1: अल्लाह की महानता
2-4: किताबवाले (यहूदियों) को देश-निकाला
5-10: यहूदियों को देश से निकाले जाने के नतीजे में हाथ आ गए माल का बटवारा
11-17: पाखंडी [मुनाफ़िक़] लोग बुज़दिल हैं
18-21: लोगों को अल्लाह से डरने की नसीहत
22-24: अल्लाह की महानता
2: मदीना में यहूदियों की बड़ी आबादी थी, उनके एक क़बीले बनु नज़ीर के साथ मुहम्मद (सल्ल) ने एक संधि कर ली थी कि मदीना में हमला होने की सूरत में एकसाथ मिलकर उसकी रक्षा करेंगे या कम से कम विरोधियों के साथ मिलकर नहीं लड़ेंगे। इसके बावजूद, मक्का के हाथों उहुद की जंग में हार के बाद भी यहूदियों ने मक्का के लोगों के साथ मिलकर मदीना के मुसलमानों के ख़िलाफ़ साज़िशें करनी शुरू की, और उनसे यह वादा कर लिया कि अगर वे लोग मदीना पर हमला करें तो वे उनका साथ देंगे। इसके अलावा, मुहम्मद (सल्ल) बनु नज़ीर क़बीले के पास संधि की कुछ शर्तों पर अमल कराने के लिए बातचीत करने गए, तो उन लोगों ने उन्हें मार देने की साज़िश रची, जिसका उन्हें पता चल गया और वह वहाँ से बच निकले। इस घटना के बाद आपने बनु नज़ीर क़बीले के साथ संधि समाप्त करने का संदेश भेज दिया और उन्हें कुछ समय दे दिया जिसके अंदर उन्हें मदीना छोड़कर चले जाने का हुक्म दिया गया, अन्यथा मुसलमान उन पर हमला करने के लिए आज़ाद होंगे। इधर कुछ पाखंडियों [मुनाफिक़] ने जाकर बनु नज़ीर को यक़ीन दिलाया कि आप लोग डटे रहें, अगर मुसलमानों ने हमला किया, तो वे आप लोगों का साथ देंगे। बनु नज़ीर की तरफ़ से बार-बार संधि की शर्तों को तोड़ने के कारण मुसलमानों ने बनु नज़ीर के क़िले की घेराबंदी कर दी (4 हिजरी/626 ई.)। जब बनु नज़ीर ने कहीं से कोई मदद आती नहीं देखी तो हथियार डाल दिए, उनसे कहा गया कि हथियार छोड़कर वे अपनी सारी दौलत अपने साथ ले जा सकते हैं। अत: वे लोग अपने घरों के दरवाज़े तक उखाड़कर वहाँ से ले गए, और जाकर सीरिया और ख़ैबर में बस गए।
6: बनु नज़ीर के मदीने से चले जाने के बाद उनकी ज़मीनें, खजूरों के बाग़ और मकान आदि जो हाथ आ गए, वह असल में बिना युद्ध लड़े ही हासिल हो गए थे।
12: जब बनु नज़ीर के क़िले की घेराबंदी की गई तो कोई पाखंडी [मुनाफिक़] उनकी मदद को नहीं आया।
15: इससे पहले एक और यहूदी क़बीला "बनु क़ैनूक़ा" था, उसने भी मुसलमानों के साथ शांति समझौता किया था, मगर फिर ख़ुद ही लड़ाई मोल ले ली, और हार जाने के बाद देश से निकाले गए।
16: शैतान की यह आदत है कि शुरू में वह आदमी को गुनाह पर उकसाता है,
जब उसके नतीजे में बात मानने वाले आदमी को कोई तकलीफ़ उठानी पड़्ती है, तो फिर वह उनसे अलग हो जाता है। आख़िरत में तो वह काफ़िरों की ज़िम्मेदारी लेने से साफ मुकर
जाएगा, जैसा कि सूरह इबराहीम (14: 22) में आया है। इसी तरह, पाखंडी लोग शुरू में यहूदियों को मुसलमानों के ख़िलाफ़ उकसाते रहे, मगर जब समय आया, तो साफ़ मुकर गए।
19: अल्लाह को भूल बैठने के नतीजे में वह ऐसे हो जाते हैं कि वह इस बात की कोई परवाह नहीं करते कि ख़ुद उनकी जानों के लिए कौन सी बात फ़ायदे की है और कौन सी बात नुक़सान की। वह इस तरह अपने आपको भूलकर वही काम करने लगते हैं जो उन्हें तबाही की तरफ़ ले जाने वाले हैं।
24: इस आयत में अल्लाह के बहुत से नाम बताए गए हैं। यहाँ उनका अनुवाद दिया गया है। मुहम्मद (सल्ल) ने अल्लाह के निन्यानवे नाम बताए हैं जिन्हें असमा ए हसना [ख़ूबसूरत नाम] बताया गया है।