Monday, May 6, 2019

Chronological quran: Middle Meccan surah- I/ मध्यवर्ती मक्का काल-1 [617-620 AD]

सूरह 75 : अल क़ियामह 
[क़यामत/ The Resurrection]


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

मैं क़सम खाता हूँ क़यामत के दिन की  (1)

और मैँ कसम खाता हूँ (बुराइयों पर) कचोटने वाली आत्मा की!  (2)

क्या इंसान यह समझता है कि हम उसकी हड्डियों को (जो मरने के बाद चूर चूर होकर बिखर जाएगी) कभी फिर से इकट्ठा नहीं करेंगे?  (3)

क्यों नहीं! हम तो यहाँ तक कर सकते हैं कि उसकी उंगलियों के पोर-पोर [fingertips] तक को (दोबारा) ठीक (वैसा ही) कर दें।  (4)

इसके बावजूद, आदमी उस (जीवन) से इंकार करना चाहता है, जो उसके आगे (आख़िरत/ Hereafter में) आनेवाला है :  (5)

वह (व्यंग से) पूछता है,  “तो वह क़यामत का दिन कब होगा?” (6)

जब आँखें चौंधिया जाएंगी  (7)

और चांद (अपनी) रौशनी खो देगा,   (8)

जब सूरज और चाँद इकट्ठे कर दिए जाएंगे,   (9)

उस दिन आदमी पुकार उठेगा,  “भाग कर जाएं तो कहाँ जाएं?”  (10)

नहीं! सचमुच,  छिपने की कोई जगह नहीं होगी :  (11)

उस दिन तुम्हारे रब के पास ही ठिकाना होगा जहाँ लौट कर सबको जाना होगा।   (12)

उस दिन आदमी को बता दिया जाएगा, जो कुछ (दुनिया में कर्म कर के) उसने आगे भेजा था और जो कुछ (कर्मों का असर मरने के बाद) उसने पीछे छोड़ा था।  (13)

बल्कि, सच तो यह है कि आदमी (अपने किए गए अच्छे बुरे कर्मों पर) ख़ुद ही गवाह है,  (14)

चाहे वह अपनी ओर से कितने ही बहाने पेश करे।  (15)

[ए रसूल!] आप (कुरआन  की) आयतों को याद करने की हड़बड़ी में, अपनी ज़बान को जल्दी-जल्दी न चलाया करें :  (16)

बेशक उसे (आपको) याद कराना और (आपकी ज़बान से) पढ़ाना हमारी ज़िम्मेदारी है।  (17)

तो जब हम उस आयत को (जिबरील की ज़बानी) पढ़ कर सुना दें,  तब आप भी उसे पढ़कर दोहरा लिया करें (18)

और फिर इन (आयतों) के मतलब समझाना भी हमारी ही ज़िम्मेदारी है।  (19)

सचमुच, तुम लोग बहुत थोड़े समय चलनेवाली दुनिया (की ज़िंदगी) से बहुत लगाव रखते हो  (20)

और तुम इसके बाद आनेवाली दुनिया [आख़िरत/ Hereafter] को भुलाए बैठे हो। (21)

(एक तरफ) बहुत से चेहरे उस दिन खिले हुए और चमकते हुए होंगे,    (22)

और अपने रब (की नेमतों) को देख रहे होंगे,  (23)

और कितने ही चेहरे उस दिन बिगड़ी हुई हालत में (उदास और काले पड़ गये) होंगे।   (24)

वे समझ जाएंगे कि उनके ऊपर भारी मुसीबतों का पहाड़ टूटने ही वाला है।   (25)

सचमुच, जब जान [soul] (निकलती हुई) गले तक आ पहुँचेगी;  (26)

जब यह कहा जाएगा, " कि है कोई जो झाड़-फूंक कर के जान बचा सके?";   (27)

जब वह समझ जाए कि (अब सबसे) जुदाई का समय आ गया है;  (28)

जब उसके पैरों को एक साथ (कफ़न लपेटने के लिए) लाया जाएगा :  (29)

उस दिन उसे अपने रब की तरफ हँका कर ले जाया जाएगा।   (30)

उसने न (अल्लाह और रसूल की बातों पर) विश्वास किया और न नमाज़ पढ़ी,   (31)

बल्कि उसने (सच्चाई को) मानने से इंकार किया और (ईमान से) मुँह मोड़ लिया,    (32)

फिर अकड़ता हुआ अपने लोगों की तरफ़ शान से चल दिया।  (33)

तुम से (क़यामत की घड़ी) नज़दीक से और नज़दीक आती जा रही है. (34)
* या तबाही है तुम्हारे लिए (मरते समय), फिर तबाही है (मरने के बाद की हालत में)।   

तुम से और नज़दीक, और ज़्यादा नज़दीक!  (35)
* या फिर तबाही है तुम्हारे लिए (क़यामत के दिन), फिर तबाही है तुम्हारे लिए (जहन्नम की).   

क्या इंसान यह समझता है कि उसे यूँ ही (बिना हिसाब-किताब लिए) छोड़ दिया जाएगा?  (36)

क्या वह (अपने जीवनकाल के शुरू में) वीर्य [sperm]  की एक टपकी हुई बूँद मात्र न था, (37)

जो कि (कोख में) जोंक की तरह चिपका हुआ एक लोथड़ा बन गया, फिर अल्लाह ने उसे  (इंसानी) शक्ल-सूरत दे दी, फिर सभी अंगों को (सही अनुपात में) ठीक ठाक किया, (38)

फिर उसी से दो तरह के लिंग [Gender] बनाए : मर्द और औरत?  (39)

तो क्या वह [अल्लाह] जो यह सब कर सकता है, उसे इस बात की ताक़त नहीं कि मुर्दों को फिर से ज़िंदा कर दे? (40)



सूरह 104 : अल हुमज़ह
[पीठ पीछे बुराई करनेवाला, The Backbiter]

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

हर उस आदमी के लिये तबाही है, जो (मुँह पर) ताना देने वाला और पीठ पीछे दूसरों की बुराई करनेवाला हो,  (1)

                                                                                     
(बड़ी ख़राबी है उस आदमी के लिए भी) जो माल को जमा करता हो और गिन गिन कर रखता हो, (जायज़ और नाजायज़ माल का हिसाब किए बिना),  (2)

वह समझता है कि उसका माल उसे हमेशा ज़िन्दा बाक़ी रखेगा।  (3)

हरगिज़ नहीं! वह तो ज़रूर चूर चूर कर देने वाली चीज़ [हुतमा]] में झोंक दिया जाएगा!  (4)

और आपको क्या मालूम कि "हुतमा" क्या है?  (5)

वह अल्लाह की भड़काई हुई आग है,  (6)

जो (तलवे से लगी तो) दिलों तक चढ़ जाएगी।  (7)

बेशक वह (आग) उन लोगों को चारों तरफ़ से अपने घेरे में ले लेगी,   (8)

जबकि वह (भड़कते हुए) लम्बे लम्बे शोलों में घिरे हुए होंगे।  (9)



सूरह 77 : अल मुरसलात
 [हवाएं-- जो भेजी जाती हैं / WINDS- SENT FORTH]

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर महरबान है, अत्यंत दयावान है

उन (हवाओं) की क़सम जो एक के बाद एक भेजी जाती हैं,   (1)

फिर जो आँधी बनकर ज़बरदस्त झोंकों से चलती हैं,   (2)

और जो (बादलों को) लाकर दूर-दूर तक फैला देती हैं,   (3)

फिर जो (उन्हें) फाड़कर अलग अलग कर देती हैं,    (4)

*या उन (फरिश्तों) की क़सम जो सच और झूठ को अलग अलग कर देते हैं

जो (दिलों में अल्लाह की) याद दिलाती हैं,   (5)

* या फिर नसीहत की बातें (अल्लाह की ओर से फ़रिश्ते) ले कर आते हैं।

(अच्छाई और बुराई को) सबूत के तौर पर बताने के लिए, या (सच्चाई से इंकार करने के नतीजों से) सावधान करने के लिए :   (6)

जिस (क़यामत का) तुम से वादा किया जा रहा है, वह घटना जरूर हो कर रहेगी।   (7)

जब सितारों की रौशनी मद्धिम पड़ जाएगी  (8)

और जब आसमान को फाड़ दिया जायेगा,  (9)

जब पहाड़ (चूर चूर कर के) उड़ा दिए जाएंगे,  (10)

जब सभी पैगम्बर निर्धारित समय पर (अपनी अपनी उम्मतों /communities पर गवाही के लिए) जमा किए जाएंगे ------ (11)

(तो भला) किस दिन के लिए (इन सब मामलों की) अवधि तय की गयी है?  (12)

फैसले के दिन के लिए,  (13)

और आपको क्या मालूम कि फैसले का दिन क्या है?   (14)

उस दिन, सच्चाई से इंकार करनेवालों के लिए बड़ी तबाही है!  (15)

क्या हमने पहले (आयी क़ौम के) लोगों को बर्बाद नहीं कर दिया?  (16)

फिर हम उन्हीं के पीछे-पीछे, बाद के (इंकार करनेवाले) लोगों को भी (तबाही के रास्ते पर) चला देंगे :  (17)

हम अपराधियों के साथ ऐसा ही करते हैं।  (18)

सच्चाई से इंकार करनेवालों के लिए बड़ी तबाही है उस दिन!  (19)


(फिर तुम क्यों सच्चाई से इंकार करते हो) क्या हमने तुम्हें मामूली पानी (की एक बूँद) से पैदा नहीं किया,  (20)

जिसे एक सुरक्षित टिकने की जगह [माँ की कोख] में रख दिया,  (21)

एक निश्चित अवधि तक?  (22)

हम (बच्चा ठहर जाने से लेकर पैदा होने तक) एक अवधि तय कर देते हैं : और हम इसको कितनी खूबी से तय करते हैं!   (23)

बड़ी तबाही है उस दिन, सच्चाई से इंकार करनेवालों के लिए!  (24)

क्या हमने धरती को घर की तरह (समेट लेनेवाली) नहीं बनाया,  (25)

ज़िंदा के लिए भी और मुर्दो के लिए भी?  (26)

क्या हमने इस पर ऊँचे और मजबूत पहाड़ों को नहीं जमा दिया, और हमने तुम्हें मीठा पानी पिलाया? (27)

बड़ी तबाही है उस दिन सच्चाई से इंकार करनेवालों के लिए!  (28)


(उनसे कहा जाएगा), "जाओ (अब) तुम उस (आग) की तरफ, जिसे तुम झुठ समझकर मानने से इंकार किया करते थे!  (29)

जाओ उस (जहन्नम के) धुएं की छाया में! ये (धुआँ) तीन ऊँची-ऊँची लपटों से उठता है;  (30)

जो न (तो) ठंडी छाया है और न ही आग के शोलों से बचाने वाली है;  (31)

इस (आग) से जो चिंगारियाँ निकलती हैं, वह इतनी बड़ी-बड़ी होंगी जैसे कि पेड़ का तना (या महल) हो,  (32)

और इतनी चमकीली होंगी जैसे कि ताँबा (या पीले रंग का ऊँट)।  (33)

बड़ी तबाही है उस दिन सच्चाई से इंकार करनेवालों के लिए!  (34)

यह ऐसा दिन होगा कि वे (कुछ) बोल भी नहीं सकेंगे,  (35)

और न ही उन्हें कोई मौक़ा दिया जाएगा कि वे कोई बहाने पेश कर सकें।  (36)

बड़ी तबाही है उस दिन सच्चाई से इंकार करनेवालों के लिए!  (37)

(लोगों से कहा जाएगा), "यह फैसले का दिन है : हमने तुम्हें और पहले गुज़री हुई सभी पीढियों [Generations] को इकट्ठा किया है।  (38)

अगर तुम मेरे ख़िलाफ़ कोई दांव-पेंच चलना चाहते हो, तो (वह) दांव मुझ पर अभी चला लो।"  (39)

बड़ी तबाही है उस दिन सच्चाई से इंकार करनेवालों के लिए! (40)

मगर जो लोग अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते हैं, वे ठंडी छाँव और पानी के सोतों [spring] में मज़े कर रहे होंगे,   (41)

और कोई भी फल या मेवे जिसकी वे इच्छा करेंगे (उनके लिए मौजूद होगा);   (42)

(उनसे कहा जाएगा),  “जी भर के खाओ और पियो, उन (अच्छे व नेक) कर्मों के बदले जो तुम (दुनिया में) करते रहे थे :  (43)

हम इसी तरह नेक काम करनेवालों को बदले में इनाम दिया करते हैं।"   (44)

बड़ी तबाही है उस दिन सच्चाई से इंकार करनेवालों के लिए! (45)


[ऐ सच्चाई से इंकार करनेवालो!], “(तुम) थोड़ा समय खा-पी लो और मज़े उठा  लो, सचमुच तुम शैतानी करनेवाले (मुजरिम) हो। (46)

बड़ी तबाही है उस दिन सच्चाई से इंकार करनेवालों के लिए!  (47)

जब उनसे बोला जाता है, "तुम (अल्लाह के सामने) झुको", तो वे नहीं झुकते।   (48)

बड़ी तबाही है उस दिन, सच्चाई से इंकार करनेवालों के लिए!   (49)

आख़िर वे इस (कुरआन) के बाद, और (अल्लाह की ओर से उतरी) किस बात पर विश्वास करेंगे?  (50)



सूरह 50 : क़ाफ़ [Qaf]


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

क़ाफ़॰;
क़ुरआन मजीद की क़सम! (कि मुर्दा आदमियों को ज़रूर दोबारा ज़िंदा उठाया जाएगा)   (1)

मगर विश्वास न करनेवालों [काफ़िरों] को इस बात पर बड़ा आश्चर्य हुआ कि उनके पास‌ सावधान करनेवाला, उन्हीं मे से एक आदमी (कैसे) आ गया है, सो वे कहने लगे, "यह तो हैरानी की बात है! (2)

कि जब हम मर जाएँगे और मिट्टी में मिल जाएँगे, तो फिर हम वापस (ज़िंदा होकर) उठ खड़े होंगे? यह (ज़िंदा होकर) वापसी तो समझ से बहुत दूर की बात है!" (3)

धरती (मरे हुए शरीर का हिस्सा खा कर) उसमें जितनी भी कमी कर देती है, हम उसे अच्छी तरह से जानते हैं : हम एक किताब में इसका पूरा हिसाब रखते हैं।  (4)

मगर विश्वास न करनेवालों के सामने जब सच्चाई पहुँचती है, तो वे उसे मानने से इंकार कर देते हैं; असल में वे उलझन की हालत में पड़े हुए हैं।  (5)

अच्छा तो क्या उन लोगों ने अपने ऊपर आसमान को नहीं देखा ---- कि हमने उसे कैसा बनाया और किस तरह उसे सजाया है कि उसमें कोई दरार तक नहीं  है; (6)

और किस तरह हमने धरती को फैलाया और उसमे मज़बूत पहाड़ों को जमा दिया, और उसमें हर प्रकार की सुन्दर वनस्पतियाँ उगा दीं,  (7)

(और यह सब) आँखें खोलने और याद दिलाते रहने के मक़सद से है --- हर उस बन्दे के लिए जो पूरी भक्ति से अल्लाह के सामने झुकनेवाला हो;  (8)

और कैसे हमने आसमान से बरकत से भरी [blessed] बारिश भेजी और उससे बाग़ और अनाज की फ़सलें उगाईं; (9)

और खजूरों के गुच्छों से लदे हुए ऊँचे-ऊँचे खजूर के पेड़ - ---  (10)

हर एक आदमी की रोज़ी के रूप में; तो देखो कैसे पानी के द्वारा बेजान पड़ी हुई धरती को हम नया जीवन दे देते हैं? ठीक इसी तरह, मरे हुए लोग (अपनी क़ब्रों से) उठ खड़े होंगे।   (11)

इन (मक्का के) विश्वास न करनेवाले [काफ़िरों] से बहुत पहले, नूह [Noah] की क़ौम के लोगों ने भी (सच्चाई पर) विश्वास नहीं किया, इसी तरह  'अर्-रस' [यमामा के अंधे कुँए वाले], समूद [सालेह अलै. की क़ौम], (12)

आद [हूद अलै. की क़ौम], फ़िरऔन [मिस्र के राजा], लूत के भाई [सदूम व अमूरह के लोग], (13)

'अल-ऐका' [जंगलों में रहनेवाली शोऐब अलै. की क़ौम] और तुब्बा [यमन के बादशाह अलहमैरी] के लोग भी थे : इन सभी लोगों ने अपने-अपने पैग़म्बरों [messengers] की बातों में विश्वास नहीं किया, अन्ततः जिस सज़ा की चेतावनी मैंने दे रखी थी वह सच हो कर रही।  (14)

तो क्या हम पहली बार सारी सृष्टि को पैदा करने में असमर्थ रहे? बिल्कुल नहीं! मगर तब भी वे दोबारा पैदा किए जाने के बारे में सन्देह में पड़े हैं।  (15)

हमने आदमी को पैदा किया है--- हम उसके दिल में पैदा होनेवाली बातों को भी जानते हैं : हम उसके गर्दन की रग [Jugular vein] से भी ज़्यादा उससे नज़दीक हैं--- (16

क्योंकि (हर अच्छे बुरे कर्म की जानकारी) प्राप्त करनेवाले दो (फ़रिशते), लिखने के लिए बैठे रहते हैं, एक उस आदमी के दायीं तरफ़, और दूसरा उसके बायीं तरफ़ : (17)

आदमी हर वक़्त उन (फ़रिश्तों) की निगरानी में होता है, कोई एक शब्द मुँह से निकला नहीं कि उसे लिख लिया जाता है। (18

और मौत की बेहोशी अपने साथ सच्चाई को साथ ले आएगी : “यही वह चीज़ है जिससे तू भागने की कोशिश करता था।”  (19)


और नरसिंघे [Trumpet] को फूँक मार कर बजा दिया जाएगा : “यही है वह (क़यामत का) दिन, जिसकी (तुम्हें) धमकी दी गई थी।”  (20

हर आदमी इस हाल में आएगा कि उसके साथ एक (फ़रिश्ता) हँका कर लानेवाला होगा और दूसरा गवाही देनेवाला :  (21)

“तुम ने इस (दिन) की हक़ीक़त पर कभी ध्यान नहीं दिया; तुम पर एक पर्दा पड़ा हुआ था, और आज हमने तुमसे वह पर्दा हटा दिया, सो आज तुम्हारी निगाह बड़ी तेज़ हो गई है।”   (22)

उसके साथ रहनेवाला (फ़रिश्ता) कहेगा, "यह है (इसके कर्मों का लेखा-जोखा) जो मैंने तैयार कर रखा है---- (23)

(दोनों फ़रिश्तों को हुक्म होगा), "फेंक दो, जहन्नम में! ज़िद पर अड़े हुए हर उस विश्वास न करने वाले [काफ़िर] को, (24)

जो हर एक को भलाई से रोकता था, मर्यादा की सीमाएं तोड़ता था और (सच्चाई की बातों में) लोगों को सन्देह में डालता था,   (25)

जिसने अल्लाह के साथ दूसरे देवताओं को अपना प्रभु बना रखा था। फेंक दो उसे कठोर यातना में!"---  (26)

उसका (शैतान) साथी कहेगा, "ऐ हमारे रब! मैंने इसे नहीं बहकाया था, बल्कि वह ख़ुद पहले से ही बहुत ज़्यादा भटका हुआ था।" (27

अल्लाह कहेगा, "मेरे सामने झगड़ा मत करो। मैंने तो तुम्हें (यातना की) चेतावनी भेजी थी  (28)

और मेरी कही हुई बात बदला नहीं करती : मैं अपने किसी बंदे पर कोई अन्याय नहीं करता।" (29)

उस दिन हम जहन्नम से कहेंगे, "क्या तू भर गई?" और वह कहेगी, "क्या अब और कोई (इसमें आनेवाला) नहीं है?" (30)

लेकिन नेक लोगों के लिए जन्नत नज़दीक लायी जाएगी, इतनी नज़दीक कि अब कुछ भी दूरी न रहेगी : (31)

"यही है वह चीज़ जिसका तुमसे वादा किया जाता था--- यह हर उस आदमी के लिए है, जो पूरे मन से अक्सर अल्लाह की तरफ़ (तौबा के लिए) झुकता हो और उसका डर रखते हुए बुराइयों से बचता हो;  (32)

"जो बेहद दयालु रब से डरता हो, हालाँकि उसे देखा नहीं जा सकता, और जब उसके सामने आता हो, तो उसका दिल पूरी भक्ति भाव से उसके आगे झुकता हो--- (33)

"तो अब सलामती के साथ दाख़िल हो जाओ इस (जन्नत) में, वह दिन कभी ख़त्म न होनेवाली ज़िंदगी का दिन होगा।” (34)

उनके लिए वहाँ (जन्नत में) वह सब कुछ होगा जिस चीज़ की भी वे इच्छा करेंगे, और हमारे पास (देने के लिए) उससे अधिक भी है।  (35

इन (मक्का के काफ़िरों) से पहले हम काफ़िरों की इनसे भी अधिक मज़बूत नस्लों को तहस-नहस कर चुके हैं, वे धरती के बड़े हिस्से पर मारे फिरे--- मगर क्या भागने की कोई जगह थी?  (36

सचमुच इसमें हर उस आदमी के लिए सीखने और याद रखने का सामान है जिसके पास दिल हो, और जो कोई ध्यान लगा कर सुनता हो।  (37)

हमने आसमानों, ज़मीन और जो कुछ उनके बीच में है, सब कुछ छः दिनों  [कालों] में पैदा कर दिया और हमें कोई थकान नहीं हुई। (38

अतः [ऐ रसूल] जो कुछ वे कहते हैं, उस पर आप धीरज [सब्र] से काम लें; और सूरज के निकलने से पहले भी और सूरज के निकलने के बाद भी अपने रब की प्रशंसा का गुणगाण करते रहें;  (39

और रात की घड़ियों में भी उसकी बड़ाई का बखान करें, और हर नमाज़ [सजदों] के बाद भी;  (40

और ध्यान से सुनो उस दिन की बात, जिस दिन एक पुकारनेवाला बहुत पास से पुकारेगा, (41)

वे लोग उस दिन (अपनी क़ब्रों से) बाहर निकल आएंगे, और उस दिन लोग भयानक धमाके की आवाज़ सचमुच सुनेंगे। (42

हम ही तो हैं जो ज़िंदगी भी देते हैं और मौत भी, और अंत में सबको हमारी ही पास लौट कर आना है।  (43)

जिस दिन धरती को फाड़ दिया जाएगा, वे [मुर्दा लोग] बहुत तेज़ी से बाहर निकल पड़ेंगे--- यह इकट्ठा करना हमारे लिए बेहद आसान है।  (44)

जो कुछ भी वे [मक्का के काफ़िर] कहते हैं, हम उसे अच्छी तरह से जानते हैं। [ऐ रसूल] आप उन्हें ज़बरदस्ती अपनी बात मनवाने के लिए तो हैं नहीं। अतः आप क़ुरआन के द्वारा नसीहत करें, हर उस आदमी को जो हमारी चेतावनी से डरता हो। (45)



  सूरह 90: अल-बलद
  [मक्का शहर / The City] 

 अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

मैं इस शहर ٌٌ[मक्का] की क़सम खाता हूँ---  (1)

और आप [ए रसूल!] इसी शहर के रहनेवाले हैं --- (2)

(और क़सम खाता हूँ) बाप की और उनके बच्चों की,  (3)

कि हमने इंसान को कष्ट में (फंसा रहने वाला) बनाया है।  (4)

क्या वह यह समझता है कि उस पर किसी का बस नहीं चलेगा?  (5)

वह (बड़े गर्व से) कहता है, “मैंने ढेरों माल उड़ा डाला है”,  (6)

क्या वह सोचता है कि उसे (बेकार चीज़ों में खर्च करते हुए) कोई नहीं देखता?   (7)

क्या हमने उसे दो आंखें नहीं दीं? (8)

और (उसे) एक ज़बान और दो होंठ (नहीं दिए)? (9)

और हमने उसे (अच्छाई और बुराई के) दोनों रास्ते साफ़-साफ़ दिखा दिए।  (10)

इसके बावजूद, वह तो (अच्छे कर्मों को करने के लिए) कठिन रास्तों वाली घाटी से गुज़रा ही नहीं,  (11)

और आप क्या जानें कि वह (कठिन रास्तों वाली) घाटी [steep pass] क्या है?  (12)

किसी को गुलामी से आज़ाद करा देना, (13)

या भूख वाले दिनों में (यानी अकाल और गरीबी के दौर में) खाना खिला देना,  (14)
  
किसी अनाथ [यतीम] को जो नज़दीकी रिश्तेदार हो,   (15)

या सख़्त गरीबी के मारे हुए आदमी को जो धूल में पड़े होते हैं (और बेघर हैं),  (16)

और वह उन लोगों में से एक हो जो ईमान रखता हो, और एक दूसरे को सब्र व धीरज से क़दम जमाए रखने पर ज़ोर देता हो, और आपस में दया भाव रखने [compassion] की नसीहत करता हो।  (17)

तो जो लोग ऐसा करते हैं, वे दाहिने तरफ़ वाले [अच्छी क़िस्मत वाले और माफ़ किये गये] हैं,  (18)

मगर जिन लोगों ने हमारी आयतों पर विश्वास करने से इंकार किया, वे बायीं तरफ़ वाले [बदक़िस्मत और पापी] हैं,  (19)

और आग उनको चारों तरफ़ से घेर लेगी और उन्हें (उसी में) बंद कर दिया जाएगा!  (20)




सूरह 86 : अत तारिक़
[रात को (नज़र) आनेवाला / The Night-Comer]

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

आसमान (पर फैले हुए अंतरिक्ष) की क़सम, और रात को (नज़र) आने वाले की क़सम -----  (1)

और आपको क्या मालूम कि रात को (नज़र) आने वाला क्या है?  (2)

चमकता हुआ तारा (जो आसमान के अँधेरे को मिटा देता है) ----  (3)

कि कोई जान ऐसी नहीं जिस पर एक निगरानी करने वाला [watcher] (नियुक्त) नहीं है।  (4)

इसलिए आदमी को सोच विचार करना चाहिए कि वह किस चीज़ से पैदा किया गया था?  (5)

वह ज़ोर से उछलते हुए पानी [शुक्राणु / sperm] से पैदा किया गया है,  (6)

फिर वह (माता की) पीठ और सीने की हड्डियों के बीच (माँ के कोख में) से गुज़र कर बाहर निकलता है :  (7)

(जिस तरह माँ के कोख से निकलता है, उसी तरह क़ब्र से भी ज़िंदा निकलेगा!) बेशक वह [अल्लाह] इसे दोबारा पैदा करने में पूरी तरह समर्थ है।  (8)

जिस दिन (दिलों में) छुपी बातें सामने आ जाएंगी (और उन्हें परखा जाएगा),  (9)

फिर आदमी के पास न (स्वयं) कोई ताक़त होगी, और न कोई (उसको) मदद करने वाला होगा।  (10)

क़सम है आसमान की और उससे बार-बार होनेवाली (मौसमी) बारिश की,   (11)

और ज़मीन की क़सम है जो फट जाती है (और उसमें से पौधे निकल आते हैं,  उसी तरह क़यामत के दिन, आदमी ज़मीन फाड़ कर बाहर निकल आएगा)। (12)

यह सचमुच एक निर्णायक [decisive] फरमान है (जो हो कर रहेगा);  (13)

यह कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिसे (हंसी मज़ाक़ के तौर पर) हल्के में लिया जाए।  (14)

वे [काफ़िर लोग] अपनी योजना बनाने और चाल चलने में लगे हुए हैं,  (15)

मगर मैं भी अपनी तदबीर [strategy] में लगा हूँ :  (16)

इसलिए [ऐ रसूल], आप विश्वास न करनेवालों को ढील दे दीजिए, उन्हें थोड़ी सी ढील (और) दे दीजिए।   (17)









सूरह 54 : अल क़मर [चाँद, The Moon]

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

क़यामत की घड़ी निकट आ पहुँची है; और चाँद दो टुकड़े हो गया।  (1)

किन्तु उन (मक्का के काफिरों) का हाल यह है कि यदि वे कोई निशानी [चमत्कार] देखते हैं, तो मुँह मोड़ लेते हैं और कहते हैं, "यह तो वही पुराना जादू है जो पहले से चला आ रहा है!" (2) 

उन्होंने सच्चाई [रसूल की निशानियों] को मानने से इंकार किया और अपनी इच्छाओं के पीछे चल पड़े ---- हर मामले (को लिख लिया जाता है और उस) का नतीजा तय है ------ (3)

हालाँकि उनके पास (पिछ्ली क़ौमों की) ऐसी चेतावनी भरी घटनाओं की खबरें पहुँच चुकी थीं, जिनसे (सबक़ लेते हुए बुराइयों से) उन्हें बचना चाहिए था----- (4)

दिल में उतर जाने वाली गहरी समझ-बूझ की बातें ----- मगर इन चेतावनियों का उनपर कुछ असर नहीं होता :   (5)

अतः [ए रसूल!] आप उनसे मुँह फेर लें (और उनकी परवाह न करें)। जिस दिन पुकारनेवाला [फरिश्ता] एक बेहद भयानक घटना [क़यामत] की ओर बुलाएगा,  (6)

अपनी आँखें झुकाए हुए, वे अपनी क्रबों से इस तरह निकल पड़ेंगे, मानो वे चारों ओर फैली हुई टिड्डियाँ हों, (7)

वे दौड़े जा रहे होंगे उसी पुकारनेवाले की ओर। (क़यामत पर) विश्वास न करनेवाले पुकार उठेंगे, "यह तो बड़ा ही कठिन दिन है!" (8)


इनसे पहले नूह [Noah] की क़ौम ने भी सच को मानने से इंकार किया था : उन्होंने हमारे बन्दे को झूठा ठहराया और कहा, "यह तो दीवाना है!" और उन्हें बुरी तरह झिड़का गया, (9)

अन्त में उसने अपने रब को पुकारा कि "मैं बेबस हो चुका हूँ, अब आप ही बदला लीजिए!" (10) 

तब हमने मूसलाधार बरसते हुए पानी के साथ आसमान के दरवाज़े खोल दिए, (11) 

और ज़मीन के भीतर से पानी के सोते [gushing springs] बहा दिए : इस तरह (आसमान और ज़मीन का) सारा पानी उस काम के लिए एक साथ मिल गया जो (उनकी नियति में) तय हो चुका था।  (12)

और हमने उन्हें [नूह व उनके साथियों को] एक तख़्तों और कीलोंवाली (नौका) पर सवार कर दिया, (13)

जो हमारी देख-रेख में (सुरक्षित) चल रही थी, यह भरपाई थी उस [नूह] के लिए जिसको मानने से इंकार कर दिया गया था। (14)

हमने इस [घटना या नौका] को एक निशानी के रूप में (यादगार बना कर) छोड़ दिया : तो क्या कोई है जो (इस पर ध्यान दे और) नसीहत हासिल करे? (15)

तो अब सोचो कि कैसी रही मेरी (भयानक) सज़ा और कितनी (सच थीं) मेरी चेतावनियाँ!  (16)

हमने क़ुरआन को (याद करने और) सबक़ [lesson] सीखने के लिए आसान बना दिया है : तो क्या कोई है जो (इस पर ध्यान दे और) नसीहत हासिल करे? (17) 


आद की क़ौम के लोगों ने भी (हमारे पैग़म्बर हूद के संदेश की) सच्चाई को ठुकरा दिया, तो फिर कैसी रही मेरी (भयानक) सज़ा और कितनी (सच थीं) मेरी चेतावनियाँ!  (18)

हमने उन लोगों पर, उस तबाही वाले मनहूस दिन, भयानक आवाज़ वाली एक आँधी भेज दी थी;  (19)

जो लोगों को (इस तरह) उखाड़ फेंकती थी मानो वे उखड़े हुए खजूर के तने हों। (20)

तो कैसी रही मेरी (भयानक) सज़ा और कितनी (सच थीं) मेरी चेतावनियाँ!   (21)

हमने क़ुरआन को (याद करने और) सबक़ [lesson] सीखने के लिए आसान बना दिया है : तो क्या कोई है जो (इस पर ध्यान दे और) नसीहत हासिल करे? (22)


समूद की क़ौम ने भी (हमारे पैग़म्बर सालेह द्वारा दी गयी) चेतावनियों को ठुकरा दिया : (23)

वे कहने लगे, "क्या? (हमारे जैसा) एक आदमी? क्या हम उस अकेले आदमी के पीछे चलेंगे, जो हम में से ही है? यह तो भारी गुमराही होगी; एकदम पागलपन होगा!”  (24) 

"क्या हमारे बीच बस वही एक आदमी बचा था जिसे (अल्लाह की तरफ़ से) संदेश दे कर भेजा गया है? नहीं, वह तो बड़ा झूठा और घमंडी है! " (25) 

(हम ने सालिह से कहा), "कल ही उन्हें पता चल जाएगा कि कौन बड़ा झूठा, और घमंडी है,  (26)

क्योंकि हम उनकी परीक्षा लेने के लिए एक ऊँटनी को उनके पास भेज रहे हैं : अतः आप उन्हें देखते जाएं और धीरज से काम लें।  (27) 

उन्हें बता दें कि उनके (और ऊँटनी के) बीच पानी का बँटवारा होगा : हर एक हिस्सेदार को उसकी बारी आने पर ही पानी मिलेगा।" (28)

मगर (अन्ततः) उन्होंने (क़दार नामक) अपने साथी को बुलाया, उसने हाथ (में तलवार को) उठाया और ऊँटनी के पाँव की कूचें [Hamstrung] काट कर उसे मार डाला।"  (29)

(तो सोचो!) कैसी थी मेरी (भयानक) सज़ा और कितनी (सच थीं) मेरी चेतावनियाँ!  (30)

हमने उनपर केवल एक ही इतने ज़ोर का धमाका किया, और वे ऐसे हो गए जैसे किसी बाड़वाले [fence-maker] की सूखी लकड़ियाँ हों।  (31) 

हमने क़ुरआन को (याद करने और) सबक़ [lesson] सीखने के लिए आसान बना दिया है : तो क्या कोई है जो (इस पर ध्यान दे और) नसीहत हासिल करे?  (32) 


लूत [Lot] की क़ौम के लोगों ने भी चेतावनियों को मानने से इंकार कर दिया था।  (33)

सो हमने उन पर पत्थर बरसानेवाली तेज़ हवा छोड़ दी, (मगर) लूत के घरवालों को छोड़कर। उन्हें हमने भोर होने से पहले बचा लिया था, (34) 

यह हमारी तरफ से ख़ास करम था : हम शुक्र अदा करनेवालों को ऐसा ही इनाम दिया करते हैं। (35)

(लूत) ने लोगों को हमारी पकड़ से सावधान कर दिया था, मगर उन लोगों ने चेतावनियों को मानने से सिरे से इंकार कर दिया----  (36)

यहाँ तक कि उन लोगों ने लूत के मेहमानों को भी उनके हवाले कर देने की माँग की ---- जिस पर हमने उनकी आँखों को अंधा कर दिया कि, "लो, अब चखो मज़ा मेरी (भयानक) सज़ा का और मेरी चेतावनियों (के पूरा होने) का!"--- (37)

सुबह सवेरे ही एक ऐसी भयानक यातना ने उन्हें धर-दबोचा जिनके निशान आज भी बाक़ी हैं ----  (38)

"लो, चखो मज़ा मेरी (भयानक) सज़ा का और मेरी चेतावनियों (के पूरा होने) का!" (39)

हमने क़ुरआन को (याद करने और) सबक़ [lesson] सीखने के लिए आसान बना दिया है : तो क्या कोई है जो (इस पर ध्यान दे और) नसीहत हासिल करे? (40) 


फ़िरऔन [Pharaoh] के लोगों के पास भी (मूसा द्वारा) चेतावनियाँ आयी थीं; (41)

उनलोगों ने हमारी सारी निशानियों को मानने से इंकार कर दिया, तो (इसके नतीजे में) हमने उन्हें अपनी पूरी ताक़त और प्रभुत्व के साथ दबोच लिया। (42) 


"क्या तुम्हारे (मक्का के) विश्वास न करनेवाले, इन (पहले के) लोगों से किसी भी तरह अच्छे हैं? या (ख़ुदा की) किताबों में तुम्हारे लिए कोई छुटकारा लिखा हुआ है?" (43)

या शायद वे कहते हैं, "हम एक मज़बूत दल हैं और हम (रसूल के साथ मुक़ाबले में) जीत जाएंगे?" (44) 

उनके सारे दल-बल को बुरी तरह कुचल दिया जाएगा और वे पीठ दिखाकर भाग खड़े होंगे। (45) 

मगर उनसे असल वादा उस (क़यामत की) नियत घड़ी का है ---- और वह घड़ी कहीं अधिक सख़्त और बेहद कड़वी होगी : (46)

सचमुच, शैतानी करनेवाले लोग भारी गुमराही और पागलपन में पड़े हुए हैं ----- (47)

जिस दिन उनको मुँह के बल आग में घसीटा जाएगा (उस दिन उन्हें होश आ जायेगा, उनसे कहा जाएगा), "(जहन्नम की) आग को छूकर महसूस करो!" (48) 

हमने सारी चीज़ों को उसके सही अनुपात में पैदा किया है;  (49)

जब हम किसी चीज़ के होने का आदेश देते हैं, तो वह बस पलक झपकते ही (पूरा) हो जाता है;  (50)

हम तुम्हारे जैसे बहुत लोगों को (पहले) तबाह-बर्बाद कर चुके हैं। तो फिर क्या कोई है जो इस पर ध्यान दे (और नसीहत हासिल करे)? (51) 


जो कुछ भी वे करते हैं, सब कुछ (उनके कर्मों की बही में) लिख लिया जाता है :  (52)

छोटा हो या बड़ा, हर एक काम का हिसाब लिख लिया जाता है।  (53)

हाँ, सच्चे व बुराइयों से बचनेवाले लोग (सुकून से) बाग़ों और नहरों के बीच रहेंगे, (54)

सच्चाई की जगह में निश्चिंत होकर, उस बादशाह [अल्लाह] के सामने (रहेंगे),  जिसके क़ब्ज़े में सब तरह की शक्तियाँ हैं। (55)




सूरह 38: साद [Saad]

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

साद।
क़सम है उस क़ुरआन की जो याद दिलाती रहती है (कि अल्लाह तो केवल एक ही है) (1)

मगर, (सच्चाई से) इंकार करने पर अ‍ड़े लोग-- अपनी बड़ाई के घमंड, ज़िद्द  और दुश्मनी के भाव में डूबे हुए हैं। (2)

उनलोगों से पहले हम कितनी ही पीढ़ियों को मिटा चुके हैं!  (मुसीबत देख कर) वे सभी ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाये थे, मगर बचकर निकल जाने के लिए तब तक बहुत देर हो चुकी थी। (3)

उन (मक्का के) विश्वास न करनेवालों को यह बात अजूबा लगी कि उन्हें सावधान करने के लिए एक रसूल उन्हीं के बीच का कैसे आ गया है : वे कहने लगे, "यह बड़ा झूठा जादूगर है। (4)

वह यह दावा कैसे कर सकता है कि सारे भगवानों के बदले केवल एक भगवान [ख़ुदा] होता है? निस्संदेह यह तो बहुत अचम्भे वाली बात है!" (5)

और उनके सरदार यह कहते हुए उठ खड़े हुए कि "चलो यहाँ से! और अपने भगवानों की आस्था में जमे रहो! निस्संदेह तुम सब को ऐसा ही करना चाहिए।  (6)

इस तरह की बात तो हमने पिछले [ईसायी] धर्म में भी नहीं सुनी : यह एक नयी बात है जो बस गढ ली गयी है।  (7)

क्या हम सबमें से (चुनकर) केवल इसी के पास अल्लाह का संदेश भेजा गया है?" नहीं! सच्चाई यह है कि उन्हें मेरी धमकियों पर संदेह है; असल में उन्होंने अभी तक मेरी यातना का मज़ा चखा ही नहीं है!  (8)

आपका रब जो बड़ी ताक़तवाला और बड़ा दाता है, क्या उसकी रहमत [दयालुता] के सारे ख़ज़ाने उन्हीं के पास हैं? (9)

या आसमानों और ज़मीन और जो कुछ उनके बीच है, उन सब चीज़ों पर क्या उन्हीं का क़ब्ज़ा है? (अगर है, तो) उन्हें रस्सियाँ बाँध कर ऊपर (आसमान में) चढ़ जाना चाहिए।  (10)

वह उनके गठबंधन वाली एक कमज़ोर सेना है, जो कुचल दी जाएगी। (11)

उनसे पहले नूह की क़ौम और आद और मज़बूती से जमे हुए फ़िरऔन के लोगों ने रसूलों को मानने से इंकार किया।  (12

और समूद ने और लूत की क़ौम ने और 'ऐकावाले' [जंगल मे रहनेवाले शुएब के लोग] भी—इनमें से हर एक ने (रसूलों के) विरोध में गुट बनाए।  (13)

उन सभी ने रसूलों को (झूठा बताते हुए) मानने से इंकार कर दिया, और वे इसी लायक़ थे कि मेरी यातना उनपर टूट पड़े : (14)

और यह (मक्का के) विश्वास न करनेवाले [ काफ़िर] लोग भी बस एक धमाके के इंतज़ार में हैं, (समय आ जाने पर) जिसे टाला नहीं जा सकता है। (15)

वे कहते हैं, "ऐ हमारे रब! हिसाब के दिन [क़यामत] से पहले ही हमारे हिस्से की सज़ा हमें जल्दी से जल्दी दे दे! " (16)

वे जो कुछ कहते हैं, उस पर [ऐ रसूल] आप धीरज व सब्र से काम लें।

हमारे बन्दे दाऊद [David] को याद करें, जो बड़ा ताक़तवर आदमी था और बेशक वह  हमेशा (तौबा के लिए) हमारी ओर भक्ति भाव से झुकता था। (17)

हमने पर्वतों को इस तरह उसके वश में कर दिया था कि सूरज के निकलते वक़्त और डूबते वक़्त (पर्वत भी) उसके साथ मिलकर हमारा गुणगान करते थे;  (18)

और चिड़ियाँ भी, जो झुंड की झुंड होती थीं, सब मिलकर (अल्लाह की) बड़ाई में आवाज़ से आवाज़ मिलाते थे। (19)

हमने उसकी सल्तनत को मज़बूती प्रदान की थी, उसे ज्ञान व समझ-बूझ दिया था और बात कहने का ऐसा अंदाज़ दिया था कि उनकी बातें निर्णायक होती थी। (20)

और क्या आपने उन दो विवाद करनेवालों की कहानी सुनी है जब वे दीवार पर चढ़कर उस [दाऊद] के एकान्त कक्ष मे घुस आए थे?  (21)

जब वे दाऊद के पास पहुँचे, तो वह (अचानक उन्हें देखकर) घबरा गया, वे बोले, "डरिए नहीं, हम दो विवादी हैं। हममें से एक ने दूसरे पर ज़्यादती की है : तो अब आप हमारे बीच ठीक-ठीक फ़ैसला कर दीजिए--- नाइंसाफ़ी मत कीजिए--- और हमें सही मार्ग दिखा दीजिए। (22

यह मेरा भाई है। इसके पास निन्यानवे भेड़ें हैं और मेरे पास एक ही भेड़ है। अब इसका कहना है कि ‘इसे भी मुझे सौंप दो’ और बातचीत में (यह इतना तेज़ है कि) इसने मुझे दबा लिया है।" (23)

दाऊद ने कहा, "इसने अपनी भेड़ों के झुंड में तेरी भेड़ को मिला लेने की माँग करके निश्चय ही तुझपर ज़ुल्म किया है। साथ मिलकर काम करनेवाले बहुत सारे लोग एक-दूसरे पर ज़्यादती करते हैं। हाँ, जो लोग ईमान के पक्के हैं और अच्छे कर्म करते हैं, वे ऐसा नहीं करते, मगर ऐसे लोग बहुत कम हैं।"

[तब ही] दाऊद को बात समझ में आ गयी कि असल में हम उसकी परीक्षा ले रहे थे। अतः उसने अपने रब से माफ़ी माँगी,  घुटनों के बल गिर पड़ा और (गुनाहों से) तौबा की : (24)

तो हमने उसका (क़सूर) माफ़ कर दिया। इनाम में उसे यक़ीनन हमारी नज़दीकी हासिल होगी, जो रहने की बेहतरीन जगह है।  (25)

"ऐ दाऊद! हमने धरती पर तुम्हें मालिक [ख़लीफ़ा, उत्तराधिकारी] बनाया है। अतः तुम लोगों के बीच इंसाफ़ के साथ फ़ैसला करना। अपनी इच्छाओं के पीछे मत भागते चलना, कहीं ऐसा न हो कि वे तुम्हें अल्लाह के मार्ग से भटका दे : याद रखो, जो लोग उसके मार्ग से भटक जाते हैं, निश्चय ही उनके लिए दर्दनाक यातना होगी क्योंकि वे हिसाब के दिन [क़यामत] को भुला बैठते हैं ।”  (26)

हमने आसमान व ज़मीन और उनके बीच की हर एक चीज़ को, यूँ ही बिना मक़सद के नहीं पैदा कर दिया है। हाँ, भले ही (सच्चाई से) इंकार करनेवाले [काफ़िर] ऐसा मान सकते हैं ---ओह! (जहन्नम की) आग में कैसी दुर्गति होगी उनकी!----  (27)

मगर, जो ईमान रखते हैं और अच्छे कर्म करते हैं, क्या हम उनके साथ ठीक वैसा ही सलूक करेंगे जैसा कि उन लोगों के साथ जो धरती पर बिगाड़ पैदा करते हैं? वे जो अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते हैं, और वे जो बेधड़क सारी सीमाओं को तोड़ डालते हैं—--- हम क्या दोनों के साथ एक समान सलूक करेंगे?  (28)

यह किताब [क़ुरआन] एक वरदान है जो [ऐ रसूल!] आप पर उतारी गयी है, ताकि लोग इसके संदेशों पर सोच-विचार कर सकें और समझदार लोग इसे ध्यान से सुनें और उस पर अमल करें। (29)

और हमने दाऊद को सुलैमान [Solomon] (जैसा बेटा) दिया। वह बहुत अच्छा बन्दा था और हमेशा ही (तौबा के लिए) अल्लाह के सामने झुकता था। (30)

(ऐसा हुआ कि) जब दिन ढलने के समय उसके सामने अच्छी नस्ल के, तेज़ दौड़नेवाले उम्दा घोड़ों की परेड करायी गयी, (31)

तो वह (देखकर) कहता जाता, " मेरा इन उम्दा चीज़ों के प्रति प्रेम, असल में अपने रब को याद करने का एक ज़रिया है!" यहाँ तक कि वे (घोड़े) नज़रों से ओझल हो गए---- (32)

"उन्हें मेरे पास वापस लाओ!" (सुलैमान ने कहा), फिर वह उनकी टांगों और गर्दनों पर हाथ फेरने लगा। (33)

निश्चय ही हमने सुलैमान को भी परीक्षा में डाला, और हमने उसे (इतना कमज़ोर कर दिया कि वह) अपने तख़्त पर एक ढाँचा मात्र रह गया था। (34)

फिर वह मेरी ओर (तौबा के लिए) झुका, और उसने दुआ की : "ऐ मेरे रब, मुझे माफ़ कर दे! और मुझे ऐसी सल्तनत अता कर कि मेरे बाद फिर किसी की ऐसी हुकूमत न हो---- इसमें शक नहीं कि तू सबसे ज़्यादा दिल खोलकर देनेवाला है।" (35)

तब हमने हवा को उसके वश में कर दिया, इस तरह जहाँ कहीं भी वह जाना चाहता, हवा उसकी इच्छा के अनुसार हौले-हौले चला करती थी। (36)

और जिन्नों (व शैतानों) को भी (उसके वश में कर दिया)----- जिनमें हर तरह के निर्माण करनेवाले और ग़ोताख़ोर थे,  (37)

और कुछ दूसरे (जिन्नात) भी थे जो ज़ंजीरों में जकड़े हुए रहते थे।  (38)

"यह हमारी तरफ़ से तोहफ़ा है, अब तुम्हारी मर्ज़ी--- चाहो तो इसमें से कुछ दो या अपने पास रखो! इस पर कोई हिसाब-किताब नहीं होगा।" (39)

और इनाम में उसे यक़ीनन हमारी नज़दीकी हासिल होगी, जो रहने की बेहतरीन जगह है।  (40)

हमारे बन्दे अय्यूब [Job] को याद करो, जब उसने अपने रब को (मुसीबत में) पुकारा था, "शैतान ने मुझे दुख और पीड़ा पहुँचा रखी है।" (41)

(हम ने बताया) "अपना पाँव (ज़मीन पर) मारो! देखो, यह है ठंडा पानी— नहाने-धोने और पीने के लिए, "(42)

और (इस तरह) हमने उसे उसके परिवारवालों से दोबारा मिला दिया, और साथ में उनके जैसे और लोगों को भी: यह एक निशानी थी हमारी रहमत [दयालुता] की और सबक़ था उन लोगों के लिए जो समझ-बूझ रखते हैं। (43)

(हम ने उससे कहा) "और अपने हाथ में तिनकों का एक छोटा मुट्ठा लो और उससे (अपनी पत्नी को) मारो और अपनी क़सम मत तोड़ो।" हमने उसे बुरे वक़्तों में भी बड़ा धैर्य व सब्र करनेवाला पाया, क्या ही अच्छा बंदा था वह! निस्संदेह वह भी हमेशा अल्लाह के सामने (तौबा के लिए) झुकनेवाला था। (44)

हमारे बंदों में इबराहीम [Abraham], इसहाक़ [Isaac] और याक़ूब [Jacob] को भी याद करो, यह सभी (नेक अमल की) ताक़त और (सूझ-बूझ की) नज़र रखते थे। (45)

हम ने उन्हें दिल से (परलोक के) आख़िरी घर की याद करनेवाला बनाया था, जो हम पर पूरी भक्ति-भाव से समर्पित थे : (46)

निश्चय ही हमारे यहाँ, वे चुने हुए, बेहतरीन लोगों में से होंगे।  (47

हमारे बंदों में इस्माईल [Ishmael], अल-यसा’ [Elisha] और ज़ुलकिफ़्ल [Dhu’l-Kifl] को भी याद करो, इनमें से सभी बेहतरीन लोगों में से थे।  (48)

यह एक नसीहत से भरा संदेश है। बेशक जो अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते हैं, उनके लिए (जन्नत में) लौट कर जाने का अच्छा ठिकाना होगा : (49

हमेशा रहने के बाग़, जिनके दरवाज़े उनके लिए खुले होंगे।  (50)

उनमें वे (आराम से) तकिया लगाए हुए बैठे होंगे; वे बहुत-से फल-मेवे और पीने की चीज़ें मँगवाते होंगे; (51)

और उनके पास निगाहें नीची रखनेवाली, बराबर उम्र की औरतें [हूरें] होंगी।  (52)

हिसाब-किताब के दिन [क़यामत] के लिए यही वह (नेमतों से भरी) चीज़ है, जिसका तुमसे वादा किया जाता है।  (53)

बेशक यह हमारी दी हुई चीज़ है, जो कभी ख़त्म नहीं होगी।  (54)

मगर शैतानी करनेवालों का आख़िरी ठिकाना बहुत ही बुरा होगा :  (55)

वह जहन्नम जिसमें वे जलेंगे, रहने के लिए क्या ही बुरा ठिकाना है--- यह सब उनके लिए होगा :   (56)

उन्हें इसका मज़ा चखने दो --- खौलता हुआ, गाढा, पीप मिला हुआ पानी, (57)

और इसी तरह की दूसरी और यातनाएं। (58)

(उनके नेताओं से कहा जाएगा), "यह लोगों का एक और बड़ा दल है जो तुम्हारे पास दौड़ा चला आ रहा है.” (जवाब मिलेगा), “उनके लिए कोई आवभगत (की ज़रूरत) नहीं! वे तो आग में जलनेवाले हैं।" (59)

वे (नेता) उनसे कहेंगे, "तुम्हारा यहाँ कोई स्वागत नहीं होगा! तुम्हीं तो हो, जो यह (मुसीबत) हमारे ऊपर ले कर आए हो, रहने के लिए बहुत ही बुरा ठिकाना (दुखदायी अंत), " (60)

आगे कहेंगे, "ऐ हमारे रब! जो हमारे ऊपर यह (मुसीबत) लाया है उसे दोहरी सज़ा दे!" (61)

और वे कहेंगे, "क्या बात है कि वे लोग यहाँ दिखायी नहीं देते जिन्हें हम बुरा समझते थे, (62)

और जिनका हम मज़ाक़ बनाते थे? क्या हमारी नज़रें उन्हें देखने में चूक गई हैं?" (63)

हक़ीक़त में बिल्कुल ऐसा ही होगा : (जहन्नम की) आग में रहनेवाले एक दूसरे पर इसी तरह इल्ज़ाम लगाएंगे। (64)

[ऐ रसूल] आप कह दें, "मैं तो बस यहाँ चेतावनी देने के लिए हूँ। उस एक अल्लाह के सिवा कोई (ख़ुदा) इबादत के लायक़ नहीं, ताक़त में वह सबसे बड़ा है; (65)

वह आसमानों और ज़मीन का, और हर चीज़ जो इन दोनों के बीच है उन सबका मालिक है, सारी चीज़ उसके क़ब्ज़े में है, और वह बहुत माफ़ करनेवाला है।" (66)

कह दें, " यह एक ज़बरदस्त संदेश [क़ुरआन] है, (67)

इसके बावजूद तुम इस पर ध्यान नहीं देते हो।  (68)

मुझे ऊपर (फ़रिश्तों) की दुनिया की कोई जानकारी नहीं कि वे आपस में किस मुद्दे पर चर्चा कर रहे थे : (69)

मुझे तो 'वही' [revelation] के द्वारा बस यही बताया गया है, मेरा काम यहाँ साफ़ व खुले तौर पर चेतावनी देना है।" (70)

याद करो जब तुम्हारे रब ने फ़रिश्तों से कहा कि "मैं मिट्टी से एक आदमी पैदा करनेवाला हूँ,  (71)

तो जब मैं उसको पूरी तरह ठीक-ठाक कर दूँ औऱ उसमें अपनी रूह फूँक दूँ, तो उसके आगे सज्दे में झुक जाना।" (72)

तो सभी फ़रिश्तों ने एक साथ झुक कर सज्दा किया, (73)

मगर इबलीस ने (सज्दा) नहीं किया, जो कुछ ज़्यादा ही घमंडी था. वह इंकार करके बाग़ी हो गया।  (74)

अल्लाह ने कहा, "ऐ इबलीस! तूझे किस चीज़ ने उस आदमी के सामने झुकने से रोक दिया जिसे मैंने ख़ुद अपने हाथों से बनाया है? क्या तू अपने आपको महान या कोई ऊँची हस्ती समझता है?" (75)

इबलीस ने कहा, "मैं उस (आदमी) से अच्छा हूँ : तूने मुझे आग से पैदा किया और उसे मिट्टी से।" (76

(अल्लाह ने कहा), "निकल जा यहाँ से! तू (फ़रिश्तों के दल से) धुत्कार दिया गया है :  (77

और फ़ैसले के दिन [क़यामत] तक तुझ पर मेरी लानत बनी रहेगी!" (78)

मगर इबलीस ने कहा, "ऐ मेरे रब! फिर तू मुझे उस दिन तक के लिए (जीने की) मुहलत दे, जबकि लोग (ज़िंदा करके) उठाए जाएँगे," (79)

अल्लाह ने कहा, "ठीक है, जा तुझे मुहलत दी, (80)

एक तय दिन व ज्ञात समय तक (कि तू ज़िंदा भी रहेगा और तुझे दंड भी नहीं दिया जाएगा)।" (81)

इबलीस ने कहा, "तेरी इज़्ज़त की क़सम! मैं उन सबको बहकाता रहूँगा, (82)

बस तेरे उन सच्चे व अच्छे बन्दों को छोड़ कर।" (83)

कहा अल्लाह ने, "यह सच्चाई है --- और मैं तो सच ही बोलता हूँ--- (84)

कि मैं जहन्नम को तुझसे और उन सबसे भर दूँगा, जो तेरे बताए हुए रास्ते पर चलेंगे।" (85)

[ऐ रसूल] आप कह दें, "मैं इस (संदेश को पहुँचाने) के लिए तुमसे कोई इनाम नहीं माँगता, और न मैं अपने बारे में ऐसा कोई दावा करता हूँ, जो मैं नहीं हूँ" : (86)

यह [क़ुरआन] तो सारे लोगों के लिए चेतावनी मात्र है, (87)

और थोड़ी ही अवधि के बाद तुम्हें इस सच्चाई का पता चल जाएगा।  (88)




सूरह 7 : अल अ'राफ़ [ऊँची जगह/ The Heights]

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

अलिफ़॰ लाम॰ मीम॰ साद॰ (1)

[ऐ रसूल!] यह एक किताब [क़ुरआन] है, जो आप पर उतारी गयी है, ताकि इसकी मदद से आप (लोगों को) चेतावनी दे सकें और ईमानवालों को (नसीहत की बातें) याद दिला सकें. तो देखें! ऐसा नहीं होना चाहिए कि इसके चलते आपका दिल बेचैन रहा करे। (2)

"(लोगो!) जो किताब तुम्हारे रब की तरफ़ से तुम्हारे पास भेजी गयी है, उसी के पीछे चलो; अपने रब को छोड़कर (अपने बनाए हुए) दूसरे मालिकों के पीछे मत चलो. मगर (अफ़सोस!) तुम नसीहत पर बहुत कम ही ध्यान देते हो! (3)

कितनी ही बस्तियों को हमने (उनके कर्मों के चलते) बर्बाद कर दिया! उन पर हमारी यातना (अचानक ही) आ पहुँची, सोयी रात में, या दोपहर के वक़्त जबकि वे आराम कर रहे थे : (4)

फिर जब उनपर (सचमुच) यातना आ गयी, तो उनके पास कहने को कुछ न रहा, सिवाए इसके कि वे पुकार उठे, "हम सचमुच मुजरिम थे!" (5)

हम उन लोगों से अवश्य पूछताछ करेंगे जिनके पास रसूलों को भेजा गया था (कि उन्होंने रसूलों की बात मानी या नहीं)------ और हम उन रसूलों से भी ज़रूर पूछताछ करेंगे (कि उन्होंने हमारे संदेशों को ठीक-ठीक पहुँचाया या नहीं)- ----- (6)

फिर जो कुछ भी उन लोगों ने किया होगा, वे सारी बातें हम उनके सामने बता देंगे, क्योंकि हमें तो इनकी पूरी जानकारी है, और (इन घटनाओं के समय) हम कहीं ग़ायब तो न थे। (7)

और उस दिन कर्मों के वज़न को सही-सही और इंसाफ के साथ तौला जाएगा : जिनके अच्छे कर्मों का पलड़ा भारी निकला, तो वही हैं जो कामयाब हो गए, (8)

और जिनके अच्छे कर्मों का पलड़ा हल्का निकला, तो ये वही लोग होंगे जो हमारे संदेशों को मानने से इंकार करते रहे, और नतीजे में अपने आपको घाटे में डाल बैठे। (9)

हमने तुम (लोगों) को ज़मीन में बसा दिया, और साथ में ज़िंदगी गुज़ारने के सारे सामान भी दे दिए-----(मगर) शायद ही कभी तुम शुक्र अदा करते हो! (10)

[ऐ इंसानो!], हमने तुम्हें पैदा किया; तुम्हारी शक्ल सूरत बनायी, उसके बाद, हमने फ़रिश्तों से कहा, "(पहले इंसान), आदम [Adam] के आगे झुक जाओ", और सब (फरिश्ते) झुक गए. मगर इबलीस न झुका : वह झुकनेवालों में शामिल न था। (11)

अल्लाह ने कहा, "तुझे किस बात ने (आदम के सामने) झुकने से रोक दिया, जबकि मैंने तुझे आदेश दिया था?", (इबलीस ने) कहा, "मैं उससे बेहतर हूँ : तूने मुझे आग से पैदा किया और उसे मिट्टी से।" (12)

अल्लाह ने कहा, "उतर जा यहाँ से! यह [जन्नत] तुम्हारे घमंड करने की जगह नहीं है. निकल जा, दूर हो यहाँ से!, तू उनमें से हो गया जो अपमानित हुए!" (13)

मगर इबलीस ने कहा, "मुझे उस दिन तक (ज़िंदा रहने की) छूट दे दे, जिस दिन मरे हुए लोगों को ज़िंदा कर के दोबारा उठाया जाएगा।" (14

और अल्लाह ने जवाब दिया, "तुझे छूट दी गयी।" (15)

और फिर इबलीस ने कहा, "चूँकि तूने मुझे ग़लत राह पर लगा दिया है,  इसलिए अब मैं भी तेरे सीधे मार्ग पर उन सब लोगों की ताक में बैठूँगा :  (16)

मैं उन पर (चारों तरफ से) हमले करूँगा---- "उनके सामने से और उनके पीछे से भी, उनके दाएँ से और उनके बाएँ से भी----- और तू उनमें से अधिकतर को शुक्र अदा करनेवाला न पाएगा।" (17)

अल्लाह ने कहा, "निकल जा यहाँ से! बेइज़्ज़त और ठुकराया हुआ! मुझे क़सम है, कि मैं जहन्नम को तुझसे और उन सब से भर दूँगा जो तेरे पीछे चलेंगे।" (18

मगर "ऐ आदम! तुम और तुम्हारी बीवी, दोनों (जन्नत के) बागों में रहो, और जहाँ से जो चीज़ चाहो, खाओ-पियो, लेकिन इस पेड़ के नज़दीक मत जाना, नहीं तो (याद रखो!) तुम भी ग़लती करनेवालों में से हो जाओगे।" (19)

फिर ऐसा हुआ कि शैतान ने उन दोनों के दिल में एक ऐसी बात डाल दी, जिससे उनकी नग्नता [Nakedness], जो उनसे छिपी हुई थीं, उनके सामने खुल जाए : उसने कहा, "तुम्हारे रब ने तुम दोनों को जो इस पेड़ से रोका है, तो केवल इसलिए, कि कहीं ऐसा न हो कि तुम फ़रिश्ते बन जाओ या कहीं हमेशा की ज़िंदगी न हासिल हो जाए।" (20)

और उसने उनके सामने क़समें खायीं, "मैं तुम को पूरी ईमानदारी से सलाह दे रहा हूँ"---- (21)

उसने झूठी बातें बोल कर उन्हें धोखे में डाल दिया। अन्ततः जब उन्होंने उस पेड़ का फल खा लिया, तो उनकी नग्नता उनके सामने खुल गयी, और वे अपने आपको ढकने के लिए बाग़ के पत्ते जोड़-जोड़कर अपने बदन पर रखने लगे। तब उनके रब ने उन्हें पुकारा, "क्या मैंने तुम को उस पेड़ के पास जाने से नहीं रोका था?, क्या मैंने तुम्हें बताया नहीं था कि शैतान तुम्हारा खुला दुश्मन है?" (22)

उन दोनों ने जवाब दिया, "हमारे रब! हम अपने ही हाथों अपना नुक़सान कर बैठे हैं : अगर तूने हमें माफ़ न किया और हम पर दया न की, तो फिर हम बर्बाद हो जाएंगे।" (23)

अल्लाह ने कहा, "निकल जाओ यहाँ से तुम सब! तुम [शैतान और आदमी] एक-दूसरे के दुश्मन हो! अब तुम्हारे लिए ज़मीन पर रहने की जगह होगी और जीवन-यापन के सामान होंगे----  मगर एक ख़ास अवधि तक।" (24)

और कहा, "वहीं (ज़मीन पर) तुम्हें जीना है, वहीं तुम्हें मरना होगा, और उसी से (मरने के बाद) तुम्हें दोबारा निकाला जाएगा।" (25)

ऐ आदम की सन्तान! हमने तुम्हें कपड़ा दिया है ताकि तुम अपने नंगेपन को छिपा सको और यह तुम्हारे सजने-संवरने का साधन भी है; (मगर अपने भीतर की बुराई छिपाने के लिए) परहेज़ का कपड़ा सब कपड़ों में बेहतर है : यह अल्लाह की निशानियों में से है ताकि वे ध्यान दे सकें। (26)

ऐ आदम की सन्तान! देखो! कहीं शैतान तुम्हें बहकावे में न डाल दे, जिस तरह उसने तुम्हारे माँ-बाप को जन्नत से निकलवा दिया था; उनके कपड़े उतरवा दिए थे, ताकि उनकी नग्नता उनके सामने खोल दे : वह और उसका गिरोह उस जगह से तुम्हें देखता है, जहाँ से तुम उन्हें नहीं देख सकते : हमने शैतानी करनेवालों को उन लोगों का साथी व मददगार बना दिया है, जो ईमान नहीं रखते। (27)

इसके बावजूद, जब ये लोग कोई अश्लील कर्म करते हैं, तो कहते हैं कि "हमने अपने बाप-दादा को ऐसा ही करते हुए देखा है", और, "अल्लाह ने हमें ऐसा करने का आदेश दिया है।" [ऐ रसूल!] आप कह दें, "अल्लाह कभी अश्लील बातों का आदेश नहीं दिया करता। तुम अल्लाह के बारे में ऐसी बातें कैसे कह सकते हो, जिसके (सच होने की) तुम्हें कोई जानकारी नहीं है?" (28)

कह दें, "मेरे रब ने नैतिक रूप से सही काम करने का आदेश दिया है. तुम जहाँ कहीं भी इबादत [पूजा[ करो, तो इबादत में तुम्हारा पूरा ध्यान उसी (रब) की तरफ़ होना चाहिए; अपने दीन [आस्था] को पूरी भक्ति के साथ उसी पर समर्पित करते हुए, उसे पुकारो। ठीक जैसे उसने तुम्हें शुरू में पैदा किया, वैसे ही तुम फिर से ज़िंदा कर के उठाए जाओगे।" (29)

(तुम में से) कुछ को उसने (सीधा) मार्ग दिखा दिया और कुछ की क़िस्मत में (इंकार व बुरे कर्मों के चलते) भटकना लिख दिया : उन लोगों ने अल्लाह को छोड़कर शैतानों को अपना रखवाला बना लिया, और यह समझते रहे कि वे सीधे मार्ग पर हैं। (30)

ऐ आदम की सन्तान! जब कभी तुम इबादत किया करो, तो अच्छी तरह कपड़े पहना करो, और (हलाल चीज़ें) खाओ पियो, मगर (ख़र्च करने में) हद से आगे न बढ़ो : बिना सोचे-समझे, बेकार की चीज़ों में पैसे उड़ानेवालों को अल्लाह पसन्द नहीं करता। (31)

[ऐ रसूल!] आप कहें, "अल्लाह ने अपने बंदों के लिए जो सजने-सँवरने और खाने-पीने की चीज़ें दी हैं, उन्हें इस्तेमाल करने से किसने रोका है?" कह दें, "ईमान रखनेवालों के लिए भी इस दुनिया की ज़िंदगी में ये सब चीज़ें (जायज़)  हैं : (मगर) क़यामत के दिन ये चीज़ें केवल ईमानवालों के लिए ही होंगी।" तो (देखो!) किस तरह हम उन लोगों के लिए अपनी आयतों को साफ़ व स्पष्ट तरीक़े से बताते हैं, जो बातों को समझते हैं। (32)

[ऐ रसूल!] आप कहें, "मेरा रब तो केवल अश्लील व बेशर्मी के कामों को करने से रोकता है------ चाहे वह खुले आम की जाएं या ढँके-छिपे की जाएं---- और गुनाह करने से, और बेवजह ज़्यादती करने से, और यह कि तुम किसी को अल्लाह का साझेदार [Partner] ठहराओ जिसके लिए उसने कोई प्रमाण नहीं उतारा, और यह कि तुम अल्लाह के बारे में ऐसी बातें कहो जिसकी तुम्हें कोई जानकारी न हो।" (33)

हर एक क़ौम के लोगों के लिए एक नियत समय तय किया हुआ है: वे न तो इसे समय से पहले ही ला सकते हैं, और न ही समय आ जाने पर, वे इसे घड़ी भर के लिए भी टाल सकेंगे।  (34)


ऐ आदम की सन्तान! अगर तुम्हारे पास तुम्हीं में से कोई रसूल बन कर आता है, और मेरी आयतें पढ़ कर सुनाता है, तो जिसने अल्लाह का डर रखते हुए अपने आपको बुराइयों से बचाए रखा, और नेकी की ज़िन्दगी गुज़ारी, तो ऐसे लोगों को न कोई डर होगा और न वे दुखी होंगे। (35

मगर जिन्होंने हमारी आयतों को मानने से इंकार किया, और अकड़ दिखाते हुए उनसे नफ़रत की, तो ऐसे ही लोग हैं जिनका घर (जहन्नम की) आग होगा, जिसमें वे हमेशा रहेंगे। (36

उस आदमी से बड़ा ज़ालिम कौन होगा जो अल्लाह के ख़िलाफ़ झूठी बातें गढ़ता हो, और उसकी आयतों को मानने से इंकार करता हो? ऐसे लोगों की क़िस्मत में जितनी रोज़ी लिखी हुई है, उतनी (इस दुनिया में) उन्हें मिलती रहेगी, मगर उसके बाद, जब हमारे फ़रिश्ते उनकी जान वापस ले जाने के लिए आएँगे, तो कहेंगे, "कहाँ हैं वे [ख़ुदा] जिन्हें तुम अल्लाह के बजाए पुकारा करते थे?" वे लोग कहेंगे, "वे तो हमें छोड़ कर गुम हो गए हैं।" वे (अपने ही ख़िलाफ़ गवाही देते हुए) इस बात को मान लेंगे कि वे (सच्चाई में) विश्वास नहीं करते थे। (37)

अल्लाह कहेगा, "जाओ! तुम भी जिन्नों और इंसानों की उस भीड़ में शामिल हो जाओ जो तुम से पहले (जहन्नम की) आग में जा चुकी हैं।" हर समूह, (जहन्नम में) घुसते समय अपने साथ के दूसरे समूहों को बुरा-भला कहते हुए घुसेगा, उसके बाद, जब अंदर में वे सब एक साथ जमा हो जाएंगे, तो उनमें से सबसे बाद में आनेवाला समूह, अपने पहले आनेवालों के बारे में कहेगा, "हमारे रब! इन्हीं लोगों ने हमें गुमराह कर दिया था : तू इन्हें आग की दुगनी सज़ा दे"----- अल्लाह कहेगा, "तुम में से हर एक के लिए दुगनी सज़ा है, हालाँकि  तुम इसे नहीं जानते"---- (38)

उनमें से पहले आनेवाले, आख़िर में आनेवालों से कहेंगे, "तुम भी हम से किसी मामले में अच्छे तो नहीं थे : (अपने कर्मों से) जो सज़ा तुम ने कमायी है, अब उसका मज़ा चखो!" (39)

यक़ीन रखो कि ऐसे लोगों के लिए आसमान के दरवाज़े कभी नहीं खोले जाएंगे, जिन्होंने हमारी आयतों को मानने से इंकार किया और अपनी अकड़ में उन्हें ठुकरा दिया; उनका जन्नत में दाख़िल होना ऐसा ही है जैसे, ऊँट (या मोटी रस्सी) का सूई के नाके में से गुज़र जाना। मुजरिमों को हम इसी तरह उनके जुर्म की सज़ा देते हैं---- (40)

जहन्नम उनके लिए आराम करने की जगह होगी (जहाँ आग का बिस्तर होगा)  और उनके ऊपर परत दर परत, आग ही की चादर होगी-----शैतानी करनेवालों को हम ऐसी ही यातना देते हैं। (41)

मगर जो लोग ईमान रखते हैं और उन्होंने अच्छे कर्म किए --- और (याद रहे कि) हम किसी जान पर उतना ही बोझ डालते हैं जितना वह सह सके---- तो बस ऐसे ही लोग जन्नतवाले हैं और वे हमेशा वहीं रहेंगे। (42

हम उनके दिलों के अंदर पलने वाली सारी बुरी भावनाओं को निकाल देंगे; उनके पैरों तले नहरें बह रही होंगी. वे कहेंगे, "सारी प्रशंसा अल्लाह के लिए है, जिसने हमें इस (ज़िंदगी का) रास्ता दिखाया : अगर अल्लाह ने हमें रास्ता न दिखाया होता, तो हम कभी भी सही रास्ता न खोज पाते। हमारे रब के रसूल सच्चाई का संदेश लेकर आए थे।" और फिर उन्हें एक आवाज़ सुनायी देगी, "यह है जन्नत, जो अब तुम्हारा अपना हो चुका है, उन अच्छे कर्मों के नतीजे में जो तुम करते रहे थे।" (43)

जन्नत के लोग (जहन्नम के) आगवालों को पुकार कर कहेंगे, "हमसे हमारे रब ने जो वादा किया था, उसे हमने सच पाया। तो क्या तुम्हारे रब ने जो तुम से वादा कर रखा था, तुमने भी उसे सच पाया?" वे कहेंगे, "हाँ।" इतने में एक पुकारनेवाला उनके बीच पुकारेगा, "अल्लाह की फिटकार है शैतानियाँ करनेवालों पर : (44)

जो अल्लाह के मार्ग से रोकते थे और उसे टेढ़ा करना चाहते थे और जो आख़िरत [Hereafter] का इंकार करते थे।" (45)

इन दोनों समूहों के बीच एक ओट [Barrier] होगी जो इनको अलग अलग कर देगी, और (दोनों के बीच ऊँचाई पर कुछ लोग होंगे जो हर एक समूह को उनके निशानों से पहचानते होंगे: वे जन्नतवालों से पुकार कर कहेंगे, "तुम पर सलामती हो!"--- वे अभी जन्नत में दाख़िल नहीं हुए होंगे, मगर वे उसके लिए आस लगाए होंगे, (46) 

और जब उनकी नज़रें आगवाले लोगों पर पड़ेंगी, तो वे कहेंगे, "हमारे रब, हमें शैतानियाँ करनेवालों में शामिल न कर दीजियो!"---- (47)

और ऊँचाई पर ठहरे लोग कुछ ख़ास लोगों को जिन्हें ये उनके निशानियों से पहचानते होंगे, पुकार कर कहेंगे, "बताओ! क्या फ़ायदा हुआ तुम्हारी इतनी बड़ी संख्या में होने का, और तुम्हारी झूठी शान का? (48) 

"और क्या ये वही लोग हैं ना, जिनके बारे में तुम क़समें खाते थे कि अल्लाह उनपर कभी अपनी दया-दृष्टि न डालेगा?" (अब उन लोगों से कहा जाएगा), "जन्नत में दाख़िल हो जाओ, तुम्हारे लिए न कोई डर है और न तुम दुखी होगे।" (49) 

आगवाले लोग जन्नत में रहने वालों को पुकार कर कहेंगे ,"थोड़ा पानी हमें भी दे दो, या उन चीज़ों में से ही कुछ दे दो जो अल्लाह ने तुम्हें दी हैं!" और वे कहेंगे, "अल्लाह ने ये दोनों चीज़ें इंकार करनेवालों के लिए मना कर दी हैं"----- (50

जिन लोगों ने धर्म को बस एक ध्यान भटकाने, व खेल-तमाशे की चीज़ बना दिया था, और इस दुनिया की ज़िन्दगी ने उन्हें धोखे में डाल रखा था।” आज हम उन पर कोई ध्यान नहीं देंगे, जिस तरह उन्होंने उस (क़यामत के) दिन की होनेवाली मुलाक़ात को नज़रअंदाज़ [ignore] कर दिया और हमारी आयतों को मानने से इंकार करते रहे। (51)

लोगों के लिए हम एक (आसमानी) किताब लाए हैं---- हम ने सच्चे ज्ञान के आधार पर इसमें चीज़ों को विस्तार से बता दिया है----यह रास्ता दिखानेवाली और रहमत [mercy] है, उन लोगों के लिए जो (सच्चाई में) विश्वास करते हैं। (52

वे किसी और चीज़ के नहीं, बल्कि इसी इंतज़ार में हैं कि कब उस (आख़िरी अंजाम) के बारे में कही हुई बात [Prophecy] पूरी होती है? जिस दिन वह कही हुई बात पूरी हो जाएगी, तो जिन लोगों ने इसे नज़रअंदाज़ किया था, वे बोल उठेंगे, "हमारे रब के रसूल ने सच्ची बात कही थी। तो क्या कोई है जो अब हमारे लिए थोड़ी सिफ़ारिश कर सके? या क्या हमें वापस (उसी दुनिया में) भेजा जा सकता है ताकि जैसा हम पहले व्यवहार करते थे, उससे (इस बार) कुछ अलग व्यवहार कर सकें?" सचमुच वे अपनी जानें गँवा बैठेंगे, और वे सारी [मूर्तियाँ] जो उन्होंने गढ रखी थीं, वे उन्हें छोड़कर गुम हो चुकी होंगी।  (53)

अल्लाह ही तुम्हारा रब है, जिसने आसमानों और ज़मीन को छह दिनों में पैदा किया, फिर (काम-काज की व्यवस्था के लिए) अपने आपको सिंहासन पर स्थापित किया; उसने रात ऐसी बनायी है कि वह तेज़ी से पीछा करते हुए दिन को ढँक लेती है; उसने सूरज, चाँद और तारे भी पैदा किए, जो उसके आदेश से काम में लगे रहते हैं; सारी सृष्टि, और सारे आदेश, सब उसी के हैं। महिमा हो उसकी! वह सारे संसारों का रब है! (54)

अपने रब को विनम्रता से और चुपके-चुपके पुकारा करो---वह उन्हें पसंद नहीं करता जो मर्यादा की सीमाएं तोड़नेवाले हैं: (55)

और (देखो!) ज़मीन पर फैली बुराइयों को ठीक कर देने के बाद इसमें बिगाड़ न पैदा करो---- उसे (अपनी ग़लतियों से) डरते हुए और (उसकी रहमत की) उम्मीद के साथ पुकारा करो। अल्लाह की रहमत [mercy] उन लोगों के नज़दीक होती है जो अच्छा व नेक कर्म करते हैं।  (56)

यह अल्लाह है जो हवाएं भेजता है, जो उसकी आनेवाली बरकत [बारिश] की ख़ुशखबरी ले कर आती है, और जब वे ऊपर उठ कर बोझल बादलों को इकट्ठा कर लेती है, तो हम उसे किसी मुर्दा ज़मीन की तरफ उड़ा ले जाते हैं, जहाँ उससे पानी बरसाते हैं, फिर उससे हर तरह की फ़सलें उग जाती हैं, ठीक इसी तरह, हम मुर्दों लोगों को (धरती से) निकाल खड़ा करेंगे. तो क्या तुम इस पर विचार नहीं करोगे? (57)

अगर ज़मीन अच्छी हो, तो अपने रब की मर्ज़ी से, पेड़-पौधे काफी मात्रा में निकल आते हैं, लेकिन अगर ज़मीन ख़राब हुई, तो पैदावार होगी भी, तो बहुत ही कम : हम अपनी आयतों [निशानियों] को उन लोगों के लिए तरह-तरह से बयान करते हैं, जो अल्लाह का शुक्र अदा करते हैं। (58)

हमने नूह [Noah] को उसकी क़ौम के लोगों के पास भेजा, तो उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! अल्लाह की बन्दगी करो : उसके सिवा तुम्हारा कोई ख़ुदा नहीं है। मैं डरता हूँ कि एक बड़े भयानक दिन की यातना कहीं तुम्हें न आ पकड़े!" (59)

मगर उसकी क़ौम के सरदारों ने कहा, "हमें तो ऐसा लगता है कि तुम गुमराही में काफ़ी दूर जा पड़े हो।" (60)

उन्होंने जवाब दिया, "ऐ मेरी क़ौम के लोगों! मेरे बारे में किसी गुमराही का कोई सवाल नहीं है! उल्टा मैं तो सारे संसारों के रब का भेजा हुआ एक रसूल हूँ। (61)

मैं तो अपने रब के संदेशों को तुम तक पहुँचा रहा हूँ और तुम्हारे हित में सलाह दे रहा हूँ। मैं अल्लाह की तरफ़ से उन चीज़ों को जानता हूँ, जो तुम नहीं जानते। (62)

क्या तुम्हें यह बड़ा अजीब लगता है कि तुम्हारे रब की तरफ़ से संदेश आया है--- एक ऐसे आदमी के द्वारा जो तुम्हीं में से एक हो----जो तुम्हें चेतावनी दे सके और तुम अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से बच सको, ताकि तुम पर दया की जा सके?"  (63)

मगर उन लोगों ने नूह को झूठा घोषित कर दिया। हमने उसे बचा लिया, और उन लोगों को भी जो उसके साथ नौका में सवार थे, और उन लोगों को डुबा दिया जिन्होंने हमारी आयतों को मानने से इंकार किया था-----वे जानते-बूझते अन्धे बने हुए थे। (64)

आद की क़ौम के पास हम ने उनके भाई हूद को भेजा। उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! अल्लाह की बन्दगी करो : उस अल्लाह के सिवा तुम्हारा कोई ख़ुदा नहीं है। तो क्या तुम इस बात पर ध्यान नहीं दोगे?" (65)

मगर उसकी क़ौम के विश्वास न करनेवाले सरदारों ने कहा, "हमारा ऐसा मानना है कि तुम एक बेवक़ूफ़ आदमी हो" और "हमारी समझ से तुम एक झूठे आदमी भी हो।" (66)

हूद ने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! मुझ में बेवक़ूफ़ी की कोई बात नहीं है! उल्टा, मैं सारे संसारों के रब की तरफ़ से भेजा हुआ एक रसूल हूँ : (67)

"मैं तो अपने रब का संदेश तुम तक पहुँचा रहा हूँ. मैं तुम्हारा हित देखते हुए  ईमानदारी से सलाह देता हूँ। (68)

"क्या तुम्हें यह बात इतनी अनोखी लगती है कि तुम्हारे रब की तरफ़ से संदेश आया है, वह भी एक ऐसे आदमी के द्वारा जो तुम्हीं में से एक हो, ताकि तुम्हें (इंकार व बुरे कर्मों के नतीजे की) चेतावनी दे सके? याद करो, किस तरह उसने नूह की क़ौम के बाद तुम्हें उसका उत्तराधिकारी बनाया, और क़द-काठी में तुम्हें (दूसरों से) लम्बा-चौड़ा बनाया : अल्लाह की नेमतों [bounties] को याद करो, ताकि तुम कामयाबी पा सको।" (69)

वे कहने लगे, "क्या तुम हमारे पास सचमुच यही बताने के लिए आए हो कि हम केवल अल्लाह की बन्दगी करें और जिनको हमारे बाप-दादा पूजते रहे हैं, उन्हें (पूजना) छोड़ दें? ठीक है, अगर तुम अपनी बात में सच्चे हो, तो जिस यातना (के आने) की धमकी तुम देते रहते हो, उसे हम पर ले आओ।" (70)

हूद ने कहा, "तुम पर तो तुम्हारे रब की नफ़रत और ग़ुस्से का क़हर टूट पड़ना  तय हो चुका है। क्या तुम मुझ से उन (देवताओं के) नामों के लिए झगड़ रहे हो जो तुमने और तुम्हारे बाप-दादा ने रख छोड़े हैं, जिन नामों लिए अल्लाह ने कोई मन्ज़ूरी नहीं दी? अच्छा, तो बस अब (आनेवाले समय का) इंतजार करो; मैं भी इंतज़ार कर रहा हूँ।" (71)

फिर हमने अपनी दया दिखाते हुए हूद को, और जो लोग उसके साथ थे उन्हें बचा लिया; और उन लोगों को बर्बाद कर दिया जिन्होंने हमारी आयतों [निशानियों] को मानने से इंकार कर दिया था, और वे विश्वास करनेवाले न थे।  (72)

(इसी तरह) समूद के लोगों की तरफ़ हम उनके भाई सालेह को भेजा। उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! अल्लाह की बन्दगी करो: उसके अलावा तुम्हारा कोई ख़ुदा नहीं है। तुम्हारे रब की तरफ़ से अब एक स्पष्ट प्रमाण आ चुका है: यह अल्लाह के नाम पर छोड़ी हुई ऊँटनी है----यह तुम्हारे लिए एक निशानी है---- सो इसे अल्लाह की धरती पर खाने-चरने के लिए खुला छोड़ दो और देखो! उसे किसी तरह का कोई नुक़सान मत पहुँचाना, वरना एक दर्दनाक यातना तुम्हें आ लगेगी। (73)

याद करो कि किस तरह अल्लाह ने आद के बाद तुम्हें उनका उत्तराधिकारी बनाया और उस ज़मीन पर तुम्हें बसा दिया, जिस ज़मीन पर तुम अपने लिए महल बनाते हो और पहाड़ो को काट-काट कर मकान बना लेते हो : अल्लाह की बरकतों (blessings) को याद करो और धरती पर फ़साद फैलाते न फिरो।" (74

मगर उसकी क़ौम के घमंडी सरदारों ने ईमान रखनेवाले लोगों को, जिसे वे बिल्कुल ही गया गुज़रा समझते थे, कहा, "क्या तुम सचमुच ऐसा सोचते हो कि सालेह अपने रब का भेजा हुआ पैग़म्बर [Messenger] है?" उन लोगों ने कहा, "हाँ, हम उस संदेश पर विश्वास करते हैं, जो उनके माध्यम से भेजा जाता है।" (75)

मगर उन घमंडी सरदारों ने कहा, "जिस चीज़ पर तुम विश्वास करते हो, उसे हम तो मानने से इंकार करते हैं", (76)

उसके बाद, उन लोगों ने उस ऊँटनी को पाँव काट कर [hamstrung] मार डाला। फिर अपने रब के आदेश को मानने से साफ़ इंकार कर दिया और बोले, "ऐ सालेह! अगर तुम सचमुच के रसूल हो, तो हमें जिस यातना की धमकी देते रहते हो, उसे हम पर अब ले आओ!" (77

अन्त में, एक ज़बरदस्त भूचाल ने उन्हें दबोच लिया : सुबह होने तक वे अपने घरों में मरे पड़े रह गए। (78

फिर सालेह ने यह कहते हुए उन लोगों से मुँह फेर लिया, "ऐ मेरे लोगो! मैंने  तुम्हें अपने रब का संदेश पहुँचा दिया और हमेशा तुम्हारी भलाई के लिए सलाह देता रहा, मगर (अफ़सोस!) तुम नेक सलाह देनेवालों को पसंद नहीं करते।" (79)

हमने लूत [Lot] को भेजा और उसने अपनी क़ौम के लोगों से कहा, "तुम ने क्यों इस अश्लील काम को अपना लिया है? दुनिया में कोई नहीं है जो इस गंदे काम में तुमसे आगे हो। (80)

सेक्स के लिए तुम औरतों के बजाए मर्दों के पीछे जाते हो! तुम ने (अपनी हवस में) मर्यादा की सभी सीमाएं तोड़ डाली हैं!" (81)

उसके लोगों की तरफ़ से बस इतना ही जवाब मिला कि (वे आपस में) कहने लगे, "अपनी बस्ती से निकाल बाहर करो इन लोगों को! ये लोग अपने आपको बहुत पाक-साफ़ बनते हैं!" (82)

फिर ऐसा हुआ कि हमने लूत और उसके लोगों को (तबाह होने से) बचा लिया----- सिवाए उसकी बीवी के जो (शैतानी करनेवालों के साथ) पीछे रह गयी---- (83)

और हमने उन बाक़ी बचे लोगों पर तबाह कर देनेवाली (पत्थरों की) बारिश की.  तो देखो! शैतानियाँ करनेवालों का कैसा अंजाम हुआ। (84)

मदयन [Midian] के लोगों के पास हमने उनके भाई, शुऐब को भेजा। उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! अल्लाह की बन्दगी करो : उसके सिवा तुम्हारा कोई ख़ुदा नहीं। तुम्हारे रब की तरफ़ से तुम्हारे पास एक स्पष्ट निशानी आ चुकी है। (जब सामान दो) तो नाप और तौल में पूरा पूरा दिया करो, और लोगों की चीज़ों को कम कर के मत आँका करो; और ज़मीन में सारी व्यवस्था ठीक कर देने के बाद उसमें गड़बड़ी पैदा न करो : यह तुम्हारे लिए ज़्यादा अच्छा  है, अगर तुम ईमानवाले हो। (85)

"(देखो!) हर एक रास्ते पर न बैठ जाओ, कि (आते-जाते) लोगों को धमकियाँ देने लगो, और उन लोगों को अल्लाह के मार्ग (पर चलने) से रोकने लगो, जो उसपर ईमान रखते हों, और न उस मार्ग को टेढ़ा करने में लग जाओ। याद करो, तुम गिनती में कितने थोड़े हुआ करते थे, फिर उसने तुम्हें बढा कर कई गुना कर दिया। ज़रा उनके अंजाम के बारे में सोचो, जो फ़साद फैलाया करते थे। (86

"अगर तुममें से कुछ लोग (अल्लाह के) उस संदेश में विश्वास रखते हों जो मैं ले कर आया हूँ, और कुछ दूसरे लोग (इस पर) विश्वास नहीं करते, तो उस समय तक धीरज से काम लो, जब तक कि अल्लाह हमारे बीच फ़ैसला न कर दे। और वह फ़ैसला करनेवालों में सबसे अच्छा फ़ैसला करता है।" (87)

उसकी क़ौम के घमंडी सरदारों ने कहा, "ऐ शुऐब! अगर तुम हमारे दीन [Religion] में नहीं लौटे, तो हम तुम्हें और तुम्हारे साथ सारे ईमान रखनेवालों को अपनी बस्ती से निकाल बाहर करेंगे।" शुऐब ने कहा, "क्या! अगर यह (तुम्हारा धर्म) हमें बिल्कुल भी पसंद न हो, तब भी? (88

"अगर हमें तुम्हारे दीन में वापस जाना पड़े, जबकि अल्लाह हमें उससे बचा चुका है, तो यह अल्लाह के बारे में झूठी बातें गढ़ने जैसा होगा : उस (दीन) में अब वापस जाने का तो कोई सवाल नहीं है---- हाँ, अगर हमारे रब, अल्लाह की मर्ज़ी कुछ और हो तो बात अलग है। हर चीज़ को उसने अपने ज्ञान के घेरे में ले रखा है। हम तो अल्लाह पर भरोसा करते हैं। हमारे रब, तू हमारे और हमारी क़ौम के बीच सच्चाई को उजागर कर दे (और हमारे बीच) फ़ैसला कर दे, कि सचमुच तू सबसे अच्छा फ़ैसला करनेवाला है।" (89)

उनकी क़ौम के विश्वास न करनेवाले सरदारों ने कहा, "अगर तुम शुऐब के बताए हुए रास्ते पर चले, तो सचमुच तुम घाटे में पड़ जाओगे"----  (90)

एक ज़बदस्त भूचाल ने उन्हें धर दबोचा : अगली सुबह होने तक वे अपने घरों में मरे पड़े थे; (91)

शुऐब की बातों को झूठ मानने वालों का ऐसा हाल हुआ, मानो वे कभी वहाँ बसे ही नहीं थे; जिन लोगों ने शुऐब को मानने से इंकार किया था, असल में वही लोग घाटे में रहे---- (92)

तब शुऐब ने उन लोगों से यह कहते हुए मुँह मोड़ लिया, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! मैंने अपने रब के सन्देशों को तुम तक पहुँचा दिया और तुम्हारा हित देखते हुए मैंने तुम्हें सही सलाह दी, तो जिन लोगों ने इस पर विश्वास करने से इंकार कर दिया, ऐसे लोगों (की तबाही) पर दुखी होने का क्या फ़ायदा है?" (93

जब कभी हमने किसी बस्ती में कोई रसूल भेजा, तो वहाँ के (विश्वास न करनेवाले) लोगों को दु:ख-दर्द और तंगी में डाला, ताकि वे अपने आपको (अल्लाह के सामने) झुका दें, (94)

फिर उसके बाद हमने उनकी बदहाली को ख़ुशहाली में बदल दिया, यहाँ तक कि वे ख़ूब फले-फूले। लेकिन वे कहने लगे, "ये तंगहाली और ख़ुशहाली तो हमारे बाप-दादा ने भी झेली थीं", और नतीजे में हमने अचानक उन्हें धर-दबोचा, जबकि उन्हें इसकी भनक तक न थी। (95)

अगर उन बस्तियों के लोगों ने विश्वास किया होता, और अपने आपको बुराइयों से बचाया होता, तो हम ने उनपर आसमानों और ज़मीन से बरकतों [blessings] की बारिश की होती, मगर उन लोगों ने सच्चाई को ठुकरा दिया, नतीजा यह हुआ कि हम ने उन्हें उनके बुरे कर्मों के चलते दंड दिया। (96)

क्या इन बस्तियों के लोगों ने अपने आपको सुरक्षित महसूस कर लिया है और वे सोचते ही नहीं हैं कि रात के समय जबकि वे सो रहे हों, उस वक़्त भी हमारी यातना आ सकती है? (97

और यातना दिन चढ़े भी आ सकती है, जबकि वे खेल कूद में मगन हों? (98)

क्या अल्लाह की योजना के ख़िलाफ़ वे ख़ुद को सुरक्षित महसूस करते हैं? अल्लाह की योजना से तो केवल घाटे में पड़नेवाला ही सुरक्षित महसूस कर सकता है। (99

क्या उन लोगों को यह बात स्पष्ट नहीं है कि जिन्हें पिछली पीढ़ियों से धरती विरासत में मिल गयी है, अगर हम चाहें तो उनके गुनाहों पर उन्हें भी सज़ा दे सकते हैं? और हम उनके दिलों को बंद कर के उस पर मुहर लगा सकते हैं, ताकि वे कुछ भी सुन ही न सकें। (100)

(ऐ रसूल) हम ने आपको उन बस्तियों की कहानियां सुना दी हैं : उनके पास कितने रसूल आए, साफ़ व स्पष्ट निशानियाँ आयीं, मगर जिस चीज़ को वे पहले ही मानने से इंकार कर चुके थे, वे उसमें विश्वास करने वाले न थे। इसी तरह, अल्लाह (हठधर्मी से) विश्वास न करनेवालों के दिलों को बंद कर के उसपर मुहर लगा देता है। (101)

हम ने उनमें ज़्यादातर लोगों को वचन देने के बाद उसको निभाते हुए नहीं पाया; हम ने उनमें अधिकतर लोगों को खुले आम नियमों को तोड़ते हुए पाया। (102)

फिर इनके बाद हमने मूसा [Moses] को अपनी निशानियों के साथ फ़िरऔन [Pharaoh] और उसका समर्थन करनेवाले बड़े सरदारों के पास भेजा, मगर उन लोगों ने उसे मानने से इंकार कर दिया, और देखो! उनका अंजाम क्या हुआ जो फ़साद फैलाया करते थे! (103

मूसा ने कहा, "ऐ फ़िरऔन! मैं सारे संसारों के रब का (भेजा हुआ) रसूल हूँ, (104)

"मेरा यह फ़र्ज़ बनता है कि मैं अल्लाह के बारे में सिवाए सच कहने के और कुछ न कहूँ, और मैं तुम्हारे रब की तरफ़ से (सच्चाई की) स्पष्ट निशानी लेकर आया हूँ। अतः तुम इसराईल की सन्तानों को मेरे साथ जाने दो।" (105)

फ़िरऔन ने कहा, "अगर तुम सच बोल रहे हो, तो उस निशानी को पेश करो, जो तुम ले कर आए हो।" (106

अत: मूसा ने अपनी लाठी नीचे फेंकी, देखते ही देखते वह, नज़र के सामने  अजगर बन गया, (107)

और फिर उसने अपना हाथ (अपनी बग़ल से) निकाला, तो अचानक सबके सामने वह सफ़ेद होकर चमकने लगा। (108

फ़िरऔन की क़ौम के सरदार (आपस में) कहने लगे, "अरे, यह तो बडा माहिर जादूगर लगता है! (109)

"वह तुम्हें तुम्हारी धरती से निकाल बाहर करना चाहता है!" फ़िरऔन ने कहा, "तो अब तुम्हारी क्या सलाह है?" (110)

उन्होंने कहा, "इसे और इसके भाई को थोड़े समय के लिए टाल दो और इस बीच सभी शहरों में हरकारे भेज दो, (111

"कि वे हर माहिर जादूगर को तुम्हारे पास ले आएँ।" (112)

सो जादूगर फ़िरऔन के पास पहुंच गए, और कहने लगे, "अगर हम जीत गए तो क्या हमें इनाम मिलेगा?" (113

उसने जवाब दिया, "हाँ, ज़रूर मिलेगा, और तुम (मेरे) ख़ास नज़दीकी लोगों में शामिल हो जाओगे।" (114

फिर जादूगरों ने कहा, "ऐ मूसा! तुम पहले (दांव) फेंकोगे या फिर हम फेंकें?" (115

मूसा ने कहा, "तुम ही पहले फेंको।" फिर उन्होंने (लाठी व रस्सियाँ) फेंकी, बस देखनेवालों की आँखों पर जादू कर दिया, (करतब से) उनमें डर पैदा कर दिया, और (सचमुच) उन्होंने ज़बरदस्त जादूगरी दिखायी। (116

फिर हमने मूसा को 'वही' [Inspiration] भेजी, "तुम भी अपनी लाठी (नीचे) फेंक दो!"-- फिर देखते ही देखते-- वह लाठी उनके रचे हुए स्वांग को निगल गयी।  (117)

इस तरह, सच्चाई साबित हो गयी और जो कुछ उन्होंने (जादू के असर से) पैदा किया था, वह बेकार हो कर रह गए थे : (118

(फ़िरऔन के) जादूगरों की हार हो गयी, और वे बुरी तरह अपमानित हो गए।  (119)

फिर ऐसा हुआ कि सभी जादूगर घुटनों के बल गिर पड़े (120)

और बोले, "हम सारे संसारों के रब पर ईमान लाते हैं,  (121)

"मूसा और हारून के रब पर!" (122)

मगर फ़िरऔन बोला, "तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई कि बिना मेरी अनुमति के, तुमने उस (रब) पर विश्वास कर लिया! यह तो एक बड़ी साज़िश है, जो तुम लोगों ने रची है, ताकि इस शहर से लोगों को निकाल बाहर कर दो! अच्छा, तो तुम्हें जल्द ही (इसका नतीजा) मालूम हो जाएगा : (123

"मैं (तुम लोगों का) एक तरफ़ का हाथ और दूसरी तरफ़ का पाँव कटवा दूँगा; फिर तुम सबको सूली पर चढ़ा दूँगा!" (124)

जादूगरों ने (बिना डरे) कहा, "और इस तरह हम अपने रब के पास लौट जाएंगे----- (125)

"हमारे ख़िलाफ़ तेरी शिकायत बस यही तो है कि जब हमारे रब की निशानियाँ हमारे पास आ गयीं, तो हम ने उनपर विश्वास कर लिया। हमारे रब! हम पर धीरज के साथ जमे रहने की ताक़त डाल दे, और हमें इस दशा में मौत दे कि हम पूरी भक्ति के साथ तेरी आज्ञा मानने वाले रहें।" (126)

फ़िरऔन की क़ौम के सरदारों ने उससे कहा, "मगर क्या तुम मूसा और उसके लोगों को ऐसे ही छोड़ दोगे कि वे ज़मीन में फ़साद फैलाते रहें और वे तुम्हें और तुम्हारे देवताओं को छोड़ बैठें?" फिरऔन ने कहा, "हम उनके (बच्चों में से) लड़कों को मार डालेंगे, और केवल औरतों को (दासियाँ बना कर ज़िंदा) छोड़ देंगे : वे हमारी ताक़त से दबे हुए और बेबस हैं।" (127)

मूसा ने अपनी क़ौम से कहा, "मदद माँगना हो तो अल्लाह के सामने झुकते हुए माँगो और धीरज से काम लो : सारी धरती तो अल्लाह की है---- वह अपने बन्दों में से जिसे चाहता है, उसे उस (संपत्ति) का वारिस बना देता है----और आनेवाला अच्छा समय तो उन लोगों का ही है जो अपने आपको बुराइयों से बचाते हैं।" (128)

उन लोगों ने जवाब दिया, "तुम्हारे यहाँ आने के बहुत पहले से ही हम पर ज़ुल्म किया जा रहा था, और तुम्हारे आने के बाद भी यह (सिलसिला) चल रहा है।" मूसा ने कहा, "हो सकता है कि तुम्हारा रब तुम्हारे दुश्मनों को पूरी तरह से मिटा दे, और तुम्हें इस धरती पर उनका उत्तराधिकारी बना दे, ताकि वह यह देख सके कि तुम कैसा आचरण करते हो।" (129)


हमने फ़िरऔन के लोगों को वर्षों तक अकाल और फ़सल की ख़राबी जैसी मुसीबतों में डाला, ताकि शायद वे चेत जाएं व ध्यान दें, (130)

(मगर) फिर, जब उन पर कभी ख़ुशहाली आ जाती, तो वे कहते, "इस पर तो हमारा हक़ बनता था!". और जब उन्हें कोई बुरी हालत पेश आती, तो वे उसे मूसा और उसके साथियों का 'अपशगुन' [evil omen] बताते थे, मगर असल में, उनका 'अपशगुन' अल्लाह की तरफ़ से था, हालाँकि उनमें से अधिकतर लोग इस बात को समझ नहीं पाए।  (131)

और वे (मूसा से) बोले, "हम पर अपना जादू चलाने के लिए चाहे तू कैसी भी निशानियाँ हमारे सामने ले आए, हम तुझपर विश्वास करनेवाले नहीं हैं," (132)

और इसलिए, हमने उन पर (एक के बाद एक मुसीबतें) छोड़ दीं---- बाढ़, टिड्डियों (के दल), छोटे (घुन के) कीड़े [जुएं], मेंढक और ख़ून-----ये सभी साफ़-साफ़ निशानियाँ थीं. (मगर) वे बड़े घमंडी, और मुजरिम लोग थे। (133)

जब कभी उनपर (प्लेग के रूप में) यातना आ पड़ती, तो वे कहते थे, "ऐ मूसा, जो वादा तेरे रब ने तेरे साथ कर रखा है, उस आधार पर तू अपने रब से हमारे लिए दुआ कर दे : अगर तू ने हमें इस (प्लेग की) यातना से छुटकारा दिला दिया, तो हम तुझ पर विश्वास कर लेंगे, और इसराईल की सन्तान को तेरे साथ जाने देंगे," (134)

मगर जब हम ने उन्हें उस (प्लेग की) यातना से छुटकारा दे दिया और उन्हें एक तय किया हुआ समय भी दिया (ताकि वे विश्वास करने का वादा पूरा कर सकें)-----तो क्या देखते हैं कि उन्होंने अपना वादा तोड़ डाला। (135

और इस तरह, चूँकि उन्होंने हमारी निशानियों को मानने से इंकार कर दिया, और उन्हें पूरी तरह से नज़रअंदाज़ कर दिया, तो फिर हमने उनसे बदला लिया : हम ने उन्हें समंदर में डुबा दिया,  (136

और जिन (इसराइली) लोगों पर (बरसों से) ज़ुल्म हुआ था, हमने उन्हें उस भू-भाग के पूरब और पश्चिम के हिस्सों [सीरिया व फ़िलिस्तीन] का वारिस बना दिया, जिसे हमने बरकत [blessing] दी थी। (इस तरह) तुम्हारे रब ने इसराईल की सन्तान के साथ जो भलाई का वादा कर रखा था, वह पूरा हुआ, क्योंकि उन्होंने धीरज [सब्र] से काम लिया, और हम ने फ़िरऔन और उसकी क़ौम का वह सब कुछ तहस-नहस कर दिया, जिसे वे (ख़ूबसूरती से) बनाते थे और जिन (ऊँचे भवनों) का निर्माण किया करते थे। (137)

और इसराईल की सन्तान को हम (सुरक्षित) समंदर पार करा लाए, फिर जब वे ऐसे लोगों को पास से गुज़रे जो मूर्तियों की पूजा करते थे, तो वे बोले, "ऐ मूसा! उन लोगों के देवताओं जैसा हमारे लिए भी एक देवता बना दो।" मूसा ने कहा, "तुम सचमुच बड़े ही बेवक़ूफ़ [व जाहिल] लोग हो : (138)

ये लोग जिन (देवताओं) की पूजा में लगे हुए हैं, वह तो बर्बाद होकर रहेगा, और जो कुछ ये करते आ रहे हैं, वह व्यर्थ व किसी काम का नहीं है। (139)

मैं तुम्हारे लिए अल्लाह को छोड़कर किसी और देवता को क्यों ढूढूँ, जबकि उसने दूसरे तमाम लोगों पर तुम्हें श्रेष्ठता दी है?" (140)

[ऐ इसराईल की संतानों!] याद करो कि हमने किस तरह तुम्हें फ़िरऔन के लोगों से बचाया था, जिन्होंने तुम्हें बुरी से बुरी तकलीफ़ों में डाल रखा था, वे तुम्हारे बेटों को मार डालते और केवल तुम्हारी औरतों को (ज़िंदा) छोड़ देते थे---- इसमें तुम्हारे रब की तरफ़ से बड़ी कठिन परीक्षा थी। (141)


हमने मूसा के लिए (सीना/Sinai के पहाड़ पर इबादत करने को) तीस रातों की अवधि तय की थी, फिर उसमें दस और बढ़ा दिया : उसके रब की ठहराई हुई अवधि चालीस रातों में पूरी हुई। मूसा ने (जाने से पहले) अपने भाई हारून से कहा था, "मेरी (अनुपस्थिति में) तुम मेरी क़ौम के लोगों को संभाल लेना : हर मामले में सही तरीक़े से काम करना, और उन लोगों के पीछे न चल पड़ना जो फ़साद फैलाते हैं।" (142)

जब मूसा तय किए हुए समय पर (सीना के पहाड़ पर) पहुँचा, और उसके रब ने उससे बातें की, तो वह कहने लगा, "मेरे रब! मैं तुझे देखना चाहता हूँ : मुझे देख लेने दे!" अल्लाह ने कहा, "तुम मुझे कभी नहीं देख सकोगे, मगर उस पहाड़ [तूर] को ध्यान से देखो : अगर वह पहाड़ अपनी जगह मज़बूती से खड़ा रह गया, तो फिर तुम मुझे देख लोगे", और जब उसके रब ने अपने आपको उस पहाड़ पर प्रकट किया, तो उसे चकनाचूर कर दिया : मूसा बेहोश होकर गिर पड़ा। फिर जब होश में आया, तो कहा, "महिमावान है तू! मैं (गुनाहों की) तौबा के लिए तेरी ही ओर झुकता हूँ! और इस बात पर (कि दुनिया में अल्लाह को कोई नहीं देख सकता है) मै सबसे पहले विश्वास करता हूँ!" (143)

अल्लाह ने कहा, "ऐ मूसा! मैंने तुम्हें अपने संदेश [तोरात/Torah] दे कर, और तुम से सीधे बात कर के (तुम्हें चुन लिया है, और) तुम्हारा दर्जा दूसरे लोगों के मुक़ाबले में ऊँचा कर दिया है : जो कुछ मैंने तुम्हें दिया है, उसे सँभाल कर रखो; और शुक्र अदा करनेवालों में से हो जाओ।" (144)

हमने उनके लिए तख़्तियों [Tablets] पर (उपदेश की) हर चीज़ लिख दी थी, जो हर चीज़ को सिखाती और विस्तार से समझाती भी थी, और कहा, "उनको मज़बूती से थामे रहो, और अपने लोगों को आज्ञा दो कि वे उनकी बेहतरीन शिक्षाओं को अपनाएँ। मैं तुम्हें ऐसे लोगों का (आख़िरत में) अंत दिखा दूँगा, जो लोग आज्ञा नहीं मानते और उसके ख़िलाफ़ काम करते हैं। (145)

मैं अपनी निशानियों से उन लोगों को दूर रखूँगा, जो ज़मीन पर बिना अधिकार के घमंड में चूर रहते हैं, और वे ऐसे हैं कि अगर वे हर एक निशानी भी देख लें, तब भी वे उस पर विश्वास नहीं करेंगे; अगर वे सही मार्गदर्शन का रास्ता  देख लें, तो वे उस रास्ते को नहीं अपनायेंगे, लेकिन अगर वे गुमराही का मार्ग देख लें, तो उसी रास्ते पर चल पड़ेंगे। यह इसलिए है क्योंकि उन्होंने हमारी निशानियों को मानने से इंकार किया और उन पर ज़रा भी ध्यान नहीं दिया :   (146)

जिन लोगों ने हमारी निशानियों को और आख़िरत में (हिसाब-किताब के लिए) होनेवाली मुलाक़ात को झूठ समझ कर ठुकरा दिया, तो उनके सारे कर्म बेकार जाएंगे------ उन्हें जो बदला दिया जाएगा, वह इसके सिवा कुछ न होगा कि उन्हीं के कर्मों का फल होगा। (147)

और जबकि मूसा वहाँ मौजूद नहीं था, उसकी क़ौम के लोगों ने एक बछड़े के आकार की चीज़ की पूजा करना शुरू कर दिया जिसमें से गाय की सी आवाज़ निकलती थी-----यह बछड़ा उनके ज़ेवरों (को गलाने) से बनाया गया था। क्या वे इतना भी नहीं देख पाए कि वह न तो उनसे बातें करता है और न उन्हें कोई रास्ता ही दिखाता है? तब भी वे उसकी पूजा करने लगे : वे शैतानी करनेवाले लोग थे। (148)

फिर जब ऐसा हुआ कि वे (शर्म से) हाथ मलने लगे, और उन्हें अपने किए पर पछ्तावा हुआ और उन्हें इस बात का एहसास हो गया कि वे ग़लत काम कर रहे थे, तो कहने लगे, "अगर हमारे रब ने हम पर दया न की और उसने हमें माफ़ न किया, तो हम बर्बाद हो जाएँगे!" (149)

जब मूसा ग़ुस्से और दुख से भरा हुआ अपनी क़ौम के पास वापस आया, तो उसने कहा, "मेरे यहाँ नहीं होने पर तुम लोगों ने कितना बुरा और शैतानी काम किया है! क्या तुम अपने रब के फ़ैसले को समय से पहले ले आने के लिए इतने उतावले हो गए?" फिर उसने तख़्तियाँ नीचे फेंक दीं और अपने भाई [हारून] का बाल पकड़कर उसे अपनी ओर खींचने लगा। हारून बोला, "ऐ मेरी माँ के बेटे! इन लोगों ने मुझ पर क़ाबू पा लिया था! और क़रीब क़रीब मुझे मार ही डाला था! अतः मेरे शत्रुओं को मुझ पर हँसने का मौक़ा न दे और मुझे इन शैतानियाँ करनेवालों का साथी न ठहरा।" (150)

मूसा ने कहा, "मेरे रब! मुझे और मेरे भाई को क्षमा कर दे; और हमें अपनी रहमत की छाया में ले ले : तू तो दया करनेवालों में सबसे बड़ा दयावान है।" (151

जिन लोगों ने बछड़े की पूजा शुरू कर दी, उनपर उनके रब का क़हर टूटेगा, और इस जीवन में वे बेइज़्ज़त होकर रहेंगे." उन लोगों को हम ऐसा ही बदला देते हैं जो ऐसा झूठ गढ़ते रहते हैं, (152)

मगर तुम्हारा रब तो उन लोगों के प्रति बेहद माफ़ करनेवाला और अत्यंत दयावान है, जो अगर ग़लती कर बैठते हैं, तो फिर उसके बाद (अपनी ग़लती सुधारते हुए) तौबा करते है, और सचमुच ईमान रखते हैं। (153)

                                                                                                                                                                                   
जब मूसा का ग़ुस्सा ठंढा हुआ, तो उसने तख़्तियों को उठाया, जिसमें लोगों के मार्गदर्शन की बातें लिखी हुई थीं, और यह उन लोगों के लिए रहमत थीं जो अपने रब का डर रखते हैं। (154)

मूसा ने अपने लोगों में से सत्तर आदमियों को हमारे नियत किए हुए समय (पर तूर पहाड़ जाने) के लिए चुना, फिर जब उन लोगों को एक थरथराहट ने आ पकड़ा, तो उसने दुआ की, "मेरे रब! अगर तू ने यही करने के लिए इन्हें चुना था, तो तू बहुत पहले ही इनको, और मुझ को, भी मिटा चुका होता। तो क्या अब तू हमें इसलिए बर्बाद कर देगा कि हम में से कुछ बेवक़ूफ़ आदमियों ने ऐसा किया था? यह तो तेरी ओर से एक परीक्षा मात्र है---- इसके द्वारा तू जिसको चाहे भटकता छोड़ दे और जिसे चाहे सही रास्ता दिखा दे----- और तू ही हमारी रक्षा करनेवाला है, सो हमें माफ़ कर दे और हम पर दया कर, और तू ही माफ़ करनेवालों में सबसे बेहतर है। (155)

"[या ख़ुदा!] हमारे लिए इस संसार में भी अच्छाई लिख दे, और आने वाली दुनिया में भी। हम सच्चे दिल से तेरी ही तरफ़ लौटते हैं।" अल्लाह ने कहा, "मैं जिस किसी पर चाहता हूं, अपनी यातना ले आता हूं, लेकिन मेरी दयालुता व रहमत का हाल यह है कि उसने हर चीज़ को अपने घेरे में ले रखा है।

“मैं अपनी रहमत उन लोगों के हक़ में लिखूँगा जो बुराइयों से बचते हैं, और उचित ज़कात देते है; और जो हमारी आयतों में विश्वास रखते हैं; (156)

और उस रसूल [Messenger] के पीछे चलते हैं, जो ऐसा नबी [Prophet] है कि (न तो यहूदी नस्ल का है, और) पढ़ा-लिखा नहीं है, जिसका ज़िक्र वे अपने यहाँ तौरात [Torah] में लिखा पाते हैं, और इंजील [Bible] में भी---- जो उन्हें अच्छा व सही काम करने का हुक्म देता और बुराई व ग़लत काम करने से रोकता है, जो उनके लिए अच्छी चीज़ों को हलाल [Lawful] और बुरी चीज़ों को हराम [Unlawful] ठहराता है, और उन्हें उनके बोझ से और गले में पड़े हुए उन लोहे के बन्धनों से मुक्ति देता है, जिनमें वे जकड़े हुए थे। अतः ऐसे ही लोग हैं जो उस पर ईमान रखते हैं, उसकी इज़्ज़त करते हैं और उसकी मदद करते हैं, और वह उस रौशनी के पीछे चलते हैं, जो उसके साथ भेजी गयी है, तो ऐसे ही लोग कामयाब होंगे।" (157)

[ऐ मुहम्मद!] कह दें, "ऐ लोगो! मैं तुम सब लोगों के लिए अल्लाह का रसूल हूँ, यह उसकी तरफ़ से है जिसके नियंत्रण में आसमानों और ज़मीन की सलतनत है; उसके सिवा कोई ख़ुदा नहीं है, वही ज़िंदगी और मौत देता है, अतः विश्वास करो अल्लाह पर और उसके रसूल पर, जो ऐसा पैग़म्बर [Prophet] है कि पढ़ा-लिखा नहीं है, जो अल्लाह पर और उसकी बातों पर विश्वास रखता है। तो उसके बताए हुए रास्ते पर चलो, ताकि तुम्हें शायद मार्गदर्शन मिल जाए।" (158)

मूसा की क़ौम में से एक गिरोह ऐसे लोगों का भी हुआ जो सच्चाई का रास्ता दिखाते थे, और उसी के मुताबिक़ इंसाफ़ के साथ काम करते थे। (159)

हमने उन्हें बारह क़बीलों में, अलग-अलग समुदाय के रूप में बाँट दिया था, और, जब मूसा के लोगों ने उससे पीने का पानी माँगा, तो हमने मूसा को 'वही' [Revelation] द्वारा बता दिया कि अपनी लाठी से (एक ख़ास) चट्टान पर मारो, ताकि उससे पानी के बारह सोते फूट निकले। हर गिरोह को अपने पीने के घाट मालूम थे; हमने उनपर बादलों से छाया कर दी थी, और उनके (खाने के) लिए 'मन्न' और 'सलवा' [बटेर] उतारा था, [और कहा,] "हमनें तुम्हें जो चीज़े दे रखी हैं, उनमें से अच्छी चीज़ें खाओ।" उन्होंने (हुक्म न मान कर) हमारा तो कुछ नहीं बिगाड़ा, ख़ुद अपने हाथों अपना ही नुक़सान करते रहे। (160)

जब उनसे कहा गया था, "इस बस्ती में जा कर बस जाओ और इसमें जहाँ चाहो, आराम से खाओ-पियो, मगर यह कहते हुए अंदर जाना, “[हित्ता] यानी हमारा बोझ उतार दे!”, और दरवाज़े से सिर झुका के दाख़िल होना : हम तुम्हारे गुनाहों को क्षमा कर देंगे, और जो अच्छा काम करते हैं, उनके इनाम और ज़्यादा बढ़ा देंगे।" (161)

लेकिन जैसा कहने के लिए उनसे कहा गया था, उनमें से शैतानियाँ करने वालों ने उसके शब्दों में कुछ फेर-बदल कर (अनर्थ कर) दिया, अत: उनके गुनाहों के चलते हम ने आसमान से उनके लिए यातना भेजी। (162)

[ऐ रसूल!] आप इन (इसराईल की संतानों) से उस बस्ती के बारे में पूछें जो समंदर के किनारे थी; किस तरह उनके लोगों ने 'सब्त' [Sabbath] के दिन (मछली का शिकार नहीं करने) के मामले में अपना वचन तोड़ दिया, होता यह था कि मछलियाँ केवल उसी (सब्त के) दिन उनके पास पानी के ऊपर आ जाती थीं, मगर सप्ताह के दूसरे दिन कभी नहीं आतीं-----इस तरीक़े से हम ने उनकी परीक्षा ली : क्योंकि वे आज्ञा नहीं मानते थे----- (163)

इस बस्ती में से कुछ लोगों ने (नसीहत करने वालों से) पूछा, "तुम ऐसे लोगों को नसीहत देने के लिए क्यों बेकार में परेशान होते हो, जिन्हें अल्लाह (उनकी बुराइयों के कारण) बर्बाद कर देगा या कम से कम कठोर यातना तो देगा ही?" [नसीहत करनेवालों ने] जवाब दिया, "यह इसलिए कि तुम्हारे रब की तरफ़ से हम पर कोई इल्ज़ाम न रहे (कि हम ने अपना काम न किया), और इसलिए भी कि शायद वे (नसीहत की) बातों पर ध्यान दें।" (164)

फिर जब उन लोगों ने (उन नसीहतों) को भुला डाला, जो उन्हें दी गई थीं, तब हमने उन लोगों को तो बचा लिया जो बुराई करने से रोकते थे, मगर ग़लत काम करने वालों को, लगातार आज्ञा न मानने के कारण, कठोर सज़ा में जकड़ लिया। (165)

फिर जब वे अपने घमंड में (हदें पार करने लगे, और) वही कुछ करने लगे, जिससे उन्हें रोका गया था, तो हमने उनसे कहा, "बन्दर जैसे हो जाओ! ज़ात बाहर हो जाओ!" (166)

और उसके बाद, तुम्हारे रब ने घोषणा कर दी थी, कि वह क़यामत के दिन तक, उन पर ऐसे लोगों को बैठाता रहेगा, जो उनको दर्दनाक तकलीफ़ें पहुँचाते रहेंगे। तुम्हारा रब (बुरे कर्मों की) सज़ा देने में बहुत तेज़ है, मगर साथ में वह बहुत माफ़ करनेवाला और बेहद दयालू भी है। (167)

हमने उन्हें अलग अलग समुदायों में बाँट कर ज़मीन पर फैला दिया----- कुछ उनमें से अच्छे व नेक थे, और कुछ उनमें इन जैसे नहीं थे : हमने उन्हें अच्छी और बुरी परिस्थितियों में डालकर उनको जाँचा-परखा, ताकि शायद वे सभी (अच्छाई की तरफ़) लौट आएँ। (168)

और, उनके बाद जो पीढ़ियां आयीं, हालांकि उन्हें आसमानी किताब [तोरात] विरासत में मिली थीं, तब भी, वे इसी तुच्छ संसार के थोड़े (समय टिकनेवाले) फ़ायदे को लेने में ही लगे रहे, और कहते थे, "हमें ज़रूर माफ़ कर दिया जाएगा", और अगर इसी तरह के दूसरे (भ्रष्ट) फ़ायदे भी उनके हाथ आ जाते, तो (बिना ग़लती पर पछताए) ज़रूर उसे भी ले लेते। क्या उनसे यह क़सम नहीं ली गयी थी, जो कि किताब में लिखी हुई थी, कि वे अल्लाह के बारे में सिवाए सच के और कुछ न कहेंगे? और उन लोगों ने (किताब के) विषयों को अच्छी तरह से पढ़ा था। जिन लोगों ने अल्लाह को अपने ध्यान में रखते हुए अपने आपको बुराइयों से बचाया है, उनके लिए आख़िरत का घर कहीं अच्छा है। "तो तुम अपनी बुद्धि से काम क्यों नहीं लेते?"  (169)

मगर (इसराईल की संतान में से) जो लोग किताब को मज़बूती से थामे रहे, और पूरी पाबंदी से नमाज़ को क़ायम रखा, तो अच्छे व नेक लोगों के कर्मों का बदला देने से हम कभी मना नहीं करते हैं। (170)

जब हमने पहाड़ को ऊँचा उठा कर परछाईं की तरह उन लोगों के ऊपर कर दिया, और उन्हें लगने लगा कि वह उनके दम पर गिरनेवाला है, तो हम ने कहा, "जो कुछ हम ने तुम्हें दे रखा है, उसे मज़बूती से थामे रहो, और याद रखो जो कुछ उसमें लिखा हुआ है, ताकि तुम बुराइयों से बचते रहो।" (171)

[ऐ रसूल! यह याद दिलाएं], जब आपके रब ने आदम की सन्तान की पीठों से उनके बच्चों को बाहर निकाला, और उन्हें स्वयं अपना गवाह बनाया, तो अल्लाह ने कहा, "क्या मैं तुम्हारा रब नहीं हूँ?" और वे जवाब में बोले, "हाँ, हम गवाही देते हैं।" और ऐसा इसलिए किया कि तुम क़यामत के दिन कहीं यह न कहने लगो कि "हमें तो इसकी ख़बर ही न थी", (172)

या, यह कहने लगो कि "असल में, हम से पहले तो, हमारे बाप-दादा थे जिन्होंने अल्लाह के साथ साझेदार [Partners] ठहरा लिए थे, हम तो बस उनके बाद आनेवाली पीढ़ियों में से हैं : क्या तू हमें बर्बाद कर देगा, इस कारण से उन्होंने झूठी बातें गढ़ीं?" (173)

इस तरह, हम अपने संदेशों को अलग-अलग कर के समझाते हैं, ताकि शायद वे सच्चाई के रास्ते की ओर लौट आएं। (174)

[ऐ रसूल!], आप उन्हें उस आदमी की कहानी सुना दें जिसे हमने अपने संदेश [आयतें] दिए थे : किन्तु वह उनसे जान छुड़ा कर भाग निकला, इस तरह, शैतान ने उसे अपने पीछे चलने वाला बना लिया और वह सीधे मार्ग से भटक कर रह गया---- (175)

अगर हमारी यह इच्छा रही होती, तो इन निशानियों का उपयोग कर के हम उसका दर्जा ऊंचा कर सकते थे, मगर इसके बजाए वह तो धरती के साथ चिमट गया और अपनी इच्छा के पीछे चल पड़ा----उसकी मिसाल एक कुत्ते की तरह थी, अब चाहे तुम उसे दौड़ा कर भगाओ या उसे चुपचाप छोड़ दो, वह ज़बान बाहर निकाल कर हांफता रहेगा। ऐसी ही है उनकी छवि जो हमारी निशानियों को मानने से इंकार करते हैं। तो [ऐ रसूल], आप उन्हें यह कहानी सुना दें, ताकि वे सोच विचार कर सकें। (176)

कितनी बुरी मिसाल है उन लोगों की जिन्होंने हमारी निशानियों को मानने से इंकार कर दिया! वे ख़ुद अपने हाथों अपना ही नुक़सान करते रहे : (177)

जिस किसी को अल्लाह ने मार्ग दिखा दिया, तो वही असल में सीधा व सही मार्ग पानेवाला है, और जिस किसी को वह भटकता छोड़ दे, तो ऐसे ही लोग नुक़सान उठानेवाले हैं। (178)

हमने बहुत-से जिन्नों और आदमियों को पैदा किया है, जिनकी क़िस्मत में जहन्नम जाना लिखा हुआ है। उनके पास दिल है मगर वे इसका उपयोग  समझने-बूझने में नहीं करते हैं, उनके पास आँखें है, मगर वे देखने के काम नहीं आतीं, उनके पास कान हैं, मगर उसका उपयोग सुनने में नहीं करते। वे चौपायों की तरह हैं, नहीं, बल्कि वे उनसे भी अधिक भटके हुए हैं : यही लोग हैं जो पूरी तरह से (नसीहतों को) भुलाए बैठे हैं। (179)

सारे अच्छे (गुणों वाले) नाम अल्लाह के ही हैं: तो जब उसको पुकारना हो, तो तुम इन्हीं (नामों से) उसे पुकारो, और उन लोगों से दूर रहो, जो (मतलब बदलने के लिए) इन नामों के साथ छेड़-छाड़ करते हैं----- जो कुछ वे करते हैं, उसका पूरा पूरा बदला उन्हें दिया जाएगा। (180)

हम ने जिन्हें पैदा किया, उनमें से कुछ समूह ऐसे लोगों का है जो सच्चाई का रास्ता दिखाता है और उसी के अनुसार न्याय से काम लेता है। (181)

मगर जिन लोगों ने हमारे संदेशों को झुठा बताते हुए ठुकरा दिया, हम उन्हें थोड़ा थोड़ा कर के, इस तरह उनके अंत की ओर ले जाएँगे कि उन्हें पता तक न चलेगा : (182)

मैं उन्हें बीच-बीच में ढील दूँगा, मगर मेरी योजना बिल्कुल पक्की है। (183

क्या उनके दिमाग़ में यह बात नहीं आती कि उनके साथ (वर्षों) रहनेवाला आदमी [मुहम्मद], कोई पागल नहीं है, बल्कि वह तो साफ़-साफ़ चेतावनी दे रहा है? (184)

क्या उन लोगों ने आसमानों और ज़मीन की सल्तनत और वह तमाम चीज़ें  जो अल्लाह ने पैदा की हैं, उन पर कभी विचार नहीं किया, और यह कि इन चीज़ों के समाप्त हो जाने की घड़ी शायद नज़दीक आ लगी हो? आख़िर इस (क़ुरआन के संदेश) के बाद अब कौन-सी (दूसरी निशानियाँ) हो सकती हैं, जिस पर ये विश्वास करेंगे? (185)

जिन्हें अल्लाह भटकता छोड़ दे, तो कोई नहीं है जो उन्हें सही रास्ता दिखा सकता है: अल्लाह उन्हें अपनी अकड़ में भारी ग़लतियाँ करने के लिए छोड़  देता है। (186)

[ऐ रसूल!], वे आपसे उस घड़ी [क़ियामत] के बारे में पूछते हैं कि "वह घटना कब होगी?", कह दें, "इस बात की जानकारी तो केवल मेरे रब के पास है : केवल वही है जो इस राज़ से पर्दा उठाएगा कि वह समय कब आएगा, आसमानों और ज़मीन दोनों के लिए वह बड़ा भारी समय होगा, जब वह (समय) आएगा, तो तुम पर बस अचानक ही आ जाएगा।" वे आपसे इस बारे में इस तरह पूछते हैं, मानो आप इसे जानने के लिए बहुत उत्सुक हैं। कह दें, "(क़यामत कब आएगी), इस बात की जानकारी तो बस अल्लाह ही को है, हालाँकि ज़्यादातर लोग इस बात को नहीं समझते हैं।" (187)

[ऐ रसूल!], आप कह दें, "किसी चीज़ से फ़ायदा या नुक़सान होना, मेरे नियंत्रण में नहीं है, (यहाँ तक कि) ख़ुद मुझे अपने आप पर भी क़ाबू नहीं, जब तक कि अल्लाह न चाहे : जो चीज़ छिपी हुई है, अगर मुझे उसकी जानकारी होती, तो मेरे पास ढेर सारी अच्छी चीज़ें होतीं और मुझे कोई नुक़सान न पहुँचता। मैं इसके सिवा क्या हूँ कि बस (इंकार व बुरे कर्मों के लिए) चेतावनी देनेवाला, और उन लोगों को ख़ुशख़बरी सुनानेवाला, जो ईमान रखते हैं।" (188)

वही [अल्लाह] है, जिसने तुम सबको एक अकेली जान [Soul] से पैदा किया,  और उसी से फिर उसका (मादा) जोड़ा बनाया, ताकि वह उसके पास जाकर सुकून पा सके : फिर जब कोई मर्द अपनी बीवी के साथ सोता है और उसकी बीवी को हल्का सा बोझ [बच्चा] ठहर जाता है, फिर वह उसे लिए हुए यहाँ-वहाँ फिरती रहती है, फिर जब (गर्भ बढा) तो वह भारी हो जाती है, तब (मर्द और औरत) दोनों अपने रब, अल्लाह को पुकारते हैं, "हम ज़रूर तेरा शुक्र अदा करने वाले बन कर रहेंगे, अगर तू हमें भला-चंगा बच्चा दे दे।" (189)

लेकिन जब हम ने उन्हें भला-चंगा बच्चा प्रदान कर दिया, तो (बजाए केवल अल्लाह का शुक्र मानने के) दूसरों को उस (अल्लाह) का साझेदार [Partner]  ठहराने लगे। (190)

अल्लाह के साथ वे जिन्हें उसका साझेदार ठहराते हैं, अल्लाह उनसे कहीं ऊंचा व महान है! अल्लाह के साथ आख़िर कैसे वे (ख़ुदायी में) दूसरों को साझेदार ठहरा लेते हैं, जबकि वे कोई चीज़ भी पैदा नहीं कर सकते, बल्कि वे तो ख़ुद ही पैदा किए गए हैं,  (191)

और यह कि वे उनकी कुछ भी मदद नहीं कर सकते, यहाँ तक कि वे ख़ुद अपनी ही मदद नहीं कर सकते हैं? (192

अगर तुम [ईमानवाले], ऐसे लोगों को सही मार्ग दिखाने के लिए बुलाओ, तो वे तुम्हारे पीछे नहीं आएँगे: अब चाहे तुम उन्हें बुलाओ या चुप-चाप रहो, इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा। (193)

अल्लाह को छोड़कर जिन्हें तुम पुकारते हो, वे भी तुम्हारे ही जैसे (पैदा किए हुए) बन्दे हैं। अतः उन्हें (परेशानी में) पुकार कर देखो, फिर अगर तुम (अपनी मान्यताओं में) सच्चे हो, तो उन्हें (तुम्हारी पुकार का) जवाब देना चाहिए! (194

क्या इन (पत्थर की मूर्तियों) के पास चलने के लिए पाँव हैं, किसी चीज़ को पकड़ने के लिए हाथ हैं, देखने के लिए आँखें हैं, या उनके पास सुनने के लिए कान हैं? [ऐ रसूल!] आप कह दें, "बुला लाओ उन सब (देवताओं) को, जिन्हें तुम ने अल्लाह का साझेदार [Partners] ठहरा रखा है! फिर मेरे ख़िलाफ़ कोई साज़िश रचो! और मुझे बिल्कुल भी मत छोड़ो! (फिर देखो क्या होता है!) (195)

मेरा रखवाला तो बस अल्लाह है : उसी ने यह किताब [क़ुरआन] उतारी है, और वही है जो अच्छे व सच्चे लोगों की रक्षा करता है, (196)

मगर उसे छोड़कर जिन्हें तुम पुकारते हो, वे तुम्हारी कोई मदद नहीं कर सकते, अरे वे तो ख़ुद अपनी भी मदद नहीं कर सकते।" (197)

अगर तुम [ईमानवाले] ऐसे लोगों को सही मार्ग की ओर बुलाओ, तो वे कभी तुम्हारी पुकार नहीं सुनते हैं। [ऐ रसूल!] अगर आप उनको देखें, तो ऐसा लगेगा कि वे आपकी तरफ़ ताक रहे हैं, मगर असल में वे आपको नहीं देखते। (198)

(फिर भी) उदारता व क्षमा [Tolerance] से काम लें, और जो सही काम है उसका हुक्म देते रहें : जाहिलों की तरफ़ ध्यान न दें। (199)

अगर शैतान तुम्हें कुछ (ग़लत) करने पर उकसाए, तो अल्लाह की शरण माँगो---- वह सब कुछ सुनता, सब कुछ जानता है---- (200)

जो लोग अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते हैं, उन्हें जब शैतान कुछ (ग़लत) करने पर उकसाता है, तो उन्हें तुरंत अल्लाह का ध्यान हो आता है, और उनकी आँखें खुल जाती हैं; (201)

शैतानों के पीछे चलनेवाले लोगों को, शैतान और अधिक गुमराही में लगातार घसीटता हुआ लिए जाता है, और फिर वे रुक नहीं सकते।  (202

[ऐ रसूल], जब आप उनके पास कोई नई आयत [निशानी] लेकर नहीं जाते हैं, तो वे कहते हैं, "क्या तुम कोई एक निशानी की माँग नहीं कर सकते?" कह दें, "मेरे रब की तरफ़ से जो 'वही' [Revelation] मुझ पर उतारी जाती है, मैं तो बस उसी को दोहरा देता हूँ : आपके रब की तरफ़ से उतरी हुई ये आयतें [क़ुरआन], (लोगों में) गहरी समझ बढ़ाती हैं, और ईमान रखनेवालों के लिए यह रास्ता दिखानेवाली और रहमत हैं," (203)

तो [मुसलमानो], जब क़ुरआन पढ़ी जाए तो उसे ध्यान से और ख़ामोशी से सुना करो, ताकि तुम पर दया की जा सके। (204)

[ऐ रसूल!], अपने रब को मन ही मन में याद किया करें, सुबह के वक़्त भी और शाम के वक़्त भी, पूरी विनम्रता और (रब से) डरते हुए, और ज़बान से भी पुकारें, बिना ऊँची आवाज़ किए हुए ----- और उन लोगों में से न हो जाएं जो इन बातों को बिल्कुल भुलाए बैठे हैं------ (205)

यहाँ तक कि जो [फ़रिश्ते] आपके रब के सामने मौजूद रहते हैं, वे कभी अपनी अकड़ दिखाते हुए उसकी बंदगी न करें, ऐसा कभी नहीं होता : वे उसकी महिमा का बखान करते रहते हैं और उसके सामने सिर झुकाए रहते हैं।  (206)







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