Sunday, March 25, 2018

सूरह 59 : अल हश्र [फ़ौजों का जमा होना/The Gathering (of forces)]



सूरह 59: अल हश्र 
 [फ़ौजों का जमा होना/The Gathering (of forces)]


   1:  अल्लाह की महानता

  2-4:  किताबवाले (यहूदियों) को देश-निकाला

 5-10:  यहूदियों को देश से निकाले जाने के नतीजे में हाथ आ गए माल का बटवारा 

11-17: पाखंडी [मुनाफ़िक़] लोग बुज़दिल हैं

18-21: लोगों को अल्लाह से डरने की नसीहत 

22-24: अल्लाह की महानता


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है


आसमानों और ज़मीन की हर चीज़ अल्लाह की तारीफ़ बयान करती है; और वह बेहद ताक़तवाला, समझ-बूझवाला [wise] है। (1)

वही है जिसने उन किताबवाले [यहूदी] लोगों में से जिन [बनू-नज़ीर के क़बीले के] लोगों ने विश्वास तोड़ा था, उनको उस समय घरों से निकाल बाहर किया, जब पहली बार (मुस्लिम फ़ौज) वहाँ (मदीने में) जमा हुई थी-----[ऐ ईमानवालो!] तुमने कभी सोचा भी न था कि वे (वहाँ से) चले जाएंगे, और वे ख़ुद भी यही समझते थे कि उनके मज़बूत क़िले उन्हें अल्लाह (की पकड़) से बचा लेंगे। मगर अल्लाह (की यातना) ने उन्हें ऐसी जगह से आ लिया जिसके बारे में उन्हें ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था और फिर उनके दिलों में डर बैठा दिया: (नतीजा यह हुआ कि) उनके घर ख़ुद उनके ही हाथों, और ईमानवालों के हाथों बर्बाद हो गए। अतः तुम सब जो नज़र रखते हो, सबक़ सीखो इस (घटना) से!  (2)

अगर अल्लाह ने उनकी क़िस्मत में (पहले ही) देश निकाला न लिख दिया होता, तो उन्हें इस दुनिया में (और भी दर्दनाक) यातना देता। आख़िरत [परलोक] में उनके लिए आग की यातना होगी, (3)

यह इसलिए कि उन्होंने ख़ुद अपने आपको अल्लाह और उसके रसूल के विरोध में खड़ा कर लिया: जिस किसी ने अल्लाह का विरोध करने की ठान ली, तो निश्चय ही अल्लाह सज़ा देने में बहुत सख़्त है। (4)


[ईमानवालो! बनू नज़ीर के यहाँ घेरा डालने के दौरान] जो कुछ भी तुमने (उनके) खजूर के पेड़ों के साथ किया----चाहे उन्हें काट डाला या उन्हें जड़ों पर खड़ा रहने दिया-----यह सब तो अल्लाह की मर्ज़ी से ही हुआ, ताकि जिन लोगों ने उसकी आज्ञा मानने से इंकार किया, उन्हें बेइज़्ज़त कर सके। (5)

जो कुछ भी माल (बनू-नज़ीर के लोगों के वहाँ से चले जाने पर) हाथ आ गया, वह तो अल्लाह ने उनसे लेकर अपने रसूल को दिलवा दिया, उसको पाने के लिए [ऐ ईमानवालो!], न तो तुम्हें अपने घोड़े दौड़ाने पड़े और न अपने ऊँट। अल्लाह जिस किसी पर चाहता है, उस पर अपने रसूलों को अधिकार [Authority] प्रदान कर देता है: अल्लाह को सारी चीज़ों की सामर्थ्य प्राप्त है। (6)

जो कुछ माल बस्तीवालों (के वहाँ से चले जाने) से हाथ आ गया, जिसे अल्लाह ने अपने रसूल को दिलवाया, उस पर अधिकार है अल्लाह का, उसके रसूल का, (ग़रीब) नातेदारों का, अनाथों का, ज़रूरतमंदों का और ग़रीब मुसाफ़िरों का ----- यह इसलिए ताकि वह (माल) केवल उन्हीं लोगों में न घूमता रहे, जो तुम में से अमीर हैं ---- अत: तुम्हारे  रसूल जो कुछ तुम्हें दे दें, उसे स्वीकार कर लो, और जिस चीज़ से तुम्हें मना कर दें, उससे रुक जाओ। और अल्लाह से डरते रहो: अल्लाह दंड देने में बहुत कठोर है। (7)


(इस माल के हक़दार) वे ग़रीब मुहाजिर [प्रवासी/emigrant] भी हैं, जो (मक्का से) अपने घरों और अपनी जायदादों से निकाल बाहर किए गए, जो अल्लाह की मेहरबानी और उसकी मंज़ूरी चाहते हैं, वे लोग जिन्होंने अल्लाह और उसके रसूल की मदद की---- यही लोग हैं जो सच्चे हैं। (8)

वे लोग [अंसार] (भी हक़दार हैं) जो पहले से ही (मदीना में) पक्के ईमान के साथ, अपने घरों में मज़बूती से जमे हुए थे, वे उन लोगों से मुहब्बत करते हैं जिन्होंने (मक्का से) हिजरत करके वहाँ पनाह ले ली है, और जो कुछ भी उन (मुहाजिरों) को दिया जाता है, वे अपने दिलों में उसे (पाने की) कोई इच्छा नहीं रखते। (बल्कि) वे उन [मुहाजिरों] को अपने मुक़ाबले में वरीयता [Preference] देते हैं, हालाँकि वे ख़ुद ही बहुत ग़रीब हैं: जो लोग अपने मन के लोभ से बचे रहे, वही असल में कामयाब हैं।  (9)

और (इस माल में उनका भी हिस्सा है) जो लोग उन [अंसार व मुहाजिर] के बाद आए, वे कहते हैं, "ऐ हमारे रब! हमारे गुनाहों को माफ़ कर दे और हमारे उन भाइयों के गुनाहों को भी माफ़ कर दे जिन्होंने हम से पहले (सच्चाई पर) विश्वास कर लिया था, और हमारे दिलों में विश्वास [ईमान] रखनेवालों के प्रति कोई बुरी भावना [malice] न रख। ऐ रब! तू सचमुच बड़ा करुणामय, बेहद दया करनेवाला है।" (10)


[ऐ रसूल!] क्या आप ने उन पाखंड करनेवाले [मुनाफ़िक़/Hypocrites] लोगों को नहीं देखा, जो अपने उन किताबवाले साथियों से कहते हैं जो ईमान से ख़ाली हैं, कि "अगर तुम्हें यहाँ से निकाला गया, तो हम भी तुम्हारे साथ निकल जाएँगे----- हम ऐसे आदमी की कभी कोई बात नहीं सुनेंगे, जो तुम्हें नुक़सान पहुँचाना चाहेगा-----और अगर तुम पर हमला होता है, तो हम ज़रूर तुम्हारी मदद को आएंगे?" अल्लाह गवाही देता है कि वे बिल्कुल झूठे हैं: (11)
अगर वे बाहर निकाले गए, तो ये (पाखंडी) लोग कभी उनके साथ नहीं निकलेंगे; अगर उन पर हमला हो, तो ये कभी उनकी मदद के लिए नहीं आएंगे। और अगर कभी ये उनकी मदद के लिए आए भी, तो जल्द ही दुम दबाकर भाग खड़े होंगे----- अंत में उन्हें कोई मदद नहीं मिलने वाली।  (12)
उनके दिलों में [ऐ ईमानवालो] अल्लाह से ज़्यादा, तुम्हारा डर समाया हुआ है क्योंकि ये ऐसे लोग हैं जिनमें समझदारी बिल्कुल नहीं है। (13)
यहाँ तक कि अगर वे एकजुट हों, तब भी वे तुमसे कभी जंग नहीं करेंगे, और अगर कभी लड़ें भी, तो मज़बूत क़िले के अंदर से या ऊँची दीवारों के पीछ से (लड़ेंगे)। उनकी आपस में सख़्त लड़ाई है: तुम सोचते होगे कि वे एकजुट हैं, मगर उनके दिल टुकड़ों में बँटे हुए हैं, और यह इसलिए है कि ये ऐसे लोग है जो बुद्धि से काम नहीं लेते। (14)
इनकी हालत उन्हीं लोगों [बनू क़ैनूक़ा] जैसी है, जो उनसे ठीक पहले (वहाँ से बाहर निकाले) गए थे, वे अपने कर्मों के वबाल का मज़ा चख चुके हैं, और (आख़िरत में) एक दर्दनाक सज़ा उनके इंतज़ार में है। (15)
इन (पाखंडियों) की मिसाल शैतान जैसी है जो आदमी से कहता है, "(सच्चाई पर) ईमान [विश्वास] मत रखो!" मगर फिर, जब आदमी कुफ़्र [विश्वास करने से इंकार] कर देता है, तो शैतान कह देता है, "मैं तुम से अलग होता हूँ; मैं अल्लाह से डरता हूँ, जो सारे संसार का रब है।" (16)
उन दोनों को अंत में (जहन्नम की) आग में जाना है, जहाँ वे हमेशा रहेंगे। शैतानियाँ करनेवालों का यही बदला है।  (17)


ऐ ईमानवालो! अल्लाह से डरते रहो, और हर आदमी को यह बात ध्यान से सोचना चाहिए कि उसने कल (क़यामत के दिन] के लिए क्या (पुण्य) आगे भेजा है; अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से बचते रहो, क्योंकि वह सारी चीज़ें जो तुम करते हो, अल्लाह उन्हें अच्छी तरह जानता है। (18)
और (देखो!) उन लोगों की तरह न हो जाना जो अल्लाह को भूल जाते हैं, अत: अल्लाह उन्हें ऐसा कर देता कि वे स्वयं अपनी जानों को भुला बैठते हैं: यही वे लोग हैं जो आज्ञा न माननेवाले, बाग़ी [rebellious] हैं-----(19)
(जहन्नम की) आग में रहने वालों और (जन्नत के) बाग़ में रहने वालों के बीच कोई तुलना हो ही नहीं सकती है----- और बाग़ [जन्नत] में रहनेवाले ही कामयाब लोग हैं। (20)
अगर हमने इस क़ुरआन को किसी पहाड़ पर उतारा होता, तो [ऐ रसूल] आप देखते कि वह अल्लाह के दबदबे व डर से झुक जाता और टूट-फूट जाता: हम ये मिसालें लोगों के सामने इसलिए पेश करते हैं ताकि वे इस पर सोच-विचार कर सकें। (21)


वही अल्लाह है: उसके सिवा (पूजने के लायक़) कोई ख़ुदा नहीं। वही है जो छिपी हुई चीज़ों को भी जानता है, और सामने दिखाई देनेवाली चीज़ों को भी जानता है, वह सब पर मेहरबान है, बेहद दया करने वाला है। (22)
वही अल्लाह है: उसके सिवा (पूजने के लायक़) कोई ख़ुदा नहीं, वह बादशाह [नियंत्रक] है, बेहद पवित्र है, शांति (सुकून) देनेवाला, सुरक्षा देनेवाला, सबकी देखरेख करनेवाला, बेहद ताक़तवाला, गड़बड़ी को ठीक करनेवाला, सचमुच बहुत बड़ाईवाला है; अल्लाह उन चीज़ों से कहीं महान और ऊँचा है जिन्हें वे (अल्लाह का) साझेदार [Partner] ठहराते हैं।  (23)
वही अल्लाह है: (हर चीज़ का) पैदा करनेवाला, अस्तित्व देनेवाला, रूप देनेवाला। सब अच्छे नाम उसी के हैं। आसमानों और ज़मीन की हर चीज़ उसकी बड़ाई बयान करती है: वह बेहद ताक़तवाला, बहुत समझ-बूझवाला है।  (24)


नोट:

2: मदीना में यहूदियों की बड़ी आबादी थी, उनके एक क़बीले बनु नज़ीर के साथ मुहम्मद (सल्ल) ने एक संधि कर ली थी कि मदीना में हमला होने की सूरत में एकसाथ मिलकर उसकी रक्षा करेंगे या कम से कम विरोधियों के साथ मिलकर नहीं लड़ेंगे। इसके बावजूद, मक्का के हाथों उहुद की जंग में हार के बाद भी यहूदियों ने मक्का के लोगों के साथ मिलकर मदीना के मुसलमानों के ख़िलाफ़ साज़िशें करनी शुरू की, और उनसे यह वादा कर लिया कि अगर वे लोग मदीना पर हमला करें तो वे उनका साथ देंगे। इसके अलावा, मुहम्मद (सल्ल) बनु नज़ीर क़बीले के पास संधि की कुछ शर्तों पर अमल कराने के लिए बातचीत करने गए, तो उन लोगों ने उन्हें मार देने की साज़िश रची, जिसका उन्हें पता चल गया और वह वहाँ से बच निकले। इस घटना के बाद आपने बनु नज़ीर क़बीले के साथ संधि समाप्त करने का संदेश भेज दिया और उन्हें कुछ समय दे दिया जिसके अंदर उन्हें मदीना छोड़कर चले जाने का हुक्म दिया गया, अन्यथा मुसलमान उन पर हमला करने के लिए आज़ाद होंगे। इधर कुछ पाखंडियों [मुनाफिक़] ने जाकर बनु नज़ीर को यक़ीन दिलाया कि आप लोग डटे रहें, अगर मुसलमानों ने हमला किया, तो वे आप लोगों का साथ देंगे। बनु नज़ीर की तरफ़ से बार-बार संधि की शर्तों को तोड़ने के कारण मुसलमानों ने बनु नज़ीर के क़िले की घेराबंदी कर दी (4 हिजरी/626 ई.)। जब बनु नज़ीर ने कहीं से कोई मदद आती नहीं देखी तो हथियार डाल दिए, उनसे कहा गया कि हथियार छोड़कर वे अपनी सारी दौलत अपने साथ ले जा सकते हैं। अत: वे लोग अपने घरों के दरवाज़े तक उखाड़कर वहाँ से ले गए, और जाकर सीरिया और ख़ैबर में बस गए।  

6: बनु नज़ीर के मदीने से चले जाने के बाद उनकी ज़मीनें, खजूरों के बाग़ और मकान आदि जो हाथ आ गए, वह असल में बिना युद्ध लड़े ही हासिल हो गए थे। 

12: जब बनु नज़ीर के क़िले की घेराबंदी की गई तो कोई पाखंडी [मुनाफिक़] उनकी मदद को नहीं आया। 

15: इससे पहले एक और यहूदी क़बीला "बनु क़ैनूक़ा" था, उसने भी मुसलमानों के साथ शांति समझौता किया था, मगर फिर ख़ुद ही लड़ाई मोल ले ली, और हार जाने के बाद देश से निकाले गए। 

16: शैतान की यह आदत है कि शुरू में वह आदमी को गुनाह पर उकसाता है, जब उसके नतीजे में बात मानने वाले आदमी को कोई तकलीफ़ उठानी पड़्ती है, तो फिर वह उनसे अलग हो जाता है। आख़िरत में तो वह काफ़िरों की ज़िम्मेदारी लेने से साफ मुकर जाएगा, जैसा कि सूरह इबराहीम (14: 22) में आया है। इसी तरह, पाखंडी लोग शुरू में  यहूदियों को मुसलमानों के ख़िलाफ़ उकसाते रहे, मगर जब समय आया, तो साफ़ मुकर गए। 

19: अल्लाह को भूल बैठने के नतीजे में वह ऐसे हो जाते हैं कि वह इस बात की कोई परवाह नहीं करते कि ख़ुद उनकी जानों के लिए कौन सी बात फ़ायदे की है और कौन सी बात नुक़सान की। वह इस तरह अपने आपको भूलकर वही काम करने लगते हैं जो उन्हें तबाही की तरफ़ ले जाने वाले हैं।

24: इस आयत में अल्लाह के बहुत से नाम बताए गए हैं। यहाँ उनका अनुवाद दिया गया है। मुहम्मद (सल्ल) ने अल्लाह के निन्यानवे नाम बताए हैं जिन्हें असमा ए हसना [ख़ूबसूरत नाम] बताया गया है। 


सूरह 58 : अल- मुजादिला [बहस करनेवाली/ She Who Disputes]

   सूरह 58: अल- मुजादिला [बहस करनेवाली/ She Who Disputes]


01-04: बीवियों से बेवजह अलग हो जाने का मसला तय 

05-06: अल्लाह के रसूल का विरोध करना बेकार है

07-10: ऐसी कोई चीज़ नहीं जो अल्लाह की नज़र से बच सके

11   : रसूल की मजलिस में सही आचरण का तरीक़ा 

12-13: रसूल के साथ अकेले में मिलने की शर्तें 

14-21: विरोधियों की हार हो जाएगी

22   : विरोधियों के साथ कोई रिश्ता न रखें


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
[ऐ रसूल!] अल्लाह ने उस औरत की बात सुन ली है जो अपने पति के बारे में आपसे बहस कर रही थी और अल्लाह से शिकायत कर रही थी: अल्लाह ने (इस बारे में) आप दोनों का कहना सुना। अल्लाह सब कुछ सुननेवाला, सब कुछ देखनेवाला है। (1)
तुममें से कोई अगर अपनी बीवियों से यह कह भी देता है कि, "तुम मेरे लिए मेरी माँ की पीठ जैसी हो", तो वे उनकी माएँ तो नहीं हो जाएंगी; उनकी माएँ तो वही हैं जिन्होंने उनको जन्म दिया है। जो कुछ वे कहते हैं, वह सचमुच अनुचित और झूठ है, मगर अल्लाह (ग़लतियों को) टाल जाने वाला और (गुनाहों को) माफ़ करने वाला है। (2)
तुममें से जो लोग अपनी बीवियों से ऐसी बात कह देते हैं, फिर कहकर अगर अपनी बात से टल जाते हैं, तो इससे पहले कि दोनों [मियाँ-बीवी] एक-दूसरे को फिर से हाथ लगाएँ, उन्हें एक ग़ुलाम को आज़ाद करना चाहिए---- यह है वह बात जिसका तुम्हें हुक्म दिया जाता है, और जो कुछ तुम करते हो, अल्लाह उसकी पूरी ख़बर रखता है------ (3)
लेकिन जिस किसी के पास (ग़ुलाम आज़ाद करने का) साधन न हो, तो इससे पहले कि वे दोनों एक-दूसरे को हाथ लगाएँ, उसे लगातार दो महीने रोज़ा रखना चाहिए, और अगर कोई यह भी न कर सके, तो उसको चाहिए कि साठ ज़रूरतमंद लोगों को खाना खिलाए। ऐसा इसलिए है ताकि तुम सचमुच अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान रख सको। ये अल्लाह की तय की हुई सीमाएँ है: जो कोई इन्हें नज़रअंदाज़ करेगा, दर्दनाक यातना उसके इंतज़ार में रहेगी।  (4)
जो लोग अल्लाह और उसके रसूल का विरोध करते हैं, वे बेइज़्ज़त होकर रहेंगे, जैसा कि उनसे पहले के लोग हुए थे: हमने साफ़ व स्पष्ट आयतें [संदेश] उतार भेजी हैं, और उन्हें मानने से इंकार करने वालों के लिए अपमानित कर देने वाली यातना होगी,  (5)
उस दिन अल्लाह सबको (दोबारा) उठा खड़ा करेगा और जो कुछ उन्होंने किया होगा, वह उन्हें बता देगा। वे भले ही भूल गए हों, मगर अल्लाह ने (अपने खाते में) हर काम का हिसाब कर रखा है: अल्लाह हर चीज़ का गवाह है। (6)

[ऐ रसूल!] क्या आप नहीं देखते कि आसमानों और ज़मीन की हर चीज़ को अल्लाह जानता है? तीन आदमियों के बीच कोई ख़ुफ़िया बातचीत नहीं हो सकती, क्योंकि वहाँ चौथा वह [अल्लाह] मौजूद होता है, न पाँच आदमियों के बीच गुप्त बातचीत हो सकती है, क्योंकि वहाँ भी छठा वह [अल्लाह] मौजूद होता है, बिना उस [अल्लाह] की मौजूदगी के, चाहे वे कहीं भी हों (कोई ख़ुफ़िया बात नहीं हो सकती),---- न इससे कम आदमियों के बीच और न इससे ज़्यादा के बीच। क़यामत के दिन वह उन्हें दिखा देगा, जो भी उन लोगों ने किया होगा: सचमुच अल्लाह को हर चीज़ की पूरी जानकारी है।  (7)
क्या आपने नहीं देखा कि जिन लोगों को ख़ुफ़िया बैठक करने से रोका गया था, वे लोग वहाँ से जाने के बाद ऐसी बैठकें करते हैं, और एक दूसरे के साथ मिलकर साज़िशें रचते हैं, जो कि गुनाह है, शत्रुतापूर्ण है, और रसूल की आज्ञा को मानने से इंकार करना है? जब वे आपके पास आते हैं तो आपके अभिवादन [Greeting] में ऐसे शब्दों का प्रयोग करते हैं, जिन्हें अल्लाह ने आपके अभिवादन के लिए कभी भी प्रयोग नहीं किया, और अपने मन में कहते हैं, "जो कुछ हम कहते हैं, उसके लिए अल्लाह हमें सज़ा क्यों नहीं देता?" सज़ा के तौर पर उनके लिए जहन्नम ही काफ़ी होगी: वे उसी में जलेंगे--- वह अंतिम पड़ाव की बड़ी बुरी जगह है!  (8)

ऐ ईमानवालो! जब तुम आपस में चुपके-चुपके बातें करो, तो वह (गुप्त बातें) ऐसी न की जाएं जिसमें गुनाह, ज़्यादती और रसूल की आज्ञा न मानने की बातें शामिल हों, बल्कि बातें इस तरीक़े से की जाएं जो नेकी और (अल्लाह का डर रखते हुए) बुराइयों से बचने की बातें हों। अल्लाह से डरो, जिसके पास तुम सबको इकट्ठा किया जाएगा। (9)
(किसी भी दूसरे तरह की) ख़ुफिया बातचीत शैतानी काम है, जिसका मक़सद ईमानवालों को परेशानी में डालना है, हालाँकि अल्लाह की अनुमति के बिना वे उन्हें ज़रा भी नुक़सान नहीं पहुँचा सकते। ईमान रखनेवालों को अल्लाह पर ही भरोसा रखना चाहिए। (10)

ऐ ईमानवालो! मजलिसों में अगर तुमसे कहा जाए कि एक दूसरे (के बैठने) के लिए थोड़ी जगह बनाओ, तो जगह बना दिया करो, अल्लाह तुम्हारे लिए जगह बना देगा, और अगर तुम (बैठे हो, और तुम) से कहा जाए कि उठ जाओ, तो उठ जाया करो: अल्लाह उन लोगों के दर्जों को ऊँचा उठा देगा, जो लोग तुममें से ईमान रखते हैं, और जिन लोगों को ज्ञान दिया गया है: (याद रखो!) जो कुछ तुम करते हो, अल्लाह उसकी पूरी ख़बर रखता है।  (11)
ऐ ईमानवालो! जब तुम अपने रसूल से अकेले में बात करने के लिए आओ, तो बातचीत से पहले, (ग़रीबों को) कुछ दान दे दिया करो: यह तुम्हारे लिए अच्छा और अधिक पवित्र तरीक़ा होगा। हाँ, अगर तुम्हारे पास (देने के लिए) कुछ न हो, तो अल्लाह बहुत माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है। (12)

क्या तुम इस बात से डर गए कि (रसूल के साथ) अकेले में बातचीत से पहले दान देना होगा? चूँकि तुमने दान नहीं दिया, और (फिर भी) अल्लाह ने तुम्हारे प्रति नरम रुख़ अपनाया है, इसलिए (कम से कम) नमाज़ पाबंदी से पढ़ा करो, निर्धारित ज़कात [Prescribed alms] दिया करो, और अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा का पालन करो: जो कुछ भी तुम करते हो अल्लाह उसकी पूरी ख़बर रखता है। (13)

[ऐ रसूल] क्या आपने उन लोगों को नहीं देखा जिनका मेलजोल ऐसे लोगों के साथ है जिन पर अल्लाह का ग़ुस्सा उतरा? वे न तुम्हारे साथ हैं, और न उनके साथ हैं, और वे जानते-बूझते झूठी बात पर क़समें खाते हैं। (14)
अल्लाह ने उनके लिए कठोर यातना तैयार कर रखी है: जो कुछ वे करते हैं, वह सचमुच बहुत बुरा है। (15)
उन्होंने अपनी क़समों का इस्तेमाल (अपने काले कारनामों को) छिपाने के लिए कर रखा है, और दूसरों को अल्लाह के रास्ते से रोका है। एक बेइज़्ज़त कर देनेवाली यातना उनके घात में है-----(16)
अल्लाह के ख़िलाफ़ न उनकी धन-दौलत किसी काम आएगी, और न उनके बाल-बच्चे----- वे जहन्नम (की आग) में रहने वाले हैं, उसी में हमेशा रहेंगे। (17)
उस (क़यामत के) दिन, जब अल्लाह सबको (मुर्दे से) ज़िंदा करके उठाएगा, तो वे अल्लाह के सामने भी क़समें खाने लगेंगे, जिस तरह वे आपके सामने आज क़समें खाते हैं, और समझेंगे कि इससे उन्हें कुछ सहारा मिल जाएगा। कितने बड़े झूठे हैं वे! (18)
शैतान ने उन पर पूरी तरह से अपना क़ब्ज़ा जमा लिया है, और उन्हें ऐसा बना दिया है कि वे अल्लाह की याद को भुला बैठे हैं। वे शैतान के पक्ष [side] में हैं, और शैतान के पक्षवालों की ही हार होगी:   (19)
जो लोग अल्लाह और उसके रसूल का विरोध करते हैं, वे उन लोगों में होंगे जिनकी भारी बेइज़्ज़ती होगी।  (20)
अल्लाह ने लिख दिया है, "मैं अवश्य जीतकर रहूंगा, मैं और मेरे रसूल!" निस्संदेह अल्लाह बेहद ताक़तवाला, बड़ा प्रभुत्वशाली है। (21)

जो लोग अल्लाह और अंतिम दिन [क़यामत] पर सचमुच विश्वास रखते हैं, [ऐ रसूल!] आप उन्हें ऐसा नहीं पाएंगे कि उन लोगों की निष्ठा [Loyalty] ऐसे लोगों के साथ हो, जो अल्लाह और उसके रसूल का विरोध करते हों, भले ही वे उनके अपने बाप हों, बेटे हों, भाई हों, या उनके रिश्तेदार हों: ये वह लोग हैं जिनके दिलों पर अल्लाह ने ईमान अंकित कर दिया है, और अपनी रूह से उन्हें मज़बूती दी है। वह उन्हें (जन्नत के) ऐसे बाग़ों में दाख़िल कर देगा जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी, जहाँ वे हमेशा रहेंगे: अल्लाह उनसे बहुत ख़ुश होगा, और वे अल्लाह से। वे अल्लाह के पक्ष [side] वाले हैं, और अल्लाह के पक्षवाले ही कामयाब होंगे।  (22)



नोट:

1: अरब के बहुदेववादियों [Pagans] के यहाँ एक अजीब परम्परा थी कि वे अपनी बीवियों से यह कहकर अलग हो जाते थे कि "तुम मेरे लिए मेरी माँ की पीठ जैसी हो" जिसे "ज़िहार" कहते थे, जिससे बीवियों के वैवाहिक अधिकार ख़त्म हो जाते थे, यहाँ तक कि वे फिर से शादी भी नहीं कर पाती थीं। सलबा की बेटी ख़ौला के पति ने भी एक बार इसी तरह ग़ुस्से में उसे ज़िहार कर दिया, जब ख़ौला मुहम्मद (सल्ल) से इस मामले के बारे में शिकायत लेकर आयीं, तो आपने भी उससे यही कहा कि तुम अब अपने पति के लिए वैध [हलाल] नहीं हो। फिर वह बार-बार इस बात पर मुहम्मद (सल्ल) से बहस करने लगी कि उसके पति ने उसे तलाक़ तो दिया नहीं है, फिर उसी समय यह आयत उतरी जिसमें बीवियों के प्रति इस ज़ालिमाना नियमों को बदलकर इस पर रोक लगा दी गई।

3:  यहाँ यह बता दिया गया कि ज़िहार करने के बाद भी मियाँ-बीवी का रिश्ता दोबारा जुड़ सकता हैमगर दोबारा मिलन से पहले भरपाई के तौर पर एक ग़ुलाम आज़ाद किया जाए, यह न हो सके तो दो महीने लगातार रोज़े रखे जाएं, या यह भी न हो सके तो 60 ग़रीबों को खाना खिलाया जाए। 

7:  मदीना में मुसलमानों के आने के बाद से ही यहूदियों के मन में उनके लिए नफ़रत और जलन की भावना थी। वे जब मुसलमानों को देखते तो आपस में कानाफूसी और इशारों में बातें करने लगते थे, जैसे कि वे कोई साज़िश कर रहे हों, मदीना के कुछ पाखंडी [मुनाफ़िक़] लोग भी ऐसा ही किया करते थे। 

8: यहूदियों की एक और शरारत यह थी कि जब वे मुसलमानों से मिलते तो उन्हें "अस्सलामो अलैकुम" यानी तुम पर सलामती हो, कहने के बजाए "अस्सामो अलैकुम" यानी तुम पर बर्बादी हो, कहते थे जो सुनने में एक जैसा ही लगता था। वे अपने मन में यह भी कहते थे कि अगर ऐसी बात कहना ग़लत है, तो अल्लाह इस पर उन्हें कोई सज़ा क्यों नहीं देता

12: कुछ लोग मुहम्मद (सल्ल) से अकेले में मिलते, तो बेज़रूरत देर तक बातें करते रहते, और आप तहज़ीब की वजह से उन्हें कह नहीं पाते थे कि अब आप चले जाएं। इस आयत में यह हुक्म हुआ कि ऐसे लोगों को मिलने से पहले ग़रीबों को कुछ दान देना चाहिए। 

13: पिछली आयत में और इस आयत के आने में कुछ समय का अंतराल था। पिछली आयत में जो हुक्म हुआ उसके बाद अब मुहम्मद (सल्ल) से अकेले में मिलने वालों की संख्या बहुत कम हो गई थी, सो जब मक़सद पूरा हो गया, तो इस आयत के द्वारा वह हुक्म हटा लिया गया। 

14: यहाँ मदीना के पाखंडियों [मुनाफ़िक़] का बयान है। ये लोग ऊपर से तो क़समें खाते थे कि वे मुसलमान हैं, लेकिम असल में ईमान नहीं रखते थे, इन्होंने यहूदियों के साथ सांठ-गांठ कर रखी थी, और मुसलमानों के ख़िलाफ़ साज़िशें करते रहते थे। 

 

सूरह 57 : अल- हदीद [लोहा/ Iron]

सूरह 57: अल-हदीद
 [लोहा/ Iron]


01-06: अल्लाह की बड़ाई 

07-11: अल्लाह पर विश्वास करने और उसके रास्ते में ख़र्च करने की अपील 

12-15: फ़ैसले का दृश्य: ईमानवालों और पाखंडियों का अंजाम 

16-24: ईमान रखने और अल्लाह के रास्ते में ख़र्च करने का इनाम

25-27: अल्लाह के रसूल और उनके मानने वाले

28-29: अंत में ईमानवालों को अपने क़दम जमाए रखने पर ज़ोर



अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
आसमानों और ज़मीन की हर चीज़ अल्लाह की बड़ाई बयान करती है---- वह बेहद ताक़तवाला, और बहुत समझ-बूझ रखनेवाला है।  (1)
आसमानों और ज़मीन का नियंत्रण [बादशाही] उसी के हाथ में है; वही ज़िंदगी भी देता है, और मौत भी; उसे हर चीज़ करने की ताक़त है।  (2)
वही पहला भी है और आख़िर भी [जब कुछ न था तो वह था, जब कुछ नहीं रहेगा, तो वह रहेगा]; वही बाहर (फैली हुई निशानियों में) भी है और अंदर (छिपी चीज़ों में) भी; और उसे हर चीज़ की जानकारी है। (3)
वही तो है जिसने आसमानों और ज़मीन को छह दिनों में पैदा किया और फिर अपने आपको सिंहासन पर जमाया। जो कुछ ज़मीन में दाख़िल होता है, और जो कुछ उससे बाहर निकलता है, वह उसे जानता है; और उसे भी (जानता है) जो कुछ आसमान से नीचे उतरता है, और जो कुछ ऊपर को चढ़ता है। तुम जहाँ कहीं भी हो, वह तुम्हारे साथ होता है; और जो कुछ तुम करते हो, वह सब देखता है; (4)
आसमानों और ज़मीन का पूरा नियंत्रण [बादशाही] उसी के पास है; और सारे मामले अल्लाह के पास ही वापस लाए जाते हैं। (5)
वह रात को दिन में मिला देता है और दिन को रात में मिला देता है। वह दिलों के अंदर की (छिपी) बात को भी जानता है। (6)


अल्लाह और उसके रसूल पर विश्वास [ईमान] रखो, और उस (माल) में से ख़र्च करो, जो अल्लाह की तरफ से तुम्हें (अमानत के रूप में) दिया गया है: तुममें से जो लोग विश्वास [ईमान] रखते हैं और (अल्लाह के रास्ते में) ख़र्च करते हैं, उनके लिए बड़ा इनाम होगा। (7)
तुम अल्लाह पर विश्वास क्यों नहीं करते, जबकि (हमारे) रसूल तुम्हें अपने रब पर विश्वास करने के लिए अपने पास बुलाते हैं---- और अल्लाह तो तुम्हारे साथ पहले ही पक्का वचन ले चुका है----- अगर तुम ईमान रखते हो?  (8)
वही (अल्लाह) है जिसने अपने बन्दे पर साफ़ व स्पष्ट आयतें उतार भेजी हैं, ताकि वह तुम्हें गहरे अँधेरे से उजाले की तरफ़ ले आए। और सचमुच अल्लाह तुम पर बहुत नर्मी दिखानेवाला, बेहद दयावान है। (9)
और यह क्या हुआ कि तुम अल्लाह के रास्ते में ख़र्च नहीं करते, जबकि आसमानों और ज़मीन में जो कुछ है, उसका अकेला वारिस तो अल्लाह ही होगा? जिन लोगों ने (मक्का की) जीत से पहले (अल्लाह के रास्ते में) ख़र्च किया और लड़ाइयाँ लड़ीं, वे दूसरों के बराबर नहीं हैं: वे लोग दर्जे [Rank] में उन लोगों से बड़े हैं जिन्होंने बाद में (अपना माल) ख़र्च किया और लड़ाइयाँ लड़ीं। मगर अल्लाह ने उन सबसे अच्छे इनाम का वादा कर रखा है: जो कुछ तुम करते हो, अल्लाह उसकी पूरी ख़बर रखता है। (10)


कौन है जो अल्लाह को क़र्ज़ दे सके, अच्छा वाला क़र्ज़!? अल्लाह उस (क़र्ज़) को देनेवाले के लिए कई गुना बढ़ा देगा और उसे दिल खोलकर इनाम देगा। (11)
[ऐ रसूल!] (क़यामत का) एक दिन आएगा जब आप ईमान रखनेवाले मर्दों और औरतों को देखेंगे कि उनकी रौशनी उनके आगे-आगे और उनके दाहिने तरफ़ फैल रही होगी। (उनसे कहा जाएगा),  "आज तुम्हारे लिए बड़ी अच्छी ख़बर यह है कि तुम (जन्नत के) ऐसे बाग़ों में हमेशा रहोगे, जिनके नीचे नहरें बहती हैं, असल में यही सबसे बड़ी कामयाबी है!" (12)
उसी दिन पाखंड करनेवाले [Hypocrites] मर्द और औरतें, ईमान रखनेवालों से कहेंगे, "हमारा इंतज़ार करो! थोड़ी सी अपनी रौशनी हमें भी लेने दो!" उनसे कहा जाएगा, "वापस चले जाओ और फिर रौशनी की तलाश करो!" फिर उनके बीच एक दीवार खड़ी कर दी जाएगी, जिसमें एक दरवाज़ा होगा: उसके भीतर रहमत [mercy] होगी और उसके बाहर यातना खड़ी होगी। (13)
पाखंडी लोग [मुनाफ़िक़] ईमानवालों को पुकारकर कहेंगे, "क्या हम तुम्हारे साथी नहीं थे?" वे जवाब देंगे, "हाँ, थे तो सही! मगर तुमने ख़ुद अपने आपको ग़लत रास्ते पर डाल लिया, और (ईमानवालों की हार या मुसीबत की) प्रतीक्षा करते रहे, सन्देह में पड़े रहे और झूठी आशाओं ने तुम्हें धोखे में डाले रखा, यहाँ तक कि अल्लाह का आदेश आ पहुँचा---- धोखा देनेवाले [शैतान] ने अल्लाह के बारे में तुम्हें धोखे में डाले रखा। (14)
"आज के दिन तुमसे या उन (काफ़िर) लोगों से जिन्होंने (सच्चाई पर) विश्वास करने से इंकार किया, उनकी जानों के बदले कोई क़ीमत [फ़िदया/ ransom] स्वीकार नहीं की जाएगी: तुम्हारे रहने की जगह (जहन्नम की) आग है----- वही (तुम्हारी रक्षक है, और) तुम्हारे लिए सही जगह है---- किया ही बुरा ठिकाना है वह!" (15)


क्या ईमान रखनेवालों के लिए अब भी वह समय नहीं आया कि उनके दिल अल्लाह की याद के लिए और जो सच्चाई [क़ुरआन] उतारी गयी है, उसके लिए पसीज जाएँ, वे उन लोगों की तरह न हो जाएँ, जिन्हें उनसे पहले किताब दी गई थी, फिर उनके समय-काल को भी बढ़ाया गया, मगर उनके दिल कठोर हो गए और अब उनमें से बहुत सारे लोग क़ानून तोड़नेवाले हैं?  (16)
याद रहे कि अल्लाह मुर्दा पड़ी ज़मीन को फिर से (हरी भरी करके) ज़िंदा कर देता है; हमने तुम्हारे लिए अपनी आयतें साफ़ और स्पष्ट तरीक़े से बयान कर दी हैं, ताकि तुम अपनी बुद्धि से काम ले सको। (17)
दान देनेवाले मर्द और दान देनेवाली औरतें, जो अल्लाह को अच्छा क़र्ज़ देते हैं, उसे उनके लिए कई गुना कर दिया जाएगा, और उनको दिल खोलकर इनाम दिया जाएगा। (18)
जो लोग अल्लाह और उसके रसूलों पर ईमान रखते हैं, वे सच्चे लोग हैं और वे अपने रब के सामने गवाह होंगे: उनके लिए उनका इनाम होगा और (साथ में) उनकी रौशनी होगी। मगर जिन लोगों ने विश्वास नहीं किया और हमारी आयतों को मानने से इंकार किया, वे (जहन्नम की) आग में रहने वालेे हैं। (19)
यह बात दिमाग़ में रहे कि सांसारिक जीवन तो बस एक खेल-तमाशा है, एक भटकाव है, एक आकर्षण है, तुम्हारा आपस में एक-दूसरे पर बड़ाई जताने का एक कारण है, और दौलत और सन्तान में परस्पर एक-दूसरे से बढ़ा हुआ दिखाने की एक होड़ का नाम है। यह तो उन पौधों की तरह हैं जो बारिश के बाद (जगह जगह) उग आते हैं: पौधा लगाने वाला शुरू शुरू में ऐसे पौधों को बढ़ते हुए देखकर बहुत ख़ुश हो जाता है, मगर फिर तुम उन्हें देखते हो कि वे मुरझा जाते हैं, पीले पड़ जाते हैं, फिर वह चारा [Stubble] होकर रह जाते हैं। आगे आनेवाली (आख़िरत की) ज़िन्दगी में दर्दनाक यातना भी है और अल्लाह की तरफ़ से माफ़ी और मंजूरी भी; इस दुनिया की ज़िन्दगी तो केवल धोखे की खुशियाँ (देने वाली) है। (20)
इसलिए तुम्हें चाहिए कि अल्लाह से माफ़ी मांगने में और जन्नत हासिल करने में तुम एक-दूसरे से बाज़ी ले जाने की कोशिश करो, वह जन्नत जो लम्बाई-चौड़ाई में आसमानों और ज़मीन के बराबर है, जो उन लोगों के लिए तैयार की गई है जो अल्लाह और उसके रसूलों पर ईमान रखते हों: यह अल्लाह का फ़ज़ल व करम (bounty) है, वह जिसे चाहता है, देता है। और अल्लाह के फ़ज़ल की कोई सीमा नहीं है। (21)


कोई भी दुर्घटना घट नहीं सकती, चाहे वह ज़मीन पर हो या ख़ुद तुम्हारी जानों पर हो, जबतक कि वह पहले ही से एक किताब [लौह-ए-महफ़ूज़/ Preserved Tablet] में लिखी हुई न हो, और (ये उस समय से लिखी हुई है) जब हम उनको अस्तित्व [वजूद] में लाए तक न थे ----और यह अल्लाह के लिए बहुत आसान है----- (22)
अत: जो चीज़ तुम्हारे हाथ न आ सकी, उस चीज़ का अफ़सोस न करो, और जो चीज़ तुम्हें हासिल हो जाए, उस पर इतराते न फिरो। अल्लाह ऐसे आदमी को पसंद नहीं करता जो घमंड में चूर रहता हो (और) डींगें हाँकता हो, (23)
(और) वे लोग जो कंजूस हों, और जो दूसरों को भी कंजूसी करने के लिए कहते हों। अगर कोई आदमी (दान करने से) मुँह मोड़ ले, तो याद रखो कि अल्लाह तो आत्मनिर्भर है (उसे किसी की ज़रूरत नहीं), और सारी तारीफ़ों के लायक़ है।  (24)
हमने अपने रसूलों को स्पष्ट निशानियों के साथ भेजा, और उनके साथ (आसमानी) किताब भी उतारी, और (सही-ग़लत को तोलने के लिए) पैमाना भी भेजा, ताकि लोग न्याय स्थापित कर सकें: हमने लोहा भी उतारा, जो (लड़ने के सामान में) बेहद मज़बूत होता है, और बहुत सारी चीज़ों में लोगों के काम आता है, ताकि अल्लाह उन लोगों की पहचान कर सके जो अल्लाह (के दीन की) और उसके रसूलों की मदद करेंगे, हालाँकि वे उसे देख नहीं सकते। सचमुच अल्लाह बहुत ताक़तवाला, प्रभुत्वशाली है। (25)


हमने नूह [Noah] और इबराहीम [Abraham] को भेजा, और उनकी सन्तानों को पैग़म्बरी [Prophethood] दी और उन पर (आसमानी) किताब उतारी: उनमें से कुछ तो ऐसे थे जो सही रास्ते पर चलने वाले थे, मगर बहुत सारे ऐसे थे जो नियमों को तोड़ने वाले थे।  (26)
फिर हमने (उन पैग़म्बरों के बाद) उनके क़दमों के निशान पर चलने के लिए दूसरे रसूलों को भेजा। उनके बाद हमने मरयम के बेटे ईसा [Jesus] को भेजा: हमने उन्हें इंजील [Gospel] प्रदान की, और उनके मानने वालों के दिलों में करुणा [kindness] और दया रख दी। लेकिन (बाद में) जीवन से संन्यास लेकर अलग-थलग रहने की परम्परा [Monasticism] एक ऐसी चीज़ थी जो इन्होंने ख़ुद से शुरू कर दी------ हमने उन्हें ऐसा करने का कोई हुक्म नहीं दिया था-----(ऐसा करके) वे केवल अल्लाह की ख़ुशी चाहते थे, और अगर ऐसा था तब भी, वे उसको ठीक ढंग से निभा न सके। अतः उनमें से जिन लोगों ने विश्वास कर लिया था, हमने उन्हें उसका इनाम दिया, मगर उनमें से ढेर सारे लोग नियमों को तोड़ने वाले थे। (27)
ऐ ईमान रखनेवालो! अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से बचो, और उसके रसूल पर ईमान [विश्वास] रखो: अल्लाह तुम्हें अपनी रहमत [mercy] का दोहरा हिस्सा देगा; वह तुम्हारे लिए रौशनी कर देगा ताकि तुम उसके सहारे (सही रास्ते पर) चल सको; वह तुम्हारे गुनाहों को माफ़ कर देगा-----अल्लाह बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है।  (28)
किताब रखनेवालों [यहूदी/ईसायी] को यह जानना चाहिए कि अल्लाह की किसी मेहरबानी [grace] पर उनका कोई ज़ोर नहीं चल सकता, और यह कि किसी पर मेहरबानी करना तो केवल अल्लाह के ही हाथ में है: वह जिसको (मेहरबान होकर) देना चाहे, देता है। अल्लाह की मेहरबानियाँ बेहिसाब हैं।  (29)



नोट:

7:  सभी माल और दौलत का असली मालिक अल्लाह है। वह इसमें से इंसानों को उनकी ज़रूरतें पूरी करने के लिए देता है, मगर चाहता है कि आदमी इस माल को उसके हुक्म के मुताबिक़ ख़र्च करे। इस हक़ीक़त की तरफ़ भी इशारा किया गया है कि दौलत कभी एक हाथ में नहीं रहती, बल्कि हमेशा एक हाथ से दूसरे हाथ में जाती रहती है। इसलिए आदमी को चाहिए कि उस दौलत को उसके सही हक़दार को देता रहे। 

8: अल्लाह ने आदम (अलै) को पैदा करने से पहले ही सारे इंसानों की रूहों से वचन लिया था,   देखें 7: 172. यही वजह है कि हर इंसान के अंदर सच्चाई को पहचानने की सलाहियत मौजूद होती है, अगर वह मार्गदर्शन पर ध्यान से विचार करे। 

10: मक्का की जीत से पहले (8 हिजरी) मुसलमानों की संख्या और उनके साधन कम थे, और दुश्मन भी ज़्यादा थे, तो उस ज़माने में जिसने अल्लाह के रास्ते में जान और माल दिया, उनकी क़ुर्बानियाँ भी ज़्यादा थींइसलिए उनका दर्जा भी अल्लाह की नज़र में ऊँचा है। मक्का की जीत के बाद मुसलमानों की संख्या और साधनों भी बढ़ोतरी हुई और तब जान और माल की क़ुर्बानियाँ भी कम देनी पड़ीं, इसलिए बाद में ईमान लाने वालों का दर्जा थोड़ा कम होगा, मगर हाँ, जन्नत की नेमतें दोनों ही दर्जे के लोगों को मिलेंगी। 

11: इंसान जो कुछ दुनिया में ज़रूरतमन्दों को दान-दक्षिना, सदक़ा-ख़ैरात आदि देता है या अच्छे कामों में ख़र्च करता है, उसको अल्लाह ने क़र्ज़ कहा है, और उसके बदले में अल्लाह उस इंसान को दुनिया और आख़िरत में इस तरह देगा जैसे कि कोई क़र्ज़दार अपना क़र्ज़ वापस करता है। "अच्छावाला क़र्ज़" से मतलब अल्लाह की ख़ुशी हासिल करने के लिए साफ़ मन से बिना दिखावा किए हुए किसी को देना। देखें 2: 245;  5: 12. 

12: शायद यह उस समय की बात है जब सारे लोग "पुल सिरात" से गुज़र रहे होंगे, वहाँ हर इंसान का ईमान रौशनी बनकर उसे रास्ता दिखाएगा। 

13: पाखंडी लोग [मुनाफ़िक़] दुनिया में चूँकि अपने आपको मुसलमान ज़ाहिर करते थे, इसलिए आख़िरत में भी पहले वे मुसलमानों के साथ लग जाएंगे, लेकिन जब असली मुसलमान तेज़ी से आगे निकल जाएंगे और उनके साथ उनकी रौशनी भी आगे बढ़ जाएगी, तब ये लोग अंधेरे में पीछे छूट  जाएंगे। 

17: यानी जिन मुसलमानों से अब तक कुछ ग़लतियाँ हुई हैं और वे पूरी तरह ईमान के तक़ाज़ों को पूरा नहीं कर पाए, उन्हें मायूस नहीं होना चाहिए; जिस तरह अल्लाह मुर्दा पड़ी ज़मीन को फिर से हरी-भरी कर देता है, उसी तरह, वह गुनाहों से तौबा करने वालों के गुनाह माफ़ करके उन्हें नई ज़िंदगी दे देता है। 

19: "सच्चे लोग" [सिद्दीक़] वे होते हैं जो अपनी बात में और अपने काम में सच्चे होते हैं, इसीलिए उनका दर्जा बहुत ऊँचा होता है। ऐसे लोग अपने रब के सामने गवाह [शहीद] होंगे और वे क़यामत के दिन सारे नबियों के गवाह के तौर पर पेश किए जाएंगे [2: 143] ; गवाह होने का एक मतलब यह भी है कि सच्चाई की तरफ़ लोगों को बुलाना और उन्हें इसकी तालीम देते रहना जिस तरह मुहम्मद (सल्ल) ने अपने मानने वालों को यह शिक्षा दी थी। 

22: किताब से मतलब वह "लौह ए महफ़ूज़" [Preserved Tablet] है जिसमें अल्लाह ने क़यामत तक होने वाली घटनाओं को पहले से ही लिख रखा है। 

23: जिस आदमी को इस बात पर ईमान होता है कि जो कुछ भी होता है वह तक़दीर में लिखे अनुसार ही होता है, वह हर बुरी से बुरी घटना पर भी धीरज से काम लेता है। इसी तरह अगर उसके साथ कोई अच्छी चीज़ हो जाए, तो बजाए इतराने के, उसे अल्लाह का शुक्र अदा करना चाहिए और उसे भी तक़दीर का लिखा ही मानना चाहिए। 

24: जो लोग तक़दीर पर विश्वास नहीं करते, वह अपने सारे माल को अपनी कोशिशों से हासिल किया हुए समझते हैं और उस पर इतराते हैं, और उसे अल्लाह के रास्ते में ग़रीबों और ज़रूरतमंदों पर ख़र्च करने से कंजूसी करते हैं। 

25: चाहे सांसारिक मामला हो या सही या ग़लत के बीच फ़ैसला करना हो, हमेशा हर चीज़ में इंसाफ़ [न्याय] के साथ काम होना चाहिए। नबियों की शिक्षाएं और उनकी लायी हुई किताबों पर अगर सही तरीक़े से अमल हो, तो हर मामले में न्याय हो सकता है। लेकिन साथ में बुराई की ताक़तें हमेशा फ़साद फैलाती रहती हैं और अन्याय होता रहता है, जिसे दूर करने के लिए इंसानों को लोहा दिया गया है जिससे दूसरे फ़ायदे के साथ जंगी सामान भी बनते हैं, ताकि उन शैतानी ताक़तों से लड़कर न्याय बहाल किया जा सके, साथ में यह भी पता चल जाए कि कौन है जो सच्चाई का साथ देने वाला है। 

27: हज़रत ईसा (अलै) के जाने के बाद उनके सच्चे शिष्यों और उनकी शिक्षाओं पर चलने वालों पर उस ज़माने के राजाओं ने बहुत ज़ुल्म किए, उससे बचने और अपना दीन बचाने के लिए उन लोगों ने शहरों से दूर अलग-थलग रहना शुरू किया जहाँ ज़िंदगी की सुख-सुविधाएं बहुत कम थीं, वहाँ monasteries स्थापित कर ली गई, और धीरे-धीरे इसी तरह जीवन बिताने को इबादत समझ लिया। बाद में, जब उन पर ज़ुल्म होना बंद हो गया और ज़िंदगी की सुख-सुविधाएं मिलने लगीं, तब भी उन लोगों ने इनसे दूर ही रहकर कठिन जीवन बिताना चाहा, उनकी शादी-ब्याह भी नहीं होती थी, हालाँकि अल्लाह ने उन्हें ऐसा करने का हुक्म नहीं दिया था। हालाँकि ऐसा उन लोगों ने अल्लाह की ख़ुशी हासिल करने के लिए किया था, मगर बाद में उनकी monastery system में बहुत सी गड़बड़ियाँ पैदा होने लगीं, चूँकि इस तरह का जीवन जीना प्रकृति के ख़िलाफ़ था, इसलिए छुप-छुपकर वे आपस में  यौन संबंध भी बनाने लगे, इस तरह, वे इस तरीक़े को ठीक ढंग से निभा न सके। 

28: यहाँ उन किताबवाले यहूदियों और ईसाइयों का ज़िक्र है जिन्होंने मुहम्मद (सल्ल) के रसूल होने पर विश्वास कर लिया था, इसके लिए अल्लाह उन्हें दोहरा सवाब देगा, देखें 28: 54. 

29: यहूदी या ईसाई लोग जो कि किताब वाले थे, केवल अपनी जलन और नफ़रत की वजह से मुहम्मद सल्ल पर ईमान नहीं ला पाए, और वे यही सोचते रहे कि आख़िरी नबी इसराइल की संतानों में न होकर इस्माइल की संतानों में कैसे हो गया! हालांकि नबी बनाने का काम पूरी तरह से अल्लाह के हाथ में है। 

ईसाइयों में एक ज़माने में एक अजीब तरीका प्रचलित हो गया था, उनके पादरी पैसे लेकर लोगों को माफ़ी के परवाने जारी कर देते थे, जिसे मरने वाले के साथ ही उनकी क़ब्रों में  गाड़ दिया जाता था, और यह मान लिया जाता था कि मरने वाले के गुनाह माफ़ हो जाएंगे। यहाँ यह बताया गया है कि अल्लाह किसके साथ मेहरबानी करेगा, यह पूरी तरह उसके ही हाथ में है। 

 

Surah/सूरह 1: Al-Fatiha/अल-फ़ातिहा [(किताब की) शुरुआत/ The Opening]

       सूरह 1: अल-फ़ातिहा    [(किताब की) शुरुआत/ The Opening] यह एक मक्की सूरह है। पूरे क़ुरआन में अल्लाह का जो संदेश आया है , उसका इस सूरह मे...