Saturday, April 21, 2018

Surah/ सूरह 48 : Al-Fath/ अल-फ़तह [जीत/ Victory]

सूरह 48: अल-फ़तह 
[जीत/ Victory]



01-10: अल्लाह की तरफ़ से रसूल को आश्वासन 

11-17: युद्ध के लिए जाने से आना-कानी करने की निंदा 

18-21: युद्ध से हाथ आया माल और आगे भी लूट का माल मिलने का वादा 

22-26: मक्का के लोगों के साथ युद्ध की हालत 

27-29: मुहम्मद (सल्ल.) और उनके मानने वालों को बड़ा इनाम मिलेगा

 

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
[ऐ रसूल!] सचमुच हमने आपके लिए एक पक्की जीत का रास्ता खोल दिया है, (1)
ताकि अल्लाह आपके पिछले गुनाहों को और आगे होने वाली भूल-चूक को माफ़ कर दे, आपके ऊपर अपनी नेमतें [Grace] पूरी कर दे, और आपको सीधे रास्ते पर चलाए, (2)
और अल्लाह आपकी ऐसी मदद करे जो ज़बरदस्त हो। (3)
वही (अल्लाह) था, जिसने ईमान रखनेवालों के दिलों के अंदर (उस समय) शान्ति व सुकून उतार दिया (जब हुदैबिया में ईमानवालों ने अपने रसूल के फ़ैसले को मानने की क़सम खायी), ताकि उनके ईमान में कुछ और ईमान की बढ़ोत्तरी हो जाए ------- आसमानों और ज़मीन की सारी ताक़तें अल्लाह ही की हैं; और वह सब कुछ जाननेवाला, हर चीज़ की समझ-बूझ रखनेवाला है------- (4)
ताकि वह ईमान रखनेवाले मर्दों और ईमानवाली औरतों को (जन्नत के) ऐसे बाग़ों में दाख़िल कर दे, जिनके नीचे नहरें बहती हैं, जहाँ वे हमेशा रहेंगे, और उनसे उनकी बुराइयाँ दूर कर दे ----- यही है अल्लाह की नज़र में बहुत बड़ी कामयाबी!----- (5)
और पाखंडी [मुनाफ़िक़/ Hypocrites] मर्दों और औरतों को, और मूर्तिपूजा करनेवाले [Idolatrous] मर्दों और औरतों को (जो अल्लाह के साथ दूसरों को जोड़ते हैं) यातना दे, जिन्होंने अपने दिलों में अल्लाह (और रसूल) के बारे में बुरे विचार बैठा रखे हैं------ वही लोग हैं जो बुराइयों के घेरे में पड़ जाएंगे! ----- जो अल्लाह की नाराज़गी उठाए फिरते हैं, जिन्हें अल्लाह ने (अपनी रहमत से) दूर कर दिया है और जिनके लिए उसने जहन्नम तैयार कर रखी है, और वह कितना बुरा ठिकाना है! (6)
आसमानों और ज़मीन की सारी ताक़तें अल्लाह की हैं; अल्लाह बहुत ताक़तवाला, और बहुत समझ-बूझ रखनेवाला है। (7)
[ऐ रसूल!] हमने आपको (सच की) गवाही देनेवाला, (ईमान व अच्छे कर्मों की) ख़ुशख़बरी सुनानेवाला, और (इंकार व बुरे कर्मों के नतीजे से) सावधान करनेवाला बनाकर भेजा है, (8)
ताकि तुम [लोग] अल्लाह और उसके रसूल पर विश्वास [ईमान] करो, उसकी मदद करो, उसका सम्मान करो, और सुबह-शाम उसकी तारीफ़ों का बखान किया करो। (9)

[ऐ रसूल] जो लोग आपके साथ अपनी निष्ठा का वचन [बै'त] देते हैं, वे असल में ख़ुद अल्लाह के साथ अपनी निष्ठा का वचन देते हैं-----(लोगों ने रसूल के हाथ पर अपना हाथ रखकर वचन दिया, तो) उनके हाथों के ऊपर अल्लाह का हाथ भी है-----और अगर कोई अपना वचन तोड़ेगा, तो ऐसा करके वह ख़ुद अपने आपको ही नुक़सान में डाल लेगा: तो जिस किसी ने अल्लाह के साथ अपना वचन निभाया, उसे अल्लाह बहुत बड़ा इनाम देगा। (10)
अरब के वह देहाती लोग [बद्‌दू] जो (हुदैबिया के अभियान में) साथ नहीं गए थे, वे अब आपसे कहेंगे, "हम (उस समय) अपनी संपत्ति और अपने परिवार (के मामलों) में व्यस्त थे: आप हमारे लिए माफ़ी की दुआ कर दें," मगर वे अपनी ज़बान से जो कुछ कहते हैं, असल में वह उनके दिलों में नहीं होतीं। आप कह दें, "अल्लाह अगर तुम्हें कोई नुक़सान या फ़ायदा पहुँचाना चाहे, तो कौन है जो तुम्हारे लिए उसके सामने कुछ भी कर सके?" नहीं! बल्कि जो कुछ भी तुम (लोग) करते हो, अल्लाह उसकी पूरी ख़बर रखता है।  (11)
"नहीं! बल्कि तुमने यह सोचा कि रसूल और उनके साथी ईमानवाले, अब कभी अपने घरवालों के पास लौटकर नहीं आएँगे और इस ख़्याल से तुम्हारे दिलों को ख़ुशी होती थी। तुम्हारी सोच बहुत बुरी व गंदी है, क्योंकि तुम भ्रष्ट लोग हो":  (12)
जो लोग अल्लाह और उसके रसूल में विश्वास [ईमान] नहीं रखते, उनके लिए हमने (जहन्नम की) भड़कती आग तैयार कर रखी है। (13)
आसमानों और ज़मीन का सारा नियंत्रण [बादशाही] अल्लाह के हाथ में है, और वह जिसे चाहे माफ़ कर देता है, और जिसे चाहे सज़ा देता है: अल्लाह (गुनाहों को) बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है।  (14)

[ऐ ईमानवालो!] जब तुम (जंग के लिए) ऐसी जगह निकल पड़ो जहाँ से 'लूट का माल' [माल-ए-ग़नीमत/ war-gains] पाने की उम्मीद हो, तो जो लोग (पिछली बार के अभियान में जान बूझकर) नहीं गए थे, वे कहेंगे, "हमें भी अपने साथ चलने दो।" वे अल्लाह की बात बदल देना चाहते हैं, मगर [ऐ रसूल!] आप उनसे कह दें, "तुम हमारे साथ नहीं चल सकते: अल्लाह ने यह बात पहले ही कह रखी है।" इस पर वे जवाब देंगे, "तुम हम से जलते हो, इसलिए नहीं ले जाते," (अफ़सोस इन पर!) ये कितने ना-समझ हैं! (15)

आप उन अरबी देहातियों [बददुओं] से कह दें, जो (मदीने में ही) रुके रह गए थे, "तुम लोगों को अब जंग में बहुत ही ताक़तवर लोगों का सामना करने और उनसे उस वक़्त तक लड़ने के लिए बुलाया जाएगा, जब तक कि वे समर्पण न कर दें: अगर तुम ने आज्ञा मानी, तो तुम्हें अच्छा इनाम दिया जाएगा, लेकिन अगर तुम ने (लड़ाई से) मुंह मोड़ा, जैसा कि तुम पहले भी कर चुके हो, तो अल्लाह तुम्हें भारी दंड देगा----- (16)
हाँ, अंधे लोगों पर, लँगड़े लोगों पर, और बीमार लोगों पर (जंग में शामिल न होने का) कोई दोष नहीं है।" जो कोई अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा मानेगा, उसे वह (जन्नत के) ऐसे बाग़ों में दाख़िल करेगा, जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी; जो कोई उससे मुँह मोड़ेगा, उसे वह दर्दनाक सज़ा देगा।  (17)

अल्लाह ईमानवालों से बहुत ख़ुश हुआ, जब (ऐ रसूल) उन लोगों ने (हुदैबिया में) एक पेड़ के नीचे आपके हाथ पर हाथ रखकर आपसे निष्ठा [बै'त] की क़सम खायी: अल्लाह जानता था जो कुछ उनके दिलों में था और इसीलिए उसने उन पर सुकून व शान्ति उतार भेजी और इनाम में उन्हें जल्द मिलने वाली जीत (की ख़बर) दी, (18)
और साथ में यह भी कि (जंग के बाद) बहुत सारे माल, उनके हाथ आ जाएंगे। अल्लाह बहुत ताक़तवाला, और समझ-बूझ रखनेवाला है। (19)
अल्लाह ने तुम (लोगों) से भविष्य में (जंग के बाद हाथ आने वाले) बहुत से माल का वादा कर रखा है: उसने तुम्हारे लिए ये फ़ायदे बहुत कम समय में ही दे दिए हैं। उसने आक्रमक लोगों के हाथ तुम तक पहुंचने से रोक रखे हैं, (ऐसा इसलिए हुआ) ताकि यह ईमानवालों के लिए एक निशानी बन सके, और यह कि वह तुम्हें सीधे मार्ग पर चलने का सही रास्ता दिखा दे। (20)
इसके अलावा कई दूसरे (लूट के) माल और भी हैं (जो मिलने वाले हैं), मगर अभी उन पर तुम्हारा ज़ोर नहीं चल सकता। (लेकिन) उनके ऊपर अल्लाह का पूरा नियंत्रण है: अल्लाह को हर चीज़ करने की ताक़त है। (21)

अगर (मक्का के) विश्वास न करनेवाले [काफ़िरों] ने तुम (लोगों) से लड़ाई लड़ी होती, तो वे (मैदान छोड़कर) भाग खड़े होते, और कोई न होता जो उन्हें बचा सकता या उनकी मदद कर सकता:  (22)
अल्लाह की रीति [सुन्नत] पहले भी ऐसी ही थी, और तुम अल्लाह की रीति में कभी कोई बदलाव नहीं पाओगे। (23)
वही (अल्लाह) था जिसने मक्का की घाटी में उनके हाथ तुम तक पहुँचने से, और तुम्हारे हाथ उन तक पहुँचने से रोक लिए, जबकि वह तुम्हें इससे पहले ही उन (मक्का से आकर हमला करनेवाले) लोगों पर जीत दे चुका था----- जो कुछ भी तुम करते हो, अल्लाह सब देखता है। (24)
ये वही लोग हैं जिन्होंने विश्वास करने से इंकार किया, तुम्हें पवित्र मस्जिद [काबा] जाने से रोका, और क़ुरबानी के जानवरों को क़ुरबान करने की जगह पहुंचने सेे रोक दिया। अगर उन (काफ़िरों) के बीच बहुत-से ईमानवाले मर्द और औरतें (मक्का में) मौजूद न होते, जिन्हें तुम नहीं जानते हो, तो तुमने उन्हें अपने क़दमों तले रौंद दिया होता, और अनजाने में ही तुम्हारे हाथों गुनाह हो जाता (इसीलिए युद्ध की अनुमति नहीं दी गयी) ----- अल्लाह जिसे चाहता है, उसे अपनी रहमत के साये में ले लेता है---- अगर (मक्का में) ईमानवाले (काफ़िरों से) अलग-थलग रह रहे होते, तो हमने विश्वास न करनेवालों को दर्दनाक सज़ा दी होती। (25)
जबकि (एक तरफ़) विश्वास न करनेवाले लोगों केे दिलों में नफ़रत व ग़ुस्सा भरा था ---- जिहालत [अज्ञानता] का ग़ुस्सा---- दूसरी तरफ़ अल्लाह ने अपने रसूल और ईमानवालों के दिलों पर शान्ति व सुकून उतार दिया और उनके लिए (हुदैबिया में पेड़ के नीचे) अल्लाह से किए हुए वादे को निभाना (और ग़लत काम से रुक जाना) ज़रूरी क़रार दिया, क्योंकि यही उनके लिए ज़्यादा सही और उचित था। और अल्लाह को हर चीज की पूरी जानकारी है। (26)

सचमुच अल्लाह ने अपने रसूल के ख़्वाब को पूरा कर दिखाया है: "अल्लाह ने चाहा, तो आप ज़रूर ही उस पवित्र मस्जिद [काबा] में सुरक्षित दाख़िल होंगे, (हज की रीति के अनुसार) अपने सिर के बाल मुंडवाए हुए या बाल छंटवाए हुए, बिना किसी डर-भय के!" ----- अल्लाह वह बातें जानता था जो आप नहीं जानते-----और उसने आपके लिए बहुत जल्द मिलने वाली जीत तय कर दी है।  (27)
वही [अल्लाह] था जिसने अपने रसूल को सही मार्गदर्शन और सच्चे दीन [religion] के साथ भेजा, ताकि यह दिखाया जा सके कि यह दीन सारे (झूठे) दीनों से बढ़कर है। और गवाह की हैसियत से अल्लाह काफ़ी है: (28)

मुहम्मद (सल.) अल्लाह के रसूल [Messenger] हैं।
जो लोग उनके पीछे चलनेवाले हैं, वे विश्वास न करनेवालों के प्रति सख़्त हैं और आपस में एक दूसरे के साथ रहम-दिल हैं। तुम उन्हें देखोगे कि अल्लाह के फ़ज़ल [bounty] की तलाश में और उसकी ख़ुशी की चाहत में वे रुकू [kneeling] और सज्दे [Prostrating] में झुके रहते हैं: उनके चहरों पर सज्दे (में बार-बार झुकने) के कारण निशान पड़ जाते हैं। तौरात [Torah] और इंजील [Gospel] में उनके बारे में इसी तरह दर्शाया गया है: जैसे किसी बीज से कोंपल निकलती है, फिर वह मज़बूत होती है, फिर बढ़कर मोटी हो जाती है, फिर अपने तने पर इस तरह सीधी खड़ी हो जाती है कि उसे उगाने वाले देखकर बहुत ख़ुश हो जाते हैं। इस तरह, अल्लाह उन (की तरक़्क़ी) से विश्वास न करनेवालों [काफ़िरों] के दिल जलाता है; जो लोग ईमान रखते हैं, और नेक व अच्छे कर्म करते हैं, उनके (गुनाहों की) माफ़ी के लिए और बहुत बड़े इनाम के लिए अल्लाह ने वादा कर रखा है। (29)
 
 
 
नोट:

1: यह आयत "हुदैबिया की संधि" [6 हिजरी/ 628 ई] के बारे में है, जिससे मक्का की होने वाली पक्की जीत का रास्ता खुल गया, क्योंकि अब मुसलमानों और ग़ैर-मुस्लिमों का मेल-जोल पहले से बढ़ गया जिससे ज़्यादा लोग इस्लाम क़बूल करने लगे थे, और मक्का की तरफ़ से बार-बार होने वाले हमले से मदीना के मुसलमानों को कुछ समय के लिए राहत मिल गई थी।  

4: चूँकि हुदैबिया की संधि की शर्तें मुसलमानों को बराबरी की नहीं लग रही थीं, इसलिए वे ग़ुस्से और जोश में थे, मगर अल्लाह ने मुसलमानों के दिलों पर सुकून उतार दिया और उन लोगों ने मुहम्मद (सल्ल) से संधि की शर्तों को मान लेने का वचन दिया, देखें आयत 18. 

6: अल्लाह और उसके रसूल के बारे में बुरे विचार बैठे होने के लिए देखें आयत 12. 

10: मुसलमानों को छोटे हज [उमरा] के लिए मक्का जाने से जब रोक दिया गया, तो वे मक्का से कुछ पहले हुदैबिया नाम की जगह पर रुक गए थे, वहाँ से उन लोगों ने मक्का में बातचीत के लिए अपना दूत भेजा, फिर जब उस दूत के मारे जाने की अफ़वाह सुनने में आयी, तो फिर एक पेड़ के नीचे सब लोगों ने मुहम्मद (सल्ल) से अपनी निष्ठा का वचन दिया [बैत ए रिज़वान] और लड़ने-मरने के लिए तैयार हो गए। यहाँ उसी की तरफ़ इशारा है।  

11: जब छोटे हज [उमरा] के इरादे से मुहम्मद (सल्ल) मदीना से निकले, तो उन्होंने आसपास के देहात के लोगों को भी साथ चलने को कहा था, मगर उनमें जो पाखंडी लोग थे, वे इस डर से साथ नहीं गए कि कहीं मक्का वालों से मुठभेड़ हो गई तो युद्ध लड़ना पड़ेगा। 

15: हुदैबिया की संधि के बाद 7 हिजरी/ 629 ई. में जब मुसलमानों की फ़ौज ख़ैबर की जंग के लिए जाने लगी तो अल्लाह ने मुहम्मद (सल्ल) को यह ख़बर दी थी कि जीत मुसलमानों की होगी और बहुत सा लूट का माल भी मिलेगा। हुदैबिया के मोर्चे पर जिन लोगों ने बड़े धीरज से काम लिया था, उन्हें ही इस युद्ध में जाने के लिए कहा गया। दूसरे पाखंडी लोग जो पिछली लड़ाई में नहीं गए थे, इस बार लूट के माल में हिस्सेदारी की लालच में जाना चाहते थे, मगर उन्हें ले जाने से मना कर दिया गया। 

16: उन देहाती पाखंडियों को ख़ैबर की जंग में तो भाग लेने से मना कर दिया गया, लेकिन कहा जा रहा है कि आगे होने वाली जंगों में उन्हें मौक़ा दिया जाएगा जबकि मुक़ाबला कड़े योद्धाओं से होगा। अगर उन लोगों ने हुक्म मानते हुए ठीक से लड़ाइयाँ लड़ीं, तो उनके गुनाहों को माफ़ कर दिया जाएगा, और इसका इनाम मिलेगा। 

18: यहाँ जल्द मिलने वाली जीत से मतलब ख़ैबर की जीत है, यह इलाक़ा मदीना के उत्तर में था जहाँ यहूदियों की बड़ी संख्या आबाद थी जो मुसलमानों के ख़िलाफ़ कुछ न कुछ योजनाएं बनाते रहते थे, इस जीत से मुसलमानों को काफ़ी आर्थिक लाभ हुआ। 

21: और भी कई लड़ाइयों में जीत और उनसे मिलने वाले माल की ख़बर सुनायी गई है, जैसे मक्का की जीत, हुनैन की जीत, बाद में बाइज़ेंटाइन और फ़ारस पर जीत आदि। 

22: अगर मक्का के विश्वास न करने वालों ने हुदैबिया में मुसलमानों से लड़ाई लड़ी होती, तो वे ज़रूर हार जाते, मगर अल्लाह ने कई वजहों से मुसलमानों के हाथ लड़ने से रोक दिए, उनमें से मुख्य कारण आयत 25 में दिया गया है। 

23: अल्लाह की रीति [सुन्नत] हमेशा से यही रही है कि अल्लाह ने अपने रसूलों की मदद की है और उसके ख़िलाफ़ लड़ने वालों को हराया है, क्योंकि सच्चाई की झूठ पर जीत होती है, अगर कभी झूठ की जीत हो भी जाए तो यह समझ लेना चाहिए कि सच्चाई वाले गिरोह के काम करने के तरीक़े में कोई कमी थी। 

24: यहाँ मक्का की घाटी से मतलब वही हुदैबिया है जहाँ मुसलमानों ने पड़ाव डाला हुआ था। दोनों पक्षों में हुई संधि से पहले मक्का से 30 या 80 नौजवानों का एक दल ख़ुफिया तरीक़े से हुदैबिया में मुहम्मद (सल्ल) के क़त्ल के इरादे से घुस आया, मगर मुसलमानों ने उन्हें सही वक़्त पर पकड़ लिया। शुरू में लोग उन्हें क़त्ल करना चाहते थे, मगर बाद में उन्हें माफ़ कर दिया गया। दूसरी तरफ़ संधि की बातचीत करने के लिए मुसलमानों के दूत के रूप में गए हज़रत उस्मान (रज़ि) को भी मक्का वालों ने रोक रखा था। फिर दोनों पक्षों ने समझदारी दिखाते हुए संधि कर ली और इस तरह युद्ध टल गया। इस तरह अल्लाह ने दोनों के हाथ लड़ने से रोक दिए। 

25: मुसलमानों का इरादा चूँकि छोटे हज [उमरा] का था, इसलिए वे अपने साथ क़ुरबानी के जानवर भी लेकर चले थे जिसे काबा में ले जाकर क़ुर्बान करना था, मगर उन्हें हुदैबिया से आगे मक्का तक जाने नहीं दिया गया।  

27: मुहम्मद (सल्ल) ने मदीना में एक ख़्वाब देखा था कि वह अपने साथियों के साथ मक्का जाकर छोटा हज [उमरा] कर रहे हैं, इसी इरादे से सब लोग मदीना से निकले थे, मगर वे मक्का तक न जा सके और हुदैबिया से ही उन्हें लौटना पड़ा। लेकिन जो वहाँ संधि हुई उसके अनुसार अगले ही साल 7 हिजरी/ 629 ई. में मुहम्मद (सल्ल) ने अपने सभी साथियों के साथ बिना किसी डर-भय के उमरा किया, इस तरह अल्लाह ने उनका ख़्वाब पूरा कर दिया। इसके साथ ख़ैबर की जीत की ख़ुशख़बरी भी दे दी। 

29: संधि की शर्तों को लिखते समय मक्का वाले मुहम्मद (सल्ल) के नाम के साथ "अल्लाह का रसूल" लिखने के लिए तैयार नहीं थे, इसलिए इस आयत में अल्लाह ने उन्हें साफ़ तौर से "अल्लाह का रसूल" बताया है। .... उनके पीछे चलने वालों की मिसाल बीज से मज़बूत पौधा बनने के चरण से दी गई है। इससे मिलती जुलती मिसालें तोरात और इंजील में भी हैं। .... तोरात में इनकी मिसाल: Deuteronomy 6:8; 11:18 “उनके माथे पर एक निशान होता है।" बाइबल में: Mark 4:26-29; 30-32 में फैले हुए सरसों के बीज की मिसाल दी गई है। 


Sunday, April 1, 2018

सूरह 49 : अल-हुजुरात / Al Hujurat [रहने के कमरे / The Private Rooms]



सूरह 49: अल-हुजुरात
 [रहने के कमरे / The Private Rooms]

01-05: ईमानवालों को अपने रसूल के साथ आदर से पेश आना चाहिए

06-08: ईमानवालों को छान-बीन करके समझदारी से काम लेना चाहिए


09-13: ईमानवालों के आपसी संबंध

 

14-18: अरब के देहाती लोगों की सोच की निंदा 

 



अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
ऐ ईमानवालो! अल्लाह और उसके रसूल की मौजूदगी में (अपनी बात पर लोगों का ध्यान खींचने के लिए) आगे बढ़-बढ़कर बातें न किया करो----- और अल्लाह से डरते रहो: अल्लाह सब सुनता है, सब कुछ जानता है------ (1)
ऐ ईमानवालो!, अपनी आवाज़ों को नबी की आवाज़ से ऊँची न किया करो, और जिस तरह तुम आपस में एक-दूसरे से (ऊँची आवाज़ में) बातें करते हो, उस तरह उनसे ऊँची आवाज़ में बात न किया करो, कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारे (अच्छे) कर्म बर्बाद हो जाएँ और तुम्हें पता भी न चले। (2)
जो लोग अल्लाह के रसूल के सामने अपनी आवाज़ नीची रखते हैं, वही लोग हैं जिनके दिलों को अल्लाह ने (बुराइयों से) बचकर रहने के लिए परखकर चुन लिया है-----उन्हें (गुनाहों की) माफ़ी भी मिलेगी, और ज़बरदस्त इनाम भी ------ (3)
मगर [ऐ रसूल!], आपको जो लोग आपके कमरों [हुजरे] के बाहर से पुकारते हैं, उनमें से ज़्यादातर समझ-बूझ से काम नहीं लेते। (4)
(बजाए बाहर से पुकारने के) अगर वे धीरज रखते हुए उस समय तक इंतज़ार करते, जब तक कि आप ख़ुद ही बाहर निकलकर उनके पास आ जाते, तो यह उनके लिए बेहतर होता, वैसे अल्लाह बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है। (5)

ऐ ईमान रखनेवालो!, अगर (सही रास्ते से भटका हुआ) कोई बदमाश, तुम्हारे पास कोई ख़बर लेकर आए, तो पहले उसकी छानबीन कर लिया करो, कहीं ऐसा न हो कि तुम दूसरों को अनजाने में नुक़सान पहुँचा बैठो, और फिर अपने किए पर पछताते रहो,  (6)
और यह बात जान लो कि तुम्हारे बीच अल्लाह के रसूल मौजूद हैं: बहुत-से मामलों में अगर सचमुच वह तुम्हारी इच्छाओं को मान लें, तो तुम कठिनाई में पड़ जाओ। मगर अल्लाह ने तुम्हारे अंदर ईमान की मुहब्बत डाल दी है, और उसे तुम्हारे दिलों के लिए आकर्षक बनाया है; और (सच्चाई से) इंकार [कुफ़्र], गुनाह के काम, और आज्ञा न मानने जैसी चीज़ों को तुम्हारे लिए बहुत अप्रिय बनाया है। ऐसे ही लोग हैं जो अल्लाह के दिखाए गए सही रास्ते पर हैं,  (7)
जो अल्लाह के फ़ज़ल [favours] और नेमत [blessing] का नतीजा है: अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, बड़ी समझ-बूझ रखनेवाला है। (8)

अगर ईमानवालों के दो गिरोह आपस में लड़ पड़ें, तो (ऐ ईमानवालो) तुम्हें उनके बीच सुलह कराने की कोशिश करनी चाहिए; अगर उनमें से एक गिरोह दूसरे पर (साफ़ तौर पर) ज़ुल्म कर रहा हो, तो ज़ुल्म करनेवाले (गिरोह) के ख़िलाफ़ उस समय तक लड़ो, जब तक कि वे अल्लाह के हुक्म के सामने झुक न जाएं। फिर उनके बीच न्याय और बराबरी का ध्यान रखते हुए सुलह करा दो: अल्लाह बराबरी का इंसाफ़ करनेवालों को पसन्द करता है। (9)
ईमानवाले भाई-भाई होते हैं, अतः अपने दो भाईयों के बीच सुलह करा दो और अल्लाह का डर रखो, ताकि तुम पर दया की जा सके। (10)

ऐ ईमान रखनेवालो!, मर्दों के एक गिरोह को दूसरे (गिरोह के) मर्दों की हँसी नहीं उड़ानी चाहिए, हो सकता है कि (जिनकी हँसी उड़ा रहे हैं), वे उनसे बेहतर हों, और औरतों के गिरोह को भी दूसरे (गिरोह की) औरतों की हँसी नहीं उड़ानी चाहिए, हो सकता है कि (जिनकी हँसी उड़ायी जा रही हो) वे उनसे बेहतर हों; एक दूसरे को बुरी बातें न कहो; और न आपस में एक-दूसरे को चिढ़ाने वाले पुकारू नामों [nicknames] से बुलाओ। यह कितनी बुरी बात है कि कोई ईमान लाने के बाद भी "बदमाश" के नाम से जाना जाए! जो लोग अपने इस आचरण पर नहीं पछताते हैं, ऐसे लोग बहुत बुरा काम करते हैं। (11)
ऐ ईमानवालो! किसी चीज़ के बारे में पहले से ही बहुत सारी धारणाएं [assumptions] बनाने से बचा करो----- कुछ पूर्व-धारणाएं गुनाह होती हैं---- और एक दूसरे की जासूसी मत किया करो या लोगों की पीठ-पीछे बुराई न किया करो: क्या तुममें से कोई अपने मरे हुए भाई का गोश्त खाना पसंद करेगा? नहीं, बल्कि तुम उससे नफ़रत करोगे। अत: अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से बचो: अल्लाह हमेशा (मन से की गयी) तौबा क़बूल करनेवाला, बेहद दयावान है। (12)
लोगो! हमनें तुम सबको अकेले मर्द और अकेली औरत से पैदा किया, और तुम्हें नस्लों [क़ौमों] और क़बीलों में बाँट दिया, ताकि तुम एक-दूसरे को पहचान सको। अल्लाह की नज़र में तुममें सबसे ज़्यादा इज़्ज़तवाला वह है, जो सबसे ज़्यादा अल्लाह से (डरते हुए) बुराइयों से बचने वाला है। अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, हर चीज़ की ख़बर रखनेवाला है। (13)

रेगिस्तान में रहनेवाले अरबी (बद्‌दू) कहते हैं, "हम ईमान रखते हैं।" [ऐ रसूल!] आप कह दें, "तुम्हें (पक्का) ईमान नहीं है। सो तुम्हें अभी इतना ही कहना चाहिए, 'हम ने इस्लाम [अल्लाह के सामने समर्पण] को मान लिया है”, क्योंकि ईमान तो अभी तुम्हारे दिलों में दाख़िल ही नहीं हुआ है।’ अगर तुम अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा मानोगे, तो वह तुम्हारे किसी भी कर्म को कम करके नहीं आँकेगा: अल्लाह गुनाहों को बहुत माफ़ करनेवाला, अत्यन्त दयावान है।" (14)
असल ईमानवाले वे हैं जिन्होंने अल्लाह और उसके रसूल पर (दिल से) ईमान रखा, फिर किसी सन्देह में नहीं पड़े, और अपनी जान-माल और अपने लोगों के साथ अल्लाह के रास्ते में संघर्ष [जिहाद] किया: (यक़ीन मानो) वही लोग हैं जो (अपने दावे में) सच्चे हैं। (15)
आप (बद्दुओं से) कहें, "क्या तुम ऐसा मानते हो कि तुम अल्लाह को अपने दीन [धर्म] के बारे में बताओगे, जबकि अल्लाह आसमानों और ज़मीन की हर चीज़ जानता है, और उसे सारी चीज़ों की पूरी जानकारी है?” (16)
वे सोचते हैं कि इस्लाम क़ुबूल करके उन्होंने [ऐ रसूल] आप पर बड़ा एहसान किया है, आप कह दें, "ऐसा मत समझो कि इस्लाम क़ुबूल करके तुमने मुझ पर कोई एहसान कर दिया है; अगर तुम अपनी बात में पक्के हो, तो असल में तो अल्लाह है, जिसने तुम्हें ईमान वाला रास्ता दिखाकर तुम पर एहसान किया है।"  (17)
"अल्लाह आसमानों और ज़मीन के सारे छिपे हुए राज़ जानता है: जो कुछ भी तुम करते हो, अल्लाह हर चीज़ देखता है।" (18)



नोट:

1: इसकी पहली पाँच आयतें एक ख़ास मौक़े पर उतरी थीं। मदीना में मुहम्मद (सल्ल) से अरब के कई क़बीलों के प्रतिनिधिमंडल मिलने के लिए आते रहते थे, आगे भी संबंध बना रहे, इसके लिए उनमें से  आप (सल्ल) किसी को उस क़बीले का अमीर बना देते थे। एक बार बनु तमीम के क़बीले के लोग मिलने आए, मगर आपने किसी को उनके लिए अमीर नहीं चुना, इस बीच, अबु बकर (रज़ि) ने अमीर के लिए एक नाम सुझाया, और उमर (रज़ि) ने दूसरा नाम सुझा दिया, और दोनों एक दूसरे से तेज़ आवाज़ में बहस करने लगे। इसी मौक़े पर यह आयतें उतरीं जिसमें मुहम्मद (सल्ल) की मौजूदगी में बात करने का सही तरीक़ा बताया गया है। 

4: तमीम के क़बीले के लोग दोपहर के समय मदीना आए थे, जब मुहम्मद (सल्ल) आराम कर रहे थे, उसी समय उन लोगों ने आप (सल्ल) को उनके कमरे के बाहर से ही आवाज़ लगाना शुरू कर दिया, जिसके लिए इस आयत में मना किया गया है।  

6: वैसे तो यहाँ एक आम उसूल बताया गया है, मगर इस आयत के उतरने के पीछे एक घटना बतायी जाती है। क़रीब 5 हिजरी/ 627 ई. में मदीना के मुसलमानों और क़बीला बनु मस्तलिक़ के बीच एक युद्ध हुआ था, जिसमें हारने के बाद उस क़बीले ने इस्लाम क़बूल कर लिया और ज़कात देना मंज़ूर कर लिया था। जब मदीना से वलीद बिन अक़बा को ज़कात वसूल करने के लिए बनु मस्तलिक़ के पास भेजा गया, तो यह ख़बर सुनकर वहाँ शहर के दरवाज़े पर उस दूत के स्वागत के लिए बहुत से लोग जमा हो गए, किसी बदमाश ने शायद वलीद को बताया कि वे तुम्हें मारने के लिए जमा हैं, वलीद की उन लोगों से कुछ पुरानी दुश्मनी भी थी, इसलिए बिना ठीक से पता लगाए वह वहाँ से वापस आ गए और उन्होंने मुहम्मद (सल्ल) को इसके बारे में सूचित किया। अब युद्ध की स्थिति बन गई, मगर फिर, जब ठीक से पता लगाया गया तो यह बात ग़लत निकली और दोनों गुट आपस में लड़ने से बच गए। 

11: यहाँ "बदमाश" [mischief-maker] उसे कहा गया है जो ऊपर बतायी गई सारी बुरी हरकतें करके समाज में बुराई फैलाता हो, यह गुनाह के काम हैं और एक ईमानवाले के लिए तो बहुत ही ग़लत काम है। 

12: यानी बिना ठीक से जाँचे-परखे किसी के बारे में बुरी धारणाएं [बदगुमानी] बैठा लेना गुनाह है। किसी की कमी तलाश करने के लिए उसकी टोह में लगे रहना भी गुनाह का काम है, इसी तरह, पीठ पीछे किसी की बुराई करना तो ऐसा है जैसे अपने मरे भाई का गोश्त खाना! इन सब चीज़ों से बचना चाहिए। 

13: नस्ल और क़बीले केवल आदमी की पहचान के लिए है, इसके आधार पर किसी की बड़ाई नहीं साबित होती, बल्कि असल इज़्ज़त और बड़ाई तो उसी की है जो अल्लाह से डरते हुए अपने आपको बुराइयों से बचाता है। अल्लाह सब जानता है: आदमी की असली औक़ात [true-worth] भी और उसके मन में बैठे हुए विचारों को भी, (इसे भी देखें 50: 16). 

14: केवल मुँह से कह देने से कि हम मुसलमान हो गए, आदमी सचमुच का मुसलमान नहीं हो जाता, बल्कि उसमें सच्चा ईमान [belief] होना ज़रूरी है। बताया जाता है कि अरब में जब अकाल पड़ा तो बनु असद क़बीले के लोग मदीना आ गए और यह सोचकर कि उनकी हालत अच्छी हो जाएगी और उन्हें भी मुसलमानों जैसे अधिकार मिल जाएंगे, उन्होंने इस्लाम क़बूल तो कर लिया, लेकिन मन में रसूल की मुहब्बत नहीं बैठी थी और न ही उनके आदेशों को मानने के लिए वे मन से तैयार थे। । 

 


Surah/सूरह 1: Al-Fatiha/अल-फ़ातिहा [(किताब की) शुरुआत/ The Opening]

       सूरह 1: अल-फ़ातिहा    [(किताब की) शुरुआत/ The Opening] यह एक मक्की सूरह है। पूरे क़ुरआन में अल्लाह का जो संदेश आया है , उसका इस सूरह मे...