02-07: किताब, ईमानवाले और इंकार करने वाले
08-20: ईमान का ढोंग करने वाले
21-25: ईमानवालों को ताकीद
26-29: विश्वास न करने वालों से अपील
30-39: आदम,
इबलीस और जन्नत से निकलना
40-48: इसराईल की संतानों से अपील
49-50: इसराइलियों का फिरऔन से छुटकारा मिलना
51-74: इसराइलियों द्वारा आज्ञा न मानने की मिसालें
75-82: यहूदियों द्वारा तौरात में अपनी तरफ़ से कुछ फेर-बदल
83-103: इसराइलियों द्वारा आज्ञा न मानने की मिसालें (जारी)
104-110:
किताबवाले लोगों के बारे में चेतावनी
111-121:
यहूदियों और ईसाइयों की कड़ी निंदा
122-123:
इसराईल की संतानों से अपील
124-129:
मक्का में इबराहीम (अलै)
130-141:
इबराहीम (अलै) का दीन
142-152:
नमाज़ पढ़ने की दिशा [क़िबला] में बदलाव
153-157:
जो लोग अल्लाह के रास्ते में लड़ते हुए जान देते हैं
158
: "सफ़ा" और
"मरवा" की पहाड़ी
159-162:
जो आसमानी किताब का कुछ हिस्सा छुपाते हैं, उन्हें चेतावनी
163-167:
बहुदेववादियों को सावधान किया गया
168-173:
खाने के बारे में आदेश
174-176:
जो आसमानी किताब का कुछ हिस्सा छुपाते हैं, उन्हें चेतावनी
177
: सच्ची भलाई
178-179:
जान के बदले जान की सज़ा
180-182:
वसीयतें
183-187:
रोज़े रखना
188
: धन-दौलत का ग़लत इस्तेमाल
189 (क): नया चाँद
189 (ख): घरों में सामने के दरवाज़े से दाख़िल हो
190-194:
अल्लाह के रास्ते में लड़ना
195
: अल्लाह के रास्ते में ख़र्च
करना
196-203:
हज से जुड़े हुए नियम-क़ायदे
204-207:
झूठे और सच्चे बंदे
208-214:
एकता के लिए अपील
215
: अल्लाह के रास्ते में (भलाई
के लिए) ख़र्च करना
216-218:
अल्लाह के रास्ते में लड़ना
219
: शराब और जुआ खेलना
219-220:
दान देना
220
(ख): यतीम [अनाथ]
221-237: शादी, तलाक़ और पारिवारिक मामले से
जुड़े क़ानून
238-239:
नमाज़ को पाबंदी और सही समय पर पढ़ना
240-242:
विधवाओं को खाने-कपड़े का ख़र्च मिलना चाहिए
243-245:
अल्लाह के रास्ते में ख़र्च करना
246-251:
तालूत, जालूत और दाऊद (अलै) की कहानी
252-253:
आप उनलोगों में से हैं जिन्हें हमने रसूल बनाकर भेजा
254 : अपने माल में से दूसरों पर
ख़र्च करना
255 : "कुर्सी वाली आयत"[आयत-उल-कुर्सी]
256-257:
दीन में कोई ज़ोर-ज़बरदस्ती नहीं
258-260:
अल्लाह मुर्दा पड़े हुए लोगों को भी ज़िंदा कर देता है
261-274:
अल्लाह के रास्ते में मदद करना
275-284:
सूद/ब्याज, क़र्ज़ और अनुबंध [Agreements]
285-286:
ईमान का कारोबार, और एक आख़िरी दुआ
1: यह अरबी के तीन अक्षरों के नाम हैं: अलिफ़, लाम, मीम. सब मिलाकर क़ुरआन की उन्तीस (29) सूरह ऐसी हैं जो ऐसे अलग-अलग पढ़े जाने वाले अक्षरों [हुरूफ़ ए मुक़त्तेआत] से शुरू हुई हैं, उनमें एक अक्षर से लेकर पाँच अक्षर तक इस्तेमाल हुए हैं जिन्हें अलग-अलग पढ़ा जाता है। विद्वानों ने इन अक्षरों के बहुत से मतलब निकाले हैं, मगर साथ में यह भी लिखा है कि इसका सही मतलब अल्लाह ही को मालूम है, उनमें से यहाँ दो दिए जा रहे हैं:
(i) अरब के लोग जिन्होंने यह क़ुरआन सबसे पहले सुनी थी, उन्हें इन अक्षरों से शायद यह बताया गया कि क़ुरआन में जो अक्षर और शब्द इस्तेमाल हुए हैं, वे उनकी अपनी भाषा यानी अरबी के हैं, हालाँकि ये उनकी भाषा में लिखे गए किसी भी कलाम से बहुत ऊँचे दर्जे का था क्योंकि ये अल्लाह का कलाम है।
(ii) इन अक्षरों से शायद हैरत या आश्चर्य प्रकट होता था, जिसे शुरू में कहने से सुननेवाले का ध्यान आकर्षित हो जाता था। कुछ इसी तरह का प्रयोग उस ज़माने की अरबी कविताओं में भी होता था जिनमें शुरू में ही "नहीं! या "यक़ीनन" कहकर बात आगे बढ़ायी जाती थी।
2: "ला रैबा फ़ीहि" का एक मतलब तो यह है कि इस किताब में ऐसी कोई चीज़ नहीं है जिस पर शक या संदेह किया जाए, या यह भी मतलब हो सकता है कि इस किताब (की सच्चाई) पर शक नहीं किया जा सकता है, चाहे बात इसके लिखने वाले की हो या इसकी विषयवस्तु [content] की।
“तक़वा" का अनुवाद 'अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचना' किया गया है। असल में "तक़वा" का मतलब हर समय अल्लाह का खटका लगा रहना, या अपने आपको हर तरह की बुराइयों से बचाना होता है।
3: नज़र से ओझल चीज़ [ग़ैब] जो आदमी के अनुभूति [perception] से परे है, यानी उसे छूकर, देखकर या सूंघकर नहीं महसूस किया जा सकता है, जो एक दूसरी ही दुनिया की चीज़ें हैं, जैसे अल्लाह, आख़िरत, जन्नत, जहन्नम इत्यादि। ऐसी चीज़ों को केवल अल्लाह ही जानता है, सिवाय इसके कि जितना वह अपने रसूलों/नबियों को "वही" द्वारा बताना चाहे (जैसे देखें 2:33, 3:179, 6:59,73; 19:78; 72: 26-27)
4: एक ईमानवाले के लिए ज़रूरी है कि वह क़ुरआन के साथ-साथ मुहम्मद (सल्ल) से पहले आए नबियों पर उतारी गयी किताबों जैसे तोरात, इंजील, ज़बूर आदि पर भी विश्वास रखे कि वे भी अल्लाह की तरफ़ से भेजे गए संदेश थे।
आनेवाली ज़िंदगी [आख़िरत] से मतलब "आख़िरी" या अंत" है, यानी क़यामत के बाद की ज़िंदगी है जो हमेशा के लिए होगी और उसमें हर आदमी को अपने कर्मों का हिसाब देना होगा, उसी बुनियाद पर आदमी को जन्नत की ख़ुशियाँ मिलेंगी या जहन्नम की मुसीबत झेलनी होगी (जैसे देखें 7:38-51; 41:19-24; 55:33-78; 56:11-44; 69:19-36; 76:4-22; 83:15-22)
6: यहाँ ऐसे लोगों का ज़िक्र है जिन्होंने तय कर लिया था कि चाहे जो हो जाए, उन्हें मुहम्मद (सल्ल) द्वारा लाए हुए संदेश को न सुनना है, न मानना है। अब ऐसे आदमियों को बुरे काम के नतीजे से सावधान किया जाए या न किया जाए, वे सच्चाई पर विश्वास नहीं करने वाले।
7: अगर कोई आदमी किसी कारण से कोई गुनाह कर बैठे और फिर अपने किये पर शर्मिंदा हो, तो उसमें सुधार के उम्मीद की जा सकती है, मगर कोई आदमी अगर ग़लती पर अड़ जाए, और यह ठान ले कि सही बात माननी ही नहीं है, तो फिर उसकी ज़िद्द का आख़िरी नतीजा यह होता है कि अल्लाह उसके दिल को बंद करके उस पर ठप्पा लगा देता है जिसके बाद सच्चाई को क़बूल करने की उस आदमी की सलाहियत ख़त्म हो जाती है।
"अज़ाब" यानी ऐसी चीज़ जो बड़ी दर्दनाक हो, यातना, सज़ा आदि, यह शब्द क़ुरआन में 300 से भी ज़्यादा बार आया है।
8: यहाँ से मदीना में रहने वाले एक तीसरे समूह का ज़िक्र है जिन्हें पाखंडी [मुनाफ़िक़/Hypocrite] कह सकते हैं जो ऊपर से तो यह कहता था कि वह मुहम्मद (सल्ल) की शिक्षाओं पर विश्वास रखता है, पर असल में वह इस पर ईमान नहीं रखता था।
10: उन लोगों ने अपनी मर्ज़ी से पाखंड का रास्ता चुना और उस पर अड़े रहे, और इसी के चलते अल्लाह ने उन्हें भटकता छोड़ दिया।
14: यहाँ "अपने शैतानों" का मतलब उनके जो पेशवा और लीडर थे जो उनको गलत रास्ते पर चलने की सलाह देते थे।
17: जब इस्लाम की शिक्षाएं सामने लायी गईं तो एक तरह से पूरे माहौल में रौशनी हो गई और सारी सच्चाइयाँ साफ़-साफ़ दिखाई देने लगी, मगर केवल अपनी ज़िद्द और हठधर्मी के चलते कुछ पाखंडियों ने उन सच्चाइयों को मानने से इंकार कर दिया और उस पर अड़े रहे। तो फिर अल्लाह ने भी उनकी समझ-बूझ में अंधेरा लिख दिया और उन्हें अंधेरे में भटकने के लिए छोड़ दिया।
19: यहाँ वैसे पाखंडियों की मिसाल दी गई है जो अपने विश्वास में पक्के नहीं थे। जब इस्लाम की सच्चाई की दलीलें सामने आयीं और जन्नत के वादे किए गए, तो उनका झुकाव इस्लाम की ओर हो गया और वे उसकी तरफ़ क़दम बढ़ाने लगे, मगर फिर उसके साथ जब उसके आदेशों को मानने की ज़िम्मेदारियाँ आयीं, तो फिर अपनी ख़ुदग़र्ज़ी के चलते उन कर्मों से अपने आपको रोक नहीं पाए जिन्हें करने से रोका गया था। इस तरह कभी जब बिजली कड़कती और रौशनी होती, तो वह उससे फ़ायदे की लालच में थोड़ा चल लेते, मगर जब अल्लाह के आदेश मानने की बात आती, तो उन पर अपनी इच्छाओं का अंधेरा छा जाता, और वहीं क़दम रोककर खड़े रह जाते।
22: आयत 21-22 में इस्लाम की बुनियादी सिद्धांत "तौहीद" के बारे में बताया गया है, यानी इबादत के लिए केवल एक अल्लाह को मानना। अरब के लोग भी यह मानते थे कि सारी कायनात अल्लाह की पैदा की हुई है, मगर इसके साथ वे यह भी मानते थे कि अल्लाह ने अपने बहुत से काम छोटे-छोटे देवी-देवताओं को सौंप रखे हैं जो अपने कामों में ख़ुद से फ़ैसले कर सकते हैं। अत: उन लोगों ने इन देवी-देवताओं की मूर्तियाँ बना रखी थीं और अपनी ज़रूरतों के लिए उनके सामने हाथ फैलाते थे। अल्लाह ने कहा है कि जब सारी चीज़ें मेरी बनायी हुई हैं, तो इबादत केवल मेरी ही होनी चाहिए।
23: इस आयत में इस्लाम की एक और बुनियादी मान्यता 'रिसालत" के बारे में कहा गया है, यानी यह कि मुहम्मद (सल्ल) अल्लाह के रसूल हैं जिन पर अल्लाह की तरफ़ से संदेश [क़ुरआन] आता है। जब अरब के लोगों ने क़ुरआन की सच्चाई को मानने से इंकार किया, तो उन्हें यह चुनौती दी गई कि अगर यह एक आदमी का गढ़ा हुआ कलाम है, तो वे लोग जो अरबी भाषा में माहिर हैं, ऐसी एक सूरह ही लिखकर दिखाएं, और इसके लिए अपने सभी मददगारों (मूर्तियों या अपने नेताओं) की भी सहायता ले लें। ऐसी चुनौती क़ुरआन में कई जगह आयी है, देखें 10:38; 11:13; 28:49; 52:34.
24: 'आग' जहन्नम/दोज़ख़ के कई उपनामों में से है। "पत्थर" को आग का ईंधन कहने से मतलब शायद 'पत्थर की मूर्तियाँ' हैं। देखें 66:6
25: इस दुनिया के बाद आने वाली ज़िंदगी [आख़िरत] में मिलने वाले इनाम के बारे में यहाँ बताया गया है।
जन्नत में लोगों को हर बार खाने के लिए इतना मज़ेदार फल मिलेगा कि जब कभी फिर से उन्हें वह दिया जाएगा तो वे उस पसंदीदा फल को देखकर बहुत ख़ुश हो जाएंगे। दूसरा मतलब यह भी हो सकता है कि जब वहाँ उन्हें फल दिए जायेंगे तो वह देखने में दुनिया के फल जैसे ही जाने-पहचाने होंगे, मगर मज़े में बहुत ज़्यादा अच्छे होंगे।
26: यह आयत उन लोगों के जवाब में है जिन्होंने इस बात पर आपत्ति की थी कि ऐसी तुच्छ चीज़ों की मिसाल देना अल्लाह के लिए उचित नहीं है।
27: ज़्यादातर विद्वानों ने इंसानों द्वारा अल्लाह के सामने प्रतिज्ञा लिए जाने को उस प्रतिज्ञा से जोड़ा है जिसका उल्लेख सूरह अ'राफ़ (7: 172) में आया है, जब अल्लाह ने इंसानों को पैदा करने से बहुत पहले उनकी रूहों को जमा करके उनसे अपने आदेशों को मानने का वचन लिया था। दुनिया में समय-समय पर आकर नबियों ने भी इंसानों को उस प्रतिज्ञा को न तोड़ने की बात याद दिलायी थी। एक और बात यह है कि हर इंसान पैदा होते ही ख़ुद ही अपने पैदा करने वाले के साथ एक प्रतिज्ञा से बंध जाता है कि वह उसके आदेश के मुताबिक़ ज़िंदगी गुज़ारेगा। कुछ लोगों ने इसका मतलब इसराईल की संतानों द्वारा ली गई उस प्रतिज्ञा से लिया है जिसका ज़िक्र नीचे 2:40-48 में है।
यहाँ अपने रिश्तेदारों से रिश्ता जोड़कर रखने की बात भी कही गई है, ताकि उनका जो हक़ है वह अदा हो जाए।
30: इंसान को पहली बार पैदा किए जाने का क़िस्सा कई बार आया है, (देखें 7:10-25; 15:28-48; 20:115-123).
इंसान को "ख़लीफ़ा" बनाने का कई मतलब हो सकता है, एक तो यह कि वह ज़मीन पर अल्लाह का प्रतिनिधि [Deputy] होगा, मगर इसका बुनियादी मतलब उतराधिकारी है, या उसे अस्थायी सरपरस्त [Trustee] भी कहा जा सकता है। विद्वानों का कहना है कि इंसानों से पहले जिन्नों को पैदा किया जा चुका था जो आपस में ख़ून-ख़राबा करते रहते थे, इसलिए फ़रिश्तों ने इंसानों के बारे में भी ऐसा सोचा था।
31: नाम सिखाने का मतलब अल्लाह ने आदम को प्रकृति में फैली हुई सारी चीज़ों के नाम और उनकी विशेषताएं सिखा दीं।
34: इबलीस ही शैतान से भी जाना जाता है। फ़रिश्तों के साथ वह भी शामिल था, मगर वह जिन्नों में से था (18:50), उसने आदम के आगे सज्दा करने से क्यों इंकार कर दिया, देखें 7: 22;
36: शैतान ने आदम और उनकी बीवी को बहकाकर उस पेड़ का फल खाने के लिए तैयार कर लिया जिसे खाने के लिए अल्लाह ने मना किया था, उसने बात यह बनायी कि इसे खाने से आप फ़रिश्तों की तरह हमेशा ज़िंदा रहेंगे। इसका ज़िक्र थोड़े विस्तार से सूरह अ'राफ़ (7: 19-23) और सूरह ताहा (20: 120) में भी आया है।
37: आदम (अलै) को अपनी ग़लतियों के लिए तौबा करने की दुआ भी अल्लाह ने ही सिखायी थी, दुआ के शब्द सूरह अ'राफ़ (7: 23) में आये हैं।
40: मदीना के यहूदियों को याद दिलाया जा रहा है कि अल्लाह ने उन पर कैसी-कैसी नेमतें की थीं जिनका बयान आयत 49-50 में और उसके आगे की आयतों में दिया गया है। उन नेमतों के बदले उन्हें अल्लाह का शुक्र अदा करना चाहिए और तोरात के आदेशों को सही तरीक़े से मानने की प्रतिज्ञा पूरी करनी चाहिए, मगर एक तरफ़ उन लोगों ने तोरात व इंजील में अपनी मर्ज़ी से फेर-बदल किया और दूसरी तरफ़ आख़िरी नबी के आने की ख़बर को छिपाते हुए क़ुरआन और मुहम्मद (सल्ल) को मानने से इंकार कर दिया। शायद उन्हें डर था कि अगर क़ुरआन पर विश्वास कर लिया तो उनकी क़ौम के लोग ही उन पर भड़क जाएंगे, सो उनसे डर गए मगर अल्लाह से नहीं डरते।
41: यहूदियों से कहा गया है कि जो आसमानी किताबें यानी तोरात और इंजील [Torah & Gospel] उनके पास पहले से थीं, क़ुरआन उन बातों की सच्चाई की पुष्टि करती है कि ये किताबें भी अल्लाह ने ही उतारी थीं, भले ही इनमें कुछ फेर-बदल कर दिया गया है, और साथ में आख़िरी नबी के आने की जो ख़बर इनमें दी गई थी उसे भी क़ुरआन ने सच्चा कर दिखाया है, इसलिए उन्हें क़ुरआन और मुहम्मद (सल्ल) की सच्चाई पर सबसे पहले विश्वास करना चाहिए था।
49: फ़िरऔन मिस्र का बादशाह था जहाँ इसराईल की संतानें बड़ी संख्या में आबाद थीं, मगर वहाँ वे ग़ुलामी के दिन गुज़ार रही थी। फिर एक भविष्यवक्ता ने फ़िरऔन के सामने बताया कि इस साल इसराइलियों में एक बच्चा पैदा होगा जो फ़िरऔन की बादशाहत ख़त्म कर देगा। यह सुनकर उसने हुक्म दे दिया कि इसराइलियों के यहाँ जो भी लड़का पैदा हो, उसे मार दिया जाए, मगर लड़कियों को छोड़ दिया जाए ताकि उनसे दासियों के काम लिए जा सकें। देखें 20:36
51: अल्लाह ने मूसा (अलै) को तूर पहाड़ पर चालीस रातों की गहन इबादत के लिए बुलाया था ताकि उन्हें तोरात दी जा सके। इधर वह तूर पर गए और पीछे उनकी अनुपस्थिति में सामरी ने ज़ेवरों को गलाकर एक बछड़ा बना लिया और इसराईल की संतानों को उसकी पूजा करने के लिए तैयार कर लिया था। इस घटना का वर्णन थोड़े विस्तार से सूरह अ'राफ़ (7: 148-153) और सूरह ताहा (20: 83-97) में आयेगा।
57: इसराईल की संतानों ने जब अल्लाह के हुक्म को न मानते हुए “अमालक़ा" की क़ौम से युद्ध करने से इंकार कर दिया, तो इसके नतीजे में उन्हें सीना के रेगिस्तान में चालीस साल तक गर्मी और भूख के मारे भटकते रहना पड़ा, फिर अल्लाह ने उन पर मेहरबानी की, बादल से उन पर छाया की, और खाने के लिए "मन" (एक मीठी चीज़) और "सलवा" (बटेर का भुना गोश्त) उतारा।
58: शहर का नाम नहीं बताया गया है, शायद "येरुशलम" की बात हो। इसका ज़िक्र 7:161 में भी है।
60: यह घटना भी उसी समय की है जब वे सीना के रेगिस्तान में मारे फिर रहे थे। हज़रत याक़ूब (इसराईल) अलै. के बारह बेटे थे जो आगे चलकर बारह क़बीले में बँट गए थे। अत: सभी क़बीले के लिए एक-एक पानी का सोता! (7:160)
61: इसराईल की संतानों के बारे में यह बात कई जगह आयी है कि वे बेवजह नबियों का क़त्ल कर देते थे, (देखें 2:87,91; 3:21,112, 181, 183; 4:155; 5:70). यही इल्ज़ाम New Testament (Luke 11:39-52; 13:34-35) में भी देखा जा सकता है।
62: "साबी" [Sabians] के बारे में बताया जाता है कि ये अरब में तारों की पूजा करने वाले लोग थे, मगर मुहम्मद असद के मुताबिक़ यह लोग "एक अल्लाह को मानने वाले" [Monotheistic community] थे। कुछ विद्वान कहते हैं कि ये लोग दक्षिणी इराक़ के रहने वाले थे जो हज़रत यह्या [John, the Baptist] को अपना मसीहा मानते थे।
63: मूसा (अलै) को अल्लाह ने तोरात दी और यह हुक्म दिया कि उनकी क़ौम के लोगों को इसमें दिए गए आदेशों को मानना चाहिए। मगर हुआ यूँ कि लोग हल्के आदेशों को तो मान लेते मगर जो कड़े आदेश होते, उनको मानने में आना-कानी करते। फिर अल्लाह ने तूर पहाड़ को उनके ऊपर करके उनसे इन आदेशों को मानने का वचन लिया था। (देखें 2:93; 4:154; 7:171)
65: शनिवार [Saturday] को अरबी और सीरियाई भाषा में "सब्त" कहा जाता है। यहूदियों के लिए यह एक पवित्र दिन होता था जिस दिन पैसा कमाने के लिए कारोबार करना मना था। जिन यहूदियों का यहाँ उल्लेख है, वे शायद दाऊद (अलै) के ज़माने में समंदर के किनारे रहते थे, और मछलियाँ पकड़ा करते थे। शनिवार के दिन मछली पकड़ना उनके लिए वैध नहीं था। शुरू में तो उन लोगों ने कुछ न कुछ बहाने से मछलियाँ पकड़नी शुरू की, फिर बाद में खुलकर अल्लाह के आदेशों को न मानते हुए उन लोगों ने शनिवार के दिन मछ्लियाँ पकड़नी शुरू कर दीं। कुछ अच्छे लोगों ने समझाया भी, मगर वे न माने। फिर अल्लाह की यातना आ पहुँची, और उन लोगों को बंदर बना दिया गया। देखें (7:163-166).
क़ुरआन में एक जगह है कि ऐसे लोग जो अल्लाह का हुक्म नहीं मानते, उनमें से कुछ लोगों को अल्लाह ने बंदर और सुअर बना दिया (5:60). कुछ लोग मानते हैं कि उन्हें सचमुच बंदर बना दिया गया था, जबकि कुछ विद्वान कहते हैं कि असल में यह बात कहने का तरीक़ा है, जैसे 17: 50 में कहा गया है, "तुम पत्थर या लोहा बन जाओ" या जैसे विश्वास न करने वालों को "अंधा, बहरा और गूंगा" कहा गया है, उसी तरह यहाँ नियम तोड़नेवालों को बंदर कहा गया है।
71: इस घटना से यह शिक्षा दी गई है कि बिना कारण ऐसे काम की खोज-पड़ताल में नहीं लगना चाहिए जो ज़रूरी न हो, बल्कि जो बात सीधी-सरल हो, उसे सादगी से ही कर लेना चाहिए।
73: बताया जाता है कि एक आदमी ने संपत्ति के बंटवारे के मामले में अपने भाई को क़त्ल करके उसकी लाश को रास्ते पर रख दिया। फिर ख़ुद ही मूसा (अलै) से गुहार लगाई कि मेरे भाई के क़ातिल को सज़ा मिलनी चाहिए। इस पर मूसा (अलै) ने एक गाय ज़बह करके उसके गोश्त को मरे हुए शरीर पर मारने की सलाह दी। जैसे ही गोश्त मुर्दा शरीर पर लगा, वह आदमी ज़िंदा होकर उठ बैठा, और उसने क़ातिल का नाम बता दिया।
76: तोरात में आगे आने वाले समय में जिस नबी के बारे में भविष्यवाणियाँ की गई थीं, उन पर मुहम्मद (सल्ल) पूरी तरह सही उतरते थे। कुछ यहूदी लोग जो मुसलमानों के सामने अपने आपको ईमान रखनेवाला कहते थे, वे तोरात में आई ऐसी बातों की जानकारी कभी-कभी मुसलमानों को दे देते थे। जब अकेले में यहूदी लोग आपस में मिलते थे तो वहाँ ऐसे लोगों की निंदा की जाती थी कि अगर 'तोरात' की ऐसी बातें मुसलमानों को बताई जाएंगी, तो क़यामत के दिन वे अपनी दलीलों में ये बात हमारे ख़िलाफ़ इस्तेमाल करेंगे।
85: मदीना में यहूदियों के दो क़बीले आबाद थे: बनु क़ुरैज़ा और बनु नज़ीर, इसी तरह बहुदेव वादियों के भी दो क़बीले थे: ओस और ख़ज़रज। शुरू से ओस क़बीले की दोस्ती बनु क़ुरैज़ा से थी, और ख़ज़रज की दोस्ती बनु नज़ीर से थी। ओस और ख़ज़रज क़बीले के बीच जब कभी लड़ाइयाँ होती, तो यहूदियों के दोनों क़बीले अपने दोस्तों की तरफ़ से एक-दूसरे के ख़िलाफ़ भिड़ जाते थे, यहाँ तक कि उनका क़त्ल करने और उन्हें घरों से बाहर निकालवाने में भी सहायक होते। फिर जब दूसरे गुट के यहूदी युद्ध के बाद बंदी बनाकर लाए जाते, तो फिर ये यहूदी लोग भरपाई में पैसा ख़र्च करके उसे छुड़ा लेते, क्योंकि तोरात में हुक्म था कि अगर कोई यहूदी दुश्मन के क़ब्ज़े में चला गया है, तो उसे छुड़ाना चाहिए।
87: "स्पष्ट निशानियों" का मतलब वे चमत्कार हैं जो अल्लाह के हुक्म से ईसा (अलै) ने दिखाए थे, देखें 5:110. क़ुरआन में "रूहुल क़ुद्स" यानी पवित्र आत्मा हज़रत जिबरील (अलै) के लिए आया है। देखें 16:102.
89: जब यहूदियों का बहुदेववादियोंसे झगड़ा होता, तो वे दुआएं माँगते थे कि तौरात में जिस नबी के आने की ख़बर दी गई है, वह आ जाता तो हमलोगों को कामयाबी मिलती। मगर जब सचमुच नबी के रूप में मुहम्मद (सल्ल) आ गए, तो केवल जलन के चलते उन लोगों ने उन पर विश्वास करने से इंकार कर दिया कि वह नबी इसराइलियों में से क्यों नहीं हुआ?
92: बछड़े को पूजने का वर्णन आयत 2:53 में गुज़रा है।
93: प्रतिज्ञा के लिए देखें 2:63.
94: यहूदियों की जो मान्यता रही है कि वे ही अकेले अल्लाह की चुनी हुई क़ौम हैं, इस पर यहाँ व्यंग्य किया गया है, देखें 62: 6-7
97: कुछ यहूदियों ने मुहम्मद (सल्ल) से कहा था कि अगर आपके पास जिबरील अल्लाह का संदेश लेकर आते हैं तो हम उसे नहीं मानेंगे, हम जिबरील को अपना दुश्मन समझते हैं क्योंकि वह हमारे लिए बहुत कड़े हुक्म लाया करते थे।
102: असल में सुलैमान (अलै) के ज़माने के कुछ शैतान आदमियों और जिन्नों ने जादू-टोना गढ़ लिया और यहूदियों के बीच यह बात फैला दी थी कि सुलैमान (अलै) की सारी ताक़त और हुकूमत जादू-टोने की वजह से है, अत: आम लोग भी ऐसी ताक़त और हुकूमत की लालच में जादू-टोने जैसी बुरी चीज़ को सीखने और उस पर अमल करने में लग गए, यहां तक कि कुछ लोग जादू-मंतर के चक्कर में एक ख़ुदा को छोड़कर बुतों की पूजा तक करने लगे। सुलैमान अलै के बारे में कहा जाने लगा कि वह ख़ुद ही बड़े जादूगर हैं और बाइबल में है कि बाद के वर्षों में वह भी बुतों की पूजा करने लगे थे, हालांकि क़ुरआन ने इस बात को ग़लत बताया है कि वह सच्चाई से इंकार कर बैठे थे।
बाबिल (Babylon) इराक़ का मशहूर शहर था, और वहां के यहूदी लोग जादू-टोने में दिखाए गए खेल-तमाशे और नबियों द्वारा सच्चाई को सिद्ध करने के लिए दिखाए गए चमत्कार (मोजिज़ा) में कोई अंतर नहीं समझते थे। अल्लाह ने वहां दो फ़रिश्ते इंसानों के रूप में भेजे ताकि उनमें सच्चाई की समझ पैदा हो। फ़रिशतों ने उनकी परीक्षा लेने के लिए उन्हें जादू भी सिखाया और उससे होने वाली बुराइयों को भी बताया, मगर लोगों ने उनसे जादू सीखकर ग़लत मक़सद के लिए इस्तेमाल किया जिससे मियां-बीवी में अलगाव तक हो जाता था।
यहां समझने की बात यह है कि इंसानों को अपनी मर्ज़ी से ग़लत या सही काम को चुनने का हक़ दिया गया है। अल्लाह का क़ानून (मशीयत) यह है कि जब कोई आदमी बुरा या अच्छा काम करना चाहता है तो उसे वह करने दिया जाता है, और उसमें अल्लाह की मर्ज़ी भी शामिल हो जाती है, जिससे कि उसे गुनाह या सवाब (पुण्य) हो सके। मगर अल्लाह पसंद केवल अच्छे कामों को ही करता है।
104: मदीना के कुछ शरारती यहूदियों ने जान-बूझकर मुहम्मद (सल्ल) को गालियाँ देने के लिए "राइना" कहना शुरू किया जिसको बोलने में थोड़ा सा फेर-बदल करने से मतलब यह होता था कि "तुम बेवक़ूफ़ हो" या तुम मेरी भेड़ों के चरवाहे हो।" 4:46 भी देखें।
106: अल्लाह का तरीक़ा रहा है कि हर दौर में उस ज़माने के हालात के मुताबिक़ नियम-क़ायदे (शरीयत) में थोड़ा फेर-बदल होता रहा है जबकि दीन की बुनियादी बातें वही रहती हैं। मूसा (अलै) और ईसा (अलै) के ज़माने में नियम-क़ायदे थोड़े अलग थे। इसी तरह से मुहम्मद सल्ल जब नबी हुए तो शुरुआत के ज़माने में हालात के मुताबिक़ जो हुक्म दिए गए, बाद में उसमें ज़रूरत के अनुसार आहिस्ता-आहिस्ता बदलाव लाया गया। कुछ यहूदियों को इस बात पर एतराज़ था कि जब सारे नियम-क़ायदे उसी एक अल्लाह की तरफ़ से आते हैं, तो फिर इसमें समय-समय पर बदलाव क्यों हो रहा है? यहां इसी बात का जवाब दिया गया है।
इसी आयत और कुछ और आयतों जैसे 13:39; 16:101; 22:52 से बाद में "नासिख़ व मंसूख़"[Theory of Abrogation] का सिद्धांत बनाया गया, जिसके मुताबिक़ माना जाता है कि क़ुरआन के कुछ पुराने आदेश को बाद की आयतों में आये हुए आदेशों से बदल दिया गया, इस तरह पुराने आदेश रद्द [मंसूख़] मान लिए गए।
108: मूसा अलै. की क़ौम ने उनसे कैसे-कैसे सवाल पूछे थे, इसके लिए देखें 2: 55; 4:153 और 2:67-71
114: इस आयत में शायद यहूदियों, ईसाइयों और मक्का के मुशरिक तीनों समूह का ज़िक्र आया है जिन्होंने अलग-अलग समय में इबादत की जगहों पर हमला किया और लोगों को वहां जाने से रोका। (देखें 22:40). शाह तैतूस [Titus] के ज़माने में ईसाइयों ने “बैतुल मक़दिस” पर हमला करके उसे तहस-नहस किया, उसी तरह, अबरहा जो कि ईसाई था, उसने काबा को बर्बाद करने के इरादे से हमला किया, और मक्का के मुशरिक लोगों ने मुसलमानों को काबा में जाकर नमाज़ पढ़ने से रोका।
लेकिन यहाँ मालूम होता है कि यह आयत मदीना के यहूदियों के बारे में है जिन्होंने मुसलमानों को मस्जिद ए नबवी में येरूशलम (बैतुल मक़दिस) की जगह काबा की तरफ़ मुंह करके नमाज़ पढ़ने से रोकना चाहा। (देखें 2:115 और 2:142)
115: अल्लाह असल में हर दिशा में मौजूद है, इसलिए उसकी इबादत करने के लिए किसी दिशा में भी मुंह करके इबादत हो सकती है, असल बात है अल्लाह का हुक्म मानना। अगर अल्लाह ने कहा कि फ़लां दिशा में मुंह करके इबादत करो, तो जो उसका हुक्म बिना किसी हिचकिचाहट के मान ले, वह सही है।
116: ईसाई कहते थे कि ईसा (अलै) अल्लाह के बेटे हैं, देखें 4:171; 10:68; 19:88-92; 21:26; 25:2). कुछ यहूदियों का मानना था कि हज़रत उज़ैर अल्लाह के बेटे हैं (9: 30), उसी तरह, अरब के मुशरिक लोग देवियों को अल्लाह की बेटियां मानते थे (16: 57) ।
121: इसराईल की संतानों में बहुत बड़ी संख्या तो ऐसे लोगों की थी जो कि नियमों को तोड़ने वाले थे, मगर उनमें कुछ लोग ज़रूर ऐसे थे जो कि तौरात और इंजील के नियमों को मानते भी थे और उन पर अमल भी करते थे। ऐसे लोगों ने जब मुहम्मद सल्ल की लायी हुई शिक्षा को सुना तो तुरन्त उसकी सच्चाई को पहचान लिया और उसको दिल से सही मानते हुए उस पर अमल किया।
124: यहाँ अल्लाह ने इबराहीम अलै. की जिस परीक्षा लेने का हवाला दिया है, वह शायद उनके द्वारा बेटे की क़ुर्बानी वाला मामला है (देखें 37:102-107).
यहां से हज़रत इब्राहीम अलै के हालात बयान किए गए हैं। असल में यहूदी, ईसाई और अरब के मूर्तिपूजक सभी इब्राहीम अलै को अपना पेशवा मानते थे, और कहते थे कि हम उनके बताए हुए मार्ग पर चलते हैं। मगर यहां अल्लाह ने साफ़ कर दिया कि इब्राहीम केवल एक अल्लाह को मानने वाले थे, और उन्होंने अल्लाह द्वारा ली गई हर परीक्षा में कामयाबी हासिल की थी। तब अल्लाह ने उन्हें पेशवा बनाया, फिर यह बात साफ़ कर दी कि तुम्हारी औलाद में जो अल्लाह का हुक्म नहीं मानकर अपने आप पर ज़ुल्म करेगा, उसे पेशवाई नहीं दी जाएगी। इस तरह, जब तक इसराईल की संतानों ने अल्लाह का हुक्म माना, तब तक वे अपनी क़ौम के पेशवा बने रहे, फिर जब उन्होंने मनमानी शुरू कर दी, तो पेशवाई उनके ख़ानदान से लेकर इस्माइल अलै के ख़ानदान यानी मुहम्मद (सल्ल) को सौंप दी गई।
125: “काबा”को अल्लाह का घर कहा जाता है। अल्लाह ने इस मस्जिद को और इसके इर्द-गिर्द के बड़े इलाक़े को अमन की जगह (हरम) बनाया है (5:95), जहां न तो किसी इंसान को क़त्ल किया जा सकता है, न किसी जानवर का शिकार किया जा सकता है और न ही उसे क़ैद करके रखा जा सकता है, न किसी पौधे को उखाड़ा जा सकता है, और न ही कोई युद्ध किया जा सकता है सिवाय इसके कि अगर दुश्मन हमला कर दे तो अपनी सुरक्षा में लड़ने की इजाज़त है।
“मक़ाम ए इबराहीम” उस पत्थर का नाम है जिस पर चढ़कर हज़रत इब्राहीम ने काबा को बनाया था। यह पत्थर आज भी मौजूद है, और काबा का सात बार चक्कर लगाने (तवाफ़) के बाद, इस पत्थर के पास काबा की तरफ़ मुंह करके नमाज़ पढ़ना बहुत अच्छा माना जाता है।
127: काबा को पहली बार हज़रत आदम अलै ने बनाया था, मगर बहुत ज़माने के बाद जब वह टूट-फूट गया था, तब हज़रत इब्राहीम ने इस्माईल अलै के साथ मिलकर उसे फिर से बनाया था।
128: देखें 3:64; 26:89; 37:84.
129: मुहम्मद सल्ल का उन्हीं लोगों में से रसूल बनकर आना हज़रत इब्राहीम अलै की दुआ के क़बूल होने के नतीजे में हुआ था।
130: इबराहीम का दीन (तरीक़ा) असल में पूरी तरह से केवल एक अल्लाह के सामने झुकने वाला था, इसलिए देखा जाए तो इस्लाम ने इसी तरीक़े को दोबारा बहाल किया है, और इस लिहाज़ से बाद के यहूदी और ईसाई दीन से यह बढ़कर है। (देखें 2:135)
131: इस्लाम का शाब्दिक अर्थ अपने आपको अल्लाह के हर हुक्म के आगे झुका देना होता है।
133: कुछ यहूदियों का कहना था कि हज़रत याक़ूब (इसराईल) अलै ने मरते समय अपनी औलाद से यहूदियत बनाए रखने के लिए कहा था, यह आयत उसी के जवाब में है। देखें 3:65
135: इबराहीम अलै. के साथ "हनीफ़" आता है, जिसका मतलब शुद्ध [Pristine] या असली [Original] "केवल एक अल्लाह को माननेवाला।"
138: इस आयत में शायद ईसाइयों के रिवाज बेपतिस्मा (Baptism) की तरफ़ इशारा किया गया है, जिसे “रंग चढ़ाना” भी कहते हैं। किसी आदमी को ईसाई बनाते समय उसे रंग चढ़े हुए पानी से नहाया जाता है। बच्चों के लिए माना जाता है कि जब तक बपतिस्मा न हो तो वे गुनाहगार होते हैं। क़ुरआन कहता है कि अगर रंग लेना है तो अल्लाह का रंग लेना चाहिए कि उससे बेहतर किसी का रंग हो ही नहीं सकता।
142: मक्का की तेरह साल की ज़िंदगी में मुसलमानों को "काबा" की तरफ़ मुँह करके नमाज़ पढ़ने का हुक्म था। फिर जब मुहम्मद (सल्ल) और उनके सहाबी मक्का छोड़कर मदीना (हिजरत) चले गए, तो वहाँ अल्लाह के हुक्म से वे येरुशलम स्थित "बैतुल मक़दिस" की तरफ़ मुँह करके नमाज़ पढ़ने लगे, ऐसा उन्होंने सतरह महीने किया और फिर अल्लाह की तरफ़ से हुक्म आया कि अब हमेशा के लिए मुसलमानों को "काबा" की तरफ़ ही मुँह करके नमाज़ पढ़नी है। इस आदेश पर सबसे ज़्यादा एतराज़ यहूदियों को था क्योंकि वे भी अपनी इबादतें बैतुल मक़दिस की तरफ़ ही मुँह करके करते थे, जबकि ईसाई आम तौर से पूरब यानी उगते हुए सूरज की तरफ़ मुँह करते हैं। वैसे तो अल्लाह हर दिशा में मौजूद है और कोई एक दिशा अपने आप में कोई कमाल नहीं रखती है, मगर अल्लाह ने मुसलमानों को अलग क़ौम की पहचान देने के लिए अपना एक अलग क़िबला "काबा" को बनाया जिसकी तरफ़ मुँह करके हर मुसलमान को नमाज़ पढ़नी होती है।
143: मुसलमानों को यहाँ "बीच की क़ौम" कहा गया है जिसका मतलब "न्याय करने वाले समुदाय" से है। यहाँ यह बताया गया है कि जब मुसलमानों को यह हुक्म दिया गया था कि उन्हें अपनी नमाज़ "काबा" की तरफ़ नहीं बल्कि "बैतुल मक़दिस" की तरफ़ मुँह करके पढ़नी है, तो यह असल में अल्लाह की तरफ़ से एक परीक्षा थी कि देखें कौन अल्लाह के हुक्म के आगे अपना सिर झुका लेता है, और कौन है जो पुराने क़िबले को सही मानते हुए क़िबले को बदलने से इंकार कर देता है।
कुछ लोगों को शक हुआ कि जिन लोगों ने येरुशलम की तरफ़ मुँह करके नमाज़ें पढ़ीं और वे इस दुनिया से चले गए, उनकी नमाज़ें क्या बेकार हो जायेंगी, जवाब में यहाँ अल्लाह ने उन्हें बताया है कि उनका ईमान और उनका अमल बेकार नहीं जायेगा।
144: "काबा" चूँकि बैतुल-मक़दिस से ज़्यादा पुराना था, और उसके साथ हज़रत इब्राहीम और इसमाईल अलै. की यादें जुड़ी हुई थी, इसलिए मुहम्मद सल्ल. की दिली ख़्वाहिश थी कि काश फिर से 'काबा' को ही हमेशा के लिए क़िबला बना दिया जाए। इसी उम्मीद पर वह आसमान की तरफ़ मुँह उठाकर दुआएं मांगा करते थे।
146: अरब में रह रहे यहूदी और ईसाई लोग तौरात और बाइबल में दी गई जानकारी और निशानियों को ध्यान में रखते हुए मुहम्मद सल्ल को एक रसूल/नबी के रूप में अच्छी तरह पहचानते थे, जिस तरह कोई अपने बेटों को पहचानता है, मगर केवल अपनी ज़िद्द और हठधर्मी के चलते उन्हें मानने से इंकार करते थे।
149: "काबा" की तरफ़ मुँह करके नमाज़ पढ़ने के हुक्म को तीन बार दुहराया गया है, इससे इसकी अहमियत का पता चलता है।
150: जब तक मुसलमान येरूशलम स्थित "बैतुल मक़दिस" की तरफ़ मुँह करके नमाज़ पढ़ते थे, तब तक यहूदियों को लगता था कि मुसलमानों ने उनकी बड़ाई के आगे सिर झुका दिया, दूसरी तरफ़ मक्का के काफ़िर लोग कहते थे कि मुसलमान अपने आपको इबराहीम के तरीक़े पर चलने वाला बताते हैं, पर नमाज़ के लिए इन लोगों ने इबराहीम के बनाए गए "काबा" को छोड़कर बैतुल मक़दिस की तरफ़ मुँह करके नमाज़ पढ़ते हैं। इस तरह, क़िबला बदलकर दोनों तरह के लोगों को जवाब दे दिया गया। मगर बेकार की बहस करने वालों का मुँह बंद करना तब भी मुमकिन नहीं था।
153: यहाँ मुसलमानों को धीरज [सब्र] से काम लेने का हुक्म दिया गया है। यह दौर ऐसा था कि जब मुसलमानों को अपने दीन पर चलने में और इसके प्रचार-प्रसार में बहुत सी रुकावटें आ रही थीं, और साथ में युद्ध लड़ने का सिलसिला भी लगा हुआ था जिनमें काफ़ी मुसीबतें और सख़्तियाँ झेलनी पड़ रही थीं, अपनों के शहीद हो जाने का दुख भी बराबर लगा हुआ था। मगर उन्हें बताया गया है कि सच्चाई के रास्ते में आने वाली परेशानियों को अल्लाह की मर्ज़ी समझते हुए धीरज के साथ अपने काम में लगे रहना है।
154: अल्लाह के रास्ते में लड़ते हुए जो मारे जाते हैं, उन्हें मरा हुआ नहीं समझना चाहिए, बल्कि वह ज़िंदा हैं, और उन्हें अपने रब से रोज़ी मिलती है। देखें 3:169
158: "सफ़ा" और "मरवा" मक्का की दो पहाड़ियों के नाम हैं। जब हज़रत इबराहीम (अलै) अपनी पत्नी बीबी हाजरा को उनके दूध-पीते बच्चे इस्माईल के साथ छोड़कर चले गए थे, तब बच्चे के लिए पानी की खोज में बीबी हाजरा (रज़ि) "सफ़ा" और "मरवा" के बीच दौड़ी थीं। कुछ लोग इन दो पहाड़ियों के बीच दौड़ने से हिचकिचाते थे, क्योंकि बहुदेववादियों ने दोनों पहाड़ियों पर मूर्तियाँ स्थापित कर दी थीं, मगर यहाँ बता दिया गया कि हज और उमरा [छोटे हज] दोनों में इन दो पहाड़ियों पर दौड़ने में कोई ख़राबी नहीं, बल्कि यह ज़रूरी है।
"उमरा" यानी 'छोटा हज' तो हज के ज़माने में भी किया जा सकता है, और साल भर में किसी भी समय किया जा सकता है।
इस्लाम में घर यानी "काबा" की केंद्रीय भूमिका है, चाहे उसकी तरफ़ मुँह करके नमाज़ पढ़ने की बात हो या वहाँ जाकर हज करने की बात हो जैसा कि हज के तरीक़े इबराहीम अलै. ने अल्लाह के हुक्म से स्थापित कर दिए थे।
159: यहाँ इशारा यहूदियों और ईसाइयों की तरफ़ है जिनकी आसमानी किताबों में मुहम्मद (सल्ल) के आने और उनके संदेशों की सच्चाई के बारे में ख़बरें सुनायी गई थीं जिन्हें ये लोग छिपाते हैं, उन्हें अल्लाह, फ़रिश्ते और इंसान सब लानत भेजते हैं (3:87).
168: अरब के लोगों ने अपने मन से बहुत सी खाने की चीज़ों को हराम [अवैध] घोषित कर रखा था जिसका वर्णन सूरह अनाम में आगे आयेगा, और कुछ चीज़ें जो हराम थीं उन्हें अपने मन से हलाल [वैध] ठहराया हुआ था, जैसे मरे हुए जानवर का (सड़ा-गला) मांस हलाल था।
169: शैतान अश्लील कामों [sexual immorality] के लिए उकसाता है (2:268; 7:28,30; 24:21). अल्लाह के नाम से झूठी बातों के लिए देखें 6:138, 145
171: इस बात को ऐसे भी समझा जा सकता है कि जैसे विश्वास न करनेवाले देवी-देवताओं को पुकार रहे हों, मगर वे जवाब नहीं दे सकते।
173: किसी जानवर को ज़बह करते समय अगर अल्लाह को छोड़कर किसी दूसरे देवता का नाम लिया गया है, तब भी उसका गोश्त खाना हराम (अवैध) होगा। हराम खानों की पूरी लिस्ट 5:3 में देखी जा सकती है।
177: यहाँ अब संबोधन किताबवालों यानी यहूदियों और ईसाइयों से किया गया है, जो मुसलमानों द्वारा बैतुल मक़दिस को छोड़कर काबा की तरफ़ मुँह करके नमाज़ पढ़ने के बारे में इतना वाद-विवाद कर रहे थे जैसे यह चीज़ कोई बहुत ज़्यादा अहम हो, हालाँकि अल्लाह ने कहा है कि असल चीज़ नेकी और भलाई के काम हैं जिसे ज़्यादा से ज़्यादा करने में सबको एक दूसरे से आगे निकलने की कोशिश करनी चाहिए।
178: "क़िसास" [Law of Retaliation] का मतलब बराबर का बदला लेना। इस्लाम से पहले भी अरब में जान के बदले जान लेने की परम्परा थी, मगर होता यह था कि जो क़बीला ज़्यादा मज़बूत होता, वह ज़्यादा की माँग करता था। अगर किसी छोटे दर्जे के आदमी ने किसी बड़े दर्जे के आदमी को मार डाला, तो मारे गए आदमी के वारिस यह माँग करते थे कि बदले में हमें क़ातिल की जान नहीं बल्कि उस क़बीले के कोई ऊँचे दर्जे के आदमी की जान चाहिए। इसी तरह, अगर किसी औरत ने क़त्ल किया, तो मारे गए आदमी के वारिस की तरफ़ से यह माँग होती थी कि बदले में हमें औरत की जान नहीं बल्कि किसी मर्द की जान चाहिए। इसी तरह ग़ुलाम के बदले आज़ाद मर्द की माँग कतरे। इस्लाम ने इस तरह के भेदभाव को हटाकर सीधे तौर पर इसे क़ातिल से जोड़ दिया, अर्थात जिसने भी किसी की जान ली है तो उस जान का बदला भी उसे ही भुगतना होगा।
अगर मरने वाले के वारिसों ने क़िसास के बदले क़ातिल से "ख़ून-बहा" लेना तय कर लिया तो फिर क़ातिल की जान लेना उनके लिए उचित नहीं होगा।
180: इस आयत में मरने से पहले अपनी संपत्ति में से माँ-बाप और रिश्तेदारों के लिए वसीयत करने का हुक्म है। असल में यह आयत उस समय उतरी थी जब संपत्ति के बंटवारे के बारे में कोई हुक्म नहीं आया था। फिर कुछ साल बाद सूरह निसा (4: 11-14) में विस्तार से बता दिया गया कि छोड़ी गई संपत्ति में सभी वारिसों का कितना हिस्सा होगा। इस तरह, उनके लिए वसीयत की ज़रूरत नहीं रही। मगर कोई इंसान अगर किसी ऐसे आदमी को कुछ देना चाहे जो शरिअत के हिसाब से हक़दार नहीं है, तो वह अपनी संपत्ति का ज़्यादा से ज़्यादा एक तिहाई हिस्सा दे सकता है।
183: रोज़े तुम से "पहले के लोगों" मतलब यहूदियों पर भी फ़र्ज़ किए गए थे।
187: कुछ मुसलमानों ने मुहम्मद (सल्ल) के सामने इस बात को स्वीकार किया था कि उन लोगों ने रमज़ान की रातों में सेक्स करके अपने रोज़े को ख़राब कर दिया।
189: कुछ अरबों में एक अजीब रिवाज था कि हज करके जब घर लौटते, तो वे सामने का दरवाज़ा छोड़कर पीछे के रास्ते से जाते थे और इसे बड़ा नेक काम मानते थे।
190: यह आयतें उस समय उतरी थीं जब हुदैबिया की संधि (6 हिजरी/628 ई) के बाद मक्का वालों ने मुसलमानों को छोटा हज [उमरा] करने से रोक दिया था, और यह तय हुआ था कि वे अगले साल आकर अपना हज पूरा करें। अगले साल जब हज का समय आया तो कुछ मुसलमानों को शंका हुई कि कहीं ऐसा न हो कि मक्का वाले संधि से पलट जाएं और फिर हज करने से रोकें, तो फिर युद्ध करना पड़ेगा। अगर ऐसा हुआ तो वह आदर का महीना होगा जिसमें युद्ध करना मना है, साथ में काबा-परिसर में ऐसे भी युद्ध करना मना है, मगर अल्लाह ने इस आयत में ऐसे समय में और ऐसी जगह पर भी अपने बचाव में युद्ध करने की इजाज़त दे दी।
"लड़ाई में सीमाएं न लांघो" के मतलब में कई बातें शामिल हैं जिनसे रोका गया है, यानी अपनी तरफ़ से लड़ाई न शुरू करना, उससे नहीं लड़ना जो नहीं लड़ रहा हो, हमले के जवाब में उससे बहुत ज़्यादा हिंसा करना आदि।
191: मुसलमानों को इस बात की चिंता थी कि हज के दौरान अगर उन लोगों ने मक्का परिसर में हमला कर दिया तो क्या बदले की कार्रवाई करने की इजाज़त होगी, देखें 2: 196. यहाँ उन्हें इजाज़त दी गई है कि जब उन्हें हमला करने वालों से पाला पड़ ही जाए, तो उन्हें अपने बचाव में ज़रूर लड़ना चाहिए, चाहे मक्का परिसर के अंदर लड़ना पड़े या बाहर, क्योंकि "तुम्हारे ऊपर ग़लत तरीक़े से [unlawfully] उनका लगातार अत्याचार करना, मक्का परिसर में तुम्हारे द्वारा उनका क़त्ल करने से कहीं बुरा है।''
193: देखें 8: 39
195: अपने बचाव में युद्ध की तैयारी पर होने वाले ख़र्च में कंजूसी करना अपने पाँव पर कुल्हाड़ी मारने जैसा होगा, क्योंकि उसके नतीजे में दुश्मन मज़बूत होकर तुम्हारी ही बर्बादी का कारण बनेगा। इस आयत का आम तौर से यह भी मतलब समझा जाता है कि ख़ुदकुशी [आत्महत्या] करना या किसी भी तरीक़े से अपने आपको नुक़सान पहुँचाना भी अवैध है।
196: जब कोई आदमी हज या उमरे के इरादे से इहराम बाँध ले, तो जब तक हज की सारी रीतियाँ पूरी न हो जाए, उन्हें इहराम उतारना मना है। लेकिन अगर किसी कारण से उन्हें काबा तक जाने से रोक दिया जाए, तो ऐसी सूरत में कुर्बानी करके इहराम खोला जा सकता है, जैसा कि आप (सल्ल) ने हुदैबिया में रोके जाने पर किया था।
जब हज की ज़्यादातर रीतियाँ पूरी हो जाती हैं, तब हज में गए मर्दों को अपना बाल कटवाना या मुंडवाना होता है। जब तक हाजी इहराम पहने हुआ होता है, तो ऐसी हालत में सिर के बाल मुंडवाना सही नहीं है, अगर बीमारी के कारण ऐसा करना पड़े, तो फिर इसकी भरपाई इस तरह होगी कि या तो तीन दिन रोज़ा रखे, या छ: ग़रीबों को उचित दान (सदक़ा) दे या एक बकरी कुर्बान करे।
198: हज के दौरान रोज़ी-रोटी के लिए व्यापार करना कोई गुनाह नहीं, अगर इससे हज के ज़रूरी कामों पर कोई असर न पड़ता हो।
हज के दूसरे दिन (9वीं को) मिना से अरफ़ात (मक्का से 22 km) पहुँचा जाता है जहाँ दोपहर से शाम तक रुका जाता है, फिर वहाँ से आगे 8 km "मुज़दलिफ़ा" में रात गुज़ारी जाती है, और अगले दिन सूरज निकलने से पहले अल्लाह को याद किया जाता है और दुआएं माँगी जाती हैं।
199: पुराने ज़माने से अरब के लोगों का तरीक़ा यह रहा था कि हज के दौरान 9 ज़िल-हिज्जा को मिना से अरफ़ात जाते थे, और रात को वहाँ से लौटकर मुज़दलिफ़ा में ठहरते थे। बाद में क़ुरैश और उनका देखा-देखी उनके कुछ साथी क़बीलों ने मिना से अरफ़ात तक जाना बंद कर दिया और वे मुज़दलिफ़ा तक जाकर ही लौट आते थे। इस आयत में यह हुक्म दिया गया है कि सभी को आम लोगों की तरह अरफ़ात तक जाकर ही मुज़दलिफ़ा होते हुए लौटना चाहिए।
203: मिना में तीन दिन गुज़ारना सुन्नत है, और इस दौरान शैतान पर कंकरियाँ मारनी ज़रूरी है। 12 तारीख़ के बाद मिना से जाया जा सकता है, 13 तारीख़ तक रुकना ज़रूरी नहीं है। और अगर कोई रुकना चाहे, तो 13 तारीख़ को भी कंकरियाँ मारके वापस जा सकता है।
205: बताया जाता है कि 'अख़नस बिन शरीक़' नाम का एक आदमी मदीना में आकर मुहम्मद (सल्ल) से मिला था और उनसे बड़ी चिकनी-चुपड़ी बातें कीं, और अल्लाह को गवाह बनाकर सच्चाई पर विश्वास कर लेने की बात कही, मगर जब वह वहाँ से वापस गया तो रास्ते में मुसलमानों के खेत जला दिए और मवेशियों को ज़बह कर डाला। यह आयत इसी पृष्टभूमि में उतरी है, वैसे इस तरह की हरकत मदीना के पाखंडी [मुनाफ़िक़] लोग करते रहते थे।
210: सच्चाई से इंकार करने वालों और मदीना के कई यहूदियों की तरफ़ से यह माँग की जाती थी कि अल्लाह को ख़ुद ही हमारे सामने प्रकट होकर हमें विश्वास कर लेने का हुक्म देना चाहिए। यह आयत ऐसी ही माँगों के जवाब में है कि यह दुनिया इंसानों की आज़माइश [परीक्षा] करने के लिए बनायी गई है, आदमी को अपनी अक़्ल का इस्तेमाल करते हुए प्रकृति में फैली हुई निशानियों की रौशनी में सृष्टि की रचना करनेवाले अल्लाह को पहचानना है और उस पर विश्वास करना है, साथ में उसके द्वारा भेजे गए रसूलों पर भी विश्वास करना है, और वह भी छुपी हुई चीज़ों को बिना देखे हुए। जब अल्लाह सामने ही आ जायेगा तो उसे देखकर विश्वास कर लेने में तो कोई परीक्षा न हुई।
212: दुनिया में अगर किसी को बहुत रोज़ी दी गई है और उसकी आर्थिक हालत बहुत अच्छी है, तो यह ज़रूरी नहीं है कि अल्लाह उससे बहुत ख़ुश है। दुनिया में रोज़ी देना पूरी तरह से अल्लाह की मर्ज़ी पर है और वह जिसे चाहता है बेहिसाब रोज़ी देता है।
217: इस्लाम में चार महीने आदर के माने जाते हैं (9:36).... मुहर्रम, रजब, ज़ीक़ादा और ज़िल-हिज्जा, जो कि कैलेंडर के हिसाब से पहला, सातवाँ, ग्यारहवाँ और बारहवाँ महीना होता है। इन महीनों में जंग करना बिल्कुल मना है, लेकिन अगर कोई हमला कर दे तो अपनी रक्षा के लिए लड़ने की अनुमति है। इन आदर के महीनों में अगर कोई सताया हुआ आदमी अपने बचाव में लड़ता है तो वह कोई गुनाह नहीं, बल्कि इससे कहीं बड़ा जुर्म लोगों पर लगातार अत्याचार करना है और वह भी इस कारण से कि वे अल्लाह पर विश्वास रखते हैं। आयत 191 में कही बात को यहाँ और साफ़ किया गया है।
219: अरब के लोग बरसों से शराब पीने के आदी रहे थे, इसलिए क़ुरआन में उसको एकदम से एक ही बार में मना नहीं कर दिया गया, बल्कि धीरे-धीरे इसको बंद किया गया। पहले सूरह नहल (16: 67) में कहा गया कि नशा लानेवाली शराब अच्छी चीज़ नहीं होती, फिर सूरह बक़रा (2: 219) में कहा जा रहा है कि इससे कुछ फ़ायदे तो हैं मगर नुक़सान बहुत ज़्यादा है कि यह गुनाह करने पर उकसाती है। फिर सूरह निसा (4: 43) में आया कि नशे की हालत में नमाज़ से दूर रहना चाहिए, और फिर अंत में सूरह मायदा (5: 90-91) में इसको पूरी तरह हराम [अवैध] घोषित कर दिया गया।
"दान"[सदक़ा] उतने में से ही देना चाहिए जो अपने घरवालों की ज़रूरत पूरी करने के बाद बच जाए, ताकि घरवाले ज़रूरतमंद न बन जाएं। बताया जाता है कि जब दान देने का हुक्म आया तो कुछ लोगों ने सब कुछ दान कर दिया और अपने घरवालों के लिए कुछ नहीं छोड़ा।
220: जब क़ुरआन ने अनाथों के अभिभावकों को यह बताया कि अनाथों का माल खा जाने पर सख़्त पकड़ होगी (4: 1-2), तब से मदीना के कुछ मुसलमान लोगों ने अनाथों के साथ कुछ ज़्यादा ही सावधानियाँ बरतनी शुरू की, वे उनके खाने अलग पकवाने लगे, और उन्हें अलग ही खिलाते, यहाँ तक कि अगर उनका खाना बच जाता तो ख़राब हो जाता, इसमें तकलीफ़ भी थी और नुक़सान भी। असल मक़सद उनके अभिभावकों को परेशानी में डालना नहीं था, बल्कि यह था कि लोग अनाथों के माल को सही ढंग से रखें और बड़े होने पर उनका माल उन्हें वापस कर दें।
223: यहाँ एक बात साफ कर दी गई है कि मियाँ-बीवी का मिलाप केवल मौज-मस्ती के लिए नहीं होना चाहिए, बल्कि उसका मक़सद इंसानी नस्ल को बढ़ाने के लिए होना चाहिए, जिस तरह एक किसान अपने खेत में बीज बोता है तो उसका मक़सद पैदावार हासिल करना होता है। और चूँकि इसका मक़सद नस्ल को बढ़ाना है, इसलिए यह मिलन का काम औरतों के उसी आगेवाले हिस्से [योनि] में ही होना चाहिए जो इसके लिए बना है।
औरतों के शरीर का पीछेवाला हिस्सा जो कि इस काम के लिए नहीं बना है, उसको (प्रकृति के विरुद्ध) सेक्स का मज़ा लेने के लिए उपयोग [anal sex] करना मना है।
एक और अहम बात यह है कि सेक्स के लिए औरतों के आगे के ही हिस्से [योनि] का उपयोग होना चाहिए, और उस जगह पहुँचने के लिए आगे या पीछे, ऊपर या नीचे किसी भी तरफ़ से पहुँचा जा सकता है। अत: इस बात में कोई हक़ीक़त नहीं है, जैसाकि उस ज़माने के के कुछ यहूदियों का विचार था कि अगर सेक्स पीछे के रास्ते से किया जाए तो औलाद भैंगी होती है।
226: इस्लाम के आने से पहले अरब में यह देखा जाता था कि कभी-कभी कोई पति अनिश्चित काल के लिए अपनी बीवी के नज़दीक न जाने की क़सम खा लेता था, इससे बीवी को तलाक़ भी नहीं होती थी कि वह दूसरे आदमी से शादी कर सके। इस्लाम में यह नियम बनाया गया कि ऐसी क़सम खाने के बाद कोई पति अगर चार महीने तक बीवी के नज़दीक नहीं गया, तो फिर तलाक़ हो जायेगी।
228: जिन औरतों को तलाक़ दे दी गई हो, उनके लिए "इद्दत" यानी अगली शादी के लिए इंतज़ार की अवधि तीन माहवारी पूरी होने तक है। अगर वह गर्भवती है, तो उसे यह बात छिपानी नहीं चाहिए।
हाँ, शादी के तुरंत बाद अगर तलाक़ हो जाए, जबकि मर्द ने अपनी बीवी को छुआ तक न हो, तब औरत को दूसरी शादी के लिए इंतज़ार करने की ज़रुरत नहीं है (33:49).
जिन औरतों को माहवारी आनी बंद हो गई हो या आनी शुरू न हुई हो, उनके लिए इद्दत की अवधि तीन महीने है, और अगर वह गर्भवती हो, तो उसके लिए इद्दत की अवधि बच्चे के पैदा होने तक है (65:4).
229: अरब में एक अजीब रिवाज यह था कि लोग अपनी औरतों को तंग करने के लिए बार-बार तलाक़ देते और फिर इद्दत की अवधि ख़त्म होने से पहले ही उनसे मेल-मिलाप कर लेते, इस तरह, वैसी औरतें न सही मायने में बीवी होने का दर्जा पातीं और न ही उन्हें भले तरीक़े से छोड़ा जाता कि वे किसी और से निकाह कर सकें। इस्लाम ने नियम बनाकर ऐसे तलाक़ की संख्या ज़्यादा से ज़्यादा दो निर्धारित कर दी जिसके दौरान फिर से मेल-मिलाप हो सकता हो।
क़ुरआन और सुन्नत के मुताबिक़ तलाक़ देने का सही तरीक़ा नीचे दिया गया है:
(i) जब बीवी को तलाक़ देने की नौबत आ ही जाए, तो यह तब देना चाहिए जब वह माहवारी के बाद साफ़-सुथरी हो जाए और इस बीच उसके साथ सेक्स न किया गया हो।
(ii) एक बार में एक ही तलाक़ देना चाहिए, तलाक़ देने के बाद बीवी को 'इद्दत" यानी तीन माहवारी के पूरे होने तक इंतज़ार करना है। इस अवधि के ख़त्म होने से पहले-पहले अगर मर्द चाहे तो अपनी बीवी से मेल-मिलाप करके उसे घर पर रोक ले या फिर इद्दत की अवधि पूरी होते ही बीवी को एक तलाक़ हो जाएगी, अब मर्द को चाहिए कि भले तरीक़े से औरत को घर से जाने दे। अब औरत अपनी दूसरी शादी के लिए आज़ाद होगी। फिर अगर वह औरत और उसका पुराना पति दोनों चाहें तो वे एक-दूसरे से नये सिरे से मेहर के साथ निकाह कर सकते हैं।
(iii) एक बार तलाक़ देने के बाद अगर इद्दत पूरी होने से पहले मर्द ने अपनी बीवी से मेल-मिलाप कर लिया, या इद्दत पूरी हो जाने के बाद दोनों ने फिर से एक-दूसरे के साथ शादी कर ली, तो फिर वे मियाँ-बीवी के रूप में रह सकते हैं, मगर मर्द को याद रखना होगा कि उसे बीवी को तलाक़ देने का दो बार ही मौक़ा दिया गया है, जिसमें एक गिनती पूरी हो गई।
(iv) एक साथ रहते-रहते फिर अगर ऐसी नौबत आ जाए कि दूसरी बार तलाक़ देनी पड़े, तो फिर से वही तरीक़ा अपनाना होगा, जैसाकि पहली तलाक़ के समय अपनाया गया था, यानी इद्दत की अवधि पूरी होने से पहले या तो बीवी से मेल-मिलाप कर ले या उसे जाने दे। अब अगर दोनों को फिर से पछतावा हुआ और मियाँ-बीवी आपसी सहमति से फिर से एक-दूसरे के साथ शादी करना चाहें, तो मेहर के साथ फिर से शादी कर सकते हैं। औरत के घरवालों या किसी और को उन्हें दोबारा शादी करने से नहीं रोकना चाहिए।
(v) इस तरह, दो बार तलाक़ देने के बाद भी मर्द के पास यह अवसर होता है कि वह बीवी से मेल-मिलाप करके शादी के बंधन में बना रहे। लेकिन अगर मर्द ने तीसरी बार भी तलाक़ दे दिया, तो उसी वक़्त तलाक़ पक्का हो जाएगा और तब मेल-मिलाप के रास्ते बंद हो जाएंगे और फिर बीवी उससे जुदा हो जाएगी।
(vi) तलाक़ का एक और तरीक़ा यह भी बताया गया है कि माहवारी से पाक-साफ़ होने के बाद पहली तलाक़ दी जाए, फिर अगली माहवारी के बाद दूसरी तलाक़ और फिर तीसरी माहवारी के बाद तीसरी बार तलाक़, और इस तरह, तीसरी देते ही तलाक़ पक्का हो जाता है।
(vii) तलाक़ का एक और तरीक़ा जो जाहिलों में आम तौर से पाया जाता है कि एक बार में ही तीन तलाक़ दे दी जाए। यह मामला काफ़ी विवादों में रहा है। शरिअत के हिसाब से ऐसा करना गुनाह है। कुछ उलमा मानते हैं कि एक बार में तीन तलाक़ देने से एक ही गिनती मानी जानी चाहिए, जबकि कुछ उलमा के मुताबिक़ तलाक़ हो जाती है। इसे बहुत से देशों में ग़लत ठहराया जा चुका है, और यह एक बेहद ना-पसंदीदा तरीक़ा है।
(viii) मर्दों के लिए यह जायज़ नहीं है कि वह तलाक़ देने के बाद अपनी बीवी की मेहर या किसी दिए गए तोहफ़े को वापस लेने की माँग करे। हाँ, अगर किसी कारण से बीवी ख़ुद ही तलाक़ की माँग करे, जिसे "ख़ुला" कहते हैं, और मर्द इसके लिए आसानी से तैयार न हो, तो औरत उससे पीछा छुड़ाने के लिए मेहर का कुछ हिस्सा देकर या और कुछ दे-ले के यह मामला तय कर सकती है।
230: तीसरी तलाक़ के बाद मर्द के लिए कोई मौक़ा नहीं रह जाता कि वह फिर से बीवी से मेल-मिलाप कर सके। बस एक सूरत है जिसे "हलाला" कहते हैं, जिसमें तलाक़ के बाद औरत किसी और से शादी कर ले और फिर उसका पति अपनी मर्ज़ी से उसे तीसरी तलाक़ दे दे, तो फिर इस सूरत में दोबारा पुरानी बीवी से शादी की जा सकती है, अगर दोनों इसके लिए तैयार हों। हदीसों से मालूम होता है कि अगर कोई मर्द योजना बनाकर अपनी तलाक़ दी हुई बीवी को अपने लिए "हलाल" करने के लिए उसकी शादी किसी ऐसे मर्द से करवाता है जो कि उसे शादी के बाद ही तलाक़ दे दे, तो ऐसी शादी पर लानत की गई है।
232: दो बार तक तलाक़ देने में मियाँ-बीवी को फिर से मेल-मिलाप करके शादी कर लेने का मौक़ा होता है। अगर औरत फिर से अपने पति से शादी करना चाहे, तो औरत के घर वालों जैसे उसके बाप या भाई को इसमें अड़ंगा नहीं लगाना चाहिए।
238: यहाँ नमाज़ों को सही वक़्त पर और पाबंदी से पढ़ने पर ध्यान रखने को कहा गया है ताकि इस कड़वे माहौल में भी दोनों पक्ष क़ुरआन में बताए गए तरीक़ों पर अमल करें और एक दिन अल्लाह के सामने अपने किए का जवाब दे सकें।
240: इस्लाम से पहले अरब में विधवाओं के लिए इद्दत की अवधि एक साल थी, जिसे क़ुरआन ने बाद में घटाकर तीन महीना दस दिन कर दिया (2: 234)। सो, बाद में विधवाओं को खाना-ख़र्चा देने की अवधि भी एक साल के बजाए तीन महीना दस दिन तक ही कर दी गई। इस सूरह के आने तक पतियों की छोड़ी गई संपत्ति में विधवाओं का हिस्सा तय नहीं हुआ था, जो बाद में सूरह निसा में तय कर दिया गया, अत: उसमें बताये गए विधवाओं के तय हिस्से में से उनके लिए खाना-ख़र्चा देना और इद्दत तक अपने पति के घर पर रहना ज़रूरी ठहरा दिया गया।
243: देखें आयत 246. यहाँ से लेकर आयत 260 तक दो विषय एक साथ बयान हुए हैं। असल में यहाँ बुनियादी तौर पर अल्लाह के रास्ते में संघर्ष [जिहाद] करने की सीख दी गई है, मगर कुछ पाखंडी और कमज़ोर-तबियत लोग युद्ध में जाने से इसलिए डरते थे कि उन्हें मरने का डर लगा रहता था। इसलिए दूसरे विषय में यह बताया गया है कि मौत और ज़िंदगी देना अल्लाह के हाथ में है, कोई बिना युद्ध में गए भी मर सकता है और कोई युद्ध में जाकर भी सही-सलामत बच सकता है। अल्लाह अगर चाहे तो मरने के बाद भी किसी को ज़िंदा कर सकता है। आगे आयतों में इनकी कई मिसालें दी गई हैं।
244: शादी-तलाक़ आदि विषयों पर चर्चा के बाद क़ुरआन में फिर से बदला लेने का मामला उठाया गया है।
246: यहाँ सैम्युएल [Samuel] नाम के नबी [Prophet] के बारे में बात कही गई है। [देखें 1 Samuel 8:19-20]. इनका ज़माना मूसा (अलै) के क़रीब 350 साल बाद का है।
247: तालूत [Saul] असल में समाज के निचले तबक़े के थे, न वह किसी राजा के ख़ानदान से थे और न ही धर्म-गुरुओं में से थे, इसलिए लोगों ने उन्हें अपना राजा मानने से इंकार कर दिया था।
248: जब नबी ने तालूत को राजा बनाने की ख़बर सुनाई तो शुरू में तो इसराइलियों ने मानने से इंकार किया, मगर फिर उनसे कोई निशानी की माँग की। नबी ने इसकी निशानी यह बताई कि बरसों का खोया हुआ ताबूत वापस मिल जाएगा, जिसे फ़रिश्ते उठाकर लाएंगे।
249: इससे मिलती-जुलती कहानी बाइबल में गिड्योन [Gideon] के क़िस्से में है जब उनकी सेना जार्डन नदी पार कर रही थी, देखें [Judges 7: 4-7], हालाँकि गिड्योन सैम्युएल और तालूत से पहले था।
251: जालूत [Goliath] दुश्मनों की तरफ़ का देव जैसे डील-डौलवाला पहलवान था। एक दिन दाऊद [David] जो अपने भाइयों में सबसे छोटे थे, जंग के मैदान में अपने भाइयों की ख़बर लगाने के लिए पहुँचे, जो इस जंग में इसराइलियों की तरफ़ से लड़ रहे थे। बाइबल में है कि जालूत कई दिन से इसराइलियों को ललकारता रहा, मगर किसी को भी उससे मुक़ाबला करने की हिम्मत नहीं हो रही थी, जब दाऊद ने यह बात सुनी तो उन्हें ताव आ गया, और वह जालूत [Goliath] से मुक़ाबला करने के लिए खड़े हो गए। उन्होंने अपनी गुलेल चलाई और पत्थर जालूत के माथे पर इस ज़ोर से लगा कि वह चकराकर गिर पड़ा। आपने आगे बढ़कर उसकी गर्दन काट दी। [1 सैम्युएल: 17]
253: इंसानों को दुनिया में भेजने का मक़सद असल में उनकी परीक्षा लेना है कि कौन है जो पैग़म्बर द्वारा लाई गई शिक्षाओं को सही मानते हुए अपनी मर्ज़ी से उन पर विश्वास कर लेता है, और कौन है जो उस संदेश को नज़रअंदाज़ कर देता है और अपनी इच्छा अनुसार ग़लत रास्ते पर चल पड़ता है। अल्लाह किसी को ज़बरदस्ती सच्चाई पर विश्वास कर लेने के लिए मजबूर नहीं करता, जैसाकि आयत 256 में साफ़ कहा गया है कि दीन [धर्म] को मानने या न मानने पर कोई ज़ोर-ज़बरदस्ती नहीं है।
255: "अल्लाह हर चीज़ पर नज़र रखने वाला है। देखें 13:13
यहाँ अल्लाह के तख़्त (कुर्सी) का ज़िक्र है जहाँ से सारी दुनिया को नियंत्रित [control] किया जाता है। देखें 7:54; 10:3; 25:59; 32:4
258: कहा जाता है कि यह घटना बाबिल [babylonia] के बादशाह नमरूद [Nimrod] के बारे में कही गई है।
259/260: इन दो आयतों में अल्लाह ने अपने ख़ास बंदों को मौत के बाद दोबारा ज़िंदा करने का अनुभव कराया ताकि उनका यक़ीन और पक्का हो जाए। आयत 259 में जिस घटना का ज़िक्र है, उससे मिलती जुलती बात नबी ज़ुल-किफ़्ल [Ezekiel] के ज़माने में हुई थी जिसके बारे में बाइबल में है, देखें Ezekiel 37:1-14
272: मदीना के मुसलमानों के कुछ ऐसे ग़रीब रिश्तेदार थे जो मुस्लिम न थे, और इसी कारण वे उनकी मदद नहीं कर पाते थे, बल्कि इस इंतज़ार में थे कि कब वे मुसलमान बन जाएं ताकि उनकी मदद की जा सके। लेकिन इस आयत में बताया गया है कि अल्लाह की ख़ुशी हासिल करने के इरादे से किसी (ग़ैर-मुस्लिम) की भी मदद की जाए तो इसका बदला ज़रूर अच्छा मिलेगा।
273: बताया जाता है कि यह आयत मुहम्मद (सल्ल) के कुछ ऐसे सहाबियों [साथियों] के बारे में है जो मदीना की मस्जिद से लगे हुए चबूतरे पर रात-दिन पड़े रहते थे और उनका मक़सद इस्लाम की सही शिक्षा हासिल करना था, इस काम में पूरी तरह लगे रहने के कारण वे कोई दूसरा काम नहीं करते थे, और इसीलिए उनकी आर्थिक हालत अच्छी न थी, मगर वे किसी से कुछ माँगते न थे। अल्लाह ने ऐसे आदमियों की मदद करने का हुक्म दिया है।
275: एक ख़ास अवधि के लिए किसी को क़र्ज़ देकर उससे बढ़ी हुई रक़म वसूल करने की शर्त तय कर लेने को ब्याज खाना कहते हैं। अगर तय की गई अवधि में क़र्ज़ की रक़म लौटाई नहीं जाती तो फिर ब्याज की रक़म भी बढ़ती जाती है जो कि सरासर अत्याचार है। जबकि अल्लाह ने व्यापार को सही ठहराया है जिसमें सामान को बेचकर ज़्यादा पैसा कमाया जाता है, मगर इसमें सौदा एक बार ही होता है और इसमें लाभ-हानि दोनों ही होने की संभावना रहती है।
282: "लिखनेवाले को लिख देना चाहिए जैसाकि उसे अल्लाह ने सिखाया है..." यहाँ ध्यान देने की बात है कि लिखना एक हुनर माना गया है जिसे अल्लाह ने इंसानों को सिखाया है, देखें 68:1; 96:4-5
284: बिना किसी इरादे के मन में आने वाली बातों पर आम तौर से पकड़ नहीं होती, बल्कि बुरी नीयत से दिल में कोई बात रखना, या मन में गुनाह करने का पक्का इरादा रखना जैसी चीज़ों का ज़रूर हिसाब देना होगा।
No comments:
Post a Comment