

और जिन्न को इससे पहले, हम जलती हुई हवा की गर्मी से पैदा कर चुके थे। (27

[ऐ रसूल] जब ऐसा हुआ कि आपके रब ने फ़रिश्तों से कहा था, "मैं सड़े हुए गारे की खनखनाती हुई मिट्टी से एक आदमी पैदा करनेवाला हूँ। (28)

तो जब मैं उसे पूरा बना लूँ और उसमें अपनी रूह फूँक दूँ, तो तुम सब उसके आगे झुक जाना," (29)

और सब के सब फ़रिश्तों ने ऐसा ही किया।  (30)

मगर इबलीस न माना: उसने दूसरे फ़रिश्तों की तरह (आदमी के आगे) झुकने से इंकार कर दिया। (31)

अल्लाह ने कहा, "ऐ इबलीस! तुम दूसरे फ़रिश्तों की तरह (आदमी के आगे) क्यों नहीं झुके?" (32)

और उसने जवाब दिया, "मैं ऐसे मामूली आदमी के आगे नहीं झुक सकता जिसको तूने सड़े हुए गारे की खनखनाती हुई मिट्टी से पैदा किया है।" (33)

अल्लाह ने कहा, "चला जा यहाँ से! तुझे ज़ात-बाहर [Outcast] किया जाता है,  (34)

और फ़ैसले के दिन तक तुझ पर फिटकार रहेगी।" (35)

इबलीस ने कहा, "मेरे रब! फिर तू मुझे उस दिन तक के लिए (ज़िंदा रहने की) मुहलत दे दे, जब मरे हुए लोग दोबारा (ज़िंदा करके) उठाए जाएँगे।" (36)

अल्लाह ने कहा, "ठीक है, तुझे मुहलत दी जाती है, (37)

मगर (यह मुहलत) एक तय किए हुए समय के दिन तक (ही होगी)।" (38

इबलीस ने फिर अल्लाह से कहा, "चूँकि तूने मेरे लिए सीधे मार्ग से भटकना तय कर दिया है, अतः मैं भी धरती पर इंसानों को इस तरह बहकाऊंगा (कि उन्हें बुरी चीज़ें बहुत भली लगने लगेंगी) और उन सबको (सीधे मार्ग से) भटका कर रहूँगा, (39)

सिवाए उनके, जो सचमुच तेरे नेक व भक्ति में डूबे हुए बन्दे होंगे (जो मेरे बहकावे में आने वाले नहीं)।" (40)

अल्लाह ने कहा, "बस यही सीधा रास्ता है जो मुझ तक पहुँचने वाला है: (41

मेरे (असल) बन्दों पर तो तेरा कोई ज़ोर चलने वाला नहीं है, तेरा ज़ोर तो केवल उन पर चलेगा जो राह से भटक गए हों और तेरे पीछे-पीछे चलते हों। (42)

जहन्नम उनका ठिकाना होगा, इस बात का उन सबसे वादा है, (43

उसके सात दरवाज़े हैं, उनकी हर टोली के हिस्से में एक दरवाज़ा आएगा (जिससे होकर वे जहन्नम में दाख़िल होंगे)। (44)

मगर जो सच्चे व अच्छे [मुत्तक़ी] लोग हैं, वे तो बाग़ों और बहते हुए पानी के सोतों [spring] के बीच (आराम से) होंगे---- (45)

(उनसे कहा जाएगा), "सलामती के साथ बेधड़क (इन बाग़ों में) दाख़िल हो जाओ---- " (46)

उनके दिलों से हम उनके मन-मुटाव निकाल देंगे: वे तख़्तों पर भाइयों की तरह आमने-सामने बैठे होंगे। (47) 

न तो वहाँ उन्हें कभी कोई थकान महसूस होगी और न उन्हें कभी वहाँ से बाहर निकाला जाएगा।”  (48)

[ऐ रसूल!] मेरे बन्दों को बता दें कि मैं (गुनाहों का) बड़ा माफ़ करनेवाला और बेहद दयावान हूँ,  (49)

मगर मेरी यातना भी सचमुच बहुत ही दर्दनाक होती है। (50)


उन्हें इबराहीम [Abraham] के मेहमानों [फ़रिश्तों] का क़िस्सा भी बता दें:  (51)

जब वे इबराहीम के यहाँ आए और कहा, “तुम पर सलाम हो”, इबराहीम ने (अजनबियों को देखकर) कहा, "हमें तो तुमसे डर मालूम होता है।" (52)

"डरो नहीं”, वे बोले, “हम तो तुम्हें एक बेटे के पैदा होने की ख़ुशख़बरी देने आए हैं जो बड़ा ज्ञानी होगा।" (53)

इबराहीम ने कहा, "तुम मुझे किस तरह ऐसी ख़बर सुना सकते हो जबकि पता है कि मुझ पर बुढ़ापा आ चुका है? यह भला कैसी ख़बर हुई?" (54

उन्होंने कहा, "हमने जो बात बतायी है वह सच है, इसलिए तुम निराश न हो", (55)

इबराहीम ने कहा, "गुमराहों को छोड़कर कौन है जो अपने रब की रहमत [Mercy] से निराश हो सकता है?" (56)

और फिर उनसे पूछा, "ऐ फ़रिश्तों, तुम किस अभियान पर आए हो?" (57)

वे बोले, "हम तो एक अपराधी [लूत की] क़ौम की ओर (उनकी तबाही के लिए) भेजे गए हैं।” (58)

मगर हाँ, लूत [Lot] के घरवालों को हम बचा लेंगे,  (59)

सिवाए उसकी पत्नी के: हम यह बात तय कर चुके हैं कि वह उन लोगों में से होगी जो (तबाह होने के लिए) पीछे रह जाएंगे।" (60)


फिर जब वे भेजे हुए दूत [फ़रिश्ते] लूत के घरवालों के पास पहुँचे, (61)

तो लूत ने कहा, "तुम (लोग) तो अजनबी मालूम होते हो।" (62)

उन्होंने जवाब दिया, "हम तुम्हारे पास वह (यातना) लेकर आ गए हैं, जिसके बारे में ये लोग कहा करते थे कि ऐसा कभी होने वाला नहीं है। (63

और हम तुम्हारे पास सच्चाई लेकर आए हैं, और हम बिलकुल सच कहते हैं,  (64)

तुम अपने घरवालों को लेकर रात के पिछले पहर निकल जाना, और स्वयं उन सबके पीछे-पीछे चलना। और (ध्यान रहे!) तुममें से कोई भी पीछे मुड़कर न देखे। बस चुप-चाप चलते जाना, जहाँ जाने का तुम्हें आदेश हुआ है।" (65)

हमने इस फ़ैसले की जानकारी लूत को दे दी: सुबह होते ही उस शहर के लोगों के आख़िरी अवशेष [remnants] तक पूरी तरह से मिटा दिए जाएंगे। (66)

इतने में शहर के लोग नाच-गाना करते हुए (लूत के पास) आ पहुँचे,  (67)

उसने लोगों से कहा, "ये लोग मेरे मेहमान हैं, (इनके सामने) मेरा अपमान न करो।  (68)

अल्लाह से डरो और मुझे शर्मिंदा न करो।" (69

उन लोगों ने जवाब दिया, "क्या हमने तुम्हें किसी दूसरे आदमी (की इज़्ज़त) को बचाने से या ऐसे लोगों को अपने यहाँ ठहराने से रोका नहीं था?" (70)

लूत ने कहा, "तुम को अगर (सेक्स) करना ही है, तो (छोड़ो मेहमान मर्दों को), इसके लिए ये मेरी (क़ौम की) बेटियाँ मौजूद हैं।" (71)

[तब फ़रिश्तों ने लूत से कहा], आपकी ज़िंदगी की क़सम! वे अपनी मौज-मस्ती के नशे में धुत हैं।” (आपकी बात सुननेवाले नहीं!) (72)

और सुबह का सूरज निकलते ही एक भयानक धमाके ने उन्हें धर दबोचा:  (73)

हमने उस शहर को ऐसा उलट दिया कि सब ऊपर का नीचे और नीचे का ऊपर हो गया, और उन पर पकी हुई मिट्टी के पत्थर बरसाए। (74)

सचमुच इसमें उन लोगों के लिए बड़ी निशानी है जो इससे सीख लेना चाहते हैं----(75)

यह (खंडहर बनी) जगह अब भी मुख्य रास्ते पर मौजूद है----(76)

सचमुच इसमें उन लोगों के लिए एक निशानी है जो ईमान रखते हैं। (77)

(इसी तरह) जंगलों में रहनेवाले [ऐका यानी मदयन के क़बीले के लोग] भी अत्याचारी थे, (78)

उन्हें भी हमने (उनके अत्याचार की) सज़ा दी थी; और ये (लूत व मदयन के लोगों की) दोनों बस्तियाँ मुख्य मार्ग पर अब भी स्थित हैं जिसे देखा जा सकता है। (79)

अल-हिज्र [पत्थर का शहर] में (समूद की क़ौम) के लोगों ने भी हमारे रसूलों को मानने से इंकार किया था:  (80

हमने उन्हें अपनी निशानियाँ दी थीं, मगर वे उनसे मुँह मोड़े रहे। (81)

वे पहाड़ों को काट-काटकर अपने घर बनाते थे कि उसमें सुरक्षित रह सकें----  (82)

मगर एक दिन सुबह-सवेरे उठे तो उन्हें एक ज़ोरदार धमाके ने धर दबोचा।  (83)

फिर जो कुछ उन्होंने कमाया था, वह उनके कुछ काम न आ सका। (84)

हमने आसमानों और ज़मीन को और वे सारी चीज़ें जो उनके बीच में हैं, उन्हें बिना किसी सही मक़सद के यूँ ही नहीं बना दिया है: और (क़यामत की) वह घड़ी तो अवश्य आकर रहेगी, अतः [ऐ रसूल!] आप (उनके विरोध के बावजूद) उनके साथ अच्छा व्यवहार करते हुए उन्हें झेल लें। (85)

आपका रब  हर चीज़ को पैदा करनेवाला, और सब (की हालत) जाननेवाला है। (86)

हमने आपको बार-बार दोहरायी जाने वाली सात आयतें दी हैं [सूरह फ़ातिहा], और इसके साथ पूरी क़ुरआन दी है जो महानता से भरी है। (87)

हमने उनमें से कुछ लोगों को (इस दुनिया में) थोड़ा मौज करने के लिए कुछ सुख-सामग्री दे रखी है, आप उन चीज़ों को चाहत की नज़र से न देखें। और न ही आप उन (काफ़िरों) के लिए बेकार ही दुखी हों। बल्कि ईमानवालों के लिए अपने बाज़ू फैलाए रखें (और उन पर हमेशा ध्यान दें), (88)

और कह दें, "मैं तो बस तुम्हें (इंकार व बुरे कर्मों के लिए) साफ़-साफ़ चेतावनी देनेवाला हूँ," (89)

जिस तरह हमने (अपनी चेतावनी) उन लोगों के लिए भेजी थी जिन लोगों ने अपने आपको कई समूहों में बाँट रखा था (और वे तीर्थ-यात्रियों को क़ुरआन के ख़िलाफ़ भड़काते रहते थे), (90)

और क़ुरआन को बुरा-भला कहते थे ---- (91)

आपके रब की क़सम! हम अवश्य ही उन सबसे पूछताछ करेंगे, (92)

जो कुछ (कर्म) वे करते रहे थे। (93)

अतः जिस बात को कहने का आदेश हुआ है, उसकी खुले-आम घोषणा कर दें, और बहुदेववादियों [idolaters] की ओर कोई ध्यान न दें। (94)

वे लोग जो आपके संदेश का मज़ाक़ उड़ाते हैं, उनके ख़िलाफ़ हम काफ़ी हैं। (95)

जो अल्लाह के साथ दूसरों को भी पूजने के लायक़ ठहराते हैं, तो शीघ्र ही उन्हें (सच्चाई) मालूम हो जाएगी! (96)

हम अच्छी तरह जानते हैं कि वे जो कुछ कहते हैं, उन बातों से (तकलीफ़ के मारे) आपका दिल रुकने लगता है। (97)

सो अपने रब की महानता का (दिन-रात) गुणगान करें और उन लोगों में शामिल हो जाएं जो उसके आगे झुके रहते हैं:  (98)

और अपने रब की इबादत में उस समय तक लगे रहें, जब तक कि वह (मौत) न आ जाए जिसका आना निश्चित है। (99)





नोट:

3: विश्वास न करने वाले दुनिया की ज़िंदगी में मगन रहते हैं, जबकि मुसलमान दुनिया में रहता ज़रूर है और इसमें अल्लाह की नेमतों से फ़ायदा भी उठाता है, मगर इस दुनिया को अपनी ज़िंदगी का मक़सद नहीं बनाता, बल्कि उसे परलोक [आख़िरत] की भलाई के लिए इस्तेमाल करता है। 

8: जिस क़ौम के पास रसूल भेजे जाते हैं और जब वह क़ौम अल्लाह के संदेशों को मानने से इंकार कर देती है और आदेश तोड़ने में हदें पार कर जाती है, तब फ़रिश्तों को भेज दिया जाता है, ताकि बिना कोई मुहलत दिए हुए पूरी क़ौम को तबाह-बर्बाद कर दिया जाए। 

9: क़यामत तक के लिए क़ुरआन आख़िरी आसमानी किताब है, और इसकी हिफ़ाज़त का ज़िम्मा ख़ुद अल्लाह ने लिया है। अल्लाह ने इसकी हिफ़ाज़त इस तरह की है कि यह छोटे-छोटे बच्चों को याद हो जाती है, और पूरी दुनिया में लाखों लोग हैं जिन्हें पूरी किताब याद है, इस तरह, इसमें मामूली फेरबदल भी मुमकिन नहीं है।

 17: देखें सूरह जिन्न (72: 8-9)  

 18: शैतान आसमान के ऊपर जाकर ऊपर की दुनिया की ख़बरें लेना चाहते हैं, ताकि वह ख़बरें काहिनों [तांत्रिकों] और भविष्यवक्ताओं [नजूमियों] तक पहुँचाएं, और उनके द्वारा वे लोगों को यह बताएं कि उन्हें छिपी हुई बातें भी मालूम होती हैं। लेकिन आसमान में उनके घुसने पर रोक लगी हुई है, वैसे ये शैतान आसमान के क़रीब जाकर चोरी-छिपे फ़रिश्तों की बातें सुनने की कोशिश करते थे, और वहाँ से कोई बात कान में पड़ जाती, तो उसमें नमक-मिर्च लगाकर काहिनों को बता देते थे। लेकिन मुहम्मद (सल्ल.) के दुनिया में आने के बाद जब कभी शैतान आसमान के नज़दीक जाने की कोशिश करते हैं, तो एक शोला उनका पीछा करता हुआ उन्हें मार भगाता है। देखें सूरह जिन्न. 

26: इंसान का मतलब यहाँ पर आदम (अलै.) की रचना से है, देखें सूरह बक़रा (2: 30-34) 

 27: जिन्नों में सबसे पहले जिस जिन्न को पैदा किया गया, उसका नाम जान था। 

38: शैतान को जो मुहलत दी गयी है, वह शायद पहली बार नरसिंघे [सूर] में फूँक मारने तक दी गई है, जिसके बाद शैतान समेत सारे जीवों को मौत आ जाएगी। 

42: असल बंदे वे होंगे जो अल्लाह के हुक्म पर चलने का पक्का इरादा रखते हैं, और उसी से मदद माँगते हैं, उनकी नेकी और अल्लाह की सच्ची भक्ति उन्हें बहकने से बचा लेगी। 

 52: मेहमानों के लिए इबराहीम (अलै.) ने भुना गोश्त पेश किया, जब उन्होंने देखा कि वे खा नहीं रहे, तो उन्हें लगा कि ये कोई दुश्मन हैं, और ज़रूर किसी बुरे इरादे से आए हैं। देखें सूरह हूद (11: 69-83) 

62: लूत (अलै.) की क़ौम के मर्द सेक्स के लिए दूसरे मर्दों के पास जाते थे, यानी [Homo-sexual] थे, और वे अपने यहाँ आए हुए अजनबियों को भी नहीं छोड़ते थे। देखें सूरह अ'राफ़ [7: 80] 

 67: ये फ़रिश्ते ख़ूबसूरत नौजवान की शक्ल में आए थे, और उन्हें वहां के लोगों ने देख लिया था, इसलिए वे ख़ुशी मनाते हुए अपनी हवस पूरी करने के लिए आए थे।

 76: लूत अलै के क़ौम की बस्तियां जॉर्डन (Jordan) में मृत सागर (Dead Sea) के आसपास के इलाकों में फैली हुई थी, और उनके खंडहर अरब से सीरिया जाते समय व्यापारिक मार्ग पर ही पड़ते थे।

78: "ऐका" यानी घना जंगल, हज़रत शोएब (अलै.) की क़ौम घने जंगल के पास रहती थी। कुछ लोग कहते हैं कि इस बस्ती का नाम मदयन था, जोकि जार्डन में है, और यह भी सीरिया जाने के रास्ते में पड़ता था।  कुछ लोग इसे कोई दूसरी बस्ती बताते हैं। इनका वर्णन सूरह आराफ़ (7:85-93) में थोड़े विस्तार से आया है। देखें 26: 176-191; 38: 13; 50: 14

 80: "हिज्र" यानी "पत्थर का शहर", जो कि मदीने के उत्तर में था, और जार्डन के पेट्रा जैसा होगा, यह समूद के क़ौम की उन बस्तियों का नाम था जिनके पास हज़रत सालेह (अलै.) को पैग़म्बर बनाकर भेजा गया था, इसका वर्णन भी सूरह आराफ़ (7: 73-79) में आया है। 

 85: इस कायनात को पैदा करने का असल मक़सद यह है कि नेक लोगों को परलोक [आख़िरत] में इनाम दिया जाए, और बुरे कर्म करने वालों को सज़ा दी जाए, अत: मुहम्मद (सल्ल.) को यहाँ तसल्ली दी जा रही है कि आप इन विश्वास न करने वालों के कर्मों के लिए ज़िम्मेदार नहीं हैं, बल्कि उनका फ़ैसला ख़ुद अल्लाह करेगा। .... ध्यान देने की बात यह है कि मक्का के लोगों द्वारा तकलीफ़े पहुँचाने के बावजूद उनसे बदला न लेते हुए उनसे अच्छा व्य्वहार और बर्दाश्त करने को कहा गया है। 

87: "सात आयतों" का मतलब "सूरह फ़ातिहा" है जो हर नमाज़ में बार-बार दोहरायी जाती है, यहाँ उसके ज़िक्र का मतलब शायद यह है कि मुसीबत और तकलीफ़ में हमेशा अल्लाह से ही मदद माँगनी चाहिए और सीधे रास्ते पर चलते रहने की दुआ करनी चाहिए। 

 90: मक्का के विश्वास न करने वालों ने अपने कुछ समूह बना रखे थे जो कि मक्का में आने वाले तीर्थ-यात्रियों [हाजियों] को क़ुरआन और मुहम्मद (सल्ल) के ख़िलाफ़ भड़काते रहते थे। 

 91: मक्का के कुछ लोग क़ुरआन के बारे में तरह-तरह की झूठी बातें कहते थे, जैसे कि यह जादू है, या शायरी है, या पुराने ज़माने की कहानियाँ है आदि। कुछ लोग इसकी कुछ बातों को मान लेते थे और कुछ बातों को अपनी मर्ज़ी से नहीं मानते थे, इसे ही क़ुरआन को बुरा-भला [Abuse] कहना कहा गया है।  

94: कहा जाता है कि इस आयत के बाद मुहम्मद (सल्ल.) लोगों के सामने अल्लाह का संदेश खुले-आम पहुँचाने लगे, इससे पहले तक वह लोगों से अलग-अलग बातें करते थे। 




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