सूरह 58: अल- मुजादिला [बहस करनेवाली/ She Who Disputes]
01-04: बीवियों से बेवजह अलग हो जाने का मसला तय
05-06: अल्लाह के रसूल का विरोध करना बेकार है
07-10: ऐसी कोई चीज़ नहीं जो अल्लाह की नज़र से बच सके
11 : रसूल की मजलिस में सही आचरण का तरीक़ा
12-13: रसूल के साथ अकेले में मिलने की शर्तें
14-21: विरोधियों की हार हो जाएगी
22 : विरोधियों के साथ कोई रिश्ता न रखें
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
[ऐ रसूल!] अल्लाह ने उस औरत की बात सुन ली है जो अपने पति के बारे में आपसे बहस कर रही थी और अल्लाह से शिकायत कर रही थी: अल्लाह ने (इस बारे में) आप दोनों का कहना सुना। अल्लाह सब कुछ सुननेवाला, सब कुछ देखनेवाला है। (1)
तुममें से कोई अगर अपनी बीवियों से यह कह भी देता है कि, "तुम मेरे लिए मेरी माँ की पीठ जैसी हो", तो वे उनकी माएँ तो नहीं हो जाएंगी; उनकी माएँ तो वही हैं जिन्होंने उनको जन्म दिया है। जो कुछ वे कहते हैं, वह सचमुच अनुचित और झूठ है, मगर अल्लाह (ग़लतियों को) टाल जाने वाला और (गुनाहों को) माफ़ करने वाला है। (2)
तुममें से जो लोग अपनी बीवियों से ऐसी बात कह देते हैं, फिर कहकर अगर अपनी बात से टल जाते हैं, तो इससे पहले कि दोनों [मियाँ-बीवी] एक-दूसरे को फिर से हाथ लगाएँ, उन्हें एक ग़ुलाम को आज़ाद करना चाहिए---- यह है वह बात जिसका तुम्हें हुक्म दिया जाता है, और जो कुछ तुम करते हो, अल्लाह उसकी पूरी ख़बर रखता है------ (3)
लेकिन जिस किसी के पास (ग़ुलाम आज़ाद करने का) साधन न हो, तो इससे पहले कि वे दोनों एक-दूसरे को हाथ लगाएँ, उसे लगातार दो महीने रोज़ा रखना चाहिए, और अगर कोई यह भी न कर सके, तो उसको चाहिए कि साठ ज़रूरतमंद लोगों को खाना खिलाए। ऐसा इसलिए है ताकि तुम सचमुच अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान रख सको। ये अल्लाह की तय की हुई सीमाएँ है: जो कोई इन्हें नज़रअंदाज़ करेगा, दर्दनाक यातना उसके इंतज़ार में रहेगी। (4)
जो लोग अल्लाह और उसके रसूल का विरोध करते हैं, वे बेइज़्ज़त होकर रहेंगे, जैसा कि उनसे पहले के लोग हुए थे: हमने साफ़ व स्पष्ट आयतें [संदेश] उतार भेजी हैं, और उन्हें मानने से इंकार करने वालों के लिए अपमानित कर देने वाली यातना होगी, (5)
उस दिन अल्लाह सबको (दोबारा) उठा खड़ा करेगा और जो कुछ उन्होंने किया होगा, वह उन्हें बता देगा। वे भले ही भूल गए हों, मगर अल्लाह ने (अपने खाते में) हर काम का हिसाब कर रखा है: अल्लाह हर चीज़ का गवाह है। (6)
[ऐ रसूल!] क्या आप नहीं देखते कि आसमानों और ज़मीन की हर चीज़ को अल्लाह जानता है? तीन आदमियों के बीच कोई ख़ुफ़िया बातचीत नहीं हो सकती, क्योंकि वहाँ चौथा वह [अल्लाह] मौजूद होता है, न पाँच आदमियों के बीच गुप्त बातचीत हो सकती है, क्योंकि वहाँ भी छठा वह [अल्लाह] मौजूद होता है, बिना उस [अल्लाह] की मौजूदगी के, चाहे वे कहीं भी हों (कोई ख़ुफ़िया बात नहीं हो सकती),---- न इससे कम आदमियों के बीच और न इससे ज़्यादा के बीच। क़यामत के दिन वह उन्हें दिखा देगा, जो भी उन लोगों ने किया होगा: सचमुच अल्लाह को हर चीज़ की पूरी जानकारी है। (7)
क्या आपने नहीं देखा कि जिन लोगों को ख़ुफ़िया बैठक करने से रोका गया था, वे लोग वहाँ से जाने के बाद ऐसी बैठकें करते हैं, और एक दूसरे के साथ मिलकर साज़िशें रचते हैं, जो कि गुनाह है, शत्रुतापूर्ण है, और रसूल की आज्ञा को मानने से इंकार करना है? जब वे आपके पास आते हैं तो आपके अभिवादन [Greeting] में ऐसे शब्दों का प्रयोग करते हैं, जिन्हें अल्लाह ने आपके अभिवादन के लिए कभी भी प्रयोग नहीं किया, और अपने मन में कहते हैं, "जो कुछ हम कहते हैं, उसके लिए अल्लाह हमें सज़ा क्यों नहीं देता?" सज़ा के तौर पर उनके लिए जहन्नम ही काफ़ी होगी: वे उसी में जलेंगे--- वह अंतिम पड़ाव की बड़ी बुरी जगह है! (8)
ऐ ईमानवालो! जब तुम आपस में चुपके-चुपके बातें करो, तो वह (गुप्त बातें) ऐसी न की जाएं जिसमें गुनाह, ज़्यादती और रसूल की आज्ञा न मानने की बातें शामिल हों, बल्कि बातें इस तरीक़े से की जाएं जो नेकी और (अल्लाह का डर रखते हुए) बुराइयों से बचने की बातें हों। अल्लाह से डरो, जिसके पास तुम सबको इकट्ठा किया जाएगा। (9)
(किसी भी दूसरे तरह की) ख़ुफिया बातचीत शैतानी काम है, जिसका मक़सद ईमानवालों को परेशानी में डालना है, हालाँकि अल्लाह की अनुमति के बिना वे उन्हें ज़रा भी नुक़सान नहीं पहुँचा सकते। ईमान रखनेवालों को अल्लाह पर ही भरोसा रखना चाहिए। (10)
ऐ ईमानवालो! मजलिसों में अगर तुमसे कहा जाए कि एक दूसरे (के बैठने) के लिए थोड़ी जगह बनाओ, तो जगह बना दिया करो, अल्लाह तुम्हारे लिए जगह बना देगा, और अगर तुम (बैठे हो, और तुम) से कहा जाए कि उठ जाओ, तो उठ जाया करो: अल्लाह उन लोगों के दर्जों को ऊँचा उठा देगा, जो लोग तुममें से ईमान रखते हैं, और जिन लोगों को ज्ञान दिया गया है: (याद रखो!) जो कुछ तुम करते हो, अल्लाह उसकी पूरी ख़बर रखता है। (11)
ऐ ईमानवालो! जब तुम अपने रसूल से अकेले में बात करने के लिए आओ, तो बातचीत से पहले, (ग़रीबों को) कुछ दान दे दिया करो: यह तुम्हारे लिए अच्छा और अधिक पवित्र तरीक़ा होगा। हाँ, अगर तुम्हारे पास (देने के लिए) कुछ न हो, तो अल्लाह बहुत माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है। (12)
क्या तुम इस बात से डर गए कि (रसूल के साथ) अकेले में बातचीत से पहले दान देना होगा? चूँकि तुमने दान नहीं दिया, और (फिर भी) अल्लाह ने तुम्हारे प्रति नरम रुख़ अपनाया है, इसलिए (कम से कम) नमाज़ पाबंदी से पढ़ा करो, निर्धारित ज़कात [Prescribed alms] दिया करो, और अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा का पालन करो: जो कुछ भी तुम करते हो अल्लाह उसकी पूरी ख़बर रखता है। (13)
[ऐ रसूल] क्या आपने उन लोगों को नहीं देखा जिनका मेलजोल ऐसे लोगों के साथ है जिन पर अल्लाह का ग़ुस्सा उतरा? वे न तुम्हारे साथ हैं, और न उनके साथ हैं, और वे जानते-बूझते झूठी बात पर क़समें खाते हैं। (14)
अल्लाह ने उनके लिए कठोर यातना तैयार कर रखी है: जो कुछ वे करते हैं, वह सचमुच बहुत बुरा है। (15)
उन्होंने अपनी क़समों का इस्तेमाल (अपने काले कारनामों को) छिपाने के लिए कर रखा है, और दूसरों को अल्लाह के रास्ते से रोका है। एक बेइज़्ज़त कर देनेवाली यातना उनके घात में है-----(16)
अल्लाह के ख़िलाफ़ न उनकी धन-दौलत किसी काम आएगी, और न उनके बाल-बच्चे----- वे जहन्नम (की आग) में रहने वाले हैं, उसी में हमेशा रहेंगे। (17)
उस (क़यामत के) दिन, जब अल्लाह सबको (मुर्दे से) ज़िंदा करके उठाएगा, तो वे अल्लाह के सामने भी क़समें खाने लगेंगे, जिस तरह वे आपके सामने आज क़समें खाते हैं, और समझेंगे कि इससे उन्हें कुछ सहारा मिल जाएगा। कितने बड़े झूठे हैं वे! (18)
शैतान ने उन पर पूरी तरह से अपना क़ब्ज़ा जमा लिया है, और उन्हें ऐसा बना दिया है कि वे अल्लाह की याद को भुला बैठे हैं। वे शैतान के पक्ष [side] में हैं, और शैतान के पक्षवालों की ही हार होगी: (19)
जो लोग अल्लाह और उसके रसूल का विरोध करते हैं, वे उन लोगों में होंगे जिनकी भारी बेइज़्ज़ती होगी। (20)
अल्लाह ने लिख दिया है, "मैं अवश्य जीतकर रहूंगा, मैं और मेरे रसूल!" निस्संदेह अल्लाह बेहद ताक़तवाला, बड़ा प्रभुत्वशाली है। (21)
जो लोग अल्लाह और अंतिम दिन [क़यामत] पर सचमुच विश्वास रखते हैं, [ऐ रसूल!] आप उन्हें ऐसा नहीं पाएंगे कि उन लोगों की निष्ठा [Loyalty] ऐसे लोगों के साथ हो, जो अल्लाह और उसके रसूल का विरोध करते हों, भले ही वे उनके अपने बाप हों, बेटे हों, भाई हों, या उनके रिश्तेदार हों: ये वह लोग हैं जिनके दिलों पर अल्लाह ने ईमान अंकित कर दिया है, और अपनी रूह से उन्हें मज़बूती दी है। वह उन्हें (जन्नत के) ऐसे बाग़ों में दाख़िल कर देगा जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी, जहाँ वे हमेशा रहेंगे: अल्लाह उनसे बहुत ख़ुश होगा, और वे अल्लाह से। वे अल्लाह के पक्ष [side] वाले हैं, और अल्लाह के पक्षवाले ही कामयाब होंगे। (22)
नोट:
1: अरब के बहुदेववादियों [Pagans] के यहाँ एक अजीब परम्परा थी कि वे अपनी बीवियों से यह कहकर अलग हो जाते थे कि "तुम मेरे लिए मेरी माँ की पीठ जैसी हो" जिसे "ज़िहार" कहते थे, जिससे बीवियों के वैवाहिक अधिकार ख़त्म हो जाते थे, यहाँ तक कि वे फिर से शादी भी नहीं कर पाती थीं। सलबा की बेटी ख़ौला के पति ने भी एक बार इसी तरह ग़ुस्से में उसे ज़िहार कर दिया, जब ख़ौला मुहम्मद (सल्ल) से इस मामले के बारे
में शिकायत लेकर आयीं, तो आपने भी उससे यही कहा कि तुम अब अपने पति के लिए वैध [हलाल] नहीं हो। फिर वह बार-बार इस बात पर मुहम्मद (सल्ल) से बहस करने लगी कि उसके पति ने उसे तलाक़ तो दिया नहीं है, फिर उसी समय यह आयत उतरी जिसमें बीवियों के प्रति इस ज़ालिमाना नियमों को बदलकर इस पर रोक लगा दी गई।
3: यहाँ यह बता दिया गया कि ज़िहार करने के बाद भी मियाँ-बीवी का रिश्ता दोबारा जुड़ सकता है, मगर दोबारा मिलन से पहले भरपाई के तौर पर एक ग़ुलाम आज़ाद किया जाए,
यह न हो सके तो दो महीने लगातार रोज़े रखे जाएं, या यह भी न हो सके तो 60 ग़रीबों को खाना खिलाया जाए।
7: मदीना में मुसलमानों के आने के बाद से ही यहूदियों के मन में उनके लिए नफ़रत और जलन की भावना थी। वे जब मुसलमानों को देखते तो आपस में कानाफूसी और इशारों में बातें करने लगते थे, जैसे कि वे कोई साज़िश कर रहे हों, मदीना के कुछ पाखंडी [मुनाफ़िक़] लोग भी ऐसा ही किया करते थे।
8: यहूदियों की एक और शरारत यह थी कि जब वे मुसलमानों से मिलते तो उन्हें "अस्सलामो अलैकुम" यानी तुम पर सलामती हो, कहने के बजाए "अस्सामो अलैकुम" यानी तुम पर बर्बादी हो, कहते थे जो सुनने में एक जैसा ही लगता था। वे अपने मन में यह भी कहते थे कि अगर ऐसी बात कहना ग़लत है, तो अल्लाह इस पर उन्हें कोई सज़ा क्यों नहीं देता?
12: कुछ लोग मुहम्मद (सल्ल) से अकेले में मिलते, तो बेज़रूरत देर तक बातें करते रहते, और आप तहज़ीब की वजह से उन्हें कह नहीं पाते थे कि अब आप चले जाएं। इस आयत में यह हुक्म हुआ कि ऐसे लोगों को मिलने से पहले ग़रीबों को कुछ दान देना चाहिए।
13: पिछली आयत में और इस आयत के आने में कुछ समय का अंतराल था। पिछली आयत में जो हुक्म हुआ उसके बाद अब मुहम्मद (सल्ल) से अकेले में मिलने वालों की संख्या बहुत कम हो गई थी, सो जब मक़सद पूरा हो गया, तो इस आयत के द्वारा वह हुक्म हटा लिया गया।
14: यहाँ मदीना के पाखंडियों [मुनाफ़िक़] का बयान है। ये लोग ऊपर से तो क़समें खाते थे कि वे मुसलमान हैं, लेकिम असल में ईमान नहीं रखते थे, इन्होंने यहूदियों के साथ सांठ-गांठ कर रखी थी, और मुसलमानों के ख़िलाफ़ साज़िशें करते रहते थे।
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