Sunday, April 1, 2018

सूरह 49 : अल-हुजुरात / Al Hujurat [रहने के कमरे / The Private Rooms]



सूरह 49: अल-हुजुरात
 [रहने के कमरे / The Private Rooms]

01-05: ईमानवालों को अपने रसूल के साथ आदर से पेश आना चाहिए

06-08: ईमानवालों को छान-बीन करके समझदारी से काम लेना चाहिए


09-13: ईमानवालों के आपसी संबंध

 

14-18: अरब के देहाती लोगों की सोच की निंदा 

 



अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
ऐ ईमानवालो! अल्लाह और उसके रसूल की मौजूदगी में (अपनी बात पर लोगों का ध्यान खींचने के लिए) आगे बढ़-बढ़कर बातें न किया करो----- और अल्लाह से डरते रहो: अल्लाह सब सुनता है, सब कुछ जानता है------ (1)
ऐ ईमानवालो!, अपनी आवाज़ों को नबी की आवाज़ से ऊँची न किया करो, और जिस तरह तुम आपस में एक-दूसरे से (ऊँची आवाज़ में) बातें करते हो, उस तरह उनसे ऊँची आवाज़ में बात न किया करो, कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारे (अच्छे) कर्म बर्बाद हो जाएँ और तुम्हें पता भी न चले। (2)
जो लोग अल्लाह के रसूल के सामने अपनी आवाज़ नीची रखते हैं, वही लोग हैं जिनके दिलों को अल्लाह ने (बुराइयों से) बचकर रहने के लिए परखकर चुन लिया है-----उन्हें (गुनाहों की) माफ़ी भी मिलेगी, और ज़बरदस्त इनाम भी ------ (3)
मगर [ऐ रसूल!], आपको जो लोग आपके कमरों [हुजरे] के बाहर से पुकारते हैं, उनमें से ज़्यादातर समझ-बूझ से काम नहीं लेते। (4)
(बजाए बाहर से पुकारने के) अगर वे धीरज रखते हुए उस समय तक इंतज़ार करते, जब तक कि आप ख़ुद ही बाहर निकलकर उनके पास आ जाते, तो यह उनके लिए बेहतर होता, वैसे अल्लाह बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है। (5)

ऐ ईमान रखनेवालो!, अगर (सही रास्ते से भटका हुआ) कोई बदमाश, तुम्हारे पास कोई ख़बर लेकर आए, तो पहले उसकी छानबीन कर लिया करो, कहीं ऐसा न हो कि तुम दूसरों को अनजाने में नुक़सान पहुँचा बैठो, और फिर अपने किए पर पछताते रहो,  (6)
और यह बात जान लो कि तुम्हारे बीच अल्लाह के रसूल मौजूद हैं: बहुत-से मामलों में अगर सचमुच वह तुम्हारी इच्छाओं को मान लें, तो तुम कठिनाई में पड़ जाओ। मगर अल्लाह ने तुम्हारे अंदर ईमान की मुहब्बत डाल दी है, और उसे तुम्हारे दिलों के लिए आकर्षक बनाया है; और (सच्चाई से) इंकार [कुफ़्र], गुनाह के काम, और आज्ञा न मानने जैसी चीज़ों को तुम्हारे लिए बहुत अप्रिय बनाया है। ऐसे ही लोग हैं जो अल्लाह के दिखाए गए सही रास्ते पर हैं,  (7)
जो अल्लाह के फ़ज़ल [favours] और नेमत [blessing] का नतीजा है: अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, बड़ी समझ-बूझ रखनेवाला है। (8)

अगर ईमानवालों के दो गिरोह आपस में लड़ पड़ें, तो (ऐ ईमानवालो) तुम्हें उनके बीच सुलह कराने की कोशिश करनी चाहिए; अगर उनमें से एक गिरोह दूसरे पर (साफ़ तौर पर) ज़ुल्म कर रहा हो, तो ज़ुल्म करनेवाले (गिरोह) के ख़िलाफ़ उस समय तक लड़ो, जब तक कि वे अल्लाह के हुक्म के सामने झुक न जाएं। फिर उनके बीच न्याय और बराबरी का ध्यान रखते हुए सुलह करा दो: अल्लाह बराबरी का इंसाफ़ करनेवालों को पसन्द करता है। (9)
ईमानवाले भाई-भाई होते हैं, अतः अपने दो भाईयों के बीच सुलह करा दो और अल्लाह का डर रखो, ताकि तुम पर दया की जा सके। (10)

ऐ ईमान रखनेवालो!, मर्दों के एक गिरोह को दूसरे (गिरोह के) मर्दों की हँसी नहीं उड़ानी चाहिए, हो सकता है कि (जिनकी हँसी उड़ा रहे हैं), वे उनसे बेहतर हों, और औरतों के गिरोह को भी दूसरे (गिरोह की) औरतों की हँसी नहीं उड़ानी चाहिए, हो सकता है कि (जिनकी हँसी उड़ायी जा रही हो) वे उनसे बेहतर हों; एक दूसरे को बुरी बातें न कहो; और न आपस में एक-दूसरे को चिढ़ाने वाले पुकारू नामों [nicknames] से बुलाओ। यह कितनी बुरी बात है कि कोई ईमान लाने के बाद भी "बदमाश" के नाम से जाना जाए! जो लोग अपने इस आचरण पर नहीं पछताते हैं, ऐसे लोग बहुत बुरा काम करते हैं। (11)
ऐ ईमानवालो! किसी चीज़ के बारे में पहले से ही बहुत सारी धारणाएं [assumptions] बनाने से बचा करो----- कुछ पूर्व-धारणाएं गुनाह होती हैं---- और एक दूसरे की जासूसी मत किया करो या लोगों की पीठ-पीछे बुराई न किया करो: क्या तुममें से कोई अपने मरे हुए भाई का गोश्त खाना पसंद करेगा? नहीं, बल्कि तुम उससे नफ़रत करोगे। अत: अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से बचो: अल्लाह हमेशा (मन से की गयी) तौबा क़बूल करनेवाला, बेहद दयावान है। (12)
लोगो! हमनें तुम सबको अकेले मर्द और अकेली औरत से पैदा किया, और तुम्हें नस्लों [क़ौमों] और क़बीलों में बाँट दिया, ताकि तुम एक-दूसरे को पहचान सको। अल्लाह की नज़र में तुममें सबसे ज़्यादा इज़्ज़तवाला वह है, जो सबसे ज़्यादा अल्लाह से (डरते हुए) बुराइयों से बचने वाला है। अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, हर चीज़ की ख़बर रखनेवाला है। (13)

रेगिस्तान में रहनेवाले अरबी (बद्‌दू) कहते हैं, "हम ईमान रखते हैं।" [ऐ रसूल!] आप कह दें, "तुम्हें (पक्का) ईमान नहीं है। सो तुम्हें अभी इतना ही कहना चाहिए, 'हम ने इस्लाम [अल्लाह के सामने समर्पण] को मान लिया है”, क्योंकि ईमान तो अभी तुम्हारे दिलों में दाख़िल ही नहीं हुआ है।’ अगर तुम अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा मानोगे, तो वह तुम्हारे किसी भी कर्म को कम करके नहीं आँकेगा: अल्लाह गुनाहों को बहुत माफ़ करनेवाला, अत्यन्त दयावान है।" (14)
असल ईमानवाले वे हैं जिन्होंने अल्लाह और उसके रसूल पर (दिल से) ईमान रखा, फिर किसी सन्देह में नहीं पड़े, और अपनी जान-माल और अपने लोगों के साथ अल्लाह के रास्ते में संघर्ष [जिहाद] किया: (यक़ीन मानो) वही लोग हैं जो (अपने दावे में) सच्चे हैं। (15)
आप (बद्दुओं से) कहें, "क्या तुम ऐसा मानते हो कि तुम अल्लाह को अपने दीन [धर्म] के बारे में बताओगे, जबकि अल्लाह आसमानों और ज़मीन की हर चीज़ जानता है, और उसे सारी चीज़ों की पूरी जानकारी है?” (16)
वे सोचते हैं कि इस्लाम क़ुबूल करके उन्होंने [ऐ रसूल] आप पर बड़ा एहसान किया है, आप कह दें, "ऐसा मत समझो कि इस्लाम क़ुबूल करके तुमने मुझ पर कोई एहसान कर दिया है; अगर तुम अपनी बात में पक्के हो, तो असल में तो अल्लाह है, जिसने तुम्हें ईमान वाला रास्ता दिखाकर तुम पर एहसान किया है।"  (17)
"अल्लाह आसमानों और ज़मीन के सारे छिपे हुए राज़ जानता है: जो कुछ भी तुम करते हो, अल्लाह हर चीज़ देखता है।" (18)



नोट:

1: इसकी पहली पाँच आयतें एक ख़ास मौक़े पर उतरी थीं। मदीना में मुहम्मद (सल्ल) से अरब के कई क़बीलों के प्रतिनिधिमंडल मिलने के लिए आते रहते थे, आगे भी संबंध बना रहे, इसके लिए उनमें से  आप (सल्ल) किसी को उस क़बीले का अमीर बना देते थे। एक बार बनु तमीम के क़बीले के लोग मिलने आए, मगर आपने किसी को उनके लिए अमीर नहीं चुना, इस बीच, अबु बकर (रज़ि) ने अमीर के लिए एक नाम सुझाया, और उमर (रज़ि) ने दूसरा नाम सुझा दिया, और दोनों एक दूसरे से तेज़ आवाज़ में बहस करने लगे। इसी मौक़े पर यह आयतें उतरीं जिसमें मुहम्मद (सल्ल) की मौजूदगी में बात करने का सही तरीक़ा बताया गया है। 

4: तमीम के क़बीले के लोग दोपहर के समय मदीना आए थे, जब मुहम्मद (सल्ल) आराम कर रहे थे, उसी समय उन लोगों ने आप (सल्ल) को उनके कमरे के बाहर से ही आवाज़ लगाना शुरू कर दिया, जिसके लिए इस आयत में मना किया गया है।  

6: वैसे तो यहाँ एक आम उसूल बताया गया है, मगर इस आयत के उतरने के पीछे एक घटना बतायी जाती है। क़रीब 5 हिजरी/ 627 ई. में मदीना के मुसलमानों और क़बीला बनु मस्तलिक़ के बीच एक युद्ध हुआ था, जिसमें हारने के बाद उस क़बीले ने इस्लाम क़बूल कर लिया और ज़कात देना मंज़ूर कर लिया था। जब मदीना से वलीद बिन अक़बा को ज़कात वसूल करने के लिए बनु मस्तलिक़ के पास भेजा गया, तो यह ख़बर सुनकर वहाँ शहर के दरवाज़े पर उस दूत के स्वागत के लिए बहुत से लोग जमा हो गए, किसी बदमाश ने शायद वलीद को बताया कि वे तुम्हें मारने के लिए जमा हैं, वलीद की उन लोगों से कुछ पुरानी दुश्मनी भी थी, इसलिए बिना ठीक से पता लगाए वह वहाँ से वापस आ गए और उन्होंने मुहम्मद (सल्ल) को इसके बारे में सूचित किया। अब युद्ध की स्थिति बन गई, मगर फिर, जब ठीक से पता लगाया गया तो यह बात ग़लत निकली और दोनों गुट आपस में लड़ने से बच गए। 

11: यहाँ "बदमाश" [mischief-maker] उसे कहा गया है जो ऊपर बतायी गई सारी बुरी हरकतें करके समाज में बुराई फैलाता हो, यह गुनाह के काम हैं और एक ईमानवाले के लिए तो बहुत ही ग़लत काम है। 

12: यानी बिना ठीक से जाँचे-परखे किसी के बारे में बुरी धारणाएं [बदगुमानी] बैठा लेना गुनाह है। किसी की कमी तलाश करने के लिए उसकी टोह में लगे रहना भी गुनाह का काम है, इसी तरह, पीठ पीछे किसी की बुराई करना तो ऐसा है जैसे अपने मरे भाई का गोश्त खाना! इन सब चीज़ों से बचना चाहिए। 

13: नस्ल और क़बीले केवल आदमी की पहचान के लिए है, इसके आधार पर किसी की बड़ाई नहीं साबित होती, बल्कि असल इज़्ज़त और बड़ाई तो उसी की है जो अल्लाह से डरते हुए अपने आपको बुराइयों से बचाता है। अल्लाह सब जानता है: आदमी की असली औक़ात [true-worth] भी और उसके मन में बैठे हुए विचारों को भी, (इसे भी देखें 50: 16). 

14: केवल मुँह से कह देने से कि हम मुसलमान हो गए, आदमी सचमुच का मुसलमान नहीं हो जाता, बल्कि उसमें सच्चा ईमान [belief] होना ज़रूरी है। बताया जाता है कि अरब में जब अकाल पड़ा तो बनु असद क़बीले के लोग मदीना आ गए और यह सोचकर कि उनकी हालत अच्छी हो जाएगी और उन्हें भी मुसलमानों जैसे अधिकार मिल जाएंगे, उन्होंने इस्लाम क़बूल तो कर लिया, लेकिन मन में रसूल की मुहब्बत नहीं बैठी थी और न ही उनके आदेशों को मानने के लिए वे मन से तैयार थे। । 

 


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