01 : क़ुरआन की आयतें
02-05: सज़ा मिलना तय है
06-15: रसूलों का हमेशा लोगों ने मज़ाक़ उड़ाया है
16-25: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ
26-27: इंसानों और जिन्नों को पैदा किया जाना
28-48: इबलीस [शितान] की कहानी
49-60: इबराहीम (अलै) और उनके मेहमानों का क़िस्सा
61-77: लूत (अलै) और उनकी क़ौम की कहानी
78-84: जंगलों में रहने वाले, और पत्थर के शहर में बसने वाले लोग
85-86: फ़ैसले की घड़ी का आना तय है
87-99: रसूल का उत्साह बढ़ाया गया
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
(इसी तरह) जंगलों में रहनेवाले [ऐका यानी मदयन के क़बीले के लोग] भी अत्याचारी थे, (78)
3: विश्वास न करने
वाले दुनिया की ज़िंदगी में मगन रहते हैं, जबकि मुसलमान दुनिया में रहता ज़रूर है और इसमें
अल्लाह की नेमतों से फ़ायदा भी उठाता है, मगर इस दुनिया को अपनी ज़िंदगी का मक़सद नहीं
बनाता, बल्कि उसे परलोक
[आख़िरत] की भलाई के लिए इस्तेमाल करता है।
8: जिस क़ौम के पास रसूल भेजे जाते हैं और जब वह क़ौम अल्लाह के संदेशों को मानने से इंकार कर देती है और आदेश तोड़ने में हदें पार कर जाती है, तब फ़रिश्तों को भेज दिया जाता है, ताकि बिना कोई मुहलत दिए हुए पूरी क़ौम को तबाह-बर्बाद कर दिया जाए।
9: क़यामत तक के लिए क़ुरआन आख़िरी आसमानी किताब है, और इसकी हिफ़ाज़त का ज़िम्मा ख़ुद अल्लाह ने लिया है। अल्लाह ने इसकी हिफ़ाज़त इस तरह की है कि यह छोटे-छोटे बच्चों को याद हो जाती है, और पूरी दुनिया में लाखों लोग हैं जिन्हें पूरी किताब याद है, इस तरह, इसमें मामूली फेरबदल भी मुमकिन नहीं है।
17: देखें सूरह जिन्न (72: 8-9)
18: शैतान आसमान के ऊपर जाकर ऊपर की दुनिया की ख़बरें लेना चाहते हैं, ताकि वह ख़बरें काहिनों [तांत्रिकों] और भविष्यवक्ताओं [नजूमियों] तक पहुँचाएं, और उनके द्वारा वे लोगों को यह बताएं कि उन्हें छिपी हुई बातें भी मालूम होती हैं। लेकिन आसमान में उनके घुसने पर रोक लगी हुई है, वैसे ये शैतान आसमान के क़रीब जाकर चोरी-छिपे फ़रिश्तों की बातें सुनने की कोशिश करते थे, और वहाँ से कोई बात कान में पड़ जाती, तो उसमें नमक-मिर्च लगाकर काहिनों को बता देते थे। लेकिन मुहम्मद (सल्ल.) के दुनिया में आने के बाद जब कभी शैतान आसमान के नज़दीक जाने की कोशिश करते हैं, तो एक शोला उनका पीछा करता हुआ उन्हें मार भगाता है। देखें सूरह जिन्न.
26: इंसान का मतलब यहाँ पर आदम (अलै.) की रचना से है, देखें सूरह बक़रा (2: 30-34)
27: जिन्नों में सबसे पहले जिस जिन्न को पैदा किया गया, उसका नाम जान था।
38: शैतान को जो मुहलत दी गयी है, वह शायद पहली बार नरसिंघे [सूर] में फूँक मारने तक दी गई है, जिसके बाद शैतान समेत सारे जीवों को मौत आ जाएगी।
42: असल बंदे वे होंगे जो अल्लाह के हुक्म पर चलने का पक्का इरादा रखते हैं, और उसी से मदद माँगते हैं, उनकी नेकी और अल्लाह की सच्ची भक्ति उन्हें बहकने से बचा लेगी।
52: मेहमानों के लिए इबराहीम (अलै.) ने भुना गोश्त पेश किया, जब उन्होंने देखा कि वे खा नहीं रहे, तो उन्हें लगा कि ये कोई दुश्मन हैं, और ज़रूर किसी बुरे इरादे से आए हैं। देखें सूरह हूद (11: 69-83)
62: लूत (अलै.) की क़ौम के मर्द सेक्स के लिए दूसरे मर्दों के पास जाते थे, यानी [Homo-sexual] थे, और वे अपने यहाँ आए हुए अजनबियों को भी नहीं छोड़ते थे। देखें सूरह अ'राफ़ [7: 80]
67: ये फ़रिश्ते ख़ूबसूरत नौजवान की शक्ल में आए थे, और उन्हें वहां के लोगों ने देख लिया था, इसलिए वे ख़ुशी मनाते हुए अपनी हवस पूरी करने के लिए आए थे।
76: लूत अलै के क़ौम की बस्तियां जॉर्डन (Jordan) में मृत सागर (Dead Sea) के आसपास के इलाकों में फैली हुई थी, और उनके खंडहर अरब से सीरिया जाते समय व्यापारिक मार्ग पर ही पड़ते थे।
78: "ऐका" यानी घना जंगल, हज़रत शोएब (अलै.) की क़ौम घने जंगल के पास रहती थी। कुछ लोग कहते हैं कि इस बस्ती का नाम मदयन था, जोकि जार्डन में है, और यह भी सीरिया जाने के रास्ते में पड़ता था। कुछ लोग इसे कोई दूसरी बस्ती बताते हैं। इनका वर्णन सूरह आराफ़ (7:85-93) में थोड़े विस्तार से आया है। देखें 26: 176-191; 38: 13; 50: 14
80: "हिज्र" यानी "पत्थर का शहर", जो कि मदीने के उत्तर में था, और जार्डन के पेट्रा जैसा होगा, यह समूद के क़ौम की उन बस्तियों का नाम था जिनके पास हज़रत सालेह (अलै.) को पैग़म्बर बनाकर भेजा गया था, इसका वर्णन भी सूरह आराफ़ (7: 73-79) में आया है।
85: इस कायनात को पैदा करने का असल मक़सद यह है कि नेक लोगों को परलोक [आख़िरत] में इनाम दिया जाए, और बुरे कर्म करने वालों को सज़ा दी जाए, अत: मुहम्मद (सल्ल.) को यहाँ तसल्ली दी जा रही है कि आप इन विश्वास न करने वालों के कर्मों के लिए ज़िम्मेदार नहीं हैं, बल्कि उनका फ़ैसला ख़ुद अल्लाह करेगा। .... ध्यान देने की बात यह है कि मक्का के लोगों द्वारा तकलीफ़े पहुँचाने के बावजूद उनसे बदला न लेते हुए उनसे अच्छा व्य्वहार और बर्दाश्त करने को कहा गया है।
87: "सात आयतों" का मतलब "सूरह फ़ातिहा" है जो हर नमाज़ में बार-बार दोहरायी जाती है, यहाँ उसके ज़िक्र का मतलब शायद यह है कि मुसीबत और तकलीफ़ में हमेशा अल्लाह से ही मदद माँगनी चाहिए और सीधे रास्ते पर चलते रहने की दुआ करनी चाहिए।
90: मक्का के विश्वास न करने वालों ने अपने कुछ समूह बना रखे थे जो कि मक्का में आने वाले तीर्थ-यात्रियों [हाजियों] को क़ुरआन और मुहम्मद (सल्ल) के ख़िलाफ़ भड़काते रहते थे।
91: मक्का के कुछ लोग क़ुरआन के बारे में तरह-तरह की झूठी बातें कहते थे, जैसे कि यह जादू है, या शायरी है, या पुराने ज़माने की कहानियाँ है आदि। कुछ लोग इसकी कुछ बातों को मान लेते थे और कुछ बातों को अपनी मर्ज़ी से नहीं मानते थे, इसे ही क़ुरआन को बुरा-भला [Abuse] कहना कहा गया है।
94: कहा जाता है कि इस आयत के बाद मुहम्मद (सल्ल.) लोगों के सामने अल्लाह का संदेश खुले-आम पहुँचाने लगे, इससे पहले तक वह लोगों से अलग-अलग बातें करते थे।
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