Sunday, March 25, 2018

सूरह 57 : अल- हदीद [लोहा/ Iron]

सूरह 57: अल-हदीद
 [लोहा/ Iron]


01-06: अल्लाह की बड़ाई 

07-11: अल्लाह पर विश्वास करने और उसके रास्ते में ख़र्च करने की अपील 

12-15: फ़ैसले का दृश्य: ईमानवालों और पाखंडियों का अंजाम 

16-24: ईमान रखने और अल्लाह के रास्ते में ख़र्च करने का इनाम

25-27: अल्लाह के रसूल और उनके मानने वाले

28-29: अंत में ईमानवालों को अपने क़दम जमाए रखने पर ज़ोर



अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
आसमानों और ज़मीन की हर चीज़ अल्लाह की बड़ाई बयान करती है---- वह बेहद ताक़तवाला, और बहुत समझ-बूझ रखनेवाला है।  (1)
आसमानों और ज़मीन का नियंत्रण [बादशाही] उसी के हाथ में है; वही ज़िंदगी भी देता है, और मौत भी; उसे हर चीज़ करने की ताक़त है।  (2)
वही पहला भी है और आख़िर भी [जब कुछ न था तो वह था, जब कुछ नहीं रहेगा, तो वह रहेगा]; वही बाहर (फैली हुई निशानियों में) भी है और अंदर (छिपी चीज़ों में) भी; और उसे हर चीज़ की जानकारी है। (3)
वही तो है जिसने आसमानों और ज़मीन को छह दिनों में पैदा किया और फिर अपने आपको सिंहासन पर जमाया। जो कुछ ज़मीन में दाख़िल होता है, और जो कुछ उससे बाहर निकलता है, वह उसे जानता है; और उसे भी (जानता है) जो कुछ आसमान से नीचे उतरता है, और जो कुछ ऊपर को चढ़ता है। तुम जहाँ कहीं भी हो, वह तुम्हारे साथ होता है; और जो कुछ तुम करते हो, वह सब देखता है; (4)
आसमानों और ज़मीन का पूरा नियंत्रण [बादशाही] उसी के पास है; और सारे मामले अल्लाह के पास ही वापस लाए जाते हैं। (5)
वह रात को दिन में मिला देता है और दिन को रात में मिला देता है। वह दिलों के अंदर की (छिपी) बात को भी जानता है। (6)


अल्लाह और उसके रसूल पर विश्वास [ईमान] रखो, और उस (माल) में से ख़र्च करो, जो अल्लाह की तरफ से तुम्हें (अमानत के रूप में) दिया गया है: तुममें से जो लोग विश्वास [ईमान] रखते हैं और (अल्लाह के रास्ते में) ख़र्च करते हैं, उनके लिए बड़ा इनाम होगा। (7)
तुम अल्लाह पर विश्वास क्यों नहीं करते, जबकि (हमारे) रसूल तुम्हें अपने रब पर विश्वास करने के लिए अपने पास बुलाते हैं---- और अल्लाह तो तुम्हारे साथ पहले ही पक्का वचन ले चुका है----- अगर तुम ईमान रखते हो?  (8)
वही (अल्लाह) है जिसने अपने बन्दे पर साफ़ व स्पष्ट आयतें उतार भेजी हैं, ताकि वह तुम्हें गहरे अँधेरे से उजाले की तरफ़ ले आए। और सचमुच अल्लाह तुम पर बहुत नर्मी दिखानेवाला, बेहद दयावान है। (9)
और यह क्या हुआ कि तुम अल्लाह के रास्ते में ख़र्च नहीं करते, जबकि आसमानों और ज़मीन में जो कुछ है, उसका अकेला वारिस तो अल्लाह ही होगा? जिन लोगों ने (मक्का की) जीत से पहले (अल्लाह के रास्ते में) ख़र्च किया और लड़ाइयाँ लड़ीं, वे दूसरों के बराबर नहीं हैं: वे लोग दर्जे [Rank] में उन लोगों से बड़े हैं जिन्होंने बाद में (अपना माल) ख़र्च किया और लड़ाइयाँ लड़ीं। मगर अल्लाह ने उन सबसे अच्छे इनाम का वादा कर रखा है: जो कुछ तुम करते हो, अल्लाह उसकी पूरी ख़बर रखता है। (10)


कौन है जो अल्लाह को क़र्ज़ दे सके, अच्छा वाला क़र्ज़!? अल्लाह उस (क़र्ज़) को देनेवाले के लिए कई गुना बढ़ा देगा और उसे दिल खोलकर इनाम देगा। (11)
[ऐ रसूल!] (क़यामत का) एक दिन आएगा जब आप ईमान रखनेवाले मर्दों और औरतों को देखेंगे कि उनकी रौशनी उनके आगे-आगे और उनके दाहिने तरफ़ फैल रही होगी। (उनसे कहा जाएगा),  "आज तुम्हारे लिए बड़ी अच्छी ख़बर यह है कि तुम (जन्नत के) ऐसे बाग़ों में हमेशा रहोगे, जिनके नीचे नहरें बहती हैं, असल में यही सबसे बड़ी कामयाबी है!" (12)
उसी दिन पाखंड करनेवाले [Hypocrites] मर्द और औरतें, ईमान रखनेवालों से कहेंगे, "हमारा इंतज़ार करो! थोड़ी सी अपनी रौशनी हमें भी लेने दो!" उनसे कहा जाएगा, "वापस चले जाओ और फिर रौशनी की तलाश करो!" फिर उनके बीच एक दीवार खड़ी कर दी जाएगी, जिसमें एक दरवाज़ा होगा: उसके भीतर रहमत [mercy] होगी और उसके बाहर यातना खड़ी होगी। (13)
पाखंडी लोग [मुनाफ़िक़] ईमानवालों को पुकारकर कहेंगे, "क्या हम तुम्हारे साथी नहीं थे?" वे जवाब देंगे, "हाँ, थे तो सही! मगर तुमने ख़ुद अपने आपको ग़लत रास्ते पर डाल लिया, और (ईमानवालों की हार या मुसीबत की) प्रतीक्षा करते रहे, सन्देह में पड़े रहे और झूठी आशाओं ने तुम्हें धोखे में डाले रखा, यहाँ तक कि अल्लाह का आदेश आ पहुँचा---- धोखा देनेवाले [शैतान] ने अल्लाह के बारे में तुम्हें धोखे में डाले रखा। (14)
"आज के दिन तुमसे या उन (काफ़िर) लोगों से जिन्होंने (सच्चाई पर) विश्वास करने से इंकार किया, उनकी जानों के बदले कोई क़ीमत [फ़िदया/ ransom] स्वीकार नहीं की जाएगी: तुम्हारे रहने की जगह (जहन्नम की) आग है----- वही (तुम्हारी रक्षक है, और) तुम्हारे लिए सही जगह है---- किया ही बुरा ठिकाना है वह!" (15)


क्या ईमान रखनेवालों के लिए अब भी वह समय नहीं आया कि उनके दिल अल्लाह की याद के लिए और जो सच्चाई [क़ुरआन] उतारी गयी है, उसके लिए पसीज जाएँ, वे उन लोगों की तरह न हो जाएँ, जिन्हें उनसे पहले किताब दी गई थी, फिर उनके समय-काल को भी बढ़ाया गया, मगर उनके दिल कठोर हो गए और अब उनमें से बहुत सारे लोग क़ानून तोड़नेवाले हैं?  (16)
याद रहे कि अल्लाह मुर्दा पड़ी ज़मीन को फिर से (हरी भरी करके) ज़िंदा कर देता है; हमने तुम्हारे लिए अपनी आयतें साफ़ और स्पष्ट तरीक़े से बयान कर दी हैं, ताकि तुम अपनी बुद्धि से काम ले सको। (17)
दान देनेवाले मर्द और दान देनेवाली औरतें, जो अल्लाह को अच्छा क़र्ज़ देते हैं, उसे उनके लिए कई गुना कर दिया जाएगा, और उनको दिल खोलकर इनाम दिया जाएगा। (18)
जो लोग अल्लाह और उसके रसूलों पर ईमान रखते हैं, वे सच्चे लोग हैं और वे अपने रब के सामने गवाह होंगे: उनके लिए उनका इनाम होगा और (साथ में) उनकी रौशनी होगी। मगर जिन लोगों ने विश्वास नहीं किया और हमारी आयतों को मानने से इंकार किया, वे (जहन्नम की) आग में रहने वालेे हैं। (19)
यह बात दिमाग़ में रहे कि सांसारिक जीवन तो बस एक खेल-तमाशा है, एक भटकाव है, एक आकर्षण है, तुम्हारा आपस में एक-दूसरे पर बड़ाई जताने का एक कारण है, और दौलत और सन्तान में परस्पर एक-दूसरे से बढ़ा हुआ दिखाने की एक होड़ का नाम है। यह तो उन पौधों की तरह हैं जो बारिश के बाद (जगह जगह) उग आते हैं: पौधा लगाने वाला शुरू शुरू में ऐसे पौधों को बढ़ते हुए देखकर बहुत ख़ुश हो जाता है, मगर फिर तुम उन्हें देखते हो कि वे मुरझा जाते हैं, पीले पड़ जाते हैं, फिर वह चारा [Stubble] होकर रह जाते हैं। आगे आनेवाली (आख़िरत की) ज़िन्दगी में दर्दनाक यातना भी है और अल्लाह की तरफ़ से माफ़ी और मंजूरी भी; इस दुनिया की ज़िन्दगी तो केवल धोखे की खुशियाँ (देने वाली) है। (20)
इसलिए तुम्हें चाहिए कि अल्लाह से माफ़ी मांगने में और जन्नत हासिल करने में तुम एक-दूसरे से बाज़ी ले जाने की कोशिश करो, वह जन्नत जो लम्बाई-चौड़ाई में आसमानों और ज़मीन के बराबर है, जो उन लोगों के लिए तैयार की गई है जो अल्लाह और उसके रसूलों पर ईमान रखते हों: यह अल्लाह का फ़ज़ल व करम (bounty) है, वह जिसे चाहता है, देता है। और अल्लाह के फ़ज़ल की कोई सीमा नहीं है। (21)


कोई भी दुर्घटना घट नहीं सकती, चाहे वह ज़मीन पर हो या ख़ुद तुम्हारी जानों पर हो, जबतक कि वह पहले ही से एक किताब [लौह-ए-महफ़ूज़/ Preserved Tablet] में लिखी हुई न हो, और (ये उस समय से लिखी हुई है) जब हम उनको अस्तित्व [वजूद] में लाए तक न थे ----और यह अल्लाह के लिए बहुत आसान है----- (22)
अत: जो चीज़ तुम्हारे हाथ न आ सकी, उस चीज़ का अफ़सोस न करो, और जो चीज़ तुम्हें हासिल हो जाए, उस पर इतराते न फिरो। अल्लाह ऐसे आदमी को पसंद नहीं करता जो घमंड में चूर रहता हो (और) डींगें हाँकता हो, (23)
(और) वे लोग जो कंजूस हों, और जो दूसरों को भी कंजूसी करने के लिए कहते हों। अगर कोई आदमी (दान करने से) मुँह मोड़ ले, तो याद रखो कि अल्लाह तो आत्मनिर्भर है (उसे किसी की ज़रूरत नहीं), और सारी तारीफ़ों के लायक़ है।  (24)
हमने अपने रसूलों को स्पष्ट निशानियों के साथ भेजा, और उनके साथ (आसमानी) किताब भी उतारी, और (सही-ग़लत को तोलने के लिए) पैमाना भी भेजा, ताकि लोग न्याय स्थापित कर सकें: हमने लोहा भी उतारा, जो (लड़ने के सामान में) बेहद मज़बूत होता है, और बहुत सारी चीज़ों में लोगों के काम आता है, ताकि अल्लाह उन लोगों की पहचान कर सके जो अल्लाह (के दीन की) और उसके रसूलों की मदद करेंगे, हालाँकि वे उसे देख नहीं सकते। सचमुच अल्लाह बहुत ताक़तवाला, प्रभुत्वशाली है। (25)


हमने नूह [Noah] और इबराहीम [Abraham] को भेजा, और उनकी सन्तानों को पैग़म्बरी [Prophethood] दी और उन पर (आसमानी) किताब उतारी: उनमें से कुछ तो ऐसे थे जो सही रास्ते पर चलने वाले थे, मगर बहुत सारे ऐसे थे जो नियमों को तोड़ने वाले थे।  (26)
फिर हमने (उन पैग़म्बरों के बाद) उनके क़दमों के निशान पर चलने के लिए दूसरे रसूलों को भेजा। उनके बाद हमने मरयम के बेटे ईसा [Jesus] को भेजा: हमने उन्हें इंजील [Gospel] प्रदान की, और उनके मानने वालों के दिलों में करुणा [kindness] और दया रख दी। लेकिन (बाद में) जीवन से संन्यास लेकर अलग-थलग रहने की परम्परा [Monasticism] एक ऐसी चीज़ थी जो इन्होंने ख़ुद से शुरू कर दी------ हमने उन्हें ऐसा करने का कोई हुक्म नहीं दिया था-----(ऐसा करके) वे केवल अल्लाह की ख़ुशी चाहते थे, और अगर ऐसा था तब भी, वे उसको ठीक ढंग से निभा न सके। अतः उनमें से जिन लोगों ने विश्वास कर लिया था, हमने उन्हें उसका इनाम दिया, मगर उनमें से ढेर सारे लोग नियमों को तोड़ने वाले थे। (27)
ऐ ईमान रखनेवालो! अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से बचो, और उसके रसूल पर ईमान [विश्वास] रखो: अल्लाह तुम्हें अपनी रहमत [mercy] का दोहरा हिस्सा देगा; वह तुम्हारे लिए रौशनी कर देगा ताकि तुम उसके सहारे (सही रास्ते पर) चल सको; वह तुम्हारे गुनाहों को माफ़ कर देगा-----अल्लाह बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है।  (28)
किताब रखनेवालों [यहूदी/ईसायी] को यह जानना चाहिए कि अल्लाह की किसी मेहरबानी [grace] पर उनका कोई ज़ोर नहीं चल सकता, और यह कि किसी पर मेहरबानी करना तो केवल अल्लाह के ही हाथ में है: वह जिसको (मेहरबान होकर) देना चाहे, देता है। अल्लाह की मेहरबानियाँ बेहिसाब हैं।  (29)



नोट:

7:  सभी माल और दौलत का असली मालिक अल्लाह है। वह इसमें से इंसानों को उनकी ज़रूरतें पूरी करने के लिए देता है, मगर चाहता है कि आदमी इस माल को उसके हुक्म के मुताबिक़ ख़र्च करे। इस हक़ीक़त की तरफ़ भी इशारा किया गया है कि दौलत कभी एक हाथ में नहीं रहती, बल्कि हमेशा एक हाथ से दूसरे हाथ में जाती रहती है। इसलिए आदमी को चाहिए कि उस दौलत को उसके सही हक़दार को देता रहे। 

8: अल्लाह ने आदम (अलै) को पैदा करने से पहले ही सारे इंसानों की रूहों से वचन लिया था,   देखें 7: 172. यही वजह है कि हर इंसान के अंदर सच्चाई को पहचानने की सलाहियत मौजूद होती है, अगर वह मार्गदर्शन पर ध्यान से विचार करे। 

10: मक्का की जीत से पहले (8 हिजरी) मुसलमानों की संख्या और उनके साधन कम थे, और दुश्मन भी ज़्यादा थे, तो उस ज़माने में जिसने अल्लाह के रास्ते में जान और माल दिया, उनकी क़ुर्बानियाँ भी ज़्यादा थींइसलिए उनका दर्जा भी अल्लाह की नज़र में ऊँचा है। मक्का की जीत के बाद मुसलमानों की संख्या और साधनों भी बढ़ोतरी हुई और तब जान और माल की क़ुर्बानियाँ भी कम देनी पड़ीं, इसलिए बाद में ईमान लाने वालों का दर्जा थोड़ा कम होगा, मगर हाँ, जन्नत की नेमतें दोनों ही दर्जे के लोगों को मिलेंगी। 

11: इंसान जो कुछ दुनिया में ज़रूरतमन्दों को दान-दक्षिना, सदक़ा-ख़ैरात आदि देता है या अच्छे कामों में ख़र्च करता है, उसको अल्लाह ने क़र्ज़ कहा है, और उसके बदले में अल्लाह उस इंसान को दुनिया और आख़िरत में इस तरह देगा जैसे कि कोई क़र्ज़दार अपना क़र्ज़ वापस करता है। "अच्छावाला क़र्ज़" से मतलब अल्लाह की ख़ुशी हासिल करने के लिए साफ़ मन से बिना दिखावा किए हुए किसी को देना। देखें 2: 245;  5: 12. 

12: शायद यह उस समय की बात है जब सारे लोग "पुल सिरात" से गुज़र रहे होंगे, वहाँ हर इंसान का ईमान रौशनी बनकर उसे रास्ता दिखाएगा। 

13: पाखंडी लोग [मुनाफ़िक़] दुनिया में चूँकि अपने आपको मुसलमान ज़ाहिर करते थे, इसलिए आख़िरत में भी पहले वे मुसलमानों के साथ लग जाएंगे, लेकिन जब असली मुसलमान तेज़ी से आगे निकल जाएंगे और उनके साथ उनकी रौशनी भी आगे बढ़ जाएगी, तब ये लोग अंधेरे में पीछे छूट  जाएंगे। 

17: यानी जिन मुसलमानों से अब तक कुछ ग़लतियाँ हुई हैं और वे पूरी तरह ईमान के तक़ाज़ों को पूरा नहीं कर पाए, उन्हें मायूस नहीं होना चाहिए; जिस तरह अल्लाह मुर्दा पड़ी ज़मीन को फिर से हरी-भरी कर देता है, उसी तरह, वह गुनाहों से तौबा करने वालों के गुनाह माफ़ करके उन्हें नई ज़िंदगी दे देता है। 

19: "सच्चे लोग" [सिद्दीक़] वे होते हैं जो अपनी बात में और अपने काम में सच्चे होते हैं, इसीलिए उनका दर्जा बहुत ऊँचा होता है। ऐसे लोग अपने रब के सामने गवाह [शहीद] होंगे और वे क़यामत के दिन सारे नबियों के गवाह के तौर पर पेश किए जाएंगे [2: 143] ; गवाह होने का एक मतलब यह भी है कि सच्चाई की तरफ़ लोगों को बुलाना और उन्हें इसकी तालीम देते रहना जिस तरह मुहम्मद (सल्ल) ने अपने मानने वालों को यह शिक्षा दी थी। 

22: किताब से मतलब वह "लौह ए महफ़ूज़" [Preserved Tablet] है जिसमें अल्लाह ने क़यामत तक होने वाली घटनाओं को पहले से ही लिख रखा है। 

23: जिस आदमी को इस बात पर ईमान होता है कि जो कुछ भी होता है वह तक़दीर में लिखे अनुसार ही होता है, वह हर बुरी से बुरी घटना पर भी धीरज से काम लेता है। इसी तरह अगर उसके साथ कोई अच्छी चीज़ हो जाए, तो बजाए इतराने के, उसे अल्लाह का शुक्र अदा करना चाहिए और उसे भी तक़दीर का लिखा ही मानना चाहिए। 

24: जो लोग तक़दीर पर विश्वास नहीं करते, वह अपने सारे माल को अपनी कोशिशों से हासिल किया हुए समझते हैं और उस पर इतराते हैं, और उसे अल्लाह के रास्ते में ग़रीबों और ज़रूरतमंदों पर ख़र्च करने से कंजूसी करते हैं। 

25: चाहे सांसारिक मामला हो या सही या ग़लत के बीच फ़ैसला करना हो, हमेशा हर चीज़ में इंसाफ़ [न्याय] के साथ काम होना चाहिए। नबियों की शिक्षाएं और उनकी लायी हुई किताबों पर अगर सही तरीक़े से अमल हो, तो हर मामले में न्याय हो सकता है। लेकिन साथ में बुराई की ताक़तें हमेशा फ़साद फैलाती रहती हैं और अन्याय होता रहता है, जिसे दूर करने के लिए इंसानों को लोहा दिया गया है जिससे दूसरे फ़ायदे के साथ जंगी सामान भी बनते हैं, ताकि उन शैतानी ताक़तों से लड़कर न्याय बहाल किया जा सके, साथ में यह भी पता चल जाए कि कौन है जो सच्चाई का साथ देने वाला है। 

27: हज़रत ईसा (अलै) के जाने के बाद उनके सच्चे शिष्यों और उनकी शिक्षाओं पर चलने वालों पर उस ज़माने के राजाओं ने बहुत ज़ुल्म किए, उससे बचने और अपना दीन बचाने के लिए उन लोगों ने शहरों से दूर अलग-थलग रहना शुरू किया जहाँ ज़िंदगी की सुख-सुविधाएं बहुत कम थीं, वहाँ monasteries स्थापित कर ली गई, और धीरे-धीरे इसी तरह जीवन बिताने को इबादत समझ लिया। बाद में, जब उन पर ज़ुल्म होना बंद हो गया और ज़िंदगी की सुख-सुविधाएं मिलने लगीं, तब भी उन लोगों ने इनसे दूर ही रहकर कठिन जीवन बिताना चाहा, उनकी शादी-ब्याह भी नहीं होती थी, हालाँकि अल्लाह ने उन्हें ऐसा करने का हुक्म नहीं दिया था। हालाँकि ऐसा उन लोगों ने अल्लाह की ख़ुशी हासिल करने के लिए किया था, मगर बाद में उनकी monastery system में बहुत सी गड़बड़ियाँ पैदा होने लगीं, चूँकि इस तरह का जीवन जीना प्रकृति के ख़िलाफ़ था, इसलिए छुप-छुपकर वे आपस में  यौन संबंध भी बनाने लगे, इस तरह, वे इस तरीक़े को ठीक ढंग से निभा न सके। 

28: यहाँ उन किताबवाले यहूदियों और ईसाइयों का ज़िक्र है जिन्होंने मुहम्मद (सल्ल) के रसूल होने पर विश्वास कर लिया था, इसके लिए अल्लाह उन्हें दोहरा सवाब देगा, देखें 28: 54. 

29: यहूदी या ईसाई लोग जो कि किताब वाले थे, केवल अपनी जलन और नफ़रत की वजह से मुहम्मद सल्ल पर ईमान नहीं ला पाए, और वे यही सोचते रहे कि आख़िरी नबी इसराइल की संतानों में न होकर इस्माइल की संतानों में कैसे हो गया! हालांकि नबी बनाने का काम पूरी तरह से अल्लाह के हाथ में है। 

ईसाइयों में एक ज़माने में एक अजीब तरीका प्रचलित हो गया था, उनके पादरी पैसे लेकर लोगों को माफ़ी के परवाने जारी कर देते थे, जिसे मरने वाले के साथ ही उनकी क़ब्रों में  गाड़ दिया जाता था, और यह मान लिया जाता था कि मरने वाले के गुनाह माफ़ हो जाएंगे। यहाँ यह बताया गया है कि अल्लाह किसके साथ मेहरबानी करेगा, यह पूरी तरह उसके ही हाथ में है। 

 

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