Saturday, April 21, 2018

Surah/ सूरह 48 : Al-Fath/ अल-फ़तह [जीत/ Victory]

सूरह 48: अल-फ़तह 
[जीत/ Victory]



01-10: अल्लाह की तरफ़ से रसूल को आश्वासन 

11-17: युद्ध के लिए जाने से आना-कानी करने की निंदा 

18-21: युद्ध से हाथ आया माल और आगे भी लूट का माल मिलने का वादा 

22-26: मक्का के लोगों के साथ युद्ध की हालत 

27-29: मुहम्मद (सल्ल.) और उनके मानने वालों को बड़ा इनाम मिलेगा

 

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
[ऐ रसूल!] सचमुच हमने आपके लिए एक पक्की जीत का रास्ता खोल दिया है, (1)
ताकि अल्लाह आपके पिछले गुनाहों को और आगे होने वाली भूल-चूक को माफ़ कर दे, आपके ऊपर अपनी नेमतें [Grace] पूरी कर दे, और आपको सीधे रास्ते पर चलाए, (2)
और अल्लाह आपकी ऐसी मदद करे जो ज़बरदस्त हो। (3)
वही (अल्लाह) था, जिसने ईमान रखनेवालों के दिलों के अंदर (उस समय) शान्ति व सुकून उतार दिया (जब हुदैबिया में ईमानवालों ने अपने रसूल के फ़ैसले को मानने की क़सम खायी), ताकि उनके ईमान में कुछ और ईमान की बढ़ोत्तरी हो जाए ------- आसमानों और ज़मीन की सारी ताक़तें अल्लाह ही की हैं; और वह सब कुछ जाननेवाला, हर चीज़ की समझ-बूझ रखनेवाला है------- (4)
ताकि वह ईमान रखनेवाले मर्दों और ईमानवाली औरतों को (जन्नत के) ऐसे बाग़ों में दाख़िल कर दे, जिनके नीचे नहरें बहती हैं, जहाँ वे हमेशा रहेंगे, और उनसे उनकी बुराइयाँ दूर कर दे ----- यही है अल्लाह की नज़र में बहुत बड़ी कामयाबी!----- (5)
और पाखंडी [मुनाफ़िक़/ Hypocrites] मर्दों और औरतों को, और मूर्तिपूजा करनेवाले [Idolatrous] मर्दों और औरतों को (जो अल्लाह के साथ दूसरों को जोड़ते हैं) यातना दे, जिन्होंने अपने दिलों में अल्लाह (और रसूल) के बारे में बुरे विचार बैठा रखे हैं------ वही लोग हैं जो बुराइयों के घेरे में पड़ जाएंगे! ----- जो अल्लाह की नाराज़गी उठाए फिरते हैं, जिन्हें अल्लाह ने (अपनी रहमत से) दूर कर दिया है और जिनके लिए उसने जहन्नम तैयार कर रखी है, और वह कितना बुरा ठिकाना है! (6)
आसमानों और ज़मीन की सारी ताक़तें अल्लाह की हैं; अल्लाह बहुत ताक़तवाला, और बहुत समझ-बूझ रखनेवाला है। (7)
[ऐ रसूल!] हमने आपको (सच की) गवाही देनेवाला, (ईमान व अच्छे कर्मों की) ख़ुशख़बरी सुनानेवाला, और (इंकार व बुरे कर्मों के नतीजे से) सावधान करनेवाला बनाकर भेजा है, (8)
ताकि तुम [लोग] अल्लाह और उसके रसूल पर विश्वास [ईमान] करो, उसकी मदद करो, उसका सम्मान करो, और सुबह-शाम उसकी तारीफ़ों का बखान किया करो। (9)

[ऐ रसूल] जो लोग आपके साथ अपनी निष्ठा का वचन [बै'त] देते हैं, वे असल में ख़ुद अल्लाह के साथ अपनी निष्ठा का वचन देते हैं-----(लोगों ने रसूल के हाथ पर अपना हाथ रखकर वचन दिया, तो) उनके हाथों के ऊपर अल्लाह का हाथ भी है-----और अगर कोई अपना वचन तोड़ेगा, तो ऐसा करके वह ख़ुद अपने आपको ही नुक़सान में डाल लेगा: तो जिस किसी ने अल्लाह के साथ अपना वचन निभाया, उसे अल्लाह बहुत बड़ा इनाम देगा। (10)
अरब के वह देहाती लोग [बद्‌दू] जो (हुदैबिया के अभियान में) साथ नहीं गए थे, वे अब आपसे कहेंगे, "हम (उस समय) अपनी संपत्ति और अपने परिवार (के मामलों) में व्यस्त थे: आप हमारे लिए माफ़ी की दुआ कर दें," मगर वे अपनी ज़बान से जो कुछ कहते हैं, असल में वह उनके दिलों में नहीं होतीं। आप कह दें, "अल्लाह अगर तुम्हें कोई नुक़सान या फ़ायदा पहुँचाना चाहे, तो कौन है जो तुम्हारे लिए उसके सामने कुछ भी कर सके?" नहीं! बल्कि जो कुछ भी तुम (लोग) करते हो, अल्लाह उसकी पूरी ख़बर रखता है।  (11)
"नहीं! बल्कि तुमने यह सोचा कि रसूल और उनके साथी ईमानवाले, अब कभी अपने घरवालों के पास लौटकर नहीं आएँगे और इस ख़्याल से तुम्हारे दिलों को ख़ुशी होती थी। तुम्हारी सोच बहुत बुरी व गंदी है, क्योंकि तुम भ्रष्ट लोग हो":  (12)
जो लोग अल्लाह और उसके रसूल में विश्वास [ईमान] नहीं रखते, उनके लिए हमने (जहन्नम की) भड़कती आग तैयार कर रखी है। (13)
आसमानों और ज़मीन का सारा नियंत्रण [बादशाही] अल्लाह के हाथ में है, और वह जिसे चाहे माफ़ कर देता है, और जिसे चाहे सज़ा देता है: अल्लाह (गुनाहों को) बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है।  (14)

[ऐ ईमानवालो!] जब तुम (जंग के लिए) ऐसी जगह निकल पड़ो जहाँ से 'लूट का माल' [माल-ए-ग़नीमत/ war-gains] पाने की उम्मीद हो, तो जो लोग (पिछली बार के अभियान में जान बूझकर) नहीं गए थे, वे कहेंगे, "हमें भी अपने साथ चलने दो।" वे अल्लाह की बात बदल देना चाहते हैं, मगर [ऐ रसूल!] आप उनसे कह दें, "तुम हमारे साथ नहीं चल सकते: अल्लाह ने यह बात पहले ही कह रखी है।" इस पर वे जवाब देंगे, "तुम हम से जलते हो, इसलिए नहीं ले जाते," (अफ़सोस इन पर!) ये कितने ना-समझ हैं! (15)

आप उन अरबी देहातियों [बददुओं] से कह दें, जो (मदीने में ही) रुके रह गए थे, "तुम लोगों को अब जंग में बहुत ही ताक़तवर लोगों का सामना करने और उनसे उस वक़्त तक लड़ने के लिए बुलाया जाएगा, जब तक कि वे समर्पण न कर दें: अगर तुम ने आज्ञा मानी, तो तुम्हें अच्छा इनाम दिया जाएगा, लेकिन अगर तुम ने (लड़ाई से) मुंह मोड़ा, जैसा कि तुम पहले भी कर चुके हो, तो अल्लाह तुम्हें भारी दंड देगा----- (16)
हाँ, अंधे लोगों पर, लँगड़े लोगों पर, और बीमार लोगों पर (जंग में शामिल न होने का) कोई दोष नहीं है।" जो कोई अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा मानेगा, उसे वह (जन्नत के) ऐसे बाग़ों में दाख़िल करेगा, जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी; जो कोई उससे मुँह मोड़ेगा, उसे वह दर्दनाक सज़ा देगा।  (17)

अल्लाह ईमानवालों से बहुत ख़ुश हुआ, जब (ऐ रसूल) उन लोगों ने (हुदैबिया में) एक पेड़ के नीचे आपके हाथ पर हाथ रखकर आपसे निष्ठा [बै'त] की क़सम खायी: अल्लाह जानता था जो कुछ उनके दिलों में था और इसीलिए उसने उन पर सुकून व शान्ति उतार भेजी और इनाम में उन्हें जल्द मिलने वाली जीत (की ख़बर) दी, (18)
और साथ में यह भी कि (जंग के बाद) बहुत सारे माल, उनके हाथ आ जाएंगे। अल्लाह बहुत ताक़तवाला, और समझ-बूझ रखनेवाला है। (19)
अल्लाह ने तुम (लोगों) से भविष्य में (जंग के बाद हाथ आने वाले) बहुत से माल का वादा कर रखा है: उसने तुम्हारे लिए ये फ़ायदे बहुत कम समय में ही दे दिए हैं। उसने आक्रमक लोगों के हाथ तुम तक पहुंचने से रोक रखे हैं, (ऐसा इसलिए हुआ) ताकि यह ईमानवालों के लिए एक निशानी बन सके, और यह कि वह तुम्हें सीधे मार्ग पर चलने का सही रास्ता दिखा दे। (20)
इसके अलावा कई दूसरे (लूट के) माल और भी हैं (जो मिलने वाले हैं), मगर अभी उन पर तुम्हारा ज़ोर नहीं चल सकता। (लेकिन) उनके ऊपर अल्लाह का पूरा नियंत्रण है: अल्लाह को हर चीज़ करने की ताक़त है। (21)

अगर (मक्का के) विश्वास न करनेवाले [काफ़िरों] ने तुम (लोगों) से लड़ाई लड़ी होती, तो वे (मैदान छोड़कर) भाग खड़े होते, और कोई न होता जो उन्हें बचा सकता या उनकी मदद कर सकता:  (22)
अल्लाह की रीति [सुन्नत] पहले भी ऐसी ही थी, और तुम अल्लाह की रीति में कभी कोई बदलाव नहीं पाओगे। (23)
वही (अल्लाह) था जिसने मक्का की घाटी में उनके हाथ तुम तक पहुँचने से, और तुम्हारे हाथ उन तक पहुँचने से रोक लिए, जबकि वह तुम्हें इससे पहले ही उन (मक्का से आकर हमला करनेवाले) लोगों पर जीत दे चुका था----- जो कुछ भी तुम करते हो, अल्लाह सब देखता है। (24)
ये वही लोग हैं जिन्होंने विश्वास करने से इंकार किया, तुम्हें पवित्र मस्जिद [काबा] जाने से रोका, और क़ुरबानी के जानवरों को क़ुरबान करने की जगह पहुंचने सेे रोक दिया। अगर उन (काफ़िरों) के बीच बहुत-से ईमानवाले मर्द और औरतें (मक्का में) मौजूद न होते, जिन्हें तुम नहीं जानते हो, तो तुमने उन्हें अपने क़दमों तले रौंद दिया होता, और अनजाने में ही तुम्हारे हाथों गुनाह हो जाता (इसीलिए युद्ध की अनुमति नहीं दी गयी) ----- अल्लाह जिसे चाहता है, उसे अपनी रहमत के साये में ले लेता है---- अगर (मक्का में) ईमानवाले (काफ़िरों से) अलग-थलग रह रहे होते, तो हमने विश्वास न करनेवालों को दर्दनाक सज़ा दी होती। (25)
जबकि (एक तरफ़) विश्वास न करनेवाले लोगों केे दिलों में नफ़रत व ग़ुस्सा भरा था ---- जिहालत [अज्ञानता] का ग़ुस्सा---- दूसरी तरफ़ अल्लाह ने अपने रसूल और ईमानवालों के दिलों पर शान्ति व सुकून उतार दिया और उनके लिए (हुदैबिया में पेड़ के नीचे) अल्लाह से किए हुए वादे को निभाना (और ग़लत काम से रुक जाना) ज़रूरी क़रार दिया, क्योंकि यही उनके लिए ज़्यादा सही और उचित था। और अल्लाह को हर चीज की पूरी जानकारी है। (26)

सचमुच अल्लाह ने अपने रसूल के ख़्वाब को पूरा कर दिखाया है: "अल्लाह ने चाहा, तो आप ज़रूर ही उस पवित्र मस्जिद [काबा] में सुरक्षित दाख़िल होंगे, (हज की रीति के अनुसार) अपने सिर के बाल मुंडवाए हुए या बाल छंटवाए हुए, बिना किसी डर-भय के!" ----- अल्लाह वह बातें जानता था जो आप नहीं जानते-----और उसने आपके लिए बहुत जल्द मिलने वाली जीत तय कर दी है।  (27)
वही [अल्लाह] था जिसने अपने रसूल को सही मार्गदर्शन और सच्चे दीन [religion] के साथ भेजा, ताकि यह दिखाया जा सके कि यह दीन सारे (झूठे) दीनों से बढ़कर है। और गवाह की हैसियत से अल्लाह काफ़ी है: (28)

मुहम्मद (सल.) अल्लाह के रसूल [Messenger] हैं।
जो लोग उनके पीछे चलनेवाले हैं, वे विश्वास न करनेवालों के प्रति सख़्त हैं और आपस में एक दूसरे के साथ रहम-दिल हैं। तुम उन्हें देखोगे कि अल्लाह के फ़ज़ल [bounty] की तलाश में और उसकी ख़ुशी की चाहत में वे रुकू [kneeling] और सज्दे [Prostrating] में झुके रहते हैं: उनके चहरों पर सज्दे (में बार-बार झुकने) के कारण निशान पड़ जाते हैं। तौरात [Torah] और इंजील [Gospel] में उनके बारे में इसी तरह दर्शाया गया है: जैसे किसी बीज से कोंपल निकलती है, फिर वह मज़बूत होती है, फिर बढ़कर मोटी हो जाती है, फिर अपने तने पर इस तरह सीधी खड़ी हो जाती है कि उसे उगाने वाले देखकर बहुत ख़ुश हो जाते हैं। इस तरह, अल्लाह उन (की तरक़्क़ी) से विश्वास न करनेवालों [काफ़िरों] के दिल जलाता है; जो लोग ईमान रखते हैं, और नेक व अच्छे कर्म करते हैं, उनके (गुनाहों की) माफ़ी के लिए और बहुत बड़े इनाम के लिए अल्लाह ने वादा कर रखा है। (29)
 
 
 
नोट:

1: यह आयत "हुदैबिया की संधि" [6 हिजरी/ 628 ई] के बारे में है, जिससे मक्का की होने वाली पक्की जीत का रास्ता खुल गया, क्योंकि अब मुसलमानों और ग़ैर-मुस्लिमों का मेल-जोल पहले से बढ़ गया जिससे ज़्यादा लोग इस्लाम क़बूल करने लगे थे, और मक्का की तरफ़ से बार-बार होने वाले हमले से मदीना के मुसलमानों को कुछ समय के लिए राहत मिल गई थी।  

4: चूँकि हुदैबिया की संधि की शर्तें मुसलमानों को बराबरी की नहीं लग रही थीं, इसलिए वे ग़ुस्से और जोश में थे, मगर अल्लाह ने मुसलमानों के दिलों पर सुकून उतार दिया और उन लोगों ने मुहम्मद (सल्ल) से संधि की शर्तों को मान लेने का वचन दिया, देखें आयत 18. 

6: अल्लाह और उसके रसूल के बारे में बुरे विचार बैठे होने के लिए देखें आयत 12. 

10: मुसलमानों को छोटे हज [उमरा] के लिए मक्का जाने से जब रोक दिया गया, तो वे मक्का से कुछ पहले हुदैबिया नाम की जगह पर रुक गए थे, वहाँ से उन लोगों ने मक्का में बातचीत के लिए अपना दूत भेजा, फिर जब उस दूत के मारे जाने की अफ़वाह सुनने में आयी, तो फिर एक पेड़ के नीचे सब लोगों ने मुहम्मद (सल्ल) से अपनी निष्ठा का वचन दिया [बैत ए रिज़वान] और लड़ने-मरने के लिए तैयार हो गए। यहाँ उसी की तरफ़ इशारा है।  

11: जब छोटे हज [उमरा] के इरादे से मुहम्मद (सल्ल) मदीना से निकले, तो उन्होंने आसपास के देहात के लोगों को भी साथ चलने को कहा था, मगर उनमें जो पाखंडी लोग थे, वे इस डर से साथ नहीं गए कि कहीं मक्का वालों से मुठभेड़ हो गई तो युद्ध लड़ना पड़ेगा। 

15: हुदैबिया की संधि के बाद 7 हिजरी/ 629 ई. में जब मुसलमानों की फ़ौज ख़ैबर की जंग के लिए जाने लगी तो अल्लाह ने मुहम्मद (सल्ल) को यह ख़बर दी थी कि जीत मुसलमानों की होगी और बहुत सा लूट का माल भी मिलेगा। हुदैबिया के मोर्चे पर जिन लोगों ने बड़े धीरज से काम लिया था, उन्हें ही इस युद्ध में जाने के लिए कहा गया। दूसरे पाखंडी लोग जो पिछली लड़ाई में नहीं गए थे, इस बार लूट के माल में हिस्सेदारी की लालच में जाना चाहते थे, मगर उन्हें ले जाने से मना कर दिया गया। 

16: उन देहाती पाखंडियों को ख़ैबर की जंग में तो भाग लेने से मना कर दिया गया, लेकिन कहा जा रहा है कि आगे होने वाली जंगों में उन्हें मौक़ा दिया जाएगा जबकि मुक़ाबला कड़े योद्धाओं से होगा। अगर उन लोगों ने हुक्म मानते हुए ठीक से लड़ाइयाँ लड़ीं, तो उनके गुनाहों को माफ़ कर दिया जाएगा, और इसका इनाम मिलेगा। 

18: यहाँ जल्द मिलने वाली जीत से मतलब ख़ैबर की जीत है, यह इलाक़ा मदीना के उत्तर में था जहाँ यहूदियों की बड़ी संख्या आबाद थी जो मुसलमानों के ख़िलाफ़ कुछ न कुछ योजनाएं बनाते रहते थे, इस जीत से मुसलमानों को काफ़ी आर्थिक लाभ हुआ। 

21: और भी कई लड़ाइयों में जीत और उनसे मिलने वाले माल की ख़बर सुनायी गई है, जैसे मक्का की जीत, हुनैन की जीत, बाद में बाइज़ेंटाइन और फ़ारस पर जीत आदि। 

22: अगर मक्का के विश्वास न करने वालों ने हुदैबिया में मुसलमानों से लड़ाई लड़ी होती, तो वे ज़रूर हार जाते, मगर अल्लाह ने कई वजहों से मुसलमानों के हाथ लड़ने से रोक दिए, उनमें से मुख्य कारण आयत 25 में दिया गया है। 

23: अल्लाह की रीति [सुन्नत] हमेशा से यही रही है कि अल्लाह ने अपने रसूलों की मदद की है और उसके ख़िलाफ़ लड़ने वालों को हराया है, क्योंकि सच्चाई की झूठ पर जीत होती है, अगर कभी झूठ की जीत हो भी जाए तो यह समझ लेना चाहिए कि सच्चाई वाले गिरोह के काम करने के तरीक़े में कोई कमी थी। 

24: यहाँ मक्का की घाटी से मतलब वही हुदैबिया है जहाँ मुसलमानों ने पड़ाव डाला हुआ था। दोनों पक्षों में हुई संधि से पहले मक्का से 30 या 80 नौजवानों का एक दल ख़ुफिया तरीक़े से हुदैबिया में मुहम्मद (सल्ल) के क़त्ल के इरादे से घुस आया, मगर मुसलमानों ने उन्हें सही वक़्त पर पकड़ लिया। शुरू में लोग उन्हें क़त्ल करना चाहते थे, मगर बाद में उन्हें माफ़ कर दिया गया। दूसरी तरफ़ संधि की बातचीत करने के लिए मुसलमानों के दूत के रूप में गए हज़रत उस्मान (रज़ि) को भी मक्का वालों ने रोक रखा था। फिर दोनों पक्षों ने समझदारी दिखाते हुए संधि कर ली और इस तरह युद्ध टल गया। इस तरह अल्लाह ने दोनों के हाथ लड़ने से रोक दिए। 

25: मुसलमानों का इरादा चूँकि छोटे हज [उमरा] का था, इसलिए वे अपने साथ क़ुरबानी के जानवर भी लेकर चले थे जिसे काबा में ले जाकर क़ुर्बान करना था, मगर उन्हें हुदैबिया से आगे मक्का तक जाने नहीं दिया गया।  

27: मुहम्मद (सल्ल) ने मदीना में एक ख़्वाब देखा था कि वह अपने साथियों के साथ मक्का जाकर छोटा हज [उमरा] कर रहे हैं, इसी इरादे से सब लोग मदीना से निकले थे, मगर वे मक्का तक न जा सके और हुदैबिया से ही उन्हें लौटना पड़ा। लेकिन जो वहाँ संधि हुई उसके अनुसार अगले ही साल 7 हिजरी/ 629 ई. में मुहम्मद (सल्ल) ने अपने सभी साथियों के साथ बिना किसी डर-भय के उमरा किया, इस तरह अल्लाह ने उनका ख़्वाब पूरा कर दिया। इसके साथ ख़ैबर की जीत की ख़ुशख़बरी भी दे दी। 

29: संधि की शर्तों को लिखते समय मक्का वाले मुहम्मद (सल्ल) के नाम के साथ "अल्लाह का रसूल" लिखने के लिए तैयार नहीं थे, इसलिए इस आयत में अल्लाह ने उन्हें साफ़ तौर से "अल्लाह का रसूल" बताया है। .... उनके पीछे चलने वालों की मिसाल बीज से मज़बूत पौधा बनने के चरण से दी गई है। इससे मिलती जुलती मिसालें तोरात और इंजील में भी हैं। .... तोरात में इनकी मिसाल: Deuteronomy 6:8; 11:18 “उनके माथे पर एक निशान होता है।" बाइबल में: Mark 4:26-29; 30-32 में फैले हुए सरसों के बीज की मिसाल दी गई है। 


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