01-10: अल्लाह की तरफ़ से रसूल को आश्वासन
11-17: युद्ध के लिए जाने से आना-कानी करने की निंदा
18-21: युद्ध से हाथ आया माल और आगे भी लूट का माल मिलने का वादा
22-26: मक्का के लोगों के साथ युद्ध की हालत
27-29: मुहम्मद (सल्ल.) और उनके मानने वालों को बड़ा इनाम मिलेगा
1: यह आयत "हुदैबिया की संधि" [6 हिजरी/ 628 ई] के बारे में है, जिससे मक्का की होने वाली पक्की जीत का रास्ता खुल गया, क्योंकि अब मुसलमानों और ग़ैर-मुस्लिमों का मेल-जोल पहले से बढ़ गया जिससे ज़्यादा लोग इस्लाम क़बूल करने लगे थे, और मक्का की तरफ़ से बार-बार होने वाले हमले से मदीना के मुसलमानों को कुछ समय के लिए राहत मिल गई थी।
4: चूँकि हुदैबिया की संधि की शर्तें मुसलमानों को बराबरी की नहीं लग रही थीं, इसलिए वे ग़ुस्से और जोश में थे, मगर अल्लाह ने मुसलमानों के दिलों पर सुकून उतार दिया और उन लोगों ने मुहम्मद (सल्ल) से संधि की शर्तों को मान लेने का वचन दिया, देखें आयत 18.
6: अल्लाह और उसके रसूल के बारे में बुरे विचार बैठे होने के लिए देखें आयत 12.
10: मुसलमानों को छोटे हज [उमरा] के लिए मक्का जाने से जब रोक दिया गया, तो वे मक्का से कुछ पहले हुदैबिया नाम की जगह पर रुक गए थे, वहाँ से उन लोगों ने मक्का में बातचीत के लिए अपना दूत भेजा, फिर जब उस दूत के मारे जाने की अफ़वाह सुनने में आयी, तो फिर एक पेड़ के नीचे सब लोगों ने मुहम्मद (सल्ल) से अपनी निष्ठा का वचन दिया [बैत ए रिज़वान] और लड़ने-मरने के लिए तैयार हो गए। यहाँ उसी की तरफ़ इशारा है।
11: जब छोटे हज [उमरा] के इरादे से मुहम्मद (सल्ल) मदीना से निकले, तो उन्होंने आसपास के देहात के लोगों को भी साथ चलने को कहा था, मगर उनमें जो पाखंडी लोग थे, वे इस डर से साथ नहीं गए कि कहीं मक्का वालों से मुठभेड़ हो गई तो युद्ध लड़ना पड़ेगा।
15: हुदैबिया की संधि के बाद 7 हिजरी/ 629 ई. में जब मुसलमानों की फ़ौज ख़ैबर की जंग के लिए जाने लगी तो अल्लाह ने मुहम्मद (सल्ल) को यह ख़बर दी थी कि जीत मुसलमानों की होगी और बहुत सा लूट का माल भी मिलेगा। हुदैबिया के मोर्चे पर जिन लोगों ने बड़े धीरज से काम लिया था, उन्हें ही इस युद्ध में जाने के लिए कहा गया। दूसरे पाखंडी लोग जो पिछली लड़ाई में नहीं गए थे, इस बार लूट के माल में हिस्सेदारी की लालच में जाना चाहते थे, मगर उन्हें ले जाने से मना कर दिया गया।
16: उन देहाती पाखंडियों को ख़ैबर की जंग में तो भाग लेने से मना कर दिया गया, लेकिन कहा जा रहा है कि आगे होने वाली जंगों में उन्हें मौक़ा दिया जाएगा जबकि मुक़ाबला कड़े योद्धाओं से होगा। अगर उन लोगों ने हुक्म मानते हुए ठीक से लड़ाइयाँ लड़ीं, तो उनके गुनाहों को माफ़ कर दिया जाएगा, और इसका इनाम मिलेगा।
18: यहाँ जल्द मिलने वाली जीत से मतलब ख़ैबर की जीत है, यह इलाक़ा मदीना के उत्तर में था जहाँ यहूदियों की बड़ी संख्या आबाद थी जो मुसलमानों के ख़िलाफ़ कुछ न कुछ योजनाएं बनाते रहते थे, इस जीत से मुसलमानों को काफ़ी आर्थिक लाभ हुआ।
21: और भी कई लड़ाइयों में जीत और उनसे मिलने वाले माल की ख़बर सुनायी गई है, जैसे मक्का की जीत, हुनैन की जीत, बाद में बाइज़ेंटाइन और फ़ारस पर जीत आदि।
22: अगर मक्का के विश्वास न करने वालों ने हुदैबिया में मुसलमानों से लड़ाई लड़ी होती, तो वे ज़रूर हार जाते, मगर अल्लाह ने कई वजहों से मुसलमानों के हाथ लड़ने से रोक दिए, उनमें से मुख्य कारण आयत 25 में दिया गया है।
23: अल्लाह की रीति [सुन्नत] हमेशा से यही रही है कि अल्लाह ने अपने रसूलों की मदद की है और उसके ख़िलाफ़ लड़ने वालों को हराया है, क्योंकि सच्चाई की झूठ पर जीत होती है, अगर कभी झूठ की जीत हो भी जाए तो यह समझ लेना चाहिए कि सच्चाई वाले गिरोह के काम करने के तरीक़े में कोई कमी थी।
24: यहाँ मक्का की घाटी से मतलब वही हुदैबिया है जहाँ मुसलमानों ने पड़ाव डाला हुआ था। दोनों पक्षों में हुई संधि से पहले मक्का से 30 या 80 नौजवानों का एक दल ख़ुफिया तरीक़े से हुदैबिया में मुहम्मद (सल्ल) के क़त्ल के इरादे से घुस आया, मगर मुसलमानों ने उन्हें सही वक़्त पर पकड़ लिया। शुरू में लोग उन्हें क़त्ल करना चाहते थे, मगर बाद में उन्हें माफ़ कर दिया गया। दूसरी तरफ़ संधि की बातचीत करने के लिए मुसलमानों के दूत के रूप में गए हज़रत उस्मान (रज़ि) को भी मक्का वालों ने रोक रखा था। फिर दोनों पक्षों ने समझदारी दिखाते हुए संधि कर ली और इस तरह युद्ध टल गया। इस तरह अल्लाह ने दोनों के हाथ लड़ने से रोक दिए।
25: मुसलमानों का इरादा चूँकि छोटे हज [उमरा] का था, इसलिए वे अपने साथ क़ुरबानी के जानवर भी लेकर चले थे जिसे काबा में ले जाकर क़ुर्बान करना था, मगर उन्हें हुदैबिया से आगे मक्का तक जाने नहीं दिया गया।
27: मुहम्मद (सल्ल) ने मदीना में एक ख़्वाब देखा था कि वह अपने साथियों के साथ मक्का जाकर छोटा हज [उमरा] कर रहे हैं, इसी इरादे से सब लोग मदीना से निकले थे, मगर वे मक्का तक न जा सके और हुदैबिया से ही उन्हें लौटना पड़ा। लेकिन जो वहाँ संधि हुई उसके अनुसार अगले ही साल 7 हिजरी/ 629 ई. में मुहम्मद (सल्ल) ने अपने सभी साथियों के साथ बिना किसी डर-भय के उमरा किया, इस तरह अल्लाह ने उनका ख़्वाब पूरा कर दिया। इसके साथ ख़ैबर की जीत की ख़ुशख़बरी भी दे दी।
29: संधि की शर्तों को लिखते समय मक्का वाले मुहम्मद (सल्ल) के नाम के साथ "अल्लाह का रसूल" लिखने के लिए तैयार नहीं थे, इसलिए इस आयत में अल्लाह ने उन्हें साफ़ तौर से "अल्लाह का रसूल" बताया है। .... उनके पीछे चलने वालों की मिसाल बीज से मज़बूत पौधा बनने के चरण से दी गई है। इससे मिलती जुलती मिसालें तोरात और इंजील में भी हैं। .... तोरात में इनकी मिसाल: Deuteronomy 6:8; 11:18 “उनके माथे पर एक निशान होता है।" बाइबल में: Mark 4:26-29; 30-32 में फैले हुए सरसों के बीज की मिसाल दी गई है।