06-08: ईमानवालों को छान-बीन करके समझदारी से काम लेना चाहिए
09-13: ईमानवालों के आपसी संबंध
14-18: अरब के देहाती लोगों की सोच की निंदा
1: इसकी पहली पाँच आयतें एक ख़ास मौक़े पर उतरी थीं। मदीना में मुहम्मद (सल्ल) से अरब के कई क़बीलों के प्रतिनिधिमंडल मिलने के लिए आते रहते थे, आगे भी संबंध बना रहे, इसके लिए उनमें से आप (सल्ल) किसी को उस क़बीले का अमीर बना देते थे। एक बार बनु तमीम के क़बीले के लोग मिलने आए, मगर आपने किसी को उनके लिए अमीर नहीं चुना, इस बीच, अबु बकर (रज़ि) ने अमीर के लिए एक नाम सुझाया, और उमर (रज़ि) ने दूसरा नाम सुझा दिया, और दोनों एक दूसरे से तेज़ आवाज़ में बहस करने लगे। इसी मौक़े पर यह आयतें उतरीं जिसमें मुहम्मद (सल्ल) की मौजूदगी में बात करने का सही तरीक़ा बताया गया है।
4: तमीम के क़बीले के लोग दोपहर के समय मदीना आए थे, जब मुहम्मद (सल्ल)
आराम कर रहे थे, उसी समय उन लोगों ने आप (सल्ल) को उनके कमरे के बाहर से ही आवाज़ लगाना शुरू कर दिया, जिसके लिए इस आयत में मना किया गया है।
6: वैसे तो यहाँ एक आम उसूल बताया गया है, मगर इस आयत के उतरने के पीछे एक घटना बतायी जाती है। क़रीब 5 हिजरी/ 627 ई. में मदीना के मुसलमानों और क़बीला बनु मस्तलिक़ के बीच एक युद्ध हुआ था, जिसमें हारने के बाद उस क़बीले ने इस्लाम क़बूल कर लिया और ज़कात देना मंज़ूर कर लिया था। जब मदीना से वलीद बिन अक़बा को ज़कात वसूल करने के लिए बनु मस्तलिक़ के पास भेजा गया, तो यह ख़बर सुनकर वहाँ शहर के दरवाज़े पर उस दूत के स्वागत के लिए बहुत से लोग जमा हो गए, किसी बदमाश ने शायद वलीद को बताया कि वे तुम्हें मारने के लिए जमा हैं, वलीद की उन लोगों से कुछ पुरानी दुश्मनी भी थी, इसलिए बिना ठीक से पता लगाए वह वहाँ से वापस आ गए और उन्होंने मुहम्मद (सल्ल) को इसके बारे में सूचित किया। अब युद्ध की स्थिति बन गई, मगर फिर, जब ठीक से पता लगाया गया तो यह बात ग़लत निकली और दोनों गुट आपस में लड़ने से बच गए।
11: यहाँ "बदमाश" [mischief-maker] उसे कहा गया है जो ऊपर बतायी गई सारी बुरी हरकतें करके समाज में बुराई फैलाता हो, यह गुनाह के काम हैं और एक ईमानवाले के लिए तो बहुत ही ग़लत काम है।
12: यानी बिना ठीक से जाँचे-परखे किसी के बारे में बुरी धारणाएं [बदगुमानी] बैठा लेना गुनाह है। किसी की कमी तलाश करने के लिए उसकी टोह में लगे रहना भी गुनाह का काम है, इसी तरह, पीठ पीछे किसी की बुराई करना तो ऐसा है जैसे अपने मरे भाई का गोश्त खाना! इन सब चीज़ों से बचना चाहिए।
13: नस्ल और क़बीले केवल आदमी की पहचान के लिए है, इसके आधार पर किसी
की बड़ाई नहीं साबित होती, बल्कि असल इज़्ज़त और बड़ाई तो उसी की है जो अल्लाह से डरते हुए अपने आपको बुराइयों से बचाता है। अल्लाह सब जानता है: आदमी की असली औक़ात [true-worth] भी और उसके मन में बैठे हुए विचारों को भी, (इसे भी देखें 50: 16).
14: केवल मुँह से कह देने से कि हम मुसलमान हो गए, आदमी सचमुच का मुसलमान नहीं हो जाता, बल्कि उसमें सच्चा ईमान [belief] होना ज़रूरी है। बताया जाता है कि अरब में जब अकाल पड़ा तो बनु असद क़बीले के लोग मदीना आ गए और यह सोचकर कि उनकी हालत अच्छी हो जाएगी और उन्हें भी मुसलमानों जैसे अधिकार मिल जाएंगे, उन्होंने इस्लाम क़बूल तो कर लिया, लेकिन मन में रसूल की मुहब्बत नहीं बैठी थी और न ही उनके आदेशों को मानने के लिए वे मन से तैयार थे। ।
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